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Home » अनिल गंगल की कविताएँ

अनिल गंगल की कविताएँ

वरिष्ठ कवि अनिल गंगल की कविताएँ समकालीन जीवन के यथार्थ से टकराती हुई उस संवेदनात्मक आंच में तप्त होती हैं, जिसकी एक धारा प्रतिरोध की है. अपने जीवन के आठवें दशक में प्रवेश कर चुके कवि की ये कविताएँ आत्म-निरीक्षण और अस्तित्वगत प्रश्नों से जूझती हुईं, उनकी भीतरी दुनिया की जटिलताओं को सघन और विश्वसनीय रूप में व्यक्त करती हैं. प्रस्तुत है.

by arun dev
March 25, 2026
in कविता
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अनिल गंगल की कविताएँ
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अनिल गंगल की कविताएँ

 

1.
असमय बूढ़े हुए लोग

वे लोग
जो कैलेंडर से नहीं
चिंताओं से उम्र गिनते हैं
असमय बूढ़े हो जाते हैं.

उनकी हँसी
पहले बालों से जाती है
फिर आँखों की चमक से
और अंत में सपनों की जेब से.

वे अभी तीस के भी नहीं होते
पर उनकी चाल में पचपन की थकान बस जाती है
जैसे कंधों पर घर, रिश्ते, किस्तें और अनकहे डर
ईंटों की तरह रख दिये गये हों.

उनके आईने चेहरा नहीं दिखाते
जिम्मेदारियाँ दिखाते हैं
उनकी रातें नींद से नहीं
हिसाब-किताब से भरती हैं.

कभी वे भी बारिश में भीगना चाहते थे
बिना वजह हँसना
किसी को बेवजह याद करना
पर जीवन ने कहा
‘पहले बड़े हो जाओ.’

और वे बड़े हो गये
इतने बड़े कि भीतर का बच्चा
बोलते-बोलते चुप हो गया

ये वही लोग हैं
जो भीड़ में सबसे शांत दिखते हैं
पर उनके भीतर एक पुराना पेड़ खड़ा है
जिसकी छाल पर समय ने
उम्र से पहले सालों के निशान काट दिए हैं.

असमय बूढ़े हुए लोग
दरअसल थके हुए नहीं होते
वे बस बहुत जल्दी समझदार बना दिए गये होते हैं.

और समझदारी
जब बचपन छीन कर आती है
तो वह वरदान नहीं
धीरे-धीरे गिरती हुई एक अदृश्य बर्फ़ होती है.

 

2.
एक स्त्री का बड़बड़ाना

वह बड़बड़ाती है
जैसे चूल्हे की बुझी राख में
कोई चिंगारी धीमे-धीमे साँस ले रही हो.

उसकी आवाज़
कभी बर्तनों की खनखनाहट में छिप जाती है
कभी दरवाज़े की चौखट से टकरा कर
लौट आती है भीतर.

वह बड़बड़ाती है सब्जी काटते हुए
भीगे कपड़ों को निचोड़ते हुए
बच्चों की कॉपियों पर झुकी हुई
लाल स्याही से कम
अपने मन की स्याही से ज़्यादा.

कोई समझता है
कि यह उसकी आदत है
कोई कहता है-
‘फिर शुरू हो गई….’

पर वह जानती है
यह बड़बड़ाहट दरअसल इतिहास है
पीढ़ियों से जमा अनकहे वाक्यों का.

वह बड़बड़ाती है
क्योंकि ऊंची आवाज़ में बोलना
उसे सिखाया नहीं गया
क्योंकि चीख़ घर की दीवारों पर अशुभ मानी जाती है.

तो वह शब्दों को धीमे-धीमे उबालती है
जैसे दाल पकती है
ढक्कन आधाखुला
भाप आधी दबाई हुई.

उसकी बड़बड़ाहट में कभी शिकायत है
कभी हँसी की टूटी किरच
कभी अपने ही नाम को धीरे से पुकार लेने की कोशिश.

एक दिन
जब घर बहुत शांत होगा
और कोई आवाज़ नहीं बचेगी
तब शायद समझ आए
कि वही बड़बड़ाहट इस घर की धड़कन थी.

 

3.
शैतान की भूख

शैतान की भूख
रोटी से नहीं मिटती
वह तलाशता है आँखों में डर का नमक
और भीड़ में फैली चुप्पियों का मांस.

वह खेतों में नहीं उगता
वह उगता है अफ़वाहों की नमी में
जहाँ सच की धूप धीरे-धीरे जला कर
राख कर दी जाती है.

उसकी जीभ पर लहू का स्वाद नहीं
बल्कि सत्ता का स्वाद चढ़ा है-
वह सिंहासन चाटता है
और न्याय की हड्डियाँ कुतरता है.

शैतान की भूख
बच्चों की हँसी से चिढ़ती है
वह खिलौनों को बारूद में बदल देना चाहता है.

वह मंदिरों की सीढ़ियों पर बैठ
प्रार्थनाओं को गिनता है
और मस्जिदों की दीवारों से
करुणा का पलस्तर नोच लेता है.

