| अ डिफेन्स ऑफ पोएट्री A Defence of Poetry : Percy Bysshe Shelley _______________________ अनुवाद : महेश मिश्र |

मानसिक प्रक्रियाओं की दो कोटियों, तर्क और कल्पना को समझने के एक दृष्टिकोण के अनुसार, पहले (यानी तर्क) को विचारों के आपसी संबंधों के मनन के रूप में देखा जा सकता है, भले ही वे किसी भी स्रोत से उत्पन्न हुए हों. दूसरी ओर, कल्पना वह शक्ति है जो इन विचारों को अपनी आभा से रंग देती है, और उन्हें इस प्रकार से संयोजित करती है कि वे नए विचारों का रूप ले लेते हैं. ये विचार स्वयं अपने भीतर सम्पूर्ण एकत्व का सिद्धांत समेटे रहते हैं. इनमें से पहला, संश्लेषण का सिद्धांत है, जो सार्वभौमिक प्रकृति का होता है और स्वयं अस्तित्व को अपना विषय बनाता है. दूसरा, विश्लेषण का सिद्धांत है, जिसका कार्य केवल वस्तुओं के आपसी संबंधों को देखना है— विचारों को उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि मात्र समीकरणों के रूप में देखना, जो कुछ सामान्य परिणामों तक पहुंचने में मदद करते हैं. तर्क पहले से ज्ञात गुणों का वर्णन है; कल्पना उन गुणों का मूल्य है. उन्हें अलग-अलग और समग्र रूप, दोनों तरह से, समझने की क्षमता है. तर्क में भिन्नताओं का ध्यान रहता है, जबकि कल्पना चीजों की समानताओं को पहचानती है. तर्क और कल्पना में वही संबंध है जो उपकरण और कर्ता में, शरीर और आत्मा में, या छाया और पदार्थ में होता है.
कविता को सामान्य अर्थ में “कल्पना की अभिव्यक्ति” कहा जा सकता है. कविता मनुष्य के जन्मजात स्वभाव से जुड़ी हुई है, क्योंकि यह मानव अस्तित्व की उत्पत्ति के साथ ही अस्तित्व में आई है. मनुष्य एक ऐसा यंत्र है, जिस पर बाहरी और आंतरिक प्रभावों की एक श्रृंखला उसी प्रकार पड़ती रहती है, जैसे एक ऐओलियन वीणा (Aeolian lyre) पर बहती हुई लगातार बदलती हुई हवा की तरंगें. जिस प्रकार यह हवा वीणा के तारों को हिलाकर एक अनूठी मधुरता उत्पन्न करती है, उसी प्रकार विभिन्न प्रभाव मनुष्य के भीतर भावनाओं और विचारों की एक गतिशील ध्वनि को जन्म देते हैं.
लेकिन, मनुष्य एक निष्क्रिय वीणा मात्र नहीं है, जो केवल स्वर उत्पन्न करता है, बल्कि उसके भीतर एक ऐसी शक्ति है, जो केवल मधुर ध्वनियाँ ही नहीं, बल्कि संतुलित और सामंजस्यपूर्ण (Harmony) संगीत भी उत्पन्न करता है. यह शक्ति ध्वनियों और संवेगों को व्यक्ति के भीतर ही समायोजित (internally adjust) करने की क्षमता रखती है, ताकि वे अपने मूल प्रेरक प्रभावों से तालमेल बिठा सकें.
यह ऐसा ही है, जैसे यदि वीणा स्वयं अपनी तारों को उसी धुन में समायोजित कर सके,
जिससे वह झंकृत होती है—जैसे कोई संगीतकार अपनी ध्वनि को वीणा की ध्वनि के अनुरूप ढाल सकता है.
जब कोई बच्चा अकेले खेलता है, तो वह अपने उल्लास को ध्वनियों और गति के माध्यम से प्रकट करता है. उसके स्वर की हर लय और उसके हर हाव-भाव का सीधा संबंध उन आनंददायक प्रभावों (pleasurable impressions) से होता है, जिन्होंने उसे यह अनुभव कराया.
जिस प्रकार वीणा तब भी गूँजती रहती है, जब हवा थम जाती है, उसी प्रकार बच्चा अपने स्वर और हाव-भाव के माध्यम से उस आनंद को अधिक देर तक बनाए रखना चाहता है. बच्चे के लिए यह अभिव्यक्ति उसी प्रकार है, जिस प्रकार कविता उच्चतर अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है.
जिस प्रकार एक बच्चा अपनी प्रसन्नता को व्यक्त करता है, वैसे ही एक आदिम व्यक्ति अपने परिवेश से प्रभावित होकर अपनी भावनाओं को भाषा, हाव-भाव, चित्रकला, या मूर्तिकला द्वारा व्यक्त करता है और वह खुद उन सबका संयुक्त प्रभाव तथा उनके प्रति अपनी आशंका का चित्र बन जाता है.
अपने समस्त आवेगों और आनंद सहित व्यक्ति समाज में अन्य व्यक्तियों के आवेगों और प्रसन्नता का विषय बन जाता है. भावनाओं का एक नया संस्तर बन जाता है. इससे अभिव्यक्तियों के एक नए खजाने का जन्म होता है, जिसमें भाषा, हाव-भाव, और कला एक साथ ही माध्यम और प्रतिनिधित्व, पेन्सिल और चित्र, छेनी और मूर्ति, राग और सामंजस्य बन जाते हैं.
जैसे ही दो मनुष्य एक साथ सह-अस्तित्व में आते हैं, सह-अनुभूति और अन्य सामाजिक नियम और कायदे विकसित होने लगते हैं जिनकी परिणति समाज है. भविष्य वर्तमान में उसी तरह समाहित होता है, जैसे किसी बीज में संपूर्ण वृक्ष होता है. और समानता, भिन्नता, एकता, विरोध, और परस्पर निर्भरता ही वे सिद्धांत बनते हैं, जिनमें यह क्षमता हो सकती है जो किसी सामाजिक इकाई (सामाजिक व्यक्ति) की इच्छाशक्ति को प्रेरित कर सकते हैं. और यही वे तत्त्व हैं जो संवेदनाओं में आनंद, भावनाओं में नैतिकता, कला में सौंदर्य, विचारों में सत्य, और आपसी संबंधों में प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं.
इसलिए, मानव समाज के प्रारंभिक काल से ही लोग अपने शब्दों और कार्यों में एक निश्चित क्रम का पालन करने लगे थे, जो उन वस्तुओं और प्रभावों से भिन्न था, जिनका वे प्रतिनिधित्व कर रहे थे. क्योंकि हर अभिव्यक्ति उसी नियम से संचालित होती है, जिससे वह उत्पन्न होती है. अब, इन गूढ़ सामाजिक सिद्धांतों पर विस्तृत चर्चा किए बिना, हम केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित करें कि कल्पना किस प्रकार अपने रूपों के माध्यम से व्यक्त होती है.
2.
जब यह विश्व अपने युवाकाल में था, तब मनुष्य नृत्य करता था, गाता था और प्राकृतिक वस्तुओं की नकल करता था. इन सभी क्रियाओं में, अन्य कार्यों की भांति, वह एक निश्चित लय और क्रम का पालन करता था. हालाँकि, सभी लोग नृत्य के संचालन में, गीत की धुन में, भाषा की संरचना में, और प्राकृतिक वस्तुओं की अनुकरण प्रक्रिया में मिलते-जुलते क्रम का अनुसरण करते थे, लेकिन यह क्रम हर किसी के लिए बिल्कुल एक जैसा नहीं था.
क्योंकि प्रत्येक प्रकार की अनुकरणात्मक (mimetic) अभिव्यक्ति का अपना एक विशिष्ट क्रम और अपनी एक विशेष लय होती है, जो श्रोता और दर्शक को अन्य किसी भी चीज़ की अपेक्षा अधिक तीव्र और शुद्ध आनंद प्रदान करती है. आधुनिक लेखकों ने इन विशिष्ट क्रमों के प्रति जागरूकता को ‘रुचि’ (taste) कहा है. कला के प्रारंभिक चरण में प्रत्येक व्यक्ति एक ऐसा क्रम अपनाता है, जो इस सर्वोच्च आनंद के स्रोत के अधिक या कम निकट होता है. लेकिन यह भिन्नता इतनी स्पष्ट नहीं होती, कि इसके विभिन्न स्तर सहज रूप से अनुभव किए जा सकें, सिवाय उन मामलों के जहाँ सौंदर्यबोध की यह प्रवृत्ति अत्यधिक प्रबल हो (जिससे हम इस सर्वोच्च आनन्द और उसके स्रोत के सम्बन्ध में कुछ कह सकें).
जिनमें यह क्षमता अत्यधिक मात्रा में होती है, वे सबसे सार्वभौम अर्थों में कवि होते हैं. वे समाज या प्रकृति के प्रभाव को जिस तरह अभिव्यक्त करते हैं और उससे अपने मन में जिस तरह आनन्द महसूस करते हैं, उसकी भावनात्मक गूंज अन्य लोगों तक भी सम्प्रेषित होती है. इसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं रहता, बल्कि समुदाय में इसका अनुकरण होता है. उनकी भाषा जीवंत रूपकात्मक (vitally metaphorical) होती है—अर्थात यह उन संबंधों को उजागर करती है, जो पहले अनदेखे थे और भावक की समझ को स्थायी बनाते हैं इस हद तक कि वे रूढ़ हो जाएं. अर्थात् उनके द्वारा बनाए गए शब्द पूर्ण विचारों के चित्र न रहकर मात्र वर्गीकृत अवधारणाओं के संकेत बन जाते हैं. उसके बाद यदि फिर से नए कवि न आएँ, जो इन खंडित संबंधों को पुनर्जीवित करें, तो भाषा मानवीय संवाद के वृहत्तर उद्देश्यों के लिए निष्प्राण होकर रह जाएगी.
लॉर्ड बेकन1 ने इन समानताओं और संबंधों को बहुत ही सुंदर रूप में परिभाषित किया है—उन्होंने कहा है कि शब्द “प्रकृति के पदचिह्न हैं, जो विश्व के विभिन्न विषयों पर अंकित हैं”. उन्होंने इस बोध को सभी ज्ञानों के सामान्य सिद्धांतों के भंडार के रूप में देखा. समाज के आरंभिक चरण में प्रत्येक लेखक अनिवार्य रूप से कवि होता था, क्योंकि स्वयं भाषा ही काव्य होती थी. कवि होना सत्य और सुंदरता को आत्मसात करना है—या संक्षेप में कहें तो अच्छाई को पहचानना है, जो पहले अस्तित्व और अनुभूति में, और फिर अनुभूति से अभिव्यक्ति की ओर जाती है. हर मौलिक भाषा, जब वह अपने स्रोत के निकट होती है, स्वयं एक चक्रीय कविता (cyclic poem) का अनगढ़ रूप होती है. व्याकरण की जटिलता और शब्दकोश की व्यापकता बाद के समय की देन हैं, जो कविता की रचनात्मकता के औपचारिक ढाँचें मात्र हैं.
लेकिन कवि, या वे जो इस अविनाशी व्यवस्था की कल्पना करते हैं और उसे व्यक्त करते हैं, केवल भाषा, संगीत, नृत्य, वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला के रचयिता ही नहीं होते; वे कानूनों के प्रवर्तक, नागरिक समाज के संस्थापक, जीवन की कलाओं के आविष्कारक और ऐसे शिक्षक होते हैं जो अदृश्य संसार की उन शक्तियों की आंशिक अनुभूति को—जिसे धर्म कहा जाता है—सुंदर और सत्य के निकट ले आते हैं. इस कारण सभी मौलिक धर्म रूपकात्मक होते हैं, या रूपक के योग्य होते हैं, और जानस2 की तरह उनका भी एक द्विमुखी स्वरूप होता है—एक सत्य का और एक असत्य का.
प्राचीन समय में कवि, उस युग और राष्ट्र की परिस्थितियों के अनुसार जिसमें वे प्रकट होते थे, विधि-निर्माता या भविष्यवक्ता कहलाते थे; परंतु एक कवि इन दोनों भूमिकाओं को अनिवार्य रूप से अपने भीतर समाहित रखता है और जोड़ता है. वह वर्तमान को सूक्ष्मता से धारित करता है, और उन नियमों की खोज करता है जिनके अनुसार वर्तमान को व्यवस्थित किया जाना चाहिए. वह वर्तमान में भविष्य की संकल्पना कर पाता है, और उसके विचार समकाल के फूलों और फलों के पराग होते हैं.
यह नहीं कि मैं कवियों को उस सामान्य अर्थ में भविष्यवक्ता मानता हूँ, या यह दावा करता हूँ कि वे घटनाओं के स्वरूप की भविष्यवाणी उसी निश्चितता से कर सकते हैं जिस निश्चितता से वे उनके सार को पहले ही जान लेते हैं. ऐसी मान्यता अंधविश्वास है, जो कविता को भविष्यवाणी का एक गुण बनाना चाहती है, बजाय इसके कि भविष्यवाणी को कविता का एक गुण माना जाए.
एक कवि शाश्वतता, अनंतता और एकत्व-भाव में सहभागी होता है. उसकी अवधारणाओं में समय, स्थान और संख्या का कोई अस्तित्व नहीं होता. उच्चतम कविता में समय के काल-वाचक रूप, व्यक्तियों के भेद और स्थान के अंतर का परिवर्तन किया जा सकता है, फिर भी वह अपनी काव्यात्मकता नहीं खोती. इस तथ्य के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हमें एस्किलस के कोरस3, अय्यूब की पुस्तक4 और दांते की पैराडाइज़5 में मिल सकते हैं, यदि इस निबंध की सीमाएँ हमें इन्हें उद्धृत करने से न रोकतीं. मूर्तिकला, चित्रकला और संगीत की रचनाएँ इस तथ्य को और भी निर्णायक रूप से स्पष्ट करती हैं.
3.
भाषा, रंग, रूप, और धार्मिक एवं नागरिक आचार-विचार, ये सभी कविता के उपकरण और सामग्री हैं; इन्हें उस आलंकारिक भाषा के अनुसार कविता कहा जा सकता है, जिसमें प्रभाव को कारण का पर्याय माना जाता है. लेकिन अधिक संकुचित अर्थ में, कविता उन भाषा-व्यवस्थाओं, विशेष रूप से छंदबद्ध भाषा को व्यक्त करती है, जो उस सम्राट-तुल्य शक्ति द्वारा रचित होती हैं, जिसका सिंहासन मानव के अदृश्य स्वभाव के भीतर निहित है. यह स्वयं भाषा की प्रकृति से उत्पन्न होती है, क्योंकि भाषा हमारे आंतरिक अस्तित्व की क्रियाओं और भावनाओं का अधिक प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है, और रंग, रूप या गति की तुलना में अधिक विविध और सूक्ष्म संयोजनों के लिए सक्षम होती है. भाषा उस सृजनशील शक्ति के नियंत्रण में अधिक लचीली और आज्ञाकारी होती है, जिसके द्वारा इसे निर्मित किया गया है. भाषा कल्पना के द्वारा मनमाने रूप से बनती है और केवल विचारों से संबंधित होती है; जबकि कला की अन्य सभी सामग्रियाँ, उपकरण और परिस्थितियाँ आपस में ऐसे संबंध रखती हैं, जो संकल्पना और अभिव्यक्ति के बीच हस्तक्षेप करती हैं और सीमाएँ बना देती हैं.
भाषा एक दर्पण के समान है, जो परावर्तित करती है, जबकि अन्य कलाएँ बादल के समान हैं, जो प्रकाश को मद्धिम कर देती हैं—यद्यपि दोनों ही संप्रेषण के माध्यम हैं. इसीलिए, मूर्तिकारों, चित्रकारों और संगीतकारों की ख्याति, भले ही इन महान कलाओं के उस्तादों की आंतरिक शक्तियाँ उन लोगों से किसी भी रूप में कम न हों, जिन्होंने भाषा को अपने विचारों के माध्यम के रूप में अपनाया है. फिर भी उनकी ख्याति कवियों के बराबर कभी नहीं पहुँचती, जबकि संकुचित अर्थ में वे भी “कवि” ही कहे जाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे बराबर दक्षता वाले दो कलाकार, यदि एक गिटार और दूसरा वीणा बजाए, तो उनका प्रभाव दर्शक पर बराबर नहीं पड़ता.
विधि-निर्माताओं और धर्म-प्रवर्तकों की ही ख्याति, वह भी तब तक जब तक उनकी संस्थाएँ बनी रहती हैं, प्रसिद्धि कवियों से अधिक होती है. परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि हम उस ख्याति को घटा दें, जो आम जनमानस की रूढ़ बन चुकी धारणाओं की खुशामदी से उनको प्राप्त हुई है, और उस प्रसिद्धि को भी हटा दें, जो उन्हें उनके उच्चतर कवि-सुलभ चरित्र के कारण मिलती है, तो कुछ भी शेष नहीं बचेगा.
हमने कविता शब्द की महिमा उस कला के रूप में परिभाषित किया है जो मानवीय सृजनात्मक शक्ति की सबसे अधिक जानी-पहचानी, प्रामाणिक और पूर्णतम अभिव्यक्ति है. फिर भी, इस परिभाषा को थोड़ा और सीमित करना आवश्यक है, ताकि छंदबद्ध और ग़ैर-छांदिक भाषा के बीच का अंतर स्पष्ट किया जा सके क्योंकि गद्य और पद्य का लोकप्रिय विभाजन तर्कसंगत मायनों में देखा जाए तो स्वीकार करने योग्य नहीं है.
जिस प्रकार विचारों के बीच एक व्यवस्थित संबंध होता है, उसी प्रकार ध्वनियाँ भी परस्पर संबंधित होती हैं और जिन अभिप्रायों को वे व्यक्त कर रही होती हैं उनसे भी गहराई से जुड़ी होती हैं. इन संबंधों को समझने की क्षमता सदैव विचारों के संबंधों को समझने की क्षमता से जुड़ी रही है. यही कारण है कि कवियों की भाषा में सदैव एक विशिष्ट लय और संगीतमय पुनरावृत्ति पाई जाती है—जिसके बिना वह कविता नहीं हो सकती. यह ध्वनि-सामंजस्य कविता के प्रभाव को संप्रेषित करने के लिए उतना ही अनिवार्य है, जितने कि शब्द स्वयं, भले ही उनका क्रम कुछ भी क्यों न हो.
यही कारण है कि काव्यानुवाद हमेशा अपूर्ण रहता है. किसी कविता को दूसरी भाषा में पूरी तरह रूपांतरित करना उतना ही असंभव है, जितना कि एक बैंगनी फूल (वॉयलेट) को किसी कुंभी में डालकर उसके रंग और सुगंध के मूलभूत सिद्धांतों को खोजने का प्रयास करना. जिस प्रकार किसी पौधे को दोबारा बीज से उगाना आवश्यक होता है, अन्यथा वह फूल नहीं दे सकता, उसी प्रकार कविता भी हर भाषा में नई मिट्टी, नए वातावरण में दोबारा जन्म लेती है. और यही बाबेल6 के शाप का सबसे गहरा सत्य है.
