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समालोचन

Home » प्रफुल्ल कोलख्यान से महेश मिश्र की बातचीत

प्रफुल्ल कोलख्यान से महेश मिश्र की बातचीत

by arun dev
July 17, 2026
in बातचीत
Reading Time: 10 mins read
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प्रफुल्ल कोलख्यान से महेश मिश्र की बातचीत
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प्रफुल्ल कोलख्यान से महेश मिश्र की बातचीत

 

१.
आपने अपने ब्लॉग का नाम रखा है,  ‘विचार और संवेदना का साझापन’.  क्या यह केवल आपके लेखन का परिचय है या आपकी पूरी रचनात्मक दृष्टि का आधार?

विचार और संवेदना का साझापन, यह मेरे लेखन का परिचय नहीं संकल्प है. संकल्प शब्द को सही अर्थों में समझना मुश्किल हो तो प्रतिबद्धता या कमिटमेंट जैसे शब्दों की मदद लिया जा सकता है. हालांकि प्रतिबद्धता और कमिटमेंट एक दूसरे के अनुवाद या प्रति-शब्द की तरह समझे जाते हैं, हालांकि फर्क है.

विचार और संवेदना का साझापन इसे मेरी रचनात्मक दृष्टि का आधार कहें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी लेकिन कोण कहें तो शायद अधिक सही होगा. आधार और कोण के अंतर पर विचार करें तो यह अपने-आप स्पष्ट हो जायेगा.

 

 

2.
क्या मनुष्य को समझने के लिए विचार पर्याप्त नहीं हैं, या विचार को मानवीय बनाने के लिए संवेदना का साथ अनिवार्य है?

मनुष्य को समझने के लिए विचार पर्याप्त है या नहीं! एक अर्थ में हाँ और दूसरे अर्थ में नहीं.

विचार को सोच या थॉट और आइडिया समझ लिया जाता है. जो आम तौर पर समझा जाता है उसे ग़लत कहना अपने-आप में ग़लत है. लेकिन विचार में जो चार है इसे आप आचरण, आचार, संचार, लाचार आदि में मुसकुराते हुए देखेंगे तो लगेगा कि अरे यह चार तो सिर्फ 4 या FOUR नहीं है. तो फिर चार क्या है ?

चार का अर्थ चलने और व्यवहार से जुड़ा है— विचार के ‘चार’ और व्यवहार का विहार से गहरा रिश्ता है. घास खाते समय चर-चर आवाज निकलती है, कदम बढ़ता है. जीवन रक्षा, जीवन सुरक्षा के लिए कदम उठाये का संदर्भ ‘चार’ से है और इसलिए यह ‘चार’ अधिक गंभीरता से समझे जाने की मांग करता है. यह ध्यान में रहे तो माना जा सकता है कि मनुष्य को समझने के लिए विचार पर्याप्त है.

फिर भी इतना तो मानना ही होगा कि मनुष्य को समझने के लिए संवेदना अनिवार्य है. क्यों अनिवार्य है ? क्योंकि संवेदना सिर्फ मनुष्य में होती है. अन्य प्राणियों में संज्ञानात्मक समझ तो होती है लेकिन संवेदनात्मक समझ नहीं होती है. Cognitive और Sensory पर ध्यान देने से बात साफ हो सकती है.

तो यह है कि मनुष्य को समझने के लिए विचार और संवेदना दोनों जरूरी है. ये दोनों एक साथ कैसे मिल सकते हैं ? अपने साझापन से मिल सकते हैं. साझापन! संधि यानी जोड़ से संध्या → सांझ → संझा → साझा → साझापन.

यानी संवेदनात्मक समझ से प्रेरित क्रिया का साथ यानी सक्रियता का संकल्प है विचार और संवेदना का साझापन.

 

 

3.
आपकी रचनाओं में, आलेखों में प्रतिरोध दिखता है, लेकिन प्रतिरोध व्याकुल नहीं है,  विश्वास के साथ दिखता रहा है.

प्रतिरोध विकसित करने की इच्छा तो रहती है लेकिन प्रतिवाद से आगे बढ़ नहीं पाता हूँ. आकुल-व्याकुल मनःस्थिति की वास्तविकता पर नज़र टिकी रहे तो द्वंद्व दिखेगा, नहीं तो विश्वास दिखेगा!

हाँ, मनुष्य जाति के प्रति गहरा विश्वास है. कई बार तो मनुष्य के प्रति अंधता की हद तक विश्वास है- साबार ऊपरे मानुष सत्यो, ताहार ऊपरे नाञ!

 

 

४.
आज के समय में जब आक्रोश और असहमति अक्सर कठोरता में बदल जाती है. एक रचनाकार अपनी संवेदना को बचाए रखते हुए संघर्ष की भाषा कैसे खोज सकता है? कैसे खोजे?

आज के समय में असहमति के लिए सार्वजनिक जीवन में लगातार सम्मान समाप्त होता गया है. अपमानित असहमति असल में असहमतों के व्यवहार को कठोर बना देता है. आलोचनात्मक स्वीकृति की स्वाभाविक मनःस्थिति का अभाव मानव चरित्र का ऐसा खालीपन जिसे आँशिक रूप से भी भर पाना बहुत मुश्किल से संभव हो पाता है.

असल में मेरी समझ यह बनी है कि भाषा क्रिया की स्वरलिपि, क्रिया का मानचित्र होती है. जैसे भूगोल में रेखाएं-  चित्र पर मान, शब्द पर मान! मान यानी मूल्य! मूल्य जिसे अर्थ कहा जाता है. क्रिया के बिना भाषा का कोई मोल नहीं. क्रिया सचेत तो, भाषा सचेत! सचेत भाषा और सचेत क्रिया. मनुष्य का बेहतरी के लिए कदम बढ़ाते ही उसका संघर्ष सचेतनता के लिए शुरू होता है. सचेतनता को सुमति का स्वाभाविक हिस्सा बनाने का संघर्ष.

महेश जी, मुश्किल यह है कि यह सब बहुत-कुछ व्यक्ति की मनोभूमि पर होता है. रचनाकार अपनी मनोभूमि को सामाजिक भूमि बनाने की कोशिश करता है. सामाजिक भूमि को अपनी मनोभूमि बनने की कसरत में आजीवन लगा रहता है. रचनाकार, अधिकतर मामलों ऐसे उलझावों में पड़कर समझदारों के बीच अबूझ बनकर जीते-मरते रहने की स्थिति में पड़ा रहता है.

सच पूछा जाये तो अबूझ बनकर जीते-मरते रहने की स्थिति में पड़े-पड़े विचार और संवेदना का साझापन कब भीतर-ही-भीतर बांझपन में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता है.

 

 

5.
प्रफुल्ल जी, आपने अपने एक आलेख में ‘भारतीयता एक सांस्कृतिक हुनर है’ कहा और वह आपके चिंतन में बार-बार आता है. इस पर आपकी बात अधिक विस्तार से जानना चाहूँगा.

असल में, भारतीयता के सार पर एक लेख लिख रहा था. नये सिरे से, नई नज़र से भारतीयता को समझने की कोशिश कर रहा था. इस कोशिश में यह बात समझ में आई कि ‘भारतीयता एक सांस्कृतिक हुनर है’. भारत के इतिहास में जत्थों के आने और बसने की कई कहानियां हैं. हर दौर में आनेवाला अंतिम जत्था नये जत्थे के आने तक आक्रांता बने रहता था. आक्रांता बने रहकर भी उनका भारत में रचना-बसना जारी रहता था. नये जत्थे के आने से स्थिति बदल जाया करती थी. नये जत्थे के आते ही ठीक अपने पहले आये जत्था के साथ होने वाले संघर्ष में शामिल हो जाया करता था. इस तरह से भारतीयता की सांस्कृतिक अवधारणा बनती गई. बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में आत्मसातीकरण स्वचालित सांस्कृतिक प्रक्रिया बनती गई— आक्रांताओं, विरोधियों, असहमतों को अपने में मिला लेना या उस से मिल जाना, अपना बना लेना या उस का बन जाना. यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि मिला लेना का मतलब मिल जाना, अपना बना लेने का मतलब अपना बन जाना भी होता है. किसी को अपने में मिलाते हुए उस से मिल जाना या किसी को अपना बनाते हुए उस का बन जाना एक सांस्कृतिक हुनर है. यही सांस्कृतिक हुनर भारतीयता है. इस अर्थ में भारतीयता एक सांस्कृतिक हुनर है.

यहाँ दो बातों का उल्लेख जरूरी है—  इस लाइन पर सोचते हुए मुसलमानों तथा दलितों और आदिवासियों की स्थितियों पर संक्षेप में ही सही चर्चा करना भ्रामक हो सकता है. मुसलमानों के पहले जो भी आये उन का अन्यीकरण आज लगभग असंभव है. मुसलमानों का अन्यीकरण न सिर्फ संभव है बल्कि कुछ संगठनों व दलों की पूरी राजनीति का आधार मुसलमानों के अन्यीकरण otherisation पर ही टिकी है, हम जानते हैं.

सोचिए क्यों… क्योंकि मुसलमानों के बाद कोई जत्था इस देश में आया ही नहीं! अंग्रेज आये लेकिन आक्रांताओं की तरह से नहीं व्यापारी की तरह से और फिर अंग्रेज उच्चतर राजनीतिक बुद्धि से लैस थे. जाहिर है कि 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज सत्ता ने ‘बांटो और राज करो’ की नीतियों का जमकर इस्तेमाल किया. अंग्रेजों की नीतियों से 1885 में गठित कांग्रेस और 40 बाद 1925 में गठित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दृष्टि-कोण के फर्क पर ध्यान दिया जाना चाहिए. एक बात और! मुझे महात्मा गांधी का अविकल समग्र भारत को समझने का सब से बड़ा आधार लगते हैं, एक मात्र नहीं. यहाँ इतना कहना जरूरी है कि एक राजनीतिक औजार के रूप में अहिंसा की अनिवार्य स्वीकृति के पीछे 1857 की उपस्थिति को नजर-अंदाज नहीं कर सकते हैं. 1857 न हुआ होता तो एओ ह्यूम का कांग्रेस विचार किस तरह से किस रूप में प्रकट होता, समझना, मुश्किल, कहना उस से भी अधिक मुश्किल!

कांग्रेस ने आत्मसातीकरण का तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अन्यीकरण का राजनीतिक रास्ता अख्तियार किया— एकदम विपरीत! जाहिर है कि कांग्रेस के राजनीतिक पराभव और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव के बढ़ने में आत्मसातीकरण के कमजोर होने और अन्यीकरण की भूमिका को ध्यान रखकर विचार करना चाहिए. हिंदू महासभा को मुसलमानों के अन्यीकरण में  मुस्लिम लीग का भी हमेशा साथ मिलता रहा था. पहले दौर में मुस्लिम लीग सफल हुआ और पाकिस्तान पा गया लेकिन हिंदुत्व की राजनीति महात्मा गांधी की हत्या में संलग्नता, यथा आरोपों, में फंस गई. ऊपर से कांग्रेस का मजबूत नेतृत्व…तो हिंदुत्व की राजनीति के लिए जगह ही नहीं बन पा रही थी. कांग्रेस के नेतृत्व के विरोध में खुद कांग्रेस के नेता-गण लग गये. ऊपर से कांग्रेस विरोध की राजनीति को दायें-बायें समर्थन के लिए राष्ट्रीय मोर्चा और वाम मोर्चा हाजिर थे ही! वैसे हम भी खड़े हैं गुनहगारों की लाईन में.

दलितों और आदिवासियों की स्थिति ध्यान देने लायक है. आजादी के पहले भारतीयता के सांस्कृतिक हुनर के सक्रिय रहते हुए आदिवासियों के जत्थों को निरंतर पीछे हटना पड़ा. वही और वैसा ही कुछ हुआ जैसे नई कड़ियों के जुड़ने के बाद पुरानी कड़ियों के साथ होता ही है. बाद में वर्चस्व की राजनीति के चलते दलितों को विभिन्न जातियों में बांटकर उन्हें अपने-अपने टोलों में ढुका दिया गया, घुसा दिया गया है. आजादी के बाद इनके आत्मीयकरण की सामाजिक प्रक्रिया धीरे-धीरे बंद ही हो गई. जो थोड़ा-बहुत राजनीतिक प्रयास हुआ तो उसे मुस्लिम तुष्टिकरण कहा गया, हालांकि इस में वोट की राजनीति के होने से इनकार नहीं किया जा सकता है. राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासकीय क्षेत्र मामले में आरक्षण का लाभ निश्चित रूप से मिला लेकिन उदात्त और उच्चतर सामाजिक प्रक्रिया के अभाव में वह भी अपने सारांश में निष्फल हो गया.

 

 

6.
यहाँ एक सवाल झाँक रहा है- भारतीयता के इतने उदार दिखते पहलू कि एक और व्यक्ति (समूह) की जगह बनी रहना… सामंजस्य और सहन करने का भाव .. यह समंजन एक गुण की तरह कितना है और मजबूरी की तरह कितना? क्योंकि हम जानते हैं कि विभेदीकरण की सामाजिक संरचना भी लगातार ऑपरेट करती रही है… सामंजस्य और otherisation एक साथ रहते हैं,  ऐसा लगता है.

जी, दोहरी प्रक्रिया है यह. इसे समझने की कोशिश ऊपर की गई है. निश्चित रूप से समंजन गुण भी है अवगुण या मजबूरी भी है. गुण इसलिए कि इस प्रक्रिया के साथ समझदारी भरी शांति की गुंजाइश बनती है. अवगुण इसलिए कि समझदारी भरी शांति की समझदारी धूर्तता बनकर रह जाती है.

