• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज

फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज

by arun dev
September 10, 2026
in फ़िल्म
Reading Time: 5 mins read
A A
फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
फ़ा
मैं नहीं तुम
______________________
कुमार अम्‍बुज

 

(एक)

देश और समाज के जीवन में यह कठिन समय है.
इकाई में कहें तो ये कठिन वर्ष हैं. कुछ गुज़र गए. कुछ बाक़ी हैं.
कितने? जितने हम गुज़ार देना चाहें. अंत की कठिनाई अधिक आक्रामक और प्रतिकार से भरी हो सकती है. प्राणांत से पहले प्रत्‍येक व्‍यवस्‍था पूरी ताक़त से प्रहार करती है. अगर वह निरंकुश है तो और कई गुना शक्ति से. अधिक निर्दयता से. अपने बचाव के लिए किए जा रहे बचाव में सर्वाधिक भयानकता निहित होगी. कोई सर्वसत्‍ता की पूँछ पर पाँव रख देगा तो वह पलटकर अपना फन निकालेगी.

मिथक, साहित्‍य और इतिहास एक साथ गवाही दे सकते हैं कि प्रत्‍येक शक्तिशाली सत्‍ता को अपने अधीन सदैव एक सभ्‍य, सुसंस्‍कृत समाज चाहिए. आज्ञाकारी और धर्मभीरू. जो आज्ञाकारी नहीं, वह सभ्‍य नहीं. जो धर्मभीरू नहीं, वह सुसंस्‍कृत नहीं. इसलिए अब सत्‍ता सभ्‍य बनाएगी. और संस्‍कार करेगी. जंगलों से निकालकर सभ्‍य बनाएगी. घरों से निकालकर सुसंस्‍कृत करेगी. यदि विरोध करोगे तो फिर उसके पास बर्बरता ही सभ्‍य बनाने का एकल उपाय रह जाएगा. कारगर औज़ार. सत्‍ता की यह संवैधानिक जवाबदारी भी है कि वह असभ्‍य प्रजा का अनुकूलन कर. कौन-सा संविधान? वही, जो उसने समानांतर रूप से अलिखित जारी कर दिया है. सत्‍ता का संविधान.

 

सोचो, तुम्‍हें मेरा जैसा भला अधिकारी मिला है. तुम्‍हारी अच्‍छी भली नौकरी है. भरा-पूरा, सुंदर परिवार है. तुम क्‍लर्क हो, तनख़्वाह कम है तो क्‍या, इज्‍़ज़त बहुत है. तुम्‍हारे भाग्‍य से मुझे ईर्ष्‍या होती है. मैं बॉस हूँ लेकिन तुमसे ईर्ष्‍या करता हूँ. मैं नहीं चाहता कि तुम्‍हारा कोई अहित हो. परंतु तुम मेरे अधीन काम करते हो. तुम्‍हारे अवज्ञाकारी होने से मैं भी निशाने पर आऊँगा. इसलिए प्रशासक होने के बावजूद मैं प्रेमपूर्वक समझा रहा हूँ कि तुम ‘फ़ा’ की सदस्‍यता ले लो. यही वह संस्‍था है जो हमारा, हमारे देश का ख़याल रख रही है. तुम मेरे प्रेम को धमकी मत समझो, इसे मेरी मुश्किल समझो. सोचो, यह मेरे लिए कितनी संगीन मुसीबत होगी कि तुम मेरे कार्यालय में हो और ‘फ़ा’ के सदस्‍य नहीं हो. इससे मेरी अयोग्‍यता ज़ाहिर होती है. तुम किस क़दर ढीठ हो. क्‍या मैं तुम्‍हें नौकरी से निकाल दूँ? तब कम से कम मेरी नौकरी तो बच ही जाएगी.

हम इंसान हैं, पशु नहीं हैं मगर हम भी ऊपरी आदेशों के खूँटे से बँधे हैं. तुम्‍हें कैसे समझाऊँ कि ‘फ़ा’ राजनीतिक दल नहीं है. यह समाजसेवी दल है. ‘फ़ा’ व्‍यक्ति है और संस्‍था भी. यह एकवचन है और बहुवचन भी. चलो, तुम सामाजिक संस्‍था मानकर इसमें शामिल हो जाओ. माना कि तुम राजनीति से दूर रहना चाहते हो लेकिन ‘फ़ा’ का राजनी‍त‍ि से कोई सीधा वास्‍ता नहीं. यह तो एक परिवार है. विशाल. सांस्‍कृतिक परिवार. देश-व्‍यापी. आदर्श संयुक्‍त परिवार. हमारा, तुम्‍हारा, सबका. तुम चाहो, न चाहो लेकिन हो तो इसी कुटुम्‍ब का हिस्‍सा. यह फॉर्म लो और दस्‍तख़त कर दो. ऑटोग्राफ़. हालाँकि, इधर ‘फ़ा’ की सदस्‍यता मिलना मुश्किल है. और जो सदस्‍य नहीं हैं, वे मुश्किल में हैं. इस समीकरण को समझो. जो इसका हिस्‍सा नहीं, वे देश का हिस्‍सा नहीं. मैं कोशिश करूँगा कि तुम्‍हारा आवेदन कहीं अटक न जाए. तुम अपनी पत्‍नी से बात करो. वह तुमसे ज्‍़यादा समझदार है. और हाँ, अब सदस्‍यता के लिए कुछ पैसा भी ख़र्च करना पड़ सकता है.

मैं तुम्‍हें प्रेम करता हूँ, तुम्‍हारा बॉस हूँ और संयोग से तुम मेरे मकान में ही किराये से रहते हो. ‘’लगता है अभी भी तुम दुविधा में हो. क्‍या तुम ‘फ़ा’ से घृणा करते हो?’’
‘’नहीं, नहीं. हमारे प्रधान तो हमारे देवता हैं. मगर साहब मैं किसी राजनीति के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता.‘’
‘’जो भी हो, कल तक तय करो कि तुम सदस्‍यता लेना चाहते हो या कोई दूसरी नौकरी खोजना चाहते हो. और हाँ, किराये के लिए दूसरा मकान भी.‘’

 

 

(दो)

Anni Difficli फ़िल्म से एक दृश्य

पूरा परिवार, ख़ासतौर पर पत्‍नी समझा रही है- ‘फ़ा’ की सदस्‍यता ले लो. किंतु-परंतु—यदि-अगर करोगे तो मगर से बैर हो जाएगा. और हम सबको इसी पानी में रहना है. तुम ‘फ़ा’ में नहीं जाना चाहते तो कहाँ जाओगे? जेल में? पता है लोग प्रधान के एक इशारे पर जान तक देते हैं. आठवें माले की खिड़की से छलाँग लगा देते हैं. क्‍या तुम एकदम कायर हो. तुमसे तो कूदने को भी नहीं कहा जा रहा है. क्‍या तुम्‍हें अपनी पत्‍नी, बच्‍चों की तनिक भी परवाह नहीं. तुम कहो तो मेरे एक रिश्‍तेदार की मदद से यह सदस्‍यता मिल जाएगी. रिश्‍वत देना होगी, मैं दे दूँगी. और तुम हाँ कहो या न कहो, तुम्‍हारी तरफ़ से मेरी हाँ है.

नायक का दिमाग़ चकरघिन्नी हो गया है.
वे भला मुझे सदस्‍य क्‍यों बनाना चाहते हैं. मैं एक ना-कुछ आदमी. जिसकी कम या ज्‍़यादा रोशनी में परछाईं तक ठीक से नहीं बनती. मैंने किसी का क्‍या बिगाड़ा है. एक मच्‍छर, चींटी, मक्‍खी या तिलचट्टे तक को मैंने कभी नहीं मारा. फिर ये सब मुझे ‘फ़ा’ में प्रवेश क्‍यों दिलाना चाहते हैं. मैं तो चीथड़ों से बना बिजूका या बागड़बिल्‍ला तक नहीं हूँ. मैंने कभी राह चलते गेंदे, गुलाब, कनेर के फूल नहीं तोड़े. ताल में खिले हुए कमल या फैली हुई जलकुंभी की तरफ़ भी ललचाई निगाह से नहीं देखा. राह में बैठे कुत्‍ते को नहीं हड़काया. उसे पत्‍थर नहीं मारा, लतियाया नहीं. फिर मुझे ये सब मिलकर आदमी से ‘फ़ा’ क्‍यों बना देना चाहते हैं? अपनी मित्र मंडली में बात करता हूँ. शायद मेरे दोस्‍त कुछ सही सलाह दे सकें.

तुम इतना सोच रहे हो. अगर ‘फ़ा’ को पता चला कि तुम इतना सोचते हो तो फिर चाहोगे तब भी ‘फ़ा’ की सदस्‍यता नहीं ले पाओगे. जो इतना विचार करता है उसकी अर्हता पर संदेह स्‍वाभाविक है. यह मत समझो कि तुम मन ही मन या मित्रों के बीच सोच रहे हो तो ‘फ़ा’ को कोई ख़बर नहीं होगी. हम दोस्‍त हैं और ‘फ़ा’ नहीं हैं मगर ख़बरची हो सकते हैं. यह ‘फ़ा’ का युग है. यहाँ दायाँ हाथ अपने बाएँ हाथ पर भरोसा नहीं कर सकता. और तुम जो सदस्‍यता लेने को इतना बड़ा सवाल बना रहे हो और कहते हो कि यह व्‍यक्तिगत मामला है. तुम इतना भी नहीं समझ रहे हो कि यह दरअसल सार्वजनिक मामला है. ‘फ़ा’ अब सार्वजनिक संस्‍था है. समाजसेवी. पंद्रह-बीस बरस पहले की बात अलग थी. तुम्‍हें आज के वक्‍़त में निर्णय लेना है. जो आदमी आठवीं मंजिल की खिड़की से कूद गया था, वह यही सोचकर कि ‘फ़ा’ ने कहा है तो मरना ही पड़ेगा. वैसे भी ‘फ़ा’ की छाँव तले यह ज़‍िंदगी भी कोई ज़‍िंदगी है. अब तुम ही बताओ, इसमें हम मित्र भला क्‍या सलाह दे सकते हैं, सिवाय इसके कि तुम विरोध करके आदर्शवादी जीवन चरितार्थ करना चाहते हो तो करो. दो-चार दिन में ही यह चरितार्थ हो जाएगा. फ़ा-फ़ा-फ़ा!

यदि तुमको लगता है कि़‍ यह तानाशाही है तो अपने जैसे विचारों के हज़ारों-लाखों लोग इकट्ठा करो. या चुपचाप देश की प्रगति में योगदान दो. पुरानी बातों में कुछ नहीं रखा. जो हमारे सामने है उसका सम्‍मान करो. हमें हर साल अपने पुराने विचारों पर पुनर्विचार करना चाहिए. और अवसर अनुकूल संशोधन. नया राज. नया काज. तुम अपना फ़ैसला ख़ुद लो. तुम कैसे मित्र हो जो हमसे पूछकर हमें संकट में डालना चाहते हो. एक ही सलाह और है- ‘दिमाग़ की नहीं, दिल की सुनो. दिमाग़ मुसीबत में डाल सकता है.‘
और परिवार की तरफ़ देखो. नौकरी बचाओ.

तुमने क्‍या निर्णय लिया? क्‍या तुम नहीं देख रहे हो कि ट्रेनें समय पर चल रही हैं. पक्षी पिंजरों में भी चहचहा रहे हैं. नदियों में पानी है और नहीं भी है तो बाँधों में सुरक्षित है. बारिश हो रही है. धूप निकल रही है. समुद्रों के किनारे ‘बीच’ पर रेत है. त्‍यौहार मनाए जा रहे हैं. धार्मिक जुलूस बेरोकटोक निकल रहे हैं. और तुम एक छोटा-सा फ़ैसला नहीं ले पा रहे हो. ‘फ़ा’ ज़‍िंदाबाद! तुम जानते हो कि सत्‍ताधीश ईश्‍वर का अवतार होता है.
क्‍या तुम ईश्‍वर का विरोध करना चाहते हो?

 

आख़ि‍र मरता क्‍या न करता. नायक दुविधा से बाहर आ गया है. काली कमीज़, काली टोपी और धूसर पेन्‍ट पहन लिया है. कोट पर ‘फ़ा’ का प्रतीक टाँक लिया है. कुल्‍हाड़ी के साथ बँधी लकड़ियों का गट्ठर. वह ‘फ़ा’ की मीटिंग्‍स में जाता है, रैलियों में ‘फ़ा’ का बैनर उठाता है. वह जीवन की मुख्‍य धारा में बह रहा है. हालाँकि उसके भीतर कुछ है जो किरकिराता रहता है. जिसे वह अपने युवा बेटे से भी साझा नहीं कर पा रहा है. बेटा देश की तरफ़ से सेना में लड़ने वाला है. वह अपनी बेटी को भी कई चीज़ों में, कई हरक़तों में रोक-टोक नहीं पा रहा है. अब ‘फ़ा’ जैसा तय करेगा उसी तरह कोई जीवन जी सकता है. या नहीं जी सकता है. वह बेटी को रोक नहीं सकता. उसकी बेटी एक ‘फ़ा’ को प्‍यार करने लगी है.

कभी-कभी उसे फ़ालतू ख़याल आते हैं. जैसे यही कि एक समय था जब देश में लोग अपनी-अपनी पसंद का संगीत सुन सकते थे. मर्ज़ी का खा-पी सकते थे, पहन-ओढ़ सकते थे. सारे मौसमों में थोड़ी-सी निश्‍चिंतता का उपवन खिला रहता था. सुंदरताएँ अनेक रूपों में संभव थीं. एक-दूसरे के प्रति दयालुता थी और सम्‍मान भी. यत्किंचित ही.
लेकिन था.

 

 

 

(तीन)

‘नहीं, तुम यह नाटक नहीं खेल सकते. इसे बंद करो. इस नाटक में संशोधन करो. यह फ़ा-विरोधी है.‘ ‘लेकिन सर, ‘फ़ा’ बीस साल पहले ही अस्तित्व में आया है, यह नाटक एक सौ साल पुराना है.‘ ‘इससे हमें कोई मतलब नहीं. इसका मतलब है कि कई लोग बरसों पहले से ही ‘फ़ा’ के विरोध की योजना बना रहे थे. इसे सेंसर किया जाता है. यह सरकार की नीतियों का विरोधी है. और इसमें बार-बार देश की राजधानी का नाम भी आता है. ये इतनी पंक्तियाँ, ये सारे संवाद काट दो.‘
‘सर, यह हटा देंगे तो फिर नाटक में कुछ बचेगा नहीं.‘
‘लेकिन देश बचेगा. यह बुद्धिजीवियों का शग़ल है कि वे ‘फ़ा’ से घृणा करें, उसे प्रचारित करें. यह नाटक नहीं, दुष्‍प्रचार है.‘

देश की प्रगति के लिए ज़रूरी है कि वही कला संरक्षित की जाए, उसी कला को प्रोत्साहित किया जाए जो ‘फ़ा’ समर्थक है. कलाओं को अपनी सही भूमिका समझना होगी. इसी में देश सेवा है. हमारा नारा है- ‘हम पर विश्‍वास करो, आज्ञापालक बनो, आगे बढ़ो.‘ ‘फ़ा’ के नेतृत्‍व में राष्‍ट्र महानता की दिशा में यात्रा कर रहा है. ‘फ़ा’ का उद्बोधन सुनने के लिए हर गाँव, हर क़स्‍बे, हर शहर के चौराहों पर लोग इकट्ठा हो रहे हैं. लाऊड स्‍पीकर लगे हैं. यह जन समूह देखो. यह ‘फ़ा’ के प्रति प्‍यार है. इस प्रेमिल भीड़ में फँसकर एक महिला अचानक मूर्छित हो गई है. लोग कह रहे हैं कि वह ‘फ़ा’ से बेइंताह प्‍यार करती है, उसकी आवाज़ सुनकर मारे ख़ुशी के अचेत हो गई. पवित्र दीवानगी. फ़ार्मेसी का एक आदमी उसके गालों पर कुछ हिसाब-किताब से तमाचे जड़ता है. वह धीरे-धीरे होश में आ जाती है.
इलाज कारगर हुआ.

उधर नायक की पत्‍नी भी प्रसन्‍न है. उसने महान ‘फ़ा’ का भाषण सुना. हमारे देश का महानतम कवि भी उतने अच्‍छे शब्‍द नहीं रच सकता जितने सुंदर हमारा ‘फ़ा’ रचता है. हज़ारों साल की बेनूरी से गुज़रकर ही कोई देश ‘फ़ा’ को जन्‍म दे सकता है. यानी दीदा-वर को. सौभाग्‍य का पहिया तब कहीं जाकर सही दिशा में घूम पाता है. लेकिन इस प्रसन्‍नता के वातावरण में अचानक एक अवरोध, एक चिंता, एक मुश्किल, एक काली छाया घिर आई है. उनके बेटे को ‘अनिवार्य सेना’ के तहत सीमा पर लड़ने के लिए बुलावा आ गया है. आपातकालीन सेवा है. तुरंत ज्‍वाइनिंग देना है. नागरिकों में से युवाओं को चुनकर फौज़ में भर्ती की गई है. उनकी ख़ुशी की मीनार पर एक बाज़ आकर बैठ गया है.
यह ‘फ़ा’ का बाज़ है.

 

नियमित मित्र-मंडली के बीच भी नायक उदास है. दोस्‍त दिलासा दे रहे हैं. तुम चिंता मत करो, हमारी सेनाएँ वीरता की मिसाल हैं. तुम्‍हारा बेटा विजेता बनकर लौटेगा. हम युद्ध के विरुद्ध हैं मगर अभी देश की ज़रूरत है. हम किसी को युद्ध में बुलाए जाने से कैसे रोक सकते हैं. हम नियंता नहीं हैं. साधारण लोग हैं जो केवल नियंताओं के फ़ैसलों को स्‍वीकार कर सकते हैं. हमारी ताक़त क्‍या है? यहाँ बैठकर गपशप करना. बहस करना. आख़िर नायक की सब्र का बाँध टूट जाता है- ‘तुम जो बहस में कहते हो, उसे कुछ ऊँची आवाज़ में कह सकते हो. चौराहे पर जाकर भी कह सकते हो. क्‍या वे सभी जेल में डाल दिए जाएँगे जो अपनी बात ज़ोर से कहेंगे? तुम आदर्शों की बात करते हो लेकिन हमेशा एक दूरी से. तुम्‍हारी छोटी-सी आदर्शवादी लालटेन बहुत दूर, बहुत ऊँचाई पर टँगी रहती है. वह मुहावरे की तरह भी काम नहीं आती. वह किसी ऐसी अज्ञात चोटी पर है जो किसी को दिखाई भी नहीं देती.‘

तुम बहस करते रहो और इसी बीच तमाम दूसरे देश पाबंदियाँ लगा देते हैं. हमारे देश को तरह-तरह की पाबंदियों की रंग-बिरंगी झंडियों, झालरों से सजा दिया जाता है. तो तुम कहने लगते हो कि यह अंतर्राष्‍ट्रीय मामला है, इसमें ‘फ़ा’ क्‍या कर सकता है. कोई तुम्‍हारी नहर बंद कर देता है. दूसरा तुम्‍हारे समुद्र में अपने जहाज़ का लंगर डाल देता है. तीसरा तुम्‍हें तेल नहीं देता. चौथा किसी तरह का सहयोग नहीं करता. कोई आयात रोक देता है. कोई निर्यात. अब मज़े करो. मजीरे बजाओ. देश तरक्‍़क़ी पर है.
हँसो- ‘फ़ा’!‘फ़ा’!‘फ़ा’!

जवाब में एक मित्र बुदबुदाता है- ‘हमारा देश महान था. महान रहेगा. एक नाख़ून तोड़कर हमारे महान देश का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.‘ अवसादग्रस्‍त नायक यकायक सोच में पड़ जाता है : कहीं यह नाख़ून उसके बेटे का रूपक तो नहीं.

 

 

(चार)

Anni Difficli फ़िल्म से एक दृश्य

लोहा लाओ. लोहा लाओ.
सोना लाओ. सोना लाओ. ओरा अल्‍ला पेत्रिया.
लोहे से हम गोलियाँ बनाएँगे. स्‍वर्ण हमें आत्‍मनिर्भर बनाएगा. देश पर यह बंदिशों का युग है. युद्धकाल है. चुनौती है. यह जनयुद्ध है. जनता को भागीदारी करना पड़ेगी. इसलिए सोना घर में मत रखो. लोहे का तुम घर में क्‍या करोगे. सब कुछ देश पर न्‍यौछावर करो. स्‍वाभिमान और गौरव की रक्षा के लिए दान करो. तुम हमें अपना सोना दो, हम तुम्‍हें स्‍वर्ण युग में ले जाएँगे. देशभक्‍त जनता का कर्तव्‍य है कि वह हमें ये धातुएँ निस्‍संकोच दें. चाँदी भी दे सकते हैं. टीन नहीं, पीतल नहीं. कुछ तुम भी रख लो. यह ‘फ़ा’ की पुकार है. ‘फ़ा’ का आदेश. जनता को समझ नहीं आ रहा है कि यह हो क्‍या रहा है. यह कैसी पुकार है. उनका सब कुछ और बचा-खुचा लूटने की साज़‍िश है. यह तो आर्थिक आत्‍मसमर्पण करने की पुकार है. जैसे अंतिम चेतावनी.

समानांतर रूप से घर-घर, गाँवों-क़स्‍बों से युवाओं को सेना में भेजने की कार्रवाई जारी है. ‘फ़ा’ का कहना है लोग तो अपनी मर्ज़ी से सेना में जा रहे हैं. आत्‍मोत्‍सर्ग की हवा चला रही है. ये दो युवा भाई कह रहे हैं कि हाँ, हम मर्ज़ी से जा रहे हैं. भूख अंतिम विकल्‍प को भी मर्ज़ी में तब्‍दील कर देती है. कहीं कोई रोज़गार है नहीं. खेतों में फ़सलें बरबाद हैं. जानवर तक भूख से मर रहे हैं. अब हमारी यह जान बाक़ी है. इसी को दाँव पर लगाएँगे. मर गए तो वहाँ मरें या यहाँ. दोनों तरफ़ मरण है. ऐसे ही आत्‍मोत्‍सर्ग की हवा चल रही है. बचकर आ सके तो कुछ पैसा लेकर आएँगे.

मैं सैन्‍याधिकारी हूँ लेकिन नहीं जानता कि युद्ध कब तक चलेगा या किस दिन अचानक बंद होगा. यह तो वे ही तय करेंगे जो ख़ुद युद्ध नहीं करते हैं. जो हमेशा दूसरी तरफ़ के बच्‍चों, महिलाओं या आमजन के मरने पर भी ख़ुशी जताते हैं. जैसे इस तरफ़ की जनता के मरने पर उधर के शंहशाह. बहरहाल, जो आदेश मिलेगा, पालन करूँगा. मैं वफ़ादार सैनिक हूँ. अनुभव से इतना ही कहता हूँ कि जब ‘फ़ा’ शांति की बात करता है तो समझो युद्ध होने वाला है. जब युद्ध, युद्ध की पुकार उठे तो समझो शांति चाहि‍ए. ‘फ़ा’ जब भी जनता को संबोधित करे तो समझो कि वह किसी नयी मुसीबत की सूचना देने वाला है. या किसी समस्‍या का सूत्रपात करेगा. और जब चार-छह देशों के प्रधान आपस में मिलते हैं तो किसी नयी साँठ-गाँठ के लिए. तब वे नक्‍़शे पर कुछ निशान लगा रहे होते हैं. नयी सीमा रेखाएँ खींच रहे होते हैं. जैसे मरने-मारने के लिए कुछ और नयी सीमाएँ बना रहे हों. अब कहीं ‘नो मेन्‍स लैंड’ नहीं है. फिर भी हम किसी संधि, शांति प्रस्‍ताव की आशा करते हैं तो अपने जीवन की आशा कर सकते हैं. तुम लोग मुझसे युद्ध के समाचार मत पूछो. इस तरह तुम मुझे युद्ध की याद दिलाते हो जबकि मैं उसे भूलना चाहता हूँ. मैं अभी छुट्टी पर हूँ और वापस जीवित आया हूँ. यही अंतिम समाचार है.

 

हमें कितना छोटा-सा जीवन मिलता है. उसका कितना बड़ा हिस्‍सा हम यस सर, यस सर कहकर बिता देते हैं. सब तरफ़ सिर्फ़ मुश्किलें हैं और शिकायतें. इसलिए हर नये दिन के साथ जीवन जो पेश कर दे, उसे स्‍वीकार कर लो. मेरी प्रिया, युद्ध भी दार्शनिक, पागल और क्षणजीवी बना सकता है. अब तुम मेरे पास हो. मैं अवकाश पर हूँ और मोर्चे पर नहीं हूँ. यही इस क्षण का सत्‍य है. मैं तुम्‍हारे चुंबनों से भरे प्रेमाकाश में शेष जीवन बिता देना चाहता हूँ. जैसे इस रात में चमकते तारों के नीचे. चुंबनों की बारिश में. बशर्ते इस बीच यकायक ‘फ़ा’ कोई नया संबोधन न हो. वह शांति का विचार पेश करता है तब भी रीढ़ की हड्डी में शीत की लहर दौड़ा देता है. अपवित्र शक्तिशाली भी पवित्र शांति की क़ीमत चाहता है. युद्ध के पहले या युद्ध के बाद. मैं जीवन के आकाश में जब भी चंद्रमा देखना चाहता हूँ तब-तब राहु दिख जाता है. या उसका सहोदर केतु.

‘फ़ा’ के पास कोई बिगुल नहीं है मगर वह शब्‍दों से ही बिगुल बजा देता है. हमारे महान राष्‍ट्र के आसपास हर देश की सरकार प्रतिक्रियावादी है. मजबूरी में हमें युद्ध करना पड़ता है. हमारी सहनशील जनता को इसे सहन करना पड़ेगा. यही हमारे उज्‍ज्‍वल भविष्‍य का रास्‍ता है. बस, चार साल, दस साल या बीस साल की ही बात है. जल्‍दी ही हम हमारे गौरव को फिर से प्राप्‍त कर लेंगे. विकसित राष्‍ट्र होंगे. यह ‘फ़ा’ का वचन है. हमें कोई रोक नहीं सकता. हथियार उठाओ. दुश्‍मन से लड़ना होगा. कई मोर्चों पर.
आंतरिक मोर्चे पर भी.

 

 

(पाँच)

नायक को अब ‘फ़ा’ के आंतरिक सांस्‍कृतिक संघर्ष दल की पोशाक भी दे दी गई है. कोट पर वही ‘लकड़ी गट्ठर और कुल्‍हाड़ी’ के युग्‍म का बैज है. वह दर्पण के सामने ख़ुद को देख रहा है. सोच रहा है वह क्‍या से क्‍या हो गया. हास्‍यास्‍पद. शायद दयनीय. उसे लगता है कि वह आईने में भी आदमक़द नहीं दिख रहा है. किसी खीझ, निराशा या अज्ञात आशा में वह अपनी टोपी उतारकर फेंक देता है. उसका प्रतिबिंब भी उसका अनुकरण करता है. देखकर वह चीख़ता है- कायर! इस विशेषण से वह जितना दूसरों को संबोधित करना चाहता है, उससे कहीं अधिक स्‍वयं को.

इसी बीच चिट्ठी आ गई है. उसके बेटे को दुबारा युद्ध में जाना है. ‘फ़ा’ ने एक और नया मोर्चा खोल दिया है. बेटे को फिर विदा करो. प्‍लैटफ़ॉर्म पर लोगों की दुखित भीड़ देखो. अशक्‍त और पराजित. लेकिन मुस्‍कुराने की कोशिश करते हुए. फिर वापसी का अनंत इंतज़ार शुरू होगा. समाचार सुनोगे तो सैनिकों के मरने की ख़बरें आशंकित कर देगी. प्रतीक्षा को भी अनिष्‍ट से भर देंगी. अनिद्रा ही निद्रा होगी. अमा निशा. लेकिन तुम कुछ नहीं कर सकते सिवाय इसके कि मुस्‍कुराकर, गले लगाकर विदा करो. और न्‍यूरोसिस जैसे जीवन में जाकर रहो. जीवन मनोताप है. संताप है. और तुम्‍हें देखकर लोग कहेंगे कि धीरोदात्‍त है.

बाध्‍यकारी सैनिक के माता-पिता, पत्‍नी के हृदय की हलचल कौन समझेगा. उसे किसी ईसीजी में नहीं पढ़ा जा सकता. उनकी ब्रेन-मैपिंग मुमकिन नहीं. ‘फ़ा’ कहता है कि वह केवल तब हार सकता है जब उसके सहयोगी या सैनिक नालायक निकल जाएँ. वरना उसे कोई नहीं हरा सकता. पराजय होगी तो ‘फ़ा’ के अलावा सारे लोग अयोग्‍य या मूर्ख करार दे दिए जाएँगे. ‘फ़ा’ कहता आया है कि उसमें पूर्व के सभी महान योद्धाओं की बुद्धि, वीरता, कौशल और साहस का समन्‍वय है.

रोज़ कोई न कोई समझाने आ जाता है कि ‘फ़ा’ आततायी नहीं है. अवतार है. अजन्मन है. इस भुवन में उसे कौन हरा सकता है. वह शत्रु के महल में श्‍वेत-अश्‍व, उच्‍चैश्रवा पर बैठकर प्रवेश करेगा. हमारे देश में जीत के जश्‍न की अविराम घंटियाँ बजेंगी. ओह, लेकिन अभी तो आसमान में शत्रुओं के बमवर्षक विमानों की गड़गड़ाहट भर गई है. ख़तरे का सायरन लगातार बज रहा है. चलो भागो, बंकरों में छिपो.

इधर जब ‘फ़ा’ के निकटस्‍थ वफ़ादार, भेदिए और जासूस किसी घटना-दुर्घटना में कभी प्राण गवाँते हैं तो जनता इस तरह से सवाल पूछने लगती है- ‘और आगे किसके मरने की आशा है?’ आशंका की जगह आशा का प्रयोग वे जैसे अपने ख़ुद के जीवन के लिए करते हैं.

 

आंतरिक सुरक्षा संघर्ष दल के प्रमुख की निगाह सब पर बनी रहती है. वह हर आंदोलन, अनशन या सार्वजनिक जगहों पर एकत्र लोगों की तस्‍वीरें खींचता रहता है. और पुलिस प्रमुख के साथ हर सप्‍ताह बैठकर बताता है कि इन चेहरों की भंगिमाओं को देखो. पहचानो कि इनमें से कौन है जो ‘फ़ा’-विरोधी हो सकता है. भले ही वह ‘फ़ा’ का सदस्‍य हो लेकिन घुसपैठियों की शिनाख्‍़त ज़रूरी है. निगाह के कोण से, मोना लि‍सा जैसी रहस्‍यमयी मुस्‍कुराहट से, माथे पर पड़ी शिकन से, चेहरे पर पसरी आश्‍व‍िस्ति या घबराहट से पहचानने में उसे माहरत है. देखो, यह हँस रहा है. हाँ, यह हँसी जैसी हँसी नहीं दिखती लेकिन यह जब हँसता है तो इसी तरह मनहूस दिखता है. इसकी मनहूसियत बता रही है कि यह ‘फ़ा’ को पसंद नहीं करता. इसका नाम सूची में लिखो.

अपनी रहस्‍यमयी हँसी के अपराध में नायक को एक महीने के लिए निलंबित कर दिया गया है. वेतन रहित. उसे समझाया जा रहा है कि हँसने, मुस्‍कुराने की तमीज़ सीखो. यदि ‘फ़ा’ के प्रति समर्पण है तो तुम्‍हें वैसा दिखाना भी चाहिए. अपनी कमियों को दूर करो. सभाओं, रैलियों में इस तरह के मुँह बनाओगे तो संकट आएगा. पत्‍नी समझा रही है कि ‘फ़ा’ के प्रति असंदिग्‍ध विनम्र रहो. आलोचना मत करो. तुम तो प्रशंसा भी अनमनेपन से इस तरह करते हो कि निंदा हो जाती है. तुम्‍हें अपने अंतर्मन को भी शरणागत करना होगा. अन्‍यथा निलंबन बर्ख़ास्‍तगी में तब्‍दील हो सकता है. एक महीने मैं किसी तरह घर का ख़र्च उठा लूँगी. कुछ पुराना सामान बेचकर. फिर आगे तुम जानो.

 

 

(छह)

Anni Difficli फ़िल्म से एक दृश्य

अब ‘फ़ा’ के हितैषियों को भी आशंकाएँ हो चली हैं. उन्हें लग रहा है कि ‘फ़ा’ युद्ध हार जाएगा. वह अलोकप्रिय हो रहा है. नायक के उच्‍चाधिकारी की भाषा भी अचानक बदलने लगी है. वह उसके घर आकर उससे कह रहा है कि वह ‘फ़ा’ के साथ कभी था ही नहीं. जो उसने किया या उसे करना पड़ा, वह महज़ सरकारी काम था. क्‍या करें, उच्‍च अधिकारी होना कसाई की नौकरी करने जैसा है. यह अजीबो-ग़रीब वर्दी जो हमने पहनी है, हमारी त्‍वचा नहीं है. यह बोझ है. इसे मैं उतारकर फेंक दूँगा. और यक़ीन करो, मैंने तुम्‍हें निलंबित नहीं किया. मुझसे दस्‍तख़त करवा लिए गए थे. हम तो वे बदनसीब प्रशासक हैं जो मालिकों के प्रति अपनी घृणा को सीने में दबाकर रखने के लिए अभिशप्‍त रहते आए हैं. इस घृणा को कई बार आज्ञाकारिता के परदे में भी छिपाकर रखना पड़ता है. बहुत तकलीफ़ होती है लेकिन मजबूरी है. घर-परिवार है. नौकरी के अलावा और कुछ है भी नहीं. लेकिन इधर तुम्‍हारे मित्र कानाफूसी में मुझे बदनाम करने में लगे हैं कि मैं ‘फ़ा’ का आदमी हूँ. तुम जानते हो कि मैंने दिल से कभी यह भी नहीं चाहा था कि तुम ‘फ़ा’ की सदस्‍यता लो. जो कुछ मैंने तुमसे कहा था, वह मेरी भाषा नहीं थी. केवल मुँह मेरा था.
विवश, लाचार मुँह. ‘फ़ा’ मुर्दाबाद!

शहर पर फिर बमबारी हो रही है. लोग तहख़ानों, बंकरों में चले गए हैं. सपरिवार. ठसाठस. लोग इस हद तक परेशान हो गए हैं कि सोच रहे हैं किसी भी तर‍ह युद्ध ख़त्‍म हो. चाहे दुश्‍मन ही जीत जाए. युद्ध तो रुके. काश, कुछ ऐसा विधान बने कि जो युद्ध शुरू करे, उसे शुरू से ही हारा हुआ मान लिया जाए. जो शांति न चाहे, वह पराजित हो जाए. हमारे ‘फ़ा’ ने तो यह नया युद्ध मोल ले लिया है और क़ीमत जनता से माँग रहा है. नायक अपने परिवार के साथ बंकर में सिमटा हुआ मन ही मन ख़ुद को कोस रहा है कि किस घड़ी में बुद्धि नष्‍ट हो गई थी जो मैं वर्दी पहनकर ‘फ़ा’ में शामिल हुआ. जैसे ‘फ़ा’ के प्रतीक चिह्न में बनी कुल्‍हाड़ी अपने पैरों पर मार ली थी. याद आता है कि उस पोशाक में बिल्‍कुल बंदर की तरह प्रतिबिंबित हो रहा था. अपने बच्‍चों से, अगली पीढ़ी से बस यही कह सकता हूँ कि ऐसे बंदर कभी मत बनना.

 

सरकारी ऐलान है कि शहर छोड़ दो. आसपास के छोटे गाँवों की तरफ़, निर्जन की तरफ़ चले जाओ. बमबारी से शहर भी बेचिराग़ होने वाले हैं. दुश्‍मन बदमाश है. अमानवीय है. नागरिक अपना ध्‍यान ख़ुद रखें, सरकार अभी युद्ध में व्‍यस्‍त है. देखो, यही है हमारा अजेय, अपारगम्‍य, शक्तिशाली, अजन्‍मन ‘फ़ा’. अब उसके समर्थक अधिकारी खुलकर कहने लगे हैं- ‘फ़ा’ ने कल्‍पनातीत दुर्गति कर दी. यह ‘फ़ा’ इतना अज्ञानी और अहंकारी न होता तो देश इस क़दर दयनीय स्थिति में न पहुँचता. वे यह भी समझ रहे हैं कि ‘फ़ा’ के जाने के बाद उन अधिकारियों की दुर्दशा होने वाली है. वे आपस में झगड़ने लगे हैं. एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं कि तुम ‘फ़ा’ के आदमी थे. दूसरा कहता है, मैं नहीं तुम ‘फ़ा’ के ख़ास आदमी थे. एक ही शोर उठ रहा है- मैं नहीं तुम. लोग ‘फ़ा’ के संग-साथ की हर स्‍मृति पोंछ देना चाहते हैं. जैसे दाग़ पोंछते हैं लेकिन जितना पोंछो, दाग़ उतने ही फैल जाते हैं.

‘फ़ा’ का वही विश्‍वसनीय ख़ुफ़‍िया आदमी अब ‘फ़ा’-विरोधियों की बजाय, ‘फ़ा’-समर्थकों की सूची बनाने में जुट गया है थे. कि वह तो हमेशा ही एक सरकारी सेवक की तरह कर्मठता और ईमानदारी से काम करता आया है. सूचियाँ बनाता रहा है. अब वह सरेआम सबको ‘कॉमरेड’ कह कर संबोधित करने लगा है. जैसे यह संबोधन आत्‍मरक्षा का कोई कूट शब्‍द हो गया है. वह सभी को यक़ीन दिला रहा है कि जो जेलों में हैं, वे बाहर आएँगे. और जो बाहर मौज़ करते रहे, वे कारावास में जाएँगे.
या फिर कहीं और? कहाँ? क्‍या पता!
फ़ा!फ़ा!फ़ा!!

 

 

 

(सात)

Anni Difficli फ़िल्म से एक दृश्य

ये बचे हुए, थके-माँदे सैनिक घर लौट रहे हैं. यातायात के पर्याप्‍त साधन नहीं हैं. अधिकांश पैदल ही चले जा रहे हैं. टोलियों में. या इक्‍के-दुक्‍के. ये अपने घरों की तरफ़ जा रहे हैं. घर बहुत दूर है और पहुँचकर ही पता चलेगा कि अब वहाँ घर है भी या नहीं. हो सकता है बीच रास्‍ते में, अपने घर की राह में ही ये उन लोगों द्वारा मार दिए जाएँ जिनके लिए वे लड़ते रहे. यह युद्ध के बाद का अवसाद है. छापामारी है. यह पागलपन है. समान वर्दी में दुश्‍मन भी छिपे हो सकते हैं. तुम हर चीज़ पर भरोसा कर सकते हो, हथियारबंद लोगों पर नहीं. तुम दुश्‍मनों को मारकर लौटते हो लेकिन गलियों के श्‍वानों द्वारा मारे जा सकते हो.

वापस लौटते हुए, घर से बस आधा किलोमीटर दूर हमारे नायक का फ़ौजी बेटा मार दिया गया है. नायक समझ रहा है कि जो कल तक ‘फ़ा’ का समर्थन कर रहे थे, दरअसल कायर थे. शातिर थे. और अब वे ‘फ़ा’ का विरोध इस तरह करेंगे मानो उन्‍होंने ही ‘फ़ा’ को नष्‍ट किया है. उन्‍हें अवसर अनुसार अपना पाला ही तो बदलना है. अनवरत कायरता और चतुराई ही उनकी विशेषज्ञता है. उपलब्धि है. वे ही हैं जो आमजन के जीवन को एक विशाल कारागार में, यातना गृह में बदल देते हैं. ख़ुद की जान बचाने के लिए मित्रों, परिजन और पड़ोसियों को दाँव पर लगा देते हैं. और जो उनकी वास्‍तविकता बतला सकता है, उसे वे विक्षिप्‍त घोषित कर देते हैं. या किसी तरह मार ही डालते हैं.

हमारा नायक एक साधारण क्‍लर्क, साधारण आदमी था. जिसने उसे ‘फ़ा’ का सदस्‍य बनने के लिए विवश किया और जो पिछले दिनों उलटबाँसी गा रहा था, वही ‘बॉस’ उसे बुलाकर कहता है कि तुम तो ‘फ़ा’ के साथ थे. यह वर्दी देखो और तुम्‍हारा यह आई. डी. कार्ड. तुम उसके सिविल दस्‍ते में भी थे. मैंने तुम्‍हें कितना समझाया था लेकिन तुम माने नहीं. तुम किस क़दर ढीठ थे. अब तुम्‍हें नौकरी से बर्ख़ास्‍त करना ही पड़ेगा.

एक प्रशासक ‘फ़ा’,
तुम्‍हें ‘फ़ा’ कहकर बर्ख़ास्‍त कर देता है.

 

युद्ध में अनगिन लोग मारे जाते हैं. बाक़ी लोगों को बताया जाता है कि वे सही कारणों के लिए मरे. देश की रक्षा के लिए प्राण त्‍यागे. लेकिन एक संधि, एक राजनीतिक फ़ैसला उनके अवसान को मज़ाक़ में बदल देता है. तब जीवित रह गए लोगों को पता चलता है कि वे ग़लत वजहों के लिए मारे गए. और ‘फ़ाहों’ का तो वैश्‍विक इतिहास है कि  मृत्‍यु अप्राकृतिक ही होती आई है.

ख़बर आ रही है कि ‘फ़ा’ गिरफ़्तार हो गया है. नहीं, उसने आत्‍महत्‍या कर ली है. नहीं, उसे राजधानी में जनता ने मार डाला है. नहीं, कोई भी ख़बर सच्‍ची नहीं. एक ही सच्‍चाई ध्‍यान में आती है- ‘फ़ा’ कभी मरते नहीं. हमारे ही बीच जीवित रहे चले आते हैं. उन्‍हें बस, मौक़ा मिलना चाहिए. एक मौक़ा और.

खंडहर हो गए शहर की सड़कों, चौराहों पर युद्ध समाप्‍ति‍ से उल्‍लसित भीड़ है. कोई कह रहा है यह प्रसन्‍न जनसमूह ‘फ़ा’ के नष्‍ट हो जाने के उपलक्ष्‍य में इकट्ठा हो गया है. इसी जनारण्‍य में से रास्‍ता बनाते हुए, इस कथा का उदास और पराजित नायक, वह ‘फ़ा’ जा रहा है
जो कभी ‘फ़ा’ नहीं था.

जो ‘फ़ा’ थे, जो ‘फ़ा’ हैं, वे जश्‍न में डूबे हैं. इतने ख़ुश हैं जैसे किसी नये ‘फ़ा’ के स्‍वागत का पूर्वाभ्‍यास कर रहे हैं.

आभार- अल्‍लामा इक़बाल की पंक्तियों के आशय के लिए.
Movie- Anni Difficli, 1948/ Director- Luigi Zampa

 

 

कुमार अम्‍बुज

लोकतांत्रिकता, स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न समाज के पक्षधर कुमार अम्बुज का जन्म 13 अप्रैल 1957 को जिला गुना, मध्य प्रदेश में हुआ. संप्रति वे भोपाल में रहते हैं.  किवाड़, क्रूरता, अनंतिम, अतिक्रमण, अमीरी रेखा और उपशीर्षक उनके छह प्रकाशित कविता संग्रह है. ‘इच्छाएँ और ‘मज़ाक़’ दो कहानी संकलन हैं. ‘थलचर’ शीर्षक से सर्जनात्मक वैचारिक डायरी है और ‘मनुष्य का अवकाश’ श्रम और धर्म विषयक निबंध संग्रह. ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, ‘कवि ने कहा’, ‘75 कविताएँ’ श्रृंखला में कविता संचयन है. उन्होंने गुजरात दंगों पर केंद्रित पुस्तक ‘क्या हमें चुप रहना चाहिए’ और ‘वसुधा’ के कवितांक सहित अनेक वैचारिक पुस्तिकाओं का संपादन किया है. विश्व सिनेमा से चयनित फिल्मों पर निबंधों की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य. कविता के लिए ‘भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार’, ‘माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार’, ‘श्रीकांत वर्मा पुरस्कार’, ‘गिरिजा कुमार माथुर सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, वागीश्वरी पुरस्कार तथा कुसुमाग्रज सम्मान से सम्मानित.______
ई-मेल : kumarambujbpl@gmail.com

 

 

Tags: 20262026 फ़िल्मAnni Difficliकुमार अम्बुजविश्व सिनेमा से कुमार अम्बुज
ShareTweetSend
Previous Post

खेल-खेल में बीता जीवन : गिरीश कारनाड

Next Post

1980 का फोटोग्राफिक ए. आई ट्रेंड : सुमन पाण्डेय

Related Posts

कला में निष्‍ठा और स्वतंत्रता : कुमार अम्‍बुज
पेंटिंग

कला में निष्‍ठा और स्वतंत्रता : कुमार अम्‍बुज

बस एक सीट के लिए : मनोज कुमार पांडेय
कथा

बस एक सीट के लिए : मनोज कुमार पांडेय

गांधी : एक रॉकस्टार फ़क़ीर :  त्रिभुवन
विशेष

गांधी : एक रॉकस्टार फ़क़ीर : त्रिभुवन

Comments 8

  1. ओमा शर्मा says:
    4 weeks ago

    उफ्फ, क्या कथानक, क्या बयान, क्या रवानी और क्या रोंगटे खड़े करता सब कुछ! और फिर भी कला की सार्वभौमिक, देश कल से परे प्रासंगिकता। न ऐसी फ़िल्म का सुना था और न ऐसे प्रेरक, दहलाते पाठ का।
    शुक्रिया अंबुज जी और समालोचन।

    Reply
  2. त्रिभुवन says:
    4 weeks ago

    हमारे समय के श्रेष्ठतम लेखकों में कुमार अंबुज हमेशा ही कुछ न कुछ नया क़माल रचते हैं। इस बार उन्होंने समालोचन में लुइजी ज़ाम्पा की इतालवी फ़िल्म ‘मुश्किल साल’ पर जो लिखा है, वह केवल फ़िल्म-आलोचना नहीं, हमारे समय की राजनीतिक शिनाख़्त है। इस फ़िल्म पर लिखते हुए उन्होंने इतालवी सिनेमा के इस चाक्षुष दिग्दर्शन के माध्यम से भारतीय एल्डो पिशितेल्लो के वंश, गोत्र, प्रवर सब बांच दिए हैं। लेख पढ़ते हुए बार-बार यह एहसास होता है कि यह फ़िल्म 1948 में नहीं बनी, अभी हमारे सामने से चलकर हटी है और उसके दर्शक ही नहीं, उसके पात्र भी हम स्वयं हैं। अंबुज जी का गद्य तो अपनी जगह अद्भुत है ही; लेकिन उससे भी अधिक उल्लेखनीय है फ़िल्म का उनका रूपांकन। वे ज़ाम्पा की कथा को इस तरह खोलते हैं कि फासीवाद किसी एक तानाशाह, एक पार्टी या इतिहास की किसी समाप्त हो चुकी दुर्घटना का नाम नहीं रह जाता। वह धीरे-धीरे समाज की आदत बनता दिखाई देता है। भय, सुविधा, नौकरी, मौन, अवसरवाद और छोटे-छोटे समझौतों के रूप में। सिसिली का मामूली नगरपालिका कर्मचारी एल्डो पिशितेल्लो नौकरी बचाने के लिए फासीवादी पार्टी में शामिल होता है और फासीवाद के पतन के बाद वही व्यवस्था उसे फासीवादी होने की सज़ा देती है। इस विडंबना को अंबुज जिस तरह पकड़ते हैं, उससे फ़िल्म का राजनीतिक अर्थ अचानक बहुत समकालीन हो उठता है। प्रश्न मुसोलिनी का नहीं रह जाता; प्रश्न उस समाज का हो जाता है, जो हर सत्ता के सामने अपनी नैतिकता का आकार बदल लेता है। ज़ाम्पा की कलात्मक शक्ति भी यहीं है। नवयथार्थवादी परिवेश, दस्तावेज़ी फुटेज, व्यंग्य और त्रासदी मिलकर इतिहास को भाषण नहीं बनने देते। अंबुज जी के लेख को पढ़कर लगता है : कुछ फ़िल्में पुरानी नहीं होतीं; इतिहास केवल उनके पर्दे बदलता रहता है।

    Reply
  3. farid khan says:
    4 weeks ago

    मुझे अपने आस पास ‘फ़ा’ के उन्माद में ढेर सारे ‘फ़ा’ दिखाई देने लगे हैं. उनकी अवसरवादिता भी.
    बहुत शानदार आलेख है.

    Reply
  4. Kashmir Uppal says:
    4 weeks ago

    हमेशा की तरह कुमार अम्बुज ने अपने पाठक की निराशाओं को आशा से भर दिया है। मैने फा को मा उच्चारित करके आलेख को समझा गृहण किया। इससे हीआशा अंकुरित हुई मुझमे। आभार

    Reply
  5. पवन करण says:
    4 weeks ago

    लोग इस हद तक परेशान हो गए हैं कि सोच रहे हैं किसी भी तर‍ह युद्ध ख़त्‍म हो. चाहे दुश्‍मन ही जीत जाए. युद्ध तो रुके. काश, कुछ ऐसा विधान बने कि जो युद्ध शुरू करे, उसे शुरू से ही हारा हुआ मान लिया जाए. जो शांति न चाहे, वह पराजित हो जाए

    हमारा देश महान था. महान रहेगा. एक नाख़ून तोड़कर हमारे महान देश का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.‘ अवसादग्रस्‍त नायक यकायक सोच में पड़ जाता है : कहीं यह नाख़ून उसके बेटे का रूपक तो नहीं……एक खास लेख। तहें उधेड़ता हुआ। दृष्टि को मांजता। …शुक्रिया।

    Reply
  6. सुनील सक्सेना says:
    3 weeks ago

    फ़ा में दिखते हैं अतीत के कई मृत खूंखार चेहरे और वर्तमान के स्वयंभूओं के स्याह सूरतें. कुछ भी नहीं बदलता है. जैसा पहले था आज भी है. कुमार अंबुज जी का फिल्म पर गंभीर लेख.

    Reply
  7. धीरेन्द्र अस्थाना says:
    3 weeks ago

    यह एक अद्भुत सिनेमाई पाठ है जो तुम्हारे ताकतवर गद्य की गवाही दे रहा है। कवि तो तुम अप्रतिम हो ही। कथाकार भी विरल हो। सिनेमा की व्याख्या में कोई समकालीन तुम्हारे पासंग भी नहीं। फिर क्यों तुम अभी तक मेनस्ट्रीम के स्टार नहीं। यहीं आकर पता चलता है कि हम हिंदी साहित्य के कितने दुर्गम किले के वासी हैं। हमारा फ़ा दुर्ग में बैठा हंस रहा है।

    Reply
  8. vijayshankar says:
    2 weeks ago

    कमाल यह है कि अम्बुज जी ने ‘फ़ा’ को किसी एक सत्ता या व्यक्ति का नाम भर नहीं रहने दिया। वह हमारे भीतर एक मानसिकता की तरह उतरता है। उससे मुक्त होना अपने भीतर के उस ‘फ़ा’ को पहचानना भी है, जो सुविधा, भय और चुप्पी के पैंतरों के सहारे जीवित रहता है। उनके अप्रतिम गद्य ने इस लेख को हमारे समय की कविता बना दिया है।

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2026 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक