| कहानी
बख़्शिश |
बेंचनी बुआ बरसों बाद नैहर आ रही थीं. स्मृतियों ने उनसे ऐसी दगाबाजी की थी कि वे बरसों तक इधर पलटी नहीं थीं जैसे स्मृतियों को सुहाग के जोड़े की तरह तह करके किसी खास मकसद से अगली पीढ़ी के लिए पेटी-बक्से के हवाले किया गया हो. बुआ का कोई और नाम भी था मगर वे बेंचनी के नाम से पुकारी जाती. बड़े-बुजुर्ग उनके बारे में जब भी अफसोस जताने के अंदाज में बताते तो अबोध बच्चों को किस्से-कहानियों से ज्यादा उनके नाम का रहस्य कौंधता. कोई पूछता- ‘बुआ बचपने में बेंचा गइली का जे बेंचनी नाम पड़ल.’
‘बेंचइली त ना बाकिर बचपने से दोसरा घरे पोसइली.’
बुआ के नैहर वाले गर्द-धूल झाड़कर जब भी स्मृतियों को ताजी करते तो उन्हें कुछ बातें कचोट जातीं. मगर अगले ही पल उनकी भौंहें तन जातीं कि जइसन करनी ओइसन भरनी. वे बुआ की तरफ से कठोर हो जाते लेकिन नैहर से जुड़ा कुछ रिवाज था जो उन्हें खींच लाया था. जैसा रिवाज था उसमें रूह की मुक्ति के लिए अपनी माँ के जीते जी उनसे बख़्शिश लेने आना पड़ता. बुआ ने अपनी माँ को अपने आने का गुपचुप संदेशा भेज दिया था. माँ-बेटी दोनों को बगल वाले टोले में एक विश्वस्त के घर पर भेंट होने की जगह नियत की गई थी.
बुआ अपने बचपन की दुर्दशा को याद करके भावुक होती रहती, कभी-कभी इतनी हताश हो जाती कि उन्हें इस भरी दुनिया में उनका कोई नामलेवा नहीं दिखता. उनकी व्यथा अल्लाह से रहम की गुहार लगाने लगती- ‘अल्लाह दुश्मन-मुदई को भी वैसा दिन न दिखाए.’
बुआ के पिता सुलमान गांजे के धंधे से जुड़े थे. वे विक्रेताओं तक गांजा पहुँचाते थे. गैरकानूनी और जोखिम भरा काम होने से उन्हें मजदूरों से दोगुनी-तिगुनी मजदूरी मिल जाती. गांजे की माँग घटने-बढ़ने से मजदूरी घटती-बढ़ती रहती. शुभचिंतक उन्हें समय-समय पर इस धंधे को छोड़ने की चेतावनी देते तो झगड़ा होने पर विरोधी जेल में चक्की पिसवाने की धमकी. धमकियाँ हर बार वैसी ही होतीं जो झगड़े में अक्सर देख लेने की औपचारिकता जैसी पूरी की जाती हैं. धमकाने वाले धमका कर अपने काम में लग जाते और धमकाए जाने वाला भी उससे बेपरवाह होकर उसी आजीविका में जूत जाता. गांजे की आजीविका उनसे ताउम्र न छूटने की मानसिकता के लिए सभी तैयार रहते कि भला बूढ़ा बैल अपनी हरवाही भूलेगा ?
एक दिन वे गांजा पहुँचाने कहीं जा रहे थे. उनके पास कपड़े और पॉलिथिन की कई तहों में लपेटा गया एक किलोग्राम गांजा था. गांजे के साथ एक समस्या ये होती कि उसकी महक शरीर से निकलने वाली अदृश्य आत्मा की तरह लाख जतन के बाद भी तहों से बाहर आ जाती. इसके समाधान के लिए उन्होंने सेंट और इत्र के सुगंध से गांजे को छिपाने की तरकीब अपनायी थी. उन्हें ये तरकीब शादी-विवाह या पर्व-त्यौहार में लोगों को सेंट-इत्र लगाकर अपनी आजीविका चलाने वाले इत्रकारों को देखकर सूझी थी. उन्हें गांजा पहुँचाने के लिए जब भी रेलगाड़ी की सवारी करनी पड़ती, वे सुगंधों से लदे हुए पूरी तरह से इत्रकार का भेष अपना लेते. आँखों में सुरमा, मुँह में पान की गिलोरी और दोनों कानों के ऊपरी हिस्सों में सुगंधों में डूबी हुए रूई की फाहें. इत्रकार की ये खासियत होती है कि वह नहीं-नहीं की रट लगाने वाले के कान में भी इत्र में डूबी रूई की फाहें खोंस दे और हल्की मुस्कान उछाल कर अपनी बख़्शिश पा ले, जो लोग सेंट-इत्र से परहेज का बहाना बनाएं उनकी आँखों में सुरमा फेर दे.
