• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » मूसा-ए-दिगर : मजीद क़ैसरी : अनुवाद: अक्षत जैन

मूसा-ए-दिगर : मजीद क़ैसरी : अनुवाद: अक्षत जैन

by arun dev
August 30, 2026
in अनुवाद
Reading Time: 6 mins read
A A
मूसा-ए-दिगर : मजीद क़ैसरी : अनुवाद: अक्षत जैन
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
मजीद क़ैसरी
मूसा-ए-दिगर


अनुवाद: अक्षत जैन

 

 

होर्खे लुइस बोर्खेस के छोड़े हुए नोट्स और शुरुआती प्रारूपों में एक पाठ मिलता है, जो पहली बार ब्यूनस आयर्स की सेंट्रल लाइब्रेरी से संबद्ध पत्रिका “वर्ल्ड लिटरेचर टुडे” में प्रकाशित हुआ था. संपादक ने मूल पाठ की पूरी सामग्री जस-की-तस छाप दी, ताकि उसकी प्रामाणिकता को लेकर कोई शक़ न रह जाए.

पाठ के सबसे ऊपर “एक और मूसा” लिखा है. उसके बाद कुछ और अल्फ़ाज़ हैं, जिन्हें बड़ी नफ़ासत से काट दिया गया है. ब्यूनस आयर्स लाइब्रेरी के शोधकर्ताओं ने नई से नई ईजाद हुई तकनीक और हर संभव तरीक़ा आज़मा लिया, मगर वे इस काली स्याही के नीचे उतरकर इन लकीरों का रहस्य खोलने में कामयाब नहीं हो सके.

सालों से ये काले निशान बोर्खेस के अध्येताओं की जिज्ञासा को जगाते रहे हैं, और उन्हें बोर्खेस की गंभीर व सामान्य, सभी किताबों का गहरा अध्ययन करने के लिए प्रेरित करते रहे हैं. यही काटा हुआ हिस्सा, जो एक दुर्भेद्य काले धब्बे की तरह मौजूद है, इस पाठ को ख़ास तौर से आकर्षक बना देता है.

“मूसा” नाम को लेकर टीकाकारों के बीच जो शंका और उलझन थी, उसने उन्हें ऐसे नामों की तलाश में डाल दिया, जो आख़िरकार एक किताब तक पहुँची, जिस पर ज़्यादातर टीकाकारों ने सहमति जताई. कुछ समय तक बोर्खेस के चाहने वालों ने भी इस खोज का स्वागत किया: इराक़ के नजफ़ शहर में दफ़्न हुए ईरानी आलिम शेख़ अब्बास क़ुमी की किताब “मुंतहा अल-आमाल,” यानी बेचैन आरज़ू की आख़िरी हदें.

 

 

काले किए गए शब्दों से कुछ पंक्तियाँ नीचे कुछ और नाम दिखाई देते हैं. उनमें से हर एक पर लकीर खींची गई है. यह बात साफ़ है कि बोर्खेस उन्हें मिटाना नहीं चाहते थे; शायद वह उन्हें निशानदेही के तौर पर काट रहे थे, या फिर अपनी पुरानी आदत के मुताबिक़ उन्हें पाठ के भीतर छिपा रहे थे. जैसा वह अपनी कुछ कहानियों में पहले भी कर चुके थे.

उन शब्दों पर क़लम की जो लकीरें पड़ी हैं, उनसे बोर्खेस की झिझक साफ़ महसूस होती है. काफ़ी सोच-विचार और संकोच के बाद जो पवित्र नाम उभरकर सामने आता है, वह है “मूसा”.

 

 

बोर्खेस के टीकाकारों और जीवनीकारों के बीच “मूसा” नाम को लेकर कोई मतभेद नहीं है. मतभेद उस शब्द को लेकर है जो “मूसा” से ठीक पहले आता है. टीकाकार अहमद मीरअलाई का मानना था कि ध्यान इन ख़ास नामों पर नहीं, बल्कि इस बात पर होना चाहिए कि बोर्खेस आख़िर इस तरह की खोजबीन क्यों कर रहे थे. अन्य टीकाकारों की नज़र में एक इस्लामी रिवायत की यह पड़ताल बोर्खेस की रचनात्मक यात्रा का एक अहम पड़ाव है. उनकी दलील है कि हाथ से लिखी इस इबारत से साफ़ ज़ाहिर होता है कि यहाँ “मूसा” किसी एक शख़्स का ज़िक्र भर नहीं, बल्कि एक आम नाम की तरह इस्तेमाल हुआ है. इस पाठ में बोर्खेस ने कई और मूसाओं का ज़िक्र किया है. कहीं उनके जन्म और मृत्यु की तारीख़ें दी हैं, कहीं हर नाम के साथ छोटा-सा परिचय भी जोड़ दिया है. इससे उनकी बारीक, लगभग जुनूनी छानबीन और उनके इल्मी गहराई दोनों का अंदाज़ा होता है.

इनमें एक नाम मूसायस का है, ईसा-पूर्व चौदहवीं या पंद्रहवीं सदी का यूनानी कवि; या फिर इसी नाम का वह धुँधला-सा मिथकीय पात्र, जिसे कहीं ऑर्फ़ियस का बेटा कहा गया है और कहीं उसका गुरु. इनके अलावा कुछ और मूसा भी हैं, जो पैग़ंबर मूसा इब्ने इमरान के बाद पैदा हुए और मर गए.

बोर्खेस के काग़ज़ों और अधूरे प्रारूपों में जिन मूसाओं के नाम चले आए हैं, उनमें हिजरी 128 से 183 तक जीवित रहे सातवें शिया इमाम मूसा बिन जाफ़र का नाम भी दिखाई देता है.

लगता है कि बोर्खेस मूसा बिन जाफ़र की जीवन-कथा पर कोई बड़ा काम करना चाहते थे, मगर मौत ने उन्हें बीच में ही रोक दिया. कुछ ही समय पहले बोर्खेस के विदेशी भाष्यकारों में से एक, मजीद क़ैसरी ने ब्यूनस आयर्स की सेंट्रल लाइब्रेरी में मौजूद बोर्खेस की किताब की प्रति और उसके हाशियों पर लिखे उनके नोट्स के आधार पर एक पूरा पाठ खोज निकाला. इस पाठ से साफ़ इशारा मिलता है कि वह बहुत मुमकिन है बोर्खेस की नज़र से गुज़रा था. बाक़ी ख़ुदा जाने! इस पाठ की प्रति “वर्ल्ड लिटरेचर टुडे” पत्रिका में उपलब्ध है.

 

 

शुरू में मेरा इरादा इस वाक़ये पर अलग से कुछ लिखने का नहीं था. मज़हबी हस्तियों को लेकर पाई जाने वाली संवेदनशीलता के मद्देनज़र मैंने यही मुनासिब समझा था कि इस विचार को छोड़ दूँ, और इस स्याह लकीर ने मेरे भीतर जो बेचैनी जगाई है, उसे किसी और वक़्त के लिए टाल दूँ. लेकिन बोर्खेस के दूसरे टीकाकारों ने जिस गंभीरता से इस मसले पर ग़ौर किया है, उसने मुझे हौसला दिया कि पाठ को सुगम बनाने के लिए यह पड़ताल ज़रूरी है. शायद शेख़ अब्बास क़ुमी की किताब के आधार पर मूल कथा को दोबारा पढ़कर हम इस राज़ के कुछ और क़रीब पहुँच सकें कि बोर्खेस का “एक और मूसा” से आख़िर क्या आशय था.

 

 

अहम वाक़या अब्बासी ख़लीफ़ा हारून अल-रशीद के दौर का है, जो दूसरी सदी हिजरी में बग़दाद में रहते थे. इब्न शहरआशूब ने इस वाक़ये को पूरी सनद के साथ नक़्ल किया है. मूल पाठ में, ज़ाहिर है, उन कई इतिहासकारों और कथावाचकों के नाम भी आए हैं जिन्होंने यह वाक़या बयान किया था— मसलन शेख़ बहाई और शेख़ सदूक़— और वे सब अपने-अपने इल्म में भरोसेमंद और माने हुए लोग थे.

रिवायत उस दिन का ज़िक्र करती है जब हारून अल-रशीद ने बड़े सम्मान के साथ मूसा बिन जाफ़र को अपने महल में एक ख़ास दावत पर बुलाया. यह साफ़ नहीं है कि दावत दोपहर की थी या रात की. हारून ने इस दावत की वजह मूसा से छिपाए रखी. इतिहासकार भी इस बुलावे  की असल वजह तय नहीं कर पाए हैं; इसलिए इतिहास की दूसरी अनजानी बातों की तरह यहाँ भी हमें अंदाज़े का सहारा लेना पड़ता है.

लेकिन मुस्लिम इतिहासकारों का मानना है कि हारून का असल मक़सद किसी तरह की बहस या वाद-विवाद की बिसात बिछाना था, जिससे मूसा पूरी तरह बेख़बर थे. उनके मुताबिक़ हारून बग़दाद के बड़े लोगों के सामने मूसा को शर्मिंदा करना चाहता था, और साथ ही मुसलमानों के सर्वोच्च, ख़ुदा-साज़ शासक के रूप में अपनी निरंकुश ताक़त का दबदबा क़ायम करना चाहता था.

 

 

इस दावत को रहस्यमय बनाने वाली बात एक ऐसे शख़्स की मौजूदगी थी, जिसे इस बहस में मूसा के मुक़ाबले में खड़ा होना था. वह एक जादूगर था, जो हारून के ख़र्च पर चुपचाप हिंदुस्तान से बग़दाद के महल तक लाया गया था. जादूगर की मौजूदगी दरबार से उस वक़्त तक छिपाकर रखी गई, जब तक दावत शुरू नहीं हो गई और मूसा महल में दाख़िल नहीं हो गए.

इतिहासकारों ने लिखा है कि मूसा एक हँसमुख नौजवान थे; चेहरा गेहुँआ था और लगातार इबादत ने उनके जिस्म को कमज़ोर कर दिया था. कपड़ों के ऊपर उन्होंने ऊनी चोगा डाल रखा था, कंधों पर एक शाल थी, और पैरों में बिना एड़ी की चप्पलें थीं.

मूसा, हारून के पास आकर बैठ गए. फ़र्श पर दस्तरख़्वान बिछाए गए और खाना लगा दिया गया. मूसा जैसे परहेज़गार शख़्स की मौजूदगी के कारण खाना सादा रखा गया था. जादूगर एक गुप्त दरवाज़े से वहाँ दाख़िल हुआ और दस्तरख़्वान के एक कोने पर बैठ गया.

 

 

सबने ख़ुदा का नाम लेकर खाना शुरू किया. मूसा के सेवक ने अपने सामने रखी रोटी का एक टुकड़ा तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, मगर रोटी अचानक उछलकर दूर जा गिरी. सेवक ने फिर हाथ बढ़ाया, फिर बढ़ाया, लेकिन हर बार रोटी उससे और दूर खिसक जाती. जादूगर का यह तमाशा देखकर दावत में बैठे लोग हँस पड़े और मूसा की तरफ़ देखने लगे. किन्हीं और रिवायतों में लिखा है कि रोटी की तरफ़ हाथ सेवक ने नहीं, ख़ुद परहेज़गार मूसा ने बढ़ाया था.

मूसा ने यह सब देखा, फिर सिर उठाकर उस शेर की तरफ़ देखा जो बरसों से हारून के पीछे टंगे चौड़े पर्दे पर नक़्श था. उन्होंने कहा, “ऐ असदुल्लाह—ख़ुदा के शेर—ख़ुदा के दुश्मन को पकड़ लो.”

शेर दहाड़ता हुआ उस चौड़े पर्दे से बाहर कूदा और सीधे महफ़िल के बीच आ गिरा. वह जादूगर की तरफ़ लपका और ख़लीफ़ा के मेहमानों की आँखों के सामने पल-भर में उसे चीर-फाड़कर निगल गया. शेर को देख हारून डर के मारे बेहोश हो गया. मेहमान खाना छोड़कर राजभवन के दरवाज़ों की तरफ़ भागे. दावत बर्बाद हो गई.

हारून को होश आया तो वह मूसा से मिन्नतें करने लगा. गिड़गिड़ाकर बोला, “उस आदमी को मुझे वापस लौटा दो.”

परहेज़गार मूसा ने कहा, “अगर मूसा इब्ने इमरान की लाठी उन जादूगरों की तमाम लाठियाँ वापस कर सकती है जिन्हें उसने निगला है, तो यह शेर भी उस आदमी को तुम्हें वापस कर देगा जिसे उसने खा लिया है.”

 

 

इस रिवायत के साक्ष्यों को देखें तो मुसलमानों के बीच बाद में पैदा हुए मतभेद की वजह शेर की मौजूदगी में छिपी हुई लगती है— क्या शेर सचमुच उस महफ़िल में मौजूद था, या वह सिर्फ़ पर्दे पर बनी एक तस्वीर था? मुस्लिम इतिहासकारों की राय इस बारे में अलग-अलग हैं, लेकिन हारून की महफ़िल में शेर की मौजूदगी और उसकी प्रतिक्रिया को लेकर कोई शक़ नहीं किया गया. अलबत्ता यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि असदुल्लाह, मूसा बिन जाफ़र के पूर्वज का नाम है.

शिया मुसलमानों का मानना है कि वह शेर बरसों से उस खुदा के बंदे के इंतज़ार में था कि वह आकर उसे तस्वीर की क़ैद से आज़ाद करे, और वह अपना फ़र्ज़ अदा कर सके. बोर्खेस के नोट्स और लिखी हुई बातों से यही मालूम होता है कि उसे हैरत इस बात पर थी: इतनी बड़ी हस्ती इतिहास में इस तरह छिपी कैसे रह गई!

 ( मजीद क़ैसरी  के अंग्रेजी में अनूदित ‘A Veiled Box’ कहानी संग्रह के Another Musa शीर्षक कहानी का हिंदी अनुवाद )

 

कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित मजीद क़ैसरी (Majid Gheisari) समकालीन ईरानी कथाकार और लेखक हैं, जो युद्ध के प्रत्यक्ष अनुभवों और मानवीय मनोविज्ञान पर आधारित अपनी गहन रचनाओं के लिए जाने जाते हैं.

‘थ्री प्रीस्ट्स‘, ‘स्टोन ऑफ डेस्टिनी‘ ‘ओल्ड स्नो, न्यू स्नो‘, ‘शमास शामी‘, ‘डार्क गार्ड‘ ‘व्हाइट ग्रेव‘ ‘ने चेंज प्लस टॉन नॉम‘ और ‘तेहरान बीच‘ आदि उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं.

अक्षत जैन  लेखक, संपादक और अनुवादक हैं. वह ‘आस पब्लिशर्स’ के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं, जहाँ उनका काम विश्व साहित्य की महत्त्वपूर्ण और हिंदी में अपेक्षाकृत कम उपलब्ध रचनाओं को नए पाठकों तक पहुँचाने पर केंद्रित है. आस पब्लिशर्स से अब तक फ़िलिस्तीन और इज़राइल के लेखकों की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा अल्जीरिया, ईरान, अर्जेंटीना और अन्य देशों के साहित्य के हिंदी अनुवाद प्रकाशनाधीन हैं. साहित्य, अनुवाद और समकालीन विश्व की राजनीतिक-सांस्कृतिक बहसों में उनकी विशेष रुचि है.

Tags: 20262026 अनुवादअक्षत जैनएक और मूसामजीद क़ैसरीमूसा-ए-दिगर
ShareTweetSend
Previous Post

जावेद-नामा जदीद : अशअर नज्मी

Next Post

गौतम बुद्ध और बुद्धावतार भिन्न अथवा अभिन्न : कुशाग्र अनिकेत

Related Posts

फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज
फ़िल्म

फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज

खेल-खेल में बीता जीवन : गिरीश कारनाड
समीक्षा

खेल-खेल में बीता जीवन : गिरीश कारनाड

शोक से शब्द तक : गगन गिल
आत्म

शोक से शब्द तक : गगन गिल

Comments 6

  1. Ashar Najmi says:
    2 weeks ago

    मजीद क़ैसरी की यह रचना बोर्खेस की ‘मेटा-फ़िक्शन’ (अति-कथात्मक) शैली और उनके विवरणात्मक शिल्प का एक उत्कृष्ट पुनर्सृजन है, जहाँ वे इतिहास की ठोस परतों और कल्पना के धुंधलके के बीच एक ऐसी ‘आध्यात्मिक अंतर्पाठीयता’ (intertextuality) बुनते हैं जो भूगोल और समय की सीमाओं को लांघ जाती है। यह कहानी केवल एक चमत्कारिक ऐतिहासिक घटना का वृत्तांत नहीं है, बल्कि यह ‘अनुपस्थिति के सौंदर्यशास्त्र’ पर टिकी है—चाहे वह बोर्खेस के नोट्स में काटी गई वे रहस्यमयी लकीरें हों जो शोधकर्ताओं के लिए एक ‘दुर्भेद्य काला धब्बा’ हैं, या इतिहास की मुख्यधारा से ओझल इमाम मूसा बिन जाफ़र का मौन व्यक्तित्व। लेखक ने बड़ी सूक्ष्मता से पैग़ंबर मूसा की लाठी और इमाम मूसा के ‘असदुल्लाह’ (शेर) के प्रतीकों को आपस में गूँथकर ‘मूसा’ को एक व्यक्ति-नाम से ऊपर उठाकर एक शाश्वत ‘आर्केटाइप’ (आद्यरूप) बना दिया है, जो हर युग में सत्ता के निरंकुश अहंकार के विरुद्ध सत्य की आत्मिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। निर्जीव पर्दे से शेर का सजीव होकर निकलना महज एक ‘जादू’ नहीं, बल्कि कला (Representation) और यथार्थ (Reality) के बीच की उस झीनी दीवार को ढहा देने की बोर्जेसियन फंतासी है, जो अंततः यह दार्शनिक प्रश्न छोड़ जाती है कि जिसे हम ‘इतिहास’ मानकर स्वीकार करते हैं, क्या वह उन सच्चाइयों से बड़ा है जो हाशिए के नोट्स या काली स्याही के नीचे दफ़्न रह गई हैं?

    Reply
  2. कुमार अम्बुज says:
    2 weeks ago

    दिलचस्प कहानी है।

    Reply
  3. nawal govind says:
    2 weeks ago

    बेहतरीन ..

    Reply
  4. धीरेन्द्र अस्थाना says:
    2 weeks ago

    मूसा ए दिगर अद्भुत कथा है। आज का दिन सार्थक हो गया इसे पढ़कर। बहुत दिनों बाद कुछ ऐसा पढ़ा जिसके कारण थोड़ा और समृद्ध हुआ। धन्यवाद।

    Reply
  5. अशोक अग्रवाल says:
    2 weeks ago

    बहुत कलात्मक और सुंदर कहानी।

    Reply
  6. नरेंद्र प्रताप सिंह says:
    1 week ago

    अत्यंत कलात्मक और सुंदर रचना,जहां फैंटसी और इतिहास को अद्भुत तरह प्रस्तुत किया गया है ।इतनी सुंदर रचना को पाठकों तक पहुंचाने के लिए धन्यवाद ।

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2026 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक