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आशा, अप्रैल और एक अविस्मरणीय अनुपस्थिति |
“अप्रिल इंज़ दॅ क्रुअलेस्ट मंथ……”
टीएस एलियट, दॅ वेस्ट लैंड
अप्रैल सचमुच सबसे क्रूर महीना हो सकता है. कम-से-कम समय की उन फांकों में, जब पेड़ों पर नई पत्तियाँ लौट रही होती हैं, वसंत के सुनहले सुवासित व्याकरण की कोंपलें नए सिरे से खिलने लगती हैं. पेड़ों से पृथ्वी तक पापों, दुःखों और ग़लतियों में डूबी थकी-हारी दुनिया किसी ऐसी आवाज़ में ही आशा की लहर देखती है, जो उसकी आंतरिक उदासियों में घुल जाती हो. धरती पर ज़ुल्म होते रहते हैं; लेकिन हम गीतों के माध्यम से अपने ज़ख़्मों पर सुकून देने वाली आवाज़ों के फाहे रखते हैं. और तभी हम देखते हैं कि समय हमारे जीवन की सबसे सुदीर्घ, सबसे उजली और सबसे शोख़ आवाज़ों में से किसी एक को हमसे छीन लेता है.
12 अप्रैल 2026 को 92 वर्षीय आशा भोसले मुंबई में पूरी दुनिया के सामने किसी मुसकुराती सुकुमार बालिका की तरह सम्मोहक ढंग से मौजूद थीं. और फिर उसी दिन किसी एक लम्हे में वे अचानक हमारी स्मृतियों का शिल्प हो गईं.
भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बहुरंगी, सबसे चपल और सबसे रूपांतरशील आवाज़ों में से एक अचानक इतिहास के उस शांत कक्ष में चली गई, जहाँ से कलाकार लौटते नहीं, केवल हमारे भीतर गूँजते रहते हैं. आशा भोसले का जाना एक महान् गायिका का निधन नहीं है; यह उस पूरे युग का धीरे-धीरे बुझना है, जिसमें आवाज़ सिर्फ़ स्वर नहीं थीं, व्यक्तित्व थी, चाल थी, नाज़ और नखरे थी, राग और विराग थी, देह की झिलमिल थी और रूहों में घुली ख़ामोशियों का उफ़ुक़ तक उठता बेकल ग़ुबार थी.
आशा भोसले ने हिन्दी फिल्म-संगीत को केवल गीत नहीं दिए, उसकी देह को दूसरी त्वचा दी. कभी मोहक कैबरे-शैली की दमकती रात, कभी शास्त्रीय तहज़ीब की मद्धिम आँच, कभी पाश्चात्य लय कोमल तरल तना हुआ एहसास, कभी विरह की धीमी, बुझी और जीवन के
जलते-सुलगते यथार्थ की तपिश. जीवन से स्मृति हो जाने के तत्काल बाद अब उनके गीतों को सुनना केवल रस-आस्वादन नहीं रह जाता; वह एक रूहानी और सांस्कृतिक शोकसभा में बैठना भी है, जहाँ हर धुन और हर ध्वनि के पीछे एक शताब्दी की धूल, रोशनी, प्रेम, स्पर्धा, घाव और अमरता बैठी इठला रही हैं. ऐसे समय में आशा को याद करना उनके गीतों की सूची बनाना नहीं, उस असाधारण स्त्री-स्वर में घुले तीव्र उल्लास की यात्रा को पढ़ना है, जिसने अपने ही घर की सबसे विराट छाया के बगल में खड़े होकर भी अपना अलग अतुलनीय आकाश रचा. और शायद अधिक वैविध्यपूर्ण. स्वरों के द्युलोक में एक अलग तरह की आकाशगंगा.
जिस दिन वे गईं, उस दिन वे सीने के सद्य:जात संक्रमण और थकान के कारण अस्पताल में भर्ती थीं. वह संक्रमण हमारे समय के शासकों के फैलाए संक्रमण जैसा अमानुषिक और उनकी लोभ-लिप्साओं से भरी थकान को क्रूर बनाने जैसे खेल वाली थकान भी न थी. वह मनुष्य देह की अलगनी पर टँगे किसी पुराने कोट जैसी चीज़ थी या फिर देह की महकती बुगची के किसी अनचीन्हे कोने में समेटकर रख दी गई एक पुरानी साड़ी की तरह थी. इसीलिए इस महान् गायिका का जीवन से स्मृति हो जाना समाचार नहीं था; यह भारतीय स्मृति के एक अत्यंत चपल, अत्यंत रंगीले और अत्यंत जीवंत हिस्से के अचानक शोक-संताप में बदल जाने वाले लम्हों की शृंखला भी था.
किसी कलाकार के पुनर्गमन के बाद यह कहना आसान होता है कि एक युग समाप्त हुआ. लेकिन आशा भोसले के मामले में यह वाक्य एक पत्रकारीय-क्लिशे नहीं, एक सांस्कृतिक यथार्थ है. उनका स्वर केवल गाया नहीं गया; वह जिया गया, भोगा गया, चखा गया, ठिठकता रहा, झूमता रहा, छेड़ता रहा, सांत्वना देता रहा, लजाता रहा, ठुमकता और हुमकता रहा, टूटता-बिखरता रहा और फिर अपनी ही राख से उठ खड़ा होता रहा.
हिन्दी फिल्म-संगीत के इतिहास में जितनी तरह की स्त्रियाँ, जितने तरह की इच्छाएँ, जितने तरह के विरह, जितनी तरह की अठखेलियाँ और जितने तरह की सघन प्रेमिल रातें संभव थीं, उनमें आशा की आवाज़ ने मानो अलग-अलग रंगों के मोती जड़ दिए थे. वह एक ही समय में देह भी थीं, धुन भी; शरारत भी थीं, शास्त्र भी; चैत की धूप में गूंजती चूड़ियों की खनक भी थीं और आधी रात के बाद किसी अकेले कमरे में टिके आख़िरी सुर की नमी भी. वे किसी युवा स्त्री की बिंदास, बेचैन और अधीर यथार्थ थीं तो निराशाओं, हताशाओं, पराजयों और वर्जनाओं को परे ठेलती चरमानंद की एक सम्मोहक स्टारी नाइट भी थीं. उनकी आवाज़ के भीतर लहराता वह ख़याल था, जिसमें जीवन की आधी रात के बाद फिर कभी पीछे मुड़कर न देखने का वादा था, जिसमें हर पल कीमती होता है, जिसमें प्यार को बचाने की बात होती है, चोट पहुँचाने की नहीं. कभी-कभी ऐसा लगता है, हमने आसमान के एक तारे को टूटते देखा है. क्या वाक़ई यह एक बेहतरीन अलविदा नहीं है? क्योंकि कोई भी उस आवाज़ के बिना नहीं रहना चाहता. सब उस समय को क़ैद कर लेना चाहते हैं. यादों को अपने पास रख लेना चाहते हैं.
उनके जाने पर शोक इसलिए भी गहरा है कि आशा भोसले केवल “बहुमुखी” नहीं थीं; वे बहुरूपा थीं और वह भी ऐसी बहुरूपा, जिनका हर रूप असली लगता था. उनकी आवाज़ गानों में अपनी अलग ही लीला रचती थीं. उन्होंने आठ दशकों के लंबे कॅरियर में 11,000 से अधिक गीत अनेक भाषाओं में रिकॉर्ड किए और 2011 में गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने उन्हें सबसे अधिक रिकॉर्ड किए गए कलाकारों में नक़्श किया. वे हिन्दी, मराठी, बंगाली, गुजराती, तमिल और अनेक अन्य भाषाओं में गाती रहीं. उन्होंने फ़िल्मी रूमानी गीत, ग़ज़ल, नृत्य-गीत, भक्ति, लोक, पॉप और यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर अभियानों तक अपनी आवाज़ को फैलाया. उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, पद्म विभूषण और दो ग्रैमी नामांकन जैसी मान्यताएँ मिलीं.
लेकिन उपलब्धियाँ, पुरस्कार और संख्याएँ आशा भोसले को पूरा नहीं समझातीं. वे केवल यह बताती हैं कि सुरों का यह पर्वत कितना नभस्पर्शी था; यह नहीं बतातीं कि उसकी ढलानों पर कैसी-कैसी रोशनियाँ खेलती थीं और कितने आबशार फूटते थे. आशा की असली विलक्षणता उनकी स्वर-नैतिकता में थी. जी हाँ, स्वर की भी एक नैतिकता होती है. बहुत-से बड़े गायक सुर में सही होते हैं; लेकिन वे भाव, शब्द और संगीत के प्रति आवाज़ की उस ईमानदार मर्यादा का पालन नहीं कर पाते, जिसमें प्रदर्शन से अधिक सत्य का मूल्य होता है. स्वर की नैतिकता वह है, जहाँ आवाज़ प्रभाव के लिए नहीं, सत्य के लिए खुलती है. स्वरों के अस्तित्व का ऐसा स्वाभाविक अंग, जो उनकी सत्ता का नैसर्गिक हिस्सा है. मानो जन्मजात हो.
हम जब आशा भोसले को उनके प्रारंभिक गीतों से सुनना शुरू करते हैं तो उनके स्वाभाविक विस्तार हमें चौंकाते हुए आगे बढ़ते हैं. व्यक्तित्व की एसी सहज बढ़त कहाँ दिख पाती है? कंठ के भीतर की सत्ता का ऐसा स्वाभाविक प्रसार हम कहाँ महसूस करते हैं? यह अभिनीत नहीं है. यह किया या दिखाया और बनाया हुआ नहीं, जिया हुआ है. भाव को अभिनय नहीं, स्वभाव की तरह जीना अन्यत्र दुर्लभ है. बहुत से ऐसे गीत हैं, जिन्हें सुनते रहो तो लगता है कि वे गाती नहीं, भाव का अभिनय नहीं करतीं; वे उसमें वास करती हैं, वहीं रहती हैं, वहीं जीती और मरती हैं. लेकिन फिर हम किसी और गीत को सुनते हैं तो लगता है कि अभी यहाँ कोई और रह रहा था और अब अचानक किसी अन्य ने उस कंठ को अपना निवास बना लिया है. जैसे उनके लिए भाव कोई किया हुआ कर्म नहीं, भीतर की सहज उपस्थिति है. उनके कंठ का यह लीला रूप उन्हें इस उपमहाद्वीप में एक अलग स्थान देता है.

2)
आशा भोसले की आवाज़ में यह अद्भुत नैसर्गिकता थी. वह केवल गाती नहीं थी; दृश्य रचती थीं. लगता था, जैसे एक गीत के भीतर एक और कक्ष खुल रहा है, उस कक्ष में एक और परदा है, उसके पीछे किसी स्त्री की आँखों की चमक है और उसी चमक के पीछे कोई ऐसी गहरी उदासी है, जिसे वह खुलकर स्वीकार नहीं करेगी. बस गाकर पार कर जाएगी.
आशा की आवाज़ में एक असाधारण आधुनिकता थी. वे अपनी बहन और इस युग की महान् गायिका लता मंगेशकर की तरह गायन या जीवन में डिप्लोमेटिक नहीं थीं. वे निडर और निर्भीक थीं. वर्जनाओं को बरजकर जीना उन्हें कैशौर्य से ही आ गया था. जीवन की ख़ूबियों में भी और गायन की विशिष्टताओं में भी. लेकिन इस विद्रोहिणी ने 16 साल की उम्र में विद्रोह रचते हुए ऊर्ध्वगामी पवित्रता की विलक्षण रेखा खींच देने वाली बड़ी बहन के विपरीत भारतीय उपमहाद्वीप के श्रोता के भीतर एक तपस्विनी-सी अनुभूति जगाने के बजाय अपने रग-ए-जाँ में उतर जाने वाले कंठ-स्वरों से इस पृथ्वी की अधिक सांसारिक, अधिक स्पर्शगम्य और कहीं अधिक देहधारी लय की पक्षधरताओं को स्थापित किया था. उनकी अनूठी आवाज़ में शहर थे, क्लब थे, पायल थीं, बिंदिया थी, चूड़ियाँ थीं, मेंहदी थी, बाग-बगीचे थे, धूल थी, मखमल था, इत्र था, सुहागरातें थीं, बिछोह थे, सिगरेट के धुएँ-सी एक घुमावदार लचक थी, बचैन कर देने वाला नशा था, मौसम-ए-ग़ुल था और फिर उसी में कहीं भजन की रूहानी सादगी भी थी. बहुत कम आवाज़ें ऐसा कर पाती हैं कि वे एक ही सांगीतिक जीवन में मादकता को भी वैध करें और मासूमियत को भी अपवित्र न होने दें. आशा ही यह कर सकती थीं. वे उच्छृंखल नहीं थीं, पर निर्भीक थीं. वे लोक-रुचि को रिझाती थीं, पर उसके आगे उनकी देह थरथराती नहीं थी. वे श्रोताओं को चौंकाती थीं, पर अपने सुर की अभिजात गरिमा कभी नहीं छोड़ती थीं.
यही कारण है कि उनका जाना निजी-सा लगता है, भले हम उन्हें कभी मिले न हों. भारत में लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन में आशा भोसले किसी “सेलिब्रिटी” की तरह नहीं, घर के भीतर बसी एक चलती-फिरती ध्वनि की तरह थीं. किसी की माँ रसोई में उनके गीत गुनगुनाती थी; किसी के पिता हर दिन रेडियो पर उन्हें सुनते थे; किसी प्रेमी ने पहली बार अपनी झिझक उन्हीं की आवाज़ के सहारे व्यक्त की; किसी उदास आत्मा ने रात के सन्नाटे में उन्हीं के किसी धीमे, बुझते सुर को पकड़कर अपनी अकेली साँस बचाई. उनका संगीत सार्वजनिक था, पर उसकी उपस्थिति निजी. यही बड़े कलाकार की पहचान है. वह सबका होता है, लेकिन हर श्रोता को एहसास रहता है कि वह थोड़ा-सा नहीं, इतना अधिक मेरा है कि मैं उसके माध्यम से अपनी रूह से भी रूबरू हो लूँ और अपने अनमिले प्रेम को भी कलाई थामकर अपनी आत्मा के आँगन में बिठा लूँ.
आशा भोसले का सांगीतिक व्यक्तित्व भारतीय स्त्री-अनुभव के बदलते रूपों का भी एक जीवित अभिलेख था. उनके स्वर में परंपरा थी, किंतु परंपरा की कैद नहीं थी. उन्होंने नायिका को केवल रोने, प्रतीक्षा करने और समर्पण में पिघलने वाली आकृति नहीं रहने दिया; उसकी आँख में शरारत रखी, उसकी चाल में अपने होने का गर्व रखा, उसके विरह में भी एक प्रकार की शैली दी. वह स्त्री, जो उनके गीतों में बोलती है, टूटती अवश्य है, पर टूटकर भी अपनी देह, अपनी इच्छा, अपने व्यंग्य, अपनी चुप्पियाँ–सब पर किसी न किसी रूप में अधिकार बनाए रखती है. इस दृष्टि से आशा भोसले केवल एक स्वर नहीं, उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय आधुनिकता की स्त्री-संवेदना का भी एक संगीतात्मक पाठ हैं. वे न केंद्र की राजसत्ता के आगे प्रणम्य दिखती हैं और न इलाके की धमक के साथ दोस्ताना. वे सत्ता या भुजबल के सहारे स्थापित लोकदेवताओं को भी अर्घ्य देने जाती नहीं दिखतीं. अब जब वे हमेशा यादों की आबाद गली में तन्हा चाँद की तरह घूमती रहेंगी तो यह पीड़ा सदा सताएगी कि रेशमी कंठ के झूले में जीवन के नाना एहसासों को झुलाने वाली आशा ने इस अप्रैल में यह कैसा गीत गा दिया!
और यहीं तो एलियट की अप्रैल-पीड़ा एक नए अर्थ में खुलती है. अप्रैल सबसे क्रूर महीना इसलिए नहीं कि वह मृत्यु लाता है; इसलिए कि वह मृत्यु को पुनर्जागरण की पृष्ठभूमि पर रखता है. पेड़ हरे हो रहे होते हैं, हवा नरम हो रही होती है, स्मृति फिर से मिट्टी में हलचल करने लगती है और तभी हमें पता चलता है कि कोई स्वर, जिसे हम लगभग प्राकृतिक मान बैठे थे, अब मनुष्य की नश्वरता में वापस चला गया है. आशा भोसले के जाने के बाद अप्रैल की धूप वैसी ही है, अमलतास फिर भी खिलेगा, रेडियो पर रिकॉर्डिंग फिर भी बजेगी, पर अब हर बार उस आवाज़ में एक अतिसूक्ष्म अनुपस्थिति भी सुनी जाएगी; जैसे कोई बहुत चमकीला रेशमी वस्त्र भीतर से हल्का-सा शोक पहने हो.
बड़े कलाकारों के लिए “जाना” अंतिम क्रिया नहीं होती. देह जाती है; पर आवाज़ समय के भीतर अपनी दूसरी देह धारण कर लेती है. यदि वह सचमुच आवाज़ रही हो और केवल ध्वनि न रही हो. आशा भोसले ने वह दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ और जाने कितने अनगिनत शरीर बना लिए हैं. वे ग्रामोफोन की सूई पर हैं, टेप की धुंध में हैं, रेडियो की तरंग में हैं, यूट्यूब के पिक्सेल में हैं, किसी बूढ़ी स्मृति की तह में हैं, जाने कितनी सारी ऐप्स में हैं, किसी किशोरी की नई प्लेलिस्ट में हैं, किसी उदास ड्राइवर की गुनगुनाहट में हैं, किसी सुदूर सरहद पर बंदूक लिए खड़े सीमा सुरक्षा बल के जवान के ज़ेहन में हैं.
“वे चली गई हैं”; हाँ, यह वाक्य लिखना पड़ेगा; लेकिन उतनी ही सच्चाई से यह भी कहना पड़ेगा कि वे भारतीय जीवन से अनुपस्थित नहीं हुई हैं. उन्होंने अपने लिए मृत्यु के बाद भी रहने का सबसे विश्वसनीय घर चुना था और वह था मनुष्य का हृदय, मनुष्य की स्मृति, मनुष्य की आत्मा और मनुष्य का अपना निजी अकेलापन.
अप्रैल इसलिए क्रूर है; पर संगीत इसलिए दयालु. अप्रैल देह ले जाता है, संगीत उपस्थिति लौटा देता है. आशा भोसले चली गईं, पर उन्होंने जाते-जाते भारतीय समय को एक बार फिर यह सिखा दिया कि कुछ आवाज़ें न मिट्टी में मिलती हैं और न समय में खो जाती हैं. वे मिट्टी के ऊपर बहुत देर तक, बहुत दूर तक और बहुत प्यार से तैरती रहती हैं. कभी मुसकुराते अधरों पर, कभी गीली पलकों पर और कभी मिलन को उत्कंठित वक्ष के भीतर.

