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समालोचन

Home » अशोक वाजपेयी की कुछ नई कविताएँ

अशोक वाजपेयी की कुछ नई कविताएँ

by arun dev
June 6, 2026
in कविता
Reading Time: 4 mins read
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अशोक वाजपेयी की कुछ नई कविताएँ
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अशोक वाजपेयी की कुछ नई कविताएँ

१.
टुटहे-ढहते घर में

संसार का अब कोई रूपक सम्भव नहीं है:
रूपकों ने क्षुब्ध होकर
संसार को निरूपमेय छोड़ दिया है.
भाषाओं के पास अब
लकवा-मारे अन्तःकरण
अविराम क्रूरता और सब कुछ को नष्ट करने के अपूर्व उत्साह को
व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं बचे हैं.
मनुष्य ही नहीं, भाषाएँ भी हार रही हैं?

तेहरान में डेढ़ सौ या एक सौ अस्सी बच्चियों की चिथड़ा हुई लाशों का इन्तज़ार करती क़ब्रें
फोड़ दी गयी आँखें लगती हैं
जो संसार की तरह अन्धी और बहरी हैं:
धाँय-धाँय, साँय-साँय में अब तो चीख़ तक सुनाई नहीं देती
हम एक निश्शब्द समय में पहुँच गये हैं.

न कोई सवाल पूछ रहा है
न किसी को जवाब देना है:
किसी की ज़िम्मेदारी नहीं है
मौत बारिश की तरह बरस रही है
और संसार के सारे छाते हमें इस बारिश से बचा नहीं पा रहे.

खून-धूल-धुँए में लिथड़ा लबादा पहने ईश्वर, बूढ़ा-विक्षिप्त,
खोलता है पवित्र ग्रन्थ और पा रहा है कि उसमें एक भी शब्द शेष नहीं.
पवित्रता ग़ायब हो चुकी है संसार से
और ईश्वर के घर से.

एक बच्ची की आधी-अधूरी रह गयी लाश
ईश्वर के दरवाज़े दस्तक दे रही है
और ईश्वर उसे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है
शायद चीख़-प्रार्थना-विलाप और दस्तक अब ईश्वर को सुनायी नहीं देते.

कविता का टुटहा-ढहता घर
अभी खड़ा तो है
और उसी में मृतकों के लिए थोड़ी सी जगह है.

9 मार्च 2026

 

 

 

२.
छुट्टी पर नहीं

हमारे समय में घृणा कभी छुट्टी पर नहीं जाती;
इतना काम है उसके पास करने को कि उसे तो
मरने तक की फुरसत नहीं!
सभी को उसकी लगातार ज़रूरत रहती है
और वह सबकी सुनती और करती रहती है.
वह सच को बुहारकर कचरे की तरह कूड़ेदान में फेंक आती है;
वह पुस्तकों और पवित्रता को
रद्दी बनाकर जलाती रहती है;
वह सब घर जाती है
और कई बार तो किसी घर में देर रात तक काम करने के बाद
वहीं सो भी जाती है.
सुबह चाय-नाश्ते पर हाज़िर रहती है
और आप सुबह की खबरें मिस न कर जायें
टेलीविजन चला देती है.
वह थोड़ी मूरख है और उसे समझ में नहीं आता
कि हर चैनल पर वह चकाचौंध की तरह चमक रही है.
रास्ते में पड़ते मन्दिर में वह दो पल रूककर
किसी बेसुरे कीर्तन में ज़रूर सिर मटकाती है
पर उसका दिमाग़ कहीं और होता है तो
देख नहीं पाती कि मूर्ति के पास जल रहे दिये की लौ में वही दमक रही है.
थोड़ी मूरख है और उसे पता ही नहीं चलता कि
वह कहाँ-कहाँ है.

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि कुछ छुट्टियाँ अनिवार्य करने से
रोज़गार मिलने में बाधा और नौकरी गँवाने की नौबत आ सकती है:
घृणा को भी यह समझ में आ गया है
और वह कभी छुट्टी पर नहीं जाती.

