| 1980 का फोटोग्राफिक ए. आई ट्रेंड सस्ती होती प्रसिद्धि और महँगा होता सच _______________________ सुमन पाण्डेय |
यादों का जादू इतना गहरा केवल इसलिए नहीं था कि वह अतीत था, बल्कि इसलिए था कि वह हमारे अतीत का गहरा हिस्सा था. इसलिए था कि हम उस क्षण में उपस्थित थे, हमने उस पल को जिया था. हमारे अनुभव हमारी कल्पनाओं को विस्तार देते थे. हम अपनी कल्पना में कुछ भी हो सकते थे. जिसके सामने खड़े होने में पैर काँपते थे, कल्पना में उसके कंधे पर अपना सिर रख सकते थे. कल्पना ही एक निजता का अनुभव दे जाती थी.
आपको लगेगा कि मैं क्या बात कर रही हूँ. क्या केवल रोमांस ही अतीत और उसकी कल्पना को गढ़ता है? क्या संघर्ष, जिज्ञासा और त्रासदी अनुभव और कल्पनाओं का हिस्सा नहीं थे? क्या हमने अपनी आकांक्षाओं और प्रयत्नों के सहारे विजय नहीं पाई? क्या हमने सहने की हद तक किसी लंबे संघर्ष को नहीं देखा?
यदि यह सब अनुभव का हिस्सा था, तो 80 के दशक के इन छायाचित्रों का चलन बदलते दशकों में केवल कपड़े, चप्पल और जीवन-शैली के बदलने की कहानी क्यों बनकर रह गया है? समय के साथ केवल पहनावा और जीवन-शैली ही नहीं बदलती; समस्त उपकरण, तकनीक और व्यवस्थाएँ भी अपने रूप और प्रक्रिया को क्रमशः विकसित करती हैं.
लेकिन हम ऐसे समय में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ स्मृति के लिए अनुभव का होना अनिवार्य नहीं रह गया है.
जिस समय को हमने जिया ही नहीं, उसकी भी तस्वीर हमारे पास हो सकती है. जिस स्थान पर हम गए नहीं, वहाँ भी खड़े होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कर सकते हैं. जिस रूप में हम हैं ही नहीं, उस रूप में अपने अतीत की एक “याद” सामाजिक माध्यमों पर साझा की जा सकती है.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने छवि-निर्माण की इस क्षमता को इतनी सहजता से उपलब्ध कराया है कि अब सृजन के लिए सिद्धहस्त कलाकार तो छोड़िए, कैमरे और छायाचित्रकार की भी आवश्यकता नहीं है. न औरत को श्रृंगार करना है, न रूप-सज्जाकार को श्रृंगार करना है, न परिधान-रचनाकार के पास जाकर कपड़े खरीदने हैं. कृत्रिम बुद्धिमत्ता अघटित क्षणों की कल्पना को भी दृश्य प्रमाण जैसा रूप देने लगी है.
कहते हैं, प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती. अतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रत्यक्ष का ऐसा छद्म रचा जा रहा है, जिसने सृजन को ही नहीं, कल्पना और अनुभव के अवसर को भी छीन लिया है. ऐसा छद्म रचा जा रहा है जिसमें प्रक्रिया ही गायब है.
इस सप्ताह के इस चलन में एक आश्चर्यजनक बात यह भी है कि डिजाइन की दुनिया में चलन, ऋतु और संग्रह कुछ महीनों में बदलते हैं, जबकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने चलन की आयु भी शायद एक सप्ताह तक सीमित कर दी है. इस चलन को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है.

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सामाजिक माध्यमों पर अचानक ऐसी असंख्य छवियाँ दिखाई देने लगी हैं, जिनमें हर पुरुष के लंबे बाल हैं, बड़ा कॉलर है, रंगीन कपड़े हैं, कुल मिलाकर एक “डिस्को नर्तक” से प्रभावित छवि. वहीं सभी स्त्रियों के कंधों तक कटे हुए बाल, ऊँची कमर वाली पतलून और फ्रॉक जैसी पोशाकें दिखाई देती हैं.
क्या 80 का दशक केवल सिनेमा द्वारा जनित छवियों का ही था? क्या 80 के दशक में पारंपरिक छवियाँ, शिल्प, कामगार, व्यापारी, शिक्षक, किसान, मध्यमवर्गीय परिवार और असंख्य सामान्य लोग नहीं थे? क्या उस समय की पहचान केवल सिनेमा और फैशन ही रही होगी?
हद तो तब देखने को मिलती है जब 80 के दशक के कार्यालयों में चलचित्र संगणक यानी लैपटॉप तक दिखाई देता है. मानो तकनीक ने भी इतिहास और तकनीकी विकास के क्रम को पीछे छोड़ दिया हो. मानो कार्यालय की अवधारणा में दफ्तर और फाइलों का जत्था कोई मायने ही न रखता हो.
दृश्य इतना आकर्षक और “पुराना” बनाया जाता है कि वह अतीत के विविधता-भरे छायाचित्रात्मक दस्तावेजीकरण से इतर अतीत की हमारी सामूहिक चेतना का एक छद्म रचने लगता है.
हम अपने अतीत को याद कर रहे हैं या कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से अपने लिए ऐसा अतीत बना रहे हैं जिसे हमने कभी जिया ही नहीं?

स्मृतिराग सामान्यतः किसी जिए हुए अनुभव से जुड़ा होता है. किसी पुराने घर की गंध, बचपन के खिलौने, माता-पिता की पुरानी तस्वीरें, किसी शहर की सड़क या किसी गीत की धुन हमें अपने अनुभव में ले जाती है. लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित स्मृतिराग का यह नया रूप इस व्यवस्था को ही उलट देता है.
पहले छवि आती है, फिर स्मृति का भाव पैदा होता है.
व्यक्ति किसी समय को केवल इसलिए याद नहीं करता कि उसने उसे जिया है. वह उस समय से निर्मित दृश्य भाषा को देखकर भी उसके प्रति एक भावनात्मक लगाव पैदा कर सकता है. यह लगाव स्वयं को जानने के बजाय एक ऐसे दृश्य को रच रहा है, जो उसके मन में कहीं दमित है.
यानी यथार्थ और कल्पना के विस्तार के इतर अपनी ख्वाहिशों का एक छद्म-सत्य, जो लोगों के मध्य अपने होने की प्रस्तुति को रोचकता के साथ दूसरों की प्रशंसा और स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न भी है.
यह बात कहते हुए मुझे एंडी वारहोल याद आते हैं. प्रसिद्ध अमेरिकी कलाकार, जिन्होंने पुनरुत्पादन और विज्ञापन को ही अपनी कला की भाषा बनाया था. उनसे जुड़ा प्रसिद्ध कथन है—
“भविष्य में हर व्यक्ति पंद्रह मिनट के लिए विश्व-प्रसिद्ध होगा.”
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आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सामाजिक माध्यमों द्वारा संचालित युग में यह लगभग रोजमर्रा की वास्तविकता जैसा प्रतीत होने लगा है. हर व्यक्ति कुछ क्षणों के लिए दृश्यता प्राप्त कर सकता है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस दृश्यता को एक और सुविधा देती है अब हमें केवल दिखाई देना नहीं है, बल्कि अपने लिए वह दृश्य रूप भी निर्मित करना है, जिसमें हम दिखाई देना चाहते हैं.
इसलिए यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता का चलन केवल सुविधा और मनोरंजन को जन्म नहीं दे रहा है. यह स्वयं को स्वीकारने से दूर, अपनी आंतरिक छवि के अनुसार स्व का प्रदर्शन और उसके मध्य एक छद्म संस्कृति का विस्तार भी कर रहा है, जिसमें न तो अनुभव है, न कल्पना और न ही आश्चर्य का भाव; केवल कृत्रिमता की एक सहज स्वीकृति है.
