| अनामिका की कविताएँ |
1.
युद्धभूमि में उकाब
यूक्रेन में, गाजापट्टी में
उड़ रहे हैं जो उक़ाब,
क्या भाई-बंधु हैं
शार्दूल चिड़िया के
जो कुरुक्षेत्र के ऊपर से गुज़री थी
आसन्नप्रसवा.
आर्तनाद भीषण उठा तो वह काँपी
और हवा में गुडुप चार अंडे गर्भ से गिरे
रक्तकीच में -छपाक.
उसी क्षण किसी बाण की चोट से टूटकर
एक गजघंट गिरा ऐसा
कि अंडों का बन गया वह
सुरक्षा कवच.
सेती गई घंट के भीतर
रक्तकीच की ऊष्मा ही उन अंडों को
जब तक कि युद्ध चला.
युद्ध जब समाप्त हुआ
कुरुक्षेत्र पर फैली
मरघट की विकट शांति,
अपने कुछ शिष्यों के साथ वहाँ से गुज़रे
ऋषि शमी.
टन-टन-सा बोलता हुआ
अपने भीतर ही मगन जैसे डोलता हुआ
गजघंट उनको सुनायी दिया
रक्तकीच के ऊपर औंधे मुँह लेटा था जो
उसके भीतर यह क्या बज रहा था
अनहद-जैसा?
घोर आश्चर्य हुआ उनको.
गजघंट जो उठाया
शार्दूल शावक वे चार उड़े
चारों दिशाओं में,
जो आज तक उड़े ही जा रहे हैं
रणभूमियों पर मंडराते हुए
अच्छी किताबों से जैसे
पावन वे शब्द उड़ा करते हैं
उल्टी हवा के ख़िलाफ़
“सत्यमेवजयते” …
पृथ्वी शांति…
औषधयः शांति…
शांतिरेव शांति…
शांतिः शांतिः शांतिः
2.
कैमरा इतिहास की आँख है
कैमरा इतिहास की आँख है.
विश्वयुद्ध के ही समय से
वह जो करता आ रहा है
उसे “शूट” करना ही कहते हैं
बंदूकों-तोपों का वह लेकिन प्रतिपक्ष है!
अख़बार उसके ही दम से
नींद उड़ा देते हैं तानाशाहों की.
लेकिन हमको क्या हुआ है?
नाश्ते की मेज़ पर,
अखबार की सबसे बुरी ख़बर
चुस्की बन जाती है
और एक लंबी उसाँस-
“इस बार हम बच गए!”
कोई बच सकता है कब तक
और फिर कितना बच सकता है
जितना धीरज बचता है
अपने सत्येतर समय में
स्क्रीन पर एक साथ ही उड़ाए गए
बैलूनों के गुच्छों की लय में
सत्य के इतने ये रंगीन , “परिवर्धित“ संस्करण झेलकर?
धुएँ से घिरे मुझ दमे के मरीज की छाती में
जितनी बचती होगी ऑक्सीजन
बीच रात उठ बैठकर लंबी साँसें भरने तक?
अनुलोमों का या विलोमों का
विकट अकबकाहटों के इन अनंत सिलसिलों का करें तो करें आख़िर क्या?
कुछ होने से कुछ नहीं होता.
3.
एक बिजूके की प्रेम कहानी
मैं हूँ बिजूका एक ऐसे खेत का
जिसमें सालों से कुछ नहीं उगा.
बेकार पड़ा-पड़ा
धसक गया है मेरा
हाड़ी-सा गोल-गोल माथा.
उखड़ गई हैं मूँछें
लचक गए हैं कंधे
एक तरफ़ झूल गया है कुरता.
कुरते की जेबी में
चुटुर-पुटुर करती है लेकिन
नीले-पीले पंखों वाली
छोटी-सी चिड़िया..
एक वक्त था जब यह चिड़िया
मुझसे बहुत डरती थी
धीरे-धीरे उसका डर निकल गया.
कल मेरी जेबी में अंडे दिए उसने
मेरे भरोसे ही उन्हें छोड़कर
चली गई वह दाना लाने बहुत दूर.
नया-नया था मेरी खातिर
भरोसे का कोमल एहसास.
काठ के कलेजे में मेरे
बजने लगा एकतारा.
