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Home » अपनी धुन में रस्किन बांड : पवन करण

अपनी धुन में रस्किन बांड : पवन करण

by arun dev
August 5, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 3 mins read
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अपनी धुन में रस्किन बांड :  पवन करण
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अपनी धुन में रस्किन बांड
मरने में मुझे कोई दिक़्क़त नहीं है, मगर यह जरूर है कि ज़िंदगी बहुत याद आएगी.

पवन करण

 

बरस दो हजार छब्बीस के जून माह के पहले दिन जिस वक्त मैंने रस्किन बांड की आत्मकथा ‘अपनी धुन में’  पढ़कर पूरी की है. उस समय रस्किन बांड देहरा, लंढौर के आईवी काटेज में अपने जीवन के तिरानबेवें बरस का एक और दिन कागज पर कोई निबंध, कहानी या कविता लिखकर बिता रहे होंगे. उन्होंने अपनी इस आत्मकथा में सौ बरस के आसपास जीने वाले कुछ जिंदादिल लोगों का जिक्र किया है. मेरी चाहत है कि वे अपनी उम्र का सौवां अंक पार करें और भारत ही नहीं दुनिया भर में बसे अपने पाठकों और प्रशंसकों की शुभकामनाएं स्वीकार करें. मैं राकेश, बीना और उनके बच्चों से भी नम-आग्रह करना चाहूंगा कि जिस तरह रस्किन बांड ने आपके परिवार को गोद लिया (जैसा कि वे आत्मकथा में लिखते हैं) ठीक उसी तरह वे भी अब आप सबकी गोद (परिवार) में हैं. उनकी दृष्टि और आवाज की सीमा में बने रहें. उनके बारे में ठीक-ठीक बिना जाने उम्मीद करता हूं कि अपनी कलम के साथ कागज पर नित-दिन  सक्रिय उन्हें किसी तरह की दया की नहीं हर तरह की  देखभाल की जरूरत होगी.

सुबह की घास पर ओस की बूंदों जैसी. तेज धूप में किसी घने वृक्ष की छांव जैसी. बारिश के बाद मिट्टी से उठती गंध जैसी. जंगली झाड़ियों और बेलों पर उगी पत्तियों और खिले फूलों जैसी. पेड़ों पर फुदकतीं गिलहरियों और उन पर चढ़ते और अपना रंग बदलते गिरगिटों और उन पर चहचहाते-गाते कई तरह के छोटे-बड़े पक्षियों जैसी होने के साथ-साथ घर में घुसते ही लाड़ जताते कुत्तों और लपककर गोद में बैठ जाती बिल्ली की उछाल को अपने में समेटे इस आत्मकथा को जिसे पढ़कर आप यह तय नहीं कर सकते कि इसमें रस्किन बांड नामक मनुष्य का निर्माण चल रहा है या लेखक रूपी रस्किन बांड की निर्मिति हो रही है. जिसमें मनुष्य और लेखक इस कदर ‘एक’ हैं कि उन्हें ‘दो’ करके देख पाना असंभव है. यही वजह है कि बचपन से ही रस्किन बांड का जो देखना है. वही लिखना भी है. इसी के चलते ये आत्मकथ्य भी एक दीर्घ कहानी अथवा उपन्यास या कहें मनुष्य केंद्रित ऐसा निबंध ही है जिसके केंद्र में रस्किन स्वयं हैं और जिसमें से उनका लिखा उनकी प्रकाशित किताबों में बाहर है, जो हमारा पढ़ा जा चुका है या हमारे द्वारा अभी पढ़ा जाना बाकी है.

वे अपने इस आत्मकथ्य में लिखने के लिए अलग से कोई जतन करते नहीं दिखते. बस वे जीते दिखते हैं और जैसा, जितना वे जीते जाते हैं उतना लिखते जाते हैं. शायद अपने भीतर विकसित होती इसी खासियत के दम जिसे उसने उन्हें बचपन से ही उनके भीतर होने का विश्वास दिला दिया. वे लेखक होने और लेखन के दम पर अपने जीवन का यापन करने का निर्णय लेते हैं. जो एक बारगी तो उनके परिवार और मित्रों के साथ-साथ इस आत्मकथ्य को पढ़ने वाले पाठक को भी हैरत में डालता है. मगर जिस तरह इश्क आसां नहीं. लेखक होना भी आसान नहीं. हराने पर आमादा जिंदगी हर जगह कड़वी-फीकी और कभी-कभार मीठी हकीकत बनकर उसके सामने आ खड़ी होती है. जो हार जाता है फिर हर चेहरे में उसका चेहरा दिखाई देता है मगर जो हार को हरा देता है सबसे अलग दिखाई देते उसके चेहरे को हर कोई देखता है. ठीक रस्किन बांड की तरह जिनके लिए इश्क तो कठिन ही बना रहा मगर अनेक कठिनाइयों को सरल बनाते हुए उन्होंने अपना लेखक होना साध लिया.