कवियों की भाषा में मौजूद लयबद्धता और संगीतात्मकता के सूक्ष्म अवलोकन से ही हम समझ पायेंगे कि छांदिक या लयबद्ध भाषा का जन्म कैसे होता है. लेकिन प्रत्येक कवि के लिए यह अनिवार्य नहीं कि वह हमेशा इस पारंपरिक तरीके का पालन करे ही करे—महत्वपूर्ण यह है कि उसकी कविता में वह लय और संगीत बना रहे, जो उसकी आत्मा है. छंदबद्ध रचना निश्चित रूप से अधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली होती है, विशेषकर ऐसी कविता में, जिनमें घटनाओं का विस्तार अधिक होता है. लेकिन हर महान कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों की रचना-शैली में कुछ नूतनता लाता है और अपनी विशिष्ट काव्य-शैली का निर्माण करता है.
कवि और गद्य लेखक में अंतर करना एक अशिष्ट-सी भूल है. इसी तरह, कवि और दार्शनिक के बीच का अंतर भी असंगत ही था. प्लेटो7 मूलत: एक कवि थे—उनकी कल्पना में जो सचाई व विशालता है और भाषा में जो माधुर्य है, वह बहुत गहरा है तथा कल्पना के अंतिम छोर तक पहुँचता है. उन्होंने महाकाव्य, नाटक और गीत-काव्य के पारंपरिक विभेदों को अस्वीकार किया, क्योंकि वे विचारों में ऐसा सामंजस्य उत्पन्न करना चाहते थे, जो किसी निश्चित रूप या घटना की सीमा में बंधा न हो. उन्होंने अपने वाक्यों की प्राकृतिक गति को किसी कठोर छंदबद्ध नियम में ढालने का प्रयास नहीं किया. सिसरो ने उनका अनुकरण करने की कोशिश की, लेकिन वे इसमें पूरी तरह सफल नहीं हो सके.
लॉर्ड बेकन भी एक मायने में कवि थे. उनकी भाषा में ऐसी गहरी लय और भव्यता है, जो पाठक की संवेदनाओं को उतना ही तृप्त करती है, जितनी उनके दर्शन की अतिमानवीय प्रज्ञा बुद्धि को संतुष्ट करती है. उनके शब्दों का प्रवाह पाठक की चेतना को पहले विस्तार देता है, फिर उसके मस्तिष्क की परिधि को तोड़कर उसे उन शाश्वत तत्त्वों से जोड़ देता है, जिनके साथ उसकी स्थायी संगति है.
हर क्रांतिकारी विचारक केवल इसलिए कवि नहीं होता कि वह नया सोचता है, या इसलिए कि उसके शब्द सत्य की गहरी झलक देते हैं, बल्कि इसलिए भी कि उसकी भाषा में एक स्वाभाविक लय होती है, जो शाश्वत संगीत की गूँज के समान होती है. और वे महान कवि, जिन्होंने अपने विषय की माँग के अनुसार पारंपरिक छंदों को अपनाया, वे भी सत्य को व्यक्त करने में उतने ही समर्थ थे, जितने वे, जिन्होंने इस लयबद्धता को छोड़ दिया. शेक्सपीयर8, दांते9 और मिल्टन10 (यदि हम केवल आधुनिक रचनाकारों की बात करें) सिर्फ कवि ही नहीं, बल्कि उदात्त अर्थों में महानतम दार्शनिक भी हैं.
कविता जीवन की जीवंत छवि है, जो उसके शाश्वत सत्य को प्रकट करती है. कहानी और कविता में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि कहानी केवल घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन होती है, जिसमें समय, स्थान, परिस्थितियाँ, कार्य- कारण के अलावा कोई अन्य गहरा संबंध नहीं होता. दूसरी ओर, कविता मानवीय प्रकृति के स्थायी स्वभाव के अनुकूल घटनाएँ रचती है—जिस तरह वे सृजनहार की चेतना में विद्यमान हैं और जो स्वयं समस्त मनुष्य मन का प्रतिबिंब हैं.
कहानी सीमित होती है—यह केवल एक निश्चित समय और घटनाओं के एक विशिष्ट मेल से जुड़ी होती है, जो दोबारा उसी रूप में नहीं घट सकती. कविता सार्वभौमिक होती है—इसके भीतर वह बीज समाहित होता है, जो मानवीय स्वभाव की अनगिनत संभावनाओं और कृत्यों से जुड़ा होता है. समय, जो कुछ विशेष घटनाओं के काव्य-रहित वर्णन से उसकी सुंदरता और उपादेयता नष्ट कर देता है, वही समय कविता के महत्त्व को और बढ़ा देता है. कविता में छिपे शाश्वत सत्य को समय निरंतर नए और अद्भुत अर्थों में विकसित करता रहता है. इसी कारण, घटनाक्रमों के वर्णन को न्यायसंगत इतिहास का पतंगा (कीड़ा) कहा गया है, क्योंकि यह उसमें छिपी कविता को नष्ट कर देता है. कुछ तथ्यों से बनी कहानी एक ऐसे दर्पण की तरह होती है, जो संभाव्य सुंदरता को भी अस्पष्ट और विरूपित कर देती है; जबकि कविता एक ऐसे दर्पण की तरह है, जो विकृत को भी मंजुल बना देती है.
किसी रचना के कुछ हिस्से काव्यात्मक हो सकते हैं, भले ही पूरी रचना कविता न हो. एक अकेला वाक्य भी सम्पूर्ण माना जा सकता है, भले ही वह एक असंगठित अंशों की श्रृंखला के बीच पाया जाए; यहाँ तक कि एक अकेला शब्द भी अमिट विचार की चिंगारी बन सकता है. इसी कारण, हेरोडोटस11, प्लूटार्क12 और लिवी13 जैसे महान इतिहासकार भी अपने तरीक़े के कवि थे. हालाँकि इनके लेखन की रूपरेखा, विशेष रूप से लिवी की शैली, उन्हें इस काव्यात्मक क्षमता को पूर्ण रूप से व्यक्त करने से रोकती थी, लेकिन उन्होंने अपनी इस सीमा की भरपाई अलग तरीक़े से की. उन्होंने अपने ऐतिहासिक वृत्तांत के हर खाली स्थान को जीवंत विवरणों से भर दिया, जिससे उनका लेखन इतिहास होते हुए भी कविता जैसा महसूस होता है.
अब जब हमने समझ लिया कि कविता क्या है और कवि कौन होते हैं, तो आइए यह जानें कि कविता का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है.
कविता हमेशा आनंद से जुड़ी होती है. जिस मन पर भी इसका प्रभाव पड़ता है, वह इसकी मधुरता में घुली हुई बुद्धिमत्ता को सहज रूप से आत्मसात कर लेता है. दुनिया के आरंभिक दौर में, न कवि और न ही उनके श्रोता पूरी तरह यह समझ पाते थे कि कविता का महत्त्व कितना विराट है. इसका असर किसी दैवीय शक्ति की तरह होता है—अदृश्य और अवचेतन रूप से, हमारे बोध से परे. काव्य की विराट शक्ति और महत्ता भविष्य की पीढ़ियों के सोचने समझने के लिए आरक्षित है. आज के समय में भी, कोई कवि अपने जीवनकाल में अपनी पूरी ख्याति तक नहीं पहुँच पाता. कवि किसी एक युग का नहीं, बल्कि समूचे समय का होता है. इसलिए उसके मूल्यांकन का निर्णय भी कई पीढ़ियों के सबसे बुद्धिमान व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए. कवि तो एक बुलबुल की तरह होता है, जो अकेले में बैठकर अपनी मधुर ध्वनि से अपने एकाकीपन को संगीतमय बना लेता है. और उसके श्रोता उन लोगों के समान होते हैं जो किसी अनदेखे संगीतकार की धुन में खो जाते हैं. वे इस संगीत से भाव-विभोर हो जाते हैं, उनका हृदय कोमल पड़ जाता है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि यह अनुभूति कहाँ से और क्यों आ रही है.
होमर14 और उनके समकालीन कवियों की रचनाएँ युवा ग्रीस के लिए आनंद का स्रोत थीं. ये वह आधार थीं, जिन पर ग्रीक समाज और उसकी सभ्यता की पूरी संरचना टिकी थी.
अपने युग की आदर्श सम्पूर्णता को मानवीय चरित्रों को होमर ने साकार किया था, इसमें कोई संदेह नहीं. संदेह इसमें भी नहीं हमें कि जिन्होंने उनकी कविताएँ पढ़ी थीं, वे एकिलीस15, हेक्टर16, और यूलिसिस17 जैसे महान पात्रों के समान बनने की आकांक्षा से प्रेरित ज़रूर हुए होंगे. इन कविताओं में मित्रता का खरापन और उसका सौंदर्य, देशभक्ति और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण जैसी भावनाओं को गहराई से उकेरा गया था. उनके श्रोताओं और पाठकों का हृदय इन महान और सुंदर चरित्रों से गहरी अनुभूति के माध्यम से शुद्ध और विस्तृत अवश्य होता होगा. प्रशंसा का भाव आता होगा. प्रशंसा से अनुकरण और अनुसरण से वे अपनी पहचान को उन आदर्शों से जोड़ने लगे होंगे जिन्हें वे सम्मान की दृष्टि से देखा करते थे. यदि कोई यह कहे कि ये पात्र नैतिक रूप से पूर्ण नहीं थे और इसलिए ये अनुकरण के योग्य नहीं हैं, तो हमें यह समझना होगा कि हर युग अपने नायकों को अलग-अलग मानदंडों में गढ़ता है.
प्रतिशोध एक अर्द्ध-बर्बर युग की पूजा का नंगा देवता है: और आत्म-छल वह ढका हुआ रूप है जो अज्ञात बुराई का प्रतीक है, जिसके सामने विलासिता नतमस्तक हो जाती है.
लेकिन कवि अपने समकालीनों की बुराइयों को महज़ एक अस्थायी आवरण मानता है, जिसमें उसकी रचनाएँ लिपटी होती हैं—एक ऐसा आवरण जो उनकी शाश्वत सुंदरता को ढँकता तो है, लेकिन मिटा नहीं सकता. महाकाव्य या नाटक का पात्र इन्हें अपनी आत्मा पर उसी तरह धारण करता है, जैसे कोई योद्धा प्राचीन कवच या आधुनिक वर्दी पहनता है—एक बाहरी आवरण, जिसे बदला जा सकता है. यह कल्पना करना कठिन नहीं कि इससे भी अधिक सुन्दर परिधान संभव है. लेकिन सच्ची सुंदरता, जो आत्मा की गहराइयों में निहित है, कभी भी पूरी तरह छिप नहीं सकती. वह अपने आवरण को भी अपनी आभा से भर देती है, और जिस तरह वह उसे धारण करती है, उसी से उसके वास्तविक स्वरूप की झलक मिल जाती है.
एक दिव्य रूप और उसकी मनोरम गतियाँ, चाहे कितने ही असभ्य और अरुचिपूर्ण कपड़ों में ढकी हों, अपनी गरिमा और सौंदर्य को प्रकट कर ही देती हैं. महानतम कवियों में बहुत कम ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी कल्पनाओं के शुद्धतम सौंदर्य को उसकी निर्वसन सत्यता और तेजस्विता में प्रस्तुत किया हो. यह भी विचारणीय है कि यह स्वर्गिक संगीत—जो मानो किसी गूढ़ ग्रह का दिव्य गान हो—नश्वर मानव कानों के लिए सुग्रहणीय बनाना क्या अलंकरणों के बिना संभव होगा?
4.
कविता की अनैतिकता को लेकर उठाई गई समस्त आपत्तियाँ दरअसल इस भ्रांति पर आधारित हैं कि कविता मनुष्य के नैतिक उत्थान में किस तरह सहायक होती है. नैतिक शास्त्र उन तत्वों को व्यवस्थित करता है जिन्हें कविता ने सृजित किया है; वह सामाजिक और पारिवारिक सिद्धांतों की रूपरेखा प्रस्तुत करता है और उदाहरण प्रस्तावित करता है. लेकिन केवल उत्तम सिद्धांतों की कमी के कारण ही लोग एक-दूसरे से घृणा नहीं करते, एक-दूसरे को तुच्छ नहीं समझते, आलोचना नहीं करते, धोखा नहीं देते और एक-दूसरे को गुलाम नहीं बनाते. कविता का प्रभाव एक भिन्न और दिव्य तरीके से होता है. यह हमारे मस्तिष्क को उन अनगिनत विचारों और संभावनाओं का केंद्र बना देती है, जिन्हें अन्यथा हम समझ ही नहीं सकते.
कविता संसार की छिपी हुई सुंदरता से पर्दा उठाती है और परिचित वस्तुओं को इस प्रकार प्रस्तुत करती है जैसे वे पहली बार देखी जा रही हों. यह उन सभी चीजों को पुनः सृजित करती है जिन्हें वह चित्रित करती है. कविता के प्रकाश में जो भी रूपक या कल्पनाएँ जन्म लेते हैं, वे पाठकों के मन में स्थायी रूप से अंकित हो जाते हैं और उनके विचारों तथा कार्यों में एक कोमल और उच्च कोटि की संतुष्टि भर देते हैं.
नैतिकता का सबसे बड़ा रहस्य प्रेम है— यानी अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर उस सौंदर्य के साथ स्वयं को एकाकार करना जो विचारों, कर्मों या व्यक्तित्व में मौजूद है, लेकिन जो हमारा अपना नहीं है. एक व्यक्ति को उदात्त बनने के लिए तीव्र और व्यापक कल्पना शक्ति से युक्त होना चाहिए; उसे स्वयं को दूसरों की स्थिति में रखना आना चाहिए; उसे अपने समाज के सुख-दुःख को अपना मानना चाहिए. नैतिक उत्थान का सबसे बड़ा उपकरण कल्पना है, और कविता इस प्रक्रिया में योगदान देती है क्योंकि वह मूल कारण को प्रभावित करती है. कविता नित नए आनंददायक विचारों के आलोक से कल्पना की परिधि को विस्तारित करती रहती है. ये विचार अपने स्वभाव के अनुरूप अन्य विचारों को अपनी ओर आकर्षित कर उन्हें आत्मसात कर लेते हैं जो नए विराम और रिक्त स्थान बनाते हैं. इन अंतरालों में नई खुराक की माँग उठती रहती है. कविता मनुष्य की नैतिक प्रवृत्ति को उसी तरह सशक्त करती है जैसे व्यायाम शरीर के अंगों को मजबूत करता है.
अतः कोई कवि यदि अपनी काव्य रचनाओं में अपने स्थान और काल के अनुरूप बने नैतिक और अनैतिक के विचारों को आरोपित करे, तो यह अनुचित होगा, क्योंकि उसकी रचनाएँ न तो किसी युग की सीमाओं में बंधी होती हैं, न ही किसी स्थान विशेष की. यदि वह केवल प्रभाव को दृष्टि में रखकर निम्नतर कार्य को स्वीकार कर लेता है— जिसमें संभवतः वह अपूर्ण ही सिद्ध होगा— तो वह उस महान गौरव से वंचित हो जाएगा, जो मूल में अपनी सहभागिता से प्राप्त होता है.
होमर या अन्य महान और शाश्वत कवियों के लिए यह खतरा नहीं था कि वे अपनी इस सर्वोच्च सत्ता को छोड़ देते. लेकिन जिन कवियों में काव्य-शक्ति महान तो थी, परंतु उतनी तीव्र नहीं थी—जैसे यूरिपिडीज18, लुकेन19, टैसो20, स्पेंसर21—ने नैतिक उपदेश लादने के प्रयास किये परिणामस्वरूप, उनकी काव्य-प्रतिभा उसी अनुपात में क्षीण हुई, जिस अनुपात में उन्होंने अपने पाठकों को अपने (नैतिक) उद्देश्य की ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए बाध्य किया.
होमर और चक्रीय कवियों (Cyclic Poets) के बाद एक निश्चित अंतराल पर एथेंस के नाट्य और गान-कवि (lyrical poets) आए. ये उसी युग में विकसित हुए जब काव्य प्रतिभा के अन्य सभी रूप अपनी पूर्णता को प्राप्त कर रहे थे—जैसे वास्तुकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, दर्शनशास्त्र और यहाँ तक कि नागरिक जीवन का संगठन भी.
हालाँकि एथेनियाई समाज की संरचना में कई खामियाँ थीं, जिन्हें आधुनिक यूरोप की संस्कृति और ईसाई आदर्शों ने धीरे-धीरे मिटा दिया, फिर भी इतिहास में ऐसा कोई और समय नहीं आया जब इतनी ऊर्जा, सुंदरता और नैतिकता का विकास हुआ हो. न ही किसी अन्य युग में बेलगाम शक्ति और कठोर संरचना को इतनी कुशलता से अनुशासित किया गया और मनुष्य की इच्छाशक्ति के अधीन किया गया. और न ही, किसी अन्य समय में मनुष्य की इच्छाशक्ति सुंदरता और सत्य के सिद्धांतों के विरुद्ध इतनी कम रही, जितनी कि सुकरात की मृत्यु से एक शताब्दी पहले तक थी.
हमारे इतिहास में ऐसा कोई और युग नहीं है, जिसके पास मनुष्य में मौजूद दिव्यता की इतनी स्पष्ट छाप लिए हुए साक्ष्य और अवशेष (records and fragments) हों. लेकिन यह केवल कविता ही थी—चाहे वह रूप में हो, क्रियाओं में हो, या भाषा में—जिसने इस युग को अन्य सभी युगों की तुलना में इतना अधिक यादगार बना दिया और इसे आने वाले समय के लिए प्रेरणास्रोत बना दिया.
उस समय लिखित काव्य अन्य कलाओं के साथ समानांतर रूप से मौजूद था, और यह व्यर्थ की बहस होगी कि किसने किसे प्रकाश दिया. वास्तव में, सभी कलाएँ एक ही स्रोत से प्रकाश प्राप्त कर रही थीं और उन्होंने इस प्रकाश को आगे के अंधकारपूर्ण युगों में फैलाया. हम कारण और प्रभाव के बारे में उतना ही जानते हैं जितना कि घटनाओं की निरंतर संगति से जाना जा सकता है. जहाँ भी कोई ऐसी कला पाई जाती है, जो मनुष्य की प्रसन्नता और पूर्णता में योगदान देती है, वहाँ कविता भी सह-अस्तित्व में रहती है. मैं कारण और प्रभाव में अंतर के पहले से स्थापित तथ्य का ही हवाला दे रहा हूँ.
यही वह दौर था जब नाटक (ड्रामा) का जन्म हुआ. भले ही बाद के कुछ लेखकों ने एथेंस के उन महान नाटकों की बराबरी कर ली हो या आगे निकल गए हों, जो अब तक हमारे पास सुरक्षित हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि नाट्यकला को उसके असली दार्शनिक दृष्टिकोण के अनुसार समझा और अपनाया गया था तो केवल एथेंस में. एथेनियन नाटकों में भाषा, अभिनय, संगीत, चित्रकला, नृत्य और धार्मिक परंपराओं का उपयोग एक साथ किया जाता था, ताकि भावनाओं और शक्ति के उच्चतम आदर्श का सम्पूर्ण चित्रण किया जा सके. कला के प्रत्येक विभाग को उस क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ कलाकारों द्वारा परिपूर्ण बनाया गया था और इन सभी तत्वों को एक सुंदर संतुलन और सामंजस्य के साथ प्रस्तुत किया जाता था.
इसके विपरीत, आधुनिक रंगमंच पर केवल कुछ ही ऐसे तत्वों का उपयोग किया जाता है, जो कवि की कल्पना के चित्रण में सक्षम हैं. हमारे पास संगीत और नृत्य के बिना त्रासदी (tragedy) है, और संगीत व नृत्य ऐसे रूप में हैं, जिनमें वे जिस महान अभिनय के पूरक हो सकते थे, वह नहीं है. इसके अलावा, दोनों से धर्म और गंभीरता को पूरी तरह हटा दिया गया है. आधुनिक रंगमंच से धार्मिक परंपराओं को प्रायः बहिष्कृत कर दिया गया है.
