| साही की संपूर्णता मयंक |
विजयदेव नारायण साही हिंदी साहित्य के इतिहास के एक विशिष्ट कवि, आलोचक और साहित्य चिंतक हैं. स्वतंत्र भारत के हिंदी साहित्य और आलोचना पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा है. हिंदी साहित्य के विभिन्न प्रसंगों और विवादों से गुजरते हुए साही का नाम हमसे अनायास ही टकरा जाता है. लेकिन, साही की रचनाओं की अनुपलब्धता और उन पर किसी व्यवस्थित पुस्तक के अभाव में उनके लेखन और जीवन से हमारी और हमसे पहले की पीढ़ी ठीक-ठाक अपरिचित है. ऐसे में हम ऐसी विडम्बनापूर्ण स्थिति में हैं जिसमें हम साही को बिल्कुल भूल पाए न ही ठीक से जान पाए.

पिछले वर्ष प्रकाशित आलोचक आनंद पांडेय की आलोचना पुस्तक ‘आशंकाओं के द्वीप में लघुमानव : साही साखी’ हमें इस विडम्बना की स्थिति से उबारने की सराहनीय कोशिश करती है. ऐसा नहीं है कि साही पर खोजबीन करने पर कोई सामग्री नहीं मिल सकती है लेकिन वे सब उनको एक साथ, एक प्रबंध में पूर्णता में नहीं पा पाती हैं. दूसरे अब पूर्वलिखित सामग्री प्रायः बासी प्रतीत होती हैं. देश के मौजूदा संकट और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में साही की विचारधारा, राजनीतिक संघर्ष, सृजनात्मक मूल्यों और आलोचनात्मक मानों पर नये और समकालीन दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता भी अनुभव होती रही है. अंधाधुंध गैरकांग्रेसवाद, दक्षिणपंथ की मोनोपली से लोहिया का समझौता और मार्क्सवाद से परहेज जैसी तमाम मान्यताओं को नए सिरे से देखने और समझने की जरूरत शिद्दत से महसूस होती है. आनंद पांडेय ने इसी विस्तृत परिप्रेक्ष्य में साही का सामयिक और अभिनव पाठ किया है. उनकी कोशिश साही को संपूर्णता में पाने की रही है, उन्हें सामयिक परिप्रेक्ष्य में फिर से रखकर देखने की रही है.
इस संपूर्णता की प्राप्ति की कोशिश आनंद पांडेय के इन शब्दों में दिखती है जो वे साही का परिचय देने के क्रम में बीजरूप में सामने रखते हैं, “विजयदेव नारायण साही हिंदी के महत्वपूर्ण कवि, अनुपेक्षणीय आलोचक, क्रांतिधर्मी राजनीतिज्ञ, यथार्थवादी विचारक और अंग्रेजी साहित्य के विद्वान आचार्य थे. वे हिंदी जातीयता और साहित्य के प्रतिनिधि बुद्धिजीवी थे. उत्तर उपनिवेशवादी दौर में वे साहित्य और कलाओं की भूमि और भूमिका की खोज और पहचान के लेखक-विचारक थे. वे पश्चिमी वर्चस्ववाद के विरुद्ध एशियाई चेतना के प्रवक्ता और मानव की सार्वभौमिक एकता के पक्षधर थे.” साही के कवि – आलोचक की रूढ़ छवि को तोड़कर आनंद पांडेय उन्हें साम्राज्यवाद विरोधी, और एशियाई चेतना के प्रतिनिधि बुद्धिजीवी के रूप में स्थापित करते हैं. इससे पता चलता है कि आनंद पांडेय उन्हें कितने बड़े फलक पर देखते हैं. वे उनकी वैचारिकी और सरोकारों की सार्वभौमिकता को सामने लाते हैं.
इसके अतिरिक्त, मुझे इस किताब में साही की संपूर्णता की तलाश इसलिए भी दिखती है क्योंकि उनके कर्म की विविधता और बहुआयामिकता के सभी रूपों को पकड़ने की कोशिश की गयी है. वे लिखते हैं, “आलोचन, सृजन, राजकर्म और अध्यापन के चौराहे पर खड़े साही अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर हर दिशा में दूर-दूर तक गए.” आनंद पांडेय ने साही के चौमुखे रूप को पूरी किताब में जानने-समझने की कोशिश की है. इसीलिए इस किताब को उन्होंने ‘जीवनपरक’, ‘कवितापरक’, ‘आलोचनापरक’ और ‘जायसीपरक’ के चार खंडों में विभक्त करके लिखा है.