रस्किन बांड से ये मजेदार प्रश्न है कि क्या उन्हें उनका लेखक होना उन्हें एक अथवा उन कुछ स्त्रियों को जिन्हें अपना बनाने के उन्होंने प्रारंभिक जतन किये उन्हें स्थायी रूप से गंवाकर हासिल हुआ. कितनी बार ऐसा हुआ कि उन्हें इश्क के बहते दरिया के किनारे से लौटना पड़ा. जबकि वे उसमें डूबकर जाना चाहते थे. क्या उनके पास, जिसे हासिल करने की उन्होंने भरपूर कोशिश की, ऐसी किसी स्त्री का उन्हें लिखा, पछतावे से भरा कोई पत्र है जिसमें उसने कहा हो ‘मैंने तुम्हें गंवाकर बड़ी भूल की रस्किन’. जिसका जिक्र उन्होंने अपने इस आत्मकथ्य में नहीं किया और वे उसे छुपा गये.

उनके पिता ने भी विवाहित-प्रेम में जो विफलता और उसके बाद जो आजीवन विच्छेदन झेला उसे मजबूत बचपन के मालिक रस्किन ने बहुत नजदीक से देखा. बल्कि कहा जाये तो साझा किया. शायद अपने पिता के चुप्पे अकेलेपन ने ही उन्हें बचपन से ही अकेलापन झेलने के काबिल बनाया. माँ से अलगाव के बाद तो शिमला में बोर्डिंग स्कूल की पड़ने वाली छुट्टियों के दौरान वे रॉयल एयरफोर्स में सेवारत अपने पिता के साथ दिल्ली में ही रहे. दुनिया भर के डाक-टिकटों के जुनूनी संग्राहक उसके पिता घर में डाक टिकटों की एल्बम और उनसे भरे लोहे-लकड़ी के बक्सों में खोये रहते. क्या उनकी तलाश ऐसे किसी टिकट की थी जो फिर से उन्हें उसकी माँ से मिला दे. जिसके बारे में उन्होंने कभी रस्किन को बताया नहीं. शायद ऐसा कोई टिकट था ही नहीं. लगातार घटते रोचक जीवन प्रसंगों के साथ, फिल्में देखने, रेस्टोरेंट में नियमित खाना खाने जाते और पिता के गंभीर रूप से बीमार पड़ने के दौरान वे उनके साथ अकेले थे और पिता के मन में खुद प्रवेश करते हुए वे अपने पिता को अपने हृदय में प्रवेश करने दे रहे थे. ये एक अव्यक्त दबी-छीपी अव्यक्त पीड़ादायक आत्मीयता थी जो दोनों के भीतर पनप चुकी थी.

पिता और माँ के बीच वेगमयी प्रेम के परिणाम स्वरूप कसौली में जन्में रस्किन को जामनगर से मसूरी तक माँ और पिता दोनों का साथ और प्यार मिला. माँ के ‘तितली’ सुभाव से उसका परिचय यहीं से होना शुरु हुआ जो देहरा में आकर उड़ान भरता चला गया. जिससे अंत तक उसे शिकायत नहीं हुई. मगर दिल्ली में उनके साथ बस माँ से बनी दूरी थी. उनके देखते-देखते पिता और माँ की उम्र के बीच का दोगुना अंतर स्थायी अंतर में बदल गया. रस्किन का एक भाई और एक बहन माँ के साथ देहरा में थे और वह अकेले पिता के साथ दिल्ली में. माँ से अलग होने के बाद पचास से कुछ कम उम्र में कलकत्ता में रस्किन के दादी के पास बीमारी से मृत्यु होने तक रस्किन के पिता के जीवन में किसी अन्य स्त्री को लेकर कोई ‘हलचल’ नहीं हुई मगर रस्किन की माँ तो स्थायी तौर पर खुद को ‘हलचल’ के हाथों में सौंप चुकी थी.