यहाँ एक और बात स्थापित होने लगती है कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक प्रक्रिया-विहीन निर्णय है. इस चलन का अनुसरण करने वाला भी अनभिज्ञ है कि उसकी छवि कैसी बनकर आएगी. अब छवि को वास्तविक अनुभव बनाने की आवश्यकता नहीं है. अनुभव से पहले ही उसकी छवि बनाई जा सकती है. और जब वह छवि बार-बार देखी, साझा और दोहराई जाती है, तो वह धीरे-धीरे व्यक्तिगत कल्पना से सामूहिक मिथक में बदल जाती है. यहाँ से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है क्या सृजन केवल छवि बनाता है या छवि धीरे-धीरे एक मिथक गढ़ने लगती है? यह मिथक सृजन की बहुलता तो देगा, पर मनुष्य की विविधता के परिचय को एकरूपता में निर्मित करने लगेगा. हम निजता और बहुरूपता के विपरीत, विविध चेहरों वाले एक ही पर्चे का हिस्सा बनते जाते हैं.
मुझे बड़ा आश्चर्य इस बात पर भी होता है कि विज्ञापन के विरोध में कितने सामाजिक प्रयत्न हुए. फेयर एंड लवली के विज्ञापन में गोरेपन की धारणा का विरोध हुआ. फैशन की दुनिया में शरीर को लेकर अपमानजनक दृष्टि के विरुद्ध आवाजें उठीं. त्वचा के रंग और सौंदर्य की नई परिभाषाओं को लेकर कितने गहरे प्रयत्न हुए. सौंदर्य उत्पादों, फैशन और विशिष्टता के विपरीत समावेशिता की विचारधारा को स्थापित करने की कोशिश की जाती रही है. किन्तु न चाहते हुए और न जानते हुए भी व्यक्ति समय और समाज की विविधता को फिर से एक सांस्कृतिक एकरूपता में ढाल रहा है जो औद्योगिक विकास के कारण पैदा हुई सबसे बड़ी समस्याओं में से एक रही है. और हम उस अतीत की याद में मगन हैं, जो हमारी थी ही नहीं.
यहाँ केवल किसी दूसरे छद्म का अनुभव, छवि के माध्यम से होड़ का वह मिथक रचा जा रहा है, जिसमें न अनुभव है और न ही किसी समय-विशेष की पूर्ण और स्पष्ट सच्चाई. क्योंकि सिनेमा और फैशन भी एक कल्पना का छद्म हैं, जो वास्तविकता से बहुत दूर होते हैं. किन्तु अभिनेता के पास तो अभिनय और आकर्षक आभा का अनुभव था. उसके पीछे श्रम था, शरीर था, अभ्यास था, मंच था, कैमरा था और एक प्रक्रिया थी. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में अब अभिनेता का जीवन भी इच्छा और छवि को स्वयं को किसी नए रूप में स्थापित करने की एक नई अवधारणा में बदलने लगेगा.
अब यहाँ प्रश्न आता है जब स्मृति अनुभव से मुक्त होकर रची जाएगी, प्रसिद्धि कुछ क्षणों में हासिल कर ली जाएगी और सच जैसा दिखने वाला कल्पित संसार रचा जाएगा, तब इस समय में सच की कीमत क्या रहेगी?
यह अनुभव-विहीन स्मृति का विचार केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं है. यह दृश्य संस्कृति के स्वभाव में परिवर्तन है.
पहले छायाचित्र घटनाओं की स्मृति-साक्षी हुआ करते थे. अब छायाचित्र स्वयं पुनरुत्पादन और उसके संकट के संदर्भ में कैमरे और छायाचित्रकार की भूमिका को चुनौती देते दिखाई देते हैं.
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वाल्टर बेंजामिन ने यांत्रिक पुनरुत्पादन के युग में कलाकृति के आभामंडल, प्रामाणिकता और ऐतिहासिक साक्ष्य पर विचार किया. उनके अनुसार किसी वस्तु की प्रमाणिकता उसके इतिहास और उसकी विशिष्ट उपस्थिति से जुड़ी होती है, जबकि पुनरुत्पादन उस विशिष्टता और ऐतिहासिक प्रामाणिकता को कमजोर करता है. छायाचित्र ने इसी परिवर्तन को गति दी, जबकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित छवि इससे भी आगे जाती है. वह उस घटना के घटित होने की संभावना को भी समाप्त कर देती है, जिसकी तस्वीर बनाई जा रही है.
