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Home » अरसलान और बहज़ाद : पवन करण

अरसलान और बहज़ाद : पवन करण

by arun dev
April 29, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 3 mins read
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अरसलान और बहज़ाद :  पवन करण
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आत्मा का कमीनापन यह है कि
वह हर उस चीज़ से खुश होती है
जिसमें जिस्म को दर्द सहना पड़े.

 

 पवन करण

 

अरसलान और बहज़ाद कॉलेज की पढ़ाई के दौरान बने दो मित्र हैं, जिनमें बहज़ाद वह है जो अभी खुद को कूड़े के एक पहाड़ जैसे ढेर में घुसाकर मारने वाला है. दूसरा अरसलान है, जिसके सीने में ‘जैक’ खंजर उतारने वाला है. मगर यह ‘जैक’ कौन है? क्या यह वही है, जो बच्चा जनने के दौरान चैचन्या में आठ माह की गर्भवती हुस्न आरा सैफ़ी के पेट से तेज हवा की तरह निकला और हवा में ही होता हुआ बहज़ाद के उस मूल वीर्यस्थल जॉर्जिया पहुँचकर बार्था की गोद में जा ठहरा, जहाँ उसका बाप दफ़्न था और जिसका वीर्य उसके मुर्दा जिस्म (लाश) से निकालकर अड़तालीस घंटे के भीतर बहज़ाद की माँ की कोख में रोपा गया था? शायद इस उपन्यास का कोई पाठक इस कल्पना पर पहुँचे, और इस गहन-रोचक उपन्यास के लेखक ख़ालिद जावेद अपनी किसी असहमति पर ज़्यादा देर स्थिर न रह सकें. कारण यह भी है कि शायद उन्होंने इसे जान-बूझकर या अनजाने में, सुराख़ या सुराग की तरह, अपने इस उपन्यास ‘अरसलान और बहज़ाद’ में स्पष्ट न करते हुए पाठकों के लिए छोड़ दिया है.

Khalid Jawed

ठीक यहीं से, घृणास्पद ढंग और अजीब-सी बेचैनी से भयभीत होते जाने के बाद भी, अकल्पनीय और अब तक अनसुने, बंदर-सरीखे चेहरे और फुर्ती वाले अपराधी-मानस ‘जैक’ के बारे में जानने की अपरिहार्य उत्सुकता जन्म लेती है कि अरसलान ने कई कानूनी गवाहों की मौजूदगी में जॉर्जिया में बार्था से विवाह किया भी अथवा नहीं? बस, उसके पास बार्था के वकील के पत्र आते हैं. कानूनी नोटिस आते हैं. वहाँ से अधिकारी आते हैं और अचानक एक दिन, कुछ भी स्वीकार किए बिना, वह जॉर्जिया पहुँचकर स्वयं बार्था की ढेर सारी संपदा को अस्वीकार करते हुए, जैक को स्वीकारने के लिए तैयार हो जाता है.

क्या इस पूरी बार्था-जैक परियोजना के पीछे बहज़ाद का दिमाग था, जो हुस्न आरा सैफ़ी के चैचन्या छोड़कर चले जाने के बाद अपने मुर्दा पिता की कब्र पर जॉर्जिया गया और वहाँ यह सब उसके हर समय बेचैन दिमाग में जन्मा? वह अरसलान को उपहार लौटाने की बात करता है, मगर पढ़ें तो खूबसूरत हुस्न आरा सैफ़ी, अरसलान का बहज़ाद को दिया उपहार नहीं थी. हुस्न आरा सैफ़ी से दूर होने का अरसलान का अपना गोपन मनोवैज्ञानिक कारण था, दांपत्य-विफल बहज़ाद ने जिसे अरसलान के माथे मढ़ दिया.

इन तीनों घटनाक्रमों के पीछे की वस्तुस्थिति, कारण, या कोई सांकेतिक सुराग उपन्यास में मौजूद नहीं है. अब यहाँ भी यह संभवतः लेखक की ख़ूबी है और जान-बूझकर इसे ख़ामी की शक्ल में वह पाठकों की कल्पना करने और कथा गढ़ने की क्षमता आँकने वाली स्थिति में छोड़कर आगे बढ़ जाता है. इस आश्चर्य से इस किताब के पाठकों को कभी निजात नहीं मिल सकेगी कि आख़िर अरसलान के जैक को इस तरह स्वीकार करने के पीछे क्या वजह रही. क्या वह कभी जॉर्जिया गया था और उसने बार्था से विवाह किया था? यदि किया भी, तो यह किसी के सामने नहीं आ सका, जिसे वह इसे सबके आगे स्वीकार करने के स्थान पर अपने भीतर पी गया. तब भी, मात्र इस बड़े अनसुलझे रहस्य, जिसे जानने की गहरी जिज्ञासा पाठक के भीतर पैदा हो जाती है, और भी कुछ रहस्यों के आधार पर इसे इतने भर से एक रहस्यमयी उपन्यास नहीं कहा जा सकता है. इसे किसी अब तक अपरिचित मिश्रण की कोई ऐसी नवीन जादूगरी-भरी उपमा दी जा सकती है (शायद इसके लिए भी कोई रूपक न मिले), जिसका आना और परिभाषित किया जाना सामने था.

ख़ालिद जावेद के इस उपन्यास में अरसलान, बहज़ाद, तुगरल, हुस्नआरा और जैक के साथ-साथ कूड़े का विशाल पहाड़ और ‘मृत्यु’ मुख्य किरदार हैं. देखें तो मृत्यु ही मुख्य किरदार है, जिसकी बात लेखक ने प्रारंभ से अंत तक की है, और इतनी की है कि यदि मृत्यु हम मनुष्यों से, हम मनुष्यों की तरह, किसी कॉफ़ी टेबल पर सामने बैठकर संवाद कर सकती, तो ख़ालिद जावेद को अपना उस्ताद मानकर उनसे स्वयं के बारे में जानती और तरह-तरह से उनके द्वारा अपने देखे जाने को खुद अपनी आँखों से देखती. हो सकता है, इतने बारीक विचार-वैविध्य से उसे अपना देखा जाना दाँतों तले उँगली दबाने को विवश कर देता. मौत उन्हें अपने सिर पर उठाकर घूमती, और जब तक वह खुद नहीं चाहते, उम्र हो जाने के बाद भी वह उन्हें लेने नहीं आती, या वह उनसे अपने संदर्भ में होने वाली किसी चूक की प्रतीक्षा करती. ख़ालिद जावेद मृत्यु से प्रेम भी नहीं करते, नफ़रत भी नहीं करते, मगर उसे किसी काली बिल्ली की तरह हर समय अपनी गोद में बिठाए, उसकी पीठ पर हाथ फेरते और उसे दूध पिलाते रहते हैं.

हर रोज़ और अधिक मृत्यु को आत्मसात करता, आत्मविज्ञापित होता जाता उनका दृष्टिबोध ‘मौत की किताब’ से चलकर, बरास्ते ‘नेमतखाना’, ‘अरसलान और बहज़ाद’ तक बढ़ता ही जाता है. मृत्यु की इतनी परख शायद ही किसी ने की हो. मृत्यु को शायद ही किसी लेखक ने रूमानियत से बाहर निकलकर इतना ताका हो. मृत्यु के साथ शायद ही कोई लेखक हर समय रहता हो. कई बार लगता है, पके फोड़े में मवाद की तरह कुलबुलाती मृत्यु के अलावा उर्दू लेखक ख़ालिद जावेद का कोई दोस्त नहीं. मनुष्य के हिस्से में उनकी मृत्यु शानदार और आरामदायक अंदाज़ में नहीं आती, बल्कि वह गंदे नाले में बजबजाकर मरते हुए काले, बदबूदार पानी की शक्ल में क़दम रखती है. क्या ख़ालिद जावेद हर रोज़ मौत की आँखों में देखकर अपने बाल काढ़ते हैं?

इसी उपन्यास से

तुगरल का पात्र बेहद रोचक है. वह मोटी रकम लेकर अरसलान और बहज़ाद, दोनों ही के सामने अपने द्वारा जुटाए गए सबूत रखता है. यह एक तरह से दोनों को अपने द्वारा हासिल किए प्रमाणों से इस तरह का विश्वास दिलाने जैसा है कि भले ही इन घटनाओं से आपका अपरिचय हो, मगर इनसे आपका गहन जुड़ाव है.

तुगरल को इस तरह भी देखा जा सकता है कि कहीं वही तो अरसलान और बहज़ाद के जीवन में उथल-पुथल रचने का ज़िम्मेदार नहीं? क्योंकि अरसलान और बहज़ाद के अलावा, एक वही ऐसा शख़्स है जो उन दोनों के बारे में, उन दोनों से ज़्यादा जानता है. कहीं वह मौत तो नहीं, जो दोनों के सिर पर नाच रही थी और जिसने उन दोनों को एक जगह पर इकट्ठा कर उनका शिकार कर लिया? और जैक भी कहीं मृत्यु का ही युवा प्रतिनिधि तो नहीं, जिसे तुगरल ने ही रोपा हो? जैक को हम लगातार ख़ौफ़नाक ढंग से मृत्यु का कारोबार करते देखते भी हैं.

मगर एक बात जो तुगरल के पक्ष में जाती है, वह यह है कि आख़िर तुगरल ऐसा क्यों करेगा? उसके पास इनके विरुद्ध षड्यंत्र रचने का कोई कारण नहीं. बस हुस्न आरा बचती है, जिसके पास अरसलान और बहज़ाद, दोनों को बरबाद करने का रूमानी कारण है. मगर उसका कोई पता नहीं. पाठकीय कल्पना यह भी है कि क्या उसे जॉर्जिया में भी पाया जा सकता है? क्या तुगरल ने उसे अरसलान और बहज़ाद से जुड़े सारे सबूत सौंप दिए? शायद हाँ, शायद न.

अरसलान के बचपन और किशोरावस्था में घटीं यौन-केंद्रित घटनाओं ने उसे मसलकर रख दिया. तुम नहीं जानते, याक़ूब, कि तुमने क्या कर डाला. तुम्हारा क्या हुआ, याक़ूब— यह इस उपन्यास के पाठक नहीं जानते, मगर तुम्हारे अपराध के चलते अरसलान पर ज़िंदगी भर क्या बीती, यह ज़रूर जानने को मिलता है. फुल्लो बाज़ी ने उसके साथ जो किया, उसे तो वह भूल-सा गया, मगर तुम्हारा अपराध तो उसकी देह का हिस्सा बनकर रह गया. हर वक़्त उसे उसकी कमी याद दिलाता. काश, उस किशोर हस्तमैथुन-धारियों के स्कूल में तुम अरसलान को नहीं मिले होते. तब आगे चलकर उसे अपने सामने हुस्न आरा सैफ़ी को, और हुस्न आरा सैफ़ी के सामने स्वयं को, पराजित होते नहीं देखना पड़ता. तब हुस्न आरा सैफ़ी की देह के उन उभारों और घुमावों की दुनिया बस उसकी होती, अंततः जो बहज़ाद को भी हासिल नहीं हो सकी.

बहज़ाद की दुनिया भी तो स्त्री के स्तनों के इर्द-गिर्द ही बसती थी. मगर उसे स्त्री की नज़दीकी तो हासिल हुई, मगर एक भी बार उसे स्त्री के स्तनों की क़रीबी नहीं मिल सकी. हुस्न आरा ने भी उसे अपनी छातियों को नहीं छूने दिया, जबकि वे पति-पत्नी थे. मगर हुस्न आरा ने ऐसा क्यों किया— यह जिज्ञासा आख़िर तक बनी रही. अंततः स्त्री ही अपने स्तनों की स्वामिनी होती है, मगर वह उनके स्पर्श अपने प्रिय पुरुष और अपने बच्चों को बाँटकर उनसे उत्पन्न आनंद भी हासिल करती है. (जिन बातों पर उपन्यास में आख़िर तक पर्दा पड़ा रहा, उनमें एक यह भी है.) जबकि उनके बीच का प्रेम उन्हें विवाह तक लेकर आया था. आँख भर स्त्री के स्तन देखने, जी भर उन्हें प्यार करने की छटपटाहट, जो बहज़ाद को पूर्ण बनाती, वह उसे कभी हासिल नहीं हो सकी. उल्लेखनीय यह कि पढ़ने के दौरान बहज़ाद की छटपटाहट की यह निरंतरता, बहज़ाद के साथ-साथ पाठक को भी बेचैनी से भरने लगती है. पाठक की आँख और हाथ, बहज़ाद की आँखों और हाथों में बदल जाते हैं. इस उपन्यास में कभी न सुलझने को दृढ़ जितनी हमें उलझनें मिलती हैं, बहज़ाद के शरीर से आती मुर्दागंध के बीच उन्हें सुलझते हुए देखने की हमारी छटपटाहट-खीझ और बढ़ती जाती है.

उपन्यास के अंत में, लोगों के बीच खंजर बेचता जैक बचता है. हम अनुमान लगा सकते हैं कि अरसलान और बहज़ाद की मौत के बाद, जैक के हाथों में यह दुनिया कैसी चली होगी. क्या अब दुनिया में ऐसे ही कुछ लोग बढ़ रहे हैं? क्या तुगरल भी उसके साथ इस रक्तरंजन में शामिल हो गया होगा? लगता है, मौत बस मौत चाहती है; मौत का पेट बस मौत से भरता है. वह हर समय बोर्ड पर चाक से मरने वालों की संख्या लिखती और बढ़ाती जाती है. आज तक उसकी वृद्धि में कमी नहीं हुई. उसने आज तक खुद पर नाराज़गी जाहिर नहीं की. मौत को किसी की आरामदायक मौत ख़ुशी नहीं देती. किसी की आरामदायक मौत उसे उदास कर देती है. वह तो हर एक मरते हुए को ज़िंदगी के लिए छटपटाते, और खुद को उससे ज़िंदगी छीनते, देखना चाहती है. मौत को अपना साफ़-सुथरा होना भी पसंद नहीं. घिनौनी मौत, तकलीफ़देह मौत, मृत्यु से पहले मृतक के शरीर को खोखला कर चुकी मौत— मौत को सुकून से भर देती है.

गंदगी की दुनिया का कोना-कोना छान आने के लिए मनुष्य को अपने दिमाग और दृष्टि को तिलचट्टे में बदल लेना चाहिए. उसकी जीभ को सुअर की जीभ में बदल जाना चाहिए. उसे अपने पैरों को नाले के पानी से होकर निकल जाते कुत्ते के पैरों में परिवर्तित कर लेना चाहिए. ख़ालिद जावेद जिस तरह गंदगी की दुनिया की परतों को उतारते चलते हैं, इस बारे में और भी अन्य तरीकों से कहा जा सकता है. जिस समय पाठक गंदगी के इन विवरणों को पढ़कर अपने मुँह में घिन से पैदा हुए थूक का भर जाना महसूस कर रहा होता है, उस समय ख़ालिद जावेद की आँख गंदगी में घुसकर उसकी सतह को ठीक से खंगालकर देखने के उपक्रम में जुटी होती है. वे ऐसे उपन्यासकार हैं, जिन्हें गंदगी से कोई भय नहीं. वे गंदगी को जीवन से जोड़कर देखते हैं और उनका यह देखना खुड्डी में गिरे अरसलान के मल में बिगड़े पैर तक जाता है. गंदगी से घृणा न करने के क्रम में उनकी दृष्टि, गंदगी को समझने की दिशा में सक्रिय रहकर, उसे पृथ्वी पर जीवन का ही हिस्सा मानने का उपक्रम करती है. वे शौच के समय मलद्वार से बाहर आकर तत्काल मर जाने वाले कीटाणुओं जैसी गंदगी पर बात और विचार करने से भी बचने की कोशिश नहीं करते.

इस उपन्यास पर इसके चरित्रों और कथानक के घुमावों को सामने रखकर ही बात की जा सकती है. इससे वही पार पा सकता है, जो इसके कथानक से परिप्रश्न कर सकता है, इसके चरित्रों को ऐन बगल से पकड़ सकता है. सामने से पकड़ने की कोशिश में ये आपके हाथों से अपना हाथ छुड़ाकर भाग सकते हैं. कोशिश करने पर ये अरसलान की तरह किसी बारात के पीछे चल देंगे, बहज़ाद की तरह बीच नाटक में मिर्गी के दौरे की चपेट में आकर मंच पर गिर पड़ेंगे, हुस्न आरा की तरह अपने रूप की घातकता से आपको घायल कर देंगे, अथवा जैक की तरह आपके चेहरे से ख़ून टपकाता आपका ही चेहरा नोचकर एक तरफ़ खड़े हो जाएँगे. यह उपन्यास एक घटनीय-अघटनीय घटनाक्रम के बीच आपके द्वारा किए जाने वाले विश्वास-अविश्वास की तरह है, जिसमें वाद्य यंत्रों को और उनसे निकलती आवाज़ों को अब तक अपरिचित, अनदेखे ढंग से देखा गया है. आश्चर्यजनक है कि ख़ालिद जावेद अपने उपन्यास के चरित्रों में उतरकर जब सोचते हैं, तो सोचते चले जाते हैं; उनके मुँह में अपनी ज़ुबान धरकर कहते हैं, तो कहते चले जाते हैं.

ख़ालिद जावेद को अपनी तरह से ज़िंदगी को देख पाने, अपने ढंग से ज़िंदगी के बारे में कह पाने से रोक पाना आसान नहीं. हमारे बीच वे, उर्दू से हिंदी में अनूदित होकर आए अपने इस उपन्यास ‘अरसलान और बहज़ाद’ में भी, अनूठे हैं. तब आप उनसे क्या कह सकते हैं, जब आप जिस घृणा से दूर भागते हैं और वे उससे गलबहियाँ करते मिलते हैं? गंदगी के जिस ढेर से आप दूर भागते हैं, वे उस पर आराम से खड़े होकर सिगरेट फूँकते हैं.

खुद को ख़ालिद जावेद के लेखन का मित्र बना लेना आसान नहीं. उसके लिए थोड़ा वह चाहिए, जो ख़ालिद जावेद के पास है, जिसकी कीचड़ और मवाद से वह अरसलान और बहज़ाद, हुस्न आरा सैफ़ी, तुगरल तथा जैक जैसे चरित्र रचते हैं.

 

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें 

 

पवन करण
(18 जून, 1964; ग्वालियर,म.प्र.)

प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित.
सम्मान : ‘रामविलास शर्मा पुरस्कार’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान आदि से सम्मानित.
pawankaran64@rediffmail.com

Tags: 20262026 समीक्षाअरसलान और बहज़ादउर्दू उपन्यासख़ालिद जावेदनेमतख़ानापवन करणमौत की किताब
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Comments 6

  1. जावेद आलम ख़ान says:
    3 weeks ago

    खालिद साहब की दृष्टि एकदम अलहदा लगती है।उनके यहां जो ब्यौरे होते हैं वह पाठक को लेखक के साथ कथा में भीतर तक ले जाते हैं।
    पवन का सर ने बहुत अच्छी समीक्षा की है।
    बताना जरूरी है कि इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद इकबाल हुसैन भाई ने किया है और खूब किया है।

    Reply
  2. Anonymous says:
    3 weeks ago

    Bohot hi sunder ❤️

    Reply
  3. तेजी ग्रोवर says:
    3 weeks ago

    बहुत बढ़िया समीक्षा। ख़ालिद जावेद बड़े लेखक हैं और घूरे पर खड़े होकर कश खींच सकते हैं। यह वही कर सकते हैं। बहुत कम लेखक होंगे जो उन हदों को पार करते हैं जिनसे सब घबराते हैं।

    Pawan Karan ने बड़े मन से उन्हें पढ़ा और गुना है।

    पहले मैंने समास में अंश पढ़े थे। फिर पूरी किताब बाद में। पाठक को ऐसी चुनौती कम मिलती है कि वह अस्तित्व की गहराई में छिपे गुह्य तत्वों के रूबरू खड़ा कर दिया जाए।

    Reply
  4. निधि अग्रवाल says:
    3 weeks ago

    न केवल अरसलान और बहजाद उपन्यास को समझने के लिए बल्कि खालिद जावेद सर के लेखन से परिचय के लिए भी यह महत्वपूर्ण आलेख है। हमारी चाहनाओं और प्राप्य के बीच न केवल नियति बल्कि हम खुद भी कई मर्तबा आ खड़े होते हैं। मानवीय अस्तित्व और उससे जुड़ी तमाम अंधेरी गुफाओं में विचरण करते अरसलान और बहजाद के किरदार जीवन की तरह आसानी से अपने भेद नहीं देते। पुनर्पाठ में इस आलेख की रोशनी साथ बनी रहेगी। शुक्रिया।

    Reply
  5. ख़ुर्शीद अकरम says:
    3 weeks ago

    पवन करण जी ने उपन्यास को इस तरह जिया है जैसे कोई स्त्री अपने प्रेम को जीती है और फिर प्यार की निशानी को जन्म देती है । उन्हों ने उपन्यास के विभिन्न हिस्सों को जोड़कर एक नया चित्र रचा है, एक ऐसा चित्र जो हर कोण से एक नया प्रश्न उठाता मालूम होता है । जिस गंभीरता से हिंदी पाठकों ने ख़ालिद जावेद के उपन्यासों को पढ़ा और लिखा है वह अतुल्य है। हालांकि, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें उर्दू या हिंदी, अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा में अधिक गंभीर पाठक मिले । महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले पच्चीस-तीस वर्षों में वे एकमात्र उर्दू लेखक हैं जिन्होंने अपना पाठक पैदा किया है ।

    Reply
  6. Sadashiv Shrotriya says:
    3 weeks ago

    We seem to be moving towards an absurd world.

    Reply

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