3)
लता और आशा के बीच प्रतिद्वंद्विता थी, यह कहना आसान है; पर सच उससे कहीं अधिक सूक्ष्म, अधिक संगीतात्मक और कहीं अधिक मानवीय है. वे दो स्वर थीं. एक जैसे आकाश की नहीं, पर एक ही वंश की प्रतिध्वनियाँ; दो नदियाँ, जिनके जल का ताप, रंग और प्रवाह अलग था, फिर भी जिनकी दूरस्थ गूँज में एक ही घर का सांध्य झिलमिलाता था. एक सुबह की लाली फूटती थी. उनके घरों के बीच दरवाज़ा था. यह बात अपने आप में एक रूपक की तरह है. दीवार भी, रास्ता भी; दूरी भी, निकटता भी. शशि कपूर की “उत्सव” में “मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को” दोनों ने साथ खड़े होकर नहीं गाया, वे अलग-अलग समय पर आईं, अपने-अपने अंश रिकॉर्ड कर गईं, पर गीत में जो सुर-सहोदरता है, वह बताती है कि रक्त के रिश्ते टूटते नहीं, वे केवल कभी-कभी राग बदल लेते हैं. लता की घाटी में आशा सचमुच एक प्रतिध्वनि की तरह सुनाई पड़ती हैं; लेकिन ऐसी प्रतिध्वनि, जो मूल ध्वनि की दासी नहीं, उसकी अनुगामिनी नहीं और उसकी अनुवर्तिनी नहीं; अपितु उसका दुस्साहसी, दमकता और स्वाधीन रूपांतर. जैसे वे इस उपमहाद्वीप की गायिकाओं के बरअक्स रहती हैं.
आशा भोसले की सबसे बड़ी करामात यह नहीं कि उन्होंने हज़ारों गीत गाए; यह है कि उन्होंने अपनी आवाज़ को किसी एक परिभाषा, किसी एक साँचे, किसी एक नैतिक अनुशासन में कैद नहीं होने दिया. उनकी ध्वनि कभी चुलबुली थी, कभी मोहक कैबरे-शैली, कभी स्थावर रूप, कभी जंगमता लिये शास्त्रीय मस्ती, कभी धधकती हुई लौ की तरह देहधर्मी और कभी फकीर की तरह विरागी और फक्कड़. संगीतकार ओपी नैय्यर ने उन्हें “वैम्प” की परिधि से निकालकर “हीरोइन” की आवाज़ बनाया था.
पंचम अर्थात् आरडी बर्मन ने उसमें पाश्चात्य, लैटिन लय-संसार और इंप्रूवीसेशन कहें कि तात्कालिक अलंकरण और रचनात्मक फेरबदल का ऐसा जादू घोला कि वह स्वर केवल गाता नहीं, नाचता, मुस्कराता, आँख मारता, हाँफता, ठहरता और फिर एकाएक उड़ता जाता है, एकदम खिलंदड़ा. मानो वह स्वर नहीं, किसी वैविध्य जीवन जीने वाले चरित्र की भूमिका हो. “माँग के साथ तुम्हारा” जैसी रचनाओं में नैय्यर के मन में पंजाबी लोक की मिट्टी, उसकी खुली छाती और उसकी चाल की ठसक गूँज रही थी. उन्होंने आशा को केवल सुर नहीं समझाए, पूरा मूड यानी भावों का माहौल समझाया और आशा उस रंग में इस तरह ढल गईं मानो उनकी आवाज़ में पहले से ही सरसों के फूलों की महक तारी हो. और तब हम देखते हैं कि वैजयंतीमाला के नृत्य, दिलीप कुमार की उपस्थिति, नैय्यर की लयकारी और आशा-रफ़ी की झनक आदि ने मिलकर गीत को महफ़िलों का स्टैपल बना दिया था. यहाँ भी और अन्य बहुत सारे ऐसे गीतों में आशा की आवाज़ में जो रोबस्ट महसूस होता है, जो मज़बूत और भरावदार रिद्मिक हैवी और सिडक्टिव सा तेवर दिखता है, जो मोहकता टपकती है, वही उन्हें लता से स्पष्टतः अलग करता है. यह अलगाव किसी विद्रोह का शोर नहीं था; यह अलग पहचान की स्थापत्य-कला थी.
फिर देखिए, आशा के व्यक्तित्व का एक दूसरा, कम चर्चित, पर अधिक उज्ज्वल पक्ष यानी “ऐ मेरे वतन के लोगो” का प्रसंग. पहले यह गीत आशा के हिस्से में था, रिहर्सल भी उन्होंने की थी; बाद में लता ने उसे गाया और इतिहास बन गया. यहाँ आशा की कला से भी बड़ी चीज़ उनका प्रोफ़ेशनलिज़्म और औदार्य है. वे उन कलाकारों में नहीं थीं, जो हर अच्छे गीत पर “यह मेरा था” का स्वामित्व-क्रंदन करें. वे जानती थीं कि संगीत का अंतिम धर्म अहंकार नहीं, अर्पण है. कला में यह संयम दुर्लभ होता है.
“ओ मेरे सोना रे” में उनका दूसरा ही रूप खुलता है. पंचम ने विदेश प्रवास के दौरान किसी होटल के रेस्तरां में जापानी बैले के दौरान नर्तकी की पुकार सुनी, जिसमें उन्हें “सोना, सोना” ही शब्द समझ आए और उन्होंने उस ध्वनि-चपलता को इस गीत में पिरो दिया. लेकिन आशा की आवाज़ ने उसे जो दैहिकता, चपलता और चमक दी, वह एकदम नैसर्गिक प्रतीत होती है. उसमें नृत्यप्रधानता और मंच की मोहक गायन-शैली की खुमारी तो है ही, उसके भीतर फ्यूजन भी है. भारतीय और पाश्चात्य का, लय और अभिनय का, शोखी और स्वर-सिद्धि का. उनकी यही वर्सैटिलिटी थी. एक ही साथ शरारत भी, आमंत्रण भी और मुस्कराहट के पीछे थोड़ी-सी गहरी रात का नशीलापन भी.
लेकिन जो लोग आशा को केवल चमक, अदा और ठिठोली की गायिका मानते हैं, उन्हें “इन आँखों की मस्ती के” सुनना चाहिए. खय्याम ने उनसे इस गीत की रिकॉर्डिंग के समय कहा था कि अपने कंठ की सामान्य ऊँचाई से नीचे उतरकर इसे गाओ. यह उतरना केवल स्वर की ऊँचाई का उतरना नहीं था; यह मानो भीतर के किसी अँधेरे, किसी नम तहखाने और सदियों से सुलगते दर्द के किसी धीमे दीये तक पहुँचना था. परिणामस्वरूप जो आवाज़ निकली, वह पीछा करती हुई, सम्मोहनकारी उदासी से भरी, रिस्ट्रेंड और अतिशय शास्त्रीय गरिमा से युक्त प्रस्तुति बन गई. वे नीचे उतरीं; लेकिन बहुत ऊँचे पहुँच गईं. जीवन हो या संगीत, बहुत बार नीचे ले जाने वाले सोपान ऊपर पहुँचा देते हैं और ऊँचे ले जाने वाली प्रतीत होतीं सीढ़ियाँ मनुष्य को नरक कुंड में ले जा पटकती हैं. इस गीत में आशा अपने सामान्य चंचल व्यक्तित्व से एकदम उलट और एक अलग तहज़ीब की मद्धिम लौ में जलती हुई दिखाई देती हैं. यह गीत सिद्ध करता है कि उनकी प्रतिभा का सबसे बड़ा चमत्कार केवल उच्छृंखल चमक नहीं, संताप में घुली संयमित वेदना भी थी. यहाँ उनकी आवाज़ दर्द के उस गाहक का प्रतिनिधित्व करती है, जो चश्म-ए-नाज़ से टपकने को बेताब है. “दम मारो दम” में वे एक दूसरी दिशा में निकल जाती हैं. यहाँ उनका कंठ विद्रोह का केंद्र तो बनता ही है, एक ख़ास तरह के हेडिनिज़्म यानी भोगवादी उन्मुक्ति और समय की बेचैन धड़कन का आमंत्रित करता आलिंगन भी है.
इस गीत के पीछे भी कहानी है. इस गीत की मूल योजना कुछ और थी, गायक भी कोई और हो सकते थे, पर अंतिम रूप में आशा का एकल स्वर ही उस पूरे हिप्पी कल्चर को उतार कर लाता है. एक ख़ास तरह के प्रतिरोध और सांस्कृतिक उच्छृंखलता का ध्वज बनाकर. पंचम ने इसमें ध्वनि-प्रभावों के ऐसे खेल रचे कि गीत केवल सुना ही नहीं जाता, वह एक पूरे दशक की रगों में बहते लहू में ध्वनित होता रहता है. इसमें बोतलों में फूँक, शरीर पर ताल और विचित्र ध्वनि-विन्यास का कमाल था. कहते हैं कि पहले इसे लता मंगेशकर और उषा उत्थुप से गवाया जाने वाला था; लेकिन बाद में आशा को चुना गया और उन्होंने इस चयन को सही साबित किया. और वह गीत जैसे सत्तर के दशक की जनरेशन का एंथम ही बन गया. आशा की मुखर, धुँधली और मादक आवाज़ ने क्या कमाल किया था उस गीत में.
