| अरुण खोपकर विद्वत्ता और लालित्य चन्द्रकान्त पाटील |
अरुण खोपकर ने अपनी पुस्तकों में जिनके बारे में लिखा है वे कवि नारायण सुर्वे, लोकनाट्य-कलाकार दादू इंदुरीकर, मामा वरेरकर, श्री. ना पेंडसे जैसे लेखक, ख़ाँ साहब अहमद ख़ाँ तिरख्वाँ, पं. शरच्चंद्र आरोलकर, संगीतकार भास्कर चंदावरकर, अमीर ख़ाँ साहब जैसे संगीत के क्षेत्र के कलाकार, सिनेमा के विशेषज्ञ सतीशबहादुर, नृत्य-कलाकार लच्छू महाराज, कृष्ण नायर, सुलेखन-विशेषज्ञ र. कृ. जोशी अर्थात रघुनाथ कृष्ण जोशी, स्थापत्यविशारद चार्ल्स कोरिया, जहाँगीर सबावाला, भूपेन खक्कर, सुधीर पटवर्धन जैसे विभिन्न शैलियों के चित्रकार, फ़िल्म-निर्देशक मणि कौल और ऋत्विक घटक, के. के. महाजन जैसे चलच्चित्र-छायाकार और, और भी कई व्यक्तित्व.
महज़ यह नामावली पढ़ने भर से भी विविध कलाओं को लेकर अरुण खोपकर के अहसास और उनकी गहरी समझ के विस्तार और उसकी परिधि का पता चलता है.
मराठी में साहित्य-संस्कृति की चर्चा का आरंभ क़रीब 1960 के बाद ही शुरू हो पाया. हालाँकि लेखक-कवि, पाठक, समीक्षक, प्रकाशक, पुस्तक-विक्रेता आदि साहित्य-संस्कृति के पहलू हैं, मगर मुख्यतः यह चर्चा साहित्य और समीक्षक के गिर्द ही घूमती रही है. साहित्य की तुलना में सिनेमा के चाहने वालों की संख्या बहुत बड़ी थी. आम दर्शकों को मुख्य रूप से सिनेमा की कहानी में और कभी-कभी भूले से सिनेमा में प्रकट होनेवाले आसान-से फ़लसफ़े में रुचि रहा करती थी. जनसाधारण से लेकर उच्च वर्ग तक सभी को अपने दायरे में समेट लेने वाले इस जादुई माध्यम ने व्यक्ति के जीने के अंदाज़ पर बहुत गहरा प्रभाव डाला. लेकिन सिनेमा पर लिखी जानेवाली सतही समीक्षाएँ अधिकतर फ़िल्म की कहानी और गीतों पर ही ज़ोर दिया करती थीं.
सिने-संस्कृति को रचनेवाले बाक़ी सारे पहलुओं पर कभी कुछ लिखा ही नहीं जाता था. मराठी में पहली बार अरुण खोपकर ने अपनी पुस्तक ‘गुरुदत्त: तीन अंकी शोकान्तिका’ में गहन, गंभीर चर्चा कर सिने-संस्कृति को प्रस्थापित करने का प्रयास किया है. उन्होंने यह प्रयास महज़ पुस्तकें पढ़कर और किनारे पर खड़े रहकर नहीं किया है, बल्कि अपने आपको पूरी तरह झोंककर, डूबकर और सिने-संस्कृति के अतल में उतरकर यह संपूर्ण विचार प्रस्तुत किया है. सिनेमा से अरुण के रिश्ते को अब साठ साल पूरे होने को हैं. लेकिन अरुण को जितनी सिनेमा में रुचि है उतनी ही, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा ही रुचि साहित्य में है. इसीलिए तो उनकी लिखी सभी पुस्तकों को बहुत सराहना मिलती रही है. उनकी हाल की पुस्तकों के देशी-विदेशी अनुवादों की भी बड़ी चर्चा हुई है. यह तय कर पाना मुश्किल है कि अरुण बेहतर लेखक हैं या सिनेमा के बेहतर निर्माता-निर्देशक.
मुंबई के बालमोहन विद्यामंदिर से अरुण ने स्कूली शिक्षा पूरी की. मज़े की बात यह है कि उनके साथ एक ही बेंच पर बैठनेवाले उनके सहपाठी थे अमोल पालेकर. बाद में अरुण ने मुंबई विश्वविद्यालय से बीएस. सी. किया. प्रमुख विषय था गणित (ऑनर्स) और गौण विषय भौतिकी. अरुण एमएस. सी करना चाहते थे, लेकिन परीक्षा में बैठे ही नहीं. तीन-चार साल यूँ ही गुज़र गए. इस दौरान उन्होंने ख़ूब साहित्य पढ़ा. संजोग से इसी दौरान कला क्षेत्र की कई विद्वान हस्तियों से बहुत क़रीबी संबंध बने. पं. बिरजू महाराज के चाचाजी पं. लच्छू महाराज अरुण के साथ काफ़ी देर तक बातचीत किया करते थे. संगीत क्षेत्र के मेधावी, प्रतिभाशाली गुरु पं. शरच्चंद्र आरोलकर से बातों के सिलसिले ने अरुण को संगीत के कई पहलुओं की बारीक़ियों से अवगत कराते हुए संगीत-संपन्न बना दिया.
कथकली नृत्य के विश्वविख्यात विद्वान के. भरत अय्यर ने तो सहेजकर रखे हुए आनंद कुमारस्वामी के अमूल्य और दुष्प्राप्य ग्रंथ अरुण को सौंप दिए. उस दौर में जे. जे. स्कूल में पढ़नेवाले, पढ़ानेवाले और जे. जे. में जो कभी भी नहीं पढ़े थे वे कई चित्रकार उनके क़रीबी दोस्त बन गए. वामपंथी विचारधारा रखनेवाले कई दोस्त तो थे ही. सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह हुई कि इसी दौरान वे अरुण कोलटकर और अशोक शहाणे के संपर्क में आए और लघु-पत्रिकाओं के आंदोलन से जुड़ गए. कॉ. तारा रेड्डी और दूसरे मार्क्सवादी मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने ‘भारूड’ नामक एक लघु-पत्रिका का संपादन भी किया. संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष रूप से सिनेमा के क्षेत्र में क़दम रखने के पहले ही सिने-संस्कृति के अधिकतर पहलुओं से वे परिचित हो चुके थे.
इसके बाद एक बहुत ही साधारण-सी घटना से अरुण के जीवन में एक नया मोड़ आया. मणि कौल मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर आधारित फ़िल्म बनाना चाहते थे, जिसके लिए वे एक नए चेहरे की खोज में थे. मणि ने सत्यदेव दुबे के पास बात छेड़ी. सत्यदेव दुबे ने सीधे अरुण से पूछ लिया, “सिनेमा में काम करोगे?”
अरुण के हाँ कहने पर उन्होंने उन्हें मणि के पास भेज दिया. मणि को अरुण का चेहरा सिनेजेनिक मालूम हुआ और कॉन्ट्रैक्ट होते ही अरुण काम में जुट गए. शूटिंग हुई. ‘आषाढ़ का एक दिन’ पूरी हुई, तो सवाल उठा कि अब आगे क्या करें. मणि ने अरुण को पुणे की फिल्म इन्स्टिट्यूट में दाख़िला लेने की सलाह दी. इन्स्टिट्यूट में प्रवेश के लिए इंटरव्यू के दौरान अरुण ने अभिनय के एवज में निर्देशन को तरजीह दी. प्रवेश पाने पर काफ़ी मेहनत की, ख़ूब फ़िल्में देखीं. बारीक़ी से उनका अध्ययन किया और गोल्ड मेडल के साथ पाठ्यक्रम पूरा किया.
1971 में अरुण ने फ़िल्म इन्स्टिट्यूट में प्रवेश लिया था. वे इन्स्टिट्यूट के सुनहरे दिन थे. वहाँ न सिर्फ़ देश भर के, बल्कि विदेशों से आए हुए सहपाठियों से दोस्ताना हुआ. इन्स्टिट्यूट के उन दिनों को लेकर अरुण ने काफ़ी विस्तारपूर्वक लिखा है. यहाँ पर उन्होंने सिनेमा की कई छोटी-छोटी बारीक़ियों को सीख लिया. सिनेमा पर बहुत सारी पुस्तकें पढ़ीं, विश्व भर की बेहतरीन फ़िल्में देखीं. दोस्तों के साथ ख़ूब चर्चाएँ कीं और भविष्य की नींव रखी. कोर्स के आख़री वर्ष में उन्हें एक लघु फ़िल्म बनानी थी. इस लघु फ़िल्म में पहली बार स्मिता पाटील को केंद्रवर्ती भूमिका सौंपकर अरुण उन्हें सिनेमा के विशाल विश्व में ले आए. लघु फ़िल्म का नाम था ‘तीव्र मध्यम’. अरुण के फ़िल्म गुरु और आदर्श थे ऋत्विक घटक. उनकी बहुचर्चित फिल्म ‘कोमल गंधार’ की तर्ज़ पर ही अरुण ने अपनी लघु फिल्म का नाम ‘तीव्र मध्यम’ रखा था. अरुण ने ऋत्विक घटक के गुरु सर्गेइ आइज़ेन्स्टीन पर इतना कुछ लिखा है कि आज वे आइज़ेन्स्टीन के विश्व स्तरीय जानकार के रूप में जाने जाते हैं.
पुणे में बिताए दिन आर्थिक दृष्टि से बहुत ही कष्टदायी थे. कभी किसी से मिलने का मन करे तो जहाँ जा सकता था ऐसे ठिकाने थे बस, तीन. एक भास्कर चंदावरकर, जो पहले इनके अध्यापक रहे और बाद में क़रीबी दोस्त बने. दूसरे सतीशबहादुर और तीसरे विख्यात समीक्षक एवं अंतरराष्ट्रीय भाषा-विशेषज्ञ अशोक केलकर. इन तीनों से बातचीत के ज़रिये भी अरुण ने बहुत कुछ सीखा. आगे चलकर, चंदावरकर की मृत्यु के पश्चात उनके लिखे लेखों के दो संग्रहों- ‘चित्रभास्कर’ और ‘रंगभास्कर’ – का संपादन अरुण ने किया और इन पुस्तकों की बड़ी ही विवेचक प्रस्तावनाएँ भी लिखीं. इन पुस्तकों ने मराठी साहित्य में बहुत अमूल्य योगदान दिया है. वैसे ये पुस्तकें आई हैं क्रमशः 2017 और 2020 में, यानी ये हाल के वाक़ये हैं.
