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निर्मल वर्मा से श्रीवत्स की बातचीत प्रस्तुति : मनोज मोहन |
श्रीवत्स
निर्मल जी, इस वर्ष देश स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती मना रहा है, यानि कि हमें आज़ाद हुए पूरे पचास वर्ष हो चुके हैं और यह शताब्दी भी अब अवसान पर है, तो यहीं से बात शुरू करें कि इन पचास वर्षों में हिंदी साहित्य का विकास, विशेष कर कथा साहित्य का विकास किस रूप में हुआ, आप इसे किस रूप में देखते हैं, कैसे इसका आकलन करते हैं ?
निर्मल वर्मा
जब हमने या मेरी पीढ़ी के लोगों ने लिखना शुरू किया था तो कभी यह सोचा भी नहीं था कि हम किसी ऐतिहासिक क्रम की कड़ी में बीच में आते हैं. लेकिन यह ज़रूर है कि एक नागरिक होने के नाते, एक पाठक और थोड़ा बहुत अपने समय का साक्षी होने के कारण यह महसूस होता था कि स्वतंत्रता के बाद जितना भी, अंदर का ख़ालीपन है और आशाएँ हैं, आकांक्षाएँ हैं, जो समूचे राष्ट्रीय आंदोलन का स्वप्न था, उसको सँजो कर हम अपने साथ साहित्य में लाए थे. तो 50-51 का एक पक्ष, जब हमने लिखना शुरू किया, काफ़ी उजला पक्ष था, और काफ़ी हैरानी का भी पक्ष था, क्योंकि आपको मालूम है कि पार्टीशन के बाद एकदम ही, जिस शहर में मैं रहता हूँ, दिल्ली, वहाँ हज़ारों शरणार्थी आए थे, और दिल्ली का जो स्वरूप था, जो परम्परागत शांत एक शहर, जिसमें कि मैंने अपना बचपन गुज़ारा था. वह समूचा ही अस्त-व्यस्त-सा जान पड़ने लगा था. मैं यह कह सकता हूँ कि उन वर्षों में यह दोनों चीज़ें एक साथ हमारे भीतर काम कर रही थीं—स्वतंत्रता पाने के बाद जो हमारी उम्मीदें थीं वे एक तरफ़ और दूसरी तरफ़ एक अजीब तरह की हैरानी, विस्मयबोध कि आगे कैसे होने वाला है, हमारे देश की क्या नियति होगी? और जिस तरह से बाढ़ में आ कर आदमी बदहवास-सा हो जाता है, एक यह भी आलम था. तो इन दोनों पक्षों के बीच में, कम से कम मैं दूसरों के बारे में नहीं जानता, लेकिन हिंदी की नई कहानी ने इन पक्षों को समेटने की कोशिश की थी और मेरे ख़्याल में यह उजला और थोड़ा-सा धुँधला पक्ष दोनों ही इन कहानियों में उभर कर आते हैं.
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श्रीवत्स
कहानियों के अलावा भी साहित्य की अन्य विधाओं में या कहें आज़ादी की इस भावना का उत्साह समूचे साहित्यिक माहौल में नहीं दिखाई पड़ता है. कलाओं में भी. अर्से बाद जैनेंद्र के लगातार एक के बाद एक उपन्यास सामने आते हैं —विवर्त, सुखदा आदि अज्ञेय जी का ‘नदी के द्वीप’ और रेणु का ‘मैला आँचल’ यशपाल का ‘मनुष्य के रूप’ या अश्क जी के उपन्यास… और दूसरी तरफ़ कितनी ही नई पत्रिकाएँ इस दौरान शुरू हुई —’कल्पना’ हैदराबाद से, और ‘नया साहित्य’ बम्बई से निकलने लगा और भी. पचास या साठ का यह दशक जिस साहित्यिक ऊर्जा और आलोक को ले कर चला, उसके बाद यानि कि….
निर्मल वर्मा
अगर आप मुझसे पूछते हैं तो मैं कहूँगा कि जिन उपन्यासों की आपने बात कही है ‘मैला आँचल’ या ‘नदी के द्वीप’, उस समय तक आते-आते, ‘नई कहानी’ का जिसे उन्मेष कहते हैं या आंदोलन कहते हैं, वह शुरू हो चुका था. ‘मैला आँचल’ 60 के आसपास प्रकाशित हुआ है तो 50-60 के बीच का जो दौर है हिंदी कहानी का, उसमें जिन पत्रिकाओं का नाम आपने लिया है ‘कहानी’, ‘कल्पना’ है, ‘कृति’ है, नई पीढ़ी के जिन्हें हम महत्त्वपूर्ण लेखक मानते हैं, कथाकार मुझे अभी तक याद है कि हम इन्हीं पत्रिकाओं के माध्यम से कमलेश्वर या राजेंद्र यादव, राकेश या मन्नू भंडारी—इन सबकी कहानियाँ पढ़ते थे. तो इस तरह से ऐसे कहानीकारों की एक बिरादरी बनी थी जो कि इस छटपटाहट को, इस उथल-पुथल को, जो हमारे जीवन में हो रही थी. उसे अपनी कहानियों के माध्यम से प्रकट करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन एक दूसरा अंतर भी था जिसे मैं रेखांकित करना चाहूँगा. आपने अभी यशपाल और अश्क आदि का नाम लिया, ये कहानीकार अपने को इन कहानीकारों से थोड़ा अलग पाते थे, वे सोचते थे कि इन कहानीकारों ने जीवन की जिन अनुभूतियों को अपनी कहानियों में या उपन्यासों में व्यक्त किया है, वह काफ़ी स्थूल ढंग से अपने शिल्प में अभिव्यक्त होता है. जिस तरह का संश्लिष्ट जीवन नये कहानीकारों ने अपने अनुभव में भोगा था, अगर मैं संश्लिष्ट की बात करता हूँ, तो उसमें परिवार का विघटन आता है. क्योंकि यह वही समय था जब बहुत बड़ी तादाद में जो छोटे शहर थे, वे बड़े शहरों में बदलने लगे थे और शहरों का, जिसे कहते हैं अरबनाईजेशन—वह शुरू हो चुका था. इसकी वजह से जो पहले परिवार की संस्था थी, जहाँ माता-पिता, भाई-बहन के रिश्ते, एक तरह का स्थायित्व, स्नेह, जिन्हें प्राप्त था और जिसके परिप्रेक्ष्य में कहानियाँ और उपन्यास लिखे जाते थे, उसका विघटन या बिखराव इसी समय में, इसी दौर में शुरू हो गया था. इस बिखराव की पीड़ा—क्योंकि बिखराव के कारण ही पहली बार हिंदी कहानी में एक व्यक्ति के व्यक्ति होने की चेतना आई; कि मैं केवल परिवार का सदस्य नहीं हूँ. में केवल समुदाय का ही सदस्य नहीं हूँ, मैं एक व्यक्ति भी हूँ, व्यक्ति होने के नाते मैं काफ़ी अरक्षित भी हूँ. मुझे वे सब सुरक्षाएँ, वे सब आश्वासन जो मुझे अपनी फेमिली से मिलते थे, या अपने कुटुम्ब से मिलते थे. उसके आधार स्तम्भ अब धीरे-धीरे ढहने लगे हैं. तो मुझे अपनी नैतिकता, अपना रास्ता, अपने विकल्प और अपना व्यक्तित्व खुद ही रेखांकित करना पड़ेगा, उसे खुद ही चुनना पड़ेगा.
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श्रीवत्स
हाँ, और इसी संदर्भ में आपकी ‘परिंदे’ कहानी काफ़ी चर्चा में रही. नामवर जी ने उसे विशेष कर रेखांकित किया. लेकिन साठ के बाद जब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी एक मोहभंग का माहौल बना, कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारें धराशायी हो गईं. देश को चीन और पाकिस्तान के साथ कई युद्ध झेलने पड़े, तो इन नई पैदा हुई परिस्थितियों का, बदले हुए इस माहौल का, उस दौर के साहित्य पर क्या और कैसा असर हुआ?
निर्मल वर्मा
मैं समझता हूँ कि राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तनों का सीधा-सीधा प्रभाव साहित्य पर नहीं पड़ता और मैं इसे ग़लत मानता हूँ कि साहित्य में होने वाले परिवर्तनों को बिलकुल सीधे या प्रत्यक्ष रूप से, या स्थूल रूप से या मोटे तौर पर समाज की पद्धतियों के साथ जोड़ा जाए या समाज में जो हो रहा हैं. यह आशा करना कि उसकी सीधी-सीधी छाया या असर हमारे साहित्य या कहानियों पर भी है. उसका असर या उसका प्रभाव एक संवाददाता या एक पत्रकार जो लिख रहा है—वह जो रिपोटिंग करता है उस पर तो होता है, लेकिन समाज में जो परिवर्तन हो रहे होते हैं, जब तक उन परिवर्तनों में एक स्थायित्व पैदा नहीं होता, जब तक वे एक स्थायी क़िस्म के बिंब या इमेज़ मनुष्य के अनुभव क्षेत्र में नहीं अर्जित करते, तब तक वे उपन्यास या कहानी या कविता में उभर कर नहीं आते हैं. इसलिए मैं जिस ओर संकेत करना चाह रहा हूँ, वह दो लड़ाइयों के बारे में नहीं है, जो पाकिस्तान या चीन के साथ हुई. आज उन कहानियों या कविताओं को कोई याद भी नहीं करता—कृश्नचंदर की या और लोगों की जिन्होंने बहुत देशभक्ति या देशप्रेम के कारण लिखी थी, लेकिन जिनका केवल एक बहुत ही अस्थाई तरह का मूल्य था, आज उनका कोई साहित्यिक महत्त्व बिल्कुल नज़र नहीं आता. साहित्यिक महत्त्व की जो चीज़ें, हमारे इतिहास में या हमारी स्मृति में सुरक्षित हैं, वे कृतियाँ हैं, वे रचनाएँ हैं जो इस पूरे समाज के भीतर होने वाले जो परिवर्तन हो रहे थे, उससे जो एक भारतीय मनुष्य की छवि बन रही थी और वह छवि पुरानी छवि से बिलकुल अलग थी, इसको किस तरह से अपने उपन्यासों या कहानियों में जगह दी जाए.
मैं आप को उदाहरण देता हूँ…. कभी हमने सोचा था कि हमारे गाँवों में भारतीय ग्राम जीवन का जो परिवेश है, वहाँ पर रहने वाले जो लोग हैं, वे एक तरह का दूसरा ही जीवन बिता रहे हैं, और दूसरी ही तरह की आशाएँ पाल रहे हैं. उस किसान से बिल्कुल अलग या उस ग्रामवासी से बिल्कुल अलग जो हमें प्रेमचंद के उपन्यासों में दिखाई देते हैं. अभी आपने रेणु का नाम लिया था, रेणु का ‘मैला आँचल’ या ‘परती परिकथा’—आप देखिए—आपको अचानक एक परिवर्तन जान पड़ेगा कि औपनिवेशिक समय का जो हमारा भारतीय किसान है, जिसकी मूर्ति या इमेज़ प्रेमचंद के उपन्यासों में थी, रेणु के समय तक आते-आते, रेणु के उपन्यासों में, उसमें इतना आमूल परिवर्तन होता है. यह साहित्य की बड़ी देन है कि किस तरह से एक साहित्यकार एक टिपीकल टाइप, होरी का टाइप बन चुका है कि होरी हताश है, निराश है, परन्तु है और हर चीज़ को स्वीकार कर लेता है. यह प्रेमचंद के किसान की मूर्ति थी हमारे सामने. हम क्या देखते हैं रेणु के उपन्यासों में, कि एक ग्राम, एक समूचा जो ग्राम का ढाँचा है, उसमें अगर आप ‘परती परिकथा’ पढ़ें तो जिस तरह से कोसी का बाँध बन रहा है और उसने किस तरह से सारे ग्राम जीवन को झंझोड़ डाला है, और हर व्यक्ति, जो पहले गाँव में रहने की परम्पराओं में जुटा था. अब अचानक एक औद्योगीकरण, एक अजीब तरह के परिवर्तन के साथ उसके जीवन के मूल्य बदलने लगे हैं. लेकिन रेणु का भी जो सब से सुंदर पक्ष हमारे सामने आया और जिसे प्रेमचंद ने बिल्कुल भी नहीं छुआ था, वह यह था कि हमारा किसान भूखा रह सकता है, ग़रीबी में रह सकता है, लेकिन उसका एक रसिक पक्ष भी है. जबकि दिन भर काम करने के बाद वह अपने लोकगीत गाता है, नाचता है, एक दूसरे के साथ उसकी वार्ताएँ होती हैं. एक तरह की हँसी, जीवन की जो रसमयता है, वह रसमयता प्रेमचंद में आपको नहीं दिखाई देती है. जो आगे स्वतंत्रता के बाद रेणु के उपन्यासों में दिखाई देती है.
वैसे ही एक दूसरा पक्ष लीजिए—औरत का. औरत का एक पक्ष जो आपको जैनेंद्र के उपन्यासों में दिखाई देता है. जिसका कि आपने ज़िक्र किया है, क्या वही स्त्री का पक्ष हम देखते हैं, उषा प्रियम्वदा या मन्नू भण्डारी की कहानियों में या कृष्णा सोबती की कहानियों में? बिल्कुल भी नहीं. क्योंकि यहाँ स्त्री धीरे-धीरे अपने परिवार से मुक्त हो कर एक तरह से आत्मनिर्भरता महसूस कर रही है. लेकिन इस आत्मनिर्भरता के बनने की प्रक्रिया में उसे किस तरह से संघर्ष करना पड़ता है, न केवल अपने माँ-बाप से बल्कि विवाह की संस्था से, अपने पति से. …पहली बार हमारे साहित्य में तलाक़, पति और पत्नी के बीच में तनाव और हर तरह की चीज़ें जो अंदर दबी हुई थीं, वो इस स्वतंत्रता के दौर के साथ सतह पर आती हुई दिखाई देती हैं. ये होते हैं स्थायी तत्त्व, जिनसे एक अच्छी कहानी बनती है. यह नहीं कि चीन ने हमला किया या कहीं पर कुछ हो गया तो उसका क्या असर पड़ा हमारे साहित्य पर. साहित्य पर उन्हीं चीज़ों का असर पड़ता है जो कि हमारे संस्कारों को धीरे-धीरे एक स्थायित्व देती हैं. यदि मुझसे कोई पूछे कि इसमें सबसे बड़ा परिवर्तन क्या हुआ तो मैं कहूँगा कि दोनों तरह के परिवर्तन हुए, गहराई में भी और इसके विस्तार में भी. कहानी के क्षेत्र का विस्तार भी हुआ और कहानी जो पहले बड़े शहरों के पात्रों तक ही सीमित रहती थी अब कस्बे की कहानियाँ बहुत सुन्दर लिखी गईं. कमलेश्वर ने बहुत सुन्दर कहानी लिखी. छोटे-छोटे क़स्बों में लोग कैसे जीवन बिताते हैं और ग्राम जीवन का एक नया परिप्रेक्ष्य हमारे सामने आया, जो पहले हमारे साहित्य में उपलब्ध नहीं था.