 

 

7.
आगे बढ़ते हैं…. इधर के कुछ वर्षों में भारतीय ज्ञान परम्परा पर चर्चा और प्रोत्साहन बढ़ा है…और इसका एक तरह से स्वागत होना चाहिए…. लेकिन ज्ञान परंपरा में क्या भविष्य-उन्मुख है और क्या भूत-उन्मुख है, यह विवेक हमें उसी समय रखना पड़ेगा न? आप भारतीय ज्ञान परम्परा को कैसे देखते हैं? उस पर जो जोर दिया जा रहा है, उसको कैसे देखते हैं और इस दिशा में क्या काम ऐसा है जो सचमुच किया जाना चाहिए?

महेश जी, यह महत्वपूर्ण है. भविष्य-उन्मुख भूत-उन्मुख पर धैर्य के साथ ठहरकर देखना चाहिए. ज्ञान भविष्य-उन्मुख होता है और अपनी इस उन्मुखता में आगे बढ़कर विज्ञान बन जाता है. भूत-उन्मुख विचार इस अर्थ में पीछे हटते-हटते आखिर में धर्म बनकर संस्थापित हो जाता है. भारतीयता की एक परंपरा की एक धारा, सनातन कह सकते हैं, धर्म-संस्थापनाय के लिए सचेष्ट रहती है, तो दूसरी धारा, बौद्ध कह सकते हैं, धर्मचक्रप्रवर्तनाय (धम्म) की तरफ जाती है.  अपनी उन्मुखता में धर्म-संस्थापनाय भूत-उन्मुख है और धर्मचक्रप्रवर्तनाय भविष्य-उन्मुख है — लोकसभा का ध्येय वाक्य है, धर्मचक्रप्रवर्तनाय.

भारत में ज्ञान परंपरा से अधिक महत्वपूर्ण भाव-परंपरा और रस-परंपराएं रही हैं. ज्ञान का मूल संबंध भौतिक संदर्भों से होता है. भाव-परंपरा और रस परंपराओं का मूल संबंध कल्पना-जनित और आध्यात्मिक संदर्भों से होता है. दुनिया में ज्ञान-परंपराओं का जितना विस्तार पिछले दो या ढाई सौ बरसों में हुआ है. यही व समय है जब भारत की प्रज्ञा औपनिवेशिक शक्ति की अधिकतम गिरफ्त में फंसी रही है. आज की सरकार और सरकारी राजनीतिक दल पुष्पक विमान को विज्ञान से जोड़कर मुग्धता का वातावरण बनाने में लगे रहते हैं. नई शिक्षा पद्धति और उस की प्रेरणा पर गौर करने से भारत की ज्ञान-परंपरा और भारत के ज्ञान-सरोकार दिख जायेगा. समाज में ज्ञान-परंपरा में वैज्ञानिक मनोभाव की कमी को देखते हुए ही भारत के संविधान में वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद आदि को खासकर भारत के नागरिक को मौलिक कर्तव्य के रूप में याद किया गया.

 

 

8.
भारतीय ज्ञान परम्परा  परियोजना क्या ऐसी  है जिसे सचमुच किया जाना चाहिए?

इस सवाल के जवाब में तो एक किताब लिखे की जरूरत है. ऐसी महत्वपूर्ण ‎किताब जिस का लिखा जाना तो बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन जिस का पढ़ा जाना ‎उतना ही गैर-जरूरी है बल्कि और भी बहुत-कुछ हो सकता है. फिर भी इतना तो ‎मानना ही होगा कि इस सवाल से कन्नी काटने की कोशिश बौद्धिक बेईमानी ‎होगी. ‎

भारत की ज्ञान-पद्धति और ज्ञान-परंपरा से जुड़ा यह सवाल क्यों इतना महत्वपूर्ण ‎हो गया है आज? ‎

क्योंकि डीकॉलोनाइजेशन या विऔपनिवेशिकीकरण के नाम पर एक भिन्न तरह ‎का विमर्श खड़ा किया जा रहा है. इस विमर्श से सीधे टकराना विमर्श से हासिल ‎हो सकनेवाले  इच्छित तत्व को नष्ट-भ्रष्ट करने के जोखिम को नजर-अंदाज करना ‎होगा. विऔपनिवेशिकीकरण या डीकॉलोनाइजेशन की बात करते समय आम तौर पर डीकॉलोनाइजेशन की बात करते समय समाज के विभिन्न संस्तर पर जारी आँतरिक उपनिवेशन‎ या आत्म उपनिवेशन की बात नहीं करते हैं. भारत के समाज का अधिक-से-अधिक भाग बंद समाज है — ब्रेकेटेड समाज! जाहिर है कि संविधान कुछ भी कहे बराबरी का सिद्धांत अपनी-अपनी जाति-समाज की पारस्परिक तुलना में ही विचारणीय होता है. यह गलत है, मगर है.

भारतीय मनीषा और संस्कृति की दो महत्वपूर्ण धाराएं हैं— ज्ञान-परंपरा और ‎‎रस-परंपरा. फिर ज्ञान-परंपरा के अंतर्गत कई ज्ञान-परंपराएं हैं, रस-परंपरा के ‎‎अंतर्गत कई रस-परंपराएं हैं. जितनी परंपराएं उतनी पद्धतियां! परंपराएं हैं, ‎‎पद्धतियां हैं तो फिर! तो फिर यह है कि यह सब मनोभूमि पर है, मनोभाव में है ‎‎वस्तुगत या वास्तविक भूमि पर नहीं हैं. भावगत हैं — जाकी रही भावना जैसी! ‎‎काव्य-शक्ति (Poetic-Power) के चलते सामाजिक मान्यताओं के रूप में रूढ़ ‎‎होकर काव्य-न्याय (Poetic-Justice) का आधार बन जाती हैं. कई बार इन ‎‎मनोभाव को ज्ञान-परंपरा से जोड़कर देखने लग जाते हैं लोग और जान-बूझकर ‎‎जानकार लोग इस तरह की धारणाओं को बौद्धिक वैधता प्रदान करते रहते हैं. ‎‎जबकि इस का ज्ञान से कोई लेना-देना ही नहीं है. ज्ञान की स्वीकृति हमेशा साक्ष्य-‎‎सापेक्ष रहती है जबकि भावनाएं साक्ष्य-निरपेक्ष हुआ करती हैं. यह बिल्कुल ‎‎जायज सवाल हो सकता है कि जीवन में सब-कुछ को साक्ष्य-सापेक्ष क्यों होना ‎‎चाहिए? साक्ष्य-निरपेक्ष का साक्ष्य क्या हो सकता है! भारत की संस्कृति में सब से ‎‎बड़ी साक्षी अग्नि रही है. साक्षी भी हवि की वाहक और दूताय भी! हवि का संबंध ‎‎मनुष्य के समर्पण और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के बीच के संवाद का ‎माध्यम है — लेकिन ‎‎साक्ष्य! ओह्ह! फिर वही समस्या. ‎