1974 में सफल स्नातक के रूप में फिल्म इन्स्टिट्यूट से बाहर निकलते ही अरुण ने सिनेमा के क्षेत्र में अपना काम शुरू किया. वे फ़िल्मकार, सिनेमा के अध्यापक, फ़िल्म के लेखक और फ़िल्म स्कॉलर के रूप में विख्यात हुए. अब तक उन्होंने 2 फ़ीचर फ़िल्मों और क़रीब 30 लघु फ़िल्मों का लेखन और निर्देशन किया है. और इन सबको देश-विदेश में पुरस्कार और सम्मान मिले हैं. अरुण का बायो-डेटा इतना बड़ा है कि उसकी एक छोटी-सी पुस्तक ही बन सकती है.
अरुण ने अपनी पहली फ़ीचर फ़िल्म ‘कथा दोन गणपतरावांची’ बनाई 1996-97 में. यह प्रसिद्ध रूसी कहानीकार निकोलाइ गोगोल की एक कहानी पर आधारित थी. इसमें मोहन आगाशे और दिलीप प्रभावलकर जैसे नामी-गिरामी अभिनेताओं ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाई थीं. इसके बाद अरुण ने बच्चों के लिए फ़ीचर फ़िल्म बनाई- ‘हाथी का अँडा’, जो बच्चों को बेहद पसंद आई. इस फ़िल्म में विश्वविख्यात तालवादक तौफ़िक कुरैशी ने एक भूमिका निभाई थी.
अरुण का बड़प्पन इसमें भी है कि संस्कृति को अपना अमूल्य योगदान देनेवाले कलाकारों पर उन्होंने लघु फ़िल्में बनाई हैं. मसलन, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पर ‘रसिकप्रिया’, अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वास्तुविशारद चार्ल्स कोरिया पर बनाई फ़िल्म, विश्वविख्यात भरतनाट्यम् नृत्यांगना अलारमेल वल्ली और उनके भरतनाट्यम् नृत्य पर बनाई लघु फ़िल्म ‘प्रवाही’, शांतिनिकेतन पर बनाई फ़िल्म, हिंदी फ़िल्म संगीत पर बनाई फ़िल्म ‘लोकप्रिया’, आधुनिक चित्रकला पर बनाई ‘नेहरू, गांधी आणि आर्ट’ (नेहरू, गांधी और आर्ट), प्रसिद्ध चित्रकार जहाँगीर सबावाला पर बनाई फ़िल्म, तीन चित्रकारों -भूपेन खक्कर, विवान सुंदरम् और नलिनी मालानी – की कला पर बनाई फ़िल्म. इसके अलावा उन्होंने सामाजिक, शिक्षासंबंधी और स्वास्थ्यसंबंधी लघु फ़िल्में भी बनाई हैं.
फ़िल्म देखने और पुस्तक पढ़ने के परिणाम बहुत ही अलग अलग होते हैं. भारतीय फ़िल्में अक्सर आम दर्शक को भावनाओं के भँवर में या अद्भुत दुनिया के चक्कर में उलझाकर रख देती हैं. इन फ़िल्मों के गाने भी यादों को जगाकर भावुक बना देते हैं. विकास की यात्रा में मानव धीरे धीरे भावनाशीलता से तर्कबुद्धिवाद की तरफ़ बढ़ने लगा. कुछएक अपवाद छोड़ दें तो भारतीय भाषाओं की फ़िल्मों में अधिकतर सस्ती भावुकतावाले फ़ार्मूले ही पाए जाते हैं. सिनेमा को सैद्धांतिक आधारशिला दिला देने के लिए अरुण ने सिनेमा के सभी पहलुओं पर गहरे सोच-विचार के बाद किया गंभीर लेखन बहुत ही विशेष है. निशिकांत ठकार, गोरख थोरात और रेखा देशपांडे ने अरुण की पुस्तकों के किए हिंदी अनुवाद भी बहुत पाठकप्रिय हो चले हैं. ‘गुरुदत्त : तीन अंकी शोकान्तिका’ के बाँगला अनुवाद का तो तीसरा संस्करण आ चुका है. मल्यालम् और गुजराती संस्करणों का भी बहुत अच्छा स्वागत हुआ है.
अरुण की अब तक की लिखी पुस्तकें क्रमशः इसप्रकार हैं : 1) गुरुदत्त : तीन अंकी शोकान्तिका (1986), 2) चित्रव्यूह (2012), 3) चलत् चित्रव्यूह (2012), 4) अनुनाद (2020), 5) कालकल्लोल (2021), 6) प्राक्-सिनेमा (2024). इनमें से कुछ एक पुस्तकों के दूसरे-तीसरे संस्करण भी छप चुके हैं. इनके अलावा उनकी और दो पुस्तकें जल्द ही प्रकाशित होने जा रही हैं.
सिनेमा लोकरंजन का सबसे बड़ा माध्यम है. इसलिए इसपर बहुत लिखा जाता है. यह लेखन अक्सर चलताऊ क़िस्म का, महज़ समाचारपत्रीय होता है, इसमें गंभीरता का अभाव ही पाया जाता है और अक्सर वह सिर्फ़ ‘स्टोरी’ बयान करनेवाला होता है या फिर अभिनय को लेकर कुछ उथली, सतही टिप्पणियाँ भर होती हैं. सिनेमा पर अरुण के लेखन में इस तरह की कोई सामग्री नहीं मिलती. सिनेमा के उद्गम से आज तक उसका तकनीकी विकास किस तरह होता गया, इसमें किस किस का योगदान रहा, सिनेमा में प्रयुक्त हर तकनीक के पीछे कैसा चिंतन, कैसी सैद्धान्तिक सोच होती है इसकी चर्चा वे करते हैं, सिनेमा की अलग अलग उपविधाओं को लेकर मौलिक विचार प्रकट करते हैं. ऐसे अध्ययन के लिए ज़रूरी विद्वत्ता और परिश्रम अरुण के जीवन के अभिन्न अंग हैं. और इसका सबूत हमें उनके हर छोटे-मोटे लेख में मिलता रहता है.
संदर्भों के लिए वे केवल अँग्रेज़ी का सहारा नहीं लेते, बल्कि वे फ्रेंच, जर्मन, रूसी, स्पैनिश, उर्दू, बाँगला, हिंदी, अंग्रेज़ी आदि कई भाषाओं के जानकार हैं. वे इन भाषाओं में पढ़-लिख लेते हैं. तभी तो मोंताज, मिज़-आँ-सेन जैसी अवधारणाओं को वे आसान भाषा में समझा पाते हैं. उनकी भाषा-शैली प्रसन्नता पैदा करनेवाली है और वह अलंकारमंडित नहीं है. इसकी वजह शायद यह हो सकती है कि वे काफ़ी समय से फ़िल्म इन्स्टिट्यूट में विजिटिंग प्रोफ़ेसर की हैसियत से पढ़ाते आ रहे हैं और अपने सिनेमा-पर्व से पहले लघु-पत्रिकाओं के आंदोलन से जुड़े रहे थे.
एक और बात है : आप किसी विदेशी भाषा से कोई अवधारणा अपनी मातृभाषा में ले आने की कोशिश में हों, लेकिन अगर आप ख़ुद उस अवधारणा को ही सही ढंग से हज़म नहीं कर पाए हों तो उसे समझाते समय आपकी अपनी भाषा बहुत जटिल, और अक्सर दुरूह बनकर रह जाती है. इसका मतलब यह है कि अगर आप किसी अवधारणा को आसान-सी भाषा में प्रकट करना चाहते हैं तो उसके लिए पहले उस अवधारणा को ख़ुद अच्छी तरह से हज़म करना पड़ता है. विदेशी भाषा की उस अवधारणा का आत्मसातीकरण होना ज़रूरी होता है. अरुण के लेखन में यही आत्मसातीकरण पाया जाता है.
अगर अपनी भाषा को समृद्ध बनाना है तो उसमें ज्ञानवृद्धि हो यह ज़रूरी होता है. पिछले 60 साल से अरुण यह काम बड़े मनोयोग से, समर्पण भाव से करते आ रहे हैं. यह काम उनसे और भी अधिक जोश के साथ होता रहे, बहुत सारा होता रहे, इसके लिए उन्हें लंबी आयु नसीब हो, यही शुभकामना इस अवसर पर.
(मराठी से हिंदी अनुवाद रेखा देशपांडे)

साहित्य जीवन गौरव पुरस्कार का स्वीकार करते हुए.
अरुण खोपकर
प्रमुख अतिथि श्री गणेश देवी, महाराष्ट्र फ़ाऊंडेशन (अमेरिका), मासूम संस्था और साधना ट्रस्ट के सभी पदाधिकारी, साहित्य और समाजकार्य पुरस्कार चयन समिति के समन्वयक एवं सदस्य, मंच पर उपस्थित ज्येष्ठ व्यक्ति, सभी पुरस्कार विजेता और उपस्थित सज्जन. सुनील देशमुख महाराष्ट्र फ़ाऊंडेशन पुरस्कार 2025 के अंतर्गत दिलीप वि. चित्रे साहित्य जीवन गौरव पुरस्कार मुझे दिया गया है, इसके लिए मैं सभी संबंधित व्यक्तियों के प्रति मनःपूर्वक आभार प्रकट करता हूँ. महाराष्ट्र फ़ाऊंडेशन की स्थापना कर उसके कार्य को कई साल तक चलाते रहनेवाले सुनील देशमुख, दिलीप वि. चित्रे और अन्य स्वर्गीय व्यक्तियों का स्मरण करता हूँ.