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श्रीवत्स
कथा साहित्य का विकास तो आज़ादी के बाद खूब हुआ, लेकिन समीक्षा या आलोचना के विकास को आप किस रूप में देखते हैं?
निर्मल वर्मा
यह एक ऐसा प्रश्न है कि जो भारतीय मनीषा से भी सम्बंध रखता है. हमारे यहाँ आलोचना या मनीषा की परम्परा वैसी ही नहीं है जैसी कि पश्चिम में या अमेरीका में रही है. इसका कारण कुछ भी हो, ऐतिहासिक कारण हो या हमारे समाज में कारण हों, मैं उसमें नहीं जाऊँगा, समय भी नहीं है, लेकिन हमारी आलोचना का विकास बहुत कुछ इस दृष्टि से नहीं हुआ कि हम कृत्तियों का आकलन कृतियों के आधार पर करें. जब मैं कहता हूँ कि कृति के आधार पर करें तो इसका मतलब यह है कि उस कृति की सामाजिक, सोद्देश्यता के बारे में न सोचें. वह कृति अपने संगठन और अपनी संरचना में कैसे कला बन पाती है, कैसे कलाकृति बन पाती है, इस समूची प्रक्रिया से गुज़र कर आलोचना अपने हथियार गढ़े. ऐसा दुर्भाग्यवश नहीं हो पाया. इसलिए होता यह रहा कि आलोचना के नाम पर हमारे तथाकथित आलोचक यह साबित करते रहे कि कौन-सी कहानी प्रगतिशील है, कौन सी कहानी राजनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है जो कि उस आलोचना के राजनीतिक उद्देश्य हैं. कहानी से या कहानी प्रक्रिया से या रचना प्रक्रिया से उसका कोई सम्बंध नहीं, लेकिन कहानी किन्हीं राजनीतिक या सामाजिक उद्देश्यों की तरह नहीं लिखी जाती. कहानी लिखी जाती है, लेखक कहानी लिखता है, चूँकि उसके मन के भीतर जो अराजकता है, उसको छाँट कर वह किसी तरह की अर्थवत्ता प्राप्त करना चाहता है. और यह बात कोई नई चीज़ नहीं है. यह मध्यकाल में भी थी. जब तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की थी तो लोगों का मन बहलाने के लिए नहीं, लोगों को राम की भक्ति सिखाने के लिए नहीं, क्योंकि तुलसीदास खुद रामचरितमानस के माध्यम से राम की उपासना करना चाहते थे. यह दूसरी बात है कि रामचरितमानस लिखी जाने के बाद वह करोड़ों लोगों के लिए एक गहरी अर्थमयता पैदा करने लगी. इसलिए हर साहित्यकार की जो एक अनूठी देन होती है, उस रचना के माध्यम से सम्प्रेषित होती है. उस रचना के इनर मैकेनिज़्म, उसकी अंदरूनी संरचना को जाँचने की जो प्रक्रिया है, उससे आलोचना का जन्म होता है. जब तक यह प्रवृत्ति कि किस की कहानी कैसे अच्छी, कहानी बनती है, यह प्रतिक्रियावादी या प्रगतिशीलता का सवाल नहीं है, बल्कि उसके सारे समूचे शिल्प के अंदर किस तरह से वह अर्थ संचालित होता है. मोटर तेज़ी से भागती है या धीमें चलती है, यह तो बाद का सवाल है, लेकिन मोटर भागती कैसे है, प्रश्न यह है. उसको जाँचने के लिए हमें कार के गाड़ी के अंदर की जो मशीनरी है, उसकी जाँच करनी पड़ती है. यह जो एप्रोच है, यह जो रूख है, जब तक हम यह नहीं अपनाते, हमारी आलोचना ने शुरू से इस पक्ष पर ध्यान नहीं दिया, इसलिए बहुत-सी आलोचना, मैं समझता हूँ, आज कोई मायने नहीं रखती .
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श्रीवत्सयह बात आप सिर्फ़ कथालोचना के बारे में कह रहे हैं या काव्य इत्यादि…
निर्मल वर्मायह मैं कथा आलोचना के बारे में कह रहा हूँ. क्योंकि काव्य की आलोचना की हमारे देश में परम्परा थी. काव्य का जो इतिहास है, वह भी बहुत लम्बा रहा है. प्रोज़ का इतिहास तो मुश्किल से डेढ़-सौ वर्षों से भी कम ही रहा है. और जिसे हम आधुनिक गद्य कहते हैं, वह तो पचास-साठ साल से पुराना नहीं है. लेकिन काव्य की परम्परा तो बहुत पुरानी रही है. फिर काव्य की परम्परा के साथ नाट्यशास्त्र की परम्परा रही है. यानि कि भवभूति, कालिदास आदि नाटककारों ने हमारी संस्कृति, साहित्य को समृद्ध किया है. इसी के साथ-साथ जिसे हम कहते हैं सौंदर्यशास्त्र, उसका विकास भी हुआ है. भरत का, आपने देखा होगा बहुत ही ज़्यादा योगदान है, फिर उसके बाद मम्मट, आनंदवर्धन जैसे लोग हुए हैं… तो काव्य और नाटक की समीक्षा की पद्धति और परम्परा में जो गरिमा और परिपक्वता आ चुकी थी, उसी के कारण आधुनिक कविता या नई कविता का विकास हुआ, तो उस पर जो दृष्टि डाली गई वह कहीं ज़्यादा पैनी और कहीं ज्यादा अर्थपूर्ण थी. क्योंकि हमें मालूम था कि इसका शास्त्र क्या होता है. जब कि अभी तक प्रोज में या गद्य को जाँचने के लिए क्या औज़ार इस्तेमाल किये जाएँ, किस तरह की दृष्टि इस्तेमाल करनी चाहिए, जो हमारे आलोचकों के पास उपलब्ध नहीं थी.
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श्रीवत्सउपन्यास भी एक तरह से आयातित विधा है तो एक रचनाकार की हैसियत से आप क्या सोचते हैं कि ‘भारतीय उपन्यास’ की क्या अवधारणा हो सकती है?