“चैन से हमको कभी” तक आते-आते आशा की आवाज़ में निजी जीवन की कातर परछाइयाँ भी सुनाई पड़ती हैं. नैय्यर के साथ यह उनका अंतिम महत्वपूर्ण पड़ाव था. इस जोड़ी ने एक-दूसरे को गढ़ा भी, चमकाया भी, झुलसाया भी. उनके निजी संबंधों के बारे में बहुत कुछ कहा गया, बहुत कुछ लिखा गया, बहुत कुछ अनुमान के धुएँ में तैरा; पर कला के स्तर पर इतना स्पष्ट है कि नैय्यर ने आशा को एक विशिष्ट पहचान दी. बाद में दूरियाँ आईं, संबंध टूटे और इतिहास की तरह संगीत भी अधूरी चुप्पियों में बदल गया. “चैन से हमको कभी” में एक ऐसी पीड़ा है, जो मानो किसी टूटे और निजी मौसम से छनकर आई हो. आशा स्वयं इसे अपने उदास लम्हों का मरहम मानती रहीं और श्रोता भी. आशा की असल विशिष्टता यह थी कि वे “लता की छोटी बहन” बनकर नहीं रह गईं. यह सिर्फ़ एक जानकारी थी. आशा अपने लिए एक अलग भाषिक, शारीरिक और सांगीतिक भूगोल लेकर आईं.

4)
ओपी नैय्यर ने उनके स्वरों को तेवर देकर ताराशा, पंचम ने संगीतात्मक प्रयोगधर्मिता सिखाई और खय्याम ने उन्हें गहराई का अनुशासन दिया. उनकी आवाज़ में एक ख़ास तरह का इंप्रोवाइज़ेशन है. क्षण में जन्म लेने वाला वह अलंकरण अद्भुत है. लेकिन अगर उनकी आवाज़ की ख़ूबियों को देखें तो वे अपनी चपलता से चमत्कृत करती हैं. जैसे कोयल या कुछ अन्य पक्षी अपनी आवाज़ों में कभी ध्वन्यात्मकता लाते हैं और कभी माधुर्य घोलते-घोलते अचानक एक शरारत सी पैदा करने का चमत्कार दिखाते हैं. उनके कंठ स्वर में शब्दों और ध्वनियों की चंचल फुहार और सबसे बढ़कर इमोशनल ऑनेस्टी उन्हें सबसे अलग करती है. वे गीत को केवल गाती नहीं थीं; उसके साथ एक जीवित रिश्ता बनाती थीं. इसी से संगीतकारों के साथ उनका रचनात्मक अनुराग असाधारण रहा है.
आशा के जीवन में निराशाएँ और निजी दु:ख कम नहीं थे. परिवार की त्रासदियाँ, संबंधों की धुंध और सार्वजनिक सफलता के बीच निजी आर्तनाद. फिर भी आशा की कला की सबसे सुंदर बात यह है कि उन्होंने दु:ख को भी रंगहीन नहीं होने दिया. उनकी आवाज़ रोती है तो भी उसमें कंगन की हल्की-सी छनक बची रहती है; हँसती है तो भी कहीं पलक के कोने में एक पुराना आँसू मोती की तरह बिंधा रहता है. यही कारण है कि वे केवल एक गायिका भर नहीं, बीसवीं सदी के भारतीय सिनेमाई-संगीत की सबसे जीवित, सबसे बहुरंगी, सबसे सांस लेती हुई आवाज़ों में एक हैं.
इसलिए आशा भोसले को समझना केवल गीतों की सूची बनाना नहीं, उस स्त्री को सुनना है, जिसने प्रतिद्वंद्विता के बीच आत्मीयता, शोख़ी के भीतर साधना और लोकप्रियता के भीतर कला का एक गुप्त, चमकदार अनुशासन बचाए रखा. लता यदि हिमशिखर की उजली निस्तब्धता हैं तो आशा सांध्य के बाद का वह शहर हैं, जहाँ रोशनियाँ भी हैं, धुआँ भी, पायल भी, शराब का गिलास भी और किसी बंद खिड़की के पीछे से आती हुई ठुमरी भी. और भारतीय संगीत का सौभाग्य यह है कि उसे ये दोनों बहनें मिलीं. एक स्वर की मर्यादा तो दूसरी स्वर की उच्छृंखल लेकिन मुग्धमयी स्वतंत्रता. दोनों मिलकर ही वह आकाश बनाती हैं, जिसके नीचे हमारा फिल्म-संगीत अब भी चमकता, काँपता और यादों में गाता-गुनगुनाता रहता है.
आशा सिर्फ़ हिन्दी संसार की आशा नहीं थीं. उनकी उपस्थिति उपहाद्वीपीय है. उन जैसी बहुविधता, सुर पर पकड़ और फिल्मी-ग़ज़ल-लोक-अर्धशास्त्रीय के बीच सहज आवाजाही किसी और आवाज़ में शायद ही मिले. हालांकि भारतीय उपमहाद्वीप में कई समकालीन या लगभग-समकालीन आवाज़ें मिलती हैं. लेकिन आशा भोसले जिस असाधारण वैविध्य या वर्सैटिलिटी के लिए जानी जाती हैं, “ठीक वैसी” दूसरी गायिका को ढूँढ़ना कठिन है; लेकिन उसी दर्जे की दक्षता वाली कई बड़ी आवाज़ें रही हैं. आशा भोसले का जीवन और गायन हमें यह समझाकर आगे बढ़ता है कि कोई महान आवाज़ सिर्फ़ अपने गीतों में नहीं रहती; वह अपने समय, अपने भूगोल, अपनी भाषाओं, अपने समाजों और अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों में भी फैली होती है. उनसे आगे एक पूरा सांगीतिक भूगोल खुलता है. उनका स्वर हमें भारतीय उपमहाद्वीप की उन दूसरी महान गायिकाओं तक ले जाता है, जिन्होंने अपनी-अपनी भाषाओं, संस्कृतियों और संगीत परंपराओं में स्त्री-स्वर को नई ऊँचाई दी. जिन्होंने अपने-अपने देश, अपनी परंपरा, अपने दुःख-सुख, अपनी लोकधुनों और अपनी आधुनिकताओं को स्वर दिया.
भारत से पाकिस्तान, बांग्लादेश से नेपाल और श्रीलंका तक फैली इन आवाज़ों में भले ही लहजे अलग हों, पर भाव, स्मृति, करुणा, रागात्मकता और जीवन-सत्य की एक साझा धड़कन सुनाई देती है. आशा भोसले को समझने का एक सुंदर तरीका यह भी है कि उन्हें उस बड़े उपमहाद्वीपीय स्वर-संसार के बीच रखकर देखा जाए, जहाँ कई स्वर अपने ढंग से चमकते हैं, लेकिन कुछ ही ऐसे होते हैं, जो युग का पर्याय बन जाते हैं.
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, भूटान और मालदीव की इन गायिकाओं की आवाज़ों में भले ही अलग-अलग मिट्टियों की गंध हो, पर उनमें एक साझा सांस्कृतिक आकाश भी है. राग, विरह, ठुमक, करुणा, नज़ाकत, शास्त्रीय अनुशासन, लोक की सहजता और स्त्री-अनुभव की गहरी प्रतिध्वनि. आशा भोसले इस विराट परंपरा की अकेली चोटी नहीं, उसकी सबसे उजली और बहुरंगी शिखाओं में से एक हैं; और अब इसी व्यापक परिदृश्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि उपमहाद्वीप की अन्य कौन-सी आवाज़ें अपने ढंग से उतनी ही विशिष्ट, उतनी ही स्मरणीय और उतनी ही सांस्कृतिक रूप से अर्थवान रही हैं. भारत के विभाजन का दर्द सिर्फ़ भारत, पाकिस्तान या बाँग्लादेश के हिस्से ही नहीं आया, वह श्रीलंका, नेपाल, मालदीव, भूटान और अफ़गानिस्तान के शानों पर भी सर रखकर अपनी आँखों में शबनम और दिलों में गहरी आहें महसूस करता रहा है. काश कि हम अपने पड़ोस के इन देशों के इतिहास, संस्कृति और कलाओं को थोड़ा भी देख पाएँ.
इस महाद्वीप के सिने संसार को गीतों से सजाने वाले सुरों की बात करें तो भारत में सबसे पहले लता मंगेशकर का नाम आएगा. एक पारदर्शी, सुदीर्घ और लगभग अलौकिक स्त्री-स्वर की आदर्श प्रतिमा. उनके साथ गीता दत्त उस दौर की अद्भुत प्रतिभा थीं. शमशाद बेगम का स्थान भी अनूठा है, जिन्होंने हिन्दी फिल्म-संगीत के स्वर्णयुग की शुरुआती और अत्यंत वैविध्यपूर्ण आवाज़ों में अपनी जगह बनाई. सुमन कल्याणपुर जैसी गायिका किसे नहीं याद आएगी? दक्षिण में पी. सुशीला, एस. जानकी, वाणी जयराम और एलआर ईस्वरी ऐसी आवाज़ें हैं, जिनकी बहुभाषी पहुँच, तकनीकी दक्षता और जॉनर-रेंज उन्हें आशा की तुलना में रखने लायक बनाती है.
पाकिस्तान में सबसे बड़ा नाम नूरजहाँ का है. उन्हें भले पाकिस्तान भर में मल्लिका-ए-तरन्नुम कहा गया; लेकिन वे निःसंदेह पूरे साउथ एशिया की सबसे प्रभावशाली गायिकाओं में रही हैं. उनके बाद फ़रीदा ख़ानम ग़ज़ल की शहंशाही आवाज़ है तो इक़बाल बानो अपनी तरह की क्लासिकल, सेमि-क्लासिकल और ग़ज़ल के लिए व्यापक रूप से सराही गईं. रोशन आरा बेगम शास्त्रीय गायकी की शिखर हस्ती मानी जाती हैं. आबिदा परवीन सूफ़ी गायन की सबसे बड़ी और फ़न की मंसूब आवाज़ों में हैं. नय्यरा नूर को तो मानो एक नैसर्गिक उपहार, सुर-सचेत, मॉडर्न-लाइट क्लासिकल सिंगर कहा गया है.
