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समालोचन

Home » अमेय कान्त की कविताएँ

अमेय कान्त की कविताएँ

अमेय कान्त की कविताएँ समकालीन जीवन के एकाकीपन, उदासी और निरर्थकता के चित्र बनाती चलती हैं. वे बताती नहीं, दिखाती हैं. छोटे-छोटे प्रसंग चमकते हैं और अपनी रोशनी छोड़ जाते हैं. उनकी कुछ नई कविताएँ प्रस्तुत हैं.

by arun dev
March 16, 2026
in कविता
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अमेय कान्त की कविताएँ
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अमेय कान्त की कविताएँ 

 

अल्प-विराम

बहुत पुराने किसी दोस्त से
इस तरह भी होता है मिलना
जब छोटे कस्बे से गुज़रती कोई ट्रेन
ठहरती है स्टेशन पर
महज़ दो मिनट के लिए

औपचारिक पूछताछ के बाद
कुछ सघन वाक्यों  के बीच
अचानक बज उठता है हॉर्न
और ख़त्म हो जाता है समय

ट्रेन चल देती है आगे
उसके भीतर और बाहर खड़े दो लोग
कुछ देर के लिए
ठहरे रह जाते हैं

 

 

नदियाँ

नदी के घाट पर
क़तार में बैठे हैं
नानी
फिर माँ
फिर मैं
फिर मेरी बेटी

एक नदी मेरे सामने बह रही है
और एक मुझसे होकर

 

 

आवाज़

जाते हुए आदमी की आँखें
काँच की दीवारों जैसी होती हैं

उनके उस पार
एक सन्नाटा होता है
जहाँ नहीं पहुँचती कोई आवाज़

आप बुलाने के लिए कितना भी चीख-चिल्ला लें
उस तरफ़ आपको लगातार अनुसना करते हुए
कोई अपना सामान बाँधकर
जूते पहन रहा होता है

आख़िर में उस तरफ़ से
बस दरवाज़ा बंद करके
चले जाने की आवाज़ आती है

 

 

दिसंबर

पीठ पर पड़ती है सर्दी की धूप
और उड़ती हुई नमी की परछाई
दिखाई देती है
हाथ में रखी किताब के पन्ने पर

कुछ अक्षर भी सफ़ेद सतह छोड़कर
निकल जाना चाहते होंगे
नीलेपन की तरफ़

लेकिन भौतिकी में
कोई नियम नहीं है
उनके अवस्था-परिवर्तन के लिए

भाषा में भी नहीं है कोई नियम
ऐसी स्थिति में
बचे रह गए अक्षरों से बनने वाले अर्थ के लिए

लिहाज़ा
वे चुपचाप बैठे रहते हैं अपनी जगह
पन्ने पर बची रह गई
ज़रा-सी गर्माहट के साथ

 

अकेला आदमी

बड़े शहर में
एक आदमी है अकेला
ऐसे ही कई और
अकेले आदमियों की तरह

छह दिन काम के बाद
कटता है उसका दिन
दीगर कामों, बची हुई नींद
और ख़ामोशी के बीच
जहाँ कई बार वह
अपने जैसे अकेलों के बीच
समेट लेता है थोड़ी ज़िंदगी

जिन्हें छोड़ आया है बहुत दूर
फ़ोन पर उनसे बातें करते हुए
अक्सर भरभराकर ढह जाने से
रोक लेता है ख़ुद को

अकेले आदमियों के
ऐसे अनगिनत अकेलेपनों से
हर बार
और बड़ा होता जा रहा है शहर

 

 

ग्रैंडफ़ादर पैराडॉक्स

सोचा होगा हर किसी ने कभी न कभी
कि मौका मिले तो
अतीत में जाकर
बदल दे चीज़ों को ज़रा सा

लौटना चाहा होगा
निर्णय के उस पल में फिर से
जहाँ से निकलते थे कई रास्ते
चुनना चाहा होगा कोई और रास्ता
जो ले जाता शायद
अपने ही किसी
और बेहतर संस्करण की तरफ़

मगर उस क्षण तक पहुँचने की
हर संभावना के आगे
खड़े थे पुरखे
त्यौरियाँ चढ़ाए
संदेह से देखते

रोक दिया उन्होंने हर बार
दी हमारे वजूद की दुहाई
इस तरह रह गए हम इसी तरफ़
अपने वर्तमान में

पुरखो, आप आश्वस्त रहें
हम लौट आएँगे चुपचाप
करके ज़रा-सा फेरबदल
होने ही न देंगे कोई विरोधाभास
मौका तो दीजिए एक बार
भरोसा तो रखिए ज़रा-सा!

* “ग्रैंडफ़ादर पैराडॉक्स” टाइम ट्रैवल से जुड़ी एक अवधारणा है. इसके अनुसार, अगर कोई व्यक्ति अतीत में जाकर अपने ही पूर्वज (जैसे दादा) को उनके संतान होने से पहले मार दे, तो उसका ख़ुद का भी कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा.

 

 

बहुत चलने वाली चप्पलें

भागते समय में
अपनी ठसक से रहती हैं
बहुत चलने वाली चप्पलें

पहनने वाले की टालमटोल
और नई की ज़रूरत न होने के बीच
थोड़ी सी जगह में
वे बनाए रखती हैं अपने लिए गुंजाइश

उनके घिसे हुए तलों पर
किसी अज्ञात लिपि में
लिखी होती हैं
अच्छे बुरे वक़्त की ढेरों कहानियाँ

पैरों से उनकी गहरी दोस्ती
रोके रखती है उनकी बर्ख़ास्तगी को
लंबे समय तक

अपनी बदलती भूमिकाओं के बीच
वे चलती चली जाती हैं
पूरे ढीठपन के साथ
इस तरह
जैसे समय और नश्वरता के
उनके लिए कोई मायने नहीं

 

 

स्वाद

जैसे नदियाँ बढ़ती हैं आगे
अपने भीतर कई नदियों, धाराओं का पानी लिए
वैसे ही स्वाद पहुँचा, माँ
तुम्हारे हाथ तक

जब भी कौर उतरता है
गले से नीचे
स्वाद मेरे भीतर
और गहरी कर देता है
अपनी लिखावट

 

 

स्पीकर

फेरीवालों ने बाँध लिए हैं
अपनी गाड़ियों पर स्पीकर

वे अब समझ गए हैं
कि बाज़ार के कोलाहल के बीच
गले की अपनी सीमाएँ हैं

अब वे आवाज़ें साथ लेकर चलते हैं
अपनी ऊर्जा बचाते हुए

और भिड़ने देते हैं
मशीन को
नुकीले समय से.

 

 

स्पर्श

पार्क में रोज़ घूमने आने वाला
वह बूढ़ा आदमी
किसी गिरते हुए बच्चे को देखते ही
अचानक उठने को होता है

उसके शरीर में
न जाने कहाँ से आ जाती है
यह स्फूर्ति

जब दौड़कर संभाल लेती है
बच्चे को उसकी माँ
वह मुसकुराकर फिर बैठ जाता है
अपनी जगह
आश्वस्त होकर

उसकी उंगलियों की स्मृति में
अचानक करवट लेता है
धुंधलाता जा रहा
कोई स्पर्श.

 

 

अमेय कान्त
10 मार्च, 1983, देवास (म.प्र.)
एक कविता संग्रह ‘समुद्र से लौटेंगे रेत के घर’ वर्ष 2016 में अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित. म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा ‘पुनर्नवा पुरस्कार’, दिनकर सृजन पीठ उज्जैन द्वारा दिनकर (सोनवलकर) सम्मान.
सम्प्रति : लगभग 10 वर्षों तक इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन के बाद पिछले आठ वर्षों से फ़्रीलांस अनुवाद तथा अन्य कार्य
amey.kant@gmail.com
Tags: 20262026 कविताअमेय कान्त
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Comments 11

  1. Arun kamal says:
    4 weeks ago

    अमेय की कविताएँ बहुत अच्छी हैं,सूक्ष्म ब्योरों को दर्ज करतीं और आभ्यंतर की ओर मुड़तीं।

    Reply
  2. पंकज सुबीर says:
    4 weeks ago

    बहुत अच्छी कविताएँ हैं प्रिय अमेय, छोटी कविताएँ बहुत सघनता के साथ रची गयी हैं। पढ़ने के बाद कुछ देर को उदास कर देती हैं ये कविताएँ। बधाई, विशेषकर नदियाँ और स्पीकर के लिए।

    Reply
  3. Anonymous says:
    4 weeks ago

    sureshpateljbp@gmail
    बहुत मार्मिक हृदयस्पर्शी कविताएं। अच्छा कवि और सच्चा कवि वह होता है जो अपने समय को अपनी कविताओं में लिखता है तुम दोनों हो।खूब प्यार और अशीर्वाद।

    Reply
  4. Naresh Kanungo says:
    4 weeks ago

    छोटी छोटी कविताओं के माध्यम से बड़ी बातें कहने वाले कवि प्रिय अमेय को आत्मीय बधाई।
    सभी कवितायें अपना – अपना महत्व रखती हैं, पुनःबधाई !

