| अनुगूँज राजेन्द्र जोशी |
टोरंटो की उस सुबह में एक अजीब-सी सफेदी थी. जैसे रात ने जाते-जाते अपने कुछ अधूरे सपने खिड़कियों पर छोड़ दिए हों. महेश ने बेसमेंट के छोटे-से कमरे की खिड़की खोली तो सामने लॉन पर हल्की नमी चमक रही थी. घास पर बिखरे पानी के कणों में सूरज अभी पूरी तरह नहीं उतरा था. हवा ठंडी थी, पर भीतर कहीं एक धीमी गर्मी भी थी, जो उसे दिल्ली की किसी पुरानी सर्द सुबह की याद दिला रही थी.
ऊपर किचन में आवाजें थीं. बर्तनों की हल्की खनक, कॉफी मशीन की भनभनाहट और सीमा की तेज़, लगभग फुसफुसाती हुई अंग्रेज़ी.
कनाडा आए उसे पंद्रह दिन हो चुके थे, लेकिन अब भी उसे लगता था कि वह किसी अस्थायी स्वप्न में है. जैसे लौटना अभी बाकी हो.
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने दीवार पर टंगी तस्वीरों को देखा. सीमा और समीर की शादी. नायग्रा फॉल्स. किसी बर्फीले मैदान में दोनों स्की पहनकर हँस रहे थे.
एक तस्वीर में सीमा ने उसके कंधे पर हाथ रखा हुआ था. वह तस्वीर उसे हमेशा अजीब लगती. बेटी कब इतनी बड़ी हो गई कि उसके कंधे तक पहुँचने लगी?
“पापा, जल्दी कीजिए,” सीमा ने कहा, “ट्रैफिक बढ़ जाएगा.”
समीर कार की चाबी घुमा रहा था. उसके चेहरे पर वही स्थायी विनम्रता थी, जो महेश को कभी-कभी थका देती थी. हर बात में संतुलन. हर वाक्य में शिष्टता. जैसे भीतर की असली बेचैनी कहीं तहखाने में बंद हो.
“ब्लू माउंटेन तक ढाई घंटे लगेंगे,” समीर बोला, “बैरी में थोड़ा रुकेंगे. फिर कॉलिंगवुड.”
महेश ने सिर हिलाया.
उसने जैकेट पहनी.
आईने में एक क्षण को अपनी मूँछों पर नज़र गई. सफेद और काली लकीरों का मिला-जुला आकार. कभी यही मूँछें उसकी पहचान थीं. कॉलेज में दोस्त उसे “राज कपूर” कहते थे. बाद में बैंक की नौकरी में वही मूँछें उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गईं.
अब दिल्ली में बच्चे उसे “ओल्ड स्कूल अंकल” कहकर मुस्कराते.
उसे नहीं मालूम था कि उसी दिन, उन्हीं मूँछों के कारण उसकी ज़िंदगी के भीतर कोई पुराना बंद दरवाज़ा फिर खुलने वाला है.
हाइवे पर कार तेज़ी से भाग रही थी. दोनों ओर फैले पेड़ किसी लंबे चलचित्र की तरह पीछे खिसकते जा रहे थे. कहीं-कहीं झील की चमक दिखती. कहीं छोटे-छोटे फार्महाउस. आकाश बहुत खुला था. इतना खुला कि महेश को डर लगता.
भारत में आसमान हमेशा तारों, तारों के जाल, मकानों, धुएँ और शोर के बीच दिखाई देता था. यहाँ वह बिल्कुल अकेला था.
“पापा, आप ठीक हैं?” सीमा ने पूछा.
“हाँ.”
“थक गए?”
“नहीं. बस देख रहा हूँ.”
सीमा मुस्कराई. “आप कनाडा आकर बहुत चुप हो गए हैं.”
महेश ने बाहर देखते हुए कहा, “नई जगह आदमी को थोड़ा चुप कर देती है.”
उसने यह बात जैसे खुद से कही.
बैरी में वे थोड़ी देर रुके. झील के किनारे हवा और ठंडी थी. कुछ लड़के साइकिल चला रहे थे. एक बूढ़ा आदमी बेंच पर बैठा किताब पढ़ रहा था. महेश को अचानक दिल्ली की याद आई. इंडिया गेट के पास की शामें. पत्नी सुधा के साथ गोलगप्पे.
फिर एक खालीपन.
सुधा को गए आठ साल हो चुके थे.
कुछ दुख समय के साथ छोटे नहीं होते. वे सिर्फ शरीर के भीतर दूसरी जगह जाकर बैठ जाते हैं.
समीर कॉफी लेने चला गया. सीमा फोन पर किसी से बात कर रही थी. महेश झील के पानी को देखता रहा. पानी स्थिर था, लेकिन भीतर कहीं बहुत धीमी गति से चल रहा था. बिल्कुल स्मृतियों की तरह.
“चलें?” समीर ने पूछा.
कार फिर आगे बढ़ी.
कॉलिंगवुड पहुँचते-पहुँचते दोपहर ढलने लगी थी. सड़कें धीरे-धीरे जीवंत होती जा रही थीं. लंबा वीकेंड था. पर्यटक हर तरफ़ थे. दुकानों के बाहर रंगीन फूलों की कतारें थीं. हवा में भुने कॉर्न, कॉफी और लकड़ी की मिली-जुली गंध तैर रही थी.
ब्लू माउंटेन का छोटा-सा बाज़ार किसी यूरोपीय पोस्टकार्ड जैसा लगता था. पत्थरों से बनी सड़कें. लकड़ी की बालकनियाँ. खुले कैफ़े. दूर पहाड़ियों पर हल्की धुंध.
एक मोड़ पर लाइव बैंड बज रहा था.
तीन लड़के और एक लड़की.
गिटार, ड्रम और सैक्सोफोन.
अंग्रेज़ी गीत हवा में फैल रहा था.
“You are my love…”
आवाज़ में एक अजीब नरमी थी. लोग रुक-रुककर सुन रहे थे. कुछ जोड़े हाथ पकड़े खड़े थे. बच्चे दौड़ रहे थे.
महेश थोड़ा पीछे खड़ा हो गया. संगीत उसे हमेशा असुरक्षित कर देता था. क्योंकि संगीत में आदमी अपने बचाव भूल जाता है.
उसी समय उसने उसे देखा.
वह औरत भीड़ से थोड़ी अलग खड़ी थी. हल्के भूरे बाल. नीली जैकेट. हाथ में कॉफी का कप. उसकी उम्र शायद पचपन के आसपास होगी. चेहरे पर वह चमक नहीं थी जिसे सुंदरता कहते हैं. बल्कि वह थकान थी जो किसी लंबे जीवन के बाद चेहरे पर उतरती है और उसे अधिक सच्चा बना देती है.
वह अचानक महेश की ओर बढ़ी.
महेश ने सोचा शायद रास्ता पूछना होगा.
लेकिन वह मुस्कराई.
“Hey… enjoying music?”
महेश थोड़ा चौंका. “Yes…”
फिर वह हँसी. खुलकर नहीं. जैसे धीरे से कोई खिड़की खुली हो.
“You have a lovely mustache. I love its shape… and thickness. It’s wonderful.”
महेश के भीतर कुछ अटक गया.
उसे लगा उसने ठीक सुना नहीं.
“Sorry?”
उसने फिर दोहराया. इस बार और स्पष्ट.
महेश को समझ नहीं आया कि वह क्या करे. इतने वर्षों में किसी अजनबी स्त्री ने उससे इस तरह बात नहीं की थी. वह भी उसकी मूँछों पर.
उसने घबराकर कहा, “Thank you…” फिर कुछ सोचकर पूछा, “Your name?”
“Lora.”
“मैं… Mahesh.”
“Mahesh,” उसने धीरे से दोहराया, “beautiful name.”
दोनों कुछ क्षण साथ खड़े रहे. बैंड का गीत बदल गया था.
हवा में हल्की ठंड घुल रही थी.
“Coffee?” उसने अचानक पूछा.
महेश ने अनायास सीमा और समीर की ओर देखा. वे सामने एक दुकान में चले गए थे.
“Sure,” उसके मुँह से निकला.
और कहानी वहीं से शुरू हुई.
कैफ़े छोटा था. लकड़ी की दीवारें. पीली रोशनी. काँच की खिड़की के बाहर लोग चलते दिखाई दे रहे थे. अंदर धीमा जैज़ बज रहा था.
लॉरा ने दो कॉफी ऑर्डर की.
महेश कुर्सी पर बैठा रहा, जैसे अभी भी तय नहीं कर पा रहा हो कि यह सब सच है या नहीं.
“आप यहाँ घूमने आए हैं?” लॉरा ने पूछा.
“हाँ. बेटी के साथ.”
“India से?”
“दिल्ली.”
“मैं कभी इंडिया नहीं गई,” उसने कहा, “लेकिन हमेशा जाना चाहती थी.”
महेश हल्का से मुस्कराया.
“लोग इंडिया आना चाहते हैं. जो इंडिया में रहते हैं, वे बाहर जाना चाहते हैं.”
“और आप?”
“मैं…” वह रुक गया,
“मैं शायद अब कहीं जाना नहीं चाहता.”
लॉरा कुछ देर उसे देखती रही. उसकी आँखों में उत्सुकता कम, सुनने की इच्छा अधिक थी.
“आपकी wife?”
महेश ने कप की ओर देखते हुए कहा, “नहीं रहीं.”
“ओह… I’m sorry.”
“कोई बात नहीं.”
लेकिन बात थी.
हमेशा रहती है.
कुछ देर दोनों चुप रहे. बाहर सड़क पर लोग हँसते हुए गुजर रहे थे. बैंड की आवाज़ अब दूर से आ रही थी.
“मेरे husband भी नहीं हैं,” लॉरा ने धीरे से कहा.
महेश ने सिर उठाया.
“तीन साल पहले. Cancer.”
उसने यह ऐसे कहा जैसे कोई बहुत पुरानी वस्तु अलमारी से निकालकर मेज़ पर रख दे.
“आप अकेली रहती हैं?”
“हाँ. कॉलिंगवुड में. पहले हम दोनों साथ रहते थे. अब घर बहुत बड़ा लगता है.”
महेश ने पहली बार उसकी आँखों में वह खालीपन देखा जो उसे अपना-सा लगा.
दो अजनबी अचानक थोड़े कम अजनबी हो गए.
सीमा ने जब महेश को लॉरा के साथ बैठे देखा तो उसके चेहरे पर हल्का आश्चर्य आया.
“पापा!”
महेश थोड़े असहज हुए. “ये… लॉरा हैं.”
लॉरा ने सहजता से हाथ बढ़ाया. “Your father has a wonderful mustache.”
सीमा हँस पड़ी. “Yes, he’s very proud of it.”
महेश को लगा जैसे वह लड़का बन गया हो और उसकी बेटी अचानक उसकी उम्र की हो गई हो.
समीर विनम्र मुस्कान के साथ बैठ गया. थोड़ी देर सामान्य बातें हुईं. मौसम. ट्रैफिक. भारत. कनाडा.
लेकिन बातचीत की असली धारा महेश और लॉरा के बीच थी. सीमा यह देख रही थी.
शायद पहली बार उसने अपने पिता को किसी अजनबी स्त्री के सामने थोड़ा जीवित देखा.
शाम ढलने लगी थी.
लॉरा ने कहा, “अगर आपके पास समय हो तो ऊपर ट्रेल पर sunset बहुत सुंदर दिखता है.”
समीर ने कहा, “हम जा सकते हैं.”
वे सब साथ चल पड़े.
पहाड़ी पर हवा और ठंडी थी. नीचे पूरा ब्लू माउंटेन छोटे खिलौनों जैसा दिख रहा था. दूर झील पर धूप की आखिरी परत चमक रही थी.
लोग तस्वीरें ले रहे थे. कोई गिटार बजा रहा था.
महेश रेलिंग के पास खड़ा रहा.
लॉरा उसके बगल में आकर खड़ी हो गई.
“आप बहुत शांत रहते हैं,” उसने कहा.
महेश हँसा. “India में लोग कहते हैं मैं बहुत बोलता हूँ.”
“शायद आदमी जगह बदलते ही बदल जाता है.”
महेश ने उसकी ओर देखा. “या फिर असली आदमी बाहर आ जाता है.”
हवा में कुछ देर वही वाक्य तैरता रहा.
लॉरा ने पूछा, “आपकी शादी… कैसी थी?”
महेश इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था.
“लंबी,” उसने धीरे से कहा.
“Happy?”
वह मुस्कराया. “हमारे यहाँ शादी को happy या unhappy नहीं कहते. बस निभाते हैं.”
“और प्यार?”
महेश ने दूर पहाड़ियों की ओर देखा. बहुत देर बाद बोला, “प्यार शायद बीच में कहीं था. रोजमर्रा की चीज़ों में. चाय में चीनी कम होने पर झगड़े में. डॉक्टर के पास साथ बैठने में. रात को खाँसी सुनकर जाग जाने में.”
लॉरा की आँखें भर आईं.
“यहाँ लोग जल्दी अकेले हो जाते हैं,” उसने कहा, “बहुत जल्दी.”
सूरज धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था.
उस क्षण महेश को लगा कि उम्र चाहे जितनी हो जाए, मन के भीतर कहीं एक जगह हमेशा खाली रहती है. जहाँ कोई आवाज़, कोई स्पर्श, कोई अनपेक्षित मुस्कान अचानक रोशनी कर सकती है.
उस रात होटल लौटकर महेश देर तक सो नहीं पाया.
कमरे की खिड़की से बाहर रोशनी दिख रही थी. नीचे सड़क पर लोग अब भी घूम रहे थे.
सीमा बगल के कमरे में थी.
उसे याद आया, जब सीमा छोटी थी तो रात में डरकर उसके बिस्तर में आकर सो जाती थी. अब वही लड़की अपने पति के साथ दूसरे कमरे में थी और वह अकेला.
उसने फोन उठाया.
लॉरा का नंबर स्क्रीन पर था.
उसने सेव करते समय नाम के आगे कुछ नहीं लिखा. सिर्फ “Lora”.
वह देर तक उस नाम को देखता रहा.
उसे अपराधबोध नहीं था. लेकिन एक हल्की शर्म थी. जैसे उसने अपनी उम्र के खिलाफ कोई छोटी-सी चोरी कर ली हो.
फोन पर अचानक संदेश आया.
“Nice meeting you, Mahesh.”
उसने बहुत देर बाद लिखा.
“Same here.”
फिर लंबे समय तक कुछ नहीं.
लेकिन नींद फिर भी नहीं आई.
अगले दिन सीमा और समीर स्कैंडिनेवियन स्पा जाना चाहते थे. महेश ने बहाना बना दिया कि उसे थोड़ा आराम करना है.
सीमा ने उसे गौर से देखा. शायद वह समझ रही थी.
“पापा, आप ठीक तो हैं?”
“हाँ.”
“कल वाली friend से मिलने जा रहे हैं क्या?”
महेश चौंक गया. “नहीं तो.”
सीमा हँस दी. “Relax. I’m happy.”
यह सुनकर महेश के भीतर कुछ काँपा.
क्या सचमुच?
दोपहर में लॉरा का संदेश आया.
“If you are free, there is a small lake nearby.”
महेश काफी देर फोन देखता रहा.
फिर उसने जैकेट पहनी और बाहर निकल आया.
झील बहुत शांत थी. किनारे लकड़ी की बेंचें थीं. हवा में चीड़ की गंध.
लॉरा पहले से बैठी थी.
“आप आ गए,” उसने कहा.
“हाँ.”
“मुझे लगा शायद आप नहीं आएँगे.”
महेश मुस्कराया. “मुझे भी.”
दोनों धीरे-धीरे झील के किनारे चलने लगे.
लॉरा ने अपने बारे में बताना शुरू किया. वह स्कूल में संगीत पढ़ाती थी. पति माइकल पेंटर था. उनका एक बेटा था जो वैंकूवर में रहता था और साल में मुश्किल से एक बार आता.
“हम यहाँ बूढ़े हो जाते हैं,” उसने कहा, “लेकिन बच्चों की ज़िंदगी कहीं और होती है.”
महेश ने कहा, “भारत में बच्चे साथ रहते हैं. लेकिन अब वहाँ भी लोग दूर जाने लगे हैं.”
“क्या आपको अपनी बेटी की याद आती है?”
“जब वह साथ होती है तब भी.”
लॉरा ने उसकी ओर देखा. “आप बहुत अकेले आदमी हैं, Mahesh.”
उसने उत्तर नहीं दिया.
कुछ वाक्य जवाब नहीं माँगते.
शाम होते-होते हवा और ठंडी हो गई.
लॉरा ने अचानक पूछा, “क्या मैं आपकी मूँछ छू सकती हूँ?”
महेश हँस पड़ा. इतने वर्षों बाद इतनी सच्ची हँसी उसके भीतर से निकली थी.
“क्यों?”
“Because they look unreal.”
वह संकोच से थोड़ा आगे झुकी. उसकी उँगलियाँ हल्के से मूँछों को छूकर लौट आईं.
महेश के भीतर एक अजीब कंपन हुआ. बहुत पुराना. लगभग भूला हुआ.
उसे सुधा याद आई.
शादी के शुरुआती दिनों में सुधा भी उसकी मूँछों को लेकर चिढ़ाती थी. कहती, “इनके पीछे तुम अपना चेहरा छुपाते हो.”
शायद सच था.
उस रात लौटते समय सड़क पर हल्की बारिश शुरू हो गई.
महेश ने कार की खिड़की से बाहर देखा. रोशनियाँ धुँधली हो रही थीं.
उसे लग रहा था कि वह किसी ऐसे समय में लौट आया है जहाँ उम्र की सीमाएँ थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं.
लेकिन भीतर एक डर भी था.
क्या यह सिर्फ अकेलेपन का छलावा है?
क्या दो लोग केवल इसलिए नजदीकी महसूस कर सकते हैं क्योंकि दोनों के जीवन में खाली कमरे हैं?
उसने कोई निष्कर्ष नहीं निकाला.
अगले दो दिन वे कई बार मिले.
कभी कॉफी पर. कभी झील के किनारे. कभी बस सड़क पर चलते हुए.
वे बहुत निजी बातें नहीं करते थे. लेकिन उनके बीच जो चुप्पी थी, वह सबसे निजी थी.
एक शाम लॉरा ने पूछा, “क्या आपने कभी अपनी पत्नी को धोखा दिया?”
महेश ने तुरंत कहा, “नहीं.”
फिर कुछ सोचकर जोड़ा, “कम से कम बाहर से नहीं.”
“और भीतर से?”
महेश बहुत देर चुप रहा.
“हर आदमी कभी-न-कभी किसी कल्पना में चला जाता है. शायद वही भीतर का धोखा है.”
लॉरा मुस्कराई. “आप ईमानदार हैं.”
“नहीं. बस बूढ़ा हो गया हूँ. बूढ़े लोग झूठ बोलते-बोलते थक जाते हैं.”
दोनों हँस पड़े.
सीमा सब समझ रही थी.
उस रात उसने महेश से कहा, “पापा, आपको अच्छा लग रहा है न?”
महेश असहज हो गए. “तुम क्या कहना चाहती हो?”
“कुछ नहीं. बस… आपने मम्मी के जाने के बाद खुद को बंद कर लिया था.”
महेश चुप रहे.
“मैंने आपको इतने हल्के मूड में वर्षों बाद देखा है.”
“यह सिर्फ दोस्ती है.”
“तो रहने दीजिए इसे दोस्ती ही.”
महेश ने बेटी को देखा. अचानक उसे लगा कि बच्चे कभी-कभी माता-पिता से ज्यादा परिपक्व हो जाते हैं.
अंतिम दिन आ गया.
सुबह आसमान धूसर था. बादल नीचे झुके हुए.
उन्हें टोरंटो लौटना था.
महेश ने सूटकेस बंद किया तो भीतर एक खालीपन उतरा. जैसे कोई अधूरी किताब बंद कर रहा हो.
लॉरा उनसे विदा लेने आई.
होटल के बाहर हवा तेज़ थी.
समीर कार में सामान रख रहा था. सीमा थोड़ा दूर खड़ी थी.
लॉरा ने महेश की ओर देखा.
“Will you come back?”
महेश ने उत्तर देने में देर की.
“शायद.”
“People say maybe when they mean no.”
महेश मुस्कराए. “और कभी-कभी maybe ही सच होता है.”
लॉरा ने हाथ बढ़ाया.
लेकिन महेश ने हाथ की जगह उसे हल्के से गले लगा लिया.
बहुत छोटा-सा आलिंगन.
लेकिन उस छोटे-से स्पर्श में दो महाद्वीपों का अकेलापन था.
जब वह अलग हुई तो उसकी आँखें भीगी थीं.
“Take care of your mustache,” उसने कहा.
महेश हँस पड़े.
कार चल पड़ी.
लॉरा सड़क किनारे खड़ी रही.
धीरे-धीरे वह धुँध में छोटी होती गई.
टोरंटो लौटकर दिन फिर सामान्य हो गए.
सीमा ऑफिस जाने लगी. समीर मीटिंग में व्यस्त रहने लगा. महेश सुबह पार्क में टहलता. भारतीय किराने की दुकान जाता. शाम को चाय पीता.
लेकिन भीतर कुछ बदल चुका था.
अब वह आईने में अपनी मूँछों को थोड़ी देर देखकर मुस्कराता.
कभी-कभी लॉरा का संदेश आ जाता.
“Snow today.”
“Listening to jazz.”
“Your city must be hot now.”
महेश जवाब देता. छोटे-छोटे वाक्य.
लेकिन उन वाक्यों के बीच बहुत कुछ था जो लिखा नहीं जाता.
भारत लौटने से एक दिन पहले सीमा ने पूछा, “पापा, आपको कनाडा कैसा लगा?”
महेश ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “बहुत शांत.”
“बस?”
“और थोड़ा उदास.”
“फिर भी आप दोबारा आएँगे?”
महेश ने धीमे से कहा, “हाँ.”
सीमा मुस्कराई. “ब्लू माउंटेन?”
महेश ने कोई उत्तर नहीं दिया.
लेकिन उसकी आँखों में उस छोटी पहाड़ी सड़क की रोशनी फिर चमक उठी थी. लाइव बैंड की धुन. कॉफी की भाप. और एक अजनबी स्त्री की आवाज़.
“You have a lovely mustache…”
दिल्ली लौटने के बाद कई सप्ताह तक महेश को लगता रहा कि वह पूरी तरह वापस नहीं आया है. उसके भीतर का एक हिस्सा अब भी कनाडा की किसी ठंडी सड़क पर चल रहा है.
एक शाम उसने अलमारी खोली. सुधा की पुरानी साड़ी अब भी वहीं रखी थी. उसने कपड़े को हल्के से छुआ.
“तुम होतीं तो हँसती,”
उसने मन ही मन कहा.
उसे लगा जैसे कहीं बहुत दूर से सुधा की आवाज़ आई हो.
“जिंदगी खत्म थोड़े ही हुई है.”
महेश खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया.
दिल्ली की सड़क पर हॉर्न थे. धूल थी. लोग थे.
लेकिन उस शोर के भीतर भी उसे कहीं दूर सैक्सोफोन की धीमी धुन सुनाई दे रही थी.
वह पहली बार समझ पाया कि कुछ मुलाकातें प्रेम नहीं होतीं. वे सिर्फ यह याद दिलाने आती हैं कि मन अब भी जीवित है.
राजेन्द्र जोशी |




मनुष्यता को जीवित रहना है तो प्रेम जरूरी है। सहज प्रेम। संकीर्णताओं से मुक्त। इस कहानी में बड़ी चीज है, प्रेम को लेकर सहजता। यह सहजता उम्र के साथ आती है और जीवन को सुंदर बनाती है। तब पाप-पुण्य, उम्र, देश व नस्ल की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। प्रेम कुछ खोने -पाने के बजाय एहसास के स्तर पर पहुंच जाता है। उसी एहसास का एहसास कराने में कहानी में सफल रही है।
झीलों की चमक, रंग बदलते आसमान और काॅफ़ी की महक के बीच व्यक्ति के अकेलेपन को खोलती प्यारी-सी कहानी।
लेकिन, मुझे लगा कि अंत में कहानीकार के सामने कोई संस्कार आकर खड़ा गया है।
आख़िर यह मानने में क्या हर्ज़ है कि कुछ मुलाक़ातें प्रेम की शुरुआत भी हो सकती हैं। और वे सिर्फ़ यह याद दिलाने नहीं आतीं कि ‘मन अब भी जीवित है’, बल्कि यह बताने आतीं हैं कि प्रेम अब भी संभव है!
क्या यहां पिछले प्रेम की स्मृति नए प्रेम की संभावना के आड़े आ गई है?
छोटी सी, प्यारी सी, सच्ची सी कहानी है।
हर उम्र में एक स्पेस बचा रहता है जहां रोशनी जा सकती है। इस तरह भावों, एहसासों से सोच कर ईमानदारी से अपने आवेगों, संवेगों के साथ चलते जाना , वो जहां ले जाए। कोई परिपाटी नहीं। बिना प्रेम, दोस्ती या कोई भी बंधा बंधाया नाम देते हुए….जिसे दुनिया अकेले व्यक्ति के एकाकीपन को भरने के लिए सोचने की अभ्यस्त है। अच्छी कहानी है।
जीवन को शांत तल में पड़ने वाली उजास है । अपना असर धीरे धीरे बढ़ा रही। सम्बन्ध को आकार देने, अवसर का लाभ लेने की कोई हड़बड़ी कोई बेचैनी नहीं। यह इत्मीनान , यह मंथर गति एकाकीपन के कुछ सुफल हैं।।
शब्दों के तल में कहीं परिवार के संदर्भ में पूर्व vs पश्चिम संस्कृति की कोटियां हैं, जिसमें जाहिर है पूर्व का पलड़ा भारी होना था। जिसके कारण Lara का अकेलापन ज्यादा भारी है। मगर इतना भारी भी नहीं कि दूसरे के अंदर रोशनी की कौंध पैदा न कर सकें। ’मन अभी भी जिंदा है’। यह ज़िंदापन के लिए स्पेस रचती हुई कहानी है। जो प्रेम, दोस्ती …से वृहत्तर है।
बहुत दिनों बाद एक कोमल सच्ची कहानी पढ़ी जो अपनी कहन से चौंकाती नहीं बल्कि मन के भीतर बैठी मनुष्यता के नाज़ुक पक्ष को हौले से छू कर आगे बढ़ जाती है.लेखक और समालोचन को साधुवाद.
सहज मुस्कान के साथ कहानी पढ़ ली. पढ़ते हुए एहसास हो कि कहानी सच्ची है ,तभी उसे कहानी माननी चाहिए. मैं कहूँगा -बिलकुल सच्ची है .महेश के साथ मैं भी थोड़ा उदास हुआ .यह वापसी की उदासी है.अंत में जिस एक वाक्य पर ध्यान जाना चाहिए ,वह है सुधा का कथन- जिन्दगी ख़त्म थोड़े ही हुई है. पिता-पुत्री संवाद भी मारक है .उस मन:स्थिति में पहुँच कर महसूस किया जा सकता है.
बहुत दिन बाद कोई कहानी पढ़ी। जीवन की सहज संवेदनाओं से बुनी गई सुंदर कहानी।
कितनी मीठी कहानी है……….कि वाह।
एक अच्छी कहानी जितनी कथ्य में यात्रा करती है उससे कहीं ज़्यादा भाषा में और विराम में। जितनी कहने में, उतनी कहने को अचानक छोड़ देने में। वाक्य के अप्रत्याशित संकोच में। जितनी पुकार में, उससे अधिक अनुगूँज में। और ऐसा काफ़ी कुछ इस कहानी में दिखा। अनुभव हुआ। ए गुड रीड। कथाकार को बधाई। शुभकामनाएँ।
कितनी अच्छी कहानी है। सच में ।
यह कहानी मनुष्य के उस अकेलेपन को रेखांकित करती है जो अपने पार्टनर को खो देने के बाद उसके भीतर हमेशा बजता तो रहता है, लेकिन बाहर किसी को सुनाई नहीं पड़ता। यह कहानी बाहर के भीतर पैठने और फिर पूरी एक जगह घर लेने की सहज अभिव्यक्ति है। यह दोस्ती से ज्यादा प्रेम और प्रेम से कम दोस्ती की कहानी है। कहानी में कुछ भी अतिरेक नहीं लगता। एक सहज,निर्मल और मानवीय अभिव्यक्ति। तीसरी कसम की बैलगाड़ी वाले दृश्य याद आ गए।
वास्तव में मीठी, कोमल कहानी
कुछ लोग यूं ही मिल जाते हैं अनजाने रास्तों पर। वे लोग कब मन में बरसों से खाली हुई जगह को भर लेते हैं यह अहसास ही इस कहानी का प्राण है। कथाकार को बधाई
वाह 💛 सूक्ष्म, उम्दा और क्यूट कहानी! जिसमें ‘महाद्वीपों का अकेलापन ‘ समेटने की ताकत है. शब्द बेहद सच्चे! पहली बार मूंछें मर्दानगी का प्रतीक नहीं लगी!
एक अदद दिल है जो सादगी से धड़कता रहता है💗 जिसकी अनुगूंज देर तक और दूर तलक सुनाई देती है!
मुबारक कथाकार 🪻
कहानी बहुत सुंदर लगी । निर्मल हृदय से रची कहानी लगी । कहानी की अदा हिंदी कहानी सम्राट निर्मल वर्मा की याद दिलाती रही । परंतु कथानक यथार्थ से बुना हुआ लगा। कहानी में दो दिन पात्रों महेश, सीमा और लोरा के संवादों में जो कशिश है वह भी मोहक लगी मुझे । कहानी की अनेक लाइनें जीवन से आई हुई रौशनी लगी जैसे –
नहीं. बस बूढ़ा हो गया हूँ. बूढ़े लोग झूठ बोलते-बोलते थक जाते हैं.
अभिनंदन कवि राजेंद्र
बहुत ही प्यारी कहानी… एकदम सच्ची।
सुंदर कहानी । पाठक को बांधे रखने में सक्षम । कहे से ज्यादा अनकहा है इस कहानी में ।
Dil chhoo liya h ❣
कल इस कहानी को पढ़ नहीं पाया था।
बहुत सुंदर कहानी है। खूबसूरत परिवेश और एहसास से रची इस कहानी में सबसे अच्छी बात मुझे ठहराव लगा जो अनुभव के साथ आता है। कोई उतवलापन नहीं, ना ही बहुत कुछ कहने की जल्दी। अनकहा भी कितना कुछ कह देता है। कहानी पाठक में भी उसकी अपनी कल्पना का एहसास पैदा करती है। जोशी जी और समालोचन को बधाई
हार्दिक आभार
मेरी कहानी “अनुगूँज” को पढ़ने, समझने, सराहने और उस पर अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त करने वाले सभी लेखकों, कवियों, पाठकों एवं साहित्य-प्रेमियों को मेरा हृदय से प्रणाम और धन्यवाद।
आप सभी की विस्तृत टिप्पणियाँ, प्रशंसाएँ और आत्मीय प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान हैं। आपकी प्रत्येक प्रतिक्रिया ने न केवल मुझे प्रसन्न किया है, बल्कि मेरे लेखन-पथ को भी नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की है।
एक रचनाकार के लिए इससे बड़ा सुख क्या हो सकता है कि उसकी रचना पाठकों के मन तक पहुँचे और उनके हृदय में अपनी प्रतिध्वनि छोड़ जाए। “अनुगूँज” के प्रति आपका स्नेह, रुचि और अपनापन मेरे लिए अमूल्य है। यह विश्वास दिलाता है कि मेरी लेखनी का भाव आप तक पहुँचा और आपने उसे आत्मसात किया।
आप सभी मेरे साहित्यिक सफ़र के केवल सहयात्री ही नहीं, बल्कि मेरे पथप्रदर्शक भी हैं। आपकी प्रेरणा, मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन मेरे साथ इस कहानी की यात्रा में निरंतर बने हुए हैं। आपके शब्द मुझे और बेहतर लिखने, नए विषयों को खोजने और साहित्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को और दृढ़ करने की प्रेरणा देते हैं।
विशेष रूप से, कहानी के अंत को लेकर आपने जो महत्वपूर्ण सुझाव और विचार साझा किए हैं, उनके लिए मैं आपका और भी अधिक आभारी हूँ। आपकी दृष्टि और अनुभव मेरे लिए अत्यंत सम्माननीय हैं। मैं आपके सुझावों का गंभीरता से सम्मान करता हूँ और उन्हें अवश्य ध्यान में रखूँगा। एक लेखक के लिए पाठकों और साथी रचनाकारों की सार्थक प्रतिक्रिया उसकी रचना को और अधिक परिपक्व एवं प्रभावशाली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
“अनुगूँज” को अपना स्नेह देने, उसकी खूबियों को पहचानने और उसकी कमियों की ओर भी आत्मीयता से ध्यान दिलाने के लिए आप सभी का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद। आपका यह प्रेम, विश्वास और मार्गदर्शन मेरी साहित्यिक यात्रा की अमूल्य पूँजी है।
सादर, सप्रेम एवं कृतज्ञता सहित,
राजेन्द्र जोशी 🙏🌹📖✨
अनुगूंज, जीवन की अनुगूज उत्तरार्द्ध में साथी के जाने के बाद मन मस्तिष्क में व्याप्त अकेलेपन की गूंज को बड़े अच्छे से पात्रों के माध्यम से सुनाया है । साधुवाद हर स्थल, परिदृश्य घटना, महेश,के मुखरित, तो लोरा के अव्यक्त जीवन में व्याप्त एकांत को बड़े अच्छे से व्यक्त करती प्यारी सी कथा । जहां एक मुलाकात की अनुगूंज ,महेश की जीवन की शांत पड़ी वीणा के तार झंकृत कर देती है ।साधुवाद।
आपकी कहानी का ये अंश पढ़ा। पढ़ते ही मन भीग गया। आपने प्रवासी मन की उलझन को बहुत सच्चाई से पकड़ा है।
*जो सबसे अच्छा लगा:*
*बिम्ब बहुत जीवंत हैं* – “रात ने खिड़कियों पर अधूरे सपने छोड़ दिए” जैसी पंक्ति से ही कहानी का मिज़ाज बँध जाता है। बेसमेंट, नमी, घास पर पानी के कण, कॉफी मशीन की भनभनाहट – कनाडा की सुबह आँखों के सामने आ जाती है।
*महेश का अकेलापन बिना शोर के दिखता है* – आपने उसे चीखने नहीं दिया। वह बस देखता है, महसूस करता है। ‘बेटी कब इतनी बड़ी हो गई’ वाली लाइन में एक पिता की पूरी उम्र छुपी है। बहुत मार्मिक।
*संस्कृतियों का टकराव सूक्ष्म है* – समीर की ‘स्थायी विनम्रता’ जो थका देती है, सीमा की फुसफुसाती अंग्रेज़ी, और महेश की दिल्ली वाली खराश। आपने सीधे-सीधे ‘इंडिया vs कनाडा’ नहीं किया, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी बातों से फासला दिखाया। यही असली लेखन है।
❤️💙💜.
भाषा में ठहराव है– वाक्य छोटे हैं, पर वजनदार। उर्दू-हिंदी का मिश्रण सहज लगता है। पढ़ते हुए साँस लेने की जगह मिलती ह
ये लेखन परिपक्व है। आप किरदारों को जज नहीं कर रहे, सिर्फ उनके साथ खड़े होकर देख रहे है .
आपने जिस तरह से रूपकों (metaphors) का इस्तेमाल करके कहानी लिखी है, वह तारीफ़ के काबिल है। मुझे कहानी के आगे बढ़ने का तरीका बहुत पसंद आया। यह धीरे-धीरे पाठकों को उन किरदारों की बातचीत और उस रहस्य से जोड़े रखती है, जो एक अनोखे रिश्ते की नींव पर बुना गया है।
जब मैं ‘अनोखे’ (unconventional) रिश्ते की बात करता हूँ, तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि एक समाज के तौर पर हम रिश्तों और भावनाओं को कैसे समझते हैं। कुछ संस्कृतियों में यह बिल्कुल सामान्य बात है, तो कुछ में इसे गलत या वर्जित (taboo) माना जाता है।
लेकिन जब बात भावनात्मक जुड़ाव की हो, तो हमें उसे किसी परिभाषा में बांधने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। जब भी हम रिश्तों को समझने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। रिश्ते तो बस संवारने और निभाने के लिए होते हैं।
हिन्दी के जाने- माने कवि- कथाकार राजेन्द्र जोशी की कहानी ‘ अनुगूंज ‘ पढ़ी l कहानी झील के ठहरे जल की अनुगूंज है l उस जल में कंकड़ फेंके जाने की अनुगूंज है l जिन्दगी लौटने की अनुगूंज है l वह अनुगूंज, जो अपने देश लौटने के बाद भी कथानायक के भीतर बजती रहती है l
‘ अनुगूंज ‘ केवल कहानी भर नहीं, एक खूबसूरत कविता है , जो इतनी बड़ी होकर भी बहुत छोटी है l और छोटी होकर भी बहुत बड़ी l कहानी के अनेक विन्दु ऐसे हैं, जो हमारे भीतर कविता की तरह उतर जाते हैं l जैसे— उम्र चाहे जितनी हो जाये, मन के भीतर कहीं एक जगह हमेशा खाली खाली रहती है … वह किसी ऐसे समय में लौट आया है, जहाँ उम्र की सीमाएं थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं … जैसे कोई अधूरी किताब बन्द कर रहा हो … उस छोटे से स्पर्श में जैसे दो महाद्वीपों का अकेलापन था … कुछ मुलाकातें प्रेम नहीं होतीं, सिर्फ़ यह याद दिलाने के लिए आती हैं कि मन अब भी जिवित है …l
यह एक ऐसी प्रेम कथा है, जो अधूरी होकर भी स्वयं में सम्पूर्ण है l महेश उस पूर्णता को जी रहा है l और लारा भी, जहाँ कहीं होगी, उस पूर्णता से भरपूर होगी l
इस बेहद काव्यात्मक कहानी के लिए राजेन्द्र जोशी को बहुत- बहुत बधाई ! …