‘जीवनीपरक’ खंड के ‘वह मामूली आदमी नहीं था’ नामक पहले अध्याय में आनंद पांडेय ने साही की जीवनी की समस्या को उठाया है और उनकी कविता और आलोचना पर विचार करने की दिशा में उसके महत्त्व को असन्दिग्ध बताया है. यहाँ आनंद पांडेय ने लेखक के जीवन को उसके रचना-संसार से जोड़कर देखने के सिद्धांत को स्वीकार किया है. जाहिर है, वे लेखक से रचना की स्वायत्तता के सिद्धांत को खारिज न करते हुए भी लेखक और रचना के परस्पर सम्बन्ध को महत्त्व देते हैं. एक जगह वे लिखते हैं, “उनके लेखन के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व और जीवन-प्रसंग भी दुर्धर्ष जिजीविषा और उद्दाम संवाद-बहसधर्मिता का रूपक रहा है. विचार को जीने का नैतिक दायित्वबोध उनके जीवन को इस इस रूप में प्रभावित करता है कि उनके साहित्य को समझने के क्रम में उनका जीवन भी एक परिचय के लिए आमंत्रित करता है.” एक तरह से वे रचना को रचनाकार के व्यक्तित्व का प्रस्फुटन मानते दिखते हैं. इसीलिए वे लिखते हैं कि साही के रचना और आलोचना संसार को समझने के लिए उनके जीवन को समझने या कम से कम उससे परिचित होने की विवशता अनुभव होती है. इसी विवशता से पार पाने के क्रम में वे साही की जीवनी की अनुपलब्धता से उपजी समस्या को हल करने की दिशा में स्वयं लगते हैं. इस लगन का फल है कि पचपन पृष्ठों में उन्होंने साही की बुनियादी जीवनी लिखी है. भले ही यह पुस्तकाकार न हो लेकिन पर्याप्त अवश्य है. जीवनीकार ने शोध और लेखन शैली की उलझन को हल कर लिया है. यदि थोड़ी सी भी रुचि लेंगे तो वे साही की एक विस्तृत और पुस्तकाकार जीवनी लिख सकते हैं.
साही की जीवन रेखा को वे उनके पूर्वजों से लेकर आत्मजों तक के उपलब्ध बिंदुओं से जोड़कर अत्यंत पठनीय और प्रामाणिक जीवनी प्रस्तुत की है. यह जीवनी इसलिए भी सधी हुई लगती है कि यह केवल साही के जीवन से जुड़े तथ्यों का संग्रह नहीं है बल्कि साही के समय, समाज और उनके जीवन-संघर्ष की बेहद विचारोत्तेजक पड़ताल भी है. यह साही के व्यक्ति और मानस की निर्मिति को समझने की कोशिश करती है. आनंद पांडेय मानते हैं, “किसी रचनाकार की जीवनी उसकी वैचारिक जीवनी भी होनी चाहिए. क्योंकि उसके जीवन की राहें विचार के प्रभाव में बदलती रहती हैं. वह विचारों से अपने जीवन को परिभाषित करता है.”
मित्र-प्रसंग में आनंद पांडेय ने साही की मित्र मंडली और परिमल-मंडली पर बहुत विस्तार से लिखा है. पहला मित्र प्रसंग नामवर सिंह के साथ है. आनंद पांडेय साही-नामवर के आपसी संबंधों को भगवतीचरण वर्मा की कहानी ‘दो बाँके’ के रूपक के माध्यम से खोलते हैं. वे दोनों के बीच कई रोचक समानताओं को रखते हैं. वे लिखते हैं कि दोनों बनारसी थे, दोनों राजनीतिक कार्यकर्ता थे, दोनों लोकसभा के चुनाव लड़े, दोनों चुनाव हारे, उसके बाद दोनों अध्यापकी में निमग्न हुए और दोनों हिंदी आलोचना में चरमोत्कर्ष तक गए. साही और नामवर सिंह समकालीन थे. नामवर सिंह ने ‘पाखी’ पत्रिका में प्रकाशित एक साक्षात्कार में साही को अपना पसंदीदा आलोचक बताया है.
