| आषाढ़ की एक अधूरी बारिश
योगिता यादव |
जिंदगी में सूखा हो तो हर समय बारिश का ख्याल रहता है. मैं इन दिनों हर समय बारिशों के बारे में सोचा करती हूँ. फुहार, कड़ियां, बौछार, मूसलाधार…. मैं उनकी हर दस्तक, हर रूप को पहचानने लगी हूँ. उनकी ध्वनियों और खुशबू से मैं उनकी तासीर जान जाती हूँ. और यह भी कि आषाढ़ का आसमान कई बार यूं ही उमड़ घुमड़ कर धोखा दिया करता है, बरसता नहीं है. इस अनुभव से गुजरना मुझे बेतरह तड़पा देता है. यह मौसम अपनी ही देह की तहों में दुश्वारियां ला रखता है.
अंबर रात देर तक जागा है, उसे अपने ऑफिस का जरूरी असाइनमेंट पूरा करना था. पर उसे करने से पहले वह मुझे भली तरह फेंट चुका था. यह उसे ऊर्जा देता है, इसके बाद वह ज्यादा फोकस होकर काम कर पाता है. मगर किनारे तक लाकर अपनी सब लहरें समेट लेना, मुहब्बत का कौन सा शऊर है? फेंटे जाने के बीच भी मैं भय और आनंद के मिश्रित भावों के बीच डूबती-उतराती रही थी. दूसरे कमरे में बेटी पढ़ रही है. अंबर इस बात से निश्चिंत था कि यह उसका अपना कमरा है और जब तक बेटा नहीं आ जाता, वह यहाँ कुछ भी कर सकता है. एयरकंडीशन्ड कमरे होने के बावजूद मैं बार-बार इस भय में झूलती रही थी कि अगर बेटी ने पानी लेने के लिए भी अपने कमरे का दरवाजा खोला तो वह इस कमरे से आ रही सब आवाजें सुन लेगी. यह कितनी अजीब बात है कि जहाँ होने का मुझे एक-एक पल इंतजार रहता है, वहाँ होते हुए भी मैं एक अनहुए की कल्पना भर से शर्मिंदा हो रही हूँ.
आधी रात तक जागकर उसने जो पॉवर पॉइंट प्रजेंटेशन बनाई है, वह उसके डिपार्टमेंट की साख बचा सकती है. सर्वजन हिताय अंबर देर रात तक जागा था और मैं रात भर अनिद्रा अतृप्ति में सुबह का इंतजार करती रही थी.
बच्चों की उम्रें घर का रंग, रूप और स्वभाव बदल देती हैं. हमारा घर अब दो हिस्सों में बंट गया है. एक जैसे ज़नानखाना हो गया है. जहाँ मैं, बेटी और हम दोनों के जरूरी सामान रहते हैं और दूसरा हिस्सा बेटे, उसके पिता, और उन दोनों के जरूरी सामान का है. बेटा और बेटी ही बस हम दोनों के साझे हैं. हमारी अलमारियां, हमारे कमरे और हमारे बिस्तर भी कब अलग हो गए, नहीं पता. बच्चों के बढ़ते कद, जरूरतें और अपेक्षाएं शायद हम दोनों के बीच पसरते चले गए. पर यह कब हुआ, ठीक-ठीक याद नहीं.
शायद किसी एक सुबह बेटी मेरी बगल में आ बैठी होगी डायनिंग टेबल पर या किसी दिन शायद बेटा अपने पिता के साथ गाड़ी की अगली सीट पर बैठ गया होगा और मैं हंसते हुए पिछली सीट पर चली गई होऊंगी. हो सकता है बेटी की उम्र के किसी एक बदलाव के समय मैंने अपनी अलमारी का कुछ सामान उसे दिया हो या फिर यह भी हो सकता है कि कोई एक बात बेटे ने सिर्फ अपने पिता से साझा की हो. इनमें से कुछ, या हो सकता है सब कुछ हुआ होगा. और हम दोनों एक दूसरे से दूर होते चले गए. इतना ज्यादा कि अब मैं अंबर को अपने बच्चों के पिता और अंबर मुझे अपने बच्चों की मां के तौर पर ही ज्यादा पहचानते हैं, इसी हैसियत से हमारे बीच ज्यादातर संवाद होता है. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए वह खुद को विदड्रॉल करता गया. अब वो और उसका दफ्तर, बस यही उसका हर रोज का रुटीन हो गया है. कोई त्योहार हो, उसने किसी बहुत जरूरी काम से छुट्टी ली हो, तो भी वह दिन भर अपने लैपटॉप पर ही व्यस्त रहता है.