निर्मल वर्मायह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है आपने, इस पर मैंने लिखा भी था. यह सोचने का प्रश्न है कि उपन्यास भारतीय विधा नहीं है. हालाँकि कथा कहने की विधा भारत में बहुत पुरानी है. उपन्यास कथा कहने का केवल एक विशिष्ट तरीक़ा है, एकमात्र तरीक़ा नहीं है. उसे एकमात्र फॉर्म या एकमात्र माध्यम इसलिए माना क्योंकि हम पश्चिम से बहुत आक्रांत थे. सब से ज़्यादा जो पश्चिमी साहित्य ने हमें, मैं समझता हूँ ग़लत ढंग से प्रभावित किया, वह गद्य को उपन्यास के उस विशिष्ट रूप में सीमित कर देना था जिसे हमने यूरोप से आयातित किया था. अब यह देखिए कि यूरोप में 19वीं शताब्दी, 18वीं शताब्दी में जिस तरह से उपन्यास का विकास हुआ है. उसमें यूरोप के जीवन को समेटने के जो चौखटे बने थे, उससे उस उपन्यास की संरचना हुई है. वैसे ही जैसे कि समय, जिससे उपन्यास का गहरा संबंध होता है. यहाँ से आप शुरू करते हैं. यहाँ से आप अंत करते हैं, अनुक्रमिक एक श्रृंखला होती है. जबकि भारतीय मनीषा में समय की जो अवधारणा है, वह काफ़ी अलग है. हम इस रूप में नहीं सोचते कि जो चीज़ एक बार हो चुकी, वह दुबारा से नहीं घट सकती, जैसी कि पश्चिमी धारणा होती है.
इतिहास में एक घटना अपने में बिल्कुल ऐसी होती है कि उसका रीपीटिशन नहीं होता. हर चीज़ नई होती चली जाती है, उससे प्रगति की धारणा बनती है. हाँ, ईसाई धर्म में यही है. प्रगति की धारणा ही बहुत कुछ औपन्यासिक संरचना को प्रभावित करती थी. जबकि हमारे यहाँ देखिए कि पुरानी कथाओं में इस तरह का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. पुरानी कथाओं में जो हो चुका है, वह हमेशा होता रहेगा. यह वर्तुलाकार सर्कुलर प्रक्रिया में समय घूमता है. अब ज़रा कल्पना कीजिए कि जिस जाति की समय के प्रति यह धारणा है कि वह Linear नहीं है वर्तुलाकार है, तो उसकी दृष्टि में मनुष्य के जीवन की जो घटनाएँ हैं, वे रैखिक नहीं होंगी. उसकी संरचना और उसका औपन्यासिक बिंब भी बहुत अलग होगा.
हमने अपनी मनीषा पर अपनी दृष्टि को छोड़ कर जो समय के बारे में, प्रकृति के बारे में, मनुष्य और मनुष्य के संबंधों के बारे में हैं, अगर उसके अनुसार हम किसी कथा का ढाँचा तैयार करते तो मुझे लगता है कि वो उस उपन्यास के ढाँचे से बहुत अलग होता जो कि हमने यूरोप से लिया है.
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श्रीवत्सनिर्मल जी, साहित्य के प्रति जो हमारी समझ आज़ादी के बाद बनी, विश्वविद्यालयों के द्वारा, विश्वविद्यालयों में साहित्य के पठन-पाठन का जो एक अकादमिक ढाँचा तैयार किया गया, क्या इसमें बदलते साहित्य के रू-ब-रू विकास की कोई रेखा दिखाई पड़ती है ?
निर्मल वर्मायह विकास तभी होगा जब कि सृजन के क्षेत्र में इस तरह की कहानियाँ और उपन्यास लिखे जाएंगे, जो उपन्यास की पुरानी परम्परा को तोड़ कर उस समय बोध और उस भारतीय मनीषा, जो है, उसको अपने अध्ययन क्षेत्र में, अपने सृजन क्षेत्र में लाने में सफल होंगे. तब अध्यापकों को भी और आलोचकों को भी एक चुनौती होगी कि आख़िर विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास.. यह तो बिल्कुल अलग है.. और वह है भी. यदि आप इनके उपन्यास पढ़ें जैसे कि ‘नौकर की कमीज’ या जैसा कि अब उनकी कहानियाँ आई हैं उसमें बिल्कुल ही स्वप्न, फैंटेसी और यथार्थ आपस में घुलमिल जाते हैं. यह समझ में ही नहीं आता, पता ही नहीं चलता कि कौन-सा जीवन यथार्थ में घट रहा है और कौन-सा स्वप्न में घट रहा है. और दोनों ही बहुत सुंदर ढंग से विनोद कुमार शुक्ल एक विनोदप्रियता के साथ और बहुत ही कलात्मकता के साथ अपने उपन्यासों में लाए हैं.
अच्छा, उनके उपन्यास, जितने पिछले उपन्यास है, पिछली पीढ़ी के उपन्यास है, उनसे बहुत अलग हैं. लेकिन वे सफल उपन्यास नहीं है. सफलता उनकी किस में है, जब तक यह प्रश्न हमारे अध्यापक और हमारे आलोचक नहीं पूछेंगे तब तक उनके लिए बहुत मुश्किल होगा कि वे अपनी पुरानी धारणाओं को छोड़ दें. यदि पुरानी धारणाओं के आधार पर ही कहानियाँ और उपन्यास लिखे जाते रहे तो ज़ाहिर है कि उनके लिए कोई चुनौती नहीं है.
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श्रीवत्सवैसी रचनाएँ न हों तो एक बात है लेकिन अगर वैसी रचनाएँ आ भी रही हों तो क्या आलोचना या आलोचकों का यह धर्म नहीं बनता कि पाठक की, पढ़ाने वालों की, साहित्य के प्रति जो एक आम समझ बनी होती है उसे बदलने और तोड़ने में भूमिका निभाएँ ?
निर्मल वर्मावह तो तभी निभा सकेंगे कि वे खुद कहानियों में होने वाले परिवर्तन को पहचान पाएँ. अगर आप उन्हें पहचानने से ही आँखें मूँद लेते हैं! हमारे अधिकांश आलोचकों ने तो नई कहानी या नई कहानी आंदोलन को ही, जो नये परिवर्तन हो रहे थे, उन्हें ही स्वीकार करने से इनकार कर दिया. वे तो निराला और पंत के बाद मुक्तिबोध को भी अपनी कोशिश में लाना अपराध मानते थे. इसे पाप मानते थे. उसके लिए भी काफ़ी संघर्ष करना पड़ा.
तो आप यह देखिए कि जब कोई साहित्य में नया परिवर्तन होता है, उसको निगलने के लिए यह परिवर्तन सचमुच एक सार्थकता रखता है. इसका एक अर्थ है और हर कथाकार को इसका सामना करना पड़ता है. निराला के समय को देखिए कि निराला ने कविताएँ लिखनी शुरू की थीं और निराला अब छायावादी कवियों से एक अलग तरह का मुहावरा आविष्कृत करने की कोशिश कर रहे थे, तो निराला को स्वीकार करने में रामचन्द्र शुक्ल जी को बड़ी मुश्किल पड़ती थी. क्योंकि उनके लिए यह कविता ही न थी, जिस तरह से निराला लिख रहे थे. जैसा उनका विषय था, जैसा उनका काव्य मुहावरा था. लेकिन आज कोई कह सकता है कि निराला हमारे हाशिये के कवि हैं, जैसा उन दिनों माना जाता था.
निराला को कितनी आलोचनाएँ सहनी पड़ी हैं. इसीलिए मैं समझता हूँ कि किसी भी युग में जब भी कोई नया परिवर्तन होता है, वो चूंकि हमारी पुरानी धारणाओं को धक्का पहुँचाता है. ठेस पहुँचाता है, हम उसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते.
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श्रीवत्सआज समाज में व्यक्ति का महत्व बहुत कम हो गया है, संस्थाएँ, चाहे राजनीतिक हों, सामाजिक या धार्मिक, उनकी जगह बड़ी होती जा रही है. ऐसे में साहित्य की प्रासंगिकता पर बार-बार सवाल किये जाते हैं. आपको क्या लगता है, ऐसे समय में साहित्य की प्रासंगिकता के बारे में?
निर्मल वर्माजितना भी व्यक्ति का महत्व या जिस समय में व्यक्ति स्वयं को उपेक्षित पाता है, उतना ही साहित्य के प्रति उसकी लालसा बढ़ती है. उल्टा होता है, क्योंकि साहित्य में उसे, काव्य में उसे पहली बार अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं और स्वप्नों का एक ऐसा विकल्प दिखाई देता है, एक ऐसी ज़मीन दिखाई देती है, जो कि यथार्थ जीवन उसे उपलब्ध नहीं कराता. आप तो संस्थाओं की बात कह रहे हैं, आज तो प्रश्न यह पूछा जा रहा है कि मास-मीडिया की तुलना में, जहाँ टेलीविज़न है जहाँ ग्लोबलाईजेशन हो रहा है, इतनी बड़ी मैसिव टेक्नोलॉजी मास-मीडिया की उपलब्ध कर रहे हैं, उसके सामने बेचारी किताब का क्या मूल्य रह जाएगा. लेकिन मैं समझता हूँ कि उसका मूल्य सचमुच हमारे सामने आएगा. क्योंकि कितनी ख़राब किताबें लिखी जाती थीं, जो हमारा मनोरंजन करके ही ख़त्म हो जाती थी. अब ईश्वर की दया से मनोरंजन करने का दायित्व हमारे मास-मीडिया ने, हमारे पेपर्स ने, हमारी रंगीन पत्रिकाओं ने, हमारे टेलीविजन ने, अच्छा-बुरा अपने ऊपर ओढ़ लिया है. अब साहित्य का यह दायित्व नहीं रहा.
अब साहित्य पहली बार अपने उस झूठे दायित्व को छोड़ कर अपना सच्चा धर्म अपनाने की कोशिश कर रहा है. और उसका सच्चा धर्म क्या है ? हमारे जीवन के उन अन्तरतम कोनों को छूना, जिनकी ओर किसी भी मास-मीडिया की नज़र नहीं जाती. हमारे भीतर के, हमारे जीवन के उन अनुभवों को मूर्तिमान करना, कविता में या कहानी में, जिन्हें हम कहते हैं कि वे प्रत्यक्ष कभी नहीं होते, वे बाहर के उजाले में कभी नहीं आते, वो अख़बारों में कभी व्यक्त नहीं होते, लेकिन वे मेरे जीवन में, आपके जीवन में बहुत गहरी प्रासंगिकता रखते हैं.
साहित्य की प्रासंगिकता इसमें नहीं है कि वह लोगों की रुचियों को कहाँ तक स्वीकार कर पाता है. साहित्य की प्रासंगिकता इसमें है कि कहीं तक वह लोगों को अपनी जो दिन भर की रुचियाँ हैं, उनको छोड़ कर यह महसूस करवाए कि मैं अब तक कितनी ओछी रुचियों के पीछे पड़ा हुआ था. और असल में इस अँधेरे में सत्य पाने का रास्ता कहाँ से शुरू होता है, साहित्य वैसे सत्य भी नहीं दिखाता, साहित्य हमें केवल यह बताता है कि हम जिस रास्ते पर चल रहे थे, हम जिन समझौतों में जी रहे थे, हम जिस झूठ को सच समझ रहे थे, वह कितना नक़ली था. और मेरे ख़्याल में यह अपने में कोई छोटी बात नहीं है कि हम रोशनी न प्राप्त कर पाएँ, केवल यही समझ पाएँ कि हम कितने अँधेरे में हैं.
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श्रीवत्सजहाँ तक आपकी रचनाओं की बात है… तो वे हिंदी आलोचना में दो विपरीत ध्रुवों पर टिकी हुई दिखाई पड़ती है. उन्हें या तो श्रेष्ठ माना जाता है या पतनशील. आप स्वयं इन ध्रुवों में स्वयं की रचनाओं को कहाँ पाते हैं?
निर्मल वर्माजैसा कि मैंने कहा कि हमारे यहाँ आलोचना का जो सबसे बड़ा दोष मैंने बताया था कि वो इस तरह की अमूर्त, सामान्यीकृत धारणाओं का ही प्रचार है, उससे कुछ समझ में नहीं आता, क्योंकि उससे मेरा प्रश्न उठता है कि आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं? जब तक आप ठोस रूप से किसी कहानी को, उसके गुणों का, अवगुणों का आकलन नहीं करते, और आप मुझे बताएँ कि देखिए आप ने यहाँ पर, चरित्र की क्या संभावनाएँ थी और कहाँ आप उसमें असफल हो गये, इसका पूरा विकास या विस्तार नहीं कर पाए, तो बात समझ में आती है. आप अगर बढ़ई से कहेंगे कि टेबल बनाइये, और फिर आप को पसंद नहीं आए तो आप बताएँगे कि टेबल आपको क्यों नहीं पसंद आया. वैसे ही कहानी के रूप में भी आएगा कि पतन का क्या मतलब है, श्रेष्ठता का क्या मतलब है. ऐसे उपन्यास लिखे गये हैं जो कि सचमुच ही वेश्याओं के बारे में, गिरे हुए लोगों के बारे में, शराबियों के बारे में, और वे एक बहुत ही ऊँचा आदर्श प्रतिष्ठित करते हैं. क्या हम उन्हें पतनशील कहेंगे?
समूचा उपन्यास या कविता पढ़ने के बाद हम पर क्या प्रभाव पड़ता है, बात वहाँ से शुरू होनी चाहिए. वह प्रभाव कैसे पड़ता है, इसमें शब्दों का जादू भी है, इसमें बिंबों का संयोजन भी है, इसमें लेखक की दृष्टि भी है, सब चीज़ें जैसे कि मसाला जमा कर के किसी सब्ज़ी को बनाया जाता है. आप पहचान नहीं पाते कि सब्ज़ी का स्वाद कहाँ है, क्योंकि वह तो रसा मिला है… आप कहीं उसे एक को अलग नहीं कर सकते. वैसे ही कलाकार भी सौंदर्य लाता है. मुझे इस तरह का आक्षेप चाहे वो मेरे बारे में हो चाहे किसी और व्यक्ति के बारे में हो, मुझे कोई ज़्यादा समझ में नहीं आता है.
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श्रीवत्सआलोचना में जाने से पहले आलोचक के पास जो अपनी दृष्टि होती है, पूर्वाग्रह होते हैं, उनके चलते बाजदफ़ा आलोचक की दृष्टि और कृति में विरोधाभास की स्थिति आ जाती है, ऐसे में वह क्या करे ?