आनंद पांडेय ने एक रोचक पक्ष की ओर ध्यान खींचा है जो संभवतः काफी विवादास्पद हो सकता है. वे लिखते हैं, “नामवर सिंह जैसे उनके कुछ मित्र वैचारिक रूप से विरोधी खेमे के होने के बावजूद मित्र रहे. साही ने नामवर सिंह के लेखन को शायद ही कभी संदर्भित किया हो जबकि नामवर सिंह साही के लेखन को बेहद गम्भीरता से लेते हैं. नयी कविता पर केंद्रित उनकी किताब ‘कविता के नये प्रतिमान’ का नाम साही के ही एक कथन से लिया गया है. इस किताब में उन्होंने साही को बार बार संदर्भित और उद्धृत करके अपने विवेचन को आगे बढ़ाया है.” आनंद पांडेय ने ‘लघुमानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’ के एक अंश में संयोग से अधिक साम्य देखा है. वे लिखते हैं, “कविता के प्रतिमान’ में नामवर सिंह ने लगभग एक पृष्ठ तक साही के विवेचन की पैरफ़्रेजिंग और पल्लवन किया है. निकट से देखने पर इससे साही की आलोचना की शक्ति का पता चलता है.” हालांकि आनंद पांडेय ने नामवर सिंह पर इस अंश के चोरी का आरोप नहीं लगाया है लेकिन उन्होंने जो कुछ लिखा है उसका आशय उनके शब्दों के चुनाव से अधिक जाता है.
साही अपने समय में नयी कविता के मुखर प्रवक्ता और सृजनशील कवि थे. वे छायावादी कविता का जबरदस्त विरोध करते थे. उनका मानना था कि छायावाद का समय जा चुका है. इस समय तक प्रसाद और निराला नहीं रहे थे. सुमित्रानंदन पंत छायावादी कविताएँ लिखे जा रहे थे. साही पंत से अक्सर भिड़ते रहते थे. आनंद पांडेय ने इस पीढ़ीगत संघर्ष का अच्छा ब्यौरा दिया है. एक बार ‘परिमल’ की गोष्ठी में पंत की मौजूदगी में साही ने कहा कि उन्होंने पंत का कविता संग्रह ‘चिदम्बरा’ न पढ़ा है और न पढ़ेंगे. पंत इससे काफी आहत हुए. साही ने माहौल बिगड़ते देख अपने कथन से ‘नहीं पढूँगा’ उपवाक्य निकाल दिया. फिर भी ‘परिमल’ लंबे समय तक डिस्टर्ब और आंदोलित रहा.
आनंद पांडेय ने एक प्रतिबद्ध शोधार्थी की तरह साही के तमाम अज्ञात पक्षों को सामने लाया है और उससे उनके व्यक्तित्व को जीवंत और गतिशील बनाया है. ऐसा ही एक अज्ञात पक्ष उनके संस्कृतिकर्मी रूप का है. आनंद पांडेय ने लिखा है, “नाट्यलेखन, अभिनय, और नाट्य समीक्षा में ही उनकी दिलचस्पी नहीं थी बल्कि वे एक रंगकर्मी की भूमिका में भी खुद को रखते थे.” इस जीवनी से यह भी पता चलता है कि अज्ञेय के कविता संग्रह ‘आँगन के पार द्वार’ का नाम साही के घर के ही बिम्ब पर आधारित है.
‘आशंकाओं के द्वीप में लघुमानव: साही साखी’ का दूसरा खंड ‘कवितापरक’ में उन्होंने साही के काव्य संसार की बड़ी विस्तृत आलोचना की है. इसी अध्याय के नाम पर किताब का नाम रखा गया है. इसमें आनंद पांडेय किसी बड़े कवि के सम्पूर्ण रचना कर्म को एक साथ पढ़ने पर उसे समझने के लिए औपन्यासिक टेक्नीक की जरूरत रेखांकित करते हैं. वे लिखते हैं, साही के सभी संग्रहों की सभी कविताओं “पर एक साथ विचार करने पर इन्हें समझने के लिए औपन्यासिक प्रविधि मुझे सहज ही सूझी. क्योंकि निरन्तरता में पढ़ने पर ये कविताएँ स्वतः भाव-सूत्रों और कथा-सूत्रों में अन्तर्गुम्फित हो जाती हैं. असंबद्ध और स्वतंत्र होते हुए भी ये मिलकर एक रचना हो जाती हैं.” हालांकि यह एक विवादास्पद स्थापना हो सकती है. लेकिन इस टेक्नीक का ही उपयोग करके आनंद पांडेय साही की कविताओं को एक अन्विति और आख्यान के रूप में पढ़ते हैं और अपनी आलोचना के माध्यम से इन कविताओं को एक आख्यान के रूप में रखते भी हैं. साही को उद्धृत करते हुए आनंद पांडेय कहते हैं कि स्वयं साही अपनी कविताओं को एक ‘अनंत कथा’ कहते थे.