दूर तलक है उजाड़ मगर
यह जो चटकने- चमकने लगी है
बूटी भरोसे की
उसकी ही मूक प्रार्थना फूली है शायद.
लो, बदलियाँ भी
उमड़ आई हैं अब क्षितिज पर.
खिल जाएगा धीरे-धीरे
अब पूरा संसार,
बस जाएगा, हाँ
धीरे-धीरे
फिर से यह उजड़ा दयार!
लेकिन जब खेत हरे हो जाएँगे ,
मुझको तो फिर से भयावह बना देंगे खेतों के मालिक,
हाड़ी-मुख पर मेरे कोलतार पोतेंगे
लाल नेल पॉलिश से आँखें बनायेंगे
खून टपकाती हुईं,
मक्के के मोचों पर लस्सा लगाकर
मूँछें बनायेंगे खूब कड़क.
ढह जाएगी तब तो मेरी यह निरीहता!
जब मैं भयावह हो जाऊँगा फिर से
डर जाएगी मेरी चिड़िया मुझी से?
क्या बेबसी प्यार का घर है?
प्यार हमदर्दनगर है.
4.
निस्संग
मैं कौन हूँ?
क्या बताऊँ तुम्हें मैं, महर्षि रमण
हर बार यही पूछते हो
“हु आर्ट दाउ?“
बरसों टटोलती रही
यही समझने की कोशिश की
कि मैं कौन हूँ और क्या हूँ मैं!
जीवन
विपरीत दिशा से
दौड़ता चला आया.
उसे कहीं और ही पहुँचने की जल्दी थी.
मैं बीच में आ गई तो वह टकराया
मैं औंधे मुँह गिर गई तो वह जरा रुका
मुझको कंधे से उठाया
देखता रहा मेरी आँखों में
और धीरे से कहा- “सॉरी.
फिर वह आगे बढ़ गया
मैं ठगी-सी रह गई
ये क्या हुआ!
उसने कहा था यह
जल्दी में मुड़ते हुए
“आप कौन ,मोहतरमा?
देखा नहीं इस इलाके में पहले?”
फिर से वही प्रश्न
“मैं कौन हूँ”.
जो भी आगे बढ़ गए
जाने-अनजाने धकेलते हुए,
उनकी “सॉरी” का अब मैं क्या करूँ?
सोच रही हूँ तबसे लगातार
मैं कौन हूँ?
माफ कर देने के एक मिनट पहले की दुविधा हूँ?
माफ नहीं करने की सुविधा हूँ?
भूलभुलैया हूँ पूरी की पूरी
एक तरफ़ से खुलती हूँ तो मुंदती हूँ पचपन तरफ़ से
एक ओर आग से ढँकी हूँ तो दूसरी ओर
नीली बरफ़ से.
मेरा कुछ हो ही नहीं सकता!
मैं अपने ही ख़िलाफ़ बैठी पंचायत हूँ.
आयतें कहती हैं
“अलग वर्ग है इसका”
और वर्ग कहते हैं
ना-तमाम आयत हूँ.
अलग पात है मेरी,
अलग जात है मेरी
फिर भी समझने के लायक़ हूँ.
गायक हूँ महाशून्य की
शून्य से शून्य घटा
शून्य बचा.

5.
मेहमाननवाज़ी
मेरे बाबा कहते थे
कोई राहगीर जो खड़ा हो दरवाज़े पर,
उससे यह मत पूछो
कहाँ जा रहा है, कहाँ का है?
हाथ-पाँव धुलवाकर
खाना खिला दो उसे
और एक तोशक बिछा दो
चौकी पर दालान के.
सोकर उठेगा, कुछ कहने की
ताक़त मिलेगी उसे तो
वह ख़ुद ही बोलेगा
किस्से सुनायेगा इधर-उधर के
और दोस्त बन जाएगा
या कि मुर्शिद तुम्हारा
करेगा इशारे
दिखाएगा आगे का रास्ता.
अब चौकी कहीं दिखाई नहीं देती
बस चौकीदार हर जगह हैं
और पुलिस चौकियां हैं
तलाशी है, संशय हैं, नाके हैं.
अतिथि नहीं रह गया कोई,
समय भीख में मिलता है
जेब टटोलकर बढ़ाया जाता है
सबसे छोटा सिक्का जेब में पड़ा.