जब रस्किन के पिता का निधन हुआ वह अपने बोर्डिंग स्कूल शिमला में था. पिता की अंत्येष्टि में शामिल न पाये रस्किन ने बरसों बाद कलकत्ता में दादी की कब्र के पास अपने पिता की कब्र खोज ली. दूसरी शादी कर चुकी माँ ने पिता की मृत्यु के बाद उससे संपर्क और संवाद स्थापित किया. जिसमें बहुत बेफिक्री और थोड़ी चिंता शामिल थी. जिसके चलते जब वह शिमला अपने स्कूल से दिल्ली होता जब वह देहरा पहुंचा तो रेलवे स्टेशन पर उसे लेने माँ अथवा उसके सौतेले पिता में से कोई भी मौजूद नहीं था. रॉयल एयरफोर्स से मिलने वाले धन से उसकी पढ़ाई पूरी हो सकी. रस्किन की ‘निर्भर’ बहन का भी आजीवन खर्च रॉयल एयरफोर्स ने उठाया जो अंत तक उसकी सौतेली बहन प्रमिला के साथ रही. प्रमिला उसकी माँ के दूसरे पति की पहली पत्नी बीबीजी की कोख से जन्मी लड़की थी. रस्किन की माँ ने भी अपने दूसरे पति जो हिंदू थे से दो लड़कों को जन्म दिया. माँ के दूसरे पति का एक समझौते के बाद अपनी पहली पत्नी और दूसरी पत्नी के यहाँ आना-जाना लगा रहता. मगर उल्लेखनीय है कि रस्किन बांड ने इस सब पर अपनी ‘अतिरेक-शून्य’ इस आत्मकथा में निरपेक्ष ढंग से लिखा है. न उसमें किसी के लिए नफरत है न अतिरिक्त लगाव. एक दृष्टि है जो लगातार सब देख रही है. यहाँ इस बात के रेखांकन में कोई संदेह नहीं कि वह बचपन से ही एक बनते हुए लेखक की दृष्टि है.

रस्किन बांड ने अपनी इस आत्मकथा में जामनगर में रहने के दौरान अपनी आंखों देखे-कानों सुने कई रोचक प्रसंग दर्ज किए हैं उनकी कम-उम्र स्मृति पर आश्चर्य होता है जिसका उल्लेख उन्होंने आत्मकथ्य के प्रारंभ में किया है. क्रिकेट के पोषक और प्रेमी जामसाहब अपने महल में ब्रिटिश और यूरोपियन को ही नौकरी पर रखते थे. जिसके चलते उनके पिता जामसाहब के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने जामनगर रहे. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जिन्होंने अपने दम पर पोलैंड के शरणार्थियों को शरण दी. जहाँ एक तरफ राजकीय ढंग से कुत्तों के विवाह और उनके अंतिम संस्कार करवाने वाले जूनागढ़ के नवाब बंटवारे के पश्चात अपने कुत्तों के साथ पाकिस्तान भागे वहीं जामसाहब भारत में अपने राज्य के विलय के लिए सहर्ष तैयार हुए. छोटे हवाई जहाज उड़ाने के शौकीन जामनगर के एक प्रिंस ने रस्किन को उसकी माँ के साथ हवाई जहाज की कलाबाज सैर भी करवाई. स्कूल में अजहर से उसकी शानदार दोस्ती जिसे बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाना पड़ा और महाराजा पटियाला की कई पत्नियों से जन्में लड़कों के किस्से. भीतर-भीतर लेखक के रूप में संपन्न हो रहे रस्किन के मानस का प्रारंभिक परिचय देते हैं. हाँ यहाँ एक रोचक बात यह कि शिमला में रस्किन के स्कूल में मशहूर नाट्य लेखक मोहन राकेश की हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्ति हुई और उन्होंने बकौल रस्किन बच्चों को पंजाबी मिश्रित बहुत खराब हिंदी पढ़ाई.

पिता की मृत्यु के पश्चात देहरा में अपनी माँ के साथ रहकर दोस्तों के साथ आवारागर्द समय बिताने वाले रस्किन संगदिल नानी के छोड़े कुछ रुपयों से इंग्लैंड जाते जरूर हैं और वहाँ पहले जर्सी और फिर लंदन में नौकरी भी करते हैं, बीमार भी पड़ते हैं, प्रेम भी करते हैं. ‘दि रूम ऑन द रूफ’ के प्रकाशन के सिलसिले में प्रकाशक से भी मिलते हैं और अपने सहयोगी की मदद से नया टाइप राइटर भी खरीदते हैं. बीमार पड़ते हैं और अस्पताल में रहकर मुफ्त इलाज करवाने के पश्चात ब्रिटेन की महारानी को मन ही मन इस चिकित्सकीय आतिथ्य के लिए धन्यवाद भी देते हैं. मगर अपना दिल जिसे वे हिंदुस्तान में ही छोड़कर गये थे, वह उसे अपने पास बुलाकर इंग्लैंड में अपने साथ रखने की कोई कोशिश नहीं करते. ग्राहम ग्रीन से हुई आकस्मिक मुलाकात भी उनका मन नहीं बदल पाती और वे ब्रिटिश लेखक भी जिन्हें उन्होंने डटकर पढ़ा. उन्हें लंदन में नहीं रोक पाते.

सुबह-शाम के खाने और सुबह के नाश्ते की समस्या रस्किन के साथ हिंदुस्तान में भी बनी रही और इंग्लैंड में भी. कारण. धन की कमी. होटलों में पेट भर खाना महंगा मिलता और कम पैसों में मिलने वाले कम खाने से उनका पेट नहीं भरता. इसलिए उन्हें कोई खाने पर घर बुलाता तो वे डटकर खाते. वे शुरु में लिखते भी हैं बोर्डिंग स्कूल में मिलने वाले औसत भोजन ने एक तो उनकी सेहत को गड़बड़ा दिया. जिसके चलते उनकी एक आंख में खराबी आई.  दूसरा उन्हें खाने पर टूट पड़ने वाला भी बना दिया. वाह. वह कितना अच्छा दिन था जिस रोज रस्किन ने अंतत: हमेशा के लिए भारत में, देहरादून में जहाँ के कच्चे-पक्के रास्ते उनके कदमों के उन पर चलते जाने की पहचानी आदत का इंतजार कर रहे थे. पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, पर्वत-चांदनी, उनके द्वारा बदले जाते घर और उनकी खिड़कियां, जिनसे वे रात को आसमान में बिखरे तारों और दिन में प्रकृति के वैविध्य को ताकते और उसके दोस्त रस्किन के आने की बाट जोह रहे थे. वे लिखते हैं भारत पहुंचकर वे कहीं नहीं रुके उन्होंने सीधे देहरा पहुंचकर ही दम लिया. जबकि ब्रिटिश मूल का होने के नाते इंग्लैंड को उनका स्वाभाविक घर और वहाँ की रिहाइश को उनके लिए सुगम बताया जाता रहा.

अब हमेशा के लिए भारत उनका घर था. यहाँ लगने और मिटने वाली भूख और जिसमें रात गुजारी जा सके वह छत और दीवारें उनकी थीं. क्या किसी मनुष्य का देश उसकी नस्ल से नहीं जहाँ उसने जन्म लिया वहाँ की मिट्टी से तय होता है. हाँ होता है और रस्किन के मामले में यही था. जिसके चलते रस्किन बांड भारत लौट आये. रस्किन ने भारत के आजाद होने के बाद भारत छोड़कर जाने वाले और न जाने वाले तथा यहीं रहकर मर-खप जाने वाले ब्रिटिशों, दोनों का व्यवहारिक जिक्र अपने इस आत्मकथ्य में किया है. जिसके पास धन था हालात उसके ही लिए ठीक थे. जिसके पास धन नहीं था उसके लिए परिस्थितियां दोनों ही तरफ नाजुक थीं. ऐसे भी लोग थे जिनका ब्रिटेन मैं अब कोई नहीं था. मगर वे केवल ब्रिटिश होने के नाते वहाँ जा रहे थे. वहाँ उनके पास न घर था और करने के लिए न कोई काम. हाँ पंजीयन कराने पर अंग्रेज सरकार उन्हें भारत से लंदन तक का किराया जरूर दे रही थी. रस्किन की लेखक निगाह विभाजन के पश्चात भारत से पाकिस्तान जाने और पाकिस्तान से भारत आने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा से भरी रक्तरंजित तकलीफों पर भी थी. जिसके बारे में उन्होंने इस आत्मकथ्य में लिखा है. खासकर अपने दूसरे पिता का अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को पाकिस्तान की सीमा तक पहुंचाने का जिक्र. रस्किन को अपने सौतेले पिता से जो बाद में उसकी माँ और बच्चों को लेकर हमेशा के लिए दिल्ली रहने चले गये से कोई समस्या न थी. मगर उनके बीच किसी तरह की आत्मीयता भी न थी. मगर आगे चलकर रस्किन की थोड़ी-सी आत्मीयता उनके सौतेले पिता की पहली पत्नी बीबीजी से बनी जो अपने अधिकांश में आवश्यकता पर आधारित थी. माँ को कैंसर हुआ तब रस्किन उन्हें देखने दिल्ली भी गये और मृत्यु होने पर उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुए. भाई के विदेश जाकर बसने और बहन के प्रमिला के साथ होने के बाद वे अब लेखक होने के विश्वास से भरे वे हर तरह से अकेले थे.

रस्किन बांड ने निराश होना नहीं सीखा. उनके इस आत्मकथ्य में निराशा या हताशा ढूंढे नहीं मिलेगी. कहानी या निबंध प्रकाशित हो जाने पर मिल जाने वाले पांच रुपये के पारिश्रमिक पर भी उतने ही संतुष्ट हैं जितने इलेस्ट्रेटेड वीकली से मिल जाने वाले पचास रुपये के पारिश्रमिक पर. पत्रिकाओं के संपादक की ओर से रचना अस्वीकृति के मिलने वाले पत्रों पर उनका आक्रोशित होना या खीजना हमें कहीं देखने को नहीं मिलता. सकारात्मकता और धीरज उनका स्थायी गुण है. इस पूरे आत्मकथ्य में उनके दिमाग को जितना हम लिखने की नव-कल्पनाओं से भरा पाते हैं टटोलने पर हमें उनकी जेबें उतनी ही खाली मिलती हैं. किसी मजदूर जैसे रोज कुआं खोदकर पानी पीते लेखक की तरह वे हमें मिलते हैं. उनको मिलने वाला अच्छा खाना उनको मिलने वाले अच्छे पारिश्रमिक पर टिका होता है. जिसका रंज आत्मकथ्य पढ़ने वाले पाठक को तो होता है मगर उसे लिखने वाले लेखक को नहीं. मगर आगे चलकर धीमी गति से ही सही जिंदगी की गाड़ी को लेखन के दम पर जिंदगी भर खीचने का फैसला कर चुके रस्किन के पैरों को हम लेखन-प्रकाशन की जमीन पर क्रमशः जमता हुआ देखते हैं.

Ruskin Bond

उनके उपन्यास प्रकाशित होना प्रारंभ होते हैं. कहानी संग्रह प्रकाशित होते हैं. इस्मत चुगताई के कहने पर शशि कपूर उनकी कहानी पर जुनून नामक फिल्म बनाते हैं जिसके उन्हें दस हजार रुपये मिलते हैं जो बस तीन-चार महीने के लिए ही काफी होते हैं. विशाल भारद्वाज भी उनकी कहानी पर ‘सात खून माफ’ फिल्म बनाते हैं जिसमें वे एक छोटी सी भूमिका भी निभाते हैं. मगर विशाल भारद्वाज ने इसके लिए उन्हें कितना पैसा दिया इसका जिक्र वे नहीं करते. शायद यहाँ से वे दुनियादार होने लगते हैं. बच्चों के लिए जवाहर लाल नेहरु की जीवनी लिखने के लिए डा कर्ण सिंह उनका नाम आगे बढ़ाते हैं और इस सिलसिले में वे ठीक आपातकाल के दिनों में इंदिरा गांधी से मिलने जाते हैं. वे मुम्बई से प्रकाशित एक अंग्रेजी पत्रिका के संपादन से जुड़ते हैं और अलग भी हो जाते हैं. अश्लीलता के आरोप में उन्हें एक मुकदमा भी झेलना होता है. जिसमें विजय तेंदुलकर तो उनकी मदद करते हैं मगर खुशवंत सिंह नहीं. इस सबसे उनकी बढ़ती जाती लेखकीय लोकप्रियता का अनुमान हम लगा सकते हैं.  मगर ये रस्किन बांड हैं जिनसे देहरादून नहीं छूटता. वे मुम्बई से, दिल्ली से, देहरा की ओर भागते हैं. अपने आत्मकथ्य में धीरे-धीरे वे अपनी बढ़ती आमदनी के बारे में बताना भी बंद कर देते हैं लेकिन इसका कुछ अस्पष्ट भाग तब उजागर होता है जब मकान मालिक के कहने पर वे आईवी काटेज जिसमें वे अपने गोद लिए परिवार के साथ रहते हैं खरीदने का निर्णय लेते हैं. आईवी काटेज उनके जीवन की पहली अचल संपदा होती है जिसे वे क्रय करते हैं. जिसमें रहते हुए एक रात तेज अंधड़ में जिसकी छत उमड़ गई थी और बच्चों सहित पूरा परिवार उनकी किताबों को पानी में भीगने से बचाने में जुटा था. एक परिवार जिसे रस्किन को गोद लिया जिसकी शुरुआत प्रेम और चंद्रा से हुई उस विषय में आपको इस आत्मकथ्य को पढ़कर जानना चाहिए. उसकी रोचकता को तभी आप महसूस कर सकेंगे.

ग्रामोफोन पर घूमते रिकार्ड पर बजते अधिकतर अंग्रेजी गीतों और रस्किन की कहानियों और किताबों की सूची भी आप इस आत्मकथ्य को पढ़कर बना सकते हैं. हाँ रस्किन द्वारा देखीं गईं तमाम अंग्रेजी फिल्मों की भी. ब्रिटिश और अमेरिकी सैनिकों की आरामगाह में तब्दील हो चुके देहरादून के सिनेमाघरों में तब अंग्रेजी फिल्में चलतीं. किसी न किसी तरह रस्किन उन्हें देख ही लेते. वे याद करते हैं कि किस तरह अचानक एक चलती फिल्म रोककर उन्हें बताया गया कि दिल्ली में महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई है और अब सात दिन तक थियेटर बंद रहेंगे. तब वे चौदह बरस के थे. और ये भी कि मध्यांतर में बजाने के लिए कुछ अतिरिक्त रिकार्डों के बदले थियेटर के मैनेजर ने उन्हें ऐसा फ्री-पास दिया जिसके चलते वे किसी भी दिन कोई भी शो देख सकते थे.

प्रभात सिंह द्वारा किसी पहाड़ी नदी के कल-कल करते निर्बाध बहाव जैसी अचूक-अनुदित, शायद इस किताब की विशेषताओं पर संपूर्णता में लिख पाने में विफल मैं यही कहना चाहता हूं कि ये एक ऐसी प्यारी आत्मकथा है जिसे मैं कुछ कम किताबों की तरह, हमेशा अपनी आंखों के सामने रखना चाहूंगा. ये एक ऐसे लेखक और मनुष्य की गाथा है. (जो हर उम्र में बचपन के रस्किन की तरह नजर आता है.) जिसमें हर कोई अपने को थोड़ा सा ढूंढ सकता है. कुछ-कुछ अपने को पा सकता है. एक ऐसे मनुष्य की गाथा जिसे जीना आता है. जिसके लिए वह किसी अन्य पर नहीं स्वयं पर निर्भर है. खुद के लिए जिसे खुद से उम्मीद है.

तुम्हारा देश भारत तुम्हें बहुत प्यार करता है रस्किन.

 

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें .

 

पवन करण
(18 जून, 1964; ग्वालियर, म.प्र.)
__________________
प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित.सम्मान : ‘रामविलास शर्मा पुरस्कार’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान आदि से सम्मानित.
pawankaran64@rediffmail.com

 

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Comments 5

  1. Mushtak Khan says:
    5 days ago

    पवन जी ने केवल पुस्तक ही नहीं बल्कि रस्किन बॉन्ड के जीवन में भी गहराई से उतरकर लिखा है. पुस्तक के साथ यह समीक्षा भी पढ़ने के काबिल है. इससे
    रस्किन बॉन्ड के लेखन ही नहीं उनके जीवन को भी समझने का मौका मिला.

    Reply
  2. Anonymous says:
    5 days ago

    इस लेख की दूसरी पंक्ति में मेरी समझ से तिरानवें वर्ष होगा।

    Reply
    • arun dev says:
      5 days ago

      आभार . ठीक किया गया है.

      Reply
  3. Amit Upmanyu says:
    5 days ago

    बहुत गहनता से लिखा गया है। किताब तक उंगली पकड़ कर ले जाने वाली पगडंडी है यह आलेख।

    Reply
  4. कुमार अम्बुज says:
    3 days ago

    यह सुंदर समानांतर पाठ है। सहज, तरल।
    एक सहयात्रा।

    Reply

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