15 मार्च 2026

 

Painting-Tom Vattakuzhy, Ball Game, 2023

३.
थकता नहीं

हमारे समय में झूठ कभी कहीं थकता नहीं है:
वह चौबीस घण्टे चलता रहता है,
न रुकता है, न थमता है, न सुस्ताता या आराम करता है:
रात के अँधेरे में, दिन दहाड़े वह कुछ न कुछ मुस्तैदी से कर रहा होता है.

धीरे-धीरे वह हर जगह पहुँच गया है
अँधेरे या उजाले या धूल की तरह;
उस जैसा निडर मिलना मुश्किल है.
इसमें सन्देह हो सकता है कि ब्रह्म घट-घट में व्याप्त है
पर निस्सन्देह झूठ हर जगह व्याप्त है:
कभी वह किले की प्राचीर से सुसज्जित बोल रहा होता है
तो कभी अध्यात्म-चिन्तन के लिए हिमालय की किसी गुफा में चला जाता है
कभी संसद में दहाड़ रहा होता है
कभी किसी तिकड़मी महफ़िल में हँस रहा होता है.
हर चैनल, सड़क, अख़बार में वह मुखर होता है.
झूठ की दूसरे झूठों से गलबहियाँ होती रहती हैं
झूठ हमारे इस क़दर सुबह-शाम साथ है
कि हमें सच की न तो याद आती है, न उसकी कमी महसूस होती है.
कई बार लगता है कि हमारा जीवन उसी के कारण इतना सुकर हो गया है:
वह न होता तो हम कैसे चैन से जी पाते!

‘झूठ के पाँव छोटे होते हैं’ की पुरानी कहावत
कब की झूठी साबित हो चुकी है.

यों तो झूठ को पूरा विश्वास है कि उसने सच को हमेशा के लिए दबा-कुचल दिया है;
पर कभी-कभी उसे शक होता है कि वह पीछे कहीं आ तो नहीं रहा उसे पछियाते हुए.
उसने बहुत अड़ंगे खड़े कर दिये हैं
और उसके जासूस सच के आने या होने की ख़बर उसे पहुँचा देंगे.
उसे चिन्ता नहीं,
वह बिना थके या रूके हर जगह काम पर है.

16 मार्च 2026

 

 

Painting :G. R. Iranna, Golden Bowls

४.
घृणा के पाले में

मैं दिवंगत देवताओं और पुरखों को पुकारता हूँ कि बतायें कि इस भयानक समय को कैसे कहूँ और सहूँ. मैं बचपन के घर के आँगन से पूछता हूँ कि छोटा होते हुए भी वह जितना खुला था उतना मैं कैसे रहूँ. मैं अपने युवा अवस्था के बकौली और कठचन्दन के पेड़ों की गुहार लगाता हूँ कि वे सुझाएँ कि कड़ी धूप में अमलिन और प्रफुल्ल कैसे रहा जाता है? मैं मकरोनिया पर बनी सेना की बैरकों से जानना चाहता हूँ कि सेना के चले जाने के बाद वे एक नये विश्वविद्यालय का परिसर इतनी आसानी से कैसे बन गयीं? मुझे याद नहीं है कि यह क्या जुनून था कि मैं और रमेशदत्त दुबे मई-जून की दोपहर में लू में भी शहर की सुनसान सैर का लुत्फ़ लेते थे. मैं कहाँ से लाऊँ वह आसक्ति, वह आवेग जो मैंने अपने पहले प्रेम को पुस्तकों में छुपाकर दिये पत्रों में भरा था और अब संसार के नाम अपने प्रेमपत्र में नहीं ला पाता? कहाँ चली गयीं वे पत्रिकाएँ जिनके ताज़ा अंक रेलवे बुकस्टाल से खरीदने हम कोसों उत्साह से चला करते थे जबकि इन दिनों लोकार्पण में जाते पैर हाँफने लगते हैं?