दिक्कत क्या है कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा का ‎साहचर्य प्राप्त करनेवाले सोना-चांदी  ‎तेज दिमाग रस-परंपराओं में रस की तलाश ‎करते हैं और भारत-प्रेमी हुए तो ‎काव्य-शक्ति (Poetic-Power) के माध्यम से ‎काव्य-न्याय (Poetic-Justice) ‎करते हैं और भारत की रस-परंपराओं में ज्ञान-‎परंपरा की तलाश करते हैं. इस ‎कोशिश में कॉलोनाइज्ड माइंड से ‎डीकॉलोनाइजेशन की छटपटाहट दिख सकती ‎है. बौद्धिक बदमाशी तो नहीं कहूँगा ‎लेकिन यह सच है कि कॉलोनाइज्ड माइंड में ‎बौद्धिक साहस नहीं होता है कि ‎कॉलोनाइज्ड माइंड सेट के साथ ‎डीकॉलोनाइजेशन की प्रक्रिया में उतरने के पहले ‎अपने माइंड का ‎डीकॉलोनाइजेशन करने की कोशिश करें. असल में भारत में ज्ञान ‎की नहीं, बुद्धि ‎की नहीं बोध की प्रतिष्ठा है — महात्मा बुद्ध को ज्ञान नहीं बोध ‎प्राप्त हुआ था. ज्ञान ‎और बोध के फर्क को ध्यान में रखा जा सके तो विचार और ‎संवेदना की पूरी ‎प्रक्रिया ही ध्वस्त हो जाती है. ‎

भारत में सब-कुछ आनंद-उन्मुखी है. ब्रह्म को भी आनंद स्वरूप मानते हैं — रसो ‎‎वै सः‎ — तैत्तिरीय उपनिषद में ब्रह्म को रस ‎कहा गया ‎है. समझाया यह गया है कि ‎ज्ञान अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर ज्ञान अपनेआप में ज्ञान नहीं रह जाता, रस हो ‎जाता ‎है. ज्ञान अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर विज्ञान हो जाए तो यह स्वाभाविक ‎लगता है, नहीं क्या! देखिये कि जो पराकाष्ठा पर पहुंचकर रस हो जाए उसे ज्ञान ‎कहा जाना चाहिए ‎या भावोन्मेष का चरम आनंद! ब्रह्म भी आनंद स्वरूप हैं — ‎सच्चिदानंद!‎ ‎

साहित्य के विद्यार्थियों को पता है कि विश्वविद्यालय में गोदान या ‎रामचरितमानस के अध्ययन का मकसद गोदान या रामचरितमानस‎ के रस या ‎भावांश को ज्ञान में बदलने का होता है— विश्वविद्यालय में साहित्य के अध्ययन-‎अध्यापन का लक्ष्य किसी भावाकुलता में खो जाने का नहीं होता है! हाँ, इधर ‎आकर उधर के अनुसार लक्ष्य बदल गया हो तो मुझे पता नहीं है.    ‎

ज्ञान परंपरा में वेदों, ‎उपनिषदों, सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत ‎‎तो ये अविद्या से मुक्ति के रास्ते पर विद्यार्जन के लिए लगे हुए हैं! ‎‎विद्यार्जन क्यों? क्योंकि ‎विद्या ही मुक्त करती है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ‎‎UGC का ध्येय वाक्य है— सा विद्या या विमुक्तये! क्या गजब का कॉलोनाइज्ड ‎‎वातावरण है विद्या और ज्ञान का अंतर ही नहीं कर पाया! कौन समझाये कई से ‎‎कहे कि ज्ञान से शक्ति मिलती है और विद्या से मुक्ति! क्या मान लिया जाये कि ‎‎शक्ति ही मुक्ति है! मेरा मन तो नहीं कहता, आपका ज्ञान जो कहता हो. हम तो ‎‎मन की बात सुनते हैं. मन की बात सुनने की ही स्वतंत्रता असली है. मन की बात ‎‎न सुनने की स्वतंत्रता की मांग! जाने भी दीजिए!‎

प्राकृतिक बाधाओं नियमों का रहस्य जानना चौदहों विद्या का लक्ष्य है और रहस्य ‎‎जान गये तो उसके पार जाना, उत्तीर्ण होना ही मुक्त होना है—  सा विद्या या ‎‎विमुक्तये!‎ भारतीयों को शक्ति नहीं, मुक्ति चाहिए— ज्ञान नहीं, आनंद चाहिए! हम आनंद परंपरा के हैं. आँबेडकर ने मुक्ति का जो सूत्र दिया था उस में था educate, organize and agitate अर्थात शिक्षा संगठन और आँदोलन.

ज्ञान की प्रकृति, ज्ञान के स्रोत और ज्ञान की सीमाओं पर भारत की ज्ञानमीमांसा ‎‎‎‎(Epistemology) में किस तरह से विचार किया गया है कोई बड़ा विद्वान ही ‎‎‎बता सकता है. जहाँ तक औचित्य और प्रमाणिकता ‎की बात है तो लोकायत का ‎‎‎जो हाल हुआ वह बिल्कुल स्पष्ट है. हल्के में कहूँ तो लोक, लोकायत और लोकतंत्र ‎‎‎का एक ही हाल है. व्यवहार में आप्त वचन ही प्रमाण है! ज्ञानमीमांसा कुछ भी कहे ‎‎‎व्यवहार में आप्त वचन ही प्रमाण है उसी की प्रामाणिकता स्वीकार्य है.  ‎

 

 

9.
हम विचार और संवेदना के बाँझ बन जाने की परिस्थितियों को समझना चाहेंगे और उसमें भी आप पहले यह बताइए कि इस तरह की स्थिति से रचनाकार बचते कैसे हैं… अंदर की स्निग्धता बचती कैसे है? और भला पाठक इस सबके बीच में कहीं नज़र आता है?

यह काफी दिलचस्प सवाल है. दिलचस्प इसलिए है कि बांझ शब्द का इस्तेमाल रूढ़ अर्थ में संतान पैदा करने की शारीरिक अयोग्यता को बताने के लिए किया जाता है. संतान में अपनी माता-पिता की संरचनात्मक समानता बनी रहती है. इस समानता के बावजूद संतान अपने माता-पिता की नक़ल नहीं होते हैं. सभी प्राणियों की तरह मनुष्य में भी प्रजनन चक्र चलता रहता है. प्रजनन चक्र के ‘चक्र’ में वर्तुल और रैखिक दोनों ही दिशा होती है. प्राणी अपने माता-पिता की तरह से दिखते हुए भी उन की नकल नहीं होते हैं!

प्रजनन चक्र में ‘माता या पिता’ नहीं ‘माता और पिता’ की ज़रूरत होती है. माता-पिता में से कोई एक अपनी शारीरिक योग्यता का कोई मतलब नहीं पा सकता है. तात्पर्य यह कि प्रजनन की शारीरिक योग्यता की अनिवार्य शर्त युग्मता होती है. युग्मता की स्थिति के बाधित हो जाने से बांझपन की अनिवार्य स्थिति उत्पन्न हो जाती है. युग्मता की बाधित स्थिति! बंद → बंध → बंध्या → बांझ (जैसे संध्या से सांझ) → बांझपन.

प्रजनन प्रक्रिया में नर-मादा की युग्मता होती है. समझने के लिए रूपक के इस्तेमाल की इजाजत हो तो, रचना प्रक्रिया में लेखक और पाठक की युग्मता होती है. पाठक और लेखक की वैचारिक और संवेदनात्मक युग्मता में भागीदारी, समझदारी और संयम और समझदारी का साझापन रचना की संभावनाओं को आकार देता है. लेखक और पाठक की युग्मता न बन पाने से साझापन अंततः अपने वृतांत में बांझपन की स्थिति में पहुंच जाता है.