रोलां बार्थ स्वयं छायाचित्र खींचते समय अपने सामने आने और स्वयं को छवि में बदलने की प्रक्रिया की बात करते हैं. इसलिए छायाचित्र केवल चेहरा नहीं, बल्कि उपस्थिति का प्रमाण भी था.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित छवि इस संबंध को उलट देती है. अब छायाचित्र-जैसी छवि यह नहीं कहती— “यह था.” बल्कि कहती है, “यह होता तो ऐसा दिखता.” यानी बार्थ के “जो घटित हो चुका है” की अवधारणा बदलकर “जो घटित हो सकता था” की ओर एक सांस्कृतिक परिवर्तन दिखाई देता है.
सुसान सोंटाग ने छायाचित्र को केवल वास्तविकता का पारदर्शी अभिलेख मानने से इनकार किया. उन्होंने छायाचित्र को दुनिया को एक विशेष संबंध में रखने और उसे ज्ञान की तरह ग्रहण करने का माध्यम माना. छायाचित्र प्रमाण जैसा प्रतीत होता है. वह हमें विश्वास दिला सकता है कि जो दिखाया गया है, वह वास्तव में था. साथ ही छायाचित्र चयन, सीमांकन और सौंदर्यपरक निर्णय के माध्यम से वास्तविकता की व्याख्या करता है.
छायाचित्रकार जहाँ यह प्रश्न करता है कि—“वास्तविकता में क्या दिखाऊँ?”
कृत्रिम बुद्धिमत्ता पूछ सकती है—“आप कौन-सी वास्तविकता देखना चाहते हैं?”
यहीं से सृजन, अनुभव और प्रक्रिया के बीच का संबंध और दूर होता जाता है.
और अर्विंग गॉफमैन के सामाजिक जीवन के प्रदर्शन का वह पक्ष उभरता है, जहाँ व्यक्ति अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों में अपने स्व को प्रस्तुत करता है. सामाजिक माध्यम इस प्रस्तुतीकरण को और स्वाभाविक रूप से स्थायित्व प्रदान करने लगते हैं. हम अपनी जिंदगी के चुने हुए क्षण दिखाते हैं. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहयोग से तो केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रहते कि किस हिस्से को दिखाना है, बल्कि यह भी तय कर सकते हैं कि किस तरह दिखना है.
यहीं गाय देबोर की द सोसाइटी ऑफ द स्पेक्टेकल अर्थात दृश्य-तमाशे के समाज की अवधारणा सामने आती है. उनके अनुसार दृश्य-तमाशा केवल छवियों का संग्रह नहीं है, बल्कि छवियों के माध्यम से निर्मित मनुष्यों के बीच सामाजिक संबंध है. अतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता का यह दौर अनुभव-विहीन स्मृतिराग का एक दृश्य-तमाशा बन जाता है. और यह 80 के दशक का स्मृतिराग भी चयनित है, एक ऐसा चयनित अतीत, जो 80 के दशक को आकर्षक आभा के प्रश्न में बदल देता है.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विषय में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि वह इतिहास को कालक्रम से नहीं, बल्कि दृश्य सामंजस्य से बनाती है. वह एक ऐसे दृश्य का मिथक गढ़ती है, जिसे देखकर लगता है कि 80 का दशक केवल एक वर्ग, एक शैली या एक दृश्य संस्कृति का दशक था.और इतनी बड़ी तादाद में इसका छवि-निर्माण के लिए प्रयोग एक ऐसा संसार रचता है जिसे “संदर्भ के बिना समानता” कहा जा सकता है, यानी अनुभव नहीं, फिर भी स्मृति; वस्तु नहीं, फिर भी छायाचित्र; घटना नहीं, फिर भी ऐतिहासिक रूप.
यही अनुभव-विहीन संस्कृति है.
यही प्रक्रिया-विहीन सृजन है.
कला और शिल्प जहाँ प्रक्रिया की धुरी पर रचते हैं, जहाँ देखना, सीखना, अनुभव करना, संग्रह करना, स्वीकारना, नकारना, सफलता और असफलता के क्रम में निर्माण का जो सुख कलाकार को मिलता है, वही कलाकार की सबसे बड़ी पूँजी होती है.
प्रक्रिया का सुख कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निर्मित छवियों ने समाप्त नहीं तो कम अवश्य कर दिया है.