मैं सुबह बगीचे की सैर में इधर-उधर मँड़राती मधुमक्खियों से कैसे सीखूँ मधु इकट्ठा करना जबकि मुझे सब कुछ ज़हर-बुझा लगता है! मैं अपने स्कूली गुरू लक्ष्मीधर आचार्य से कैसे शिकायत करूँ कि उन्होंने सत्तर-बहत्तर बरस पहले यह आदर्श दिया कि ‘कवि की तरह मरना’ जबकि हो सकता है कि मैं एक अवांछनीय नागरिक की तरह मरूँ या मारा जाऊँ? काका से पूछते डर लगता है कि जिन्होंने धोखा दिया उन मित्रो की आँखों में उनके धोखे की संभावित तारीख़ पढ़ना तुम्हारी तरह मुझे क्यों नहीं आया? दिदिया को तो अब भी स्वर्ग से लगता होगा कि मुझे इतनी भाग-दौड़ के बजाय आराम की ज़रूत है. बिटिया अब भी तो सिखा सकती है कि प्रेम में हताश होकर भी एक भरा-पूरा जीवन कैसे जिया जा सकता है?

सिर्फ़ एक बार की भेंट के आधार पर सही, उनकी तीख़ी नज़र बचाते हुए, निराला से कैसे कहूँ कि मेरा अवसान की ओर जाता जीवन ‘पत्रोत्कण्ठित’ क्यों नहीं है? और किसी क़िले में अब भी बैठे रिल्के से बताऊँ कि इस धरती पर सिर्फ़ एक बार हो पाना मुझे, उनकी तरह, काफ़ी नहीं लगता- मुझे क्यों आगे भी जीवन चाहिये? इसी एक जीवन में ऐसा क्या कर लिया कि दूसरा भी मिले? मैं घबरा जाता हूँ कि एक ही जीवन में कितने और जीवन घुले-मिले हैं!

ऐसा क्यों हुआ है कि मुझे पुस्तकों से अधिक और लोगों से कम गरमाहट और उजाला मिले हैं? हरेक के पास कुछ देने को हैं तो मैं क्यों ले नहीं पाता हूँ? यह क्या अमानवीय है कि जितना उत्साह किसी नयी पुस्तक से मिलने में होता है उतना किसी व्यक्ति से मिलने में नहीं? मुझे पता है कि इस पर झुँझलाने से कुछ हासिल नहीं कि मेरी हाउसिंग सोसायटी में दो-चार को छोड़कर कोई पुस्तक नहीं पढ़ता जबकि कार-पार्किंग को लेकर रोज़ीना झगड़े और मनमुटाव होते रहते हैं.

क्या यह कहना या मानना कि ‘जो कुछ मुझसे नहीं हुआ मेरा संसार नहीं’ अपने जीवन के अकारथ जाने की सचाई का लाचार स्वीकार भर है? मैं चीख़ता हूँ कि अपना संसार मैंने अकेले तो नहीं रचा, दूसरों की भी इसमें शिरकत है? क्या मैं ही जवाबदेह हूँ, वे नहीं?

बालकनी के सामने के गुलमोहर में फूल अब तक नहीं आये हैं जबकि खिड़की के सामने से दीखते गुलमोहरों में फूल खिलखिला रहे हैं. मैं बालकनी के सामनेवाले गुलमोहर से कैसे पता करूँ कि जब तेज़ी से फूल रहे हैं तो उसने मन्दगति कैसे और क्यों चुनी? ऐसा क्यों है कि चम्पा-चमेली-मालती-कनेर आदि सब फूल देते हैं उदारशाख, बिना किसी प्रतिदान की आशा किये और मैं अपने दिये का एहतराम चाहता हूँ? नेकी कर दरिया में कितने डालते हैं- ज़्यादा डाल रहे होते तो दरिया पानी से कम नेकी से भरे बह रहे होते!