    Reply
  5. चयन कानूनगो says:
    4 weeks ago

    अमय भईया की कविता हमारे आस पास घटने वाली छोटी छोटी चीजों को बड़ी बारीकी से हमारे समक्ष रखती है। कविता छोटी होते हुए भी बड़ी गहन हैं। ओर आपको सोचने पर मजबूर कर देती है।

    Reply
  6. संदीप नाइक says:
    4 weeks ago

    हमारे समय के अकेलेपन, चिंता, संताप और तनाव को व्यक्त करती ये कविताएं नदी, माँ और नानी होने की संभावनाओं और उम्मीदों के बीच जीवित रहेंगी, अमेय की कविताएं बदलते समय में एक छोटा सा जुगनू है जो अँधेरों में भभकता है

    ये कविताएं संवेदना के स्तर पर सघन और बेहद प्रभावी है और बार बार पढ़े जाने की मांग करती है ताकि भीतर बहुत गहरे में धंस कर अपनी जगह बना सकें

    Reply
  7. Vijay Rahi says:
    4 weeks ago

    बहुत सुन्दर कविताएं। स्पीकर, अकेला आदमी और अल्पविराम ख़ासतौर से पसंद आई। बहुत बधाई और शुभकामनाएँ अमेय जी को। समालोचन का आभार।

    Reply
  8. प्रोफेसर मंजुला राना says:
    4 weeks ago

    अमेय की कविताओं में समय स्वयं बोल रहा है।अदंर तक कौंधती कविताएं संवेदना को भी सोचने पर मजबूर कर रही है।नदी और स्पीकर के उपमान बहुत कुछ कह रहे हैं। धारदार लेखन की बड़ी बधाई एवं असीम शुभकामनाएं।

    Reply
  9. शरद कोकास says:
    4 weeks ago

    वास्तव में कवि वह होता है जिसकी निगाह बहुत छोटी-छोटी चीजों पर जाती है घिसी हुई चप्पल और स्पीकर यह अद्भुत कवितायें हैं । शहर में अकेला आदमी इस समय की त्रासदी है।एक राजनीतिक प्रतिबद्धता भी इन कविताओं में दिखाई देती है यह नितांत अकेलेपन की या चुपचाप देखने रहने की कविताएं नहीं है ।
    शरद कोकास

    Reply
  10. Tulika Kekre says:
    4 weeks ago

    आपने ज़िंदगी को इतनी खूबसूरती और गहराई से शब्दों में पिरोया है कि दिल को छू गई। आपकी कविता सच में एक एहसास बनकर सामने आती है।

    Reply
  11. Hemant Deolekar says:
    3 weeks ago

    प्रिय युवा कवि साथी अमेय कांत की यहाँ प्रस्तुत कविताओं को पढ़कर सुखद संतोष हुआ। पहले संग्रह से इन कविताओं तक आते आते उनकी दृष्टि व्यापक हुई है, संवेदना गहन हुई है। दृष्टि पैनी भी हुई है, जीवन की अव्यक्त – सी बातों को पकड़ रही हैं। भाषा में सादगी है और कहने का संजीदा तरीका उसके पास है। यहाँ की सभी कविताएं मन को बांध लेती हैं। साधारण – से लगते विषयों में अमेय कविता की अंतर्वस्तु ढूंढ लेते हैं। और पाठक ठिठक जाता है। बिना कोई चीखो- पुकार मचाये ये कविताएं लगभग चुपचाप सी गुज़र जाती हैं, मगर पाठक को संवेदित कर देती हैं। ग्रैंडफादर पैराडॉक्स बहुत बिरली कविता है। हर किसी के मन में चुभी रह गई फांस – सी। हम सभी ने अतीत में अपने परिजनों को दुख पहुंचाया है। उनके सपनों को ठुकराया है। इसी तरह पुरखों के नज़रिए से देखें तो वे भी किसी पछतावे से भरे रहे होंगे। वे भी कुछ रद्दो बदल करना चाहते होंगे। हम भी तनिक पुनर्विचार करना चाहेंगे। नहीं तो, एक यकीन तो दिला ही देंगे कि अपने पूर्वग्रह छोड़िये और भरोसा कीजिये। इस कविता को सोचना एक मुश्किल बात थी, क्योंकि कविता का मूल विचार भले ही सबके मानस में घुमड़ता हो, लेकिन वह इतना सूक्ष्म या गुप्त है कि उसकी मुखरता महसूस ही नहीं होती। नदी भी बहुत सहजता से व्यक्त हुई है। स्पीकर तो मेरी कविता फेरिवाले की एक प्रतिलोम कविता ही बन गयी है। मेरी कविता के समय में और अमेय की इस कविता के समय में जो अंतर आया है, वह बखूबी व्यक्त हुआ है। स्पीकर ने जगह ले ली है फेरिवालों की आवाज़ की।

    अमेय की सृजन यात्रा जीवन के कई कई व्यक्त और गुप्त ठिकानों तक पहुंचे और पाठकों को रस व करुणा से भर दे। यही भरोसा भी और शुभ कामनाएं भी। समालोचन को बधाई।

    Reply

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