अंचित की प्रेम कविताएँ
(असु के लिए)
ग़ैरज़रूरी चीज़ें
कई ग़ैरज़रूरी चीज़ें तुम्हारे बारे में जानता हूँ,
बेवजह तुम किस शहर में रहती हो
तुम्हारा पता क्या है, तुम कहाँ पढ़ाने जाती हो
तुम्हारे स्कूल का समय क्या है
तुम्हारे घर में कौन कौन है
किसके प्रेम में हो आजकल तुम!
नीरवता
शांत दोपहर की नीरवता में
सबसे ज़्यादा जागती है
तुम्हारी चाह.
उन्होंने मुझे ज़िंदा छोड़ दिया है
अकेला रहने के लिए
एक कवि से उधार लेता हूँ यह पंक्ति
उन्होंने सिखाया है
कि एक खेल की तरह है ज़िंदगी
एक लंबा खेल जहाँ
मुझे भावनाओं पर नियंत्रण सीखना होगा.
पतझड़ धीरे धीरे फ़रवरी की ओर कदम बढ़ाता है
यह पहली फ़रवरी होने वाली है तुम्हारे बग़ैर.
आओ मेरी नायिका, वापस आओ
लौट आओ, मेरी पुकार सुनो.
बिना नींद की इस दोपहर में
आओ और बताओ कि मेरी साँसें चल रही हैं.
दया
मैंने प्यार चाहा था
और दया भी नहीं मिली.
अब दोनों की ज़रूरत नहीं है.
एक पूरी सदी की बेचारगी लिए
मैं एक पूरा कवि भी नहीं बचा.
यहाँ इस वक्फ़े में
तुम्हारी कोमलता एक मेड़ की तरह
बाढ़ का पानी रोक रही है.
मैं चाहता हूँ पानी घुसे
तुम चाहती हो इतना ही आए
कि मैं बचा रहूँ बंजर होने से.
दीक्षा
सत्कार के सारे नियम सीख गया
सब निभाये, जैसे जैसे तुमने मांगे
तने कंटीले तारों पर चलता रहा पंद्रह बरस
अपने को यीशु समझता रहा
दंभ से देखता रहा अपने खूनी तलवे
मैं नई परिभाषाओं में घट रहा हूँ अब
यह एक नई दीक्षा है तुम्हारी दी हुई
नए मंत्र सुसज्जित कर रहे हैं मेरी वाणी
नई हो गई है सलीब की लकड़ी
नई चुभन.
नया यह सोचना
क्यों तुमने मुझे छोड़ दिया?
तुमने मुझे छोड़ दिया.
बदलाव
कोई उसके कान चूमता है
बदले में तुम मेरे चूम लो
कहा तुमने.
उसकी लटें किसी और चेहरे पर गिरती हैं
मैं तुम्हारा चेहरा ढक दूँ अपने केशों से
उसकी गर्दन पर नसें हैं नीली
मेरे सीने पर एक तिल है उसके बदले
उठ कर वह भेजती है प्यार भरे संदेश
मैं भी भेजूँगी तुम्हें रोज़
मैं सफेद रातों को आने वाले सपनों का क्या करूँगा?
मेरा सपना देख लो एक बार, यहाँ ठहरो.
कैसे बदल दूँ एक स्त्री से दूसरी स्त्री
तुम ही बताओ
हो जाऊँ इस आदमी से कोई दूसरा आदमी.
सुखों की अनुपस्थिति
सबसे ज़्यादा डर दिन के आख़िरी घंटे में लगता है
गलती है देह एक एक क्षण
कितना धुआँ है अब मेरे आसपास
लंबी साँसें लेता हूँ
अब तुम नहीं हो और एक धक्का लगता है.
मैं उदास दिनों का आदी रहा हूँ
गमगीन शामें पहाड़ों को देखते बितायीं है
उनका उत्सव मनाया है.
पर यह इस कदर खलती है अनुपस्थिति
जैसे निचुड़ गया हूँ कड़ी धूप में
एक उमस भरा वक्फ़ा है
एक बेकली से भरा सूखता दीयर.
गर्भनाल
इस तरह साँस आती है
जैसे मैं तुम्हारा बच्चा
उलझ गया हूँ हमारी ही गर्भनाल से
न तुम्हें छोड़ सकता हूँ
न तुम्हारे साथ ही हूँ कहीं
ज़हर धीरे धीरे फ़ैल रहा है
मुझे काट कर फेंक दो
मैं मांस का लोथड़ा भर तुम्हारे बिना
रक्त और वायु का अपूर्ण एक तंत्र
एक कली फूल की
जो मुरझा गई खिलने से पहले.