वह कौन था जो हाथ पकड़ कर मुझे गृहस्थी के इस ट्रैक पर ले आया था! एक ऐसा ट्रैक जिसके दो हिस्सों के बीच हमेशा एक संतुलित दूरी बंधी रहती है. बेटी के बिस्तर पर करवटें बदलते रात भर एक वाक्य मेरी आत्मा पर बजता रहा है,
“मैं तुम्हें इतना प्यार करूंगा कि तुम कभी बूढ़ी नहीं हो पाओगी.”
आपादमस्तक मुझे चूमते हुए बरसों पहले कहा था अंबर ने. पर शायद वह अपने कहे को खुद ही भूल गया है. तभी तो हर बार अपनी अनुपलब्धता को उम्र के मत्थे मढ़ देता है. मैं बार-बार खुद से सवाल करती हूँ, “क्या बच्चों के बड़े होने से हम बूढ़े हो गए हैं?” और “क्या बूढ़े होने से हम एक-दूसरे की भावनाओं की लिपि पढ़ना भूल गए हैं?”
मेरी हल्की फुल्की बातें भी उसे अब ताने लगती हैं और उसका हर बात पर सफाई देना मुझे उसकी अतिरिक्त चालाकी. वह अब क्यों नहीं मेरे हर शिकवे को मुझे चूम कर भुला देता? क्यों हर बार उन पर लंबी जिरह पर उतारू हो जाता है? वह यह भी भूल गया है कि उसने मुझसे कभी उदास न होने का वादा लिया था. तब जब पहली बार हमें लंबे समय के लिए एक दूसरे से दूर होना पड़ा था, उस दूरी को अपनी मुहब्बत से पाटते हुए उसने कहा था, “मैं तुम्हारे हर दुख की भरपाई करूंगा अवनि.” कयामत ये कि उसे यह भी याद नहीं है!
वह जिस सक्रियता से अपने सोशल सर्कल में सक्रिय रहता है, जिस तत्परता से दफ्तर की हर ईमेल, हर मैसेज का जवाब देता है, घंटों बिना थके फाइलें निपटाता है, अपने जूनियर को मोटिवेट रखता है और सीनियर के सामने हाथ बांधे खड़ा रहता है, उससे वह 25 बरस का भरी पूरी ऊर्जा वाला नौजवान लगता है. मगर मेरे आभाचक्र में दाखिल होते ही वह दुनिया का सबसे अक्षम, असमर्थ, मजबूर और व्यस्त आदमी हो जाता है. उसकी अनदेखी कैसे एक खुश्की बनकर मेरे वजूद को घेरती जा रही है, उसे अंदाजा ही नहीं है.
भोर की बारिश ने फिर देहराग छेड़ दिया है. चार बजते मुझे ख्याल आया कि बेटा अब जिम जाएगा और बेटी ने सुबह पाँच बजे का अलार्म लगाया है. यह चार से पाँच बजे के बीच का एक घंटा हमारी अधूरी बारिशों को फिर से पूरा कर सकता है. मैं बच्चों की आँख बचाकर झट से अपने हिस्सा का कुछ समय चुरा लेना चाहती हूँ.
मैंने चोर नजरों से बेटी की तरफ देखा है, ‘वह सचमुच सो रही है न?’ बिस्तर के सिराहने तिपाई पर रखी अलार्म घड़ी को दोबारा जांचकर तसदीक की है, ‘यह पाँच बजे ही बजेगी न, उससे पहले तो नहीं?’ रसोई से आ रही आवाजों से मैंने अंदाजा लगाया है कि बेटा अपने लिए प्रोटीन शेक बना चुका है और अब वह जूते पहनकर लिविंग एरिया से बाहर निकल रहा है. मैं दम साधे दरवाजा बंद होने का इंतजार कर रही हूँ. दो बार चाबी घुमाने की आवाज़ ने मुझे निश्चिंत किया है कि अब वह जिम के लिए निकल गया है. अब मैं अपने अंबर की तरफ जा सकती हूँ. एक भय अब भी मेरे भीतर है. मेन डोर की चटखनी अंदर से बंद कर मैं उस भय को काबू करने की कोशिश करती हूँ.