निर्मल वर्मामेरे ख़्याल में यह प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मैं समझता हूँ कि एक आलोचक को अपनी दृष्टि, मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि उसे अपने पूर्वाग्रह भी रखने चाहिए. जब वो किसी रचना के पास जाता है तो वह अपना समूचा माल असबाब ले कर जाता है, जो उसने सीखा है, अर्जित किया है, यूनिवर्सिटी में पढ़ा है (जो उसके अपने अनुभव रहे), यदि मैं आपसे यह कहूँ कि आप कोरे होकर मेरी कविता पढ़िए, कहानी पढ़िए तो आप कहेंगे कि मैं कोरा बन ही नहीं सकता, यह असंभव चीज़ है. लेकिन कविता और कहानी और उपन्यास का अपने अनुभवों का सत्य है.
सबसे पहली चीज़ तो यह है कि आप को किताब के अनुभव क्षेत्र में प्रवेश करने का धैर्य और क्षमता चाहिए. किस दरवाज़े से हमें इसकी दुनिया में प्रवेश करना चाहिए. एक बार जब हमें चाबी मिल जाती है भीतर जाने की और हम कविता के संसार में आते हैं, कहानी के, उपन्यास के संसार में आते हैं तो फिर उसमें हमारे जो पूर्वाग्रह हैं, वे छोड़ कर नहीं आते, उसके साथ आते हैं. लेकिन जिस दुनिया के सत्य में वह उपन्यास हमें लाता है वहाँ पर हमारा अपना सत्य, हमारा अपना अनुभव, एक अपनी सच्चाई या अपना झूठापन, अपना खोटापन, यह उसके सामने उनका टकराव होता है.
मैं समझता हूँ, हर पाठक और लेखक के बीच में यह टकराव अनिवार्य है, यही पढ़ने का रस भी है. मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ—फर्ज करो मैं सोचता हूँ कि एक औरत जिसका विवाह हो गया है, जिसके बच्चे हैं, उसे अपनी गृहस्थी और पति को छोड़ कर, तीसरे आदमी के साथ नहीं भागना चाहिए, यह उसके लिए अनैतिक है, यह मेरी धारणा है, और मैं तालॅस्ताय का उपन्यास ‘अन्ना करेनिना’ पढ़ना शुरू करता हूँ जिसमें हू-ब-हू एक लड़की यही करती है. वो प्रेम के आवेश में आकर अपने लड़के और आपने पति, अपने घर की सारी सुरक्षा न केवल छोड़ती है बल्कि समाज की बदनामी भी सहती है. लेकिन कितना बड़ा आश्चर्य है कि एक पाठक के तौर पर मुझे घृणा करनी चाहिए थी, करेनिना जैसी स्त्री से. लेकिन यह कथा का जादू है कि पहली बार उसकी भर्त्सना करने की बजाए, जो मैं अपनी नैतिक मर्यादा लेकर के गया हूँ कि एक स्त्री की नैतिक मर्यादा यह होनी चाहिए, मुझे वह छोड़नी पड़ती है. क्योंकि मुझे पहली बार उपन्यास में यह पता चलता है कि नैतिक मर्यादाओं से ऊपर भी एक मूल्य होता है, वह प्रेम का मूल्य है.
अगर उस प्रेम को पाने के लिए मुझे अपने पति की झूठी असुरक्षा को, और अपने बच्चे के स्नेह को भी छोड़ना पड़े तो यह मूल्य कहीं ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है. यह एक उदाहरण है कि किस तरह से एक पाठक, एक तरह का पूर्वाग्रह लेकर जाता है और उस कृति की महानता, उस पूर्वाग्रह को छोड़ने के लिए उसे विवश करती है. और तालॅस्ताय मुझे मज़बूर करते हैं कि मैं दुनिया की मर्यादाओं से ऊपर आकर, एक दूसरे मूल्यों की दुनिया में प्रवेश करूँ और उसके संसार के महत्व को समझ पाऊँ.
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श्रीवत्सआप की रचनाओं का फिर संदर्भ लें तो हिन्दी में पाठकों का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे आपकी रचनाएँ पढ़ते हुए अभारतीयता का अहसास होता है. इसलिए आप को यूरोप की युद्धोत्तर मनःस्थिति का लेखक भी कहा जाता है.
निर्मल वर्माआप तो पुरानी बात कर रहे हैं. नई बात तो मेरे बारे में यह है कि मैं बड़ा हिन्दूवादी हो गया हूँ. मेरी समझ में नहीं आता कि मुझ पर पश्चिम का असर है या हिंदुत्व का असर है या भारतीयता का गहरा प्रभाव है. मेरे भीतर यूरोप भी है, मेरे भीतर हिन्दू संस्कार भी हैं, मेरे भीतर भारतीय इतिहास और परम्पराओं का गहरा असर भी है. एक लेखक होने के नाते मेरे लिए यह गहरी ईमानदारी की चीज़ होगी कि मैं अपनी लेखनी में किसी पक्ष को झुठला पाऊँ या छोड़ूँ. इसलिए ये तीनों पक्ष या कहा जाए चार या पाँच, क्यों कि मैं शिमला वासी भी हूँ और शिमला का जो प्राकृतिक परिवेश है, वह मेरा सबसे ज़्यादा आत्मीय है… क्योंकि वह मेरे बचपन का परिवेश रहा है तो मेरे लेखन में इन सब चीज़ों के तत्व का सम्मिश्रण आता है.
मैं कभी भी यह नहीं सोचता कि इन सब में से मुझे इस तत्त्व को कम कर देना चाहिए, क्योंकि अगर यह तत्त्व मेरी कहानी में रहेगा तो लोग समझेंगे कि मैं बड़ा यूरोपियन बन गया हूँ. मुझे इस बात की कभी कोई चिंता नहीं रहती. इसलिए इस प्रश्न का उत्तर, मेरे लिए इसलिए भी देना मुश्किल है, क्योंकि मुझे मालूम ही नहीं कि साहित्य में भारतीयता का क्या मतलब है.
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श्रीवत्सशायद इसका मतलब यही है कि इस क्षेत्र में, यहाँ की परम्पराएँ, रीति रिवाजों, यहाँ की आबोहवा के साथ जो कुछ सामने आता है उसे स्वीकार करने में किसी को दिक्कत नहीं होती. लेकिन बाहर की, पश्चिम की कोई चीज़, वहाँ का माहौल जब उसके सामने किसी कृति में आता है तो उसे अपनेपन का वह अहसास नहीं होता… जैसा उदाहरण के लिए प्रेमचंद को पढ़ते हुए होता है.
निर्मल वर्मालेकिन क्या ऐसा है? मैं तो सोचता हूँ कि ऐसा नहीं है. क्योंकि एक भारतीय सजग पाठक, संवेदनशील पाठक के ऊपर पिछले दो सौ वर्षों का, जिसे हम औपनिवेशिक यूरोप कहते हैं, क्या उसका असर नहीं रहा है? उसके संस्कारों में वह नहीं आता? हमारी अंग्रेज़ी भाषा, अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से यूरोप में हमारी जो खिड़की खुली, अंग्रेज़ी साहित्य ने हमारे समाज में स्थान बनाया. जितनी संस्थाएँ हमारे देश में है, चाहे वह पार्लियामेंट है, चाहे जुडिशियरी है, चाहे वह हमारी यूनिवर्सिटीज़ का सिलेबस है, यह सब हमने पश्चिम से लिया हुआ है. मुझे तो यह कहते हुए शर्म आती है कि हमने अपने पश्चिमी संस्कारों को स्वतंत्रता के बाद छोड़ा नहीं, वह हम पर इतना ज़्यादा हावी हो गये हैं कि अपने को हिंदू कहना, अपने को भारतीय कहना… काश हम अपने को कह सकते ! हम नहीं कह सकते क्योंकि हमारे समूचे सोचने-समझने-जीने की पद्धति में कहीं भी भारतीयता का स्वरूप नज़र नहीं आता.