कंटेम्प्लेटिंग सुसाइड
दस दिन तक न नहाए बदन से उसने जब अपने कपड़े हटाए
एक तेज भभका उठा और उसने सोचा कि वह जब लाश होगा
कैसी गंध छोड़ेगा.
वह अपनी देह से खूब मुहब्बत करता रहा
उसका एक एक रेशा जानता पहचानता कि
उससे ज़्यादा मोह उसने किसी से नहीं किया.
उसे अपने देखे तमाम शव याद आए
और उसने कल्पना की कि वह कैसा दिखेगा.
उसने सोचा दाढ़ी बना कर उसने अच्छा काम किया.
उसने सोचा उसके थोड़े और बाल होते तो वह संस्कार के समय
सड़ती देह में भी सुंदर लगता.
दुनिया का कोई ख्याल उसके मन में नहीं आया
हिंसा और उससे लड़ने के सारे ख्याल उसने घनी निराशा में
वहीं छोड़ दिए जहाँ अब उसे नहीं होना था.
उसने जाने के तरीके सोचे
नदी में कूद जाना कि लगे वह दुर्घटना में डूब गया
पुल पर से कूदना कि अख़बारों में उसके जाने की ख़बर छपे
या और कुछ नहीं तो यह कि किसी आती हुई ट्रेन के आगे
उसका पैर फिसल गया.
ग़लत होने का क्या मतलब रहा अब, सोचता हुआ मुसकुराया.
प्रारब्ध क्या कहता था, उसकी सीमा से वह दूर जा रहा था.
कठिनाइयों से लड़ने की कोई ज़रूरत नहीं बची थी.
हार-जीत की परिभाषाएँ उसके साथ नहीं जातीं.
कोई और दुख अब उसके रास्ते नहीं आता.
उसने कल्पना की और दुआ में हाथ उठाए
ईश्वर उसे इसकी हिम्मत बख़्शे.
फिर वह लौट गया
एक हसीन याद की तरफ़.
अंचित1990 तीन कविता संग्रह ‘साथ-असाथ’, ‘शहर पढ़ते हुए’, ‘आधी पंक्ति’ |

अंचित


बहुत दिनों बाद कविताएँ पढ़कर काफ़ी देर ख़ामोश बैठा रहा…
सभी कविताएं बहुत बेहतरीन है
दीक्षा और गैर जरूरी
मेरे मन की बनी हैं, मृत्यु के विकल्पों के भंवर से होकर गुजरने को महसूस किया है और इसका अंत कि हसीन यादों की ओर मुड़ जाना मृत्यु जितना ही मारक है
अंचित अपनी कविताओं में बड़े प्यारे लगते हैं. कमाल की गूफ्तगू है ये कविताएँ. इन कवितओं का दृश्य विधान सचमुच खामोश कर देता है. इस पावन मन: स्थिति में पहुंचना बड़ी बात है.
बहुत इंटेंस कविताएं है।प्रेम और अनुभूति की गझिन अभिव्यक्ति।बधाई अंचित और समालोचन।
अंचित जी की प्रेम कविताएँ पहली बार पढ़ी हैं। वाकई में हिज़्र के बाद जितनी मनोदशाएं होती हैं, इन कविताओं वो सब बड़े ही सहज और निर्मल रूप में पेश कर दिया है। बहुत बधाई और शुभकामनाएँ प्रिय कवि अंचित जी।
बहुत सुंदर और मर्मस्पर्शी कविताएँ हैं अंचित। विशेष रूप से ‘ग़ैरज़रूरी चीज़ें’, ‘दीक्षा,’ ‘नीरवता’ और ‘बदलाव’। ‘ग़ैरज़रूरी चीज़ें’ प्रेम की अपेक्षाहीनता और प्रयोजन को नए तरीके से परिभाषित करती लगती है। साफ़ दिखता है कि ये घटित चीज़ें है, कविताओं ने इन्हें बस प्रोसेस्ड किया है।किसी कवि के लिए यह एक विरल बात है, लेकिन उतनी ही पीड़ादायी भी है। बाक़ी कविताएँ भी अच्छी हैं। फिर से बधाई।