सुलमान जब भी रेलगाड़ी में होते तो सहयात्रियों से सेंट-इत्र का बखान करते नहीं अघाते. वे अपने हाव-भाव से लेकर एक-एक शब्द से किसी इत्रकार का तिलिस्म रचने लगते. अपनी यात्रा का मकसद हर बार किसी शादी-ब्याह में सट्टा-बैना पर जाना बताने से नहीं चूकते. उन्हें अपने दादा-परदादा के जमाने में फलां-फलां शुभ अवसरों पर इत्र की उपयोगिता गिनाना जरूरी लगता—‘इत्र तो हमारे बाप-दादा के जमाने में होता था. मजाल है कि उसके बिना कोई रस्म पूरा हो जाए, पान से लेकर पुलाव तक में न पड़े तो काहे का मजा ? नेग देने में भी कोई कंजूसी नहीं. अब तो लोग शादी-बियाह में भी नखरे दिखाने लगे हैं. लग रहा कि अब तो सिर्फ मैय्यत के लिए ही इत्र बचेगा.’
इस बार जब वे स्टेशन पहुँचे तो यात्रियों की भीड़ में एकाएक गामा की एक झलक मिली. पुरानी अदावतों ने पहली बार उन्हें आशंकित किया. जिनसे भी अदावतें थीं गांजा ले जाने के दौरान उनमें से कोई भी टकरा जाता तो शायद चित्त की यही दशा होती. लेकिन इस बार की आशंका बड़ी थी क्योंकि गामा अपने इंतकामी स्वभाव के लिए पूरे इलाके में कुख्यात था. दूसरे ही पल वे आशामय भ्रम में जी कड़ा करने लगे कि शायद गामा कहीं जा रहा हो. लेकिन गामा का व्यक्तित्व तो यात्रा विरोधी है, फिर वह स्टेशन क्यों आने लगा ? गाड़ियों में बैठते ही उल्टियाँ करने वाला गामा उम्र का चार दशक पार करने के बाद भी गाँव की गिनी-चुनी बारातों में ही शामिल हो पाया था. परदेश से तो उसका वैर ही था जो पड़ोसियों के साथ पूर्वोत्तर राज्यों में आज तक कमाने नहीं गया था. ऐसे डोडोफोबिया वाला गामा आखिर स्टेशन कैसे पहुँच गया ? वे गामा से खुदको बचते-बचाते रेलगाड़ी में छिपने लगे. उन्हें ऐसा महसूस होने लगा कि गामा किसी को ढूँढ रहा हो.
ट्रेन हवा से बातें करती. हर स्टेशन पर शंका गहराती. कोई आगंतुक बगल में बैठ जाता तो शंका तरह-तरह का आकार लेने लगती. गंतव्य तक पहुँचने में अभी दो-चार घंटे की देर थी. सुलमान अपने इत्रकार होने के अभिनय की बारीकियाँ भूलने लगे थे जैसे अभिनय से पहले ही मंच के पीछे का रिहर्सल देखकर दर्शक निरुत्साहित हो गए हों. इसी बीच पुलिस का दारोगा चार जवानों के साथ यात्री की तरह चढ़ा और किसी गुप्त सूचना जैसे सीधे निशानदेही कर ली. उसने गालियाँ बकते हुए सुलमान को हथकड़ी पहला दी. सुलमान सकते में आ गए. घबराहट ने पसीने से सराबोर कर दिया. अगल-बगल की अफरा-तफरी जैसी स्थिति ने लोगों की निगाहों में बर्छी सी धार दे दी थी.
रात चढ़ी हुई थी. कुछ यात्री सोए पड़े थे तो कुछ जगह के अभाव में ऊँघ रहे थे. पूरी बॉगी में अगर कोई सतर्क था तो वह पुलिस थी ताकि अपराधी चकमा देकर फरार न हो पाए. स्टेशन आते ही यह सतर्कता बढ़ जाती लेकिन ट्रेन रफ्तार पकड़ती तो पुलिस भी थोड़ी बेफिक्र हो जाती. चलती ट्रेन में सुलमान ने पेशाब जाने का बहाना बनाया. दारोगा जी शायद अपनी पदोन्नति के सपने में खोए हुए थे या पूरी तरह आश्वस्त थे कि चलती ट्रेन में अपराधी भागने का दुस्साहस नहीं कर सकता. उन्होंने दो जवानों के साथ सुलमान को शौचालय जाने दिया. भीड़ इतनी थी कि देह से देह छिल जाए. भीड़ को डाँटते-फटकारते आगे-पीछे से घेरे जवान उन्हें शौचालय से थोड़ी दूर ही पहुँचाये थे कि शौचालय से सटे दरवाजे से उन्होंने छलांग लगा दी. छलांग लगाने से पहले उन्होंने आगे वाले जवान को जोर का धक्का मारा था. उसके मुँह से कोई भद्दी सी गाली निकली थी. उसने जोर से चीखा- ‘बहेनचो…धत् साला ! भाग गया !’
चेनपुलिंग करके रोकते-रोकते ट्रेन एकाध किलोमीटर तक घिसट गई थी. पुलिस टॉर्च जलाती हुइ दौड़ी. वह सोचती रही कि मूर्ख आदमी था, बेचारा बेमौत मारा गया. शायद जेल के डर से आत्महत्या की हो. लेकिन चमत्कार ये था कि सुलमान की लाश कभी मिली ही नहीं. पुलिस रिकॉर्ड में भी उनके फरार होने का ही मामला दर्ज था. इस पूरी वारदात से जुड़ा आठवां अजूबा ये था कि पुलिस रिकॉर्ड में ये भी दर्ज था कि सुलमान जब्त गांजा छिनकर फरार हो गए थे.
पुलिस के इस तर्क ने कुछ लोगों को सेंत के कयास लगाने की गुंजाइश दे दी थी. शक की सुई बार-बार पुलिस पर जाती. कोई कहता- ‘गांजे का भैलू तो किसी से छिपा नहीं है, हमेसा आसमान छूता है. पुलिस के मन में पाप समा गया होगा. गांजा डकारने के लिए सुलमान को मारकर किसी सुनसान जगह गाड़-तोप दिया होगा कि लास भी न मिले.’
‘कोई पुलिस से भागेगा भी तो जान बचाकर भागेगा कि गांजा छिनकर भागेगा, रहेगा जी तब ना खायेगा घी. बताइए पुलिस कितनी बे-सिरपैर की बात करती है.’ – कोई प्रतिउत्तर देता.
इधर शौहर से जुड़ी वारदात ने हलीमन को पूरी तरह से चित कर दिया. कुछ दिनों तक तो घर में गाड़ी गई संपत्ति से पेट की आग शांत की जाती रही मगर जिस गाड़ी के पहिए ही टूट गए हों उसे धक्के देकर कितनी दूर घसीटी जा सकती थी. जब तक शौहर थे तब तक तो लोगों में लिहाज था, मुरौवत थी. उनके जाने के बाद लोगों की आँखों का पानी सूख गया था. हलीमन की तीन संतानें थीं. उनमें से सबसे छोटी बेंचनी बुआ तब छह साल की थी, उसके बड़े भाई जफरा का ग्यारहवां साल पूरा होने वाला था और मंझले भाई जुनेदा का आठ साल चल रहा था. दोनों भाई गाँव में किसी का भी काम कर देते तो उन्हें पेट का निवाला मिल जाता. खेती-बाड़ी के समय तो काम मिलना आसान होता मगर बाकी दिनों में मिलना मुश्किल हो जाता. हलीमन खेती-बाड़ी में मजदूरी करती—सोहनी-रोपनी से लेकर गट्ठर-बोझा ढोने तक का काम.
एक दिन हलीमन की देह तपने लगी. दवा-दारू से थोड़ी राहत तो मिली मगर बिना नागा किए बुखार दिन में उतर जाता और रात होते पारा चढ़ने लगता. दो सप्ताह ऐसे ही चला. दवा-दारू के नाम पर जब तब पैरासिटामोल की गोली खिला दी जाती. दिन में बुखार उतर जाता तो चक्कर खाती देह को आराम देने के बजाए किसी काम में जूतना पड़ता. बुखार धीरे-धीरे कालाजार में बदल गया. उन दिनों कालाजार का काफी खौफ था. हलीमन ने निढाल होकर बिस्तर पकड़ ली थी. जफरा और जुनेदा आसपास के गाँवों में काम की खोज के लिए जाते. रोग-शैय्या पर पड़ी हलीमन को वक्त-बेवक्त उसके सिरहाने पहले से मौजूद थाली में, कोई-न-कोई भोजन उड़ेल जाता. कुशल-क्षेम की कामना के साथ वह अपने दिनचर्या में लौट जाता. बेंचनी माँ को परोसे गए भोजन से थोड़ा-बहुत खा लेती तो कभी फांके जैसी नौबत आ जाती. फांके की स्थिति में वह मूज से बनी डलिया उठाती और गोंसार की तरफ निकल पड़ती. वहाँ गाँवभर की औरतें कच्चा अनाज भूनने आती थीं. वह गोंसार के बगल में डलिया आगे रखकर बैठ जाती और अनाज भूनने वाली औरतों की तरफ टुकुर-टुकुर देखती. लगता कि उसकी आँखों में जैसे लोर इकट्ठा होता हो और कभी भी बरसाती बादल की तरह झर-झर बरस पड़ेगा. औरतें उस पर तरस खाने लगतीं- ‘आहि रे दादा ! महतारी के बिस्तर पकड़े से पहिले केतना फुदके ! बेचारी पेट के फेर में गोंसार अगोरले रहेले, हँसल-खेलल सब भुला गईल बिया.’
अनाज भूनकर जाने वाली औरतें उसकी डलिया में खाने भर के अनाज डाल देतीं. अनाज अक्सर उसकी खुराक से ज्यादा होते. वह बचे हुए अनाज को माँ के सिरहाने वाली थाली में पलट देती और देने वाले का नाम एक सुर में गिनाने लगती. माँ के पास उन सभी के लिए रटा-रटाया एक ही जवाब होता- ‘अल्लाह उन्हें जन्नत दें.’ उनके हाथ अचेत जैसी स्थिति में भी दुआओं में ऊपर उठ जाते.
पहले माँ उसे किसी का दिया-छुआ खाने से चेताती थी. जो औरतें टोने-टोटके के लिए बदनाम की गई थीं वे भी माँ के सिरहाने वाली थाली में खाना पलट देतीं जिसे खाने से अब माँ को कोई परहेज नहीं होता. तब तो बेंचनी किसी का भी दिया खा सकती थी. उनका नाम भी गिना सकती थी.
शाम में काम से लौटने पर उसके दोनों भाई झाड़-बुहार करते. जूठी थाली को उनमें से कोई भी धो देता. थाली धोने पर खाना देने वाले का नाम पूछने की याद आती. दाताओं के नाम हर बार बदले हुए होते. जिस दिन एक से अधिक दाता होते उस दिन सिरहाने के अलावा किसी दूसरी थाली में भी बाकी लोगों के लिए भोजन ढँका होता. लोगों में यह आम चर्चा थी कि कालाजार में जिसने इतने दिनों तक बिस्तर पकड़ ली उसे वैद्य-हकीम तो क्या पीर-औलिया भी नहीं बचा सकते. ये सब याद कर-करके तीनों संतान माँ के भावी खालीपन के लिए उनके सिरहाने जाकर रोते. माँ को शायद अपनी मृत्यु स्पष्ट दिखने लगी थी. कभी-कभी उसे अपनी रूह कब्जा करने मलिक-अल-मौत आते दिखाई देते. वह अंधेरे में अक्सर उनकी परछाई देखकर बड़बड़ाती- ‘टुअर-टापर बचवन के छोड़ के कईसे जाईं.’ फिर वह स्मृतिभ्रम से बाहर आती तो अपने बच्चों को नसीहतें देने लगती- ‘आपस में लड़िय-झगड़िय लो मत. एक-दूसरा के साथे रहियऽ लो. जेकर केहू ना होला ओकर ऊपरवाला होखेलन.’
बेंचनी को कोई भी दुलार करता तो वह फफक पड़ती शायद उसे वहम होने लगा हो कि वह अनाथ हो चुकी है. कोई उसे खाने को देता तो वह अनमना होकर कुछ खाती और कुछ फैला देती. लोगों का दुलार उसे फफकने के लिए उकसाता. बच्चों के साथ खेलने पर वे भी उसे जता देते कि उसकी माँ अब नहीं बचेगी. वह बीच-बीच में खेल भूलकर रोने बैठ जाती. उसके साथी खेल छोड़कर उसे मनाने के लिए घेर लेते.
एक दिन वह ऐसे ही रो रही थी. बगल के गाँव के नमीस मियाँ वहाँ से गुजर रहे थे. वे लकड़ियों के ठेकेदार थे. इस रुलाई ने उन्हें द्रवित कर दिया. वे बार-बार उधर खींचे जाने लगे. रोने का कारण पूछने पर बेंचनी जवाब में सिर्फ रोए जाती. बेंचनी उस दिन ऐसे रोयी थी जैसे अपना बरसों का संताप दूर करने के लिए समुद्र के आखिरी छोर पर खड़े फरिश्ते तक अपना दुखड़ा पहुँचा दे. आस-पास के लोगों से उन्हें उसकी सारी राम कहानी पता चल गई. उन्होंने बड़े दुलार से बेंचनी का हाथ थामा. उसे किया जाने वाला दुलार पहले उसकी रुलायी भड़का देता था, मगर इस बार उसने उसे सहेज लिया. उसके माथे पर हाथ फेरकर चुप कराने की वात्सलता ने उसके भरोसे को जीत लिया. वह ढेर सारे मंसूबों के साथ उनके पीछे-पीछे चल पड़ी. उन्होंने लोगों से बोल दिया- ‘इनका घरे बता दिहऽ लो. अनाज-पानी के कवनो दुख नइखे, हमरा घरे पोसा जइहन. कवनो लड़िका त हई ना जे बढ़ भइला पर कमा के दिहें. लड़िकी हई, सयान होईहें त आच्छा घर-दुवार देख के सादी-बियाह करा देम.’
नमीस मियाँ ने काफी दौड़-भाग की, रूपये-पैसे से लेकर देह-जांगर से किसी आत्मीय की तरह सेवा-समर्पण दिखाए तब जाकर अर्द्धमृत देह में जान वापस लौटी. हलीमन मरते-मरते जिंदा हो गई. वह बिस्तर से ऐसे खड़ी हुई जैसे उसे बिखरे हुए घर को फिर से व्यवस्थित करने की मियाद मिली हो.
यह टोला गरीब पसमांदा जातियों का था और बगल वाला टोला अशराफों का. उन दिनों इन गरीब घरों की लड़कियाँ अशराफों के यहाँ चौका-बर्तन करने जाती थीं. उनमें से कई तो वहीं रहकर चौका-बर्तन करतीं और कुछ दिनों पर घरवालों से मिलने आ जातीं. दोनों टोलों का बगीचा एक था, मस्जिद-मदरसा-ईदगाह-ईमामबाड़ा सब एक ही, खेती-बाड़ी भी एक-दूसरे से सटी हुई, तो घरवालों से उनकी भेंट कभी भी हो जाती. गाय-बकरी डोगते हुए, गट्ठर-पुवाल ढोते हुए, शुभ अवसरों पर बैना-मिठाई बाँटते हुए भी उनकी आपस में भेंट हो जाती. वे मायके आयी बिटिया की तरह एक-दूसरे से मिलते और विदाई की औपचारिकता पूरी किए बिना अपने-अपने ठिकाने लौट जाते. दोनों के दुख-सुख साझे होते, परिवार में घटित दुख-सुख जैसे. इसलिए बेंचनी का नमीस मियाँ के यहाँ पलना उसके परिवार वालों को नहीं अखरा.
नमीस मियाँ के टोला जाने के लिए एक बड़े चौंर को पार करना पड़ता. बरसात के दिनों में जलभराव से इस टोले से एक तरह का संपर्क टूटने जैसी स्थिति होती, इसलिए बेंचनी का वहाँ होना उसके परिवार से संपर्क टूटने जैसा था. इसके बावजूद उसके घर वाले उसकी तरफ से निश्चिंत हो गए थे कि अच्छा खा-पहन रही, शादी-ब्याह भी किसी अच्छे घर-बार में हो ही जाएगा.
दोनों भाई बड़े हो गए थे. जफरा की शादी की बात चलने लगी थी. इस बीच पट्टीदार और पास-पड़ोस में ब्याह कर कई भौजाइयाँ आ गई थीं. बेंचनी के बारे में जो भी सुनती उसकी जिज्ञासा बढ़ने लगती. वे मजाक-मजाक में भाइयों से उसे वापस लाने को लेकर गंभीर हो उठतीं, कभी उन्हें छेड़तीं तो कभी लजवाने लगतीं. भौजाइयाँ बातों का सिरा ऐसे घुमातीं कि जवान बहन का दूसरे के घर पलने में लज्जा आए, परिवार की प्रतिष्ठा जाती दिखे. जो लोग इस गाँव के थे वे तो बेंचनी को उसी रूप में देखने को आदी हो चुके थे लेकिन जिन भौजाइयों के नैहर में ऐसी चलन नहीं थी वे जब-तब भाइयों को छेड़तीं-कोंचतीं, बेंचनी के लिए आहत होतीं.
आखिरकार लाज ने कुनमुनाकर आँखें खोल दी. भौजाइयों की साध पूरी होने की बारी आ गई. जफरा और जुनेदा अपनी बहन को हमेशा के लिए वापस लाने को तैयार हो गए. हलीमन बेटी की वापसी को लेकर अचानक से उद्विग्न हो उठी.
बेंचनी को वापस लाने के नाम पर नमीस मियाँ और जफरा के बीच विवाद बढ़ गया. यह विवाद बेंचनी पर दावे को लेकर था कि उस पर किसका हक बनता है जैसे कृष्ण को लेकर उसे जन्म देने वाले और पालने वाले आपस में उलझ पड़े हों. नमीस मियाँ खौलते पानी जैसे उबल पड़े- ‘आज बहन की याद आयी ? अब तक कहाँ सोये थे ? इतने दिन तक पाल-पोस दिया तो बाकी गुजर भी हो जाएगी.’
‘किसी की बहन-बेटी चुरा लेने से वह अपनी हो जाएगी ?’ जफरा भी तैश में था. जुनेदा केवल बीच-बचाव करता रहा.
‘फरज निभाए बिना ही बेटी-बहन पर हक हो जाएगा ? किया-धरा मैं और हक जताए दूसरा.’
‘बहुत दासी बन ली यहाँ, इसे साथ लिए बिना वापस नहीं लौटेंगे.’
‘हाँ तो इसे बहुत महल का सुख मिला था ना, जो मड़ई में लाकर पटक दिया, रानी से नोकरानी बना दिया.’
लोगों की भीड़ लगी थी. उस अनौपचारिक पंचायत का पंच और गवाह कोई भी बना दिया जाता. दोनों में से किसी की भी दलील पर जो भी हामी भर दे वही उस पक्ष का गवाह मान लिया जाता. इस तू-तू मैं-मैं से बेहतर था कि बेंचनी की राय ली जाए. उसकी राय ही उसका भविष्य और उसे अपना अभिभावक मानने के विकल्प पर अंतिम मुहर लगाने वाली थी. दोनों पक्षों ने उसकी राय पर अपने स्वाभिमान का दाव लगा दिया था. जो पक्ष बैरंग लौटता भरी सभा में उसकी नाक कट जाती. सभी की एकटक निगाहें बेंचनी पर टिक गईं. सभी की साँसें उसकी हाँ-ना पर थम गईं जैसे आई.सी.यू. में भर्ती मरीज की अनियंत्रित हृदयगति मापने वाले मोनिटर पर किसी आत्मीय की टकटकी बंधी रहती है.
‘बताओ साथ चलना है कि नहीं ?’ जफरा की तरफ से सवाल उछला था. आवाज थोड़ी ऊँची थी. नमीस मियाँ ऊँची आवाज का अर्थ डरा-धमकाकर साथ ले जाना समझकर बिगड़ गए. अब बेंचनी की राय जानने के लिए किसी बुजुर्ग को पंच की पदवी दी गई. बुजुर्ग ने उस तनाव की स्थिति में भी दुलार से पूछा- ‘किसके साथ रहना है बबुनी ?’
बेंचनी पहले तो सिर नीचे झुकाए रही, पैर के अंगूठे मिट्टी में धंसाती रही. बुजुर्ग ने कई बार प्रश्न दुहराया. प्रश्न टालने का कोई विकल्प नहीं होने से जैसे वह चारो तरफ से घिर गई हो. वह अपनी राय देने से पहले ही सुबकने लगी. काँपते होंठों से उसने अपनी चुप्पी तोड़ी- ‘बाबा के पास.’ घुटने तक अपनी ऊँचाई बताते हुए सिर के ऊपर हाथ रखकर वर्तमान ऊँचाई बताने का संकेत की- ‘इतनी छोटी से यहीं इतनी बड़ी हुई. यहीं से कबर में चली जाऊँगी.’ इतना कहते ही वह फफक पड़ी. उसने आगे का अर्थ उसी रुलाई पर छोड़ दिया. उसकी जो भी व्याख्या की जाए, पंच का विवेक जाने. उसकी रूलाई और आँसू ने जनमत को भाइयों के खिलाफ कर दिया. तय हो गया कि बेंचनी नमीस मियाँ के यहाँ ही रहेगी. जफरा ने भरी सभा में इस अपमान को पत्थर की लकीर की तरह खींच दी- ‘आज के बाद मियाँटोली में पाँव पड़ गया तो पाँव काट दूँगा.’
धमकी खाए पाँव ना तो कभी मियाँटोली में पड़े और ना उन्हें काटने की नौबत आयी. पत्थर की जो लकीर खींची गई थी उसे किसी ने मिटाने की पहल नहीं की. बेंचनी वहीं से ब्याह कर अपने ससुराल चली गई. बेंचनी आहत थी कि उसकी शादी में उसके घर से कोई नहीं आया. उसे बीच-बीच में अपनों की याद तो आती मगर घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों के कारण वह उधर से जल्दी ही उबर जाती.
उसके ससुराल में, ब्याहित बेटियाँ जब भी अपनी माँ से दूध बख्शवाने आतीं तो बेंचनी को भी अपनी माँ की याद आती. वह खुद को अभागिन मानकर आहत होने लगती कि उसकी किस्मत इतनी फूटी हुई क्यों है ? वह आखिरत में क्या जवाब देगी ? दूध बख्शवाने से संबंधित यह मान्यता थी कि लाख रोजा-नमाज करो, खैरात-जकात, उमरा-हज कर लो; जब तक माँ बच्चों को अपना दूध पिलाना नहीं बख्शेगी तब तक वे जन्नत में नहीं जा सकते. लोगों की शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति के अनुसार माँ के दूध से संबंधित और भी तरह-तरह की मान्यताएँ थीं. दूध बख्शवाने की बात जब कभी छिड़ती तो बेंचनी के लिए पड़ोसी औरतों की नसीहतें भी होतीं. वे उसे दूध बख्शवाने की तरकीब सूझाने लगतीं-
‘नया कपड़ा पहना देना, कुछ पर-पकवान खिला देना और जितना बन पड़े हाथ में रूपये-पैसे दे देना. महतारी का जी कितना भी काठ का होगा पसीज जाएगा.’
फिर वे खुदके दूध बख्शवाने का किस्सा, अपनी माँ को दिए जाने वाले उपहार का बखान करना नहीं भूलतीं.
माँ अब बूढ़ी होने लगी थी. बेंचनी की उम्र भी अब बेंचनी बुआ के संबोधन जितनी हो चली थी. दिन-प्रतिदिन उसे यही चिंता खाए जाती थी कि कहीं माँ दूध बख्शे बिना मर गई तब कितना अनर्थ हो जाएगा? दीन-दुनिया सब चौपट ! उसी चिंता ने उसे माँ से दूध के बख़्शिश की संदेशा भेजवायी थी. वह अपने घर की दहलीज पर पैर नहीं रख सकती थी जैसे वहाँ पाँव न पड़ने की बरसों पुरानी धमकी ने किसी श्राप का रूप ले लिया हो. उसके रिश्ते की चाचियों-भाभियों में से अधिकांश को संदेशा मिल गई थी. वे चोरी-छिपे वहाँ इकट्ठी होने लगी थीं जहाँ बेंचनी बुआ का आना तय था.
औरतें माँ के कानों में कुछ फुसफुसा जातीं. यह फुसफुसाहट कई आंगनों में भी थी. इसने जुनेदा की पत्नी के कान खड़े कर दिए. उसके कानों में बेंचनी नाम कई बार टकरा गया. उसने अपनी सास से पूछ डाला- ‘बेंचनी कौन है ?’ संयोगगवश छोटी बहू के सामने कभी भी उसका जिक्र नहीं हुआ था.
‘तुम्हारी ननद है.’ सास ने भारी मन से बताया. बेंचनी बुआ से जुड़े मुख्य प्रसंग भी बता दिया.
‘यहीं बुला लाइये. घर के बगल से बिना भेंट किए जाना ठीक नहीं. दस मुँह दस तरह की बातें उड़ेंगी. बोल दीजिएगा कि मुझे मिलना है. मना करें तो भी जिद करके बुला लीजिए.’
‘वो नहीं मानेगी.’
‘जिसने धमकी दी उसके यहाँ न जायें, मेरे घर से तो किसी ने धमकी नहीं दी.’ दोनों भाइयों में बँटवारा हो चुका था. माँ जुनेदा के हिस्से आयी थी. बहू ने इसी आशय से ये बोला.
आखिरकार बेंचनी बुआ बुला लायी गईं. उन्हें मनाकर लाने में काफी दुहाइयाँ देनी पड़ी, काफी हीले-हवाले देने पड़े. वे कसमें भी देनी पड़ी जिसे टूटने पर किसी आत्मीय का मरा मुँह देखने की बददुआ हो. दोनों तरफ आँसुओं के साझे संवाद ने, भीतर की साझी टूटन ने मन का पीर पिघलाया था. बेंचनी बुआ की सूजी हुई आँखें बताती थीं कि वे किसी श्राप से पुरजोर तरीके से जूझती रही थीं, टूटती-बिखरती और बार-बार संभलती रही थीं. ससुराल से पहली बार नैहर आयी बेटी से सास-ससुर के स्वभाव, पति से रानी का सुख मिलने या ना मिलने की यहाँ उत्सुकता नहीं थी बल्कि आंगन में इकट्ठी दर्जनों छलछलायी आँखें भीतरी पीड़ा को जज्ब करती रहीं.
बंधी-बंधायी हिचकियों के बीच-बीच में बुआ के उद्गार फूट पड़ते- ‘इसी घर में पैदा हुई…इसी आँगन में खेली-कूदी…मेरे लिए किसी से पेट भर की रोटी नहीं जूटी…मैं आधे पेट खा ली होती- भूखे पेट पर थाली बाँधकर रात काट ली होती…मेरी बेबसी किसी ने देखी नहीं, सयानी होने के लिए दूसरे ठिकाने फेंक दी गई…एके कोख से तीनों को जनीं तो एक आँख से देखती ना…’
माँ के लिए बुआ ने अनसुलझे प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी जैसे पुराने घाव के मवाद को बाहर आने का चीरा लग गया हो.
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एजाज़ुल हक का जन्म 10 दिसम्बर 1993 को सिवान, बिहार में हुआ. उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से हिन्दी विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है तथा इससे पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय से अनुराग कश्यप के सिनेमा पर केन्द्रित शोध के लिए हिन्दी में एम.फिल. किया है. उनकी कहानियाँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं और उनका एक कहानी-संग्रह ‘अँधेरा कमरा’ प्रकाशित है. साहित्यिक लेखन के लिए उन्हें कृष्ण प्रताप कथा सम्मान और लोकोदय नवलेखन सम्मान से सम्मानित किया गया है. Email- ejazulhaque456@gmail.com |




जीवन की यथार्थ वेदना को बहतरीन पेश किया ।
बढ़िया कहानी, भावबोध की सघनता, परिवेश और तार्किकता…एजाजुल हक को बधाई
लगा जैसे हम किसी टोले के घर का आंखों देखा हाल सुन रहे हैं।
हारी – बीमारी,ग़रीबी और हालात इंसान की तक़दीर पलट देते हैं।
बेंचनी बुआ का इसमें क्या क़ुसूर कि अपने घर से निर्वासन झेलना पड़ा उसे।
दूध बख़्शवाने की प्रथा न होती तो शायद मां – बेटी का मिलन ही न हो पाता।
देशज संवाद, भाषिक प्रवाह, कथ्य का निर्वाह रोचक है।
बेहतरीन कहानी। भाषा का प्रवाह उत्सुक बनाये रखता है। माँ से बख्शीश लेने की प्रथा मालूम न थी।
वही पारंपरिक शैली, लेकिन कथावस्तु वही जिस ओर कम ही लोगों का ध्यान जाता और वे आयाम भी जो नजरों पर तभी चढते जब रचनाकार की संवेदनीयता उन्हें मिले। भाषा शैली में मुहावरे का प्रयोग प्रेमचंद की ओर ले जाते। कथा-संरचना नई और अंत कथ्य को संकेंद्रित करता हुआ–कुल मिलाकर कहानी अपनी सहजता में नवीन और सफल।एजाजुल को बधाई और धन्यवाद। समालोचन को भी ऐसे सतत कार्य के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।🙏
Iकहानी में प्रवाह है।
पर क्या प्रवाह ही कहानी है?
कहानी हस्तक्षेप है, सभ्यता समीक्षा का ताकतवर औज़ार। दर्पण नहीं कि टुकड़ा भर यथार्थ की शक्ल उकेर दे।
औरत की सामाजिक-सांस्कृतिक गुलामी की परंपरा रुदाली करके जी हल्का कर लेने की नहीं। उसे आँसुओं को आग से भरना होगा और सवालिया निशान बन कर व्यवस्था से पूछना होगा कि भंवर का अपनी ही लहर में अट कर भटकना आगे चला नहीं तो कब तक साहित्य बीती लीकों पर बेजान आवाज़ों की जुगाली करता चलेगा ।
हिंदी कहानी मार्मिकता के नाम पर दुखों के हॉट बैलून की सवारी आखिर कब तक करती रहेगी? मार्मिकता में प्रतिरोध का चेतस अंश न हो तो वह भावुकता में लिथड़ी बेचारगी में ढल जाती है। परंपरा साक्षी है कि रोने- चीत्कारें की यही महिमामंडित साज़िशें स्त्री की एजेंसी को अदृश्य करने की युक्तियाँ रही हैं। इक्कीसवीं सदी की कहानी को हर मोर्चे पर जूझना होगा- कथ्य-शिल्प, चरित्र-संवेदना, मिजाज और संदेश।
मार्मिक कहानी ! बेंचनी का परिवार मैंने अपने गाँव में देखा है । ग़ुरबत में बचपन जी ही लेता है ! कहानी तो एक उम्र के बाद ही बनती है ! बेंचनी का दूध बख़्शवाना सफल हुआ या नहीं, यह जान नहीं पाया ! शायद कहानी की आज ऐसी ही विधा है !
अच्छी कहानी! ऐसी बहन, बुआओं की कहानियों से गांव ज्वर, शहर अपार्टमेंट भरे हुए हैं! सबकी अपनी कहानियां हैं! दुःख है, भाग है अपना अपना…
कहानी एक लय में बहती चली जा रही है। बख्शीश कहानी बेहद मार्मिक होने के साथ समाज के उस दर्द को उभारती है जिसमें लड़कियों बहनों , बेटियों को अपने ही घर में अपने होने को तलाश होती है।
कहानी ‘बख़्शिश’ हाशिये पर जीते जीवन की उस करुण, जटिल और लगभग अदृश्य त्रासदी को अत्यंत संयमित भाषा में उजागर करती है, जहाँ गरीबी, पितृसत्ता, सामुदायिक संरचनाएँ और धार्मिक मान्यताएँ मिलकर एक स्त्री के अस्तित्व को निरंतर टुकड़ों में बाँटती रहती हैं। यह कहानी केवल बेंचनी की नहीं, बल्कि उस समाज की भी कथा है जहाँ “पालने” और “जन्म देने” के अधिकार, करुणा और स्वार्थ, बख़्शिश और दमन—सब एक-दूसरे में उलझे हुए हैं। एजाजुल हक लोकभाषा, संवेदनशील विवरण और प्रतीकात्मक घटनाओं के सहारे पीड़ा को चीख नहीं, बल्कि धीमी, गहरी और भीतर तक उतर जाने वाली अनुभूति में बदल देते हैं। माँ का दूध, बख़्शिश, लकीर, धमकी और चुप्पी—ये सब यहाँ सत्ता और असहायता के सांस्कृतिक रूपक बनकर उभरते हैं। कहानी की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह करुणा पैदा करती है, सहानुभूति नहीं माँगती; और पाठक को उस नैतिक असहजता में छोड़ देती है, जहाँ प्रश्नों के उत्तर नहीं, बल्कि प्रश्नों का बोझ ही शेष रह जाता है।
ये खड़ी पाई की जगह डॉट क्यों लगाने लग गए हैं?
पूर्ण विराम के लिए समालोचन डॉट का प्रयोग करता है.
कहानी में “प्रेमचंदिए” प्रवाह और भाषा का जादू तो है लेकिन कहानी के अंत ने निराश किया… दमदार अंत के बिना कहानी कोई पारीवारिक रिपोर्टिंग हो कर रह गई।
बुआ ने अनसुलझे प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी जैसे पुराने घाव के मवाद को बाहर आने का चीरा लग गया हो.
कहानी के इस अन्तिम वाक्य में पूरी कहानी का निचोड़ है । बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करता है।