वह जगह जो मुझे मिली और वह भी जो मैंने बनायी, इतनी कम क्यों निकली? चौड़ी सड़कों पर भाग-दौड़ की है पर छोटी पगडण्डी पर चलने का हुनर क्यों नहीं आया? अपने टुच्चेपन से बचे रहने की प्रार्थना कितनी फलीभूत हुई? ज़्यादा से ज़्यादा पाने की ललक कभी नहीं हुई तो कम से कम से सन्तोष भी तो नहीं हुआ?

मुझे जीत की कभी उम्मीद नहीं थी पर ऐसे हार होगी मैंने नहीं सोचा था. जीवन भर कुछ स्वभाव से, कुछ गांधीनिष्ठा से घृणा करने से बचा रहा. कम से कम ऐसा आत्मभ्रम बना रहा. मित्र शत्रु बने, वैचारिक शत्रु हुए, अनेक रंग के विरोधी हुए पर किसी से घृणा नहीं की. अब हार रहा हूँ. इतनी घृणा फैली, फैलायी गयी है, इतनी घृणा हज़ारों निरपराधों को मौत के घाट उतार चुकी है, इतनी घृणा झूठ के साथ मिलकर सत्तासीन है, इतनी घृणा धर्म-आचार-अनुष्ठानों में भर गयी है कि उससे बचना मुश्किल हो रहा है. किससे कहूँ कि अपने जीवन का अन्तिम चरण घृणा में बिताने पर विवश हुआ जा रहा हूँ? किसको इसकी परवाह और इससे किसको क्या फ़र्क पड़ता है!

अब भी रोज़मर्रा की धूसर ज़िन्दगी में चमक और लपक हैं. अब भी खाते वक़्त दाल में कम नमक या खीर में ज़्यादा मीठा पकड़ में आ जाते हैं अब भी पुस्तकों का जादू, उनमें छुपे रहस्य कम नहीं पड़े हैं. अब भी, सुबह की हवा ठण्डी है और दोपहर की बेहद गरम. अब भी, कुछ लिखने, कुछ करने की इच्छा मन्द नहीं हुई है. अब भी, अपनी चूकों पर खीझने के मौक़े घटे नहीं हैं. अब भी दूसरों की मदद और सलाह की दरकार बनी रहती है. अब भी, अपनी आवाज़ पर थोड़ा शक, थोड़ा भरोसा है. अब भी, सन्तोष की किसी परछी में आराम से नहीं लेटा हूँ. अब भी, दूसरों की बेहर ज़िन्दगी से रश्क नहीं होता. अब भी, जो मेरे पास नहीं है उसे किसी तरह हथियाने की जुगत करना ज़रूरी नहीं लगता. अब भी, याद करता हूँ वह बहुत कुछ जो नहीं कर पाया बजाय उस थोड़े से को जो कर पाया. अब भी, मुझे दुख होता है अगर कोई मुझसे निराश होता है. अब भी, सुन्दरता अलक्षित नहीं जाती, टुच्चापन लकदक मालाओं से लदा सिंहासन पर बैठा नज़र आता है. अब भी, कहीं देर से पहुँचने या जल्दी उठ आने पर अफ़सोस होता है. अब भी, कुछ नोंक-पलक टेढ़ी हो जाने के बावजूद मैं वही हूँ. फिर भी, मैं घृणा करता हूँ उस सत्ता से जो छलकपट, झूठ, घृणा, अत्याचार, अनाचार, पैसों, ख़रीद-फ़रोख़्त, षड्यन्त्र, मर्यादाहीन आचरण, संवैधानिक संस्थाओं-राजकीय उपकरणों- धर्म-सन्तों-मीडिया को काबू में कर सिंहासन पर बैठी है. मैं घृणा करता हूँ उन चेहरों से जो लगातार झूठ बोलते, झाँसे देते, नफ़रत फैलाते, अन्याय को उचित ठहाराते, लोगों को गुण्डोंलफंगों की तरह हिंसा-हत्या के लिए उकसाते रहते हैं. मैं घृणा करता हूँ लोकतंत्र में सक्रिय उस मीडिया से जो खरीदा जाकर सत्ता का चापलूस प्रवक्ता बनने पर इतना इतराता रहता है. मैं घृणा करता हूँ उस समाज से जो यह सब देखता-सहता है और फिर भी इन्हीं वृत्तियों को समर्थन देता है और पैसे से खरीदने जाने के लिए आतुर है. मैं घृणा करता हूँ उस संवैधानिक व्यवस्था से जो लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित करती और उस व्‍यवस्‍था में भी जो ऐसा होने देती है.