आनंद पांडेय ने साही को ‘ट्रैजिक विजन’ का कवि कहा है. वे मानते हैं कि मुक्तिबोध की तरह साही ने भी फैंटेसी की प्रविधि का इस्तेमाल किया है. उनकी सूझ है कि इस फैंटेसी की प्रविधि के माध्यम से ही साही उस ट्रेजेडी को अभिव्यक्त करते हैं जो सभ्यता की हार का रूपक है. साही की ‘अगाध द्रष्टा, बर्बर और तीसरा’ कविता को उद्धृत करके पांडेय यह दिखाते हैं कि मनुष्यों ने पृथ्वी को इक्कीस बार जीता और अपने प्रमाद से हर बार इसे बर्बरों को सुपुर्द कर दिया. तब से बर्बर सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने में जी-जान से लगे हैं. उन्होंने नगरों से बाहर अपने शिविर बना रखे हैं. इन्हीं शिविरों से निकलकर वे रात में सभ्य जनों पर हमले करते हैं. पांडेय ‘वे’ कविता से बर्बरों की पहचान करते हुए लिखते हैं, “वे’ कविता में बर्बरों की बड़ी भयावह और दुर्दांत पहचान हुई है. बर्बर नवजात सभ्यता को नष्ट कर देना चाहते हैं.”
ये बर्बर कौन हैं? साही इसे प्रतीक में ही बने रहने देना चाहते हैं. उसे किसी सामयिक सत्ता या राजनीतिक शक्ति या सामाजिक संरचना के रूप में नहीं खोलते हैं. साही की इस दृष्टि से दो अर्थ निकलते हैं – एक यह कि साही कविता में सामयिक समस्याओं को राजनीतिक विमर्श के रूप में नहीं बल्कि सभ्यता विमर्श के रूप में रखते हैं. दूसरा यह कि साही जिन समस्याओं से आक्रांत हैं और जिनसे उनका काव्य नायक ‘मैं’ जूझ रहा है उनका अमूर्तन करते हैं. अमूर्तन का यह आरोप पांडेय तर्कों के साथ सिद्ध करते हैं.
आनंद पांडेय उनकी कविताओं के अमूर्तन के प्रसंग में एक और पहेली या उलझन का जिक्र करते हैं. वह यह कि साही सक्रिय राजनीति में थे. दलीय राजनीति की तमाम समस्याओं और अनैतिकताओं को उन्होंने करीब से देखा था फिर भी उन्होंने राजनीतिक कविताएँ नहीं के बराबर लिखी हैं. वे इन समस्याओं को शाश्वत प्रतीक में रखते हैं. जिनसे भावनात्मक जागरूकता तो होती है लेकिन कालबद्ध विवेक का पता मुश्किल से चलता है.
आनंद पांडेय दिखाते हैं कि साही की कविताओं को पढ़कर मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता की याद आती है. ‘अंधेरे में’ के नायक जैसा ही एक नायक साही की कविताओं में अक्सर आता है जिसे वे ‘मैं’ के रूप में रखते हैं. वैसे ही डरावने अंधकारपूर्ण दृश्य हैं, रातें आतंकमयी हैं. लेकिन मुक्तिबोध का कहीं कोई जिक्र साही के लेखन में नहीं मिलता है. आनंद पांडेय ने किताब का शीर्षक बड़ा ही रचनात्मक रखा है. इसमें मुक्तिबोध और साही के साम्य की मौन स्वीकृति है. यह विदित है कि मुक्तिबोध ने ‘अंधेरे में’ कविता का पहले नाम ‘आशंकाओं के द्वीप’ रखा था. मुक्तिबोध के इसी द्वीप में आनंद पांडेय ने साही के ‘लघुमानव’ को बसा दिया है. फलतः लघुमानव का नायक ‘मैं’ वैसे ही मध्यवर्ग को धिक्कारता है जैसे ‘अंधेरे में’ का नायक. वह वैसे ही शत्रुओं के आसन्न हमले से आक्रांत हो अकेले उनसे लड़ने और उनकी असलियत को देख लेता है जैसे ‘अंधेरे में’ का नायक. पांडेय के इस विश्लेषण और साही की मुक्तिबोधीय ‘आशंकाओं’ पर अगर और विचार किया जाए तो एक ही समय के लगभग विरोधी विचारधाराओं के दो कवियों के युगबोध के साझे सत्य को अधिक स्पष्टता के साथ समझा जा सकता है.साही अपने जीवित रहते कवि के रूप में अधिक जाने गए जबकि मरने के बाद उनकी आलोचना की चर्चा कविताओं से अधिक होती है. इसी बिडम्बना के उद्घाटन के साथ उन्होंने साही की कविता की दुनिया से निकलकर आलोचना की दुनिया में प्रवेश किया है.
‘आलोचनापरक’ खंड के अध्याय का नाम है ‘साही की आलोचना का दर्शनशास्त्र.’ आनंद साही को ऐसे साहित्य चिंतक के रूप में देखते हैं जो वर्चस्ववादी सौन्दर्याभिरूचि के देशी-विदेशी सभी रूपों का विरोधी है और लोकजीवन के सत्त्व को पुनर्जीवित करने पर बल देता है. संस्कृत, अंग्रेजी और फ़ारसी साहित्यशास्त्र के अनुगमन के बजाय साही ब्रजभाषा की लोकपरम्परा से हिंदी आलोचना को जोड़ने का प्रयत्न करते हैं, इसे वे तीसरा रास्ता कहते हैं.
साही साहित्य के स्वधर्म के रक्षक थे. वे साहित्य और साहित्यकार की पूर्ण स्वाधीनता के पैरोकार थे. उन्होंने विचारधारा और पार्टीबन्दी से साहित्य को ऊपर रखने की नीति स्वीकार की. इसीलिए मार्क्सवादी आलोचना से साही का भयंकर संघर्ष हुआ. आनंद पांडेय ने इस संघर्ष के कारणों और इसमें साही की भीषण बौद्धिक तैयारी का विस्तृत परिचय दिया है. लेकिन उनका ध्यान संघर्ष के पहलुओं के साथ-साथ समन्वय पर भी रहा है. पांडेय यह दिखाते हैं कि साही मार्क्सवाद से प्रभावित भी थे इसीलिए कुछ आलोचक उन्हें ‘कुजात मार्क्सवादी’ कह गए हैं.
आनंद पांडेय ने साही को आज़ादी के बाद के भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक जरूरतों के अनुरूप साहित्य की भूमि और भूमिका को परिभाषित करने वाले लेखक के रूप में परखा और पहचाना है. वे मानते हैं कि साही को समझे बिना आजादी के बाद के साहित्यिक विकास को नहीं समझा जा सकता है. मार्क्सवादी और गैर मार्क्सवादी – जिनमें कलावादी, गांधीवादी, रूपवादी, लोहियावादी इत्यादि – सभी वाद प्रभावित साहित्यकारों पर साही का गहरा प्रभाव पड़ा था. मार्क्सवाद – प्रगतिवाद विरोधी साहित्यधारा द्वारा स्वीकृत विचारों को व्यवस्थित और तर्कसंगत बनाने का काम साही ने ही किया है. इसलिए वे आज़ादी के बाद के सबसे प्रभावशाली साहित्य विचारक के रूप में साही को देखते हैं.
आनंद पांडेय यह स्वीकार करते हैं कि साही भले ही जायसी के अलावा किसी बड़े लेखक पर ठोस काम नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने हिंदी साहित्य के विकास पर गम्भीर और अन्तर्दृष्टिपूर्ण चिंतन मनन किया है. भक्तिकाल से लेकर नयी कविता तक के इतिहास पर उनकी बारीक समझ है. उनके लेखों में इसे देखा जा सकता है. आनंद दिखाते हैं कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘लघुमानव’ की अवधारणाओं के माध्यम से साही ने हिंदी साहित्य परम्परा की गहरी पड़ताल की है. आनंद यह दिखाते हैं कि कबीर को लेकर साही में गहरे अंतर्विरोध हैं. जहाँ वे कबीर को गुरु मानकर उनसे प्रार्थना की कविता लिखते हैं वहीं वे कबीर की कविता और जीवन दर्शन को बेहद घिसी-पिटी दृष्टि से देखते हैं. उनकी कबीर की समझ को आनंद कच्ची कहते हैं. वे मानते हैं कि साही की वैचारिकी कबीर की तरह संघर्षपरक नहीं बल्कि जायसी की तरह समन्वयपरक है.