सिर्फ एक निर्देश-वाक्य, यानी एक कुंजी दबाई और आदेश हाजिर.
इस हाजिरगिरी के पीछे सबसे बड़ी अनुपस्थिति जो रचती है, वह है प्रक्रिया और उससे जनित अनुभव.
यानी हम ऐसी अर्थव्यवस्था में प्रवेश कर चुके हैं जो इस विचार को जन्म देती है. सृजन मिथक का निर्माण करता है.
और जब सृजन इतना सहज, त्वरित और प्रक्रिया-विहीन हो जाता है, तो मिथक भी उतनी ही तेजी से बनने लगता है. फिर वही मिथक बार-बार दिखाई देता है, दोहराया जाता है, साझा किया जाता है और धीरे-धीरे सामूहिक चेतना का हिस्सा बनने लगता है.
यहीं युवाल नोआ हरारी का तर्क मेरे लेख को एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष की ओर ले जाता है. सत्य महँगा होता है. सत्य को स्थापित करना महँगा होता है. इसके लिए साक्ष्य इकट्ठा करना होता है, तथ्यों की जाँच करनी होती है, समय और संसाधन लगाने पड़ते हैं. इसके विपरीत कल्पित संसार को मनचाहे ढंग से बनाया जा सकता है. उसे सरल, आकर्षक, सुसंगत और बार-बार दोहराने योग्य बनाया जा सकता है.
सच कई बार जटिल और हृदयविदारक भी होता है.
झूठ या कल्पित संसार को आकर्षक बनाया जा सकता है.
और आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस प्रक्रिया को और भी सस्ता कर दिया है.
सत्य धीमा है.
सत्य जटिल है.
सत्य संदर्भपूर्ण है.
सत्य साक्ष्यपूर्ण है.
किन्तु मिथक या कल्पित संसार सस्ता हो सकता है.
यहाँ “मिथक” का अर्थ केवल झूठ नहीं है. मिथक वह शक्ति भी है जो अपने बनाए हुए अर्थ को सामान्य और स्वाभाविक बना देती है. इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता की समस्या केवल यह नहीं है कि वह 1980 का एक वर्ग या एक पक्ष दिखा रही है. अधिक गंभीर बात यह है कि वह एक चयनित 1980 को इतनी बार दिखा सकती है कि वह हमें 1980 का स्वाभाविक रूप लगने लगे. यानी इसकी सबसे दुर्बल और विकट समस्या यह है कि वास्तविक इतिहास की विविधता गायब होकर एक सौंदर्यपरक रूढ़ छवि में बदलती जा रही है. और शायद इसी कारण आज हमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निर्मित छायाचित्र से केवल यह नहीं पूछना चाहिए—“क्या यह तस्वीर सच है?”
हमें यह भी पूछना चाहिए— “क्या यह स्मृति सच है?”
“क्या यह अनुभव सच था?”
“क्या यह अतीत वास्तव में हमारा था?”
क्योंकि अब हमारे सामने केवल छवि बनाने की तकनीक नहीं है. हमारे सामने स्मृति बनाने की तकनीक भी है. और जब स्मृति अनुभव-विहीन हो जाए, सृजन प्रक्रिया-विहीन हो जाए, प्रसिद्धि क्षणिक हो जाए और मिथक को गढ़ना सस्ता हो जाए, तब शायद सबसे कठिन और सबसे महँगी चीज़ वही रह जाती है. सच.