मेरी घृणा का भूगोल बढ़ता ही जाता है. मैं असहाय- सा हूँ. मेरा इस बढ़ती घृणा पर बस नहीं. मुझे इतनी घृणा का हक़ नहीं तो उन लाखों लोगों को क्या हक़ है कि वे रात दिन घृणा फैलाने के अभियान में अथक लगे रहें. हालाँकि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है, अपनी असह्य रूप से अपवित्र और आस्था-वंचित ज़िन्दगी में, कि मेरी कोई प्रार्थना कभी पूरी हो जाये. मैं अपनी अवश घृणा में लिपटा हुआ यह प्रार्थना करता हूँ कि इन सबको रौरव नरक मिले. हो सके तो इसी जीवन में. नहीं तो बाद में सही. उन्हें घृणा का दण्ड मिले और अगर मुझे भी अपनी घृणा के लिए सी रौरव नरक में किसी खोलते हुए तेलवाले कड़ाह में फेंक दिया जाये तो मुझे शिकायत न होगी. जो जैसा करता है वैसा भरता है. मुझे रत्ती भर अन्दाज़ नहीं था कि घृणा में भी इतना आवेश होता है. फिर भी, घृणा से कई गुना बड़ा प्यार और भरोसा करने के लिए बचा हुआ है. सब कुछ न सही, बहुत कुछ होना बचा हुआ है.

10 मई 2026  

अशोक वाजपेयी ने छह दशकों से अधिक कविता, आलोचना, संस्कृतिकर्म, कलाप्रेम और संस्था निर्माण में बिताये हैं. उनकी  लगभग 50 पुस्तकें हैं जिनमें 17 कविता-संग्रह, 8 आलोचना पुस्तकें एवं संस्मरण, आत्मवृत्त और ‘कभी कभार’ स्तम्भ से निर्मित अनेक पुस्तकें हैं.  उन्होंने विश्व कविता और भारतीय कविता के हिन्दी अनुवाद के और अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, भारत भूषण अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताओं के संचयन सम्पादित किये हैं और 5 मूर्धन्य पोलिश कवियों के हिन्दी अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित किये हैं। अशोक वाजपेयी को कविताओं के पुस्तकाकार अनुवाद अनेक भाषाओं में प्रकाशित हैं.

अनेक सम्मानों से विभूषित अशोक वाजपेयी ने भारत भवन भोपाल, महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, रज़ा फ़ाउण्डेशन आदि अनेक संस्थाओं की स्थापना और उनका संचालन किया है. उन्होंने साहित्य के अलावा हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, आधुनिक चित्रकला आदि पर हिन्दी और अंग्रेजी में लिखा है.

फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें अपने उच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया है.

दिल्ली में रहते हैं.
ashokvajpeyi12@gmail.com

Tags: 20262026 कविताअशोक वाजपेयीआत्मलोचन और नैतिक व्यथानिराशा
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Comments 15

  1. मनोज मोहन says:
    1 month ago

    इस उम्र में जिस संवेदना के साथ वे कविता लिख रहे हैं, वह विरल है….उनकी कविता में छिजती जा रही मनुष्यता की चिंता हमेशा से रही है, और अब भी वे बेचैनी से इसे महसूस कर रहे हैं. मनुष्यता के साथ होना कोई उनसे सीखे….