अपनी बात कहूँ! शुरू-शुरू में श्रोताओं की तालियों से रचना का उत्साह मिला. खुद रचना का उत्साह खो चुके निरुत्साह लोगों के प्रोत्साहन से मामला गतिशील बना रहा— उफ्फ,  निरुत्साह या उत्साहहीन प्रोत्साहन!

आगे चलकर पत्र-पत्रिकाओं में छपने पर अदृश्य पाठकों का भ्रम तैयार हुआ. भ्रम क्यों कह रहा हूँ? इसलिए कि लगा था कि साहित्य के गंभीर लेखक और पाठक तक बात पहुंच रही है, लेकिन यह सच नहीं था. रचना की दुनिया से अधिक रचनाकारों की दुनिया सिकुड़ ही नहीं गई थी, बल्कि संकुचित भी हो गई. और हाँ, मैं तो बिल्कुल ही अपवाद नहीं रहा हूँ.

बंध जाने से बांझपन का संबंध होता है. जो लोग बंध जाने में ही स्वतंत्रता के एहसास के भ्रम को जिलाये रख सके, वे अधिक दूर तक चले; जो इस भरम को जिलाये रखने में कामयाब नहीं रहे वे ‘न लिखने का कारण’ गिनते लेखन से दूर होते चले गये या अपने अनाप-सनाप के धुंध में ढक गये.

 

 

10.
रचना में आपका प्रवेश किस तरह से होता है?

भाषा के प्रति उसके सरोकार को. भाषा के प्रति सरोकार के आशय को थोड़ा साफ-साफ कहना होगा. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था, भाव अनूठो चाहिए, भासा कैसू होय! मेरी दादी कहा करती थी घी का लड्डू टेढ़ो नीक! अनूठा का अर्थ आप न्याय और निश्चित रूप से जानते हैं लेकिन यह ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि अनूठा (अनुच्छिष्ठ) को मतलब होता है जो जूठा नहीं है कदाचित झूठा भी नहीं है. इसी तरह से अनोखा का मतलब होता है (अनवीक्ष्य) जो सामान्यतः नंगी आँखों से दिखता नहीं है लेकिन असामान्य परिस्थितियों में दिख गया हो.

ओफ्फ यह अनूठा, अनोखा आदि में कहाँ उलझ गया! मेरा सब-कुछ कमज़ोर था तो भाषा भी कमज़ोर थी. घर के अंदर मैथिली और घर के बाहर लगभग हिंदी! लगभग हिंदी क्यों? पूरी हिंदी किसी को नहीं आती! हिंदी उर्दू का गढ़न साथ-साथ है लेकिन उर्दू आते-आते आ जाती है और हिंदी आते-आते भी नहीं आती है. तो मेरी हिंदी बहुत कमज़ोर थी. थी? नहीं है, आज भी है.

असल में हिंदी के बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति थे रामचंद्र वर्मा. रामचंद्र शुक्ल का नाम जानने वाले फिर भी मिल जायेंगे लेकिन रामचंद्र वर्मा! क्या पता! मेरे मित्र के घर की दीवाली सफाई हो रही थी. उस के पिता ने कभी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को गौरवान्वित किया था. अब कोलियरी के कोयला-धुआँ में मेरे पिता की तरह लोट-पोट थे. हालांकि बीएचयू का नाम आते ही उनका सीना चौड़ा और बाकी लोगों की छाती सकुच जाती थी. मूल बात यह है कि घर की सफाई में जो कचरा निकाला गया था, उस में एक फटी-चिटी क़िताब थी, आगे से भी फटी और पीछे से चिटी! यानी फटी-चिटी. न क़िताब के नाम का पता चल सकता था न लेखक का! तब तक मैं साहित्य सजग तो हो गया था लेकिन भाषा के मामले में भारतेंदु हरिश्चंद्र और अपनी दादी के विचारों का ही कायल था.

इस फटी-चिटी किताब ने मेरी भाषा सजगता को तीन सौ साठ डिग्री के चक्कर लगवा दिया. उस फटी-चिटी क़िताब और उस के लेखक का नाम मुझे तब पता चला और वह भी अनायास! तब मैं एम.ए. करने रांची विश्वविद्यालय गया था. मनरेसा हाउस, रांची में फादर कामिल बुल्के का निवास था. उन के घर का बहुत बड़ा पुस्तकालय सभी छात्रों के लिए बिना लिखत-पढ़त के सभी के लिए खुला रहता था. जहाँ तक याद है वहीं उस क़िताब को देखा, किताब का नाम ‘अच्छी हिंदी’ और लेखक का नाम रामचंद्र वर्मा! ऐसा नहीं कि मैं आज हिंदी में कोई ग़लती नहीं करता, बल्कि अधिक ही करता हूँ. लेकिन एक फ़र्क़ है, आज मैं अधिकतर ग़लतियों को पहचान जाता हूँ.

भाषा बहुत बड़ी चीज है. वह भाषा जो सिर्फ मनुष्य के पास है. अन्य प्राणियों के पास सिर्फ आवाज है — मनुष्य के पास आवाज भी है और भाषा भी है.

जीवन में किसी भी मामले में अति और अतिरिक्त का होना ख़तरनाक होता है, हानिकारक.

 

 

11.
आपके पाठकीय जीवन का वह क्रिटिकल मोमेंट, जब बचपन में शब्द आपको पहली बार चमत्कृत और मुग्ध कर देते हैं. उस क्षण को पहली बार क्या पढ़ते  हुए महसूस किया था?

यह ठीक-ठीक याद करना कहना मुश्किल है. लेकिन जहाँ तक याद है, मेरे पिता के पास साहित्य की दो चार क़िताबें थी. तब हम लोग झारखंड के रजरप्पा के पास के जंगल के बीच एनसीडीसी के कैंप में रह रहे थे. मैथिलीशरण गुप्त की किताब ‘पंचवटी’ और प्रेमचंद की ‘राम चर्चा’ को पढ़कर मैं चमत्कारिक ढंग से प्रभावित हुआ था. चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं, जल थल में! मैं जंगल में छिटकी चांदनी में अनायास ही इसे गुनगुनाने लगता था.

बाद में जन-जीवन में चारु चंद्र की चंचल किरणों के खेल के पीछे रात का अंधकार दिखने लगा. समझ में आने लायक़ बात है कि अंधेरे में कुछ नहीं दिखता है मगर अंधकार तो ज़रूर दिखता है.

 

 

12.
मैं फिर से एक बार वहीं आता हूँ…आपने भारतीयता को एक विराट सांस्कृतिक कथन की तरह देखा है…आपके लेखन में वह गहराई से विन्यस्त है. आपका पूरा आशय क्या है इस कथन से?

