• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » एआई और कला : सारंग उपाध्याय

एआई और कला : सारंग उपाध्याय

एआई जीवन के लगभग हर क्षेत्र में न केवल प्रवेश कर चुकी है, बल्कि कई स्तरों पर उसे नियंत्रित भी करने लगी है. उसने कला के सभी प्रारूपों को गम्भीर रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है. यह स्थिति एक साथ सुविधा भी है और संकट भी. आज के इस संक्रमणकालीन क्षण में तकनीक की कृत्रिम मेधा और मानवीय सृजनशीलता का विवेक आमने-सामने खड़ा दिखाई देता है. भविष्य का स्वरूप काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इस मुठभेड़ को नैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर किस प्रकार आकार देते हैं. सारंग उपाध्याय निरन्तर एआई की संभावनाओं और चुनौतियों पर लिखते रहे हैं. यह आलेख उसी कड़ी में कला के साथ एआई के जटिल रिश्तों पर केन्द्रित है. प्रस्तुत है.

by arun dev
February 8, 2026
in विज्ञान
A A
एआई और कला : सारंग उपाध्याय
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
एआई और कला
चुनौतियाँ और संभावनाएँ
_________________
सारंग उपाध्याय

कला भीतर की अभिव्यक्ति है. आत्मा का आलाप. मनुष्य के अंतरमन के विचारों की रचनात्मक और सृजनशील कृति. चित्रकला, संगीत, लेखन, नृत्य, फोटोग्राफी, रंगमंच अभिनय सहित वह सबकुछ जो सुंदर और लालित्यपूर्ण है सबकुछ कलाएँ हैं. सारी विधाएँ मनुष्य की कोमल भावनाओं और अनुभवों की गहराई से उपजती हैं. शताब्दियों की यात्रा से कला के इतिहास में मनुष्य ने ऐसा सुंदर संसार रचा है जिसके अवशेष आज भी आनंद और संतोष से भर देते हैं. राजनीतिक चेतना और क्रांति से लेकर मन की शांति तक, आत्मिक खुशी और संतोष से उपजते आनंद तक बहुत कुछ कला ने मनुष्य सभ्यता को दिया है.

कला मनुष्य जीवन में एक साधना की तरह है. दशकों और सदियों की साधना. कठोर श्रम का प्रतिफल जिसने शिल्पकला मूर्तिकला, चित्रकारी, लेखन, संगीत और जानें कितनी दुलर्भ कलात्मक अभिव्यक्तियों को जन्म दिया होगा. आज फिल्म, मीडिया और इंटरनेट पर दर्ज वह सबकुछ जो सुंदर रहा और कला संसार में शामिल हुआ अथक परिश्रम और साधना का ही परिणाम है. मनुष्य के जीवन में कला संसार की यह यात्रा दशकों से अनवरत् है. अंतरमन के भीतर का संसार यहाँ आकार लेता है, लेकिन कला के इस संसार में बीते दो वर्षों में तकनीक के आक्रामक हस्तक्षेप ने वर्षों के परिश्रम को चंद लाइनों के नतीजों में समेट दिया है.

दरअसल आज कला के संसार में एआई का हस्तक्षेप हो चुका है और यह दखल वैसा नहीं हुआ है जैसा कि सरलता से किसी तकनीक का प्रवेश होता रहा है बल्कि यह उग्र ढंग से हुआ है. एक तरह से यह धमकी और चुनौती के बीच की एँट्री है. वैश्विक स्तर पर हर क्षेत्र में प्रवेश पा चुकी कृत्रिम बुद्धिमता कला में एक तरह से समाहित हो चुकी है. आज एआई वह सबकुछ क्षणों और मिनटों में रच सकता है जिसे सीखने समझने और रचकर कला जगत् में उपस्थित करने के लिए किसी मनुष्य को अपने जीवन और आयु के कीमती वर्ष स्वाहा करने होते थे. आज एआई एक प्रोडक्शन हाउस में है संगीत रच रहा है, गा रहा है, एक पूरी फिल्म बना रहा है. किसी आर्ट गैलरी में वह पेंटिंग के साथ उपस्थित है, वह लेखन कक्ष में कहानी, कविता, नाटक रच रहा है और तो और मीडिया में न्यूज रूम में खबरों से लेकर पॉडकॉस्ट, एँकरिंग करते हुए एक अनुभवी मीडियाकर्मी की भूमिका निभाने की ताकत रखता है.

सवाल यह उठता है कि क्या मनुष्य की रचनात्मक और कलात्मक अभिव्यक्ति एक सीमा में कैद होने जा रही है? क्या रचनात्मक और सृजनात्मक चिंतन को तकनीक बंधक बनाने जा रही है? और क्या जिस कला का स्रोत मशीन हो, तो क्या यह कला होगी?

दरअसल, बीते दो से ढाई वर्षों में आज एआई द्वारा निर्मित पेंटिंग, कविता, उपन्यास, संगीत या डिजिटल आर्ट पूरी दुनिया में छाए हुए हैं. सैंकड़ों की संख्या में ऐसे एआई टूल्स मौजूद हैं जो सेकंडों में किसी भी शैली की तस्वीर बना सकते हैं, नए संगीत का ट्रैक तैयार कर सकते हैं, या फिर एक लेख को उसी अंदाज़ में लिख सकते हैं, जैसे कोई अनुभवी लेखक करता है. एक ओर यह बदलाव कला की पारंपरिक परिभाषा को चुनौती दे रहा है तो दूसरी और मौलिकता और कलात्मक अभिव्यक्ति के स्वामित्व को भी संकट में लेकर आ रहा है.

आज लेखक हो या चित्रकार या फिर कोई फोटाग्राफर हर कला के साधक के लिए यह स्थिति द्वंद्वपूर्ण है, विषम है और चिंताजनक है. एक ओर तकनीक उन्हें नई संभावनाओं और प्रयोगों का संसार दे रही है तो वहीं दूसरी ओर यह खतरा भी पैदा कर रही है कि क्या भविष्य में एआई उनकी जगह ले लेगा? क्या दर्शक और श्रोता मशीन द्वारा गढ़े गए कार्यों को उतना ही मूल्य देंगे जितना मानव रचनाओं को?  हाँ संभावनाएँ यहाँ भी है कि है एआई के आने के बाद कोई पेंटर अपनी कल्पना को डिजिटल माध्यम से तुरंत दृश्य रूप में बदल सकता है, या एक लेखक अपने विचारों को तेजी से व्यवस्थित कर सकता है. लेकिन यहाँ जितना बड़ा सवाल मौलिकता का है उतना ही बड़ा प्रश्न है नैतिकता का.

दरअसल प्रश्न यह है कि आखिर किस अधिकार से एआई किसी प्रसिद्ध चित्रकार की शैली की नकल कर चित्र बनाता है और यदि वह बनाता है तो क्या यह बौद्धिक संपदा अधिकार का उल्लंघन है या एक नई रचनात्मकता? और क्या मशीन द्वारा निर्मित कविता या संगीत में वही संवेदनशीलता और गहराई हो सकती है, जो मानवीय अनुभवों से जन्म लेती है? आज कलात्मक क्षेत्र में यह विरोधाभास और नैतिकता का प्रश्न है जिस पर एक लंबी बहस कला जगत में शुरू से चल रही है कि आर्टिफिशल और ओरिजनल का अंतर मशीन समझ पाएगी?  क्या विस्तार के नाम पर कला प्रतिस्थापित तो नहीं हो रही?  क्या लोकतांत्रिकता के नाम पर रचनात्मकता को बंधक तो नहीं बनाया जा रहा?  क्या होगा जब हर व्यक्ति तकनीक से कला रचकर  उस मौलिकता को ही विस्थापित करने की सोचने लगे जिसके लिए एक जीवन, एक आयु, लंबा समय और एक सीमा तक धन कलात्मक साधना में होम  हो जाता है. क्या कला महज़ तकनीकी कौशल और तेज़ उत्पादन की दौड़ में तो नहीं बदल जाएगी? इतनी की किसी संगीत से आत्मा, किसी कहानी से संवेदना और किसी चित्र से भाव ही चले जाएँ.

दरअसल, विवादों, विषमताओं और विरोधाभास के बीच इस बात को स्वीकार करना होगा कि एआई ने कला की परंपरागत् धारणाओं को हिलाकर रख दिया है और प्रत्येक कला साधक को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उसकी कला का असली मूल्य क्या है? क्या वह केवल उत्पाद भर बनकर रह गई है? या फिर रचनात्मक प्रक्रिया?

प्रश्न गंभीर है क्योंकि कला और मनुष्य जीवन के के संबंध अब नए सिरे से परिभाषित होने जा रहे हैं.

 

 

एआई के बाजार में कला और सृजन की कीमत

औद्योगिक क्रांति ने जिस तरह से नए बाजारों को खड़ा किया और मांग और पूर्ति के बीच नई वस्तुओं की श्रृंखला पैदा की ठीक वैसे ही टेक्नॉलॉजी ने बाजार को ही बदलकर रख दिया और आर्थिक संरचना के भीतर नई इकॉनॉमी खड़ी कर दी है. इंटरनेट, मोबाइल, डिजिटल टेक्नॉलॉजी के बाद अब एआई यही कर रहा है. बीते एक दशक में वैश्विक स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि से लेकर समाज और जीवन के हर आयाम में एआई अपने नए तकनीकी औजारों के साथ प्रवेश कर रहा है. नई जरूरतें पैदा की जा रही है और बाजार का विस्तार हो रहा है. कला और मीडिया के क्षेत्र में भी तकरीबन बीत पांच सालों में यही हुआ है. एआई ने विशेष रूप से जनरेटिव एआई के नए तकनीकी टूल्स ने कला क्षेत्र में एक नए बाजार को पैदा किया है.

दरअसल, कला जगत में जनरेटिव आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का प्रवेश अब आकस्मिक प्रयोग नहीं रहा, बल्कि यह एक विकसित होता हुआ वैश्विक उद्योग बन चुका है. कई स्वतंत्र रिपोर्टें बताती हैं कि आने वाले वर्षों में एआई कला न केवल एक तकनीकी परिवर्तन होगी, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक ढांचे को भी पुनर्परिभाषित करेगी.

द बिज़नेस रिसर्च कंपनी की रिपोर्ट Generative artificial intelligence (AI) in art global market report 2024–2029. बताती है कि 2024 में केवल जनरेटिव एआई कला बाजार का आकार लगभग 0.43 बिलियन डॉलर, यानी लगभग ₹3,570 करोड़ था. अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में इसी तकनीक आधारित कला का यह बाजार लगभग 2.51 बिलियन डॉलर, यानी करीब 20,800 करोड़ रुपये तक पहुंचेगा. यह रफ्तार सामान्य विकास नहीं, बल्कि लगभग 42 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर की विस्फोटक उछाल है, जो इस बात का संकेत है कि कला की दुनिया अब वैसी नहीं रहेगी जैसी सदियों से रही है. लेकिन इस बदलाव की गहराई केवल आंकड़ों में नहीं छिपी है, बल्कि इस बात में है कि जनरेटिव एआई कला वास्तव में करती क्या है.

रिपोर्ट बताती है कि एआई से बनने वाली कला केवल चित्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई रचनात्मक क्षेत्रों में सक्रिय है जैसे दृश्य कला, संगीत और साहित्य तक. दृश्य कला की श्रेणी में डिजिटल पेंटिंग, फ़ोटोग्राफ़ी, मूर्तिकला, ग्राफ़िक डिज़ाइन और विभिन्न डिजिटल प्रयोग शामिल हैं, जहाँ मानव के बजाय एल्गोरिदम कल्पना और संरचना के मूल आधार बन रहे हैं. संगीत में एआई अब केवल बीट निर्माण या आवाज़ की नकल नहीं करता, बल्कि सम्पूर्ण ऑर्केस्ट्रेशन, हार्मनी, वोकल पैटर्न और रचना संरचनाएँ तैयार कर रहा है. यह वही क्षेत्र है जहाँ पहली बार कलाकारों को यह भय महसूस हुआ है कि शायद उनके अनुभव, प्रशिक्षण और भावनाएँ अब विशिष्ट नहीं रहीं. साहित्य में यह तकनीक अब कविता, कहानी, पटकथा, संवाद और कॉपीराइटिंग तक रचने लगी है. इससे रचनात्मक जगत में यह मूल प्रश्न उठ खड़ा हुआ है क्या यह प्रगति है या रचनात्मकता का अनधिकृत प्रतिरूपण?

इधर आर्ट स्मार्ट एआई (ArtSmart.ai) की 2024 की रिपोर्ट और विस्तार से इन आंकड़ों पर प्रकाश डालती है. रिपोर्ट बताती है कि यदि केवल जनरेटिव कला नहीं, बल्कि पूरी एआई आधारित (AI in Art Ecosystem) कला के गणित को समझें तो इस बाजार का आकार 2024 में लगभग 3.2 बिलियन डॉलर, यानी लगभग 26,500 करोड़ रुपये था. अनुमान है कि 2033 तक यह बढ़कर 40.4 बिलियन डॉलर यानी लगभग 3.35 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. जाहिर है यह अंतर स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कला जगत में एआई केवल रचनात्मक परिणाम नहीं बल्कि प्लेटफॉर्म, एनएफटी डिजिटल ओनरशिप और मार्केट में वितरण जैसी कई जगहों में फैल चुका है.

बहरहाल, असल चिंता यह भी है कि जनरेटिव एआई कला केवल रचनात्मकता के स्वरूप को नहीं बदल रही, बल्कि कला बाज़ार की परिभाषा को पुनर्संरचित कर रही है. पहले जहाँ कला के निर्माण के लिए कौशल, प्रशिक्षण, लंबा अभ्यास, धैर्य और वर्षों का अनुभव अनिवार्य माना जाता था, वहीं अब तकनीक ने इन बाधाओं को ध्वस्त कर दिया है. एक लैपटॉप, इंटरनेट कनेक्शन और सही प्लेटफ़ॉर्म रखने वाला कोई भी व्यक्ति अब वह सब कुछ रच सकता है जो कभी केवल प्रशिक्षित कलाकारों के लिए आरक्षित था. इसीलिए इसका प्रसार केवल कला समुदाय तक सीमित नहीं है. अब विज्ञापन और मार्केटिंग, फ़िल्म निर्माण, फैशन, गेमिंग, मनोरंजन उद्योग, फाइन आर्ट गैलरियां, एनएफटी बाज़ार और यहाँ तक कि आम उपयोगकर्ता भी इसकी संभावनाओं को अपनाने लगे हैं. यह परिवर्तन बताता है कि कला अब केवल कैनवास, ब्रश या सुर का क्षेत्र नहीं रह गई है यह उन डिजिटल प्रणालियों, सूचनाओं और एल्गोरिद्मिक कल्पनाओं का विस्तार बन चुकी है जहाँ कलाकार और मशीनों की भूमिका एक-दूसरे में धुंधली होती जा रही है.

बहरहाल, यह तो रही बाजार की बात लेकिन यहाँ आगे बढ़ें तो तकनीकी ढांचे की कहानी भी दिलचस्प है. 2024 में 65% हिस्सा क्लाउड सेवाओं का था यानी कलाकारों को अब भारी-भरकम स्टूडियो या उपकरण की ज़रूरत नहीं, केवल एक इंटरनेट कनेक्शन और सही टूल्स काफी हैं, वहीं 40% से अधिक योगदान मशीन लर्निंग का रहा, जिसने डेटा से सीखते हुए कला निर्माण की गति और दिशा दोनों बदल दी. खास बात यह है कि 2024 में उत्तरी अमेरिका इस पूरे सेक्टर का सबसे बड़ा क्षेत्र रहा, जहाँ इस उद्योग से लगभग 1.2 बिलियन डॉलर यानी लगभग 9,900 करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधि दर्ज हुई. जाहिर है जहाँ तकनीक, नीति, निवेश और बाज़ार संरचना एक साथ विकसित हुई है, वहीं कला का भविष्य पहले आकार लेता है और फिर दुनियाभर के सांस्कृतिक ढांचे को प्रभावित करता है.

गौर करने वाली बात है कि दुनिया में एआई के नाम पर केवल आंकड़े ही दर्ज नहीं हो रहे बल्कि जमीन पर जो दुनिया आकार ले रही है उसे देखकर हतप्रभ हुए बिना नहीं रहा जा सकता. बानगी के तौर पर नीलामियों की ऐसी खबरें हैं जो एआई से निर्मित होने वाले संसार का मिजाज बता रही हैं.