डॉ. सुमन पांडेय कला एवं डिज़ाइन की शिक्षिका, शोधकर्ता, कलाकार और लेखिका हैं. वे GLS University, अहमदाबाद के Faculty of Design में सहायक प्राध्यापक हैं. उन्होंने बनस्थली विद्यापीठ से ललित कला में पीएच.डी. की है. उनके शोध और लेखन के प्रमुख क्षेत्र भारतीय कला, वस्त्र एवं पारंपरिक शिल्प, संस्कृति, सौंदर्यशास्त्र और समकालीन डिज़ाइन हैं. उनकी प्रकाशित पुस्तकों में Chhipa Chhapaan and Chhapai: Traditional Hand Block Printing of Bagru तथा Cross Currents: Interdisciplinary Reflection on Art, Craft and Design प्रमुख हैं. वे कला, शिल्प और समाज के अंतर्संबंधों पर निरंतर लेखन एवं शोध करती रही हैं. |




तकनीकी रचित विडम्बनापूर्ण स्थिति में फँसे मानव जीवन के जरूरी सरोकारों को रेखांकित करता जरूरी लेख। सामयिक विषयों पर सार्वकालिक दृष्टि से सम्पन्न ऐसे लेख कम ही देखने में आते हैं। सुमन जी का साधुवाद कि उन्होंने सोचने पर विवश किया है।
महत्वपूर्ण लेख। यह अनुभवविहीन स्मृति ही नहीं बल्कि काल्पनिक स्मृति को गढ़ने की प्रक्रिया है. हरारी इससे और आगे बढ़कर कहते हैं कि हमारा इतिहास मिथक हो जाएगा और मिथक नए सिरे से गढ़े जाएंगे। जैसा कि आप कह रही हैं यह हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा होंगे। इस लेख के ही संदर्भ में यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि क्या 80 का ट्रेंड किसी और नए मॉडल को ट्रेंड करने में डेटा इकट्ठा करने की कवायद तो नहीं?
सुमन पांडे का सोच लगता है, सिर्फ अतीत के छवि-चित्रों को लेकर है. एआई हमारे जीवन के सभी पक्षों और सरोकारों से जुड़ा है. वह हमें, हमारे सोच को विस्तार दे रहा है. सवाल यह है कि हम अपने दिमाग में मौजूद खुद की स्मृति से जुड़ी छवि को ही क्यों अंतिम मानकर चल रहे हैं? वर्तमान में सभी कुछ बदल रहा है तो हमारी दृष्टि और मूल्यबोध में भी तो विस्तार हो रहा है. हम क्यों हमेशा एक ही छवि को अंतिम मानने का दुराग्रह अपनाये रखना चाहते हैं? युवाल हरारी का जो कोट उन्होंने दिया है, उनकी बात तो हरारी के आशय के एकदम उलट है. हरारी का मुख्य प्रस्थान ही यहाँ से है कि हर चीज बदल और फ़ैल रही है तथा नयी अपेक्षाओं के अनुरूप खुद को ढाल रही है.
उनकी चर्चा में एक शब्द मिथक भी आया है. एआई ने तो मिथक को अपने तत्काल समय के अनुरूप समझने और आकार देने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. मिथक है क्या? वह एक देश-काल सापेक्ष अवधारणा होती है. जो मेरा मिथक है, वह उसी रूप में दूसरे का हो ही नहीं सकता. दुर्गा-काली, देवात्माओं के वर्ण, रंग-रूप और सरोकार हर समाज और मानव-आस्थाओं के बीच बदलते रहते हैं, हमारे देश में औपनिवेशिक समझ ने मिथक को सिर्फ ग्रीक-लेटिन सांचे में ढालकर उसे कतई एक-आयामी बन दिया है. इस रूप में हमें अपने जड़ों से जुड़ी छवियों को तलाशने और समझने में अभी वक़्त लगेगा.
जिस कोलोनियल हैंगओवर से आज हम सिर से पाँव तक जकड़े हुए हैं, रातों-रात तो उससे मुक्त नहीं हो सकते. मेकॉले ने जब अपनी भाषा से जुड़े विचारों के माध्यम से इस देश को गुलाम बनाने की बात की थी, वह यों ही नहीं कही थी. ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह अपने दौर का सबसे महान शिक्षाशास्त्री था, जिसे भारतीय मनीषा में रस-बस चुकी सैकड़ों स्मृतियों को धोकर अपना एक अंतर्राष्ट्रीय शास्त्र रचना था. उसकी सफलता ही इस बात को सिद्ध करती है कि हम आज खुद के मिथकों को बिगाड़ने में तो मजा लेते हैं, जब कि मेकॉले पर चोट करने वाले का व्यंग्य हमें जरा भी सहन नहीं होता. यह भी ध्यान रखें, भाषा की जड़ें शुद्धतावाद में नहीं हैं. भाषा और विचारों का अपना कोई शुद्ध रूप नहीं हुआ करता, समय के प्रवाह में जो नए शब्द और विचार आते-जाते हैं, हमारी अनिवार्य अस्मिता बन जाते हैं.