जिन लोगों में दिखाई देता था, जैसे गांधीजी थे या रमन महर्षि थे या श्री अरबिंद थे, आज कितने लोग उनके आदर्श को अपने व्यक्तिगत जीवन में लाना चाहते हैं. आज भारत और यूरोप हमारे भीतर इस तरह से घुलमिल गये हैं कि इन्हें चिमटे से उठा कर अलग-अलग करना, और ख़ास कर साहित्य में संभव नहीं. जबकि हमारा भारतीय जीवन, कम से कम हमारे बड़े शहरों का जो जीवन है, उसका चाहे अकेलापन हो, बेकारी से त्रास हो, चाहे वह असुरक्षा का भावबोध हो, चाहे धार्मिकता, आध्यात्मिकता का खोखलापन हो, ये पश्चिम में भी है और भारत में भी!
मैं तो पश्चिम में भी बहुत घूमा हूँ. दस वर्ष रहा हूँ. मुझे नहीं लगता कि इसके रूप अलग-अलग हो सकते हैं. अगर मुझसे कोई पूछे कि भारतीय साहित्य में क्या कोई ऐसी चीज़ नहीं है. मैं कहूँगा कि है, ऐसी चीज़ें हैं, क्योंकि साहित्य की भारतीयता अनुभव के आधार पर महसूस नहीं होती, यह साहित्य की भारतीयता इस बात से प्रमाणित होती है कि जो अकेलापन, जो त्रास, जो खोखलापन या जो आकांक्षा मैं अपने भीतर महसूस करता हूँ वह किस बिंब या किस शब्द को लेकर बाहर आती है.
मेरा हिंदी में लिखना ही मेरे भारतीय होने का सबसे बड़ा सर्टिफिकेट है, क्योंकि हिंदी में लिखने से ही मेरे शब्दों का जो विन्यास है इसके पीछे, परम्पराएँ हैं. जो मैं बिंब इस्तेमाल करता हूँ, जो मेरे मिथक हैं, जो बार-बार मेरी कहानियों में या उपन्यासों में आते हैं, जब मैं इन्हें मेरे कह रहा हूँ तो मतलब है कि ये भारतीय लेखक के हैं, जो उसे भारतीय बनाते हैं…. यहाँ तक कि प्रेमचंद का उपन्यास ‘गोदान’, मैं उसे आधुनिक उपन्यास मानता हूँ. लेकिन होरी की व्यथा तब प्रकट होती है, उसकी ग़रीबी तब सामने आती है, जब उसकी पत्नी को पता चलता है कि गोदान करने के लिए पैसे तक नहीं हैं.
गऊ के दान देने का जो बिंब है, यह शुद्ध भारतीय हिन्दू संस्कार है. यह किसी भी देश के साहित्य में आपको नहीं मिलेगा, क्योंकि इस तरह का गाय के प्रति लगाव, गाय के प्रति इस तरह की लालसा, गाय को इस तरह दान देने की परम्परा कहीं है ही नहीं. इस परम्परा को लेकर होरी की व्यथा का, जो कि सार्वभौमिक व्यथा है, उसकी ग़रीबी का, इतना सुंदर वर्णन जो प्रेमचंद ने किया है वह गऊ के मिथक को लेकर किया है. यानि एक शाश्वत और सार्वभौमिक चीज़, केवल एक भारतीय बिंब के माध्यम से ही सम्प्रेषित हो सकती है.
आज ऐसा नहीं होता. आज ऐसा क्यों नहीं होता, क्योंकि हमारा मिथक, हमारे संस्कार इतने विश्रृंखलित हो गये हैं कि व्यक्ति को केवल अपने ही अनुभवों पर, अपनी व्यथा को प्रकट करने के लिए इस तरह के बिंबों का कोई सहारा नहीं मिलता, जैसा प्रेमचंद को मिल जाता था. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम करते नहीं है. जब धर्मवीर भारती ने आज के समय की विडम्बनाओं को प्रकट करने की कोशिश की तो उन्होंने ‘अंधा युग’ लिखा.
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श्रीवत्स
‘सभ्यता बोध’ के धर्म मर्यादित ढाँचे में देश, राष्ट्र, संस्कृति की अवधारणाओं के बदलनेवाली बात जो आपने एक जगह कही है. उस का क्या मतलब है और इन बदली हुई अवधारणाओं में इस देश, राष्ट्र, संस्कृति को आप किस रूप में देखते हैं?
निर्मल वर्मा
मैं अगर आपका प्रश्न समझ पाया हूँ, तो मेरे कहने का मंतव्य यह था कि जब हम अपने देश की कल्पना करते हैं तो हमारा वैचारिक ढाँचा क्या होता है इस देश के स्वरूप को समझने का. जब मैंने यह लिखा था जिसका यह कोटेशन आपने मुझे दिया है, यह मैंने एक संदर्भ में लिखा था. वह संदर्भ था कि यूरोप में जो राष्ट्रों का विकास हुआ, वह बहुत कुछ जातियों और उपजातियों को नष्ट करके एक व्यक्ति की जैसे एक अहम केंद्रित अवधारणा होती है, उसका प्रतिरूप माना जा सकता है. नेशन, स्टेट जिसे हम कहते हैं. और नेशन और स्टेट और लोग तीनों एक तरह की आइडेंटिटी प्राप्त करने की कोशिश करते हैं.
भारत में ऐसा कभी नहीं रहा, क्योंकि भारत में स्टेट की अवधारणा या राष्ट्र की जैसी राजनीतिक अवधारणा होती है, एक राष्ट्र, इस तरह की धारणा का कभी महत्व नहीं था. हमारे यहाँ कौन-सी धारणा सबसे ज़्यादा, मेरे या आपके या किसी भी भारतवासी के मन में काम करती थी, और वह थी धर्म की. लेकिन धर्म का अंग्रेज़ी शब्द जो है, रिलीजन, उससे यह बात आती ही नहीं है. क्योंकि रिलीजन का जो क्रिश्चियन रिलीजन है या जोडायक रिलीजन है उससे यह धारणा आती है कि आपको ईश्वर के साथ कैसा संबंध रखना चाहिए.
चर्च जाने से या बाइबल पढ़ने से, टेस्टामेंट पढ़ने से, आपका एक रिश्ता बनता है, आपका एक धर्म बनता है. आपके धर्म सम्प्रदाय को वह किताब, वह बाइबल, वह क़ुरान परिभाषित करती है. हमारे यहाँ कोई रिश्ता नहीं था. हमारे यहाँ भारतीय समाज में धर्म का मतलब ही एक अलग ध्वनि देता है, कि मेरा कर्तव्य क्या है? न केवल कर्तव्य, उसके प्रति जो कि सर्वोपरि है, बल्कि उसके प्रति जो कि मेरा समाज है, जो कि मेरा कुटुम्ब है. जो मेरा वर्ण है, मेरे वर्ण का क्या धर्म है ? और सबसे ऊपर है, मेरा स्वधर्म क्या है? इन सब को मिला कर क्या मेरा स्वधर्म बनता है? समूचे महाभारत का केंद्रीय प्रश्न, यह है कि मेरा धर्म क्या है?