हमारे नाटकों में अभिनेताओं के चेहरे से मुखौटे (masks) को हटा देने की परंपरा विकसित हुई, जबकि प्राचीन रंगमंच में इन मुखौटों पर नाटक के चरित्रों की विभिन्न भाव-भंगिमाएँ उकेरी जाती थीं, जिससे एक स्थायी और स्पष्ट भाव-प्रभाव निर्मित होता था. आधुनिक प्रणाली केवल एक आंशिक और असंगत प्रभाव के लिए उपयुक्त है, जो मुख्यतः एकल-अभिनय (monologue) के लिए अधिक प्रभावी हो सकता है, जहाँ संपूर्ण ध्यान केवल एक कुशल अभिनेता की नकल या अभिनय-अभिव्यक्ति पर केंद्रित किया जा सकता है.
आधुनिक नाटकों में त्रासदी और हास्य को मिलाने की परंपरा, हालाँकि कई बार ग़लत रूप से प्रयोग में लाई जाती है, फिर भी यह नाट्य कला के दायरे को व्यापक बनाती है. लेकिन यह हास्य “किंग लीयर22“ की तरह का होना चाहिए—सार्वभौमिक, आदर्शवादी और उदात्त. संभवतः यही तत्व “किंग लीयर” को “ओडीपस टायरैनस23” या “एगामेमनॉन24” जैसी कृतियों से श्रेष्ठ बना देता है, या उन त्रयी नाटकों से भी जिनसे वे जुड़े हुए हैं. हालाँकि, “एगामेमनॉन” के कोरल काव्य (choral poetry) की अत्यधिक शक्ति इस संतुलन को फिर से स्थापित कर सकती है. यदि “किंग लीयर” इस तुलना में खरा उतरता है, तो इसे नाट्यकला का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण माना जा सकता है, भले ही आधुनिक यूरोप में नाट्यकला के दार्शनिक दृष्टिकोण की अज्ञानता के कारण शेक्सपियर को कुछ शर्तों के अधीन काम करना पड़ा हो.
काल्डेरॉन25 ने अपने धार्मिक नाटकों में उन ऊँचे आदर्शों को अपनाने का प्रयास किया, जिन्हें शेक्सपियर ने नज़र-अंदाज़ किया था—जैसे कि नाटक और धर्म के बीच संबंध स्थापित करना और उन्हें संगीत व नृत्य के अनुरूप ढालना. लेकिन उन्होंने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण तत्त्वों की उपेक्षा कर दी, जिससे यह लाभ की बजाय हानि का कारण बना. एक कठोर और विकृत अंधविश्वास से उपजे स्थायी और बार-बार दोहराए जा रहे आदर्शों को अपनाने की तुलना में, मानवीय आवेगों की सजीव अभिव्यक्ति कहीं अधिक प्रभावी होती.
लेकिन मैं विषय से भटक रहा हूँ. रंगमंचीय प्रस्तुतियों का मनुष्यों के आचरण को सुधारने या भ्रष्ट करने से संबंध होना हमेशा से स्वीकार किया गया है. दूसरे शब्दों में, जब कविता अपने सबसे पूर्ण और सार्वभौमिक रूप में मौजूद होती है, तो उसका सीधा संबंध अच्छे या बुरे आचरण और आदतों से देखा गया है. नाटक में जिस विचलन का आरोप लगाया जाता है, वह तब शुरू होती है जब उसमें मौजूद काव्यात्मकता समाप्त हो जाती है. मैं शिष्टाचार में रहते हुए यह सिद्ध कर सकता हूँ कि जिस समय नाटक में काव्य का उत्थान हुआ, उसी समय समाज का नैतिक विकास हुआ, और जब काव्य का पतन हुआ, तो समाज में भी नैतिक गिरावट आई—इसका संबंध उतना ही सटीक है जितना कि किसी भी अन्य नैतिक कारण और प्रभाव (moral cause and effect) का उदाहरण.
एथेंस में, या जहाँ भी नाटक अपने सर्वोत्तम रूप में पहुँचा, वह हमेशा उस युग की नैतिक और बौद्धिक महानता के साथ सह-अस्तित्व में रहा. एथेन्स के कवियों की त्रासदियाँ एक दर्पण की तरह होती थीं, जिसमें दर्शक खुद को देख सकता था—हालाँकि परिस्थितियों का एक हल्का आवरण होता था, लेकिन उसमें केवल वही तत्व शेष रहते थे जो आदर्श पूर्णता और ऊर्जा का प्रतीक होते थे. ये वही गुण हैं, जिन्हें हर व्यक्ति भीतर से महसूस करता है, प्रेम करता है, प्रशंसा करता है और स्वयं में अपनाना चाहता है.
इन नाटकों के माध्यम से कल्पना की परिधि बड़ी हो जाती है, क्योंकि वे पीड़ा और भावनाओं को इतने मार्मिक ढंग से दर्शाते हैं कि उनके प्रभाव से मानव मस्तिष्क की सीमाएँ भी फैल जाती हैं. करुणा, आक्रोश, भय और दुख जैसी भावनाएँ व्यक्ति के भीतर सकारात्मक गुणों को और अधिक मजबूत बनाती हैं. इन गहरी भावनाओं का अनुभव एक उच्च स्तर की मानसिक शांति उत्पन्न करता है, जो हमारी साधारण जीवन की हलचल में भी बना रहता है. यहाँ तक कि अपराध भी अपनी आधी भयावहता और संक्रामकता खो देता है, क्योंकि उसे प्रकृति की रहस्यपूर्ण शक्तियों के अनिवार्य परिणाम के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. इस प्रकार, ग़लतियाँ जानबूझकर की गई भूलों की तरह नहीं लगतीं; लोग उन्हें अपनी स्वतंत्र इच्छा से पैदा हुईं हैं-ऐसा मानकर सँजोना नहीं चाहते.
उच्चतम स्तर के नाटक में आलोचना या घृणा के लिए बहुत कम स्थान होता है; यह व्यक्ति को आत्म-ज्ञान और आत्म-सम्मान सिखाता है. न तो आँख और न ही मस्तिष्क खुद को तब तक देख सकते हैं, जब तक कि वे किसी ऐसी चीज़ में प्रतिबिम्बित न हों जो उनके समान हो. जब तक नाटक अपनी काव्यात्मकता को बनाए रखता है, वह एक बहुआयामी दर्पण (prismatic mirror) की तरह होता है, जो मानव प्रकृति की सबसे उज्ज्वल किरणों को एकत्र करता है, उन्हें सरलतम रूपों में विभाजित कर पुनः प्रस्तुत करता है, और उन्हें महिमा और सुंदरता से आलोकित करता है. यह जो कुछ भी प्रतिबिंबित करता है, उसे कई गुना बढ़ा देता है और जहाँ भी यह आलोक पड़ता है, वहाँ वह उसी ऊर्जा का संचार करने की क्षमता रखता है.
लेकिन जब सामाजिक जीवन पतन की ओर बढ़ता है, तो नाटक भी उसी पतन के साथ सहानुभूति रखने लगता है. त्रासदी (tragedy) सिर्फ प्राचीन महान कृतियों की नीरस नकल बनकर रह जाती है, जो अन्य कलाओं के सामंजस्यपूर्ण सहयोग से वंचित होती है. और कई बार तो इसका रूप ही ग़लत समझ लिया जाता है, या फिर यह लेखक द्वारा नैतिक-सत्य माने जाने वाले कुछ सिद्धांतों को सिखाने का कमज़ोर प्रयास बनकर रह जाती है. लेकिन अक्सर ये तथाकथित नैतिक सत्य केवल उन बुराइयों या कमजोरियों की आकर्षक प्रतिकृतियाँ होते हैं, जिनसे लेखक और भावक समान रूप से ग्रस्त होते हैं.
इसीलिए हमें “शास्त्रीय” और “पारिवारिक” नाटक देखने को मिलते हैं. उटिकन कैटो26 (Cato) इसका एक उदाहरण है, क्या अन्य उदाहरण भी देने की जरूरत है?
लेकिन काव्य को ऐसे उद्देश्यों की चेरी कभी भी नहीं बनाया जा सकता. कविता एक बिजली की तलवार की तरह होती है, जो हमेशा म्यान से बाहर रहती है और उस म्यान को जला देती है जो इसे रखने की कोशिश करती है. यही कारण है कि इस तरह के सभी नाट्य-लेखन (ट्रैजेडी नाटक) में कल्पनाशक्ति का असाधारण रूप से अभाव होता है. ये केवल भावुकता और जुनून को दर्शाने का दिखावा करते हैं, लेकिन जब ये कल्पनाशक्ति से रहित होते हैं, तो ये केवल सनक और लालसा के पर्याय होते हैं, उससे अधिक कुछ नहीं.
हमारे अपने इतिहास में, नाटक के सबसे पतित दौर की पहचान चार्ल्स द्वितीय27 के शासनकाल से होती है, जब कविता के सभी रूप, जो पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति के माध्यम थे, राजशाही की स्वतंत्रता और सद्गुण पर विजय का महिमामंडन करने वाले विरुद-गान बन गए. उस अंधकार-युग में केवल मिल्टन अकेले प्रकाश फैलाने वाले थे, लेकिन उनका युग उनके योग्य नहीं था. ऐसे समय में, नाटक की सभी विधाओं पर एक लेखा-जोखा वाला दृष्टिकोण हावी हो जाता है और कविता अपना अस्तित्व खो देती है.
हास्य नाटकों से उनकी आदर्श सार्वभौमिकता समाप्त हो जाती है. हास्य (humor) की जगह व्यंग्य-विनोद (wit) ले लेता है. हम आनंद से नहीं, बल्कि आत्मतुष्टि और दूसरों पर विजय की भावना से हँसते हैं. सौम्य उल्लास की जगह विद्वेष, व्यंग्य और तिरस्कार आ जाते हैं. हम खुलकर हँसते नहीं, बस एक व्यंग्य-भरी मुस्कान रखते हैं.
अश्लीलता सदा जीवन की दिव्य-सुंदरता का अपमान करने वाली ईश-निंदा की तरह होती है. वह अपनी छिपाव की प्रवृत्ति के कारण और भी अधिक भड़क जाती है, भले ही वह बाहरी रूप से कम घृणास्पद लगे. यह ऐसी आसुरी-वृत्ति है, जिसे समाज की भ्रष्टता चुपके-चुपके निरंतर पोषण देती रहती है.
नाटक वह विधा है जिसमें काव्य की अभिव्यक्ति के अधिकतम रूपों को एक साथ जोड़ा जा सकता है. इसी कारण, कविता और सामाजिक नेकी के बीच का संबंध अन्य किसी भी साहित्यिक रूप की तुलना में नाटक में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दिखता है. यह निर्विवाद है कि जिस युग में मानव समाज अपनी सर्वोच्च उत्कृष्टता पर पहुँचा, उसी युग में नाट्य कला भी अपने उच्चतम स्तर पर थी. इसके विपरीत, किसी भी देश में, जहाँ कभी नाटक का प्रचलन हुआ, यदि वह पतन की ओर बढ़े या विलुप्त हो जाए, तो यह उस समाज के नैतिक अवसान और उन ऊर्जाओं के समाप्त होने का संकेत है, जो सामाजिक जीवन की आत्मा को जीवंत बनाए रखती हैं. लेकिन, जैसा मैकियावेली28 ने राजनीतिक संस्थाओं के बारे में कहा था कि यदि कोई ऐसा व्यक्ति उठ खड़ा हो, जो उन्हें उनके मूल सिद्धांतों पर वापस ला सके, तो वे पुनर्जीवित और सशक्त हो सकती हैं—वैसा ही नाटक और काव्य के साथ भी संभव है.

5.
यह सत्य है कि कविता अपने वृहत्तर अर्थों में केवल एक बार रच के छोड़ नहीं दी जाती, बल्कि उसे निरंतर रचते रहना होता है. सभी भाषाएँ, संस्थाएँ और कला रूप केवल उत्पन्न होने से ही नहीं टिकते, बल्कि उन्हें निरंतर पोषित करना होता और सँजोना भी ज़रूरी होता है. कवि की भूमिका और उसका चरित्र एक अलौकिक स्वभाव को धारण करता है—यह केवल सृजन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसमें एक भविष्यदृष्टा- शक्ति भी होती है, जो समाज को मार्गदर्शन और पुनर्जीवन देने की क्षमता रखती है.
गृह-युद्ध, एशिया की लूट, और पहले मैसेडोनियाई फिर रोमन सेना के बर्बर प्रभुत्व – ये सभी ग्रीस की रचनात्मक शक्ति के समाप्त होने या ठहराव के प्रतीक थे. सिसिली और मिस्र के विद्वान शासकों के संरक्षण में पनपने वाले चरवाहे-कवि (ब्यूकोलिक पोएट्स29) ग्रीस के स्वर्णिम युग के अंतिम प्रतिनिधि थे. उनकी कविता अत्यधिक मधुर थी—कुछ ऐसी कि जैसे रजनीगंधा की तेज़ सुगंध, जो मन को मोहित करने के साथ-साथ बोझिल भी कर देती है. जबकि उनके पूर्ववर्ती कवियों की कविता जून की ताज़ी बयार की तरह थी, जो मैदान में खिले फूलों की सुगंध को मिलाकर एक नई ऊर्जा और लय उत्पन्न करती थी, जिससे आनंद टिकाये रखने की क्षमता बनी रहती थी. लिखित कविता में जो स्वच्छंदता और ऐन्द्रिक कोमलता देखी जाती है, वह मूर्तिकला, संगीत और अन्य समकालीन कलाओं, यहाँ तक कि उस समय की जीवनशैली और सामाजिक संस्थाओं में भी परिलक्षित होती है.
अब मैं जिस युग का वर्णन करने जा रहा हूँ वह भिन्न है, लेकिन इस असंतुलन के लिए कविता को या काव्य-प्रतिभा की कमी को ही केवल दोष नहीं दिया जा सकता.
होमर और सोफोक्लीज़30 जैसे महान कवियों में भी ऐन्द्रिक और भाव-जगत के प्रति उतनी ही संवेदनशीलता है. होमर तो विशेष रूप से संवेदी और मार्मिक चित्रण में अनूठा आकर्षण भर पाए हैं. परंतु उन कवियों की श्रेष्ठता इस बात में है कि उनकी कविताओं में केवल बाहरी सौंदर्य का ही नहीं, बल्कि मनुष्य के आंतरिक जगत का भी गहन चित्रण है. उनकी अपूर्व उत्कृष्टता इस संतुलन में निहित थी. बाद के प्रेम-कवियों की कमी इस बात में नहीं थी कि उन्होंने क्या लिखा है, बल्कि इस बात में थी कि उन्होंने क्या नहीं लिखा. इसी में उनकी अपूर्णता निहित है. वे अपने समय के नैतिक पतन से उतने जुड़े नहीं थे, जितना कि कुछ लोग मानते हैं. यदि उनका पतन वास्तव में इतना गहरा होता कि वे आनंद, प्रेम, और प्रकृति के सौंदर्य को महसूस करने की क्षमता खो देते, तो यह समाज में बुराई की अंतिम जीत होती. क्योंकि सामाजिक पतन का अंतिम उद्देश्य ही यह होता है कि वह आनंद की हर संवेदना को समाप्त कर दे. यह सबसे पहले केन्द्रस्थ कल्पना और बुद्धि पर प्रभाव डालता है, फिर धीरे-धीरे यह भावनाओं और इच्छाओं तक फैलकर संपूर्ण चेतना को सुन्न और मरण-प्राय कर देता है.
ऐसे समय में कविता उन मानसिक क्षमताओं से संवाद करती है, जो सबसे अंत में नष्ट होती हैं. उसकी आवाज़ न्याय की देवी ‘एस्ट्राया’31 के अंतिम पद-चिह्नों की तरह होती है, जब वह दुनिया को छोड़कर चली जाती है. कविता हमेशा मनुष्य को उसके आनंद की चरम सीमा तक पहुँचाने का प्रयास करती है. यह हमेशा जीवन का प्रकाश बनी रहती है—यह वही स्रोत है, जिससे किसी बुरे से बुरे समय में भी सौंदर्य, उदारता और सच्चाई बनी रह सकती है.
इसमें कोई संदेह नहीं कि सिरैक्यूज़32 और अलेक्ज़ेंड्रिया33 के विलासी नागरिक, जो थियोक्रिटस की कविताओं से आनंदित होते थे, वे अपने समय के अन्य ठंडे, निर्दयी और कामुक लोगों की तुलना में अधिक संवेदनशील थे और उनमें ये दुष्प्रवृत्तियाँ कम मात्रा में थीं. लेकिन जब तक मानव समाज संपूर्ण रूप से भ्रष्ट न हो जाए, तब तक कविता का अस्तित्व समाप्त नहीं होगा. उस पवित्र श्रृंखला के संबंध कभी पूर्णतः विच्छिन्न नहीं हुए, जो अनेक मनुष्यों के दिमाग़ से उतरती हुई, उन महान आत्माओं से जुड़ी है, जहाँ से किसी चुम्बक की तरह एक अदृश्य प्रवाह प्रसारित होता है, जो एक साथ जोड़ता है, जागृत करता है, और समस्त जीवन को संजोए रखता है.
कविता में वह शक्ति है, जो न केवल ख़ुद को बल्कि पूरे समाज को पुनर्जीवित रखती है. हमें चरवाहा गीत और प्रेम-काव्य (erotic poetry) के प्रभाव को केवल उन लोगों तक सीमित नहीं करना चाहिए, जिनको वे सम्बोधित थीं. उस समय के लोग भले ही इन रचनाओं को केवल अलग-अलग व टुकड़ों में देख पाए हों, लेकिन जो अधिक संवेदनशील हैं या किसी बेहतर युग में जन्मे हैं, वे इन्हें उस महान कविता के हिस्से के रूप में देख सकते हैं, जिसे संसार के आरंभ से लेकर अब तक सभी कवियों ने एक साथ मिलकर रचा है—जैसे किसी एक महान बुद्धि की सहयोजी चिंतन-धारा.
प्राचीन रोम में भी इसी तरह के परिवर्तन एक छोटे दायरे में हुए, लेकिन वहाँ के सामाजिक जीवन के कार्यों और स्वरूपों में कभी भी काव्यात्मक उदात्तता पूरी तरह नहीं दिखती. रोम के लोगों ने यूनानियों को शिष्टाचार और प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ रूपों के भंडार के रूप में देखा और उन्होंने काव्यात्मक भाषा, मूर्तिकला, संगीत, या वास्तुकला में कुछ भी ऐसा सृजित करने से परहेज किया, जो विशेष रूप से उनकी अपनी स्थिति के संगत होता, जबकि वह पूरे विश्व की सार्वभौमिक व्यवस्था से सामान्य रूप से संबंधित होना चाहिए था.
लेकिन हम अपूर्ण प्रमाणों के आधार पर निर्णय लेते हैं, और संभवतः पक्षपातपूर्ण निर्णय करते हैं. एनियस35, वार्रो36, पकुवियस37 और आकियस38—जो सभी महान कवि थे—आज लुप्त हो चुके हैं. लुक्रेतियस39 उच्चतम स्तर पर और वर्जिल बहुत ऊँचे स्तर पर सृजनकर्ता थे. वर्जिल की अभिव्यक्तियों की परिष्कृत कोमलता प्रकाश के एक पुंज के समान है, जो हमें उनके प्रकृति संबंधी विचारों की गहन और अत्यधिक यथार्थ सत्यता से बचाती है. लिवी का काव्य सहजता से भरपूर है.