आज के समय में एआइ हमारी इस समझ को नए सिरे से आकार दे रहा है. आजकल मैं खुद अपनी रचनाओं को अधिक धारदार और सामयिक बनाने के लिए इस तकनीक का प्रयोग कर रहा हूँ, कई बार यह प्रणाली मुझे खुद को ही समझने और अपनी दृष्टि का विस्तार करने में मदद कर रही है. ऐसा कभी नहीं हुआ कि इसने मेरे स्टैंड को बदला या विकृत किया हो. एआइ आदमी का प्रतिरूप है, वह मनुष्य नहीं है.
बेहद सुंदर और महत्वपूर्ण आलेख !!!
लेकिन इस दृष्टि का एक अन्य पक्ष भी है जिस पर निष्पक्षता से विचार किया जाना चाहिए। दरअसल, स्मृति-निर्माण का संबंध यथार्थ और कल्पना दोनों से जुड़ा हुआ है। स्मृति और कल्पना का संबंध मानव संस्कृति में बहुत पुराना है। कला अपनी अभिव्यक्ति में सामान्यतः कल्पना का ही सहारा लेती है और एक ऐसा वृहद् स्मृति-संसार रचती है जो समय-प्रवाह में उतना ही वास्तविक लगने लगता है जितना यथार्थ-जनित कोई स्मृति।
कला-इतिहास को यदि हम पलटें तो किसी भी कलाकार ने कृष्ण को कभी नहीं देखा लेकिन उनके अनगिनत चित्र बनाए गए। ऐसे ही बुद्ध और जीसस के साथ भी हुआ। लेकिन कल्पना के माध्यम से ही सही, इन सभी का एक ऐसा स्मृति-संसार रचा गया, जिसका प्रभाव काल्पनिक नहीं बल्कि उतना ही वास्तविक बना रहा जितना कोई भी यथार्थ अनुभव किसी स्मृति को रचने में सहायक हो सकता है। और वैसे भी, कोई भी स्मृति हमारे जिए गए अनुभवों की पूर्ण प्रतिलिपि कभी नहीं होती। वह हमारे मानस में महज़ एक प्रभाव के रूप में ही संग्रहीत होती है जिसकी परिधी सदैव धुंधली ही बनी रहती है।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अचानक हमारे सामने हमारे अतीत की ही कोई घटना या चित्र सामने आ जाता है जिसकी स्मृति हमारे भीतर जीवित नहीं होती लेकिन फिर भी हम उसे उतने ही आश्चर्य के साथ अनुभव कर पाने में सक्षम होते हैं।
दरअसल, तकनीक की मूल स्थापना ही प्रक्रिया-केंद्रित है। तकनीक का अधिकतम खेल प्रक्रिया के नियंत्रण तक ही सीमित है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा सृजित कोई भी तस्वीर आवश्यक नहीं कि यथार्थ, कल्पना, स्मृति और अनुभव जैसी मानवीय दृष्टि का ही विषय हो। यह भी संभव है कि हम इसे परंपरागत प्रक्रिया से इतर एक नई प्रक्रिया के सहज परिणाम और नए अनुभव के रूप में देखें और समझें ।
इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए आपको हार्दिक बधाई, सुमन जी ।
मैं 1980 दशक वाले इस एआई ट्रेंड का किसी रूप में हिस्सा नहीं रहा और उन छवियों का आनंद भी नहीं ले पाया जो उस दौरान सामाजिक माध्यम पर आई होंगी। मगर यह एक शानदार प्रयोग रहा होगा। एआई नियंत्रकों ने इस प्रक्रिया से क्या पाया, हम इसका अनुमान लगा सकते हैं। परंतु आमजन ने इस प्रक्रिया से क्या पाया – हमने सीखा होगा – छवियाँ का सत्य होना आवश्यक नहीं हैं, उन्हें पहचानना होगा, उन्हें परखना होगा। छवियाँ शुद्ध, अशुद्ध, पवित्र और आपराधिक कल्पना का परिणाम हो सकतीं हैं। कोई कृत्रिम छवि अभी तक तो अतीत की हमारी स्मृति को पूरी तरह दृश्य में नहीं उतार सकती उसके लिए कला कल्पना और रचनात्मकता अब भी चाहिए। हमें छवियों से निर्मित सत्यातीत और असत्य नेरेटिव को समझने में थोड़ा और मदद मिलेगी।