    Reply
  2. जावेद आलम ख़ान says:
    1 month ago

    वर्तमान को कविता में इस तरह अशोक सर ही दर्ज कर सकते हैं.उनके पास अथाह अनुभव और उसे व्यक्त करने के लिए व्यापक शब्द भंडार है.लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए उनकी प्रतिबद्धता और सक्रियता प्रेरित करती है.कविताएं बेहतरीन लगीं .अंतिम शीर्षक घृणा के पाले में उनका आवेग जैसे छलछला आया हो.

    Reply
  3. अरुण कमल says:
    1 month ago

    अशोक वाजपेयी की ये कविताएँ हमारे समय के कार्डियोग्राम की तरह हैं— और सिद्ध करती हैं कि एक कवि निरंतर बदलता, जीवंत बना रहता है।ये कविताएँ तात्कालिक भी हैं और सर्वकालिक भी जहाँ खोजबत्ती बाहर से भीतर को मुड़ती और घूमती रहती है।
    “घृणा के पाले में” एक सघन, सान्द्र गुंजार भरी कविता है जो एक साथ राजनैतिक, निजी और सामूहिक भी है।
    ये कविताएँ कवि के गहरे नैतिक बोध,साहस और शिल्प सौष्ठव का परिपक्व उपसंहार हैं—उपमा विहीन समय में स्वयं उपमान—

    Reply
  4. Savita Singh says:
    1 month ago

    अपने समय से क्षुब्ध ये कविताएँ अशोक जी की pahali कविताओं में जो जीवन की लालसा उपजाती रहीं, से कितनी भिन्न हैं. शब्द, ईश्वर भाषा, सबसे निराश! फिर भी राजनैतिक ढंग से महत्पूर्ण. यूरोप में ऐसे ही कठिन दौर में लिखी गई कविताओं की आत्मीय याद दिला रही हैं. दहशत भरे हमारे इस समय कविता ही सत्य का ऐसा बखान प्रस्तुत कर सकती है. लोग भूल जाते है कि कविता बखूबी यह काम करने me सक्षम ही नहीं तत्पर भी रहती है, मनुष्यों में यदि यथेष्ट साहस हो. बहुत अच्छी कविताएँ, अशोक जी, अपने बदले रूप में, इस बदले समय में.

    Reply
  5. मुकेश कुमार says:
    1 month ago

    ये कविताएं अपने समय की बेचैनी और विडंबनाओं की अभिव्यक्तियां हैं। ऐसा लगता है कवि अपने समय और सभ्यता को कविता में अनुवाद कर रहा है। चारों ओर छाई बेबसी और नाउम्मीदी को इनमें पढ़ा जा सकता है। कविताएं समय को व्यक्त ही नहीं कर रही हैं बल्कि उनको इतिहास में दर्ज़ कर रही हैं। इस लिहाज़ से इन कविताओं का महत्व और भी बढ़ जाता है।

    Reply
  6. निशांत उपाध्याय says:
    1 month ago

    अशोक जी उन दुर्भाग्यशाली कवियों में से हैं जो अपनी प्रसिद्धि और लोक-सामर्थ्य के कारण इन दिनों बिना पूर्वाग्रह के पढ़े ही नहीं जा रहे। एक वर्ग है जो उनके लिखे हर शब्द पर तारीफों के पुल बांध सकता है और एक वर्ग है जो उनकी श्रेष्ठतम रचनाओं को भी रद्दी कहने को संकल्पित है।

    ऐसे में भी वे निरंतर रच रहे हैं, अपनी शिशु-सी हँसी संभाले हुए हैं और युवा कवियों से बिना अहम के लंबी सार्थक चर्चा करने को सहज उपलब्ध रहते हैं, यह सुखद है और प्रेरक भी।

    ये कविताएं ठीक हैं लेकिन अशोक जी के ही विपुल रचना संसार के मुकाबले फीकी महसूस होती हैं। समय पर कवि के आधिपत्य की बजाय यह समय के कवि पर आधिपत्य की रचनाएं हैं।