उसे भूख है नामों की-
तुम्हें किसी खांचे में बांट देने की
ताकि वह तुम्हें एक-दूसरे के विरुद्ध परोस सके

लेकिन जब कोई
अपने हिस्से की रोटी दूसरे के साथ बाँटता है
जब कोई डर के विरुद्ध एक छोटी-सी आवाज़ उठाता है-
शैतान का पेट थोड़ा-सा खाली रह जाता है.

और वही खालीपन
उसकी सबसे बड़ी हार है.

 

Painting- B Vithal

४.
सब कुछ ख़त्म नहीं होगा

जब आख़िरी पेड़ की छाया
थक कर ज़मीन पर गिर जाएगी
और नदियाँ अपने ही सूखे कंठ से
रेत चाटती दिखेंगी

जब शहरों की नींद में
सायरनों की चीखें उगेंगी
और आदमी अपने ही बनाए यंत्रों के बीच
धीरे-धीरे पत्थर होता जाएगा

तब भी सब कुछ ख़त्म नहीं होगा.

क्योंकि एक बच्चा किसी मलबे पर बैठा
ईंट के टुकड़े से सूरज बनाता रहेगा
एक स्त्री राख में से अनाज के दाने चुनती रहेगी
एक बूढ़ा टूटी हुई खाट पर लेटा
पुरखों की कहानियाँ बुनता रहेगा.

तब भी
किसी अंधेरी सुरंग में एक जुगनू
अपनी छोटी-सी रोशनी ले कर हठ करेगा
कि रात पूरी नहीं हुई है.

सब कुछ ख़त्म नहीं होगा
जब तक एक भी मनुष्य अन्याय के सामने
अपनी काँपती आवाज़ उठाता रहेगा

जब तक कोई प्रेम
भूख से बड़ी भूख बन कर
रोटी से पहले बाँटा जाएगा

जब तक आसमान का एक टुकड़ा
किसी की आँख में
उम्मीद की तरह चमकता रहेगा.

समाप्ति का शोर बहुत बड़ा हो सकता है
पर जीवन की ज़िद उससे भी बड़ी होती है.

इसलिए जब लगे
कि अब कुछ नहीं बचा
तब याद रखना
राख के नीचे अभी भी अंगार छिपा होता है.

और जहाँ अंगार है
वहाँ सब कुछ ख़त्म नहीं होगा.

 

५.
फटे तले वाले जूते

फटे तले वाले जूते
दरअसल रास्तों की डायरी होते हैं
उनमें दर्ज़ होती हैं धूल की परतें
पसीने की गंध
और अधूरी यात्राओं की तारीख़ें.

वे चमकते शो-रूमों में नहीं मिलते
वे मिलते हैं मज़दूर की एड़ियों के नीचे
स्कूल जाते बच्चे के सपनों में
या उस बूढ़े की चाल में
जो हर सुबह उम्मीद पहन कर निकलता है.

तलवा जब फटता है
तो सिर्फ़ रबर नहीं टूटता
ज़मीन और देह के बीच की दूरी
थोड़ी और कम हो जाती है
कंकड़ सीधे चुभते हैं
जैसे सच्चाइयाँ बिना किसी परदे के.

बरसात में वे भीगते हैं चुपचाप
और धूप में सूखते हुए सिकुड़ जाते हैं
फिर भी साथ नहीं छोड़ते.

फटे तले वाले जूते जानते हैं
कि रास्ते कभी ख़त्म नहीं होते
सिर्फ़ तलवे घिसते हैं
और आदमी अपनी ज़िद से
उन्हें फिर से बांध लेता है
किसी पुरानी डोरी से.

वे जूते
दरअसल हमारी ज़िद हैं
टूट कर भी चलने की.

 

6.
पुरखे

मिट्टी की गंध में
अब भी सांस लेते हैं पुरखे
हल की मूठ पर जमी पसीने की परत में
उनकी उंगलियों की लकीरें चमकती हैं.

वे चले गये
पर गये कहाँ
खपरैल की छत से टपकती बूँदों में
उनकी खाँसी की धीमी खनक है
चूल्हे की राख में उनकी अधजली इच्छाएँ.

हम जब भी रोटी तोड़ते हैं
एक कौर उनके हिस्से का अदृश्य थाली में रख देते हैं
भले याद न करें
पर स्मृति की भूख अपने आप झुक जाती है.

पुरखे केवल तस्वीरों में नहीं
वे हमारे चलने के ढंग में हैं
क्रोध की तीखी रेखा में
दया की अचानक भीगती आँखों में.

हम जो शब्द बोलते हैं
उनमें उनकी चुप्पियाँ घुली हैं
हम जो डरते हैं
वह उनके अधूरे संघर्षों की परछाईं है.

और जब हम
किसी अन्याय के सामने क्षण भर को ठिठकते हैं
पीठ पर कोई अनदेखा हाथ
हमें सीधा कर देता है.

पुरखे दरअसल अतीत नहीं
वे एक अदृश्य ऋण हैं-
जिसे चुकाने के लिए
हर पीढ़ी को अपनी मिट्टी फिर से जोतनी होती है.