हम सत्य और असत्य दोनों को और संदेह से देखने लगेंगे।
बहुत अर्थ-गर्भित लेख।
तकनीकी रचित विडम्बनापूर्ण स्थिति में फँसे मानव जीवन के जरूरी सरोकारों को रेखांकित करता जरूरी लेख। सामयिक विषयों पर सार्वकालिक दृष्टि से सम्पन्न ऐसे लेख कम ही देखने में आते हैं। सुमन जी का साधुवाद कि उन्होंने सोचने पर विवश किया है।
बहुत सार्थक, महत्वपूर्ण और अत्यंत आवश्यक लेख। समस्त उद्धरण सटीक हैं और लेखिका की अध्ययन शीलता का परिचय प्रस्तुत करते हैं।
हम कहां जा रहे हैं, क्या होना चाहिए, हमारे विचार कहीं ग्रसित तो नहीं हो रहे इन सबकी समीक्षा इस लेख में है। व्यक्तित्व का संरक्षण, विकास प्रत्येक स्थिति में आवश्यक है इसकी पुष्टि इस आलेख में निहित है।
लेखिका को बधाई, शुभकामनाएं और साधुवाद।
‘1980 का फोटोग्राफिक ए आई ट्रेंड ‘ पढ़ा, जिसे सुमन पाण्डेय ने बहुत मनोयोग से लिखा है। सुमन कला और परिकल्पना ( डिजाइन ) की अध्येता हैं और इस पर निरंतर लिखती रही हैं इसलिए जिज्ञासा हुई कि पढ़ा जाय। पढ़ने पर निःसंदेह इस बात पर प्रसन्नता हुई कि उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमता के इस डरावने समय में सर्जक की उस सर्जनशीलता और जीवनानुभव पर आए संकट को ठीक ही लक्ष्य किया है जिसने कला और तकनीक के अंतर को मिटा देने की गंभीर स्थिति को जन्म दिया है। इस तकनीक ने जीवन से स्मृति को बहिष्कृत कर ऐसा शून्य उपस्थित कर दिया है जहाँ मनुष्य अपनी प्रज्ञा और उस विवेक से ही निरस्त हुआ जा रहा है जो उसकी शक्ति रहे हैं। बिना जिए, भोगे और कल्पना किए एक बनावटी संसार उपस्थित है और वह हमें अपने चुनाव तक की स्वाधीनता नहीं दे रहा। ऐसे में एंडी वारहोल से लेकर युवाल नोवा हरारी तक जितने भी संदर्भ सुमन ने दिए हैं, वे सब उस मानवीय चिन्ता को सामने रख रहे हैं कि सत्य का क्या होगा, जीवन के अनुभव, स्वप्न और आकांक्षा कैसे रह पाएंगे और सर्जना तो दूर, स्वयं मनुष्य क्या इन प्रवृत्तियों के बिना चेतनशील बना रह सकेगा? प्रत्येक तकनीक संकट खड़ा करता है और मनुष्य उसका मार्ग निकालता है. पर यह अधिक मारक और प्रहारक है जिससे बचने पर ही मानवीय अस्मिता का बचा रहना सम्भव है।
सुमन को इस प्रश्नाकुल करनेवाले आलेख के लिए बधाई और अरुण देव को इसे प्रस्तुत करने के लिए साधुवाद।
शानदार लेख………बढ़िया ।
“लेकिन हम ऐसे समय में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ स्मृति के लिए अनुभव का होना अनिवार्य नहीं रह गया है.” दरअसल हम से हमारी स्मृति ही छिनती जा रही है। व्यवस्था को लिए स्मृतिहीन मनुष्यों से सहूलियत भी मिलती है और कर्मी भी। बहरहाल बहुत ही गहन और चिंतनपरक लेख।