    Reply
  7. माताचरण मिश्र says:
    1 month ago

    ऐसी उम्र में जब लोग संन्यस्त हो जाते हैं, अशोक वाजपेयी कविता की अलख जगाए निरन्तर सक्रिय हैं, उन्हें देखना मुझे हमेशा विस्मित करता रहता है, ऐसे समय जब शब्द नहीं बचे हैंऔर मनुष्य ही नहीं भाषाएं भी हार रही हैं तब यह एक अकेला दीप निष्कंप जल रहा है,,,,,

    Reply
  8. सीरज सक्सेना says:
    1 month ago

    अशोक वाजपेयी की नई कविताएँ-
    एक कवि जिसने एक लंबा जीवन साहित्य,शब्द, कलाओं, देश विदेश की भाषाओं और उनकी असीम सीमाओं, संस्कृति,विरासत, मनुष्यता और उसके लिए अनिवार्य सौंदर्य, प्रेम की उपस्थिति व मनुष्य की ऐसी दुनिया,जिसमे लोभ, घृणा, लालच,दंभ,मित्रता, शत्रुता, आलोचना के आयाम आदि नज़दीक से देखें हैं। संवेदन की परतों में लिपटी ये कविताएँ सच्चाई – आज के सच को जिस तरह देखती है व छूने का प्रयास है उसे इस मायने में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि आज के समय की सच्चाई को जिसमे हमारे बीते समय के प्रति एक अजीब हिकारत है जो नासमझ और अनुभवहीन सोच का फल है।
    अशोक जिनकी कविता के भूगोल में हमारे आसपास और लगभग पृथ्वी के हर कोने में युद्ध और डर जिससे उत्पन्न अनिश्चितता का जो माहौल बन रहा है (जिसमें मनुष्य अपनी निरदयी और अमानवीयता के मुखर उदाहरण बना रहा है) उसे नज़दीक से देख कर जिस सच्चाई को अपने शब्दों में जगह दी है वह हमारे समय की परछाईं है जिसे न जाने क्यों अनदेखा किया जा रहा है।
    गांधी की उपस्थिति को जैसे आज शब्दों या कलाकृतियों में याद करना जोखिमभरा कृत्य है ।पर कवि निडर भी होता है और उसने अपने समय को,अपने शब्दों में दर्ज कर अपनी मुखर उपस्थिति और अक ए जीवित होने का प्रमाण दिया है ।अशोक जी की कविताएँ शोर की नहीं एक ऐसी भोर की कविताएँ हैं जिसकी उम्मीद हमे जीवित बने रहने को प्रेरित करती हैं ।

    Reply
  9. पवन करण says:
    1 month ago

    आज की कविता को जैसा होना चाहिए वैसी कविताएं हैं।

    Reply
  10. अरविंद त्रिपाठी says:
    1 month ago

    पुरानी पीढ़ी के कवियों में अशोक जी का कवि कर्म आज भी समर्थवान है सुबह आज सभी कविताएं एक साथ पढ़ते वक्त अपने समय के तीव्र आक्रमणों से सामना हो रहा था आखिरीगद्य कविता सचमुच उनकी लिखी गई कविताओं में एक मिल के पत्थर की तरह यादगार कविता हमेशा बनी रहेगी उसे फिर फिर पढ़ूंगा इस कविता में समाज और आत्मा दोनों की जांच पड़ताल है आज के कवियों को खुद के खिलाफ भी लिखने की कोशिश करनी चाहिए अभी तो संपादक और कवि दोनों को बधाई

    Reply
  11. ध्रुव शुक्ल says:
    1 month ago

    आधी सदी से अशोक वाजपेयी के कविता संसार में बिलमता रहा हूॅं। उनकी कविता में अपने समय की लिखतें प्रकट होती हैं। वे अवसाद को उपयुक्त शब्द प्रदान करने वाले कवि हैं। ये कविताएं यह प्रमाण भी दे रही हैं। हमारा समय प्रूफ मिस्टेक से भरता जा रहा है पर कविता की प्रस्तुति में शुद्ध लेख की जिम्मेदारी प्रकाशक की है।