“दे दे दाता, मौला देगा
तुझे भी मिलेगा
किसी द्वार तो तू भी जाएगा.”
कहता है हँसकर फ़क़ीर.
अब जो भी आते हैं दरवाज़े
बस कुछ करते हैं डिलीवर
और हड़बड़ी में बढ़ जाते हैं आगे.
दालान नहीं, न ही चौका,
घर पर नहीं है घर,
वो भी गया है परदेस
ढूँढने एक मौक़ा.
6.
यू ट्यूब पर कांतासम्मित
मेरा उनसे एक अजब तरह का रिश्ता है.
जब भी बहुत ज़्यादा थक जाती हूँ,
मैं देखती हूँ इनका चैनल.
ये मुझको हाथ पकड़कर
एक नई दुनिया में ले जाती हैं
जो दरअसल बहुत पुरानी है
माँ के डाले खट्टे-मीठे
नींबू अचार-सी चटक,
क़स्बे की दुनिया-सी
एकदम सरल और सुंदर.
ये कितने आराम से बोलती हैं!
इनके स्वर में उमा दी वाला धीरज है.
जैसे राजा हर्षवर्धन थे, वैसी वे
तैयार सब संचित निधियाँ लुटाने को
मुक्तहस्त बाँटने को सारे कौशल
सारे गुर और राज़ सारे
जो गृहस्थी की तपस्या में अर्जित किए थे
या दादी-नानी, बुआ-मौसी, माँ से सीखे थे
पाकविधियाँ और कढ़ाई-बुनाई के नमूने,
केश सज्जा, रूप सज्जा के कई प्रकार,
सारी जड़ी-बूटियां, नुस्खे
जो जीवन का चेहरा दें निखार.
सब छोटी बातें बताती हुई
अचानक ही हंस देती हैं
और उसके बाद जो कहती हैं,
कितना मिलता-जुलता है उससे
जो कहती थी मुझसे हँसती हुई दीदी-
“जीवन यह अच्छा घनचक्कर है!
सुख ढूँढा,
गैया के पीछे लगे बछड़े जैसा
दुःख चला आया.
जीवन के साथ बँधी
मृत्यु चली आई.
दिन के पीछे डोलती आयी
रात बाल खोले हुई.
प्रेम के पीछे चली आयी
दाँत पीसती कचमछाहट.
बाई वन, गेट वन फ्री.
लेकिन अतिरेकों के बीच कहीं कुछ तो था
जो जस का तस रह गया
लिए लुकाठी हाथ
डफली बजाता हुआ और
मगन गाता हुआ
“मन लागा मेरो यार फ़क़ीरी में!”
| ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत कवयित्री अनामिका का जन्म 17 अगस्त, 1961 को मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार में हुआ. वे दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं. उनकी पुरस्कृत और देश-दुनिया की बहुतेरी भाषाओं में अनूदित प्रमुख कृतियाँ हैं—‘बीजाक्षर’, ‘अनुष्टुप’, ‘कविता में औरत’, ‘खुरदुरी हथेलियाँ’, ‘दूब-धान’, ‘टोकरी में दिगन्त’, ‘पानी को सब याद था’, ‘My Typewriter is My Piano’, ‘Vaishali Corridors’ (कविता-संकलन); ‘अवान्तर कथा’, ‘दस द्वारे का पींजरा’, ‘तिनका तिनके पास’, ‘आईनासाज़’ (उपन्यास); ‘स्त्रीत्व का मानचित्र’, ‘स्वाधीनता का स्त्री-पक्ष’, ‘त्रिया चरित्रं : उत्तरकांड’, ‘स्त्री मुक्ति : साझा चूल्हा’, ‘स्त्री-मुक्ति की सामाजिकी : मध्यकाल और नवजागरण’, ‘Feminist Poetics : Where Kingfishers Catch Fire’, ‘Donne Criticism Down the Ages’, ‘Treatment of Love and War in Post-War Women Poets’, ‘Proto-Feminist Hindi-Urdu World (1920-1964)’, ‘Translating Racial Memory’, ‘Hindi Literature Today’ (आलोचना).
ई-मेल : anamikapoetry@gmail.com |




अनामिका जी के कविता संग्रह का प्रकाशन संस्थान बताएँ ।
” यू .ट्यूब में कांता सम्मित ” अद्भुत लोक का संसार सजाती कविता है ।
नए मिजाज़ की कविताएँ.बधाई समालोचन और अनामिका जी को.