Edmond de Belamy

दरअसल, दुनिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित नीलामी घरों में से एक क्रिस्टीज़ (Christie’s) ने 2018 में अपनी न्यूयॉर्क नीलामी में एआई से बनी पेंटिंग Edmond de Belamy, from La Famille de Belamy” को 432,500 डॉलर यानी लगभग 3.6 करोड़ रुपये में बेचा. यह कृति फ़्रांसीसी कलेक्टिव ऑब्वियस ने जेनरेटिव एडवर्सेरियल नेटवर्क के ज़रिए तैयार की थी और इसे किसी बड़े नीलामी घर द्वारा बेची गई पहली प्रमुख एआई पेंटिंग के रूप में देखा गया. 1766 में जेम्स क्रिस्टी द्वारा स्थापित यह ब्रिटिश नीलामी घर लंदन, न्यूयॉर्क, पेरिस, हाँगकांग और दुबई जैसे शहरों में अपनी मौजूदगी के साथ पिकासो से लेकर वॉन गॉग तक की कृतियां दुनिया के सामने रख चुका है और अब वही मंच एआई कला को भी वैधता दे रहा है.

दूसरी ओर ब्लॉकचेन आधारित (Non-Fungible Token) नॉन फंज़िबल टोकन यानी NFT की दुनिया ने डिजिटल और एआई कला के लिए एक बिल्कुल अलग बाजार खोला है. बता दें कि एनएफटी ब्लॉकचेक का उपयोग करके अद्वितीय डिजिटल वस्तुओं के स्वामित्व को खरीदने और बेचने और उनके मालिकों पर नज़र रखने की अनुमति देता है. एनएफटी का अर्थ है नॉन फंजिबल टोकन और इसमें तकनीकी रूप से कोई भी डिजिटल वस्तु हो सकती है, जिसमें चित्र, एनिमेटेड जीआईएफ, गाने या वीडियो गेम में मौजूद वस्तुएँ शामिल हैं. एक एनएफटी या तो एक तरह का हो सकता है, जैसे एक वास्तविक पेंटिंग, या कई की एक प्रति, जैसे ट्रेडिंग कार्ड, लेकिन ब्लॉकचेन इस बात पर नज़र रखता है कि फ़ाइल का स्वामित्व किसके पास है.

EVERYDAYS: THE FIRST 5000 DAYS

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अब तक सबसे महंगा एआई जनित NFT लगभग 1.1 मिलियन डॉलर यानी क़रीब 9.1 करोड़ रुपये में बिका है, जबकि अमेरिकी डिजिटल कलाकार बीपल (Beeple) की डिजिटल कोलाज कृति Everydays: The First 5000 Days जो पूरी तरह एआई नहीं बल्कि डिजिटल प्रयोग का एक अद्वितीय उदाहरण है 2021 में क्रिस्टीज़ की ऑनलाइन नीलामी में 69.3 मिलियन डॉलर, यानी लगभग 570 करोड़ रुपये से अधिक में बिकी. यह केवल एक रिकॉर्ड बिक्री नहीं थी, बल्कि इसने NFT और डिजिटल/एआई प्रभावित कला को मुख्यधारा कला बाज़ार के केंद्र में ला खड़ा किया.

उधर एक और प्राचीन नीलामी घर सोथबीज़ जिसकी स्थापना 1744 में हुई और जो आज दुनिया के सबसे बड़े कला बाज़ारों में गिना जाता है, ने 2019 में अपनी पहली एआई-आधारित कृति Memories of Passersby I  जिसके कलाकार मारियो क्लिंगेमन रहे को लगभग 40,000 पाउंड की कीमत पर बेचा, जो उस समय अनुमानित मूल्य से कहीं अधिक था. यह कृति एक डिजिटल इंस्टॉलेशन है जो लगातार बदलती एआई निर्मित चेहरों की श्रंखला दिखाती है. 2024 में सोथबीज़ ने एआई रोबोट कलाकार आइ-डा (Ai-Da) द्वारा तैयार किए गए एलन ट्यूरिंग के पोर्ट्रेट AI God को भी नीलाम किया, जो रिपोर्टों के मुताबिक 1.08 मिलियन डॉलर के आसपास की रकम पर बिका. निश्चित ही यह सब संकेत हैं कि एआई कला अब प्रयोगशाला की चीज़ नहीं रही, बल्कि बड़े नीलामी घरों की दीवारों और कटघरों तक पहुंच चुकी है. इस प्राचीन नीलामी घर में एआई की पेंटिंग की नीलामी इस समय का यथार्थ है और इस यथार्थ के आंकड़े केवल बिक्री के आंकड़े नहीं हैं, यह उस स्वीकृति का सबूत हैं जो कला जगत धीरे-धीरे एआई को दे रहा है.

बहरहाल, एआई के कला बाजार में एँट्री की यह कहानी का एक उजला पक्ष है जहाँ कला में लोकतंत्र और उदारता की बातें बतियाने वाले बहुतेरे मिल जाएँगे लेकिन इस उजियारे के पीछे का अंधियारा उन कलाकारों के जीवन में और सपनों में गहरा अंधकार घोल रहा है जो सालों से अपनी उम्र और जीवन खपाए कला के जरिए इस जीवन को सार्थक करना चाहते हैं.

दरअसल दिसंबर 2024 में सीआईएससी CISAC (International Confederation of Societies of Authors and Composers) ने पीएमपी स्ट्रेटेजी (PMP Strategy) के साथ मिलकर पहली वैश्विक रिपोर्ट जारी की. बता दें कि सीआईएससी 230 से अधिक सदस्य संस्थाओं का नेटवर्क है जो दुनियाभर के संगीतकारों, लेखकों और कलाकारों के अधिकारों की रक्षा करता है. इस रिपोर्ट ने चौंकाने वाला निष्कर्ष देते हुए कहा कि अगले पांच सालों में एआई के कारण संगीतकारों की आय में 25% और ऑडियो-विज़ुअल क्षेत्र के कलाकारों की आय में 21% तक गिरावट आ सकती है. कुल मिलाकर यह घाटा €22 अरब यूरो तक हो सकता है, यानी जिन तकनीकी कंपनियों के लिए एआई नया सोना है, वही एआई कलाकारों के लिए आय और आजीविका के क्षरण का बड़ा कारण भी बन रहा है.

इधर कलाकार समुदाय की राय भी इसी द्वंद्व को दर्शाती है. अलग-अलग सर्वे और संकलित आंकड़े बताते हैं कि लगभग 29 प्रतिशत डिजिटल कलाकार अब अपने रचनात्मक काम में किसी न किसी रूप में एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, लगभग 78 प्रतिशत कलाकार मानते हैं कि एआई दृश्य कला की दुनिया में नई सौंदर्य संभावनाएँ खोल सकता है, लेकिन इसके साथ-साथ लगभग 70 प्रतिशत कलाकारों का मानना है कि एआई कभी भी मानव निर्मित कला जैसी भावनात्मक गहराई नहीं ला सकता. लगभग 74 प्रतिशत कलाकार इंटरनेट पर उपलब्ध कलाकृतियों को उनकी अनुमति के बिना एआई प्रशिक्षण में इस्तेमाल करना अनैतिक मानते हैं.

खास बात यह है कि अमेरिका में किए गए एक सर्वे के मुताबिक केवल 27 प्रतिशत लोगों ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने एआई जनित कला को पहचान कर देखा है, उनमें से आधे से ज़्यादा को वह पसंद भी आई, फिर भी 76 प्रतिशत लोग अब भी मानते हैं कि एआई द्वारा बनाई गई रचनाओं को कला की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए. यह विरोधाभास साफ़ बताता है कि तकनीक ने कलात्मक प्रयोगों और बाज़ार में हलचल तो खड़ी कर दी है, लेकिन न्याय, नैतिकता और मानवीय संवेदना की कसौटी आज भी वहीं खड़ी है जहाँ हमेशा से थी.

बहरहाल, इन आंकड़ों की संभावित नियति के बारे में ना भी सोचा जाए तो क्या यह कहना सही नहीं होगा कि जिन निवेशकों के लिए एआई कला नया सोना है, वही एआई कलाकारों के लिए रोज़गार और आजीविका छीनने वाला बन रहा है? एबीबीए (ABBA) बैंड के सदस्य और गीतकार, निर्माता ब्योर्न क्रिस्टियन उलवायस ने इसे गंभीर अन्याय कहते हैं वे मानते हैं कि कंपनियां कलाकारों की मेहनत और काम को बिना अनुमति और बिना मुआवज़े इस्तेमाल कर रही हैं. यह वह बिंदु है जहाँ कला, नैतिकता और अर्थशास्त्र टकराते हैं.