इस पर मैं अपनी बात कह चुका हूँ… फिर कह रहा हूँ – मेरी नज़र में भारतीयता एक सांस्कृतिक हुनर है. इस अर्थ में यह एक सांस्कृतिक कथन भी है. मेरा आशय सह-अस्तित्व का संकल्प और सहमिलानी चरित्र से है. मिथ के रूपक का इस्तेमाल करने की इजाजत हो तो पुष्पक-विमान को याद किया जा सकता है. पुष्पक-विमान में एक को एडजस्ट कर लेने की जगह हमेशा बची रहती थी. मिथ के रूपक से बात समझ में न आये तो रेल के जनरल डब्बे को याद किया जा सकता है.

 

 

13.
मैंने रामायण,  महाभारत को जितना जाना है उसके हिसाब से एक विराट लेकिन संश्लिष्ट भारतीय परम्परा के वे आधार से लगते हैं जिसका सभी कुछ शायद आज की चेतना को स्वीकार नहीं हो सकता लेकिन फिर भी उनका प्रभाव बहुत गहरा है…कुछ-कुछ भारतीय सांस्कृतिक चेतना के जीव-द्रव्य जैसा….आपने कार्ल युंग की archetypes की अवधारणा पर गौर किया हो तो हमें विस्तार से बताइए कि भारतीय सन्दर्भ में archetypes क्या हैं? विस्तार अपेक्षित है.

 

जीव-द्रव्य तो सृष्टि का आधार है. लेकिन भारत में जीव-द्रव्य के साथ ही देव-द्रव्य भी महत्वपूर्ण है. सच पूछा जाये तो जीव-द्रव्य और देव-द्रव्य का महा-द्वंद्व को समझना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है. लेकिन एक बात-चीत में जीव-द्रव्य और देव-द्रव्य के महा-द्वंद्व का खुलासा कम-से-कम मेरे लिए तो नामुमकिन ही है.

यह सच है कि किसी भी व्यक्ति के लिए अपने आद्यभाव या आद्याभा के प्रभाव के प्रारूप (archetypes)‎ को बदलना तो दूर पहचानना भी बहुत मुश्किल से होता है. मैं जब इसे बहुत मुश्किल कह रहा हूँ तो यह बिल्कुल ही अधूरी बात है रखकर भ्रामक भी हो सकती है. ऐसा इसलिए कि मेरे संदर्भ में आद्यभाव या आद्याभा के प्रभाव का प्रारूप भिन्न हो सकता है — अपने होने की तरह; जैसे अस्तित्व का कोई विकल्प नहीं होता है. व्यक्तित्व एक ‘दी हुई परिस्थिति’ होती है — जीव- द्रव्य जैसा! लेकिन इस के बावजूद अभी अपने कहे हुए के सब-कुछ को अनकहा मानकर इस सवाल पर अपना कहना, फिलहाल स्थगित रखता हूँ.

 

 

14.
आपका एक लेख है ‘मँजी हुई शर्म का जनतंत्र’. उसका आशय  बताइए. और भारतीय सौंदर्यबोध की कतिपय अवधारणाओं पर अपने विचार दीजिए. हिरनी जैसी आँखें, हिरन की आँखों के डर को सौंदर्य का नाम दिए जाने को लेकर हमारी कई बार घंटों बात हुई है. ऐसी कितनी बातें हैं जिनके बारे में आपने गौर किया है,  सवाल उठाए हैं. और यह सौंदर्य-बोध क्या इंगित करता है.

जी, मेरी पहली किताब कविता संग्रह थी, नाम था— मँजी हुई शर्म का जनतंत्र. शर्म, ‎तो शर्म! लेकिन यह मँजी हुई शर्म क्या है? असल में हिंदी साहित्य में एक शब्द-‎युग्म है— मृगनयनी! मृगनयनी वृन्दावनलाल वर्मा की प्रसिद्ध ऐतिहासिक ‎रचना है. ग्वालियर राज्य के राजा मानसिंह तोमर तथा मृगनयनी की प्रेम कथा ‎है. रामचरितमानस में सीता के अपहरण के बाद व्याकुल राम तुलसीदास की ‎चौपाई में कहते हैं — हे खग, हे मृग, हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृग नैनी!

मृगनयन की उपमा आँख के सौंदर्य के लिए दी जाती रही है. मैं मृगनयन के सौंदर्य ‎की तलाश में पहुंच गया कोलकाता के चिड़ियाखाना के आँगन! चिड़ियाखाना ‎नेशनल लाइब्रेरी के पास ही है. नेशनल लाइब्रेरी में आना-जाना रहता था. सो एक ‎दिन पहुंच गया, चिड़ियाखाना के आँगन! संस्कृत में मृग का अर्थ होता है, पशु, ‎कोई भी पशु. लेकिन हिंदी में यह हिरण के लिए रूढ़ हो गया है. पहले दिन हिरण ‎की आँख में कोई सौंदर्य न दिखा. कवियों पर गुस्सा आया. लेकिन फिर दूसरे दिन ‎तहकीकी नजर के साथ फिर पहुंच गया, चिड़ियाखाना. इस बार दिखा! दिखा ‎हिरण की आँख में डर! समझ में आने लायक बात यह कि जमा हुआ डर ही शर्म ‎बन जाता है. स्त्री के मन में बसे डर आँख में शर्म के वेश में सामने आती है. डरे हुए ‎मन की आँख में बसी शर्म ही पुरुष को सुंदर लगती है. ‎

हिंदी में एक मुहावरा है — नाच तो घूंघट क्या! लेकिन घूंघट तो उस जमाने में ‎नृत्य के आनंद को आमंत्रण में बदल दिया करता था. शर्म न होने पर भी नाच में ‎घूंघट का इस्तेमाल शर्म को माँज कर चमकदार और धारदार बना देता है— यही ‎शर्म है मँजी हुई शर्म! इसी मँजी हुई शर्म का इस्तेमाल जब जनतंत्र के अधिकतर ‎रहनुमा करने लगते हैं तब जनतंत्र बन जाता है — मँजी हुई शर्म का जनतंत्र.       ‎

ऐसे कई उदाहरण हैं— नाच न जाने, अंगना टेढ़ा (नाच न जाने, अंग ना टेढ़ा’), पूत के पांव पालने में इस का अर्थ लोग बच्चे के झूले में ही उस के भविष्य का आकलन कर देते हैं, लेकिन यहाँ ‘पालने’ का अर्थ झूला नहीं ‘पालन पोषण’ यानी लालन-पालन से है. लालन का अर्थ बच्चों से किया जानेवाला सम्यक व्यवहार. खैर!

 

 

15.
विनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति, बोले राम सकोप तब भय बिनु होंहि न प्रीति … तो सौंदर्यबोध को इन सबसे मानना है कि किन्हीं अन्य उदाहरणों से या सबसे…. ऐसे में भारतीय सौंदर्य-बोध या ऐसा ही कुछ सामान्यीकरण कितना वैलिड है?