    Reply
  12. Pragya Rawat says:
    1 month ago

    आत्म की बेलौस आवाज़ से लिखी हुई कविताओं का विचार है जो हमेशा अवचेतन में रहेंगी। आपका शुक्रिया ।

    Reply
  13. ज्योतिकृष्ण वर्मा says:
    1 month ago

    अशोक वाजपेयी जी की यह कविताएं निःसंदेह वर्तमान समय का मुहरबंद दस्तावेज़ हैं। यह उन्हीं का हुनर है कि भाषा की गरिमा में रहते हुए उन व्यवस्थाओं पर करारा तंज कसते हैं जिन्हें पाठक दृश्य रूप में देखने का अनुभव कर सकते हैं। बहुत अच्छी कविताएं, अशोक जी को हार्दिक शुभकामनाएं।

    Reply
  14. vimlesh sharma says:
    1 month ago

    अशोक वाजपेयी की नई कविताएँ उस कवि के दीर्घ अनुभव की परिपक्व अभिव्यक्ति हैं, जिसने जीवन भर साहित्य, शब्द, कला, विविध भाषाओं और संस्कृतियों के विस्तृत संसार को गहराई से जिया है। उनकी कविताओं में मनुष्यता के वे तमाम रंग दिखाई देते हैं जिनमें प्रेम, सौंदर्य और संवेदना के साथ-साथ लोभ, घृणा, दंभ, मित्रता और शत्रुता जैसी जटिल मानवीय प्रवृत्तियाँ भी शामिल हैं।

    इन कविताओं की खासियत यह है कि ये अपने समय की सच्चाई को उसकी पूरी तीव्रता के साथ सामने लाने का प्रयास करती हैं। आज का वह समय, जहाँ अतीत के प्रति एक तरह की उपेक्षा और अविश्वास बढ़ता जा रहा है, वहाँ ये कविताएँ स्मृति और अनुभव की अहमियत को फिर से स्थापित करती हैं। यह प्रवृत्ति उन अपरिपक्व और सतही दृष्टियों पर भी प्रश्न उठाती है जो इतिहास और परंपरा को सहज ही नकार देती हैं।

    कवि की दृष्टि केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक है। उनके काव्य-जगत में युद्ध, हिंसा और भय से उपजी अनिश्चितता की छायाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। मनुष्य की बढ़ती अमानवीयता और संवेदनहीनता को वे अत्यंत निकटता से देखते हैं और उसे शब्दों में रूपांतरित करते हैं, जिससे यह हमारे समय का एक सजीव प्रतिबिंब बन जाता है—ऐसा प्रतिबिंब जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

    गांधी जैसी उपस्थिति को आज के समय में याद करना भी कई बार एक साहसिक कार्य जैसा प्रतीत होता है, लेकिन कवि अपनी अभिव्यक्ति में निर्भीक है। वह अपने समय को बिना किसी झिझक के दर्ज करता है, जिससे उसकी उपस्थिति और अधिक प्रामाणिक हो जाती है।

    अशोक वाजपेयी की ये कविताएँ शोर नहीं, बल्कि उस भोर की तरह हैं जो अंधकार के बीच आशा की एक किरण जगाती हैं—और मनुष्य को जीते रहने का साहस देती हैं।

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  15. Om Nishchal says:
    1 month ago

    अपने समय के संहार और घृणा, पछतावे और पराजय बोध के – से माहौल में रची कविताएं अंतःकरण का निर्वचन है। जिस संसार में हम रहते हैं उसे सहते हुए कितने क्षुब्ध रहते हैं इन क्षुब्धताओं का पश्चाताप भरा कथन हमें दिला देता है। कठिन है यह स्वीकार करना की सच्चाई अब कविता में बची है। संसार में तो इसकी गुंजाइश नहीं है। वहां तो सारा स्थान घृणा द्वेष लोभ हिंसा उठापटक और तिकड़मों ने घेर रखा है।

    सुचिंतित कविताएं।

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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