 

 

तस्वीरों और पेंटिंग के संसार में एआई

कला का संसार जब एआई से मिलता है, तो यह महज़ तकनीकी बदलाव नहीं रह जाता, बल्कि मानवीय अनुभवों और रचनात्मकता की आत्मा को चुनौती देता है. नीलामी घरों से लेकर फिल्म स्टूडियो तक, एआई ने कला की परिभाषा को बदलना शुरू कर दिया है. अब सवाल यह नहीं है कि एआई कला बना सकता है या नहीं सवाल यह है कि वह कला को किस रूप में गढ़ रहा है, और इसमें इंसान कहाँ खड़ा है.

आज एआई के प्रवेश के बाद इस क्षेत्र की दुनिया भी एआई को लेकर दो भागों में बंट चुकी है. एक मानती है कि एआई कला की मौलिकता की बराबरी नहीं कर सकता वहीं एक हिस्सा उसे प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है और कलात्मक संसार के लिए खतरा मानता है.

दरअसल, यह विरोधाभास ही कई बातों की ओर इशारा करता है कि एआई कला के संसार को एकरेखीय ढंग से नहीं बदल रहा, बल्कि वह अलग-अलग परतों में काम कर रहा है. एक ओर वह उन कलाकारों के लिए साधन है जिनके पास महंगे स्टूडियो या उपकरण नहीं हैं वे अब केवल एक लैपटॉप और एआई टूल्स की मदद से अपनी कल्पना को दृश्य रूप दे सकते हैं और इसे आप लोकतांत्रिकरण कह सकते हैं, जहाँ रचनात्मकता अब केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं रहती, वहीं दूसरी ओर यही एआई उन पेशेवर कलाकारों के लिए खतरा भी बनता है, जिनकी रोज़ी-रोटी पारंपरिक तरीकों पर टिकी है और जिन्होंने अपनी उम्र, जीवन और समय लगाकर साधना के रूप में इसे जिया.

एआई को लेकर विरोधाभास, विषमता और एक विचार के दो छोरों पर बैठी यह दुनिया इतिहास के गलियारों में झांकने को विवश करती है जब फ़ोटोग्राफ़ी के आने पर पेंटरों को लगा था कि उनकी कला बेकार हो जाएगी, लेकिन हुआ उल्टा फ़ोटोग्राफ़ी ने पेंटिंग को नई दिशाएँ दीं और इम्प्रेशनिज़्म जैसे आंदोलन जन्में. ऐसे ही जब प्रिंटिंग प्रेस आया था तो लेखन की दुनिया इस शंका में डूब गई कि हस्तलिखित पांडुलिपियां बनाने वाले कलाकारों का क्या होगा लेकिन हुआ विपरित और छपाई ने ज्ञान और साहित्य को लोकतांत्रिक बना दिया और इस तरह से नए लेखकों और विचारकों की पूरी पीढ़ी सामने आई.

ऐसे ही एक दौर में नाटककारों और रंगमंच की दुनिया पर भी अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ क्योंकि जब सिनेमैटोग्राफ़ आया, तो थियरेटर आर्टिस्ट को डर लगा कि थिएटर खत्म हो जाएगा, लेकिन फिल्मों ने नाटक को खत्म नहीं किया; उसने रंगमंच की तकनीकों को नए माध्यम में ढालकर और भी बड़े पैमाने पर दर्शकों तक पहुंचाया. आज भी थिएटर और सिनेमा दोनों अलग-अलग हैं बल्कि रंगमंच तो फिल्मों में अभिनय का खादपानी बन चुका है.

इधर हाल ही के दशकों में, जब डिजिटल पेंटिंग और ग्राफ़िक टैबलेट आए, तब परंपरागत् कैनवास और ब्रश से काम करने वाले पेंटरों को लगा कि उनकी कला अप्रासंगिक हो जाएगी, लेकिन हुआ यह कि डिजिटल आर्ट ने एक पूरी नई इंडस्ट्री खड़ी कर दी वीडियो गेम्स, एनीमेशन, फिल्म प्रोडक्शन जहाँ कलाकारों को नए अवसर मिले. जाहिर है ऐसे में एकबारगी किसी तरह की वैचारिक छुआछूत ना मानते हुए देखा जाए तो एआई भी कला के नए आयाम खोल सकता है, बशर्ते इसे समझदारी और संवेदनशीलता से इस्तेमाल करें.

तो सवाल केवल इतना नहीं कि एआई कला बनाएगा या नहीं बल्कि मूल प्रश्न यह है कि यह किस तरह की कला बनाएगा, उसकी संरचना कैसी होगी? उसमें मौलिकता कितनी शेष रहेगी? और किसके लिए बनाएगा, और किसकी जगह लेगा? यही तनाव इस पूरे विमर्श को जटिल और गहराई से विचारणीय बनाता है.

सिराक्यूज़ यूनिवर्सिटी में एआई इन क्रिएटिव प्रैक्टिस पढ़ा रहीं और कॉलेज ऑफ विजुअल एँड परफॉर्मिंग आर्ट्स में फिल्म और मीडिया आर्ट्स विभाग में कंप्यूटर कला और एनीमेशन की प्रोफेसर रेबेका जू कहती हैं- कलाकारों ने हमेशा अपनी रचनाओं की सीमाओं को आगे बढ़ाने के लिए नई प्रौद्योगिकियों को अपनाया है ऐसे में एआई भी इससे अलग नहीं है. रेबेका जू एआई और कला के बीच के द्वंद्व को अलग तरह से देखती हैं. वे यूनिवर्सिटी में अपने छात्रों को मिडजर्नी और स्टेबल डिफ्यूजन जैसे टूल्स से प्रयोग कराती हैं.

एक वेबसाइट news.syr.edu में बातचीत के दौरान वे कहती हैं- कुछ लोग मानते हैं कि एआई मानवीय रचनात्मकता की जगह ले रहा है जबकि कुछ मानते हैं कि एआई रचनात्मकता को बढ़ा रहा है, लेकिन मेरा मानना ​​है कि एआई का सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. वे कहती हैं कि डिजिटल कला के क्षेत्र में होने के नाते, मैं हमेशा नई तकनीक के प्रभाव से जूझता रहती हूं. एआई अन्य तकनीकी सुधारों से बहुत अलग नहीं है. नवाचार के माध्यम से, एआई मानव रचनात्मकता को बढ़ा सकता है, लेकिन यह इस बारे में प्रश्न उठाता है कि मानव बनाम मशीन की रचनात्मकता क्या है, क्या मशीनों में मौलिक और वास्तविक रचनात्मकता हो सकती है, और हम रचनात्मकता को कैसे परिभाषित करते हैं.

पिछले कुछ वर्षों में, जू ने जनरेटिव प्रोग्रामिंग और एआई के साथ प्रयोग किए हैं, और उनके एनिमेटेड काम, पेरिपेटीज: फ्रैजाइल सॉवरेन्टीज को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किया गया है.

जू कहती हैं- एआई मानवीय रचनात्मकता को बदल नहीं रहा, बल्कि उसे बढ़ा रहा है. एआई ब्रश या कैनवास जैसा सहायक है न कि कलाकार का विकल्प. वे यह भी मानती हैं कि यह तकनीक कला को लोकतांत्रिक बनाती है, क्योंकि अब हर किसी को रचनात्मकता के साधन मिल सकते हैं, लेकिन वे साथ ही चेतावनी भी देती हैं कि अगर डेटा में पूर्वाग्रह होगा या कॉपीराइट का ध्यान नहीं रखा जाएगा, तो कला भी पक्षपाती और अन्यायपूर्ण बन सकती है.

वे गंभीरता के साथ कहती हैं-

कला हमेशा आत्म-अभिव्यक्ति के बारे में होती है. चाहे आप कैमरा, पेंट ब्रश, मिट्टी या कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और एआई का इस्तेमाल करें, ये कला सृजन के माध्यम और विभिन्न साधन हैं. विषयवस्तु और आप अपनी कला के माध्यम से कैसे संवाद करते हैं, यही सबसे महत्वपूर्ण है.