यह पुरस्कार हालाँकि साहित्य में दिए गए योगदान के लिए है, लेकिन न मेरा व्यवसाय साहित्य का है और न ही मेरी फ़ितरत साहित्यकार की है. पहले मैं फ़िल्म निर्देशक हूँ. अचानक साहित्य के सागर में आन पड़ा और थोड़ी बहुत तैराकी करने लगा. आनंद आ रहा है, इसलिए तैराकी अभी भी जारी है.
मेरी फ़ितरत साहित्यकार की नहीं है, इसका यह मतलब नहीं कि मुझे साहित्य में रुचि नहीं थी. शिवाजी पार्क स्थित मेरे बालमोहन विद्यामंदिर में मराठी पढ़ाने के लिए बखर साहित्य विधा के विद्वान इतिहासकार डॉ. र. वि. हेरवाड़कर, प्रा. गंगाधर पाटील जैसे कई बेहतरीन अध्यापक थे. उन्होंने स्कूल के दिनों में ही पाठ्यक्रम की सीमाओं को लाँघकर श्रेष्ठ मराठी साहित्य से परिचय करा दिया था. शं. वि. सोहोनी हमारे अँग्रेज़ी के अध्यापक थे. उन्होंने ‘अ न्यू डिक्शनरी ऑफ लिविंग इंग्लिश’ नामक बेहतरीन अँग्रेज़ी-मराठी कोश का निर्माण किया. अँग्रेज़ी भाषा में उन्होंने अँग्रेज़ी बोली की जान फूँक दी. वे ही आगे चलकर हमें साहित्य की प्रयोगशाला में ले गए.
साहित्य की प्रयोगशाला में ले गए.– इसका क्या मतलब हुआ? सोहोनी सर कोई अच्छा-सा सामयिक अँग्रेज़ी निबंध, लेख या कहानी बेहतरीन उच्चारणसहित पढ़ सुनाया करते थे. फिर उसे लेकर सवाल किया करते थे. ‘क्या लिखा है’ की अपेक्षा ‘किस तरह लिखा है’,’ जिस तरह लिखा गया है उसी तरह क्यों लिखा गया है’ जैसे सवालों पर ध्यान दिया जाता था.
ख़ुद सोहोनी सर अँग्रेज़ी की सादा, सटीक, मगर बोलती हुई सामग्री का चयन किया करते थे और पढ़ते समय इस तरह पढ़ते थे मानो सामने खड़े व्यक्ति से बातचीत कर रहे हों. उन्होंने कभी शब्द या मुहावरे ज़बानी याद करने के लिए नहीं कहा. न कभी कहावतों को दोहराते रहने के लिए कहा. सच बात तो यह है कि उन्होंने कभी कोई पाठ पढ़ाया ही नहीं. मगर बोलचाल की, साफ़सुथरी अँग्रेज़ी ज़रूर सिखाई.
मैंने पुणे की फ़िल्म इन्स्टिट्यूट में दाख़िला लिया तब वहाँ पहले साल सतीश बहादुर और भास्कर चंदावरकर हमारे अध्यापक हुआ करते थे. इन दोनों की अध्यापन शैली में और सोहोनी सर की शैली में बहुत-सी समानताएँ थीं.
सतीश बहादुर सर ने सिने-बिंबों के अंदर छुपे रचना-तत्त्वों का अहसास जगाया. भास्कर जल्द ही मेरे क़रीबी दोस्त बन गए. उन्होंने अलग अलग संगीतकारों, उनकी संगीत-शैलियों और उनकी विशेषताओं से परिचित कराया. आम तौर पर जिसे नज़रअंदाज़ ही किया जाता है उस पार्श्वसंगीत और उसके बला के प्रभाव की ओर ध्यान खींचा. दोनों की कोशिश ख़ुद अपने वक्तव्य करने की नहीं होती थी बल्कि ऐसा वातावरण पैदा करने की होती थी, जिसमें छात्र ख़ुद अनुभव कर सकें.
ऋत्विक घटक, मणि कौल और कुमार शहानी बेहतरीन अध्यापक थे और ख़ुद महान कलाकार थे. ऋत्विकदा तो दुनिया के श्रेष्ठ निर्देशकों में एक माने जाते हैं. वे जितने महान निर्देशक थे उतने ही प्रतिभावान गुरु भी थे.
ऋत्विकदा की क्लास शराबख़ाने में चला करती थी. वहाँ पर वे अपनी मंत्रशक्ति के बल पर वाल्मीकि से लेकर स्त्राविन्स्की तक किसी भी हस्ती को प्रकट होने के लिए आमंत्रित किया करते थे. उनके आमंत्रण का मान हमेशा रखा जाता था. निमंत्रित व्यक्ति ऋत्विकदा के माध्यम से हमसे संवाद किया करता था. इन गुरुओं से जो ज्ञान मिला वह महज़ तकनीकी का ज्ञान न था. वह जीवन-पद्धति थी. सभी कलाओं के हृदय में उतर जाने का वह कौशल था.