 

7.
जागते हुए आधी रात

आधी रात
जब शहर अपनी थकी हुई देह बिस्तरों पर उतार देता है
मैं जागता हूँ
जैसे किसी भूले हुए सवाल की
आँख खुली रह गयी हो.

घड़ी की सुइयाँ दीवार पर नहीं
मेरी नसों में चलती हैं
खिड़की के बाहर चाँद
अपनी फीकी हँसी में सारे रहस्य छिपाए बैठा है
और भीतर यादें हैं
जो बिस्तर के कोनों से धीरे-धीरे
मेरे तकिये तक सरकती हैं.

आधी रात में
आवाज़ें भी सो जाती हैं
पर विचार
वे अड़ियल घोड़े हैं
जो दौड़ते रहते हैं एक अँधेरे मैदान में
जहाँ न दिशा है, न मंज़िल.

मैं जागता हूँ
जैसे अपने ही भीतर किसी पहरेदार की ड्यूटी पर हूँ
नींद की सीमा पर खड़ा देखता हूँ
कि कैसे सपनों का देश मेरे बिना भी बसता है.

और तभी समझ आता है-
आधी रात में जागना सिर्फ़ नींद का टूटना नहीं
यह आत्मा का अपने ही दरवाज़े पर
धीरे से दस्तक देना है.

सुबह आएगी
और रोशनी सब कुछ ढक लेगी
इस आधी रात में
जहाँ आदमी सबसे पहले ख़ुद से मिलता है
और सबसे अंत में
अपनी ही चुप्पी में टूट कर बिखर जाता है.
_____________

अनिल गंगल
1954, खुर्जा (बुलंदशहर) उ. प्र.
छह कविता संग्रह प्रकाशित.
अनेक विदेशी कविताओं, लेखों व कहानियों के हिंदी में अनुवाद.
कविता संग्रह ‘स्वाद’ पर राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘सुधींद्र पुरस्कार’ एवं राजस्थान जनवादी लेखक संघ का ‘अंतरीप सम्मान’.
सम्पर्क :
B-104, गाला सेलेस्टिया, वैष्णोदेवी सर्किल के पास, एस. पी. रिंग रोड, बालाजी विंड पार्क के सामने, अहमदाबाद-382481(गुजरात)
मो. 8233809053

Tags: 20262026 कविताअनिल गंगल
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Comments 6

  1. स्वप्निल श्रीवास्तव says:
    3 weeks ago

    बहुत दिन बाद प्रिय कवि मित्र अनिल गंगल की एक साथ इतनी अच्छी कविताएं पढ़ने को मिली. इनका कहन अलग है. सब कुछ खत्म नही होता. फ़टे तले वाले जूते. पुरखे लाजबाब कविताएं हैँ

    Reply
  2. हरिमोहन शर्मा says:
    3 weeks ago

    लम्बे अरसे बाद अनिल गंगल की कवितायेँ पढ़ीं| वरसे तो सभी संघर्षशील जीवन की कवितायेँ हैं पर एक स्त्री का बडबडाना या शैतान की भूख जैसी कवितायेँ आज के समय के विद्रूप को व्यक्त करती हैं.

    Reply
  3. Sawai Singh Shekhawat says:
    3 weeks ago

    भाई अनिल गंगल की ये कविताएँ ज़िंदगी के अनथक संघर्ष का आत्मीय दस्तावेज़ हैं।जहाँ स्मृतियों का सौंधापन उन्हें जीवंत बनाता है।

    Reply
  4. कुमार अंबुज says:
    3 weeks ago

    अच्छी कविताएँ हैं। बहुत दिनों बाद अनिल गंगल जी की कविताएँ समक्ष हुईं।

    Reply
  5. ऋषि कुमार शर्मा says:
    2 weeks ago

    आदरणीय अनिल गंगल जी मैंने समालोचना में आपकी तीन कविताएं पढ़ी मुझे आपकी तीनों कविताएं बहुत अच्छी लगी एक कविता उनमें थी “एक स्त्री का बड़बड़ना” यह कविता बहुत ही सारगर्भित और ग़ज़ब की है ।
    मैंने उसको पढ़ा और इसका आनंद लिया साथ ही आपके नाम के साथ मैंने इसको अपनी फेसबुक वॉल पर भी शेयर किया जिस पर बहुत सारे लोगों ने कमेंट किया सभी को यह कविता बहुत पसंद आ रही है मुझे तो यह खैर बहुत अच्छी लगी ही।

    साथ ही स्त्रियों को भी यह कविता बहुत पसंद आ रही है। क्योंकि मनोदशा और स्त्री की बड़बड़ाहट का सटीक चित्रण किया है। मैं आपको हृदय की गहराइयों से धन्यवाद देता हूं और आपका आभार व्यक्त करता हूं और मैं ये मानता हूं कि आपकी कविताओं को मैं भविष्य में भी आत्मसात करता रहूंगा। मैं विशेष रूप से प्रोफेसर अरुण देव जी का भी आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने इतनी सुंदर कविताओं का चयन कर समालोचना में छपा है..

    Reply
  6. नीरज नीर says:
    1 week ago

    अच्छी कविताएँ ….

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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