इसी बहस में एक और दिलचस्प और गहरी आवाज़ है क्लेयर सिल्वर की. 2017 से एआई के साथ प्रयोग कर रही यह गुमनाम कलाकार स्वयं को एआई सहयोगी कलाकार मानती हैं. सिल्वर के लिए मशीनें प्रतिस्थापक नहीं, बल्कि रचनात्मक साझेदार हैं. तेल और ऐक्रिलिक जैसे पारंपरिक रंगों से लेकर फोटोग्राफी और कोलाज तक, और आर्टब्रीडर, मिडजर्नी, स्टेबल डिफ्यूजन व डाले-2 जैसे एआई टूल्स तक सिल्वर हर साधन को अपने कैनवास का हिस्सा बना लेती हैं. उनकी कला सहज संवदेनशील, सामाजिक संरचना, परंपरा और आधुनिकता के तनाव, और ट्रांसह्यूमनिस्ट भविष्य जैसे गहन विषयों को छूती है. यही विविधता उनकी शैली की पहचान बन चुकी है.

सिल्वर की कला पारंपरिक और डिजिटल दोनों माध्यमों का अद्भुत संगम है, और यही उनकी विशेषता भी है. यही कारण है कि उनकी कृतियों को लॉस एँजिल्स काउंटी म्यूज़ियम ऑफ आर्ट (LACMA) ने अपने स्थायी संग्रह में शामिल किया और सॉदबीज़ लंदन और क्रिस्टीज़ न्यूयॉर्क जैसे प्रतिष्ठित नीलामी घरों ने उनकी कला का प्रदर्शन और बिक्री की.

सबसे महत्वपूर्ण रही उनकी कलेक्शन जेनेसिस (Genesis, 2021), जिसमें 500 एनएफ शामिल थे जो इस बात का उदाहरण है कि एआई से बनी डिजिटल कला किस तरह कला बाजार में तेजी से जगह बना रही है. बता दें कि एनएफटी यानी नॉन फंजिबल टोकन (Non-Fungible Token) को आप डिजिटल सर्टिफ़िकेट मान सकते हैं, जैसे किसी पेंटिंग की असलियत साबित करने के लिए कागज़ पर सिग्नेचर या प्रमाण-पत्र होता है, वैसे ही डिजिटल कला की मालिक़ियत दिखाने के लिए ब्लॉकचेन पर एनएफटी होता है, यानी अगर किसी के पास वह एनएफटी है तो इसका मतलब है कि वह डिजिटल कलाकृति का असली मालिक वही है.

Blood in the Streets, Late to the Ball

जेनेसिस  कलेक्शन की शुरुआत 0.1 ईटीएच (ETH) से हुई थी, और समय के साथ इसकी न्यूनतम कीमत (फ्लोर प्राइस – Floor Price) बढ़कर 23.99 ईटीएच तक पहुंच गई जो यह दर्शाता है कि एआई कला अब सिर्फ़ रचनात्मक प्रयोग नहीं, बल्कि निवेश और संग्रहण की दुनिया में भी अपनी पहचान बना चुकी है. ऐसे ही उनकी एक और प्रसिद्ध रचना ब्लड इन द स्ट्रीट्स, लेट टू द बॉल (Blood in the Streets, Late to the Ball) सॉदबीज़ (Sotheby’s) में लगभग 48 हज़ार डॉलर (USD 47,812) में बिकी. जाहिर है यह कला और एआई के बीच एक ऐसा उदाहरण जो बताता है कि एआई कला अब केवल प्रयोगशाला या स्टूडियो तक सीमित नहीं रही, बल्कि वैश्विक कला-बाजार में मान्यता और मूल्य दोनों हासिल कर रही है.

बतौर लेखक जब मैंने इंटरनेट के संसार में क्लेयर सिल्वर की पेंटिंग्स देखी तो यह एक अलग ही दुनिया में प्रवेश था. साइबर्ग और पारंपरिक पेंटिंग के बीच कहीं जगह बनाती सिल्वर जीवन और रंगों के बीच एक अज्ञात की खोज है. सिल्वर का अपना जीवन भी संघर्षों और अपने अस्तित्व की खोज में गुजरा है जो उनकी एआई पेटिंग्स में दिखाई देता है. अपने कई पॉडकॉस्ट में वे एक साइबर्ग या रोबोटिक फेस के साथ बात करतीं नजर आती हैं.

दरअसल, कला और एआई के बीच सिल्वर का जिक्र यहाँ इसलिए है क्योंकि उनका सबसे बड़ा योगदान उनके विचारों में है. जून 2024 के टेड एआई (TED AI) शो में एआई और कला के लिए कहा था-

एआई अंतिम कलात्मक साझेदार है यह एक सहयोगी है जो आपके तकनीकी कौशल या औपचारिक ट्रेनिंग की परवाह नहीं करता.

उनके अनुसार, एआई ने कला के सामने मौजूद तकनीकी बाधाओं को तोड़ दिया है. पहले जहाँ एक कलाकार को वर्षों की ट्रेनिंग चाहिए होती थी, अब कोई भी व्यक्ति केवल कुछ प्रॉम्प्ट्स की मदद से जटिल और प्रभावशाली कला बना सकता है. यह रचनात्मकता को आमजन तक पहुंचाता है, लेकिन साथ ही एक बुनियादी प्रश्न भी खड़ा करता है, कला आखिर है क्या?

बहरहाल, सिल्वर यह भी जानती हैं कि यह कहानी केवल लोकतांत्रिकरण की नहीं है. अप्रैल 2023 में एनपीआर से बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि एआई कला में लेखकत्व का प्रश्न अब भी अस्पष्ट है. यहाँ उनका इशारा कॉपी राइट की ओर था. वे सवाल उठाते हुए कहती हैं-

 

 

क्या एआई केवल एक उपकरण है या सह रचनाकार भी?

यह दुविधा केवल तकनीकी नहीं बल्कि नैतिक भी है. क्योंकि एआई अक्सर अन्य कलाकारों के कार्यों पर प्रशिक्षित होता है. सोचिए, यदि कोई मशीन आपकी शैली की नकल कर ले, तो असली कलाकार कौन होगा आप या वह मशीन. यही प्रश्न कलाकारों की आजीविका और अधिकार दोनों को गहराई से प्रभावित करता है.

सिल्वर का दृष्टिकोण तकनीक या नैतिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और मानवता तक फैला हुआ है. जुलाई 2023 में कल्चर पॉडकास्ट पर वे कहती हैं-

एआई आपकी कल्पना के लिए एक कैमरा है. यह ऐसी चीज़ें बनाता है जो हम दोनों में से कोई भी खुद नहीं बना सकता था. उनका मानना है कि एआई ऐसी चीज़ें बना सकता है जो न इंसान अकेले बना सकता था और न ही मशीन अकेले. वे कहती हैं- एआई कला का तेज़ विकास जारी रहेगा, और स्वाद नई स्किल बनकर उभरेगा, जो एआई-चलित संस्कृति को आकार देगा. यहाँ स्वाद से उनका मतलब मानवीय चयन और परिष्कार है क्योंकि एआई लाखों विकल्प दे सकता है, लेकिन उनमें से अर्थपूर्ण और संवेदनशील विकल्प चुनना कलाकार का ही काम है.

बहरहाल, यहीं से सिल्वर गहरे दार्शनिक प्रश्न उठाती हैं. उनके अनुसार- एआई एक प्रजाति स्तरीय बदलाव होगा, ठीक उसी तरह जैसे हमारी प्रजातियां होमो सेपियंस में विभाजित हुई थीं. वे चेताती हैं कि यह बदलाव हर चीज़ को छुएगा, चिकित्सा, वास्तुकला, समाज और संस्कृति तक. और इसी वजह से हमें इन सवालों पर अभी विचार करना होगा, बाद में नहीं. उदाहरण के लिए वे बच्चों की मासूमियत का ज़िक्र करती हैं. अगर किसी बच्चे के पास न्यूरालिंक जैसा इम्प्लांट हो और वह तुरंत संपूर्ण मानव इतिहास और ज्ञान तक पहुंच सके, तो क्या वह अब भी मासूम कहलाएगा. अगर नहीं, तो मासूमियत का अर्थ ही बदल जाएगा.