एक अलग तरह की बेचैनी, झिझक, उतावलापन मुझमें हिलोर ले रहा है.
“क्या मुझे यह शोभा देता है?”
“अंबर मेरा है, क्यों नहीं?”
“दांपत्य में होना ही तो अद्वैत हो जाना है.”
“अगर वो भूल गया है तो मुझे पहल करनी चाहिए.”
“एक आँख से दूसरी को देखने में कैसी झिझक!”
“अपनी जिल्द की सलवटों को खुद ही खोलने में कैसा शर्माना?”
अंबर के कमरे में दाखिल होते मैंने तमाम तरह से खुद को तैयार किया है. नीम अंधेरे में सिर्फ उसके चेहरे की आभा से पूरा कमरा रोशन हो रहा है. सिर से पांव तक कोई लहर उठी है मेरे भीतर. अंबर जब गहरी नींद में होता है, कितना प्यारा लगता है. उसकी भौंहें, पलकें, नाक, होंठ सब कुछ तो वैसा ही है, मुझे बांध लेने को आतुर. बाहर से आती बारिश की आवाज़ भीतर की तरंगों में लयबद्ध हो रही है. मैंने झुककर अपनी शुष्कता को उसके होंठों पर धर देना चाहा है, हम दोनों को अब रतिराग में भीग जाना है. मगर मेरे छूते ही अंबर की घबरायी सी देह में हरकत हुई है. उसने अपने होंठों को अपने ही भीतर कस लिया है. मेरे होंठों की जोड़ी उसके होंठों को छूकर भी अछूती रह गई. यह कैसा भय है? किससे बचने में अंबर ने अपनी देह को इस तरह कस लिया है? अंबर की देह अवनि की छुअन भूल गई है? क्या सब कुछ यंत्र बद्ध हो गया है?
मैं प्यास, तड़प, बेचैनी, शुष्कता, उदासी, खामोशी, खालीपन और जो कुछ भी कठोर, रूखा, बोझिल हो सकता था सबको समेटकर बाहर आ गई हूँ.
थोड़ी ही देर में दिन चढ़ने लगेगा, मुझे दिन भर की तैयारी करनी है. पाँच बजे बेटी के लिए कॉफी बनानी है. उसकी नींद भगाने और ध्यान लगाकर पढ़ने के लिए उसे इसकी जरूरत होती है. खाना बनाना है, कपड़े इस्त्री करने हैं. बाहर बारिश की आवाज़ और तेज हो गई है. बारिश तेज हुई तो शायद ड्राइवर समय से न पहुंच पाए. बेटा बरसाती पहनकर गया होगा कि नहीं. आज दिन के पहले हिस्से में ही मीटिंग है, उसकी तैयारी करनी है. मुझे दफ्तर जल्दी पहुंचना है.
बेटा, बेटी घर, दफ्तर के बारे में सोचते और रसोई की खटपट के बीच मैं याद करने की कोशिश कर रही हूँ कि आखिर छाता कहाँ रख दिया.