मैंने साठ की दहाई के पश्चात चले लघु-पत्रिकाओं के आंदोलन के माहौल से निकल सिनेमा का रुख़ किया था. इससे कम उम्र में ही साहित्य काफ़ी मात्रा में पढ़ चुका था. लेकिन कभी ख़ुद से ये सवाल नहीं किए थे कि चित्र कैसे पढ़ा जाए, ख़याल की बंदिश कैसे खुलती चली जाती है, सिंफ़नी के भाग कैसे पहचाने जाते हैं, प्रकाश-संयोजन का भावनात्मक परिणाम किस तरह होता चला जाता है, आदि. इस त्रुटि के चलते मैंने तय कर लिया कि सिनेमा के प्रशिक्षण के दौरान एक भी कथात्मक किताब नहीं पढ़ूँगा और दूसरी कलाओं से परिचय करा लूँगा.
मैं घंटों लाइब्रेरी में बैठकर दुनिया के श्रेष्ठ चित्रकारों और चित्र-शैलियों की पुस्तकें ध्यान से देखने लगा. चित्रकार मित्रों के स्टुडिओ में जाकर उनसे सीखने लगा कि चित्र किसतरह देखा जाता है. कथक गुरु पं. लच्छू महाराज की सेवा करते रहने के दौरान मैं नृत्य के मूल-तत्त्वों के पाठ पढ़ सका. पं. शरच्चंद्र आरोलकर ने मुझे ख़याल संगीत को समझने का तरीक़ा सिखा दिया. वे जब समझाते थे तब उनसे लोरी से लेकर टप्पे तक संगीत के सभी नमूने सुनने को मिल जाते थे.
श्री के. भरत अय्यर विश्वविख्यात कलाविद् आनंद कुमारस्वामी के अंतरंग मित्र और उनके गौरव-ग्रंथ के संपादक थे. सादी, सूती पोशाक़ पहनने वाले इस ऋषि-मुनियों के-से व्यक्तित्व के साथ कथकली, भरतनाट्यम्, कुडियात्तम आदि नृत्य-शैलियों के कार्यक्रम देखते रहने से दक्षिणी नृत्य-शैलियों से प्रथम परिचय हुआ.
ज्येष्ठ स्थपति चार्ल्स कोरिया पर फ़िल्म करने में चार साल लग गए. इस दौरान स्थापत्य-कला विधा के श्रेष्ठ नमूनों से परिचय हुआ. संस्कृतियों के मिश्रण और संगम से किस तरह महान कलाकृतियाँ पैदा होती हैं यह मैं समझने लगा.
कलाकारों के पास सीखते समय मुझे हर वक़्त सजग रहना पड़ता है. क्योंकि अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त उनकी रोज़मर्रा की बोलचाल की भाषा होती है. एक बार मींड का महत्त्व समझाते हुए पं. आरोलकर जी बोले, “संपूर्ण भारतीय कला में दो बिंदुओं के बीच कम से कम फ़ासला तय करने वाली रेखा सीधी रेखा नहीं होती, बल्कि वक्र रेखा होती है”. ख़याल, भारतीय शिल्प, सूक्ष्मचित्र, स्थापत्य और नृत्य कलाओं पर कारगर होनेवाला यह प्रभावी सिद्धान्त किसी भी दार्शनिक के ग्रंथ में नहीं मिलेगा.
महान कलाकारों और कलाकृतियों के क़रीब रहकर एक बात मैं भली भाँति समझ गया कि कलाओं के बीच कोई दीवारें नहीं होतीं. उनकी अंतर्त्वचा में एक कला का रस दूसरी कला तक आसानी से पहुँचानेवाली ऐसी परतें होती हैं जो अस्थायी रूप से उन्हें अलग किए रहती हैं. हर कला का श्रेष्ठ अनुभव अंततः काव्यात्मक ही हुआ करता है.
त्रिदंडी संन्यास के बाद जब फिर साहित्य में प्रविष्ट हुआ तब तक साहित्य की ओर देखने की मेरी नज़र ही बदल गई थी. कभी साहित्य में प्रकाश-संयोजन दिखाई देता, तो कभी रंग-रचना दिखाई देती. कभी आकार, तो कभी चलन के प्रकार. तब फिर साहित्य के दृश्य ग्रहण करनेवाली मानसिक लेन्सेज़ का अहसास होने लगा. विषयवस्तु का बेजा महत्व एकाएक कम हो गया. विधा के रूप से कथ्य तक पहुँचने की प्रक्रिया आत्मसात होने लगी. कलाकृति का विषय तो दिया जाता है, मगर कथ्य नहीं बताया जाता. हर रसिक को अपनी राहें, अपनी पगडंडियाँ बनाकर उस तक पहुँचना पड़ता है. और वह कथ्य सबको एक समान हासिल नहीं होता, यह अहसास भी पुख़्ता होता चला गया.
बचपन से मुझे अलग अलग भाषाओं से प्यार था. तीन-चार साल का था तब मैं पानवाले भास्कर की दुकान में उसकी गोद में बैठ बड़े शौक़ से उर्दू के हरूफ़ घोटता रहता था. युवावस्था में हर बार कोई नई भाषा सीखते समय मैं फिर बच्चा बन जाता था.
हम जब कोई नई भाषा सीखना शुरू करते हैं तो पहले अपनी सभी ज्ञानेंद्रियों का अनुवाद उस भाषा में करना पड़ता है. तभी ज़बान सही ढंग से चलती है, कान सही ढंग से समझने लगते हैं, रंग हमारे साथी बन जाते हैं, चमड़ी अलग ढंग से थर्ऱाने लगती है. मन शब्दों की अलग लय पकड़ लेता है. जिन क्रियाओं, विशेषणों, काल, विभक्ति और अन्य पहलुओं को एक भाषा में हम ‘नींव के पत्थर’ मानकर चलते हैं वे भी कितने भाषा सापेक्ष होते हैं इसका पता चलता है. वे सब भाषा के उस पार चिरंतन की ओर इशारे करने लगते हैं.
आप जितनी अधिक भाषाएँ सीखेंगे, आपकी अपनी मातृभाषा उतनी ही समृद्ध होती जाएगी. एक बार जर्मन महाकवि ग्योअट ने कहा था कि जो व्यक्ति मातृभाषा के अलावा कोई भी दूसरी भाषा नहीं जानता वह, बहुत संभव है कि अपनी मातृभाषा भी ठीक से नहीं जानता हो.
जो भाषा की है वही बात संस्कृति की है. जितनी विविध संस्कृतियों की आपकी समझ विकास को प्राप्त होती जाती है उतनी ही आपकी अपनी संस्कृति की आपकी समझ गहरी होती जाती है. तब आप उसे बड़े प्यार से इसतरह जानने लगते हैं जैसे माँ की देह को जानते हैं. उसकी सुरूपता और कुरूपता दोनों को आप समझने लगते हैं. अनाड़ी गर्व बह जाता है और बचा रहता है केवल प्रेम. साहित्य हो, कला हो, शास्त्र हो या महज़ किसी भी क्षेत्र का सृजन हो, हर किसीकी जड़ में अपने विकास को आप तय करने की स्वतंत्रता की दरकार होती है. तैयार नमूने से अभिजात निर्माण नहीं होता. उसे अपनी ज़मीन ख़ुद ढूँढ़नी पड़ती है. अपनी तबीयत के मुताबिक पौष्टिक खाद्य ढूँढ़ना पड़ता है. और सबसे अहम बात यह कि विशाल आकाश में अनिर्बंध विस्तार की अदम्य इच्छा की ज़रूरत होती है.
आदेश देने से निर्माण नहीं होता. आदेश देने से स्व-देश का निर्माण भी नहीं होता. क्यों कि स्व-देश की बुनियाद में स्व-त्त्व की समझ रखनेवाले और औरों का स्वीकार करनेवाले ‘स्व’ का होना ज़रूरी होता है. आदेशों का पालन करनेवाली मानवदेहधारी मशीनों का काम नहीं है यह.
और जाते जाते एक सवाल मैं आपके सामने रखना चाहूँगा जो मुझे कई सालों से सताता आ रहा है. महाराष्ट्र में किसी विद्वान या साहित्यकार का ज़िक्र हमेशा इस बात के साथ किया जाता है कि वह कितना पढ़ता रहा है. उसकी पढ़ी हुई पुस्तकों की संख्या जितनी अधिक उतना ही वह बड़ा विद्वान माना जाता है. लेकिन कभी यह नहीं पूछा जाता कि उसने कितने चित्र देखे हैं, कितने नाटक, कितने ऑपेरा देखे हैं, कितनी भाषाओं या कलाओं की समझ वह रखता है, कितनी संगीत-शैलियों और नृत्य-शैलियों की समझ रखता है, वह कितनी संस्कृतियों से अपनापा महसूस करता है, उसने दुनिया कितनी देखी है, कितनी पाक-संस्कृतियों का अनुभव उसने किया है, शिल्प और स्थापत्य को वह कहाँ तक समझता है और इनमें से किसी से भी प्रेम करने की कितनी क्षमता उसमें है. जब यह सवाल अपने आप उठने लगेगा तब इस संस्कृति में कुछ हद तक उचित बदलाव आएँगे.
अब मैं कलाकारों के प्रियजनों को लेकर कुछ कहना चाहूँगा. बेहतरीन गायक अपने सामने बेहतरीन श्रोता चाहता है तो क्यों? इस श्रोता के कानों में सैकड़ों महफ़िलों और गायकों की स्मृतियाँ बसी होती हैं. जब वह कोई बंदिश सुनता है तब वह समझ जाता है कि रटी हुई चीज़ कौन-सी है और सहजस्फूर्ति से प्रस्फुटित सुर कौन-सा है और तभी वह दाद देता है.
सहृदय पाठक का कोई चेहरा नहीं होता, कोई धर्म नहीं होता, कोई जात नहीं होती, वह न स्त्री होता है न पुरुष. लेकिन उसकी साहित्य-स्मृति ज़बरदस्त होती है. सदियों पहले के वचन उसे याद होते हैं. जब आपके लेखन में ऐसे किसी वचन की सहज प्रतिध्वनि सुनाई देती है तब वह दाद देता है. जब नक़ल सुनाई देती है तब वह धिक्कार करता है. जब कागज़ पर कोई झूठा शब्द उतर आने लगता है तब उस शब्द के पूरा होने से पहले ही वह उठकर उस लेखन-कक्ष से बाहर चला जाता है. जब आपके शब्द सूरजमुखी की भाँति सहजता से भविष्य-सूर्य का रुख़ करते हैं तब उस पाठक को स्वर्गप्राप्ति का-सा आनंद आता है.