सिल्वर यह भी सवाल पूछती हैं कि अगर हम दुख और संघर्ष को पूरी तरह मिटा दें, तो क्या हम उतने ही सहानुभूतिपूर्ण रह पाएँगे. उनका कहना है कि जिन लोगों ने कभी कठिनाइयां नहीं झेली हैं, उनमें अक्सर करुणा की कमी होती है. ऐसे में अगर एआई हमारे संघर्ष ही समाप्त कर दे, तो क्या हमारी कहानियां और हमारी नायक की यात्रा भी समाप्त हो जाएगी, और यदि ऐसा हुआ, तो हम अपने बारे में क्या सोचेंगे, और अपनी अगली पीढ़ियों को क्या सुनाएँगे. बता दें कि सिल्वर एक गंभीर बीमारी से जूझते हुए एआई और कला के संसार में पहुंची है और यहाँ वही सुकून पा रही है जो उनकी कला का नया रास्ता है.

सिल्वर सहित ऐसे कई वैश्विक कलाकार जो अपनी कला में एआई का उपयोग नई तरह से कर रहे हैं उनका दृष्टिकोण और उनकी कला वैश्विक स्तर पर एआई सहयोगी कला के नए आंदोलन की आहट है. हालांकि कलाकारों के नजरिए से आगे से दुनियाभर के संस्थान और शोध केंद्र भी इसी सवाल से जूझ रहे हैं कि एआई कला को कहाँ ले जाएगा और मानवता को इससे क्या सीखना चाहिए?

ब्रिटेन का एलन ट्यूरिंग इंस्टीट्यूट यूरोप का यह सबसे बड़ा डेटा साइंस और एआई संस्थान है, और इसके एआई एँड आर्ट्स इंटरेस्ट ग्रुप से तकरीबन चार सौ से ज़्यादा शोधकर्ता जुड़े हैं. वे मानते हैं कि एआई केवल एक उपकरण नहीं बल्कि हमारी संस्कृति को प्रभावित करने वाली शक्ति है और फिल्म, पेंटिंग और परफॉर्मिंग आर्ट्स में एआई रचनात्मकता को नए आयाम दे रहा है. यह समूह एआई के कला में हस्तक्षेप को रचनात्मक तरीके से देखता है और सृजन के विकास में सहयोगी मानता है. हालांकि समूह संतुलन और सतर्कता को भी महत्व देता है और कला जगत् में एआई के प्रयोग में एक बड़े खतरे को भी संकेत देता है.

समूह के अनुसार यह कल्चरल अप्रोप्रियेशन को बढ़ावा देने वाला हो सकता है यानी की अगर कोई एआई मॉडल बिना अनुमति किसी समुदाय की कला या प्रतीक जैसे भारतीय गोंड पेंटिंग, भील चित्रकारी या अफ्रीकी मुखौटे को सीख ले और उसे अपने आउटपुट में इस्तेमाल कर दे तो असली कलाकार या समुदाय का नाम कहीं नहीं रहता और लाभ किसी और को मिल जाता है. ये एक तरह से कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़कर भानुमति का कुनबा बनाकर खड़ा कर देने वाली कवायद है्. दरअसल यहाँ एआई के संदर्भ में कहने का अर्थ है कि एआई मॉडल लाखों ऐसी छवियों और शैलियों से सीखते हैं और फिर उनके आधार पर कला उत्पन्न करते हैं, परंतु यह स्पष्ट नहीं होता कि मूल प्रेरणा किसकी थी. इससे कलाकारों के अधिकार और संस्कृति की गरिमा दोनों पर आंच आती है.

उदाहरण से समझें तो कोई एआई मॉडल बिना अनुमति आदिवासी या स्वदेशी कला शैली को सीख ले और उसका व्यावसायिक उपयोग करने लगे तो यह केवल तकनीकी चोरी नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत पर चोट होगी. ट्यूरिंग इंस्टीट्यूट यही चेतावनी देता है कि अगर डेटा स्रोत पारदर्शी न रहे और कलाकारों की सहमति न ली गई, तो एआई कला लोकतांत्रिकरण की बजाय असमानता को जन्म देगा. ट्यूरिंग के दृष्टिकोण के मुताबिक एआई कला को एक सहयोगी उपकरण के रूप में देखना चाहिए लेकिन बिना नैतिक ढांचे के यह सांस्कृतिक नुकसान पहुंचा सकता है. एक तरह से ट्यूरिंग की सिफारिशें, यूनेस्को की एआई नैतिकता गाइडलाइंस को सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं और नीति-निर्माताओं को ऐसे फ्रेमवर्क बनाने के लिए प्रेरित करती हैं जो कलाकारों की बौद्धिक संपदा की रक्षा करें.

ऑक्सफर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट ट्यूरिंग संस्थान के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है. इंस्टीट्यूट की अपनी रिपोर्ट एआई एँड द आर्ट्स रिपोर्ट में बहुत बेहतर तरीके से समझाता है. यह रिपोर्ट मशीन लर्निंग के कला में बदलावों पर केंद्रित है जो यह मानती है कि एआई एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन मानवीय दृष्टि और नीयत को समझना और उसके प्रति संवदेनशील होने की जरूरत है. यह अध्ययन बताता है कि 2024 तक 29% डिजिटल कलाकार एआई का उपयोग कर रहे थे और 78% मानते थे कि इससे नई रचनात्मक और कलात्मक संभावनाएँ खुलती हैं, लेकिन दिलचस्प यह है कि 76% लोग अब भी कहते हैं कि यह असली कला नहीं है क्योंकि इसमें मानवीय भावनाओं की गहराई की कमी है. यहाँ देखें तो ऊपर सिराक्यूज़ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर रेबेका की बात को दोहराया जा सकता है जो कहती हैं-

एआई मानवीय रचनात्मकता को बदल नहीं रहा, बल्कि उसे बढ़ा रहा है, यानी एआई हमें तकनीकी बाधाओं से मुक्त करता है, लेकिन कला का मूल्य अब भी उस मानवीय दृष्टि पर टिका है जो तय करती है कि क्या भावनात्मक रूप से गहरा है और क्या सतही. यह वैसा ही क्षण है जैसा कभी फोटोग्राफ़ी के आने पर हुआ था. पेंटरों को डर था कि उनकी कला बेकार हो जाएगी, लेकिन हुआ उल्टा फोटोग्राफ़ी ने पेंटिंग को नए रास्ते दिए और इम्प्रेशनिज़्म  जैसी लहर जन्मीं.

लंदन की सर्पेंटाइन गैलरीज (Serpentine Galleries) का क्रिएटिव एआई लैब (Creative AI Lab) इस तर्क का व्यवहारिक तस्वीर सामने रखता है. यह एक तरह से प्रयोगात्मक धरातल ही है जहाँ कलाकार और इंजीनियर मिलकर एआई के साथ ऐसी कलाएँ गढ़ते हैं जिन्हें केवल देखा ही नहीं बल्कि जिया भी जा सके. ऊपर क्लेयर सिल्वर का प्रोजेक्ट केन आई टेल यू इसकी मिसाल है जिसे 2024 में एडब्ल्यूएस (AWS) इवेंट में प्रस्तुत किया गया. जहाँ सिल्वर कहती हैं-

 

 

एआई मेरे अतीत को फिर से सामने लाता है और मुझे बच्चे जैसी खुशी देता है.

दरअसल, यही वह क्षण है जहाँ एआई कला केवल दर्शक को सामने से नहीं दिखती बल्कि उसके अनुभव का हिस्सा बन जाती है. यही कारण है कि पिछले तीन सालों में एआई कला प्रदर्शनियों में 25% की वृद्धि हुई है और दुनियाभर की गैलरियां इसे तेजी से अपना रही हैं. लेकिन सवाल वही है क्या यह समावेशी प्रयोग संवेदनशीलता के साथ होगा या यह केवल एक तकनीकी तमाशा बनकर रह जाएगा.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूरा विमर्श केवल कलाकारों और गैलरियों तक सीमित नहीं है बल्कि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों ने भी एआई और कला के रिश्ते को समझने की कोशिश की है. कोलंबिया बिज़नेस स्कूल का अध्ययन बियॉन्ड द मशीन: व्हाय ह्यूमन-मेड आर्ट मैटर्स मोर इन द एज ऑफ एआई (Beyond the Machine: Why Human-Made Art Matters More in the Age of AI) इसी बहस में एक नया दृष्टिकोण जोड़ता है. 29 जून 2025 को प्रकाशित इस अध्ययन के लेखक फिलिपो डाल’एग्लियो और ओलिवर हाउसर मानते हैं कि एआई के बढ़ते प्रभाव से मानवीय कला की कीमत कम नहीं होती, बल्कि उसका मूल्य और बढ़ जाता है. यह वैसा ही है जैसे डिजिटल किताबों के दौर में हस्तलिखित पांडुलिपियां और कीमती हो गईं.