भारत की परंपराओं में अंतर्निहित सौंदर्यबोध ऐंद्रीय नहीं बल्कि अतींद्रिय,  गिरा-ज्ञान-गो से अतीत यानी शब्द, ज्ञान और ऐंद्रीयता से पकड़ में नहीं आनेवाला! अर्थात, वास्तविक नहीं काल्पनिक है. जो ऐंद्रीय है वह नश्वर है. नश्वर में सौंदर्यबोध कहाँ! ‎भारत की परंपराओं में सौंदर्यबोध का आश्रय सृष्टि में नहीं, स्वर्ग में है — अर्थात यथार्थ में नहीं कल्पना में है. कल्पना का वास्तवीकरण, अदृश्य का दर्शन भारत की विभिन्न परंपराओं में अंतर्निहित सौंदर्यबोध का संक्षेप है.

 

 

16.
मैं फिर से इस बात को कहने की कोशिश करता हूँ…भय बिनु होंहि न प्रीति-  यह एक बहुत प्रयोग किया जाने वाला मुहावरा बन गया… ऐसा कैसे हो सकता है कि प्रीति का आधार भय को बना दिया जाए? मुझे यह बात पसंद नहीं आती है और उससे अधिक विचलित करती है.

यह बहुत गहरा सवाल है. इस के कई कोर हैं, कई स्तर हैं. यह मनोवैज्ञानिक भी है, सांस्कृतिक भी है, सामाजिक और भी कई प्रसंग हो सकते हैं. अलग-अलग कालखंड के संदर्भ भी कालातीत – बियांड टाइम.

पहले अपने कालखंड में इस पर अपनी बात रखने की कोशिश करता हूँ.  भय ‘बिनु होइ न प्रीति’ का पूरा दोहा है-

‘बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति I
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥’

क्रोध की मनःस्थिति में धीर और उदात्त नायक राम की उक्ति है, किसी अधीर और उद्दंड व्यक्ति की उक्ति नहीं है. तो हमें उसी भाव से समझने की कोशिश करनी होगी. जब क्रोध आता है तो अधीर और उद्दंड ही नहीं धीर और उदात्त भी, अपनी बात नहीं मानी जाने पर, किसी की भी इज्जत उतार सकता है, चाहे ग़लती पड़ोसी की हो, ‘महिमा घटी समुद्र की, रावन बसै पड़ोस’.

‘प्रीती’ और ‘सवारथ’ के संबंध पर भी गौर करना होगा —

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती!
पूरी बात — सुर नर मुनि सब कै यह रीती I

भय और प्रीति के बीच में द्वंद्व की बातचीत प्रीति की तरफ झुकाव में है. भय पर लौटते हैं. हमारे समय के एक नायक राहुल गांधी ने आवाज लगाई— ‘डरो मत’. यह कैसी परिस्थिति है! क्या कोई डराकर या भय दिखाकर प्रेम कर रहा था, या डराकर लूट रहा था? भय नकारात्मक स्थिति है प्रीति सकारात्मक स्थिति है. नकारात्मक से सकारात्मक निकल सकती है. बच्चे को पीटना नकारात्मक है. मां के हाथों पीटे जाने के भय की नकारात्मकता से बच्चे के सुधर जाने की सकारात्मकता हासिल हो सकती है. तो फिर! बात उलझाव में पड़ गई. ‘कौन, कहाँ, कब, कब तक, ‎किसलिए, किस को, किस तरह से’ जैसे सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

तो फिर!
तो फिर! कबीर!

“कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट I
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥”

सवाल यह है कि ‘किस से किसको’ भय और ‘किस से किसको’ प्रीति! तो फिर! तुलसीदास— ‘सुर नर मुनि सब कै यह रीती. स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती.. तो सवाल टिक गया, स्वार्थ पर! तो फिर! परमार्थ का क्या होगा! साधु स्वार्थ नहीं परमार्थ का ख्याल रखते हैं.

हाँ फिर कबीर— परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर.

भय से भूत और भगवान दोनों का रिश्ता है; देव दानव की माता? दिति! अदिति! मानविकी का प्रत्येक वचन-वक्तव्य जनजीवन की किसी खास परिस्थिति में खास अनुभव  होते हैं. इन्हें सार्वभौम वक्तव्य या सिद्धांत की तरह से नहीं लिया जा सकता है.

 

 

17.
हमने कभी इस मुद्दे पर खूब बातें कीं थीं कि binaries कैसे बनती हैं,  हमारे भाव,  मनो और विचार- संसार को कैसे binaries में जाने की स्वाभाविक सी लगती वृत्ति पनप जाती है,  यह मुझे दसियों साल से परेशान कर रहा है. आपने मुझसे इस पर काम करने को कहा था लेकिन कुछ व्यवस्थित हो नहीं पाया. अंतर- अनुशासनिक अध्ययन और साहित्य binary थिंकिंग को रोकता है,  यह मैं समझता हूँ लेकिन हमारी consciousness का क्या स्वाभाविक झुकाव Binaries बनाने की और उनके दायरों में उलझ जाने की कोई अन्तर्जात विवशता है,  विस्तार से बात कहिए.

संसार अपूर्ण है. अपूर्ण संसार में अपूर्णता ही नैसर्गिक है. मनुष्य का मन हमेशा पूर्ण की तलाश और पूर्ण होने की फिराक में रहता है. मनुष्य के जीवन में संदेह का महत्व कम नहीं होता है. रेने देकार्त (Rene Descartes) को याद करना ज़रूरी है. आधुनिकता ने संदेह की धज्जी उड़ा दी. एक अर्थ में यह बहुत अच्छा और सभ्य और बेहतर… मानवीय जीवन के जद्दोजहद के लिए ज़रूरी था लेकिन इस का दूसरा पक्ष जीवन में संदेह के बिना मिथ्याशा को जिलाये रखना मुश्किल होता गया है. सच का साथ मिला नहीं, झूठ का सहारा छिन गया. जब तक सच का साथ मिलने की आशा बनी रही समानांतर जिंदगी के लिए सभ्य और बेहतर मानवीय जीवन के जद्दोजहद में लोग आधुनिकता के साथ ‎ जीने की कोशिश करते रहे! यह समझना होगा कि आधुनिकता समानता, तर्कशीलता, आदि मूल्यों के साथ ही जीवंत रहती है. सच का साथ मिलना जब मुश्किल होता गया तब मनुष्य ने फिर से झूठ का सहारा पकड़ लिया. झूठ के सहारे के महत्व को कहीं-न-कहीं मार्क्सवादी चिंतन भी शायद समझता रहा है इसलिए मार्क्सवादी सोच रूढ़िवादी सोच की तरह आधुनिकता के विरोध का रास्ता नहीं पकड़ पाई. हालांकि व्यावहारिक वामपंथी राजनीति ने आधुनिकता की परियोजना के कई वैचारिक तत्वों का बेधड़क इस्तेमाल करना जारी रखा.

संसार में स्पष्टता-कट्टरता-पूर्णता-अपरिवर्तनशीलता आदि दुनिया को ‘स्वीकार या अस्वीकार’ या ‘स्वीकार्य और अस्वीकार्य’ में बांट देती है दो के बीच में कोई जगह होती ही नहीं है. यहाँ दो नजरिया हैं — एक के अनुसार दुनिया में कोई दुश्मन नहीं होता है; या तो वर्तमान में दोस्त होते हैं या फिर गुजरे जमाने के या फिर आनेवाले जमाने के दोस्त होते हैं. दूसरा नजरिया है कोई दोस्त नहीं होता है— या तो वर्तमान के दुश्मन होते हैं या फिर गुजरे जमाने के या फिर आनेवाले जमाने के दुश्मन होते हैं.

सच का साथ मिलना सदा मुश्किल रहता है झूठ का सहारा लेना अनैतिक और अस्वीकार्य लगता है. जो मिला नहीं उस के सहारे जीना असंभव, झूठ के सहारे चलने में दिक्कत. तो फिर! फिर जरूरी है कि स्पष्टता-कट्टरता-पूर्णता-अपरिवर्तनशीलता-स्थिरता-निश्चयता-निस्संदेह को छोड़ अस्पष्टता-लोचकता-अपूर्णता-परिवर्तशीलता-अस्थिरता-अनिश्चयता-संदेह के हवाले खुद को छोड़ दिया जाए!

जिस को सब-कुछ साफ-साफ चाहिए, सदा के लिए चाहिए निश्चित चाहिए वे Binaries के बिना चल नहीं सकते हैं — थक-हारकर यह कि अर्थहीनता इधर-उधर दोनों तरफ है. क्या मैं निहलिस्ट शून्यवादी या फिर निरर्थकतावाद की तरफ बढ़ चला हूँ या वैसी ही मनःस्थिति में पहुंच गया हूँ? क्या पता! जब कुछ भी निश्चित नहीं, तो जो पता है वह क्या निश्चित है? तो फिर! यही कि क्या पता!

 

 

18.
आपने कविताएँ भी लिखीं हैं और वे भाव और विचार का गहरा समन्वय करती हैं. मुझे शब्दों के कविता के रूप में आकार लेने की प्रक्रिया में रुचि है. यह जादू आपमें कैसे घटित होता है? भाषा का यह अन्तर्निहित गुण होता तो सभी लोग कविता में सक्षम होते. आपकी राय में यह प्रक्रिया कैसे होती है, किन लोगों के पास कविता आती है और हाँ अच्छी कविता से आप क्या अभिप्राय लेते हैं?

यह जटिल प्रश्न है. सच पूछा जाये तो यह भोजन की पाचन-प्रक्रिया की तरह से और सब तरह से जटिल है. ठीक-ठीक यह कह पाना थोड़ा मुश्किल नहीं, बल्कि पूरा असंभव है. असंभव को संभव नहीं किया जा सकता है. कोशिश की जा सकती है.

जिन्हें हम शब्द कहते हैं उन में से कई ऐसे होते हैं जो सभ्यता संघर्ष के रिटायर्ड और रिजर्व सिपाही होते हैं. सभ्यता के ये रिटायर्ड और रिजर्व सिपाही अपने अर्थ के अंदर बहुत सारी साक्ष्य-निरपेक्ष कहानियाँ छिपाये रखती हैं. इन का होना ही इन से जुड़ी कहानियों का साक्ष्य होता है. जीवन में बहुत-कुछ साक्ष्य-निरपेक्ष होता है. जो लोग जीवन के कई प्रसंगों के साक्ष्य-निरपेक्ष होने की मर्म-कथाओं का रहस्य जानते वे जन-जीवन के प्रत्येक प्रसंग को साक्ष्य-सापेक्ष बना देते हैं. दूसरों से उन प्रसंगों के साक्ष्य और सबूत मांगते हैं जो खुद उन के पास भी नहीं होते हैं— लेकिन उन के पास दूसरों से साक्ष्य और सबूत मांने की शक्ति होती है, जबकि दूसरों के पास मांगने की शक्ति नहीं होती है— जैसे साधारण आदमी से नागरिकता प्रमाणपत्र!

तो बात शक्ति पर आकर ठहर जाती है. शक्ति के कई स्वरूप हैं. लेखकों के पास तो कोई शक्ति होती नहीं है. पहले के जमाने में ऋषि-मुनियों के पास श्राप शक्ति हुआ करती थी, ऐसी मान्यता है. जी, साक्ष्य-निरपेक्ष मान्यता! लेखकों के पास शक्ति तो नहीं होती है, लेकिन कुछ हद तक शब्द-शक्ति का ज्ञान होता है, कुछ हद तक ही. हद की पूंजी लेकर हद पार कर जाता है — हद छाड़ि बेहद गया, किया सुन्न असनान. पूरी बात के लिए कबीर —

हद छाड़ि बेहद गया, किया सुन्न असनान I
मुनि जन महल न पावई, तहाँ किया बिसराम॥

संत-सनातन ‘सुन्न असनान’ करते हैं, भक्त-सनातन ‘पुण्य स्नान’.

इसी शब्द-शक्ति के सहारे कभी-कभार हद छोड़ बेहद हो जाता हूँ. कविताई अपने बूते से बाहर रही! न कवि होना वश में होता है, न कविताई वश में होती है. तरुणाई में मन की तरंग पर कोई चाहे जितना उड़े, बाकी जिंदगी तो किसी-न-किसी के मन की बात सुनने में ही ‘कल्याण’ है. मेरी एक कविता है — अच्छे शब्द दो*.

खैर!

मुझे यह कविता पहली बार पढ़ी थी तब भी पसंद थी अभी भी पसंद है.

इस रोचक बात-चीत का हिस्सा बनने के लिए बहुत आभार!

 

* अच्छे शब्द दो

एक अच्छी कविता के बारे में
सोचते हुए
मैं आपके बारे में
सोचने लगता हूँ.

आपके बारे में
सोचते हुए मैं
एक अच्छी कविता के बारे में
सोचने लगता हूँ.

अच्छे आदमी
और अच्छी कविता के बारे में
सोचते हुए मैं अक्सर
शब्दों से इतर
सोचने लगता हूँ.

हे अच्छे लोगों!
हमें अच्छे शब्द दो.

प्रदूषित भाषा के
दूषित शब्दों से
नहीं लिखी जा सकती अच्छी कविता,

और
अच्छी कविता के बिना
नहीं जी सकता अच्छा आदमी.

इसलिए
हे अच्छे लोगों!
हमें अच्छे शब्द दो—
कोयले की तरह
दहकते हुए!

महेश मिश्र सांस्कृतिक मामलों के जानकार और टिप्पणीकार हैं. भारतीय और वैश्विक मामलों पर दृष्टि रखते हैं. साहित्य में उनकी गहरी रुचि है और उनका लेखन लगातार सामने आ रहा है.
दिल्ली में रहते हैं.
प्रफुल्ल कोलख्यान
साहित्य, समाज, संस्कृति और राजनीति पर लिखते हैं.
कविता-संग्रह- मँजी हुई शर्म का जनतंत्र.
साहित्य, समाज और जनतंत्र, बाजारवाद और जनतंत्र, आजादी और राष्ट्रीयता का मतलब  छूटे हुए क्षण. आदि पुस्तकें प्रकाशित हैं.
‎prafullakolkhyan@gmail.com
Tags: 20262026 बातचीतप्रफुल्ल कोलख्यानमहेश मिश्र
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