फिर भी, होरेस39a, कैटलस40, ओविड41 और वर्जिल42 के युग के अन्य महान लेखक प्रायः मनुष्य और प्रकृति को यूनान के दर्पण से ही देखते रहे. रोम की संस्थाएँ और उसका धर्म भी यूनान की तुलना में कम काव्यात्मक थे, जैसे कि परछाईं ठोस वस्तु की तुलना में कम सजीव होती है. इस कारण रोम में काव्य, राजनीतिक और घरेलू समाज की पूर्णता के साथ-साथ विकसित होने के बजाय उसके पीछे- पीछे चलता प्रतीत होता है.
रोम की सच्ची कविता उसकी संस्थाओं में जीवित थी; क्योंकि इनमें जो भी सुंदर, सत्य और भव्य था, वह केवल उसी शक्ति से उत्पन्न हो सकता था जिसने उस व्यवस्था की रचना की, जिसमें वे समाहित थे. कामिलस43 का जीवन, रेगुलस44 की मृत्यु, देवतुल्य स्थिति में रोमन सीनेट का विजयी गॉल शासकों का सामना करने का साहस, कैन्ने45 की लड़ाई के बाद हैनिबल46 के साथ संधि करने से गणराज्य का इनकार—ये घटनाएँ मात्र लाभ-हानि की विशुद्ध गणना से उपजी नहीं थीं, बल्कि ये वे अविस्मरणीय नाटक थे जिनमें कवि और अभिनेता दोनों एक ही थे.
कल्पना ने इस व्यवस्था की सुंदरता को देखा और इसे अपनी ही अवधारणा के अनुसार रचा; परिणामस्वरूप रोम को साम्राज्य प्राप्त हुआ और चिरस्थायी यश मिला. ये घटनाएँ इसलिए कम काव्यात्मक नहीं हो जातीं क्योंकि उन्हें किसी पवित्र कवि ने वर्णित नहीं किया. ये वे प्रकरण हैं जो समय द्वारा मानव स्मृतियों पर लिखे गए एक महाकाव्य के अंश हैं. अतीत, जैसे कोई प्रेरित गायक, अनंत पीढ़ियों के रंगमंच को अपने मधुर स्वर से भर देता है.
आखिरकार, प्राचीन धर्म और आचार-व्यवस्था की प्रणाली अपने चक्र को पूरा कर चुकी थी. संसार पूरी तरह अराजकता और अंधकार में डूब सकता था, यदि ईसाई और शौर्यशील (शिवैलरिक) व्यवस्था के रचनाकारों में कुछ ऐसे कवि न होते, जिन्होंने पहले कभी न सोची गई विचारधाराओं और क्रियाओं के रूप गढ़े. ये विचार जब मनुष्यों की कल्पना में समाए तो उनकी भटकी हुई सोच के लिए मार्गदर्शक सेनापति बन गए. इन व्यवस्थाओं से उत्पन्न बुराइयों पर चर्चा करना यहाँ हमारा उद्देश्य नहीं है. लेकिन हम यह ज़रूर कहते हैं कि पहले से स्थापित सिद्धांतों के आधार पर इनमें जो भी बुराई थी, उसका कारण इनकी कविता को नहीं ठहराया जा सकता.
यह संभव है कि मूसा47, अयूब48, डेविड49, सोलोमन50 और इशायाह51 की कविता ने यीशु और उनके शिष्यों के मन पर गहरा प्रभाव डाला हो. इस अद्भुत व्यक्तित्व के जीवनीकारों द्वारा संरक्षित बिखरे हुए अंश अत्यंत जीवंत कविता से भरे हुए हैं. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उनके सिद्धांतों को शीघ्र ही विकृत कर दिया गया.
जब उनके प्रचारित विचारों पर आधारित मतों की एक प्रणाली स्थापित हो गई, तो एक निश्चित समय के बाद प्लेटो द्वारा मन की क्षमताओं के लिए निर्धारित तीन रूपों को एक तरह की दिव्यता प्राप्त हो गई और वे सभ्य संसार की पूजा के विषय बन गए. यहाँ हमें स्वीकार करना होगा कि
“प्रकाश जैसे गहराने लगता है,”
“कौवा चट्टानी जंगल की ओर उड़ने लगता है,
दिन की शुभ चीजें मुरझाने और सोने लगती हैं,
और रात के काले जासूस अपने शिकार के लिए जाग उठते हैं.”
लेकिन देखो, इस भीषण अराजकता की धूल और रक्त से कितनी सुंदर व्यवस्था जन्मी है! देखो, संसार मानो पुनरुत्थान से उठकर, ज्ञान और आशा के सुनहरे पंखों पर संतुलन साधते हुए, समय के आकाश में अपनी अनथक उड़ान फिर से भर रहा है. उस संगीत को सुनो, जिसे बाहरी कान नहीं सुन सकते—जो निरंतर और अदृश्य हवा की तरह है, जो इस अनंत यात्रा को शक्ति और गति से पोषित कर रहा है.
यीशु मसीह के उपदेशों की कविता और रोमन साम्राज्य पर विजय पाने वाले सेल्टिक52 विजेताओं की पौराणिक कथाएँ और संस्थाएँ उन अंधकारमय और अशांत समयों से भी बची रहीं, जिनमें वे विकसित हुई थीं. ये दोनों तत्व मिलकर एक नई संस्कृति और विचारधारा का आधार बने. यह सोचना गलत होगा कि अंधकार युग की अज्ञानता का कारण ईसाई सिद्धांत या सेल्टिक राष्ट्रों का प्रभुत्व था. यदि उस समय कोई बुराई थी, तो वह काव्यात्मक भावना के लोप से उत्पन्न हुई थी, जो निरंकुशता और अंधविश्वास के बढ़ने के साथ जुड़ी थी.
समाज में लोग इतने जटिल कारणों से प्रभावित थे कि वे संवेदनहीन और स्वार्थी बन गए. उनकी अपनी इच्छा कमजोर पड़ चुकी थी, फिर भी वे उसी के दास थे—और इसी कारण वे दूसरों की इच्छाओं के भी गुलाम बन गए. वासना, भय, लोभ, क्रूरता और छल उस समाज की विशेषताएँ बन गई थीं, जहाँ कोई भी व्यक्ति न तो कला, न भाषा, न ही संस्थाओं के माध्यम से कुछ नया सृजन कर सकता था.
ऐसे समाज में मौजूद नैतिक विसंगतियों (अनैतिकताओं) के लिए उन घटनाओं को दोष देना उचित नहीं है, जो उनसे सीधे जुड़ी थीं. बल्कि वे घटनाएँ अधिक प्रशंसा के योग्य हैं, जो इस स्थिति को शीघ्रता से समाप्त कर सकती थीं. दुर्भाग्यवश, जो लोग विचारों से शब्दों का अंतर नहीं कर पाते, वे इस सच्चाई को नहीं समझ सकते कि इन सामाजिक विसंगतियों में से कई हमारे लोकप्रिय धर्मों का हिस्सा बन चुकी हैं.
ईसाई और शूरवीरता की कविता का प्रभाव ग्यारहवीं शताब्दी तक स्पष्ट रूप से दिखाई देना शुरू नहीं हुआ था.
प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में समानता के सिद्धांत को खोजा और इसे इस रूप में प्रस्तुत किया कि मानव श्रम और कौशल से उत्पन्न सुख और शक्ति के साधनों का वितरण समाज में किस प्रकार किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस सिद्धांत की सीमाएँ केवल प्रत्येक व्यक्ति की भावना अर्थात् पूरे समाज के हित के आधार पर तय की जानी चाहिए.
प्लेटो, टिमेयस53 और पायथागोरस54 के विचारों का अनुसरण करते हुए, नैतिक और बौद्धिक सिद्धांतों की एक ऐसी प्रणाली प्रस्तुत करते हैं, जो मनुष्य के भूत, वर्तमान और भविष्य की स्थिति को समाहित करते हैं. यीशु मसीह ने इन विचारों में निहित पवित्र और शाश्वत सत्यों को संसार के सामने प्रकट किया, और ईसाई धर्म अपनी शुद्धतम अवस्था में प्राचीन कविता और ज्ञान के गूढ़ सिद्धांतों का बाहरी रूप बन गया.
जब सेल्टिक राष्ट्रों का विलय दक्षिण की कमज़ोर होती जनसंख्या के साथ हुआ, तो उनकी पौराणिक कथाओं और संस्थाओं में मौजूद काव्यात्मक तत्व ईसाई संस्कृति में समाहित हो गए. इसका परिणाम विभिन्न कारणों की क्रिया-प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया. इसे एक सिद्धांत के रूप में माना जा सकता है कि कोई भी राष्ट्र या धर्म किसी अन्य को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता, बल्कि वह जिस प्रणाली को प्रतिस्थापित करता है, उसमें से कुछ तत्व अपने भीतर समाहित कर लेता है. इसी प्रक्रिया का प्रभाव यह हुआ कि व्यक्तिगत और घरेलू दास-प्रथा समाप्त होने लगी, और महिलाओं को प्राचीन समाज में लगे कई अपमानजनक बंधनों से मुक्ति मिलने लगी.

6.
व्यक्तिगत दासता का उन्मूलन मानवीय कल्पना की सर्वोच्च राजनीतिक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति है. महिलाओं को मिली स्वतंत्रता ने कमनीय प्रेम के काव्य को गढ़ने का अवसर दिया. प्रेम स्वयं एक धर्म बन गया, जिसके आराध्य हमेशा सजीव थे. ऐसा लगा मानो अपोलो और म्यूज़ (कला और ज्ञान की देवियां) की मूर्तियों को जीवन और गति मिल गई हो, और वे अपने उपासकों के बीच विचरण करने लगी हों; जिससे यह धरती एक अलौकिक संसार के निवासियों से आच्छादित हो गई.
जीवन की साधारण घटनाएँ चमत्कारी और अलौकिक बन गईं जैसे ईडन (Eden) के भग्नावशेषों से एक नया स्वर्ग निर्मित हो गया हो. और चूंकि यह सृजन स्वयं काव्य है, तो इसके रचनाकार भी कवि ही थे, और भाषा उनकी कला का माध्यम थी— “Galeotto fù il libro, e chi lo scrisse” (वह पुस्तक ही हमारी दूत बनी, और जिसने उसे लिखा वह भी- दांते की इनफर्नो की काव्य पंक्ति). प्रोवेंस (Provencal) के गायक-कवि (trouveurs) पेट्रार्क55 से पहले आए, जिनकी कविताएँ किसी जादुई मंत्र की तरह प्रेम के दुख में छिपे आनंद के अजस्र-स्रोतों को खोल देती हैं.
इन्हें महसूस किए बिना उस सौंदर्य का हिस्सा बनना असंभव है, जिससे हम साक्षात् होते हैं. यह बताने की आवश्यकता नहीं कि इन पवित्र भावनाओं से उत्पन्न कोमलता और मानसिक ऊंचाई मनुष्यों को अधिक प्रिय, उदार, और बुद्धिवान बनाती है, और उन्हें क्षुद्र आत्म-चेतना से बाहर निकालकर व्यापक चेतना से जोड़ती है.
दान्ते ने प्रेम के रहस्यों को पेट्रार्क से भी अधिक गहराई से समझा. उनकी वीता नुओवा56 (Vita Nuova) भावना और भाषा की शुद्धता का एक असीम स्रोत है—यह उस कालखंड की आदर्शीकृत कथा है, जब दांते का जीवन प्रेम को समर्पित था. स्वर्ग में बियाट्रिस57 (Beatrice) का महिमामंडन और अपने प्रेम तथा अपनी प्रेमिका के मंत्रमुग्ध कर देने वाले सौंदर्य का क्रमश: बढ़ता हुआ चित्रण, जिसके माध्यम से वे स्वयं को परम-सत्ता के सिंहासन के स्तर तक पहुंचता हुआ दर्शाते हैं, आधुनिक काव्य की सबसे महत् कल्पना है.
सूक्ष्मतम विचारकों ने जनसामान्य की धारणा को उचित रूप से उलटते हुए डिवाइन कॉमेडी के तीन प्रमुख खंड—नरक, पर्गेटरी (शुद्धिकरण), और स्वर्ग—की उत्कृष्टता को अलग दृष्टि से परखा है. इनमें स्वर्ग व शाश्वत प्रेम का अनवरत गान है. प्रेम, जिसे प्राचीन दार्शनिकों में केवल प्लेटो कवि के रूप में साध पाये थे, नये युग के महानतम लेखकों द्वारा महिमा-मंडित हुआ. इसके मधुर स्वर समाज की अतल गहराइयों तक पहुँचे और आज भी युद्ध तथा अंधविश्वास की कर्कशता को दबा देते हैं.
समय-समय पर एरियोस्तो, टैसो, शेक्सपीयर, स्पेंसर, काल्डेरोन, रूसो58, और हमारे युग के महान लेखकों ने प्रेम के गौरव का गुणगान किया है, और इसे मानवीय चेतना में पदक की तरह स्थापित करते हुए भौतिकता और ताकत पर विजय का सबसे ऊँचा प्रतीक बना दिया है.
मानव जगत जिन दो बड़े हिस्सों में बँटा है- पुरुष और स्त्री, उनके मध्य संबंधों को पहले की तुलना में अब कम ग़लत समझा जाता है. और यदि आधुनिक यूरोप की विचारधारा व संस्थाओं में इस भ्रम को आंशिक रूप से ही सही, किंतु स्वीकार किया गया है कि विविधता और असमानता एक ही चीज़ नहीं हैं, तो इस महान उपलब्धि का श्रेय उसको जाता है, जिसके लिए शूरवीरता कानून थी और जिसके भविष्यवक्ता थे कवि.
दान्ते की कविता को समय की धारा पर बना वह सेतु कहा जा सकता है, जो प्राचीन और आधुनिक विश्व को जोड़ता है. दान्ते और उनके प्रतिद्वंद्वी मिल्टन ने जिन अदृश्य तत्वों की विकृत अवधारणाओं को कल्पनात्मक रूप दिया है, वे केवल एक आवरण हैं, जिनमें लिपटे ये महान कवि अनंत काल तक विचरण करते हैं. यह एक जटिल प्रश्न है कि वे अपने व्यक्तिगत विश्वासों और जन-सामान्य की आस्थाओं के बीच मौजूद अंतर को कितनी स्पष्टता से अनुभव करते थे. कम से कम दान्ते तो इस भेद को उजागर करने की इच्छा रखते प्रतीत होते हैं, जब वे वर्जिल द्वारा “न्याय-प्रियतम” कहे गए रिपेयस59 (Rhipaeus) को स्वर्ग में स्थान देते हैं और अपने पुरस्कारों व दंडों के वितरण में एक असाधारण एवं उच्छृंखल स्वतंत्रता का परिचय देते हैं.
मिल्टन की कविता अपने ही भीतर उस विचारधारा का दार्शनिक खंडन समेटे हुए है, जो विडंबना और विरोधाभास के एक अद्भुत संयोग से, जनमानस में उसकी सबसे सशक्त आधारशिला बन गई है. पैराडाइज़ लॉस्ट में शैतान के चरित्र की जिस ऊर्जा और विराटता को दर्शाया गया है, उसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती. यह मानना एक भारी भूल होगी कि मिल्टन ने शैतान को केवल बुराई का एक लोक-प्रचलित प्रतीक बनाने का उद्देश्य रखा होगा.
अदम्य घृणा, धूर्तता से रची गई योजनाएँ, और अपने शत्रु को चरम पीड़ा देने के लिए रची गईं निर्मम और कुटिल चालें—ये सभी निस्संदेह बुराई के तत्व हैं. यदि कोई पराधीन व्यक्ति इन्हें अपनाए तो यह किसी सीमा तक क्षम्य हो सकता है, लेकिन यदि यही प्रवृत्ति किसी अत्याचारी में दिखे, तो वह घृणित बन जाती है. यदि कोई पराजित योद्धा अपनी हार को गरिमा प्रदान करने वाले गुणों से विभूषित हो तो भी वही आचरण किसी विजेता द्वारा अपनाया जाए तो उसकी विजय को कलंकित कर देता है.
नैतिक दृष्टि से देखा जाए तो मिल्टन का शैतान उनके ईश्वर से कहीं अधिक महान प्रतीत होता है. क्योंकि जो व्यक्ति विपत्तियों और असहनीय यातनाओं के बावजूद अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है, वह उस सत्ता से कहीं अधिक श्रेष्ठ कहलाएगा जो अपनी निर्विवाद विजय के ठंडे अहंकार में डूबी प्रतिशोध की सबसे क्रूरतम अग्नि में अपने शत्रु को जलाने के लिए तत्पर रहती है. और यह प्रतिशोध भी किसी सुधार या पश्चाताप की भावना से प्रेरित नहीं होता बल्कि केवल इसलिए दिया जाता है कि शत्रु और अधिक यातनाएँ सहने योग्य बन जाए.
मिल्टन ने प्रचलित धार्मिक विश्वास की सीमाओं को इस हद तक चुनौती दी है (यदि इसे वास्तव में उल्लंघन माना जाए) कि उन्होंने अपने ईश्वर को नैतिक गुणों में शैतान से किसी भी प्रकार श्रेष्ठ नहीं ठहराया. नैतिक उद्देश्यों की इस स्पष्ट उपेक्षा को मिल्टन की विलक्षण प्रतिभा का सबसे सशक्त प्रमाण माना जा सकता है. उन्होंने मानो मानव स्वभाव के समस्त रंगों को एक ही पट्टिका पर मिला दिया और अपने महाकाव्यात्मक चित्र की रचना उस शाश्वत सत्य के नियमों के आधार पर की जो बाहरी संसार की घटनाओं और बुद्धिमान व नैतिक प्राणियों के कार्यों को इस तरह प्रस्तुत करता है जिससे कि वे आने वाली पीढ़ियों की आत्मा को झकझोर सकें.
डिवाइना कॉमेडिया और पैराडाइज़ लॉस्ट ने आधुनिक पौराणिक कथाओं को एक संगठित और स्थायी रूप दिया है. और जब परिवर्तन और समय की धारा पुरानी आस्थाओं के खंडहरों पर एक नई रूढ़ि का निर्माण कर देगी, तब विद्वान व्याख्याकार बीते यूरोपीय धर्म की गूढ़ व्याख्या में रत होंगे—वह धर्म, जो पूर्णत: विस्मृत नहीं होगा, क्योंकि उस पर एक अमर प्रतिभा की अमिट छाप अंकित होगी.
होमर पहले महाकवि थे, और दांते दूसरे. अर्थात्, दांते दूसरे ऐसे कवि थे जिनकी रचनाओं की श्रृंखला उनके युग के ज्ञान, भावनाओं और धार्मिक धारणाओं से स्पष्ट और बौद्धिक रूप से जुड़ी हुई थी. उनकी कविताएँ न केवल उनके समय की आत्मा को अभिव्यक्त करती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के विचारों और मान्यताओं के विकास के साथ-साथ स्वयं भी विकसित होती चलीं गईं.