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23 वर्षों तक मीडिया समूहों के साथ पत्रकारिता करने के बाद अब ‘राष्ट्रीय पुस्तक न्यास’ के साथ सह-संपादक. प्रकाशित कृतियाँ – उपन्यास ‘ख्वाहिशों के खांडववन’ (सामयिक प्रकाशन), तीन कहानी संग्रह ‘क्लीन चिट’, ‘ग़लत पते की चिट्ठियाँ’ (भारतीय ज्ञानपीठ) एवं ‘नये घर में अम्मा ‘ (सेतु प्रकाशन), सांस्कृतिक शोध आलेख संग्रह ‘आस्था की अर्थव्यवस्था – मंदिरों के शहर जम्मू में’. कथा सप्तक – सात चुनिंदा कहानियों का संग्रह (शिवना प्रकाशन) पुरस्कार – कहानी संग्रह ‘क्लीन चिट’ पर 8वां ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार (2014), ‘झीनी-झीनी बिनी रे चदरिया’ पर कलमकार सम्मान (2015), राजधानी के भीतर बाहर कहानी पर राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान (2016), उपन्यास ‘ख्वाहिशों के खांडववन’ पर शिव कुमार मिश्र स्मृति सम्मान (2018) yogitanbt@gmail.com |

योगिता यादव


कहानी ने एक स्त्री के उन अनकहे लफ्ज़ो, जज़्बातों को छुआ है जिसे वह तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी जीना चाहती है। ये किसी एक घर की कहानी नहीं लगभग हर घर की कहानी होगी जिसमें औरतें समझती हैं कि सिर्फ जिस्म को छू लेना प्रेम नहीं होता। भावनाओ से भरा ज़रा सा स्पर्श ऊर्जा से भर सकता है। उम्र बढ़ने से प्यार घटता नहीं है बस व्यस्तताएं उन्हें जकड़ लेती हैं।
कहानी बहुत अच्छी लिखी है आपने।
बहुत मार्मिक आख्यान…अविस्मरणीय रचनात्मक अवदान के लिए योगिता को बधाई। ऐसे जरुरी विषयों पर कहानीकार ने बोल्ड कलम चलाई है। हिंदुस्तान के लगभग हर घर की अनकही दास्तान।
रजनी गुप्त
बहुत कम शब्दों में लिखी ख़ूबसूरत कहानी।बधाई योगिता जी
यह कहानी यदि रंग बचे हों तो शेष खुशबुओं के हो सकने का एतमाद तो देती है, लेकिन हवाओं की कम संभावना से फिलहाल निराशा की एक गाथा का ज्ञापन जैसा बन गई है। उधर प्रस्तुति में जो इंट्रो देते समय यह कहा गया है कि “जोड़े को जोड़े रखने वाला स्नेहिल द्रव्य सूखता जा रहा है” मेरे विचार में यह भी आदम प्यास और बायोलॉजिकल लॉन्गिंग्स पर एक सख़्त टिप्पणी जैसा है।
अवनि ने ख़ुद के अन्तर्पुर की पोशीदा बातें तो खूब ज़ाहिर की पर अंबर के मन की तह जरा भी नहीं खोली। इसीलिए आख्यान का वितान उतना खुल भी नहीं पाया और पसर भी नहीं सका, जितना उसे विस्तार मिलना चाहिए था। रचना में गुह्य चीजों का खुलासा या वर्जनाओं का अतिक्रमण ज्यादा मायने नहीं रखता, बल्कि रचना संसार तो असली संसार से बहुत भिन्न होना भी नहीं चाहिए।
मैं तो कहूंगा कि योगिता ने इस कथा को रचते समय अवनि के मन की व्यथा के बहाने एक पूर्वाग्रह को जस्टिफाई करने का जतन किया है। नहीं तो, जहां कहानी खत्म हो रही है : बेटा बेटी घर, दफ़्तर के बारे में सोचते और रसोई की खटपट के बीच में याद करने की कोशिश कर रही हूं कि आखिर छाता कहां रख दिया — वहीं से कहानी फिर से शुरू हो सकती थी, पाठकों की तस्कीन की ख़ातिर !
फिर भी कहानी का स्वाद कुछ नया और अलहदा है।
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स्त्रियों के अनकहे को कहने का साहस , सुंदर अभिव्यक्ति
हमारे आसपास लिखने के लिए इतने जरूरी विषय हैं, जिन पर लिखा जाना चाहिए। योगिता जी की इस तरह की यह दूसरी कहानी मैंने पढ़ी है। भौतिक जरूरतों और बदलती जीवनशैली के कारण हम सभी की दिनचर्या बदल गई है और मानसिक तनाव ने रिश्तों की भावनात्मक निकटता को भी प्रभावित किया है। इस लिहाज से यह कहानी लगभग हर युगल को अपने अनुभवों से जोड़ती है।
स्वाभाविक शारीरिक जरूरत को वर्षा के रूपक के साथ जोड़कर, उपयुक्त शीर्षक के साथ लिखी गई यह एक बहुत अच्छी कहानी है।
बच्चों के अलिखित बँटवारे का प्रतीक भी खूबसूरती से उभरता है। अवनि की पहल और अंबर की भावनात्मक दूरी पर सहज विश्वास होता है। जीवनशैली और मानसिक तनाव के अलावा अंबर पर किसी तरह का शक़ पाठक के मन में नहीं आता। यही बात कहानी को अधिक विश्वसनीय और प्रभावी बनाती है
बस कहानी नहीं…यह एक सच है। तकलीफ के भीतर से होकर एक बार फिर गुजरने की तरह। इस तरह भी मरना होता है। एक-दूसरे को मारते हुए।
बहुत प्यारी कहानी. योगिता जी के पास मानव मन की भीतरी तहों को समझने और अभिव्यक्त करने का अद्भुत कौशल है. छोटी मगर बड़ी कहानी इसी को कहते हैं. यह कहानी लेखकीय संयम के सौंदर्य की भी कहानी है। अच्छी कहानी के लिए योगिता जी को बधाई और आदरणीय अरुण देव जी का आभार.