मुझे पंजाबी का गीत “काला डोरिया” बचपन से ही बेइंतहा पसंद है और यह सुनते हुए भीतर ही भीतर भारतीय समाजों में तरुणियों की बेटी से बहू बनने की प्रक्रिया और भूमिका में जो दर्दआमेज़ हालात पैदा होते हैं, उसके एहसासों के माध्यम से यह गीत भीतर ही भीतर आँसुओं और उच्छवासों का आबशार पैदा कर देता है. यह गीत अनगिनत आवाज़ों में भारतीय और पाकिस्तानी गायिकाओं ने गाया गया है. किसी ने इसे लंबी हेक लेकर गाया तो किसी ने दर्द के दरिया में डूबकर. लेकिन इसे जिस तरह रावलपिंडी की शाज़िया मंज़ूर ने गाया है, उसकी किसी से कोई तुलना नहीं है. हालांकि यह गीत सुरिंदर कौर और परकाश कौर सहित कितनी ही गायिकाओं ने क़माल गाया है. शाज़िया पंजाबी डायस्पोरा की विख्यात गायिका हैं और वे ग्वालियर घराने के उस्ताद फ़ीरोज़ की परंपरा में दीक्षित हैं.
पाकिस्तान में एक से बढ़कर एक गायिकाएँ हुई हैं. नूरजहाँ, फ़रीदा ख़ानम, इक़बाल बानो, रोशन आरा बेगम, आबिदा परवीन, नय्यरा नूर. नूरजहाँ जहाँ फ़िल्मी गीतों और शीर्ष स्टारडम की मलिका हैं तो फ़रीदा ख़ानम और इक़बाल बानो परिष्कृत ग़ज़ल की, रोशन आरा बेगम शास्त्रीय ऊँचाई की, आबिदा परवीन सूफ़ियाना ताक़त की और नय्यरा नूर लिरिकल मैलेंकॉली की प्रतिनिधि आवाज़ हैं. एक गहरी उदासी, विषाद और नैराश्य का ध्वनियों पर तैरता वैसा बादल कहाँ मिलेगा, जो इस आवाज़ में मौजूद है. हो सकता है, मैं यहाँ कुछ ज़रूर और अहम आवाज़ों को अपनी त्वरा में भूल गया होऊँ.
बांग्लादेश में रूना लैला सबसे स्वाभाविक नाम है. स्वर और लय-तालबद्ध गायन वाली वैविध्यपूर्ण इस गायिका ने बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत में ख़ूब नाम कमाया है. उनके साथ एक नाम सबीना यास्मीन का है, जिन्होंने हज़ारों गीत गाए और रिकॉर्ड संख्या में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाए. शहनाज़ रहमतुल्लाह पार्श्वगायन, राष्ट्रभक्तिपूर्ण और ग़ज़ल गायन के लिए याद की जाती हैं. फ़िरदौसी रहमान बहुत महत्त्वपूर्ण नाम है, जो दशकों तक सांस्कृतिक परिदृश्य की बड़ी आवाज़ रहीं हैं. रूना लैला, सबीना यास्मीन, शहनाज़ रहमतुल्लाह, फ़िरदौसी रहमान में रूना लैला की उपमहाद्वीपीय पहुँच सबसे बड़ी है तो सबीना यास्मीन पार्श्वगायन की शक्तिशाली आवाज़ रहीं. शहनाज़ रहमतुल्लाह अद्भुत आवाज़ थीं; और फ़िरदौसी रहमान ने लोक, आधुनिक और पार्श्वगायन में गहरी पहचान बनाई.
इसी तरह नेपाल में गायन लोक की आधारशिला मानी जाने वाली तारा देवी, अरुणा लामा और मीरा राना प्रमुख नाम हैं. तारा देवी को तो “नाइटिंगेल ऑव नेपाल” कहा गया और वे रेडियो नेपाल की शुरुआती ऐतिहासिक रिकॉर्डिंग परंपरा की केंद्रीय आवाज़ों में थीं. अरुणा लामा को लीजेंडरी गायिकाओं में शुमार किया जाता है. मीरा राना ने सहस्रों गीतों के लंबे कॅरियर के साथ नेपाली संगीत की पहली रिकॉर्डिंग स्टार्स वाली पीढ़ी में जगह बनाई. इन गायिकाओं ने ख़ामोशियों को कई रंगों में ध्वनित किया और दु:खों-संकटों और तकलीफ़ों से लबरेज़ जीवन के अंधेरे की हथेलियों पर दीये रख दिए.
श्रीलंका में नंदा मालिनी और लता वालपोला अहम आवाज़ें हैं. नंदा मालिनी को श्रीलंका की सबसे सम्मानित पार्श्व स्वरों में गिना जाता है और लता वालपोला सिंहला सिनेमा की प्रभावशाली निर्णायक पार्श्व आवाज़ों में रही हैं. नंदा मालिनी की कलात्मक पहचान सिर्फ़ मधुरता नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक गहराई से भी बनी. नीला विक्रमसिंघे भी श्रीलंका की महत्वपूर्ण आवाज़ों में रही हैं.
मैं बहुत बार 1927 में प्रकाशित पाँचवीं कक्षा का अपने पिता का ज़ुगराफ़िया देखता हूँ तो उसके नक़्शे में हिन्दुस्तान अफ़गानिस्तान के नुश्की से म्यांमार (उस समय बर्मा) के भामो तक एक है. ख़ैर, अफ़ग़ानिस्तान के लिए सबसे मज़बूत नाम उस्ताद फ़रीदा महवाश का है. उन्हें इस देश की सबसे लोकप्रिय गायिकाओं में शुमार किया जाता है और 1977 में “उस्ताद” की मानद उपाधि पाने वाली वे पहली महिला थीं. यह अपने-आप में उनकी संगीत-सत्ता का प्रमाण है.
भूटान में औम त्शेवांग ल्हाम का बहुत नाम है. भूटानी पारंपरिक गायन की शुरुआती और प्रतिष्ठित कंठ में उनका स्थान विशेष है. वे 1968 में भूटान के प्रथम पारंपरिक संगीत-अल्बम रिकॉर्ड करने भेजी गई चुनीदा टोली में थीं. मालदीव में अब नई स्वर लहरियाँ तैरने लगी हैं.
लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के नभ में नूरजहाँ, लता मंगेशकर, गीता दत्त और आशा भोसले जैसी आवाज़ें नहीं होतीं तो शायद हमारे पड़ोसी मुल्क़ों के कंठ भी इतने सुरीले नहीं होते. आशा भोसले जैसी गायिका का अर्थ सिर्फ़ “मीठी आवाज़” नहीं है. उसका अर्थ है रेंज, लचक, भाषा-विविधता, फिल्मी और गैर-फिल्मी गायन के बीच आवागमन, ठुमरी से कैबरे तक और ग़ज़ल से लोक तक सहजता.
नूरजहाँ, लता मंगेशकर, रूना लैला, पी. सुशीला, एस. जानकी, वाणी जयराम, फ़रीदा ख़ानम, इक़बाल बानो, सबीना यास्मीन, नंदा मालिनी, गीता दत्त आदि में से कोई एक भी आशा की एकदम वैसी प्रतिकृति नहीं है या ठीक इसका उलट; पर इन सबमें आशा की तरह वह गुण मिलता है, जहाँ कला सिर्फ़ सुर नहीं रहती, शैली-परिवर्तन की मेधा भी तालबद्ध हो जाती है. आशा ने बहुत कुछ यहीं से इन्हीं से लिया और बहुतों में अपने होने को बांटा भी.

5)
हम गीता दत्त के “वक्त ने किया क्या हसीं सितम” को सुनते हैं तो वह एक ख़ास तरह की दर्द, धुंध, रूमानी विरक्ति और नाज़ुक नशीलेपन की अद्वितीय आवाज़ महसूस होती है. शमशाद बेगम का “कभी आर कभी पार” सुनते हैं तो वह एक खुली, चमकीली, बेबाक और लोक-रस से भरी फिल्मी गायकी की मिसाल लगती है. बेगम अख्तर “ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया” जैसी ग़ज़ल के कारण महज़ गायन नहीं, अपितु जीवन-जर्जर संवेदना में बदल देने वाली स्वर-साम्राज्ञी साबित होती हैं. इसी तरह पी सुशीला “पाल पोळवे (नालाई इनधा वेलै)” के कारण दक्षिण भारतीय फिल्म-संगीत में कोमलता, शुद्धता और नियंत्रित भाव-संचार की शिखर गायिका मानी जाती हैं. एस. जानकी अपने गीत “सेन्थूरा पूवे” के कारण सूक्ष्म भावभंगिमाओं, आवाज़ के रंग-परिवर्तन और नाटकीय अभिव्यक्ति की विलक्षण कलाकार ठहरती हैं. और वाणी जयराम को कौन भूल सकता है, जो “बोले रे पपीहरा” जैसा गीत गाकर अपनी ख़ास छाप छोड़ती हैं. अर्धशास्त्रीय ऊँचाई और फिल्मी संप्रेषण को एक ही साँस में साध लेने वाली यह आवाज़ भी कितनी अनूठी है.
कविता कृष्णमूर्ति चपलता, चमक और कठिन लय-चाल को सहज खेल में बदल देने वाली आधुनिक पार्श्वगायन की एक अलग चुंबकीय शक्ति हैं.