इधर अध्ययन में प्रयोग किए गए डेटा और सर्वे बताते हैं कि जब लोगों को एआई और मानवीय कला दोनों दिखाए गए, तो उन्होंने मानवीय कला को प्रीमियम वैल्यू दी. इसका अर्थ यह है कि एआई ने बाजार तो विस्तारित किया, लेकिन भावनात्मक गहराई और आत्मीयता अब भी इंसान से ही आती है.

इसी बात को और विस्तार देता है साइंसडायरेक्ट पर प्रकाशित शोध को-क्रिएटिंग आर्ट विथ जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Co-Creating Art with Generative Artificial Intelligence) जो 2024 में लेखक ऊवे मेसर ने प्रकाशित किया. वे मानते हैं कि एआई के साथ मिलकर कला बनाना कलाकारों को नई दिशाएँ देता है. डाले (DALL·E) और मिडजर्नी जैसे टूल्स से कलाकार अपने विचारों को नई शैलियों में बदल सकते हैं, लेकिन इस सहयोग की एक दुविधा भी है क्योंकि लोग अक्सर ऐसी रचनाओं को कम मूल्यवान मान लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें मानवीय मेहनत कम लगी है. यह अध्ययन बताता है कि एआई अवसर भी देता है और खतरे भी. जाहिर है नई शैलियां और प्रयोग संभव होते हैं, लेकिन साथ ही कॉपीराइट और नौकरियों का संकट गहराता है. यही कारण है कि मेसर सुझाव देते हैं कि नीतियां ऐसी हों जो एआई को कलाकार का सहयोगी बनाएँ न कि प्रतिस्थापक.

2023 में साइंसडायरेक्ट पर ही प्रकाशित एक और सिस्टेमैटिक रिव्यू आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन फाइन आर्ट्स (Artificial Intelligence in Fine Arts) इस पूरे विमर्श को और व्यापक बनाता है. इसके लेखक एट्टे ओक्सानेन (Atte Oksanen) हैं, जो फिनलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ टैम्परे में कार्यरत हैं, उन्होंने सैकड़ों अध्ययनों की समीक्षा कर यह निष्कर्ष निकाला कि एआई फाइन आर्ट्स को एक नई दिशा दे रहा है, लेकिन भावनात्मक गहराई के मामले में अब भी पीछे है. मशीनें पेंटिंग और स्कल्प्चर जैसी रचनाओं को ऑटोमेट कर सकती हैं, लेकिन उनकी आत्मा नहीं गढ़ सकतीं. यह अध्ययन एक तरह से आगाह करता है कि डेटा में सांस्कृतिक पूर्वाग्रह और डीपफेक जैसी तकनीकें कला के लिए खतरा बन सकती हैं. एक तरह से एआई अवसर तो देता है, लेकिन उसके साथ सावधानी और नैतिकता भी ज़रूरी है.

अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी का आर्ट एँड एआई लेबोरेटरी  भी इस बहस में अहम है. यह कंप्यूटर विजन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और मानवीय क्रिएटिविटी के इंटरसेक्शन पर केंद्रित है. 2016 से सक्रिय इस लैब का उद्देश्य एआई को कला में एकीकृत करके रचनात्मकता की नई सीमाओं को खोजना है, जैसे कि एआई को आर्ट हिस्ट्री समझना, नई स्टाइल्स जेनरेट करना और ह्यूमन क्रिएटिविटी को बढ़ावा देना. लैब का फोकस पर्सेप्चुअल और कॉग्निटिव टास्क्स पर है, जहाँ एआई को ट्रेन किया जाता है ताकि यह कला के ऐतिहासिक ट्रांजिशन पॉइंट्स को पहचाने और नई आर्टवर्क्स क्रिएट करे.

रटगर्स के कंप्यूटर साइंस डिपार्टमेंट के अहम हिस्से के रूप में स्थापित यह विभिन्न प्रोजेक्ट्स के जरिए एआई की कला में भूमिका पर गहन अध्ययन करता है. रटगर्स यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर साइंस डिपार्टमेंट के प्रोफेसर और इस एआई लैब के फाउंडर और डायरेक्टर डॉ. अहमद एलगम्मल है और उनके साथ बाबक सालेह जैसे सह-शोधकर्ता भी जुड़े हैं, जो कंप्यूटर विजन और एआई में विशेषज्ञ हैं.

डॉ. अहमद एलगम्मल और उनकी टीम ने मशीनों को आर्ट हिस्ट्री समझने और नई शैलियों को गढ़ने की ट्रेनिंग दी है. क्रिएटिव एडवरसेरियल नेटवर्क्स (Creative Adversarial Networks CAN) जैसे मॉडल्स ने एआई को यह सिखाया कि कैसे इतिहास में एक शैली से दूसरी शैली में बदलाव आया. इस लैब के प्रयोग बताते हैं कि कभी-कभी एआई की रचनाओं को दर्शकों ने आर्ट बेसल जैसी प्रदर्शनियों की कृतियों से भी अधिक असरदार माना, लेकिन एलगम्मल खुद मानते हैं कि एआई इमेज जेनरेशन मानव क्रिएटिविटी का नैचुरल एक्सटेंशन है, लेकिन यह सांस्कृतिक और नैतिक चुनौतियां लाता है, जैसा कि वे मानते हैं- AI image generation is a natural extension of human creativity, but it brings cultural and ethical challenges यानी मशीनें नई संभावनाएँ तो खोल रही हैं, लेकिन कला का मानवीय आयाम अब भी अपरिहार्य है.

स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिज़नेस ने इसे आर्थिक दृष्टि से परखा है. स्कूल का अध्ययन व्हेन एआई जेनरेटेड आर्ट एँटर्स द मार्केट, कंज्यूमर्स विन एँड आर्टिस्ट्स लूज़ (When AI-Generated Art Enters the Market, Consumers Win and Artists Lose) 20 मई 2025 को प्रकाशित हुआ. इस अध्ययन को सैम्युअल गोल्डबर्ग और उनकी टीम ने बिक्री के आंकड़ों और उपभोक्ता सर्वे का विश्लेषण किया. यहाँ निष्कर्ष यह निकला कि उपभोक्ताओं को एआई कला से सीधा लाभ हुआ और विकल्प बढ़े और कीमतें गिरीं, लेकिन कलाकारों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण रही क्योंकि एक ओर उनकी आय घटी और प्रतिस्पर्धा बढ़ गई. अध्ययन यह कहता है कि बाजार के लिए एआई सकारात्मक है, लेकिन कलाकारों के लिए यह संकट भी है. इसका हल यही है कि कलाकार नए कौशल सीखें और एआई को सहयोगी के रूप में इस्तेमाल करें.

बरहाहल, इन सब अध्ययनों से एक बड़ी तस्वीर उभरती है कि एआई कला को लोकतांत्रिकरण बनाता है, बाजार को विस्तारित करता है, और नई शैलियां देता है लेकिन यह मौलिकता, कॉपीराइट, और कलाकारों की आय पर गंभीर सवाल भी खड़ा करता है. सीधे शब्दों में कहें तो कोलंबिया की स्टडी दिखाती है कि मानवीय कला की प्रीमियम वैल्यू बनी रहेगी जबकि साइंसडायरेक्ट बताता है कि सहयोग के अवसर और खतरे दोनों मौजूद हैं. इधर रटगर्स यूनिवर्सिटी का अध्ययन यह साबित करता है कि मशीनें इतिहास से सीख सकती हैं, लेकिन संवेदना में पीछे हैं जबकि स्टैनफोर्ड के हिसाब से उपभोक्ता और कलाकार के बीच संतुलन बिगड़ सकता है.