कोई भी जन्म-पत्री बनाकर नहीं बता सकता कि ऐसा पाठक कहाँ पैदा होता है . ऐसे पाठक का एक ही धर्म होता है. प्रतिभावान पाठक का धर्म. वह अपने स्व-धर्म से कभी विचलित नहीं होता. यह धर्म ध्रुव तारे-सा अडिग, अटल नहीं होता. साहित्यगंगा बहती ही रहती है और वह उसका अग्रदूत होता है. आज मुझे जो जीवन गौरव पुरस्कार मिला है वह ऐसे पाठक को भी मिलना चाहिए, लेकिन उसे ढूँढ़ें को कैसे और कहाँ? हो सकता है वह आज यहाँ उपस्थित भी होगा और मंद मंद मुस्करा रहा होगा.
(मराठी से हिंदी अनुवाद रेखा देशपांडे)
| अरुण खोपकर 1945 मणि कौल निर्देशित ‘आषाढ़ का एक दिन’ में कालिदास की प्रमुख भूमिका. सिने निर्देशक, सिने विद् और सिने अध्यापक. फिल्म निर्माण और निर्देशन के लिए तीन बार सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कारों के सहित पंद्रह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. होमी भाभा फेलोशिप से सन्मानित.‘गुरू दत्त : तीन अंकी शोकांतिका’ को सिनेमा पर सर्वोत्कृष्ट पुस्तक का राष्ट्रीय ॲवॉर्ड और किताब अंग्रेजी, फ्रेंच, इटालिअन, बांगला, कन्नड, गुजराती और मलयाळम और हिंदी मे भाषांतरित. ‘चलत् चित्रव्यूह’ के लिए साहित्य अकादेमी ॲवार्ड व महाराष्ट्र फाउंडेशन (यू. एस. ए.) ॲवार्ड, ‘अनुनाद’ और ‘प्राक् सिनेमा’ के लिए लिए महाराष्ट्र राज्य पुरस्कार. अंतरराष्ट्रीय चर्चा सत्रों में सहभाग और प्रबंधों का अंग्रेजी, रशियन और इटालियन में प्रकाशन. सत्यजित राय जीवनगौरव पुरस्कार व पद्मपाणी जीवनगौरव पुरस्कार. चार भारतीय और छह यूरोपीय भाषाओं का अध्ययन. महाराष्ट्र सरकार द्वारा सम्मानित ‘प्राक्-सिनेमा’ सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है. |
चन्द्रकान्त पाटील 18 अक्टूबर 1943, अम्बेजोगाई (महाराष्ट्र) शिक्षा : एम.एससी. (वनस्पतिविज्ञान); पी-एच.डी. (जीवरसायन विज्ञान). लगभग 40 बरसों तक महाविद्यालयीन अध्यापन. कवि, आलोचक, अनुवादक, सम्पादक, स्तम्भलेखक, प्रायोगिक प्रकाशक. मराठी तथा हिन्दी में समान रूप से लेखन. अब तक लगभग 58 पुस्तकें प्रकाशित. मराठी में चार तथा हिन्दी में एक कविता संकलन प्रकाशित, ‘तमस’ उपन्यास के अनुवाद के लिए साहित्य अकादेमी का अनुवाद पुरस्कार (1991), कई राष्ट्रीय तथा राज्यस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित . कई राष्ट्रीय पुरस्कारों की चयन समिति के सदस्य. औरंगाबाद (महाराष्ट्र) के बाद इन दिनों पुणे में निवास.
ईमेल : patilcn43@gmail.com |




अरुण खोपकर साहब और पाटिल साहब दोनों को दिली मुबारकबाद और नेक ख्वाहिशात।
एक सवाल मैं आपके सामने रखना चाहूँगा जो मुझे कई सालों से सताता आ रहा है. महाराष्ट्र में किसी विद्वान या साहित्यकार का ज़िक्र हमेशा इस बात के साथ किया जाता है कि वह कितना पढ़ता रहा है. उसकी पढ़ी हुई पुस्तकों की संख्या जितनी अधिक उतना ही वह बड़ा विद्वान माना जाता है. लेकिन कभी यह नहीं पूछा जाता कि उसने कितने चित्र देखे हैं, कितने नाटक, कितने ऑपेरा देखे हैं, कितनी भाषाओं या कलाओं की समझ वह रखता है, कितनी संगीत-शैलियों और नृत्य-शैलियों की समझ रखता है, वह कितनी संस्कृतियों से अपनापा महसूस करता है, उसने दुनिया कितनी देखी है, कितनी पाक-संस्कृतियों का अनुभव उसने किया है, शिल्प और स्थापत्य को वह कहाँ तक समझता है और इनमें से किसी से भी प्रेम करने की कितनी क्षमता उसमें है. जब यह सवाल अपने आप उठने लगेगा तब इस संस्कृति में कुछ हद तक उचित बदलाव आएँगे……शानदार कथन और संयोजन। … शुक्रिया