इस उपमहाद्वीप के राजनेताओं ने भले इस क्षेत्र के वक्ष पर अपनी संकीर्ण राष्ट्रवादिता की खुखरियों से रेखाएँ खींच दी हों; लेकिन जब नूरजहाँ “चंद कित्थाँ गुज़ारियाईं रात वे” गाती हैं तो इस गीत के रेशमी ठहराव, गहरी नफ़ासत और अदाकारी का वैभव गायन की संपन्नता को परिपुष्ट करता है और बताता है कि गायन की मालिका-ए-तरन्नुम कोई और कैसे हो सकती है. यह दर्द सिर्फ़ पाकिस्तान में नहीं गूंजता, यह हिन्दुस्तान के समस्त पंजाबियों की देह ही नहीं, रूहों की शिराओं में भी समान रूप से बहता है.
फ़रीदा ख़ानम का नाम आते ही “आज जाने की ज़िद न करो” याद आता है. साथ ही साफ़ सुनाई देती है ग़ज़ल में ठाठ, तहज़ीब, अदब और धीमे सम्मोहन की अनुपम आवाज़. इक़बाल बानो जिस समय “दश्त-ए-तन्हाई में” गाती हैं और ऐसे समय गाती हैं, जब फ़ैज़ की शायरी प्रतिबंधित है तो यह क़माल ख़ुश्क फूलों से बहार पैदा कर देने जैसा उदाहरण बन जाता है. वे सैन्य बल से शासित देश के शीर्ष नेतृत्व के दर्प को उसके घुटनों पर ले आती हैं. वे सामान्य गायिका नहीं हैं. वे प्रतिरोध, तड़प और शास्त्रीय गरिमा के साथ जम्हूरियत को राग और विराग के माध्यम से जीवित और जीवंत कर देने वाली गायिका हैं. आबिदा परवीन कौन? वही जो “यार को हमने जा-ब-जा देखा” गाती हैं. इसी से तो वे सूफ़ियाना विह्वलता, आध्यात्मिक उन्मेष और स्वर-तप की लगभग अद्वितीय साधिक बनकर उभरती हैं.
नय्यरा नूर “ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ” गाती हैं तो नर्म, शालीन, भीतर-भीतर जलती हुई ग़ज़ल-गायकी की महीन कारीगर साबित होती हैं. और रेशमा की “लंबी जुदाई” वाली स्वर लहरियाँ मानों दो दिलों नहीं, एक ही माँस-मज्जा और एक ही माँसल मिट्टी से बने दो मुल्क़ों की जुदाई का दर्द बनती हैं. रेगिस्तानी रेत के कण, लोक-करुणा और कच्चे दिल की फटी हुई पुकार जैसी उनकी आवाज़ में सब कुछ दर्द बनकर बहता है. मलिका पुखराज “अभी तो मैं जवान हूँ” गाकर अमर हो जाती हैं. नज़्म और ठुमरी के बीच की तहज़ीबी नज़ाकत को आत्मीयता से भर देने वाली यह पुरअसर आवाज़ नहीं होती तो क्या कहीं आशा भौसले भी होतीं क्या?
कई बार लगता है कि गायन की गलियाँ तब तक सुनसान ही रहती हैं, जब कि उनमें एक से बढ़कर एक कलाकार नहीं होते. जैसे रूना लैला ने “दमादम मस्त क़लंदर” नहीं गाया होता तो इस पूरे उपमहाद्वीप में चंचलता, ऊर्जा, गायन के मधुर व्यक्तित्व और बहुभाषी लोकप्रियता की कोई और मिसाल ढूंढ़े भी मिल पाती? “शुधु गान गेयें परिचय” गाते हुए सबीना यास्मीन बांग्लादेशी आधुनिक और फिल्मी गायन में संतुलित भाव-सौंदर्य की विराट उपस्थिति लाती हैं तो इसकी प्रतिध्वनियाँ भारत भी पहुँचती हैं और भारत से उन्हें भी संपोषित करती हैं. “एकबार जेते दे ना आमार छोट्टो सोनार” गाती हैं तो शहनाज़ रहमतुल्लाह देश, स्मृति और कोमल घरेलू संवेदना को स्वर में सँभाल लेने वाली गायिका साबित होती हैं. फ़िरदौसी रहमान “गांगुली मोर आहातो पाखिर सामो” जैसे गीत गाकर ही भाओइया और बांग्ला गीत-परंपरा की लोक-माटी को सधे हुए स्वरों में ढालने वाली महत्त्वपूर्ण आवाज़ बनती हैं.
दरअसल, सच तो ये है कि कला भी उस ख़ुशबू की तरह है, जो हवाओं में घुलकर देशों की सरहदों को लांघती है और जब भारत में आशा भौसले जाती हैं तो शोक की लहर पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और अफ़गानिस्तान ही नहीं, म्याँमार तक भीगी आँखों को चूम आती है. संकीर्ण राजनीतिक घटनाचक्रों के कारण बहुत बार जब शर्मिंदगी, संत्रास और मातम हमें कोंच-कोंच कर परेशान करते हैं तो नेपाल की तारा देवी “शुभकामना भरी” जैसे गीत गाकर नेपाली सांगीतिक स्मृति में ही नहीं, पूरे ख़ित्ते में प्रेम, लोक, प्रार्थना और उत्सव भरती हैं, जो हम सबकी साझा ध्वनि है. समूचे उपमहाद्वीप में जब समर्थों का र्निबलों पर अपराध देखते हैं तो जो उदासी, आत्मीय लय और भीतरी टूटन किसी पहाड़ से उतरती सुनाई देती है तो वह अरुणा लामा की आवाज़ हो सकती है. यह प्रतिध्विन हमें आशा भोसले के बहुत से गीतों में सुनाई देती है. आशा की आवाज़ में जो लोक और शहरी आधुनिकता साथ-साथ कूकती है, वह मीरा राणा के कंठ से भी “पोहोर साल खुशी फाट्दा” बनकर लौटती है.

6)
आशा भोसले का होना “बहुविधता” की उस कसौटी का होना भी है, जहाँ से हम नूरजहाँ के कंठ से झरते स्वरों को सुनते हैं. हालांकि यह सिर्फ़ आशा भौसले को एक प्रेम करने वाले एक नागरिक के भावोद्गार भर हैं, इस उपमहाद्वीप के गायन का कोई क्यूरेटोरियल आकलन नहीं; लेकिन जब मैं उन्हें एक वृहत्तर दृष्टि से देखता हूँ तो मुझे श्रीलंका की नंदा मालिनी का “रन केन्देन बेन्दा” भी कोई याद दिलाता है. श्रीलंकाई काव्य-गीत परंपरा की गरिमा, सामाजिक चेतना और मधुर दृढ़ता की वे बड़ी आवाज़ हैं. ठीक वैसे ही जैसे लता वालपोला. उनका “श्रीलंका रानी मनियाने” बहुत प्रख्यात है. वे सिंहली पार्श्व गायन युग की शुरुआती और अत्यंत प्रभावशाली स्त्री-स्वर परंपरा की केंद्रीय गायिका मानी जाती हैं. हमारे यहाँ आम तौर पर सोचा जाता है और सिनेमा के धुरंधरी कुत्सित प्रयोग बहुतेरे देशों और भूभागों को बदनाम करते हैं तो हमें वह सब सुनाई नहीं देता, जो उस्ताद फ़रीदा महवाश के कंठ से एक अंत:सलिला फूटती है. वे जब पश्तो में गाती हैं तो हमें अफ़ग़ान संगीत में गरिमा, ऊष्मा और परंपरा-समन्वित स्त्री-सुर की ऐतिहासिक शख़्सियत से रूबरू करवाती हैं.
आख़िरकार, आशा भोसले को याद करना केवल एक विलक्षण पार्श्वगायिका को श्रद्धांजलि देना भर नहीं है. यह उस समूची उपमहाद्वीपीय स्त्री आत्मा को सुनना है, जो भाषाओं, सरहदों, लयों, बोलियों, रागों, विरहों और उत्सवों के बीच किसी अदृश्य तार पर अब भी काँप रही है. नूरजहाँ से नंदा मालिनी तक, अरुणा लामा से फ़रीदा महवाश तक, तारा देवी से मीरा राणा तक; इन सबके स्वरों में अपने-अपने देश की मिट्टी, अपने समाज की पीड़ा, स्त्री-स्मृति की धीमी आग और जनता के मौन का कंपन सुनाई देता है; पर इस समूचे तारामंडल में आशा भोसले की आवाज़ कुछ ऐसी थी जैसे रेशमी अँधेरे में अचानक खुलती हुई कोई चंचल, बुद्धिमान, घायल रोशनी; जो लोक को भी जानती थी और नगर की नियॉन-भीगी रातों को भी, जो देह की शरारत में भी विश्वसनीय थी और आत्मा की थकी हुई सीढ़ियों पर रखे गए सांत्वना-भरे दीपक की तरह भी.
अब जब आशा का वह स्वर स्वयं स्मृति का हिस्सा हो गया है तो उनके गीतों को सुनना पहले जैसा नहीं रह गया. अब वे केवल मधुर नहीं लगते; वे अधिक नश्वर, अधिक मानवीय और अधिक असह्य रूप से सुंदर लगते हैं. उनकी हँसी, उनकी चपलता, उनकी शोखी, उनकी रागात्मक चतुराई आदि सब कुछ अब एक गहरी अनुपस्थिति की परछाईं के साथ सुनाई देता है, जैसे कोई बहुत द्युतिमान कक्ष अचानक खाली हो गया हो और उसके भीतर अब भी इत्र, रेशम, धूप और किसी पुरानी बातचीत की कंपन तैर रही हो. इसीलिए उनका जाना केवल एक शोक नहीं, हमारे श्रवण की नैतिकता की परीक्षा भी है. कलाकार शायद मरते नहीं; वे समय के दृश्य मंच से हटकर स्मृति की भीतरी ध्वनिकी में रहने लगते हैं. आशा अब वहीं हैं. रेडियो की दूरस्थ चमक में, ग्रामोफोन की पुरानी खरखराहट में और हमारे भीतर किसी अनाम संध्या में उठती उस पिपासा में, जिसे केवल एक सच्ची आवाज़ ही बुझा सकती है.
और तब शुरुआत से लौटती हुई वह पंक्ति फिर हमारे सामने खड़ी हो जाती है— अप्रैल सचमुच सबसे क्रूर महीना हो सकता है. इसलिए नहीं कि वह केवल फूल खिलाता है, इसलिए कि वह हर नई हरियाली के बीच हमें हमारी क्षतियों का ताज़ा बोध भी कराता है. वसंत का दर्शन यही है कि जीवन अपने नवीकरण में भी मृत्यु को साथ लिए चलता है; कोंपलें फूटती हैं और ठीक उसी घड़ी स्मृति किसी अनुपस्थित स्वर की राख कुरेदने लगती है. शायद इसी कारण इस उपमहाद्वीप के आठ देश, अपनी राजनीति, अपने झगड़ों, अपने नक्शों, अपने अहंकारों और अपने राष्ट्रगीतों से पहले एक साझा पीड़ा से जुड़े हुए हैं. वियोग की उस गहरी, मानवीय और अनूदित न की जा सकने वाली अनुभूति से, जिसमें एक आवाज़ के चले जाने पर सीमा-रेखाएँ अचानक तुच्छ लगने लगती हैं.
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, मालदीव और अफ़ग़ानिस्तान—इन सबकी हवाओं में इस अप्रैल एक जैसी हल्की उदासी घुली हुई है. जैसे किसी ने आठ अलग-अलग घरों में एक साथ एक ही दीपक बुझा दिया हो और फिर भी उसकी गरमाहट देर तक उँगलियों पर बनी रही हो. यही शायद संगीत का अंतिम सत्य है. मनुष्य पहले अलग-अलग देशों में बँटता है और फिर एक ही शोक में पुनः मनुष्य हो जाता है. यही इस मनुष्यता की आशा है, जो हमारे भीतर गाती है, गुनगुनाती है और कराहती है.
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भारत–पाक सीमा के एक गाँव में जन्मे त्रिभुवन जयपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वे हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुके हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, “कुछ इस तरह आना,” “शूद्र: एक लंबी कविता,” और “राष्ट्रवाद के नवपरिप्रेक्ष्य .” त्रिभुवन अपने सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषण, संयमित भाषा और गहन पठनशीलता के लिए जाने जाते हैं. जयपुर में रहते हैं.


महत्वपूर्ण, विस्तृत, वस्तुनिष्ट और यादगार लेख
यह लेख अपने आप में एक मेयार हो गया है। आशा भोसले या किसी भी गायक पर अब कुछ भी लिखने से पहले या आगे लिखे हुए पर, इस लेख का ख़याल आएगा। आरंभिक (साढ़े तीन) हिस्सा एक संगीत रचना है, नये राग में स्वर लहरी है। लंबी कविता है। विष्णु खरे जी ने लता मंगेशकर और दिलीप कुमार पर जो अविस्मरणीय लेख संभव किए थे, यह उनसे कुछ अलग है, ऊर्ध्वगामी भी।
सुबह की इस पढ़त ने राग विराग सुख दुख आनंद शोक मिलन विरह संगीत कविता आलाप विलाप जीवन मृत्यु सबको एकमएक करके समक्ष कर दिया है।
त्रिभुवन सर आपके द्वारा लिखा गया आशा भोसले पर यह लेख व्यक्तिगत शोक से कई गुना बढ़कर सामाजिक सांस्कृतिक और सभ्यता में रूपांतरण हो गया है इस लेख को पढ़ने में जीवन के सुख दुख मिलन त्याग सब विशाल समुद्र सा प्रतीत होता है जन्म से मृत्यु तक के सफर को संगीत रूपी माला में फिरोकर जैसे आंखों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया हो
त्रिभुवन सर आपकी शिष्या होने पर मुझे खुद पर नाज होता है गुरु के रूप में साक्षात भगवान हमारे पास है 😊
त्रिभुवन का यह स्मृति लेख सामान्य आलोचना नहीं है; यह एक श्रेष्ठ गायिका की स्मृति और स्वर का दार्शनिक आख्यान है।
इसमें वह दुर्लभ क्षमता है कि यह पाठक को केवल व्यक्ति या समय की जानकारी नहीं देता, बल्कि उसकी श्रवण-संवेदना बदल देता है।लेख का अंतिम हिस्सा अत्यंत प्रभावशाली है—विशेषकर: “अप्रैल देह ले जाता है, संगीत उपस्थिति लौटा देता है।”टी. एस. एलियट की पंक्ति से आरंभ करके “अप्रैल” को एक सांस्कृतिक रूपक में बदल दिया है। यह रूपक पूरे लेख में केवल सजावटी नहीं, बल्कि संरचनात्मक भूमिका निभाता है।
आशा भोसले की मृत्यु को “ऋतु-विपर्यास” और “स्मृति-उद्भव” के द्वंद्व में रखकर त्रिभुवन जी ने शोक को निजी नहीं रहने दिया—उसे सभ्यता की अनुभूति बना दिया है । यह लेख की सबसे बड़ी शक्ति है—व्यक्तिगत शोक का सांस्कृतिक रूपांतरण।
त्रिभुवन जी ने आशा जी को एक तप पूर्ण श्रद्धांजलि दी है !
अच्छा लिखा है
गहरी अंतर्दृष्टि के साथ लिखा गया एक दस्तावेजी लेख जो भारतीय उपमहाद्वीप के प्रतिनिधि सांगीतिक स्त्री -स्वरों के बीच आशा भोसले की विलक्षणता को रखता-परखता है और हमें एक ऐसी यात्रा पर ले जाता है जो बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की ओर चलती रहती है जिसके अंत तक पहुंचते हम अपने ही चित्त की गहराइयों में बसे सांगीतिक राग-अनुराग की प्रकृति को भी समझने की ओर बढ़ते लगते हैं। व्यापकता और गहराई को एकसाथ साधता यह लेख हिंदी के कला-विवेचन को अभिनव समृद्धि देनेवाला है। एक परितृप्त पाठक के रूप में आभार व्यक्त करता हूं।-
What a write up !!
A masterpiece. So comprehensive , so insightful . You have understood ASHA ji and her capabilities and her contribution beautifully. To be able to understand the person and the layers that constitute a person and to be able to write so eloquently about them is a rare blessing.
Salutations to you Tribhuvanji 🙏🙏
ऐसा आलेख मुझे नहीं लगता मैंने बीते कुछ समय में पढ़ा हो. एक होड़ सी लग जाती है ऐसे समय और फिर आधा-अधूरा कुछ सामने आता है पढ़ने में. आशा जी की लगभग आठ दशकों की उपस्थिति को उपमहाद्वीप के फैलाव में इसी तरह देखा परखा जा सकता है. उपलब्धि जैसा है यह आलेख. त्रिभुवन जी का आभार. समालोचन इसी तरह की श्रेष्ठ रचनाओं की जगह है.
आदरणीय त्रिभुवन सर ने स्मृति-शेष आशा जी को पत्रकारिता की भाषा से आगे बढ़कर उन्हें समग्रता में देखने की उल्लेखनीय कोशिश की है। आशा जी के देहांत के बाद आज की तारीख तक अंग्रेज़ी में भी इस तरह का व्यापक विश्लेषण परक लेख सामने नहीं आया है। लेख का सबसे दिलचस्प पक्ष है आशा जी की यात्रा में अपने समकालीन कलाकारों से उनका रचनात्मक संबंध। इतने कम समय में त्रिभुवन सर ने एक यादगार लेख संभव किया है। इस लेख के लिए ‘समालोचन’ और Tribhuvan सर का आभार
कमाल का लेख लेख है। कहां से कहां तक पहुंचता। शानदार।….शुक्रिया।
कलम के धनी आदरणीय त्रिभुवन जी तीन वर्ष पूर्व बाड़मेर प्रवास के दौरान मेरे घर पधारे और दो घंटे मेरे डिंगल रसावल स्टूडियो में बैठे रहे। डिंगल रसावल साहित्यिक यूट्यूब चैनल को लेकर आपने बहुत से हल्के फुल्के अंदाज में प्रश्न पूछे और जैसा मेरे से बन पड़ा वैसा प्रत्युत्तर भी दिया। उस दिन आपकी चर्चा का विशेष केंद्र नौतपा, सुगन विचार, बरखा भविष्यवाणी था। मैं खुश था कि राष्ट्रीय पत्र का एक सक्षम स्तंभकार मेरे स्टूडियो में जो था।
आज जब स्वर कोकिला स्वर्गीय आशा भोंसले जी के अवसान उपरांत आपने क्रमशः पांच भागों में आशाजी के संगीत जीवन को अपनी सुलझी हुई लेखनी में धारा प्रवाह से रेखांकित किया है उसे पढ़कर रोम रोम पुलकित हो उठा। मानो विद्वज्जनों के जीह्वाग्र भाग पर अकिंचित क्रीड़ा करने वाली मां धवल वसन धारणी ने अपना संपूर्ण मसि पात्र त्रिभुवन जी पर ही उड़ेल दिया हो। शब्दों की सरसता, भावों की भव्यता, कहीं कहीं बिलबिलाते, खिलखिलाते, झिलमिलाते भाषायी बिंब अभिव्यक्ति की उत्कृष्टता को परवान चढाते हुए प्रतीत हो रहे हैं। सरस शब्दावली युक्त भाषा प्रवाह की उत्ताल तरंगो पर नृत्य करती आपकी लेखनी ने निष्कपटता, निश्छलता, निरंतरता, सतत संगीत साधना व तात्कालिक स्वर साधिकाओं का जो सांगोपांग समीक्षात्मक उल्लेख किया है, मैं तो बस आपकी लेखन अभिव्यक्ति की शक्ति की अनंत गहराई में डूबा जा रहा हूं। धन्य हो आपकी जीवंत लेखन विधा। सचमुच ज्ञान के साथ लेखन विधान भी बोलता है। बहुत ही सराहनीय और हृदयस्पर्शी आलेख।
सांगोपांग सरावणजोग लेख री मौकळी बधाईयां अर शुभकामनावां हुकम। आपरी लिखण नै घणा रंग अर धनैवाद। खम्मा घणी सा।
आपरो हैताळू- दीपसिंह भाटी, मारवाड़ रत्न 2025, डिंगल रसावल साहित्यिक यूट्यूब चैनल, बाड़मेर राजस्थान।
आदरणीय हरिदेव जी एक महान गायिका आशा भोंसले जी पर आपका समग्र सारगर्भित संपूर्ण जीवन व्यक्तित्व पर,आलेख अदभुत है
आलेख नहीं आईना है,ऐसा लगता है पढ़कर आप 24 घंटे उनके साथ रहते रहे हों ,वो भी सालों साल
शब्द ही नहीं तारीफ के लिए
साधुवाद
इस लांड्री लिस्ट में शमशाद बेगम, संध्या मुखर्जी जैसी कई गायिकाओं और गायकी पर विचार नहीं किया गया।
भाव विभोर करता हुआ आपका यह शोक आलेख आशा भोसले जी के व्यक्तित्व और संगीत यात्रा का न केवल चित्रण करता है अपितु उनके अमूल्य सांगीतिक अवदान को उपमहाद्वीपीय परिप्रेक्ष्य में निरूपित करता है । भावो और विचारो के विशद कैनवास पर चित्रित यह शोक आलेख अंतर्मन को छूता है । वास्तव मे यह एक संग्रह हेतु योग्य आलेख है ।
आशा जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ ।
इस अविस्मरणीय लेखन के लेखक बधाई के पात्र हैं
महान सदाबहार गायिका आशा भोंसले जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि आशा जी का अचानक जाना किसी गहरे झटकें से कम नहीं है लता दीदी और आशा जी का अचानक जाना किसी गहरे झटकें से कम दोनों बहनें गीत संगीत की अमूल्य धरोहर थी पर इनका ईस तरह से जाना किसी गहरे झटकें से कम नहीं है लता दीदी सिर्फ़ 92 साल पांच महीने तक जीवित रहीं और आशा जी 92 साल सात महीने तक जीवित रहीं पर हम सब यह सोच रहें थे जाना एक दिन सभी ने ईस दुनिया से है कोई जल्दी जाता है कोई देर से जाता है पर लता दीदी आशा भोंसले जी अगर पांच साल कुछ महीने अर्थात 97 साल कुछ महीने और जीवित रहतीं तो बहुत अच्छा जिससे करोड़ों फैंस और जिसमे विदेशी फैंस भी शामिल हैं और समस्त भारतवासियों और आनेवाली नयी पीढ़ियों तक लिए और ज्यादा मार्गदर्शन करती रहतीं पर ऐसा हो नहीं सका ईशवर ने दोनों महान गायिकाओं को अचानक अपने पास बुला लिया है लता दीदी आशा भोंसले जी के अचानक चलें जाने से जीवन में एक ठहराव उदासीनता सी महसूस होती है जैसे जीवन ठहर सा गया है और एक खालीपन सा महसूस हो रहा है पर ईशवर की यहीं इच्छा थी दोनों बहनों लता दीदी आशा भोंसले जी को अचानक अपने पास बुला लिया है और स्वर्ग में स्थान दें दिया है लता दीदी आशा भोंसले जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि ईशवर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें ओम शांति ओम 🚩🚩🙏🙏🙏🙏
शानदार।
जानदार।
यादगार।
बहुत शानदार आलेख… आशा जी को याद करते हुए पड़ोसी मुल्कों की गायिकाओं का ज़िक्र छेड़ते हुए सुरीले सफर की ओर ले जाता है… एक महान कलाकार को ऐसे ही याद किया जाता है… इसे पढ़ते हुए कुछ ख़ास आवाज़ेँ गूंजती रहीं…. कुछ आवाज़ों को खूब सुना है, कुछ को अब सुनना है… क्यूंकि आवाज़ेँ खोती नहीं, उन्हें कभी भी सुना जा सकता है…
आशा भोसले की आवाज़ कुछ ऐसी थी जैसे रेशमी अँधेरे में अचानक खुलती हुई कोई चंचल, बुद्धिमान, घायल रोशनी; जो लोक को भी जानती थी और नगर की नियॉन-भीगी रातों को भी, जो देह की शरारत में भी विश्वसनीय थी और आत्मा की थकी हुई सीढ़ियों पर रखे गए सांत्वना-भरे दीपक की तरह भी.
अद्भुत श्रद्धांजलि दी है त्रिभुवन जी ने। समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के स्त्री स्वरों को समाहित कर लिया।
मैंने इससे पहले त्रिभुवन जी के सिर्फ़ दो आलेख पढ़े हैं जिसमें जेन जी क्या पढ़ रही है तो कमाल का आलेख था, जो समालोचन पर ही प्रकाशित हुआ था। जब भी हिन्दी साहित्य में जेन जी की बात चलेगी , मुझे वह ज़रूर याद आएगा। आशा जी का आलेख कल पढ़ा, मुझे बहुत पसंद आया। यह अच्छी बात लगी कि यह सिर्फ़ आशा जी पर नहीं है। इसमें मेरे लिए भी बहुत कुछ है जो मैंने नोट कर लिया है। ख़ासकर एशियाई देशों की फीमेल सिंगर्स के नाम और उनके प्रतिनिधि गीत जो आपने कोट किए हैं, वे सब मैं जल्द सुनूंगा। अधिकतर गीत सुने हुए भी हैं, लेकिन दोबारा सुनूंगा। शुक्रिया समालोचन और अरुण देव जी आपका इसे पढ़वाने के लिए। त्रिभुवन जी के इधर प्रकाशित सारे आलेख पढ़ूंगा और आगे भी आपके आलेखों का इंतज़ार रहेगा।
-विजय राही
त्रिभुवन जी की इस विलक्षण रचना से चयनित अंश ———-
“हिन्दी फिल्म-संगीत के इतिहास में जितनी तरह की स्त्रियाँ, जितने तरह की इच्छाएँ, जितने तरह के विरह, जितनी तरह की अठखेलियाँ और जितने तरह की सघन प्रेमिल रातें संभव थीं, उनमें आशा की आवाज़ ने मानो अलग-अलग रंगों के मोती जड़ दिए थे. वह एक ही समय में देह भी थीं, धुन भी; शरारत भी थीं, शास्त्र भी; चैत की धूप में गूंजती चूड़ियों की खनक भी थीं और आधी रात के बाद किसी अकेले कमरे में टिके आख़िरी सुर की नमी भी.”
“उनकी अनूठी आवाज़ में शहर थे, क्लब थे, पायल थीं, बिंदिया थी, चूड़ियाँ थीं, मेंहदी थी, बाग-बगीचे थे, धूल थी, मखमल था, इत्र था, सुहागरातें थीं, बिछोह थे, सिगरेट के धुएँ-सी एक घुमावदार लचक थी, बचैन कर देने वाला नशा था, मौसम-ए-ग़ुल था और फिर उसी में कहीं भजन की रूहानी सादगी भी थी.”
“आशा भोसले की सबसे बड़ी करामात यह नहीं कि उन्होंने हज़ारों गीत गाए; यह है कि उन्होंने अपनी आवाज़ को किसी एक परिभाषा, किसी एक साँचे, किसी एक नैतिक अनुशासन में कैद नहीं होने दिया. उनकी ध्वनि कभी चुलबुली थी, कभी मोहक कैबरे-शैली, कभी स्थावर रूप, कभी जंगमता लिये शास्त्रीय मस्ती, कभी धधकती हुई लौ की तरह देहधर्मी और कभी फकीर की तरह विरागी और फक्कड़. “
“आशा भोसले जैसी गायिका का अर्थ सिर्फ़ “मीठी आवाज़” नहीं है. उसका अर्थ है रेंज, लचक, भाषा-विविधता, फिल्मी और गैर-फिल्मी गायन के बीच आवागमन, ठुमरी से कैबरे तक और ग़ज़ल से लोक तक सहजता.”
“उनके गीतों को सुनना पहले जैसा नहीं रह गया. अब वे केवल मधुर नहीं लगते; वे अधिक नश्वर, अधिक मानवीय और अधिक असह्य रूप से सुंदर लगते हैं. उनकी हँसी, उनकी चपलता, उनकी शोखी, उनकी रागात्मक चतुराई आदि सब कुछ अब एक गहरी अनुपस्थिति की परछाईं के साथ सुनाई देता है, जैसे कोई बहुत द्युतिमान कक्ष अचानक खाली हो गया हो और उसके भीतर अब भी इत्र, रेशम, धूप और किसी पुरानी बातचीत की कंपन तैर रही हो.”
उन्होंने अपनी अंजलि से श्रद्धा के पुष्पों की जो पंखुड़ियाँ अर्पित की हैं, उन्हें शब्दों की माला में पिरोना शायद असंभव हैं। हार्दिक आभार 🙏
– राय कूकणा, ऑस्ट्रेलिया