 संदर्भ

  1. https://www.christies.com/en/stories/a-collaboration-between-two-artists-one-human-one-a-machine-0cd01f4e232f4279a525a446d60d4cd1
  2. https://www.theverge.com/2021/3/11/22325054/beeple-christies-nft-sale-cost-everydays-69-million
  3. https://www.artsy.net/article/artsy-editorial-artwork-created-ai-sold-40-000-sothebys-failing-generate-fervor-propelled-ai-work-sell-40-times-estimate-year
  4. https://artsmart.ai/blog/ai-in-the-art-market-statistics/
  5. https://www.cisac.org
  6. https://www.thebusinessresearchcompany.com/report/generative-artificial-intelligence-ai-in-art-global-market-report
  7. https://www.americanscientist.org/article/ai-is-blurring-the-definition-of-artist
  8. https://business.columbia.edu/research-brief/digital-future/human-ai-art
  9. https://creativitysquared.com/podcast/ep34-claire-silver-taste-is-the-new-skill/
  10. https://www.culture3.com/posts/claire-silver-on-why-taste-is-the-new-skill-and-the-future-of-ai-driven-culture
  11. https://sites.google.com/site/digihumanlab/home
  12. https://www.gsb.stanford.edu/insights/when-ai-generated-art-enters-market-consumers-win-artists-lose
  13. https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S2949882124000161
  14. https://www.oii.ox.ac.uk/wp-content/uploads/2022/03/040222-AI-and-the-Arts_FINAL.pdf
  15. https://www.youtube.com/watch?v=-gcUJcwufsg
  16. https://www.clairesilver.com/collections
  17. https://news.syr.edu/blog/2025/08/12/how-artists-are-embracing-artificial-intelligence-to-create-works-of-art/
  18. https://www.turing.ac.uk/research/interest-groups/ai-and-arts
सारंग उपाध्याय
लेखक और पत्रकार

पत्रकार और लेखक सारंग उपाध्याय का जन्म 9 जनवरी, 1984 को भुसावल, महाराष्ट्र में हुआ. जड़ें मध्य प्रदेश के हरदा जिले में. इन्दौर यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा मिली. बीते 15 सालों से इन्दौर, मुम्बई, नागपुर, औरंगाबाद, भोपाल और दिल्ली में पत्रकारिता की. वर्तमान में ‘अमर उजाला’ दिल्ली में कार्यरत हैं. सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों के लेखन में लगातार सक्रिय सारंग सिनेमा में विशेष रुचि रखते हैं. डॉ. राममनोहर लोहिया के साथी बालकृष्ण गुप्त के आलेखों पर केन्द्रित उनकी एक किताब ‘हाशिये पर दुनिया’ 2013 में प्रकाशित है. कहानियों के लिए उन्हें 2018 में म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के ‘पुनर्नवा पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया है. ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी’ उनका पहला उपन्यास है. इस उपन्यास पर उन्हें शैलेश मटियानी पुरस्कार भी मिला है.

ई-मेल : sonu.upadhyay@gmail.com

Tags: 20262026 विज्ञानAIएआई और कलासारंग उपाध्याय
ShareTweetSend
Previous Post

कला का अर्थ : अरविन्द ओझा

Next Post

अंचित की प्रेम कविताएँ

Related Posts

आशंकाओं के द्वीप में लघु मानव  : मयंक
समीक्षा

आशंकाओं के द्वीप में लघु मानव : मयंक

चंदायन : एक और अधूरी किताब : चंद्रभूषण
शोध

चंदायन : एक और अधूरी किताब : चंद्रभूषण

ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ
कविता

ज्ञानेन्द्रपति की कुछ नई कविताएँ

Comments 4

  1. बटरोही says:
    1 month ago

    एआई की समस्या एक झूठे अनुभव के विस्थापन की नहीं है, यह व्यक्तिवाद के उस अहंकारी और तानाशाही रवेये का विस्तार है जिसे औपनिवेशिक शासन ने भारतीय मनीषा पर दो सौ साल पहले आरोपित किया। भारतीय ज्ञान की परंपरा धर्म और आत्मिक साक्षात्कार के बीच से गुजरती है, जब कि पश्चिम की व्यक्ति के ईगो के सार्वजनिक प्रदर्शन की। दोनों एक दूसरे की विरोधी हैं। भारत में प्रज्ञा और धर्म से जुड़े सवाल निरंतर सक्रिय रहे हैं और उन्हें उन्होंने मानवीय चेतना का विस्तार के स्थान जोड़ा है, फर्क यह है, यहाँ बीच में उनकी तरह चर्च नहीं, मनुष्य है। इसीलिए वह इतना विस्तार पा सका है और आज 2026 में भी पूरे संसार के मानस को मथ रहा है, इसे भाजपा, आरएसएस के साथ जोड़कर देखेंगे तो कुछ हाथ नहीं लगेगा। आदमी और प्रज्ञा की यात्रा को क्या एक सिरफिरी मशीन बदल सकती है? कुछ देर के लिए वह चीजें तहस नहस कर सकती है, लोगों को बेचैन भी, मगर आदमी की जिजीविषा का स्थानापन्न कैसे हो सकती है। आदमी चेतना है और मशीन उसके द्वारा निर्मित पुर्जा। देखते जाइये, आने वाला भारत एक नई क्रांति का सूत्रधार बनने जा रहा है।

    Reply
  2. Karan jena says:
    1 month ago

    Sir human aapka lekh pasha hay lekin ek baat bolna chaunga ki india me sab kuch kala sports byapar sab ek particular group hi karta aya tha caste ke bajahse ya fir paisa unke pass bahit tha dusre communty ke pass itna kuch tha hi nahi ab thoda sudhar aya hay log dhire dhire gana sikh rahe hay creative field me entry le rahe hay guitar animation Sikh rahe hay han ai muskil kardiya hay tradtional anime aur drawing karne alwònka kaam ko ek second me kar rah ahy lekin usko use karke bahit admi pasia bhi to akma rah hay halaki iske liye laptop aur ai ka gyan hona jaruri hay arthik durbal kareni ke log nahi akr ap rehe hay isme bhi to overall ek hi baat bolenge ki sab chij ka limit hona chhaiye ki ai ko control karna jaruri hay nahi to ek chance ehay ki insan bekar ho jaega termintor matrix event bhi ho skata hay rela life me ais aanadaja hay
    Baki society me thoda mix up hona chhaiy ejatidharm bhul ke jo jo karna chhaiye uskeo karne de help milna chhaiye bas itna bol na chahte hay me

    Reply
  3. धनंजय सिंह says:
    1 month ago

    कला सदैव दो पक्ष का पैरोकार रहा है कला कला के लिए अथवा उपयोग के लिए … ए . आई. डिजिटल माध्यम का एक इलेक्ट्रॉनिक मार्ग है जिसकी अपनी सीमाएं और विवशताए हैं अठारहवीं शताब्दी अर्थात कैमरा आने के बाद से आज तक कलाकारों के सामने अनेक नवीन चुनौतियां सामने आयी बावजूद हाथ से बनी कलाकृतियां करोड़ों में और डिजिटल माध्यम में निर्मित फोटो …की कीमत बहुत कम आंकी जाती है दरअसल सृजनात्मक कलाकृतियां प्रकृति के भीतर का स्पन्दन होने के कारण अमूल्य वाण होती है और अन्य डिजिटल माध्यम मनुष्य के लाभप्रद सुविधाओं के अधीन मानसिक उपज होने के कारण… सुखदायी है लेकिन कालजयी नही …
    अन्तर स्पष्ट है …
    एक पंक्ति स्मरण में है …

    “कलाकार नीरद होता
    जनहित होते है सींकर,
    कलाकार शिवशंकर होता
    जग हित कर्ता विष पीकर !
    …
    अर्थात्‌ ए आई कला माध्यम जनहित के लिए है और कलाकार तो ईश्वर ही है जिसके समान अन्य कोई नही…

    Reply
  4. Nisha dhakad says:
    1 month ago

    Al ko kevel ek kla ka saadan maanna chahiye
    Kalakaar nhi
    Kyunki baavnaaye sirf sjivo me hoti h nirjiv vastuvo me nhi
    Or Al ko insaan ne bnaya h jo sirf ek nirjiv mashin h jbki sjivo( insaan )ko bagvaan ne bnaya h or bagvaan se bda koi kalakaar nhi
    Isliye AI kisi kalakaar ya insaan ki jgah to le skta h pr use sirf saadan mana jaye sataa nhi
    Kyunki sansaar me sta sirf isvar ki hi chli h or chlegi baaki to jo aaya h vo jyega…………bs itna hia

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक