| अश्विनी कुमार की कविताएँ |
(1)
युद्ध में रजनीगंधा
युद्ध कहीं भी होता हो,
मुझे अपने ही शरीर से राख की गंध आती है.
क्या प्रेम भी ऐसा ही होता है?
उसकी केसर-सी आँखें रात भर जलती रहती हैं,
उसके हिंसक चुम्बनों से मैं घायल होता जाता हूँ,
और देखता हूँ
मेरे फूलदान में रखी रजनीगंधा
काँटेदार तार में बदल जाती है,
जो हम दोनों को लपेट लेती है,
मानो युद्ध के कैदियों की तरह. धीरे-धीरे मैं
पुराने नास्तिक शहरों के खंडहर में बदल जाता हूँ.
(2)
देश भी ग्रहों का खेल है
अक्सर मैं बारिश में, या जब बर्फ गिरती है,
टहलने निकल जाता हूँ,
घर लौटते-लौटते या तो पूरा भीग चुका होता हूँ,
या मेरा शरीर ठंड से नीला पड़ जाता है,
कभी-कभी लगता है जैसे मेरे शरीर को
इस तरह की पीड़ा, इस हिंसा की आदत पड़ गई है.
घर के लोग भी कहते हैं
शायद जन्म के समय बनी कुंडली में
ग्रहों का कुछ ऐसा खेल रहा होगा,
मेरे मौसा, जो पड़ोसन के इश्क में मुसलमान हो गए थे,
मेरी माँ को बताते कि जिन्न-जिन्नातों का चक्कर है,
तभी तो मैं रात में बैताल की कहानियाँ पढ़ता रहता हूँ,
अब सोचता हूँ, क्यों मेरे पिता हमेशा
जीभ के नीचे नमक रखकर मेरी कुंडली पढ़ते रहते थे
समय के साथ यह आदत मुझे भी लग गई है.
आजकल, घर बैठे जाने कैसे,
मैं ताकतवर लोगों की कुंडलियाँ बनाने लगा हूँ,
और लगता है पूरा देश किसी भूत-प्रेत के साए में है.

(3)
कम से कम पानी के साथ रहूँ
इस शहर ने मुझे सिखाया
अपने शरीर की तहों में छुपाना
धीरे-धीरे गायब होता पतझर और सरहदों की छत पर डूबता चाँद.
मेरी भाषा में कुछ ऐसा है जो अनुवाद नहीं होता.
यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं.
अक्सर मैं जोड़ता हूँ
अपनी स्मृति के टुकड़ों को, अपने कमरे में,
जब पड़ोसी व्यस्त होते हैं.
कभी-कभी सोचता हूँ कि चला जाऊँ द्वीपों पर
कम से कम पानी के साथ रहूँ,
सुनता रहूँ जो बचा है: एक लय, एक फुसफुसाहट,
कुछ ऐसा जो धुलकर भी नहीं मिटता,
क्योंकि मुझे प्रेम करने का कोई और तरीका नहीं आता…
(4)
दोपहर का अख़बार
मैं अख़बार दोपहर में पढ़ता हूँ,
सुबह की ख़बरों में कुछ ख़ास नहीं होता
ज़्यादा से ज़्यादा यही कि संसद आज भी नहीं चली,
या पड़ोसी देशों में सत्ता परिवर्तन हो गया है.
लोग कहते हैं, इमरजेंसी के दिनों में
सुबह का अख़बार कोई नहीं पढ़ता था.
दोपहर का अख़बार अक्सर
मैं सिरहाने रखकर पढ़ता हूँ,
बचपन की स्मृतियों में खो जाता हूँ
बाबूजी के सिरहाने रखा पानदान याद आता है. अक्सर माँ दोपहर में
भोजन के बाद पान और कसैली खाती थीं.
बाबूजी को औरतों का पान खाना पसंद नहीं था,
कॉलेज जाने के बाद मुझे पता चला
बाबूजी माँ को रात में पान खाने से मना नहीं करते थे.
शायद इसी वजह से सुबह मुझे बाबूजी के कुर्ते और तकियों पर
पान के दाग नज़र आते थे.
कभी-कभी तो गाढ़ी दुपहरिया में जब वह पास नहीं होती
मैं बाँहों में अख़बार घेरकर पढ़ता हूँ
जैसे उसे बिना देखे, बिना छुए,
उससे प्रेम करता हूँ, और उसके देह की गंध ओसारे में सुस्ताने लगती है.
दोपहर के अख़बार में युद्ध की ख़बरें नहीं होतीं,
सब कुछ इतना साफ़ दिखता है, जैसे पृथ्वी को झाड़-पोंछकर कर
फिर से रख दिया गया हो, शायद इसलिए जब स्मृतियाँ भी समाप्त हो जाती हैं,
अख़बार बच जाते हैं हमारे पूर्वजों की प्रार्थनाओं की तरह.
(5)
युद्ध में सब कुछ समाप्त नहीं होता…
आजकल मैं घर की खिड़कियों को बंद नहीं करता
इंतज़ार करता रहता हूँ रोशनी की आख़िरी चमक का.
सोते वक़्त उसका नाम एक घाव की तरह
मेरे होंठों से फुसफुसाता है,
जैसे एक औरत लौटती हो घर रक्त में डूबे दिन की तरह.
उसकी तलाश में फौजियों का एक जत्था
मेरे घर में आता है,
मुझे नींद से जगा कर
मेरी जेबों में उसकी पुरानी तस्वीरें ढूँढ़ता है.
बहुत देर तक मेरे शरीर में उसे तलाशते रहते हैं
मुझे याद नहीं
कैसे मेरे पड़ोसी रातों-रात ग़ायब हो गए.
सुना है, युद्ध में सब कुछ समाप्त नहीं होता
पत्थरों में उगने लगते हैं जंग लगे जंगली फूल,
और हम अपनी भाषा, अपनी स्मृतियों में
धीरे-धीरे बचे रह जाते हैं.
(6)
उसकी तेहरान की घड़ी
उन दिनों
मैं घड़ी की दुकान में काम करता था,
हर रोज़ घर से निकलता—एक बैग में अपने घर का नक्शा,
और बाबूजी का पुराना चश्मा लेकर.
हर दिन वो आती थी मेरी दुकान, नीली सैंडल पहने,
और मैरून लिपस्टिक उसके होंठों पर हल्की-सी थरथराती रहती.
वो तरह-तरह की घड़ियों के बारे में पूछती,
पर असल में देखती उनके डायल को—जैसे कोई आईना हो,
उसके अतीत का, उसकी भाषा का, उसकी किसी खोई हुई दुनिया का.
हर बार जाने से पहले वो एक ही सवाल पूछती
“तुम्हारे पास तेहरान की घड़ी नहीं है?
जिसका रंग मेरी लिपस्टिक जैसा हो, और जो मछली की आँख-सी चमकती दिखे…”
और मैं घर लौटकर देर तक पुराने कैटलॉग में ढूंढता रहता उसकी घड़ी. कई घड़ियाँ मिलतीं—पुरानी, अनोखी, खूबसूरत,
पर उसकी पसंद की एक भी नहीं.
कुछ दिनों से मैं दुकान नहीं गया.
शहर का रंग भी बदल गया था—लोग बाज़ार कम आने लगे थे,
जैसे किसी युद्ध की आशंका में.
और वो भी कई दिनों से नहीं दिखी—शायद वो तेहरान चली गई हो.
आजकल जब भी मैं कोई घड़ी पहनता हूँ,
वो धीरे से कुछ फुसफुसाती है अपनी ही भाषा में…
मैं उसे याद करता हूँ,
पर हर बार समय की सुइयाँ मेरी आँखों को थोड़ा और धुंधला कर देती हैं.




अच्छी कविताएं
आपके वाल से अनेक कवियों की
कविताएं पढ़ने को मिल जाती है
क्या यह कम है.
युद्ध पर यह विरल कविताएँ। कविता में अपनी एक खास पहचान रख रही है।
अच्छी कविताएँ हैं। एक परिपक्व (mature) दृष्टि इनमें साफ़ नज़र आती है। वह इन्हें इधर लिखी जाने वाली बहुत सी कविताओं से अलगाती है।
Wonderful poems, अभी पहली दो से गुजरा हूँ, स्वाद जीभ से आत्मा में उतर रहा, बाकी धीरे धीरे, क्या contrast है कविता में युद्ध और romance का।