मुझे क्या करना चाहिए, किस मौक़े पर. जब धर्म की ध्वनि और आशय इतना फ़र्क होता है तो मैं समझता हूँ कि उस देश की परम्परा को ढाँचा भी, समझने का औज़ार भी कुछ अलग होना चाहिए.
हमारे देश में अनेक तरह की जातियाँ, भाषाएँ, कबीले रहे हैं लेकिन क्या आप कह सकते हैं कि वे अलग-अलग नेशंस हैं? या अलग-अलग जातियाँ है जैसा जिन्ना साहब ने कहा कि धर्म के आधार पर आप मुसलमानों को एक स्टेट दे दीजिए. ऐसा कभी नहीं रहा. क्योंकि इन सब जातियों और उपजातियों के बीच में एक तरह का केंद्रीय संस्कार रहा है… काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अनेक विभिन्नताओं के बावजूद उनके कुछ केन्द्र बिंदु रहे हैं, संस्कारों के, जो कि उन्हें एकता प्रदान करते हैं और मैं समझता हूँ ये जो केन्द्र बिंदु हैं, जो एकता प्रदान करते हैं, चाहे वो पुरानी कथाएँ हों, चाहे वो हमारे महाकाव्य हों, इनको मिलाकर चाहे वो वैदिक काव्य हों, जो उत्तर से दक्षिण तक हमारी कविता में, हमारे वाङ्मय में प्रवाहित होता है वह मेरी जाति को और मेरे राष्ट्र को, मेरी अस्मिता को प्रकट करता है. और यह जो चीज़ें मेरी अस्मिता को प्रकट करती हैं यह उन सब चीज़ों से बहुत अलग है जो कि यूरोपियन नेशन या जाति की अस्मिता को प्रकट करती हैं इसलिए मैंने उस निबंध में लिखा था कि हमें अपने को समझने के लिए उन अवधारणाओं को छोड़ना पड़ेगा जिनसे यूरोप में या अमरीका में जाति का निर्माण होता है.
हमारे यहाँ जो सभ्यता का निर्माण हुआ था, जिस संस्कृति का विकास हुआ था, उसके उन्मेष स्थल बिल्कुल भिन्न थे. अगर हम यह मान लें कि मनुष्य सृष्टि के केंद्र में नहीं है लेकिन मनुष्य सबसे अधिक चेतनावान है, जो कि वह है. वृक्षों, जानवरों, प्रकृति सब में प्राण हो सकते हैं, होते हैं लेकिन सबसे सूक्ष्म और गहन चेतना जिस प्राणी में होती है, वह मनुष्य है. अब देखिए, अगर जिस मनुष्य में सबसे ज़्यादा चेतना होती है और हमारी सभ्यता उसे केंद्र में नहीं मानती, उसे मानती है, वह सर्वोच्च चेतना पुरुष है. इससे क्या फ़र्क पड़ता है? यूरोप में, क्योंकि मनुष्य को सृष्टि के केन्द्र में माना गया है, इसलिए प्रकृति मनुष्य की गुलाम है. यह मनुष्य का अधिकार बन जाता है कि वह प्रकृति को, पशुओं को, समूचे चराचर जगत को, अपनी लालसाओं को शांत करने के लिए, उपयोग में लाए.
आज जिसे हम पर्यावरण का संकट कहते हैं, वह इसी लम्बी प्रक्रिया का परिणाम है. चूंकि समूची प्रकृति को अपना दास बनाने की, उस पर कब्जा जमाने की, उसे अपने नीचे करने की यह एक स्वाभाविक तार्किक परिणति है. मनुष्य सृष्टि के केंद्र में है, इसके पीछे. यह भावना है कि मनुष्य सब से ज़्यादा शक्तिशाली है.
भारतीय परम्परा में इसका उल्टा है. भारतीय परम्परा में मनुष्य केंद्र में नहीं है. लेकिन चूंकि सर्वोच्च चेतना से सम्पन्न है इसलिए उसको यह अधिकार ही प्राप्त नहीं होता कि वह दूसरों को अपने नीचे लाए. उसका यह कर्तव्य हो जाता है कि उस चेतना के होने के कारण वह सबके प्रति अपना दायित्व सम्पन्न करे, जिसको मैंने धर्म का नाम दिया. लेकिन दोनों, मनुष्य की दो अवधारणाएँ किस तरह दो रास्तों पर निकलती हैं, यह इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है. अहिंसा का आदर्श अगर भारत में है, हम इसका कितना पालन कर पाते हैं, नहीं कर पाते हैं, यह तो अलग बात है, हम नहीं करते हैं. लेकिन अहिंसा का जो आदर्श हमारे साहित्य, हमारे धर्म, हमारी परम्परा में रहा है. वह कभी यूरोप में नहीं रहा. क्यों? क्योंकि अहिंसा का अर्थ ही यहाँ पर है कि चाहे वह या वस्तु हो या अचर वस्तु उसका अपने लिए उपभोग करने का कोई अधिकार हमें किसी ने नहीं दिया.
अहिंसा का सूत्र ही इसमें कि कोई दूसरी चीज़ आपका साधन नहीं है उसका अपना लक्ष्य है जैसाकि आपका अपना लक्ष्य है. यह अपने में एक नीतिशास्त्र उत्पन्न करता है. भारत का नीतिशास्त्र इसीलिए एक अलग नैतिकता को विकास देता है क्योंकि उसमें मनुष्य को सर्वोच्च चेतना सम्पन्न तो माना है लेकिन सर्वोपरि नहीं गाना. केंद्र में नहीं माना. इसलिए उसको कर्तव्य देता है, लेकिन उसका अहंकार उस से ले लेता है. मनुष्य को अपने अहम को छोड़ कर अपने आत्म के प्रति सचेत होना चाहिए. और यह उसका आत्म सब व्यक्तियों के आत्म और सब प्राणियों के आत्म से अलग नहीं है… एक ही जैसा है.
साभार: विपाशा- वर्ष 12, अंक 70, 71, 72, सितम्बर ’96 से फरवरी 1997
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मनोज मोहन मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक.इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. manojmohan2828@gmail.com |





मनोज मोहन जी ने निर्मल वर्मा का यह बहुत महत्वपूर्ण साक्षात्कार उपलब्ध कराया है। आज के संदर्भ में भी यह कई साहित्यिक मान्यताओं और निर्मल वर्मा को समझने के लिए बहुत प्रासंगिक है। समालोचन द्वारा इसका पुनर्प्रकाशन इसीलिए अर्थवान है।
साहित्य को समझने की दृष्टि से बढ़िया साक्षात्कार ।
वाह ! यह बहुत ही मानीखेज़ बातचीत है , कल रात मैंने इसे पूरा पढ़ा . इसे प्रकाशित करने के लिए शुक्रिया अरुण जी 🙏
निर्मल वर्मा से यह बातचीत वर्षों पहले मैंने की थी जब मैं दिल्ली में कार्यरत था । फिर हिमाचल से प्रकाशित होने वाली पत्रिका विपाशा में यह प्रकाशित हुई। इस की यहाँ प्रस्तुति देख कर सुंखद आश्चर्य हुआ।
इस शानदार बातचीत के लिए बहुत आभार आपका