आनंद दिखाते हैं कि साही की दृष्टि में हिंदी का केवल एक आलोचक प्रतिमान की तरह है – वह रामचन्द्र शुक्ल हैं. वे उन्हीं से भिड़ते और टकराते हैं. आनंद ने शुक्ल से साही के टकराव और संवाद की अच्छी परख की है. वे शुक्ल से अभिभूत भी हैं लेकिन उनसे उतने ही असहमत भी हैं. वे दिखाते हैं कि साही हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने को अपने जीवन का सबसे बड़ा साहित्यिक ध्येय रखते थे.
अपने अंतिम दिनों में साही जायसीमय हो गए थे. जिसके फलस्वरूप मलिक मुहम्मद जायसी और उनके काव्य पर ‘जायसी’ नामक पुस्तक सामने आती है. इस पुस्तक ने हिंदी आलोचना में जायसी दृष्टि को बदलने की कोशिश की. आनंद पांडेय ने ‘साही के जायसी’ नाम से इस पुस्तक में एक स्वतंत्र अध्याय लिखा है. इसमें जायसी की शुक्ल-समीक्षा की साही पड़ताल को भी समझा गया है. आनंद पांडेय मानते हैं कि विचारधारा विहीनता के अति आग्रह में साही जायसी के सूफी दृष्टिकोण को खारिज करते हैं जबकि कविता का धर्म-दर्शन और विचारधारा से विरोध का संबंध नहीं होता है. वे मानते हैं कि साही ने मनुष्य की रचनाशीलता को उसकी आस्था के विरोध में रखा है, इसलिए जायसी की सूफी विचारधारा उन्हें दिक्कततलब लगती है और वे उससे उनकी कविता को मुक्त करने की असफल कोशिश करते हैं.
इस अध्याय में साही से पांडेय की असहमतियाँ दूर तक जाती हैं. वे सिद्ध करते हैं कि विचारधारा विहीनता की दृष्टि से जायसी ही नहीं, हिंदी साहित्य के किसी भी कवि का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है. आनंद पांडेय लिखते हैं, “जायसी के लिए कविता में धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टि का उन्मीलन सहज है. ‘पद्मावत’ में आस्था और कवित्व की घोषणा और प्रतिफलन एक साथ हैं.” लेकिन साही कवित्व की घोषणा तो स्वीकार करते हैं जबकि आस्था की घोषणा को उपेक्षित करते हैं. इस संदर्भ में पांडेय साही की जायसी सम्बन्धी मान्यताओं का सार प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं, “असल में साही जायसी के गहरे प्रेम में थे. उनकी कविता से चमत्कृत थे. इसलिए वे उनकी कविता का वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने से अधिक उसके अर्थविकास और संरक्षण की भावना से चालित होते हैं. इस मार्ग में जो बात उन्हें आड़े आती हुई प्रतीत हुई उसे उन्होंने हर हिकमत से दूर करने का प्रयत्न किया. साही बालाघात की इस शैली से जिस बात पर बल देना चाहते थे उस पर बल देकर अपना मन्तव्य सफलतापूर्वक अभिव्यक्त कर पाए. वह मन्तव्य था– ‘पद्मावत’ को सूफी और इतिहास ग्रंथ की तरह न पढ़कर, काव्य की तरह पढ़ा जाय; जायसी को एक सूफी पीर की तरह नहीं बल्कि एक कवि के रूप में पढ़ा जाय. आलोचना में इस बल का मनोवैज्ञानिक और सौंदर्यशास्त्रीय अर्थ है.”
साही अध्ययन में आनंद पांडेय की यह किताब एक जरुरी किताब के रूप में सामने आती है. रचनात्मक और ताज़ी भाषा में उन्होंने साही के जीवन, सृजन और आलोचन का पठनीय, प्रामाणिक और सर्जनात्मक अनुशीलन – मूल्यांकन किया है. जिस सहजता और सरलता से वे जटिल से जटिल बिंदुओं को ग्राह्य बनाते हैं वह उन्हें एक बेहतर आलोचक के रूप में देखने के लिए विवश करती है.
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