‘क्या बेबसी ही प्यार का घर है …
बहुत खूब! बेहतरीन
आपकी रचनाएँ सदा ही गहरा प्रभाव छोड़ती हैं मैम
माफ कर देने के एक मिनट पहले की दुविधा हूँ… माफ नहीं करने की सुविधा हूँ? क्या कमाल है भावों और शब्दों का। सादर नमन आपको मैम!!
💯🎯✔️ तारीफ के शब्द नहीं! शूटिंग वाली कविता लगता है मेरे निजी Archive की कविता है
अभी Anamika Anamika मैम की कविताएँ पढ़ रहा हूँ। ‘समालोचन’ पर आयी थी पिछले दिनों। पढ़कर बस यह लिखने का मन हुआ।
‘युद्धभूमि में उकाब’, ‘एक बिजूके की प्रेम कहानी’ और ‘मेहमाननवाजी’ विशेष रूप से प्रिय लगीं। युद्ध का आधुनिकता और मिथक से क्या संबंध हो सकता है, मिथक कविता के भीतर आधुनिकता और पूँजी के अंतर्विरोध को कैसे डिकोड करती है इन बातों को ‘युद्ध में उकाब’ उठाती है। ‘बिजूके की प्रेम कहानी’ कविता निश्चित रूप से विमर्श की कविता है। प्रेम, छवि (image) और छवियों की व्याख्या की कविता है। बिजूके से चिड़िया प्रेम करती है जब वह सहज दिखता है। वही चिड़िया डरती है जब उसे भयानक बना दिया जाता है। दोनों ही स्थिति में बिजूके की कोई भूमिका नहीं है। कोई दूसरा है जो उसकी छवि निर्माण कर रहा है। यह इस अर्थ में कमाल की कविता है कि इतिहास से लेकर समकालीन समय में हम देखें तो छवि निर्माण पहचान, सत्ता, प्रेम संबंध सब तय करते हैं। इस अर्थ में चिड़िया और बिजूका प्रतीक में बदलकर आधुनिक सभ्यता के बिचौलिए (आज मीडिया, आईटी सेल, पीआर एजेंसी, विज्ञापन का तंत्र आदि) के कार्य प्रणाली की पोल खोलता है। यह कविता अर्थ की दृष्टि से बहुत दूर तक जाती है जिसे समझने के लिए कविता के साथ चली आने वाली सांस्कृतिक परिस्थितियों को भी डिकोड करना होगा। ‘मेहमान नवाजी’ कविता मनुष्य और मनुष्य के बीच सहज संबंधों के दरारों के पीछे की परिस्थितियों को रेखांकित करती है। गंवई मूल्यों से शहरी मूल्यों (जिसे आज आधुनिक मूल्य कहकर अति प्रतिष्ठित करते हैं) तक की यात्रा में जो कुछ छूट गया या छूट रहा है उसपर ठहरकर विचार करने की जरूरत है। सभ्यता की यात्रा में ध्यान देना चाहिए कि जो कुछ अच्छा था उसे हम सहेजते चलें। शहरीकरण और स्मार्ट सिटी के नाम पर हमने सहज मानवीय मूल्य और सामूहिकता खो दिया। इसका असर यह हुआ कि हमारा संपर्क सीमित हुआ और आत्मीयता का आयतन भी संकीर्ण होता गया। अतिरिक्त सुरक्षा, सोसाइटी ( जो कि शहरों में किलेबंदी की तरह है) और सौंदर्य के नाम पर किसी और के लिए स्पेस खत्म हो गया। दालान जो दुख-दर्द जानने की जगह थी। जगह ऐसी की पहले उसका दुख हरो यानी उसे खिलाओ-पिलाओ थकान दूर करो तभी तो अपना दुख कहेगा या सहज होगा। किसी से आत्मीय होने के लिए पहले स्वयं को उस लायक बनाना होता है (शिक्षण शास्त्र में इसे रेपो स्थापित करना कहते हैं)। यह हमारी सभ्यता का दुर्भाग्य है कि इस यात्रा में हम बहुत तेजी से इन मूल्यों को किनारे कर चुके हैं।