बहुत खूबसूरत कहानी बङी मासूमियत से बुनी गई,नाजुक जज्बात को बड़ी बारीकी से कैनवास पर उतारा गया है।इत्ती प्यारी कहानी लिख ने के लिए बहुत बधाई और शुभ कामनाऐं
जिंदगी का यथार्थ लेखिका ने बहुत खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया है। सचमुच एक पत्नी को घर में उपस्थित हर चीज पर बारीकी से नज़र रखनी होती है। उसे अपने लिए भी कुछ समय इन व्यस्तताओं में भी चुराना होता है।
जीवन की वास्तविकता को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है. यह हर घर की, घर-घर की कहानी है जिसमें बड़े होते बच्चों के बीच रिश्तों की भावनात्मक निकटता प्रभावित होती है. सुन्दर कहानी के लिए योगिता जी को बहुत-बहुत बधाई…
बहुत अच्छी कहानी …. एक बार पढ़कर याद रह जाने वाली
योगिता यादव जी की यह कहानी जीवन की परते खोलती है, बच्चो के बड़े होते – होते अपने स्व का विलय होने लगता है । हर दाम्पत्य जीवन में ऐसा ही घटित होता है । शिल्प भी बहुत सुंदर और सराहनीय है ।
बहुत सुंदर कहानी। कहानी पढ़ते हुए आप दाम्पत्य जीवन के सच को पाते हैं। ये कहानी ऐसी दुनिया रचती है जो हमारे आस पास है। उम्र और रिश्तों की इतनी बारीक पकड़ अमूमन कहानियों में कम दिखती है। इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे इस्मत आपा की कहानी याद आई। प्रेम कैसे देह से निकलकर दुनियावी जीवन में खो जाता है। बधाई हो यार
‘छाता का न मिलना’ जैसे मामूली बात ने साधा है कहानी का विन्यास। सुंदर।
पढ़ते हुए बार- बार उस पन्ने के खुलने का इंतज़ार- सा रहा जिसका नाम अंबर था।
बधाई योगिता.
कहानी के ‘लोक-लुभावने ‘दृश्यों को उजागर न करते या यह कहो कि उसे फांदकर तुमने जो रचा है वह तुम्हारी रचना संभावना और तुम्हारी गहराई की मिसाल देता है. स्त्री -मन की एक सशक्त कहानी है.
पुनः बधाई और शुभकामनायें.
शीला रोहेकर.
वाह, बहुत ही नाज़ुक मोड़ से गुजरती हुई यह कहानी अधिकाशं भारतीय दाम्पत्य की दास्तानगोई है. बड़े करीने से स्त्रीमन के स्वाभाविक ज़ज्बातों के उतार – चढाव को उकेरा गया है. बच्चों का धीरे-धीरे बड़ा होना, कमरों का बंटवारा, अंबर की अपनी अलहदा दुनिया, घर परिवार की जिम्मेदारियां, रसोई, ऑफिस आदि दैनिक जिंदगानी के भंवर में उलझी माननीय भावनाओं को अवनि के माध्यम से व्यक्त किया गया है. इस कहानी के बहाने एक अछूते विषय को स्पर्श करने का बेहतरीन प्रयास है यह. कहानी पाठकों को अंत तक बांधे रखती है. कहानी भले ही छोटी लग रही हो मगर इसका कॅनवास बृहद है.
इस संवेदनशील कहानी के लिए योगिता जी को बधाई और शुभकामनाएं.
डॉ. रमेश यादव, मुंबई.