लुक्रेटियस ने अपने प्रखर और गंभीर विचारों को भौतिक संसार की सीमाओं में बाँध दिया था, और वर्जिल ने अपनी असाधारण प्रतिभा के बावजूद ख़ुद को सिर्फ एक अनुकरण-कर्त्ता के रूप में प्रस्तुत किया—हालाँकि वे जिस भी चीज़ की नकल करते, उसे नए रूप में गढ़ते थे. लेकिन उनके बाद आने वाले कई कवि, जैसे अपोलोनियस रोडियस60, क्विंटस कैलाबेर61, नोनस62, लूकेन63, स्टेटियस64 और क्लॉडियन65 भले ही मधुर स्वर में गाते रहे, लेकिन उनमें से कोई भी सच्चे महाकाव्य की आत्मा को पूरी तरह पकड़ नहीं पाया. मिल्टन को तीसरा सच्चा महाकाव्य कवि कहा जा सकता है. क्योंकि यदि ऐनीड66 को महाकाव्य के सबसे ऊँचे स्तर पर नहीं रखा जा सकता तो ऑरलैंडो फ्यूरिओसो67, जेरूसलेम लिबेराटा68, लुज़िएड69, या फेयरी क्वीन70 को यह स्थान मिलना तो और भी कठिन है.
दांते और मिल्टन दोनों ही प्राचीन सभ्यताओं के धर्म से गहराई तक प्रभावित थे, और उनकी कविताओं में उस धर्म की आत्मा उसी अनुपात में मौजूद है, जैसे उसकी परंपराएँ आधुनिक यूरोप के अपरिवर्तित उपासना पद्धति में बची रही थीं. इनमें से एक सुधार आंदोलन (रिफ़ॉर्मेशन) से पहले आए और दूसरे उसके बाद लगभग समान अंतराल पर.
दांते को पहला धार्मिक सुधारक कहा जा सकता है, और लूथर71 (Luther) ने उनकी तुलना में अधिक कठोर और तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया, लेकिन पोप की सत्ता के दुरुपयोग की आलोचना करने में वे दांते से अधिक साहसी नहीं थे.
दांते ने पहली बार सोई हुई यूरोप की चेतना को जगाया. उन्होंने बिखरी हुई असंगत भाषाओं की अराजकता से एक ऐसी भाषा का सृजन किया जो स्वयं में संगीत और तर्क की शक्ति रखती थी. वे उन महान आत्माओं को एक मंच पर लाने वाले थे, जिन्होंने ज्ञान के पुनर्जागरण का नेतृत्व किया. वे उस चमकते नक्षत्रों के समूह के लूसिफर थे, जिसने तेरहवीं शताब्दी में गणराज्यीय इटली से प्रकाश फैलाया और अज्ञान के अंधकार को चीरते हुए पूरी दुनिया को जगाया.
दांते के शब्दों में जीवन स्वयं स्पंदित होता है; हर शब्द एक चिनगारी की तरह है, एक अमिट विचार का जलता हुआ कण. आज भी उनके कई विचार अपनी उत्पत्ति की राख में दबे हुए हैं, बिजली की तरह ऊर्जा से भरे हुए, बस एक सही माध्यम की प्रतीक्षा में.

7.
सभी महान कविताएँ अनंत होती हैं; वे उसी पहले बीज की तरह होती हैं, जिसमें संपूर्ण वृक्ष बनने की संभावना समाई होती है. अर्थ की परत-दर-परत हटती जाती है, लेकिन उसकी सबसे गहरी, विशुद्ध सुंदरता शायद कभी पूरी तरह प्रकट नहीं हो पाती.
एक महान कविता एक ऐसा झरना है, जो सदैव ज्ञान और आनंद के जल से भरपूर रहता है. हर युग और हर व्यक्ति अपनी दृष्टि और समय के अनुरूप उसमें से कुछ अमृत ग्रहण करता है और फिर अगली पीढ़ी आती है नए संदर्भों में उसे देखती है और हर बार उसमें एक नया, अप्रत्याशित आनंद पाती है.
दांते, पेट्रार्क और बोकेच्चियो72 के समय के बाद का युग चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला के पुनर्जागरण के लिए जाना जाता है. चॉसर ने इस पवित्र प्रेरणा को आत्मसात किया, और अंग्रेजी साहित्य की बुनियाद इतालवी रचनात्मकता की सामग्री पर रखी गई.
लेकिन हमें कविता की रक्षा करते-करते उसके आलोचनात्मक इतिहास और समाज पर पड़ रहे प्रभाव की गहन चर्चा में भटक नहीं जाना चाहिए. इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि अपने व्यापक और सच्चे अर्थ में कवियों का प्रभाव न केवल उनके समकाल पर, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और युगों पर भी पड़ता है.
कवियों को एक अन्य आधार पर तर्कवादियों और यंत्र-वादियों के लिए अपनी नागरिक प्रतिष्ठा छोड़ने की चुनौती दी गई है. यह माना जाता है कि कल्पना का अभ्यास सबसे आनंददायक होता है, लेकिन दावा यह किया जाता है कि तर्क का अभ्यास अधिक उपयोगी होता है. आइए, इस भेद के आधारों की जांच करें और समझें कि यहाँ उपयोगिता से क्या तात्पर्य है.
व्यापक अर्थ में, सुख या कल्याण वह है जिसकी खोज एक संवेदनशील और बुद्धिमान प्राणी का चेतन मन करता है और जिसे पाने पर वह संतोष अनुभव करता है. सुख के दो प्रकार होते हैं—एक जो स्थायी, सार्वभौमिक और टिकाऊ होता है, और दूसरा जो क्षणिक और सीमित होता है. उपयोगिता का अर्थ या तो पहले प्रकार के सुख को उत्पन्न करने वाले साधनों से हो सकता है या दूसरे प्रकार के. यदि पहले अर्थ में देखें, तो जो भी हमारी भावनाओं को दृढ़ता और शुद्धता प्रदान करता है, कल्पना का विस्तार करता है और हमारी चेतना को अधिक सजीव एवं प्रेरणादायक बनाता है, वही वास्तव में उपयोगी है.
लेकिन उपयोगिता शब्द को एक संकीर्ण अर्थ में भी देखा जा सकता है, जहाँ इसका आशय केवल उन चीज़ों से होगा जो हमारी मूलभूत शारीरिक आवश्यकताओं की माँग को पूरा करें, समाज में जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करती हों, अंधविश्वासों के गहरे भ्रमों को दूर करती हों और लोगों के बीच बस इतनी आपसी सहृदयता स्थापित कर सकें कि वह व्यक्तिगत स्वार्थ और सामाजिक सामंजस्य के बीच संतुलन बनाए रख सके.
निस्संदेह, इस सीमित अर्थ में उपयोगिता को बढ़ावा देने वालों की समाज में अपनी एक विशिष्ट भूमिका होती है. वे कवियों के पद-चिह्नों पर चलते हैं और उनकी कल्पनाओं की रूपरेखाओं को साधारण जीवन की पुस्तक में उतारते हैं. वे स्थानों को जन्म देते हैं और समय को आत्मा प्रदान करते हैं. जब तक वे हमारे स्वभाव की निम्न शक्तियों के प्रबंधन को उसकी उच्च शक्तियों की मर्यादा के भीतर बाँध कर रख पाते हैं, तब तक उनके प्रयास अत्यंत मूल्यवान होते हैं.
जब तर्क-शास्त्री भोंड़े अंधविश्वासों का विनाश करने निकलें तो उन्हें उन शाश्वत सत्यों को विकृत करने से बचना चाहिए जो मनुष्य के भाव-संसार में अधिक गहराई से अंकित हैं. कुछ फ्रांसीसी लेखकों ने यह ग़लती की है. इसी तरह, जब यंत्र विशेषज्ञ जीवन को सुविधाजनक बनाने और अर्थशास्त्री श्रम को संगठित करने का प्रयास करें तो उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी अवधारणाएँ भाव-जगत से जुड़े मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप हों. ऐसा न होने पर वे आधुनिक इंग्लैंड की तरह विलासिता और दरिद्रता—दोनों की चरम सीमाओं को और अधिक भड़काने-बढ़ाने का कारण बन सकते हैं.
उन्होंने उस कहावत को साकार कर दिया है— “जिसके पास है, उसे और मिलेगा; और जिसके पास नहीं है, उससे उसका बचा हुआ भी छीन लिया जाएगा.” परिणामस्वरूप, अमीर और अधिक संपन्न होते गए जबकि गरीब और अधिक विपन्न. राज्य रूपी जहाज अराजकता और तानाशाही की भयावह लहरों के बीच हिचकोले खा रहा है. यह वही अपरिहार्य स्थिति है जो तब उत्पन्न होती है जब तर्क और गणना की शक्ति को बिना संतुलन के, बिना संवेदनशीलता के, निर्बाध लागू किया जाता है.
आनंद को उसके महत्तम अर्थ में परिभाषित करना कठिन है क्योंकि यह व्याख्या कई विरोधाभासों से भरी है. मानव स्वभाव की बनक में एक विचित्र कमी यह है कि उसके अस्तित्व के उच्चतम उल्लास कई बार निम्नतर अनुभूतियों के दुःख-दर्दों से जुड़े होते हैं. दुःख, भय, पीड़ा और यहाँ तक कि निराशा भी अक्सर उस परम कल्याण तक पहुँचने के माध्यम बन जाते हैं.
दुखांत साहित्य में हमारी संवेदना इसी सिद्धांत पर आधारित होती है— त्रासदी हमें आनंद इसलिए देती है क्योंकि यह उस सुख की हल्की झलक दिखाती है, जो स्वयं पीड़ा में समाहित होता है. यही कारण है कि सबसे मधुर संगीत में भी एक अनिवार्य विषाद झलकता है. दुःख में जो आनंद छिपा होता है वह साधारण आनंद से अधिक गहरा और मधुर होता है.
इसीलिए कहा गया है कि हर्षोल्लास के घर जाने के स्थान पर शोक-संतप्त घर जाना अधिक श्रेष्ठ है. हालाँकि, इसका यह अर्थ नहीं कि उच्चतम आनंद अनिवार्य रूप से पीड़ा से जुड़ा ही होता है. प्रेम और मित्रता का सुख, प्रकृति की सौंदर्य-भावना से उपजा आह्लाद, तथा काव्य की अनुभूति और उससे भी अधिक कविता रचने का सुख—ये सभी प्रायः पूर्ण रूप से निष्पाप और शुद्ध आनंद होते हैं.
इस उच्चतम आनंद का सृजन और उसका संरक्षण ही सच्चे और महत्तम अर्थ में उपयोगिता है. जो लोग इस आनंद की रचना और रक्षा करते हैं, वे ही सच्चे कवि या काव्य-दार्शनिक कहलाते हैं.
लॉक73, ह्यूम74, गिबन75, वॉल्टेयर76, रूसो और उनके शिष्यों ने शोषित और भ्रमित मानवता के पक्ष में जो प्रयास किए, उसके लिए वे निस्संदेह संपूर्ण मानव जाति की कृतज्ञता के पात्र हैं. फिर भी, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि यदि वे कभी हुए ही न होते, तो दुनिया के नैतिक और बौद्धिक विकास पर कितना प्रभाव पड़ता. संभवतः एक-दो शताब्दियों तक थोड़ी और मूर्खतापूर्ण बातें की जातीं, और शायद कुछ अधिक पुरुष, महिलाएँ और बच्चे विधर्मी करार देकर जीवित जला दिए जाते.
संभवतः आज हम स्पेन में इनक्विज़िशन77 (धार्मिक उत्पीड़न) की समाप्ति पर एक-दूसरे को बधाई नहीं दे रहे होते.
परंतु यह कल्पना से परे है कि यदि दांते, पेट्रार्क, बोकाचियो, चॉसर78, शेक्सपियर, काल्डेरॉन, लॉर्ड बेकन और मिल्टन का अस्तित्व ही न होता, यदि राफेल79 और माइकल एंजेलो80 जन्म ही न लेते, यदि हिब्रू काव्य का अनुवाद कभी न हुआ होता और यदि ग्रीक साहित्य के अध्ययन में रुचि फिर से बढ़ी न होती तो संसार की नैतिक स्थिति क्या रूप लेती. ऐसी स्थिति की कल्पना करना भी असंभव है.
यदि प्राचीन मूर्तिकला की अनुपम कृतियाँ हम तक न पहुँची होतीं और यदि प्राचीन सभ्यता के धर्म से जुड़ी काव्यात्मक संवेदना उसके विश्वास के साथ ही विलुप्त हो गई होती, तो मानव बुद्धि कभी भी इन प्रेरणाओं के बिना जाग्रत ही न हो पाती. तब न तो भौतिक विज्ञानों के आविष्कार संभव होते, न ही समाज की विकृतियों पर विश्लेषणात्मक तर्क-प्रणाली लागू करने की वह क्षमता विकसित हो पाती, जिसे आज सृजनात्मकता और कल्पनाशील प्रतिभा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति से भी अधिक महत्त्व देने का प्रयास किया जा रहा है.
हमारे पास नैतिकता, राजनीति और इतिहास के जिस स्तर का ज्ञान है, उसे व्यावहारिक रूप देने की क्षमता उतनी नहीं है. विज्ञान और अर्थशास्त्र की हमारी समझ उस ज़रूरत से बहुत आगे बढ़ चुकी है जो इन संसाधनों के न्याय-संगत वितरण के लिए चाहिए. इन विचार प्रणालियों में निहित सौंदर्य और गहराई आँकड़ों के बोझ और गणनाओं की जटिलता में कहीं खो जाती है. नैतिकता, शासन और राजनीतिक-अर्थनीति में ज्ञान की कमी नहीं है—या कम से कम, जो वर्तमान में प्रचलित है और जिसे लोग बर्दास्त कर रहे हैं, उससे कहीं अधिक बेहतर और बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प मौजूद हैं.
लेकिन हम कहावत वाली बेचारी बिल्ली की तरह “मैं हिम्मत नहीं कर सकती, जबकि मैं करना चाहती हूँ” की स्थिति में फंसे रहते हैं. हम जो जानते हैं उसकी कल्पना करने की रचनात्मक क्षमता चाहते हैं; हम जिसकी कल्पना करते हैं उसे करने के लिए उदार आवेग चाहते हैं;- हम जीवन की कविता चाहते हैं. हमारी गणनाएँ हमारी संकल्पना से आगे निकल चुकी हैं; हमने जितना ग्रहण किया है, उसे सही से आत्मसात नहीं कर पाए. इन ज्ञान-संकायों ने मनुष्य के बाहरी संसार पर उसके अधिकार का जितना अधिक विस्तार किया है, काव्यात्मक क्षमता के अभाव में आंतरिक संसार को उसी अनुपात में सीमित भी कर दिया है. और इस तरह, प्रकृति के तत्त्वों को अपना दास बना लेने के बावज़ूद, मनुष्य स्वयं दास ही बना रह जाता है.
क्या यह सही नहीं है कि इंसान की रचनात्मक क्षमता, जो हर ज्ञान की बुनियाद है, कम होती गई जबकि यांत्रिक कौशल का ज़रूरत से अधिक विकास हुआ? और क्या इसी असंतुलन के चलते नई खोजों का इस्तेमाल श्रम को आसान बनाने के बजाय उसे और जटिल करने और समाज में असमानता बढ़ाने के लिए नहीं किया गया? किस वज़ह से यह हुआ कि जिन आविष्कारों को इंसान के बोझ को हल्का करना चाहिए था, वे उल्टा आदम पर लगे श्राप का भार और बढ़ाने लगे? इस दुनिया में कविता एक ओर है, और दूसरी ओर है स्वार्थ, जिसका प्रकट रूप है धन—जो आज के युग का सच्चा देवता बन बैठा है.
काव्यात्मक क्षमता के दो प्रमुख काम होते हैं. पहली, यह ज्ञान, शक्ति और आनंद के अभिनव स्रोतों का सृजन करती है. दूसरी, यह मस्तिष्क में उन्हें फिर से रचने और एक सुंदर लय और सामंजस्य-पूर्ण क्रम में ढालने की प्रेरणा जगाती है, जिसे हम सौंदर्य और सद्गुण कह सकते हैं.
8.
कविता का विकास कभी भी उस समय से अधिक वाँछनीय नहीं होता है जब समाज की सोच हद से ज़्यादा स्वार्थी और मतलबी हो गई हो. ऐसे समय में बाहरी जीवन के संसाधन इतनी तेजी से इकट्ठा होने लगते हैं कि मानव स्वभाव के आंतरिक नियमों के अनुसार उन्हें आत्मसात् करने की क्षमता कम पड़ जाती है. तब स्थिति ऐसी हो जाती है जैसे शरीर अपनी आत्मा की तुलना में बेडौल और असंतुलित हो गया हो.
वास्तव में, कविता एक अलौकिक प्रकाश है. यह ज्ञान का केंद्र भी है और उसकी परिधि भी. यह सभी विज्ञानों के सत्व को समझती है, और सभी विज्ञानों को चाहिए भी कि वे कविता को ही अपना मानदंड बनाएँ. यह हर चिंतन प्रणाली की जड़ भी है और उसका पूर्ण विकसित स्वरूप भी. यही वह स्रोत है, जहां से समस्त चिंतन प्रवाहित होता है, और वही है जो उन्हें सुंदरता प्रदान करता है. यदि कविता मुरझा जाए, तो न फल शेष रहता है, न बीज, और तब यह निर्जीव संसार उस पोषण से वंचित रह जाता है, जो जीवन के वृक्ष की नई शाखाओं के पनपने के लिए आवश्यक होता है.
यह सृष्टि की पूर्णता और सौंदर्य की परम अभिव्यक्ति है, जैसे गुलाब के फूल की महक और रंग का उन तत्त्वों से संबंध जिनसे वह बना, जैसे अविनाशी सुंदरता का स्वरूप और दीप्ति उस जटिल संरचना के रहस्यों से परे होती है, जो जन्म और विनाश के बीच स्पंदित होती है. यदि कविता न होती, तो सद्गुण, प्रेम, देशभक्ति और मित्रता का क्या अर्थ रह जाता? यह अद्भुत ब्रह्मांड, जिसमें हम रहते हैं, उसका सौंदर्य किस स्वरूप में प्रकट होता? जीवन की कठिनाइयों में सांत्वना कहाँ मिलती और मृत्यु के पार की हमारी आकांक्षाएँ कहाँ जातीं? यदि कविता उन शाश्वत लोकों से प्रकाश और दिव्य अग्नि न लाती, जहाँ तर्क और गणना की सीमित बुद्धि कभी पहुँचने का साहस ही नहीं कर सकती!
कविता तर्क की तरह नहीं होती है जिसका मनचाहा इस्तेमाल किया जा सके. कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता, “अब मैं कविता रचूँगा.” यहाँ तक कि सबसे महान कवि भी ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि सृजन का क्षण पूर्णतः मस्तिष्क पर निर्भर नहीं होता. यह किसी बुझते हुए अंगारे की तरह होता है, जिसे कोई अदृश्य शक्ति—एक अनियमित हवा की तरह—क्षण भर के लिए प्रज्ज्वलित कर देती है. यह प्रेरणा भीतर से जन्म लेती है, जैसे किसी फूल का रंग धीरे-धीरे खिलता है और फिर मुरझाने लगता है. हमारी चेतना न तो इसकी पूर्व-सूचना दे पाती है और न ही इसके विलीन होने का आभास कर पाती है.
यदि यह प्रेरणा अपनी मूल शुद्धता और ऊर्जा में स्थायी रह पाती, तो उसकी महानता की कोई सीमा नहीं होती. लेकिन रचना प्रक्रिया शुरू होते ही, प्रेरणा क्षीण होने लगती है. संसार को मिली अब तक की सबसे अद्भुत कविताएँ संभवतः उन मूल भावनाओं और विचारों की मात्र एक धुंधली छाया भर ही हैं, जो कवि के मन में मूलत: उपजीं थीं.
मैं आज के महानतम कवियों से यह पूछना चाहता हूँ—क्या यह सच है कि कविता के श्रेष्ठतम अंश अध्ययन और परिश्रम से जन्म लेते हैं?
आलोचकों द्वारा कवियों के लिए सुझाई गई मेहनत और विलंब का अर्थ बस इतना ही है कि कवि को अपनी प्रेरणा के क्षणों को सावधानी से देखना चाहिए और उनके बीच की खाली जगहों को प्रचलित अभिव्यक्तियों से भरना चाहिए. यह केवल इसलिए आवश्यक है क्योंकि काव्य प्रतिभा की अपनी सीमाएँ होती हैं. उदाहरण के लिए, मिल्टन ने पैराडाइज़ लॉस्ट की संपूर्ण रचना को पहले मन ही मन में गढ़ लिया था और फिर उसे अलग-अलग हिस्सों में लिखा. स्वयं मिल्टन ने यह कहा था कि उनकी कविता उन्हें “संगीत की तरह स्वतः प्रवाहित” होकर मिली थी, मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें यह रचना सुनाई हो.
जो लोग ऑरलैंडो फ्यूरियोसो81 की पहली पंक्ति के छप्पन अलग-अलग संस्करणों का हवाला देकर संशोधन को अनिवार्य मानते हैं, उनके लिए यही उत्तर पर्याप्त है. इस तरह की रचनाएँ कविता के लिए वही हैं, जो मोज़ेक कला चित्र-कला के लिए—एक कृत्रिम जोड़-तोड़, जिसमें स्वाभाविक प्रवाह का अभाव होता है. कवि की सहज अंतर्ज्ञान शक्ति ही यह स्वाभाविकता ला पाती है. यह प्रवृत्ति मूर्ति-कला और चित्र-कला में और भी स्पष्ट रूप से दिखती है. एक महान मूर्ति या चित्र कलाकार की सृजनात्मक ऊर्जा के अधीन उसी प्रकार आकार लेता है, जैसे माँ के गर्भ में एक शिशु धीरे-धीरे बढ़ता है. और वह चेतना, जो कलाकार के हाथों को दिशा देती है, स्वयं इस सृजन प्रक्रिया की उत्पत्ति, उसके क्रमिक विकास, उसकी रचना के विभिन्न चरणों तथा माध्यम को पूरी तरह समझाने में अक्षम होती है.
काव्य श्रेष्ठतम और परम आनंदित मनों के सर्वोत्तम और प्रसन्नतम क्षणों का अंकन है. हम सभी ने कभी न कभी उन क्षणभंगुर भावनाओं और विचारों की झलक पाई है, जो कभी किसी स्थान या व्यक्ति से जुड़ी होती हैं, तो कभी- कभी हमारे भीतर ही उमगती हैं. वे अप्रत्याशित रूप से हमारे भीतर जागृत होती हैं और बिना किसी चेतावनी के विलीन भी हो जाती हैं, लेकिन एक अनिवर्चनीय आनंद और भावोत्कर्ष का क्षण हमें देकर जाती हैं. यहाँ तक कि यह बीत जाने के बाद भी उन क्षणों की कसक महसूस होती है. वह सुखद कसक होती है, क्योंकि उसमें स्वयं उसी सौंदर्य का अंश समाया होता है. कविता हमारे भीतर विद्यमान किसी अलौकिक चेतना की अभिव्यक्ति सरीखी है. लेकिन इसके निशान समुद्र पर बहने वाली हवा की तरह होते हैं—जो लहरों की बेचैनी में उभरते हैं, शांत होते ही मिट जाते हैं, और उनकी केवल एक हल्की-सी छवि रेतीले किनारों पर शेष रह जाती है.
ऐसे अनुभव और ऐसी भावनाएँ वही लोग अनुभव कर पाते हैं जिनकी संवेदनाएँ सबसे नाज़ुक और कल्पनाएँ वृहत्तम होती हैं. इन स्थितियों से मन की एक ऐसी अवस्था बनती है जो हर नीच अभिलाषा के विरुद्ध होती है. सद्गुण, प्रेम, देशभक्ति और मित्रता का सच्चा भाव इन्हीं अनुभवों से जुड़ा होता है. जब तक ये भाव मन में रहते हैं, व्यक्ति खुद को पूरी सृष्टि के सामने बस एक छोटा-सा कण महसूस करता है. कवि-गण न केवल इन गहरे अनुभवों को महसूस करते हैं, बल्कि वे उनके माध्यम से दुनिया को भी वही एहसास दिलाते हैं, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें इन भावों को व्यक्त करने के लिए प्रेरित कर रही हो. उनके लिखे गए किसी शब्द, किसी दृश्य के छोटे से विवरण या किसी भावना की हल्की झलक से वह मोहक तार झनझना उठता है, जो लोगों के दिलों में सोई हुई, ठंडी पड़ चुकी या भुला दी गई पुरानी स्मृतियों को फिर से जगा देता है.
इस तरह कविता दुनिया की सबसे सुंदर और श्रेष्ठ चीज़ों को अमर बना देती है. यह जीवन के उन लम्हों को पकड़ लेती है, जो पल-भर में गायब हो सकते थे और उन्हें शब्दों या रूपों में ढालकर दुनिया तक पहुँचाती है. ये कविताएँ उन लोगों के दिलों तक खुशी का संदेश लाती हैं, जिनमें पहले से ही ऐसे भाव मौजूद होते हैं—रहते हैं, क्योंकि आत्मा के गहरे कोनों से उन्हें बाहर लाने का कोई सीधा तरीका नहीं होता. कविता इंसान के भीतर मौजूद दिव्यता के क्षण-भंगुर एहसासों को मिटने से बचाकर उन्हें हमेशा के लिए जीवित रखती है.
कविता हर चीज़ को मनमोहकता में बदल देती है. यह सबसे खूबसूरत चीज़ की सुंदरता को और ऊँचा उठाती है और जो सबसे विकृत है, उसमें भी सौंदर्य भर देती है. यह उल्लास और भय, दुःख और आनंद, शाश्वतता और बदलाव को एक साथ जोड़ देती है. यह अपने हल्के अनुशासन के अधीन सभी असंगत तत्त्वों को एकता में समाहित कर लेती है. यह हर उस चीज़ को बदल देती है, जिसे यह छूती है. इसकी रोशनी में जो भी आता है, वह इसकी भावना से भरकर एक नए रूप में ढल जाता है. इसकी अनोखी शक्ति मौत से जीवन की तरफ बढ़ रहे विष को भी अमृत में बदल देती है. यह संसार से कोरी अभ्यस्तता के आवरण को भेदकर उन रूपों के आत्म-स्वरूप नि:संग और सुप्त सौंदर्य को उजागर कर देती है.
हर चीज़ वैसी ही होती है, जैसी हम उसे ग्रहण करते हैं—कम से कम देखने वाले के नज़रिए से तो ऐसा ही होता है. “मन अपनी ही एक दुनिया है, जो खुद ही स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना सकता है.” लेकिन कविता इस बंधन को तोड़ देती है, जो हमें अपने आसपास की परिस्थितियों और प्रभावों का गुलाम बना देती है. चाहे वह अपने रंगों का बना एक नया परदा खींच दे या फिर जीवन के अंधकारमय आवरण को हटा दे, वह हमारे भीतर एक नई चेतना, एक नया अस्तित्व रचती है.
यह हमें एक ऐसी दुनिया का निवासी बना देती है, जहाँ हमारी जानी-पहचानी दुनिया बिखरी हुई और अराजक लगने लगती है. यह उसी ब्रह्मांड को हमारे सामने नए रूप में प्रकट करती है, जिसका हम हिस्सा हैं और जिसे हम अनुभव करते हैं. यह हमारी दृष्टि से आदत और परिचय की उस धुंध को हटा देती है, जो हमारे अपने अस्तित्व के चमत्कार को छिपा देती है. यह हमें केवल देखने ही नहीं, बल्कि गहराई से महसूस करने के लिए प्रेरित करती है और जो कुछ हम जानते हैं, उसे कल्पना के रंगों से जीवंत बना देती है.
यह ब्रह्मांड को नए सिरे से रचती है, जब दोहराए गए अनुभवों की आदत हमारे मन में इसकी चमक को धुँधला कर देती है. यह टैसो के साहसिक और सटीक शब्दों को सही साबित करती है—”सृष्टिकर्ता कहलाने का अधिकार केवल ईश्वर और कवि को है.”
एक कवि दूसरों को महत्तम ज्ञान, आनंद, नैतिकता और सम्मान की राह दिखाता है, इसलिए उसे ख़ुद भी सबसे सुखी, श्रेष्ठ, बुद्धिमान और सम्माननीय व्यक्ति होना चाहिए. जहाँ तक उसकी प्रसिद्धि की बात है, तो समय ही बताएगा कि क्या मानव समाज का मार्गदर्शन करने वाले अन्य व्यक्ति किसी कवि जितने महान हो सकते हैं.
एक कवि, सिर्फ अपने कवि होने के नाते सबसे बुद्धिमान, सबसे प्रफुल्लित और सबसे श्रेष्ठ होता है—इस बात में कोई संदेह नहीं. इतिहास के महानतम कवि वे रहे हैं जिनका चरित्र निष्कलंक रहा है, जिनकी बुद्धिमत्ता अद्वितीय रही है, और जिनका जीवन सौभाग्यशाली रहा है. यदि हम उनके जीवन को गहराई से देखें, तो पाएँगे कि वे सबसे सफल और भाग्यशाली लोगों में से एक थे. जहाँ तक अपवादों की बात है, तो वे इस नियम को तोड़ने के बजाय इसकी सीमा को स्पष्ट करते हैं, ख़ासकर जब वे उत्कृष्ट लेकिन पूर्णता से थोड़े कम कवि रहे हों.
9.
आइए, एक पल के लिए जनमत की अदालत में झुकते हैं और खुद ही अभियुक्त, गवाह, न्यायाधीश और दंड-दाता बनकर, बिना किसी सुनवाई या प्रमाण के, यह तय कर लेते हैं कि जो लोग वहाँ बैठे हैं, जहाँ तक हम पहुँचने की हिम्मत नहीं कर सकते, उनके इरादे निंदनीय हैं. मान लेते हैं कि होमर शराबी थे, वर्जिल चापलूस थे, होरेस कायर थे, टैसो पागल थे, लॉर्ड बेकन भ्रष्टाचारी थे, राफेल भोग-विलास में लिप्त थे, और स्पेंसर केवल एक दरबारी कवि थे.
हमारे विषय के इस भाग में जीवित कवियों का उल्लेख करना उचित नहीं होगा, लेकिन समय ने उन महान व्यक्तियों के साथ पूरा न्याय किया है. उनके दोषों को परखा गया और वे नगण्य साबित हुए. अगर उनके पाप कभी बड़े गहरे थे, तो अब वे समय-रूपी उद्धारकर्त्ता द्वारा धोकर निर्मल कर दिए गए हैं. देखिए कि कविता और कवियों के खिलाफ लगाए गए आरोप कितने बेतुके और उलझे हुए हैं, जहाँ सच और कल्पना आपस में गड्डमड्ड हो गए हैं. सोचिए, जो हमें दिखता है, वह हमेशा वैसा ही नहीं होता, और जो सच होता है, वह हर बार वैसा नहीं दिखता. इसलिए, दूसरों पर निर्णय देने से पहले अपने ही इरादों पर विचार करें, क्योंकि जैसे आप दूसरों को आँकेंगे, वैसे ही एक दिन आपको भी आँका जाएगा.
जैसा कि पहले कहा गया है, कविता इस मामले में तर्कशास्त्र से भिन्न है कि यह मन के सक्रिय नियंत्रण के अधीन नहीं है, और इसके जन्म व पुनरावृत्ति का कोई निश्चित संबंध हमारे चेतन मस्तिष्क या इच्छा से नहीं होता. यह मान लेना कि ये सभी मानसिक कार्य-व्यापार के लिए अनिवार्य शर्तें हैं, एक पूर्वधारणा होगी, क्योंकि कुछ मानसिक प्रभाव ऐसे भी होते हैं, जिन्हें इनसे नहीं जोड़ा जाना चाहिए.
काव्य-शक्ति की निरंतर उपस्थिति मन में ऐसी व्यवस्था और सामंजस्य की आदत बना सकती है, जो स्वयं उसकी प्रकृति और दूसरों के मन पर पड़ने वाले प्रभावों के अनुरूप हो.
जब कविता की प्रेरणा क्षण-भर के लिए रुकती है—चाहे ऐसा बार-बार हो लेकिन लंबे समय तक न रहे—तो कवि भी एक साधारण इंसान बन जाता है और उन भावनाओं के प्रवाह में बहने लगता है, जिनके बीच बाकी लोग सामान्य रूप से जीते हैं. लेकिन क्योंकि वह दूसरों की तुलना में उसका गठन अधिक नाज़ुक होता है और वह अपने साथ-साथ दूसरों के सुख-दुःख को भी अधिक गहराई से महसूस कर पाता है, इसलिए वह दुःख को कम करने और सुख को ढूँढ़ने में उसी अनुपात में अधिक तत्परता से लग जाएगा. और वह स्वयं को निंदा का पात्र बना लेता है जब वह यह पहचानने में चूक जाता है कि सुख और दुःख कभी-कभी एक-दूसरे का रूप लिए रहते हैं.
लेकिन इस ग़लती को अनिवार्यत: बुराई नहीं कहा जा सकता. यही कारण है कि क्रूरता, ईर्ष्या, बदले की भावना, लालच और अन्य बुरी प्रवृत्तियाँ कभी भी कवियों के जीवन से जोड़े जाने वाले सामान्य आरोपों में शामिल नहीं रहीं.
मुझे लगा कि सच्चाई के हित में यही उचित होगा कि मैं इन विचारों को उसी क्रम में प्रस्तुत करूँ, जिस क्रम में वे मेरे मन में इस विषय पर सोचते हुए आए, बजाय इसके कि मैं किसी औपचारिक तर्क-वितर्क की शैली अपनाऊँ. लेकिन यदि इनमें प्रस्तुत दृष्टिकोण सही है, तो यह कविता के विरोध में दिए गए तर्कों का खंडन करने के लिए पर्याप्त होगा, कम से कम प्राथमिक रूप से तो ज़रूर.
मैं आसानी से समझ सकता हूँ कि कुछ विद्वान और बुद्धिमान लेखकों को किन कारणों से कुछ कवियों से शिकायत रही होगी. मैं भी उनकी तरह उन रचनाओं से ऊब महसूस करता हूँ, जो शोरगुल के अलावा कुछ नहीं देतीं. बावेयस82 और मैवियस83 जैसे लोग हमेशा की तरह असहनीय ही रहेंगे. लेकिन एक सच्चे विचारशील आलोचक का काम भेद करना होता है, न कि सबको एक ही श्रेणी में डालकर गड्ड-मड्ड कर देना.
इन विचारों के पहले भाग में कविता के मूल तत्वों और सिद्धांतों पर चर्चा की गई है. सीमित शब्दों में यह समझाने की कोशिश की गई है कि जिसे संकुचित अर्थों में “कविता” कहा जाता है, वह उसी स्रोत से उत्पन्न होती है, जिससे अन्य सभी रूपों की सुंदरता और व्यवस्था जन्म लेती है. यही वह आधार है, जिसके अनुसार मानव जीवन के अनुभवों को एक सुंदर और सुसंगठित रूप दिया जा सकता है, और इसी व्यापक अर्थ में इसे कविता कहा जाता है.
दूसरे भाग का उद्देश्य इन सिद्धांतों को वर्तमान समय में कविता के विकास पर लागू करना होगा. साथ ही, यह आधुनिक जीवन शैली और विचारों को एक आदर्श रूप देने के प्रयास का समर्थन करेगा और उन्हें रचनात्मक कल्पना के अधीन करने की आवश्यकता को समझाएगा.
अंग्रेजी साहित्य, जिसका सशक्त विकास हमेशा राष्ट्र की स्वतंत्र इच्छा के उभरने या उसके साथ चलता रहा है, अब एक नए रूप में सामने आ रहा है. भले ही कुछ लोग संकीर्ण सोच और ईर्ष्या के कारण समकालीन प्रतिभाओं को कम आंकने की कोशिश करें, लेकिन हमारा समय बौद्धिक उपलब्धियों के लिहाज़ से यादगार रहेगा. हम ऐसे महान दार्शनिकों और कवियों के बीच जी रहे हैं, जो नागरिक और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए पिछले राष्ट्रीय संघर्ष के बाद से अब तक के सबसे बेहतरीन व्यक्तियों में गिने जा सकते हैं.
किसी महान समाज के जागरण और उसके विचारों या संस्थाओं में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रक्रिया की सबसे विश्वसनीय संकेतक, साथी और अनुयायी कविता होती है. ऐसे समय में, मनुष्य और प्रकृति के प्रति गहरे और उत्साही- भाव व्यक्त करने और ग्रहण करने की शक्ति असाधारण रूप से बढ़ जाती है.
जिस व्यक्ति में यह शक्ति होती है, वह अपनी प्रकृति के कई पहलुओं में उस शुभ चेतना से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ नहीं दिख सकता, जिसका वह माध्यम होता है. फिर भी, चाहे वह इसे अस्वीकार करे और त्याग दे, वह किसी न किसी रूप में इसकी सेवा करने के लिए बाध्य रहता है. यह शक्ति उसके आत्मिक अस्तित्व के केंद्र में स्थित होती है और उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करती रहती है
आज के सबसे प्रसिद्ध लेखकों की रचनाओं में शब्दों में निहित जीवंत ऊर्जा को अचंभित हुए बिना पढ़ना असंभव है. वे व्यापक और गहरी अंतर्दृष्टि के साथ मानव स्वभाव की व्यापकता और गहराइयों को नापते हैं. लेकिन शायद वे ख़ुद भी अपनी रचनाओं के प्रभाव से सबसे ज़्यादा हतप्रभ हो जाते हैं, क्योंकि यह केवल उनकी अपनी आत्मा नहीं, बल्कि उनके युग की भी आत्मा होती है जो उनके शब्दों के माध्यम से प्रकट होती है.
कवि एक ऐसी अज्ञात प्रेरणा के द्रष्टा होते हैं, भविष्य की उन विशाल छायाओं की प्रतियाँ होते हैं, जो वर्तमान पर पड़ती हैं. वे ऐसे शब्द होते हैं और ऐसी भावनाएँ प्रकट करते हैं, जिन्हें वे ख़ुद भी पूरी तरह नहीं समझते. वे युद्ध का आह्वान करने वाली ऐसी रणभेरी होते हैं, जो दूसरों में जोश भरती है, लेकिन ख़ुद उस भावना को महसूस नहीं करती. वे वह शक्ति होते हैं, जो खुद स्थिर रहती है, लेकिन दुनिया को हिला देती है. कवि दुनिया के अनदेखे, अनकहे लेकिन असली विधि-निर्माता होते हैं.
संदर्भ
1. लॉर्ड बेकन—लॉर्ड बेकन (1561-1626) एक अंग्रेज दार्शनिक, लेखक, वैज्ञानिक, वक्ता और राजनीतिज्ञ थे. उन्हें वैज्ञानिक पद्धति का जनक माना जाता है. उन्होंने प्रेक्षण तथा अनुभव को ज्ञान का मूल स्रोत माना. वे निबंध विधा में भी निष्णात माने जाते हैं.
2. जानस–जानस (Janus) प्राचीन रोमन देवता थे, जो प्रारंभ, परिवर्तन, द्वैत (Duality) और अंत के देवता माने जाते थे. उन्हें अक्सर दो मुखों वाले स्वरूप में दर्शाया जाता है—एक चेहरा अतीत की ओर और दूसरा भविष्य की ओर देखता है. जनवरी (January) माह का नाम भी जानस के नाम पर रखा गया है, क्योंकि यह पुराने वर्ष से नए वर्ष में परिवर्तन का प्रतीक है.
3. एस्किलस के कोरस–एस्किलस के कोरस एक साथ भावनात्मक कथा और दार्शनिकता को जोड़ता है. एस्किलस के कोरस पृष्ठभूमि का हिस्सा मात्र नहीं हैं बल्कि वे नाटकीय प्रभाव को बढ़ाते हैं और समाज के सामूहिक विश्वासों और उनकी आशंकाओं को व्यक्त करते हैं.
4. अय्यूब की पुस्तक--बाइबल में उद्धृत अय्यूब की पुस्तक बेहद भावनात्मक और काव्यात्मक पुस्तक होने के बावजूद एक गहरी आध्यात्मिक और दार्शनिक कृति है जो धैर्य और आस्था के अर्थ पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है.
5. पैराडाइज़--दान्ते का पैराडाइसो, डिवाइन कॉमेडी का अंतिम भाग है, जिसमें दान्ते बियाट्रिस के साथ स्वर्ग की नौ आकाशीय परतों से होते हुए एंपायरियन (परम दिव्य क्षेत्र) तक पहुँचता है. इन्फर्नो और पर्गाटोरियो जहां पाप और मोक्ष पर केंद्रित हैं, वहीं पैराडाइसो प्रेम, ज्ञान और ब्रह्मांड की दिव्य समरसता को दर्शाता है. पैराडाइसो की कल्पनाएँ रहस्यमयी और ज्योतिर्मय हैं, जहाँ प्रकाश, संगीत और दार्शनिक चिंतन प्रमुख हैं. यह डिवाइन कॉमेडी का सबसे जटिल और गूढ़ भाग है, जिसमें ईश्वर, ब्रह्मांड और आनंद के स्वभाव पर गहन चर्चा की गई है. इन्फर्नो अपने भयावह चित्रण से चकित करता है और पर्गाटोरियो मानवीय संघर्षों को दर्शाता है, लेकिन पैराडाइसो एक अलग धैर्य और गहरी सोच की मांग करता है, क्योंकि यह क्रियाओं से अधिक, ईश्वरीय सत्य की समझ पर केंद्रित है.
6. बाबेल- बाइबिल के उत्पत्ति संबंधी वर्णनमें टॉवर ऑफ बाबेल की कहानी से जुड़ा है-बाबेल का शाप. यह वह घटना है जब संपूर्ण मानवता, जो पहले एक ही भाषा बोलती थी, ईश्वरीय दंड के कारण विभिन्न भाषाओं में विभाजित हो गई. इस “शाप” ने लोगों को अलग-अलग स्थानों पर बिखेर दिया और उनके स्वर्ग तक पहुँचने के प्रयास को विफल कर दिया.इस अपूर्ण नगर को बाबेल कहा गया, जिसका अर्थ है “भ्रम”.यह कहानी पौराणिक रूप से यह बताने का प्रयास करती है कि विभिन्न भाषाएँ कैसे अस्तित्व में आईं. “शाप” को विभिन्न सभ्यताओं के बीच संचार और सहयोग की कठिनाइयों का प्रतीक माना जाता है.
7. प्लेटो—लगभग 427-347 ईसा पूर्व के यूनानी दार्शनिक, सुकरात के शिष्य और अरस्तू के गुरू. एथेंस में उच्च शिक्षा अकादमी की स्थापना की. उनके संवादात्मक ग्रंथ और रूपों का सिद्धांत- वस्तुओं के शाश्वत और पूर्ण आदर्श- प्रसिद्ध हैं. द रिपब्लिक, फेड्रस, टिमेयस उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं. प्लेटो ने नीति, तत्व-मीमांसा, ज्ञानमीमांसा और राजनीति को एकीकृत दर्शन में ढाला. वे पश्चिमी दर्शन के आधारभूत स्तंभों में से एक हैं.
8. शेक्सपीयर—विश्व-साहित्य के महानतम लेखकों में से एक गिने जाते हैं. 39 नाटक, 154 सॉनेट और कई कविताएँ रचीं. हैमलेट, मैकबेथ, ओथेलो, किंग लियर जैसी अनेक प्रसिद्ध कृतियाँ हैं. मानव स्वभाव, सत्ता, प्रेम, ईर्ष्या, विडंबना की गहरी समझ के लिए प्रसिद्ध हैं. उनकी भाषा, प्रतीकों और पात्रों ने अँग्रेजी साहित्य को नई ऊँचाइयाँ दीं.
9. दान्ते – इतालवी कवि व विचारक, आधुनिक इतालवी भाषा के जनक. द डिवाइन कॉमेडी उनकी अमर कृति है और तीन भागों में विभाजित है- इन्फर्नो (नरक), पर्गेटोरियो (प्रायश्चित) और पैराडाइसो (स्वर्ग). दान्ते मध्य-युग से पुनर्जागरण की ओर संक्रमण के सेतु हैं. उनकी भाषा, कल्पना और नैतिक दृष्टि ने यूरोपीय साहित्य की दिशा आमूल बदल दी.
10. मिल्टन- जॉन मिल्टन कवि और बौद्धिक थे. उनका महाकाव्य पैराडाइज़ लॉस्ट समादृत है. उन्होंने ऐरोपेजिटिका में गद्य लिखा. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के गहरे पैरोकार थे. उनका काव्य- वैभव और सूक्ष्म अभिव्यक्तियों ने परवर्ती कवियों को गहराई से प्रभावित किया था.
11. हेरोडोटस— हेरोडोटस (484-425 ईसा पूर्व) इतिहास के पिता के रूप में जाने जाते हैं. उनके लेखन से एक नई विधा का आविष्कार हुआ जिसमें भौगोलिक, ऐतिहासिक विवरणों के साथ साँस्कृतिक दृष्टि भी सक्रिय दिखती है.
12. प्लूटॉर्क – प्लूटॉर्क (45-120 ईस्वी) ग्रीक जीवनी-लेखक, इतिहासकार, दार्शनिक और निबंधकार थे. उनकी पैरेलल लाइव्स में ग्रीक और रोमन व्यक्तित्त्वों की जीवनी का रोचक अध्ययन है जिसका गहरा प्रभाव यूरोपीय साहित्य, निबंध-लेखन और 16 वीं से 19 वीं सदी के ऐतिहासिक आख्यानों पर पड़ा.
13. लिवी— लिवी रोमन इतिहासकार, दार्शनिक, लेखक थे जिन्होंने अब उर्बे कॉंडिटा नामक 142 वॉल्यूम का रोम का इतिहास लिखा. यह बढ़ा-चढ़ाकर किया गया वर्णन है और आज के प्रामाणिक इतिहास-लेखन के मानकों पर सही नहीं ठहरता.
14. होमर-– पश्चिमी महाकाव्य परंपरा का आदि-संग्राहक. इलियड और ओडिसी के माध्यम से उन्होंने युद्ध और यातना, घर और विस्थापन को काव्यात्मक आत्मा में बदल दिया. उनके पात्र देवताओं की छाया में रहते हैं, लेकिन उनका दर्द पूर्णतः मानवीय है.
15. एकिलीस (Achilles)– नायकत्व और क्रोध का संगम. उसकी अंतर्द्वंद्वात्मक आत्मा भी अनसुनी रह जाती है. उसके लिए युद्ध गर्व भी है, अभिशाप भी. वह अपनी मृत्यु से नहीं, अपनी संवेदना से पराजित होता है.
16. हेक्टर-– ट्रॉय की आत्मा. वह योद्धा जो युद्ध को कर्तव्य मानता है, लेकिन मनुष्य होने की क़ीमत पर नहीं. अपने बेटे को गोद में उठाए हुए जो अंतिम बार मुस्कराता है — वहाँ वीरता मातृत्व की छाया में खो जाती है.
17. यूलिसिस-– चतुराई और जीवटता का प्रतीक. वह युद्ध जीतता नहीं, धैर्य और कथा से उसे पार करता है. उसकी यात्रा केवल भूगोल में नहीं, मनोभूमियों में होती है — जहाँ हर द्वीप, हर तूफ़ान उसके भीतर के एक भय को दर्शाता है.
18. यूरिपिडीज— यूनानी त्रासदी का सबसे आधुनिक, सबसे मानवोन्मुख नाटककार. उसकी मेदेया और इलेक्ट्रा स्त्रियाँ नहीं, क्रांति की प्रतिमाएँ हैं. वह देवताओं को नीचे खींच लाता है — और मानव पीड़ा को मंच का केंद्र बना देता है.
19. लुकेन— रोमन साम्राज्य की चेतना का अंधकार पक्ष. Pharsalia में वह रोम को खुद से लड़ते दिखाता है — भाई-भाई का युद्ध, साम्राज्य की आत्महत्या. उसकी कविता सत्ता का महिमामंडन नहीं, उसका अंतर्कलह है.
20. टैसो– इटली का मध्यकालीन यथार्थ और ईसाई आत्मा का काव्य रूपांतरण. Jerusalem Delivered में वह धर्मयुद्ध को नैतिक दुविधा में बदल देता है. उसकी कविता एक क्रूसेड है — लेकिन बाहर की नहीं, अंतःकरण की.
21. स्पेंसर — एलिज़ाबेथ युग का कवि-दार्शनिक. The Faerie Queene में उसने नैतिक गुणों को नायकों में रूपांतरित किया — जैसे साहित्यिक धर्मशास्त्र रचा हो. वह एक साथ कवि भी है, और नियंता भी, जो कल्पना से नैतिकता का किला गढ़ता है.
22. किंग लीयर — राजा नहीं, एक गिरता हुआ पितामह — सत्ता के क्षरण का व्यक्तिगत क्रंदन. उसकी पीड़ा में ऋग्वैदिक ध्वनि है — जैसे कोई पुरोहित अपने ही यज्ञ की राख में बैठा हो. Lear का पागलपन उसका आत्मिक प्रायश्चित है.
23. ओडीपस टायरैनस — ज्ञान की त्रासदी. वह जो अपने भाग्य से बचना चाहता है, उसी की शिला बन जाता है. मैं कौन हूँ — यह प्रश्न जितना दार्शनिक है, उतना ही विनाशकारी भी. ओडीपस की आँखें फूटती हैं, लेकिन उसके भीतर दृष्टि जागती है.
24. एगामेमनॉन — राजा जो विजयी होकर लौटता है, लेकिन घर की देहरी पर हार जाता है. सत्ता के लिए पुत्री की बलि — यह केवल एक ऐतिहासिक कथा नहीं, बल्कि न्याय और सत्ता के बीच की चुप्पी का आर्तनाद है.
25. काल्डेरॉन-– स्पेनी बरोक रंगमंच का गंभीरतम विचारक. Life is a Dream में वह जीवन को एक स्वप्न कहता है — पर यह पलायन नहीं, जिम्मेदारी का सपना है. उसकी शैली में धर्म, राजनीति और आत्मा — सब कुछ परस्पर समाहित है.
26. उटिकन कैटो — राजनैतिक नैतिकता का स्टोइक नायक. रोमन गणराज्य की आत्मा को आख़िरी सांस तक थामे हुए. ब्रिटिश उदारवाद की प्रेरणा, अमेरिकी क्रांति की छाया — Cato विचार और कर्तव्य के बीच की त्रासदी है.
27. चार्ल्स द्वितीय— बहाली का राजा — राजतंत्र का पुराना मुखौटा, लेकिन नया राजनीतिक खेल. साहित्य में वह व्यंग्य और कटाक्ष के दौर का राजा है. Dryden और Rochester की कविताओं में वह संयम और विकृति दोनों का प्रतीक है.
28. मैकियावेली –– राजनीति के निर्विकार, लगभग क्रूर विश्लेषक. The Prince नैतिकता का नहीं, बल्कि प्रभावशीलता का शास्त्र है. उसका यथार्थवाद पश्चिम का कौटिल्य है — नीति नहीं, सत्ता का मनोविज्ञान.
29. ब्यूकोलिक पोएट्स (Bucolic/ Pastoral poets)– ग्रामीण जीवन की सौंदर्यात्मक कल्पना — लेकिन यह पलायन नहीं, बल्कि सभ्यता की थकान से जन्मा स्वप्न है. वर्जिल से लेकर स्पेंसर तक, यह परंपरा खेतों को मंदिर और ग्वालों को दार्शनिक बना देती है.
30. सोफोक्लीज़ (Sophocles)– त्रासदी का सबसे संतुलित और नैतिक कवि. ओडीपस और एंटिगोनी में वह देवताओं को न्याय और आत्मा के बीच खड़ा करता है. उसके पात्र अकेले नहीं हैं — वे संवेदनशील आत्माएँ हैं, जो भाग्य के खिलाफ भी मर्यादा खोजती हैं.
31. एस्ट्राया (Astraea)– न्याय की देवी जो पृथ्वी से उठ गई — स्वर्ण युग का अंतिम प्रकाश. साहित्य में वह आदर्श व्यवस्था और खोए हुए नैतिक संतुलन की प्रतीक बन जाती है. जब-जब अन्याय बढ़ा, कवियों ने उसे पुकारा — एक लौटती हुई आकांक्षा की तरह.
32. सिरैक्यूज़ (Syracuse)– सिसिली का नगर — दर्शन, गणित और साहित्य की धरती. प्लेटो यहाँ आया, डायोनिसियस का दरबार देखा. यह शहर युद्ध और बौद्धिकता का सम्मिलन था — जहाँ नाट्य और सत्ता एक साथ खेले जाते थे.
33. अलेक्ज़ेंड्रिया (Alexandria)– विश्वज्ञान की राजधानी — जहाँ यूनानी और मिस्री चेतना मिलती हैं. लाइब्रेरी ऑफ अलेक्ज़ेंड्रिया केवल ग्रंथों का नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृति का शिलालेख था. जब वह जला, तो मानवता ने एक पूरा युग खो दिया.
34. थियोक्रिटस (Theocritus)– पस्टोरल कविता का जनक. उसकी Idylls में ग्रामीण जीवन केवल सुंदर नहीं — वह संवेदनशील और सजीव है. थियोक्रिटस का गाँव फूलों से नहीं, भावनाओं से बसता है — जहाँ प्रेम, ईर्ष्या और सुख सब समाहित हैं.
35. एनियस (Ennius)– रोमन साहित्य का आदिम ऋषि. लैटिन कविता को पहली बार इतिहास और दर्शन की गहराई दी. वह होमर का अनुयायी है, लेकिन रोम का आत्मदर्शी. Annales में वह एक सम्राट की नहीं, एक सभ्यता की आवाज़ है.
36. वार्रो (Varro)– ज्ञान का बहुपृष्ठीय कोश — व्याकरण, कृषि, धर्म, भाषा, हर विषय पर ग्रंथ. रोमन युग का ‘विद्वान नागरिक’, जिसे Cicero भी आदर से उद्धृत करता है. उसका लेखन सभ्यता का दस्तावेज़ है, व्यक्ति का नहीं.
37. पकुवियस (Pacuvius)– रोमन त्रासदी का गंभीर सुर. वह रोमन मंच पर ग्रीक मिथकों को लाता है, लेकिन उन्हें स्थानीय आत्मा से भर देता है. उसकी शैली में वीरता कम, दार्शनिक द्वंद्व अधिक है — जैसे वह थिएटर नहीं, पाठशाला हो.
38. आकियस (Accius)– पकुवियस का उत्तराधिकारी, लेकिन और भी गूढ़. उसकी भाषा में गूंज है, उसकी कविता में क्रोध और व्यवस्था का टकराव. वह मंच पर सत्ता को विवेक की चुनौती देता है — एक रोमन प्रोटेस्टेंट की तरह.
39. लुक्रेतियस (Lucretius)– De Rerum Natura में वह परमाणु, चेतना, मृत्यु — सब कुछ को विज्ञान और कविता के सेतु से जोड़ता है. वह एपिक्यूरस का शिष्य है, लेकिन उसकी कविता दार्शनिक उग्रता से भरी है. मृत्यु की व्याख्या वह आश्वस्ति के संगीत में करता है.
39a. होरेस (Horace)– शांति, संतुलन और विनम्रता का कवि. उसका Carpe Diem केवल भोग नहीं, बल्कि समय की नश्वरता की समझ है. वह साहित्य को भव्यता नहीं, सांस्कृतिक परिपक्वता में ढालता है — जैसे रस की सही मात्रा खोज रहा हो.
40. कैटलस (Catullus)– रोमन प्रेम और विद्रोह का काव्यात्म विद्रोही. उसकी कविताओं में व्यक्तिगत पीड़ा, व्यंग्य और लालसा एक साथ थरथराते हैं — जैसे रोम की छाती पर कोई आधुनिक हृदय धड़क रहा हो. Lesbia उसकी कविता नहीं, संस्कृति की गूँज है.
41. ओविड (Ovid)– Metamorphoses — एक ऐसा महाकाव्य जो देवताओं, मनुष्यों और मिथकों को तरल करता चलता है. उसका निर्वासन केवल राजनीतिक दंड नहीं, संवेदनशीलता का देश- निकाला है.
42. वर्जिल (Virgil)– एनिड में वह रोम का आत्मबोध गढ़ता है — होमर का उत्तराधिकारी, लेकिन ज्यादा शांत, गम्भीर, और राज्यनिष्ठ. उसका कवि एक राजनैतिक ऋषि है, जो भविष्य को नायकों की कथा में लिपिबद्ध करता है.
43. कामिलस (Camillus)– रोम के आरंभिक गणराज्य का सेनापति — वीरता और कर्तव्य का प्रतीक. साहित्य में नहीं, लेकिन रोमन आत्मा में कामिलस वह पुल है जो धर्म, युद्ध और नीति को जोड़ता है.
44. रेगुलस (Regulus)– एक ऐसे योद्धा की कथा जो कर्तव्य के लिए मृत्यु को बुलावा देता है.
उसका रोम लौटकर दुश्मनों के हाथों मरना — कर्तव्य की गाथा का चरम बिंदु है.
45. कैन्ने (Cannae)– यह कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वह भयानक युद्धस्थल है जहाँ हैनिबल ने रोमन सेना को धूल चटा दी. पराजय केवल सैन्य नहीं थी — यह रोमन आत्मा की परीक्षा थी.
46. हैनिबल (Hannibal)– कार्थेज का अभिशप्त योद्धा — जिसकी विजय दृढ़ता और रणनीति का आख्यान है, लेकिन जिसकी हार इतिहास का न्याय बन जाती है. वह रोम की नींव को हिला देता है — लेकिन वह स्वयं स्मृति में हार जाता है.
47. मूसा (Moses)– धर्म, नैतिकता और कानून — तीनों के मध्यवर्ती. तोरा उसका शब्द है, लेकिन वह ईश्वर का दूत और मनुष्य की अस्मिता का वाहक भी है. उसकी कथा आदेश और करुणा के बीच की चुप्पी है.
48. अयूब– पश्चिमी धार्मिक चेतना की सबसे गहन पीड़ा. “मैंने क्या किया?” — यह उसका प्रश्न नहीं, मानवता की आन्तरिक गूँज है. उसकी चुप्पी में वेदना की आस्था है, और उसके धैर्य में प्रलय के विरुद्ध संकल्प.
49. डेविड (David)– कवि-राजा, योद्धा-गायक. भजन-संग्रह उसका आत्मदर्शन है — प्रेम, अपराधबोध, उल्लास, युद्ध — सबका संगीतमय मिश्रण. वह न्याय का नहीं, करुणा का सम्राट है.
50. सोलोमन (Solomon)– ज्ञान का स्वर्णस्तंभ — “सब व्यर्थ है” कहने वाला राजा, जिसकी वाणी बुद्ध की छाया जैसी लगती है. सुलेमान का गीत — केवल प्रणय नहीं, प्रकृति और आत्मा के मिलन का शास्त्र है.
51. इशायाह (Isaiah)– यहूदी भविष्यवक्ता — जिनकी वाणी में आग और आँसू एक साथ बहते हैं. वह केवल चेतावनी नहीं देता, उम्मीद का स्वप्न भी दिखाता है. इशायाह की भाषा काव्यात्मक न्याय की है — धर्म, दया, और प्रतिकार का संलयन.
52. सेल्टिक (Celtic)– भाषा नहीं, एक द्रविड़वत् आत्मा — जो प्रकृति, रहस्य और स्मृति में रचती है अपना धर्म. सेल्टिक परंपरा यूरोप की ‘मौन’ परंपरा है — जिसे रोमनों ने दबा दिया, लेकिन वह गीत, गाथा और जादू में जीवित रही. यह वह संस्कृति है जो नायकत्व को जादुई आस्था में बदल देती है.
53. टिमेयस (Timaeus)– प्लेटो का संवाद — जिसमें ब्रह्मांड का निर्माण गणितीय संगीत की भाषा में होता है. यह केवल दर्शन नहीं, मेटाफिज़िक्स का संगीत है. टिमेयस वह स्थल है जहाँ सृष्टि विज्ञान, आत्मा और सौंदर्य को एक सूत्र में बाँधा गया.
54. पायथागोरस (Pythagoras)– संख्या का ऋषि — जिसने कहा, “संगीत ब्रह्मांड की आत्मा है.” उसके लिए अंक केवल माप नहीं, जीवन के सिद्धांत हैं. वह गणित में धर्म खोजता है, और शब्द के पीछे सन्नाटा सुनता है.
55. पेट्रार्क (Petrarch)– पुनर्जागरण का पहला राग. उसकी कविता में प्रेम और आत्मा का एक ऐसा संवाद है, जो युगों की चुप्पी को तोड़ता है. वह लौरा को चाहता है, लेकिन लौरतापूर्ण जीवन की आकांक्षा में तपता है.
56. वीता नुओवा (Vita Nuova)– दांते की आत्मकथा — जहाँ प्रेम, दर्शन और आत्मा एक ही कविता में एकात्म हो जाते हैं. यह ग्रंथ केवल प्रेमकथा नहीं — यह आध्यात्मिक जागरण का रेखाचित्र है.
57. बियाट्रिस (Beatrice)– स्त्री नहीं, एक आलोक. दांते के लिए वह मोक्ष की ओर उठती हुई सीढ़ी है. बियाट्रिस Dante की आत्मा का दिव्य संवाद है.
58. रूसो (Rousseau)-– संवेदना और राज्य का विभाजन. उसके लेखन में मानवता अपने खोए हुए स्वाभाविक स्वरूप के लिए रोती है. Confessions और Social Contract — दोनों में वह सभ्यता से प्रश्न करता है और प्रकृति की ओर लौटता है.
59. रिपेयस (Rhipaeus)— Virgil का एक आश्चर्यजनक पात्र — एक ऐसा “धार्मिक अज्ञेय” जो मृत्यु के बाद स्वर्ग में पहुँचता है. यह अनपेक्षित मोक्ष का प्रतीक है — जहाँ नीति, पाप, और अनुग्रह के समीकरण उलट जाते हैं. Virgil के ब्रह्मांड में, न्याय जटिल है और करुणा प्राथमिक.
60. अपोलोनियस रोडियस (Apollonius Rhodius)– Argonautica का रचयिता — Jason की यात्रा के माध्यम से यात्रा को ही जीवन की कथा बना देता है. वह होमर के बाद आता है, लेकिन मनुष्य के डर, प्रेम और द्वंद्व को अधिक सूक्ष्मता से रचता है.
61. क्विंटस कैलाबेर (Quintus Smyrnaeus)– होमेरिक परंपरा का पुनरुत्थानकारी कवि — जिसने ट्रोजन युद्ध की अधूरी कथा को Posthomerica में पूरा किया. उसकी शैली में पुनरुद्धारित भव्यता है, लेकिन भाषा में स्मृति और शोक का अंधकार.
62. नोनस (Nonnus)– Dionysiaca का रचयिता — एक महाकाव्य जो देह और देवता के बीच की सीमाओं को संगीत और भाषा में तोड़ता है.
63. लूकेन (Lucan)— रोम का क्रांतिकारी कवि — जिसने Pharsalia में सिविल युद्ध को भाग्य और सत्ता के रक्तस्नान के रूप में रचा. होमर के विपरीत, वह देवताओं से इंकार करता है — उसके लिए इतिहास ही त्रासदी है.
64. स्टेटियस (Statius)-– Thebaid में वह भ्रातृहत्या और भाग्य के वर्चस्व को काव्यात्मक वैभव से संजोता है. उसका शिल्प सुंदर है, पर उसका ब्रह्मांड अंधकार से ग्रस्त है.
65. क्लॉडियन (Claudian)-– प्रशासन और कविता का संगम — वह रोमन साम्राज्य के अंतःपुरों में भक्ति और व्यंग्य का गीतकार है. उसकी शैली में मुक्त भाषण और राजनैतिक रूपक की गहराई है.
66. ऐनीड (Aeneid)-– Virgil का महाकाव्य — ट्रॉय की राख से उठता हुआ रोम का भविष्य. Aeneas वह नायक है जो भाग्य को स्वीकार करता है, उसकी यात्रा कर्तव्य और दुःख की महिमा है. यह ग्रंथ रोमन आत्मा का स्थापत्य है — गरिमा, अनुशासन और त्रासदी का समवेत संगीत.
67. ऑरलैंडो फ्यूरिओसो (Orlando Furioso)– Ariosto की द्रुत गति से बहती हुई, उन्मादी कल्पनाओं की नदी. पारंपरिक वीरता को हास्य, प्रेम और पागलपन से भंग करता हुआ एक पुनर्जागरणीय व्यंग्य. Orlando की उन्मत्तता वीर आदर्श के टूटते हुए कंगूरों का प्रतीक है.
68. जेरूसलेम लिबेराटा (Jerusalem Liberata)– Torquato Tasso की क्रूसेड की दिव्य, नैतिक और भावुक गाथा. यह महाकाव्य ईसाई धर्मयुद्ध को आत्मा की खोज में बदल देता है. Tasso का नायक तलवार से अधिक प्रार्थना में डूबा है, और युद्ध आत्मा का रूपक बन जाता है.
69. लुज़िएड (Lusiads)-– Camoes का पुर्तगाल का महागान — वास्को-डि-गामा की समुद्री यात्रा के माध्यम से राष्ट्र और समुद्र की आत्मा का आह्वान. यहाँ ओडिसी है, लेकिन यूरोपीय विस्तारवाद के गर्व और दुविधा के साथ. यह वह ग्रंथ है जहाँ इतिहास, समुद्र और मिथक एक राष्ट्रगाथा में एकत्र होते हैं.
70. फेयरी क्वीन (Faerie Queene)-– Spencer की रूपकात्मक नीति-काव्य, एलिज़ाबेथ युग का आत्मचित्र. हर पात्र एक सद्गुण है, हर प्रसंग राजनीति और नैतिकता का रूपक. यह महाकाव्य स्वप्न और उपदेश का संगम है — इंग्लैंड का आत्म-रूपायन.
71. लूथर (Luther)-– Martin Luther — वह व्यक्ति जिसने धर्म को संस्थान से तोड़कर आत्मा के सामने खड़ा किया. उसकी थीसिसों में क्रोध नहीं, नैतिक विवेक की आग है. उसने बाइबिल का अनुवाद किया, पर वास्तव में मानव विवेक का अनुवाद किया.
72. बोकेच्चियो (Boccaccio)— Decameron का रचयिता — प्लेग की छाया में मानव हास्य, प्रेम, छल और जीवन की जिजीविषा को रचने वाला लेखक. वह Dante के बाद आता है, पर पृथ्वी पर लौटता है, मानव की कामनाओं और कमजोरियों के साथ. उसकी शैली में संवेदनशीलता और व्यंग्य दोनों एक साथ.
73. लॉक (Locke)— John Locke — ज्ञान, स्वतंत्रता और सामाजिक अनुबंध का विचारक. उसके लिए व्यक्ति की चेतना ही सरकार का आधार है. उसने कहा: “मनुष्य जन्म से कोरा काग़ज़ है” — और फिर उसने शिक्षा, अनुभव और स्वतंत्रता की स्याही से वह काग़ज़ भरा.
74. डेविड ह्यूम (David Hume)– आलोचनात्मक विवेक का ध्वजवाहक — संदेह और तर्क के संतुलन पर टिका हुआ स्कॉटिश विचारक. ह्यूम ने कहा: “हम कारण को नहीं जानते, केवल आदत पहचानते हैं.” उसकी शैली शांत है, पर उसमें आधुनिक चेतना की जड़ें हैं.
75. एडवर्ड गिबन (Edward Gibbon)– The Decline and Fall of the Roman Empire — इतिहास का एक दार्शनिक महाकाव्य. उसने रोम की मृत्यु में संस्थानों की विफलता, धर्म का अतिनाट्य, और मनुष्य की अकड़ देखी. गिबन में तथ्य और विडंबना का अद्भुत संतुलन माना जाता है.
76. वॉल्टेयर (Voltaire)-– प्रबोधन का विद्रोही बुद्धिजीवी — धर्मांधता के खिलाफ़, विवेक के पक्ष में. उसके व्यंग्य में आग और तर्क की बिजली है. वह कहता है: “ईश्वर को अगर नहीं बनाया गया होता, तो हमें बनाना पड़ता” — पर वह कैसा ईश्वर होगा, यही उसकी चिंता है.
77. स्पेन में इनक्विज़िशन– यह धर्म की राजनीतिक विकृति थी — जहाँ पवित्रता की आड़ में भय और दमन की संस्थागत मशीन चली. यह वह अंधकार है जिससे वोल्टेयर जैसे लोग निकलने की कोशिश करते हैं. इनक्विज़िशन धर्म का अपराध-शास्त्र है.
78. चॉसर (Chaucer)– Canterbury Tales के रचयिता — इंग्लिश कविता का जनक, एक यात्रारत समाज का हास्यपूर्ण नक़्शानवीस. हर पात्र में एक युग बोलता है — भिक्षु, व्यापारी, मिलर, नन. वह होमर और बोकेच्चियो के बीच पुल है.
79. रैफाएल (-– चित्रकला में संतुलन, कोमलता और भक्ति का नाम —उसकी मैडोना में देवी नहीं, स्मृतियों में बसती स्त्री की कोमलता है.
80. माइकल एंजेलो (Michelangelo)– मूर्तियों में न केवल शरीर, बल्कि आत्मा का तनाव भी उकेरा. सिस्टीन चैपल का उसका चित्रण पश्चात्ताप और महिमा का युग-पत सौंदर्य है.
81. ऑरलैंडो फ्यूरियोसो (Orlando Furioso)– (पूर्व में वर्णित) Ariosto की यह कृति पुनर्जागरण की कल्पनाशीलता और शौर्य की विडंबना का सर्वश्रेष्ठ नमूना. यहाँ वीरता की परंपरा पागलपन और प्रेम में पिघलती है.
82. बावेयस (Bavius)– होरेस और वर्जिल की आलोचना में चर्चित — अयोग्य और अति-नाटकीय कवियों का प्रतीक. ‘बावेयस’ अब काव्यदोष का व्यंग्यात्मक पर्याय बन चुका है.
83. मैवियस (Maevius)– बावेयस का जोड़ा — होरेस ने उन्हें दुर्भाग्यपूर्ण कवि कहा. मैवियस वह है जो कविता को बोझ बनाता है, अर्थहीन अलंकारों से. काव्यशास्त्र के इतिहास में क्या न किया जाए — इसका जीता-जागता उदाहरण.
महेश मिश्र सांस्कृतिक मामलों के जानकार और टिप्पणीकार हैं. भारतीय और वैश्विक मामलों पर दृष्टि रखते हैं. साहित्य में उनकी गहरी रुचि है और उनका लेखन लगातार सामने आ रहा है. |




कविता के पक्ष में यह आलेख ना सिर्फ़ साहित्यिक इतिहास में महत्वपूर्ण है वरन् अवश्य पठनीय और संग्रहणीय भी है । विस्तृत निबंध में कविता पर इतने विविध दृष्टिकोणों से विचार रखे गए हैं कि उनके बारे में सोचकर अचंभित हो जाना पड़ता है । विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि कविताओं ने किसी देश और समाज के अंधकार और सुप्तप्रायः समय में जागरण का प्रकाश बिखेरा है । सत्ता परिवर्तन या औद्योगीकरण हो , हर युग व काल में कविता की उपयोगिता बनी रही है । निश्चित रूप से यह मनुज को और मनुज- सभ्यता को अधिक मानवीय बना सकती है बशर्ते कि हम मानवीयता के महत्व पर कोई सवाल न उठायें ।
आज जब कि जंगली घास की तरह अंधाधुंध कविताएँ लिखी और परोसी जा रही है , कविताएँ अनैतिकता , अपमान , अश्लील इशारेबाज़ी और कटुक्तिओं को प्रोत्साहित कर रही है हमे नई पीढ़ी की कविताओं से आशा है कि वे कविता के उदार शब्दों की ऐसी पवित्र ध्वनि उत्पन्न करेंगे जो विश्व को इस विनाश , कलह और संघर्ष के दिनों में एक नई प्रशांत दिशा दे सके । इस अनन्य निबंध के प्रवाहपूर्ण अनुवाद के लिए महेश मिश्र जी का और इसे साझा करने के लिए समालोचन का आभार ।
कविता और मनुष्य प्रकृति के अन्तर सम्बंध को शेली ने जिस तथ्यात्मक ढंग से और संवेदना से लिखा है वह लेखक और पाठक दोनों के लिए सदा ज़रूरी पाठ होगा। कविता की भाव भूमि , वैचारिकी, कल्पना जैसे कई पक्षों को इस लेख में अनूठा मयार मिला है। अनुवाद शानदार है। साथ ही लेख के संदर्भ में महेश जी की टिप्पणियाँ समृद्ध करती हैं। ऐसे सुचिंतित लेख प्रकाशित करने के लिए समालोचन को और अनुवादक को बहुत बधाई।
यह एक शानदार काम हुआ है। यह पाठ इतने अच्छे अनुवाद में ही हम हिंदी वालों को मिलना चाहिए था। पाद टिप्पणियों के माध्यम से चीज़ों को स्पष्ट करके महेश जी ने इसे समझ पाना और सुकर बना दिया है। बहुत बहुत शुक्रिया!
यह अनुवाद कार्य जिस सघनता और तन्मयता से सम्पन्न हुआ है, उतना ही अनुवादकीय कर्म और गंभीर शब्द – शिल्प संधान का बेजोड़ नज़ीर साबित हुआ है। किन्तु ग़ौर करने वाली बात यह है कि शेली का यह संजीदा और विचारोत्तेजक आलेख 1821 में लिखा गया था। यानी उनकी मृत्यु के 1 वर्ष पूर्व! किन्तु प्रकाशित हुआ 1840 में। मात्र 29 वर्ष की आयु मिली थी शेली को। इतनी कम आयु में इतना गहरा, गंभीर और बौद्धिक लेख उस समय की अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक ज़मीन को पुख्ता करता है। थॉमस पीकॉक जो शेली के अभिन्न मित्र भी थे, उन्होंने यह प्रस्थापित किया था कि होमर का काल ‘कविता का स्वर्ण काल’ था। धीरे – धीरे कविताओं में वह संवेदना, कोमलता और भाव – सम्प्रेषण नहीं रह गया। छंदमुक्तता , अ – लयता और कृत्रिम गद्यात्मकता ने इसकी जगह ले ली। औद्योगीकरण के बाद कविता की स्थिति और भी बद से बदतर होती गयी। पीकॉक का तर्क था कि इस औद्योगीकृत आधुनिक युग में कवि केवल “सभ्य समाज में अर्ध-बर्बर” हैं जिनका काम अतीत को पुनः प्राप्त करने का एक खोखला प्रयास है।
शेली ने इस अर्थ को दूसरे तरीके से खोला। कविता कर्म, कवि, उसका हेतु, उसकी ऐतिहासिकता और आज की ज़रूरत उदाहरण के साथ पेश किया। लेख में इन सब तत्त्वों की पुष्टि होती है। किन्तु एक चीज़ जो लोग भूल जाते हैं या नहीं समझना चाहते हैं – वह यह कि शेली ने पीकॉक की स्थापना के विरोध में यह नहीं लिखा है। शेली खुद कहते हैं और मानते हैं कि उन रचनाओं से मैं भी ऊब महसूस करता हूँ जो शोरगुल के अलावा कुछ नहीं देती।
कविता की हिफाज़त में यह आलेख ज़रूर लिखा गया है! लेकिन सभी कविताएँ इनमें शामिल नहीं होतीं! उन कविताओं का चयन एक प्रबुद्ध आलोचक का कर्तव्य है जिन्हें बचाने का उपक्रम किया जाना है। कविता यहाँ जातिवाचक संज्ञा के रूप में स्थापित है।
प्राचीन काल में प्लेटो और अरस्तू का द्वैत कविता के संदर्भ में उभरता है। आधुनिक काल में पीकॉक और शेली इसी विषय पर पुनः द्वैत बनकर उभरते हैं। तर्क कितने भी यथार्थ की कसौटी पर सही हो या गलत, कविता को नेस्तनाबूद और उसकी अहमियत को सरलीकृत करने की जद्दोजहद हर काल की अपनी समस्या रही है।
शेली इस आलेख में शुरुआत से ही कल्पना और तर्क को तवज्जो देते आए हैं। यानि कविता न तो शुद्ध कल्पना और संवेदना का एकात्म है न ही तर्क की एकाधिकारी।
अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ भी शेली से प्रभावित लगती है जब शेली कविता को वीणा का रुपक पहनते हुए कहते हैं कि यदि वीणा स्वयं अपनी तारों को उसी धुन में समायोजित कर सके जिसमें वह झंकृत होती है – जैसे कोई संगीतकार अपनी ध्वनि को वीणा की ध्वनि के अनुरूप ढाल सकता है।
आचार्य शुक्ल की ‘कविता क्या है’ के कई बिन्दु अपने सूत्र में मिलते हैं। हालांकि शुक्ल जी के पास वह बिन्दु अपने उत्कर्ष पर मिलते हैं क्योंकि वहाँ कविता की भाषा औए शिल्प पर भी पर्याप्त प्रस्थापनाएँ हैं।
महेश जी द्वारा किया गया यह अनुवाद धरोहर है! जिस तरह उन्होंने सार्थक और सटीक शब्दों के चयन से अनुवाद कर्म को शिद्दत से निभाया है, साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि और संस्कार प्रक्षेपित करता है।
इसे सराहा जाना चाहिए! हिन्दी ही नहीं भारतीय साहित्य, समाज और संस्कृति को एक महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी देय, महेश मिश्र द्वारा!