| बस एक सीट के लिए मनोज कुमार पांडेय |
सतीश इलाहाबाद के सिविल लाइंस के इलाके में एक शॉपिंग मॉल में नौकरी करता है जहाँ उसे दिन के दस बजे पहुँचना होता है. अपनी नौकरी तक पहुँचने के लिए अमूमन उसे तीन बार ऑटो बदलना होता है. हनुमानगंज से चुंगी, चुंगी से सिविल लाइंस हनुमान मन्दिर और हनुमान मन्दिर से शॉपिंग मॉल.
महीना जून का है. अभी तक आसमान से बारिश की एक बूँद भी नहीं टपकी है. अभी बस आग बरस रही है और जिस्मों से पसीना टपक रहा है. शरीर इस अजीब तरह से चिपचिपा हुआ जा रहा है कि सतीश का मन भन्नाया हुआ है. वह एक बेवजह की खीझ से भरा हुआ है.
वह खीझ से भरा हुआ है शायद इसलिए उसे यह मौसम और ग़लीज़ लग रहा है. वह न सिर्फ इसलिए अपनी नौकरी पर जल्दी से पहुँच जाना चाहता है कि उसे देर हो रही है बल्कि इसलिए भी कि शॉपिंग मॉल में एसी लगा हुआ है.
रोज की तरह ही वह सिविल लाइंस हनुमान मन्दिर पहुँच गया है. सामने जो एक ई-रिक्शा है उस पर पीछे की सीधी सीट पर एक वकील साहब बैठा हुआ है. बगल की सीट पर उसकी फाइलों वाली गठरी रखी हुई है.
सतीश वकील साहब से कहता है कि वे अपनी फाइलें उठा लें तो वह बैठ जाए. वकील साहब उसे ऐसे देखता है जैसे कोई कीड़ा-मकोड़ा देख रहा हो और कहता है कि सामने बैठ जाओ.
पहले से ही खीझे हुए सतीश के भीतर खीझ की एक नई लहर उतरती है जिसे दबाते हुए वह कहता है कि आपने ऑटो बुक तो कर नहीं रखी है. वहाँ भी कोई बैठेगा ही अभी. आप फाइल उठा लीजिए, मुझे उल्टा बैठने में अनइजी लगता है.
जवाब में वकील साहब उसे इस तरह घूरता रहता है जैसे सतीश कोई भिखारी हो जो उसे परेशान कर रहा हो.
सतीश जैसे यह बताने के लिए ही कि वह भिखारी न होकर वकील साहब के बराबर का ही व्यक्ति है, ई-रिक्शा में बैठते हुए वकील साहब की फाइलों का गट्ठर उठाता है और उसकी गोद में रख देता है. तब तक एक महिला वकील तथा एक और सवारी आकर बैठ जाती है और ई-रिक्शा चल पड़ता है.
वकील साहब ताव खा जाता है और कहता है कि मारेंगे साले तो दिमाग की सारी गर्मी उतर जाएगी. जाहिर है कि सतीश के दिमाग में वकील साहब से कम गर्मी नहीं है. वह भी जलता हुआ जवाब देता है कि शान्ति से बैठे रहो वकील साहब, काहे लिए बुढ़ापे में मार खाना चाहते हो?
वकील साहब सतीश का कॉलर पकड़ते हुए कहता है तू मारेगा मादरचोद. वकील को मारेगा? चल आगे बताता हूँ अभी.
सतीश के भीतर जैसे बारूद फूटती है. गालियाँ कभी बर्दाश्त नहीं होतीं उससे. वह कहता है चुपचाप बैठे रहो वकील साहब, ज्यादा वकील की झाँट न बनो. दोबारा गाली बकी तो मारूँगा मुँह टूट जाएगा.
अब सामने बैठी वकील साहिबा के भीतर का भी वकील जाग जाता है. वह सतीश पर चिल्लाती है कि कोई लिहाज है कि नहीं तुमको? तुम्हारे बाप की उमर के हैं ये.
सतीश कहता है कि बाप की उमर के हैं तो बिना किसी बात के गाली बकेंगे. बाप की उमर का होने से कोई बाप नहीं बन जाता. मेरे बाप ने मुझे कभी गाली नहीं बकी. वह ड्राइवर से कहता है कि रिक्शा रोको. उतरना है मुझे.
वकील साहब को लगता है कि सतीश डर गया है ऐसे में वह उबलना शुरू कर देता है. वह कहता है कि भाग कहाँ रहे हो, चलो बताता हूँ तुमको. अब ये रिक्शा तो अपनी जगह पर पहुँचकर ही रुकेगा.
सतीश ड्राइवर से दोबारा कहता है कि रिक्शा रोको. उतरना है मुझे. रिक्शा नहीं रुकता, चलता जाता है.
वकील साहब अपना मोबाइल निकाल लेता है और किसी से कहता है कि एक खौरहा कुत्ता वकीलों को चैलेंज कर रहा है. उधर से कुछ ऐसा कहा जाता है जिससे वकील साहब में जैसे दुगुना बल आ जाता है. वह सतीश की दाईं कलाई पकड़ लेता है और एक बदली हुई आवाज़ में ड्राइवर से कहता है कि कॉफी हाउस के सामने रिक्शा रोक देना.
सतीश बिना कहे ही जान जाता है कि कॉफी हाउस के सामने कुछ और वकील साहब खड़े हैं. वह ड्राइवर से तिबारा कहता है कि रिक्शा रोको. रिक्शा नहीं रुकता, चलता जाता है.
वकील साहब कहता है कि बहुत चुल्ल मची थी न तुमको तो अब क्यों फटी पड़ी है. इसके बाद वकील साहब की आवाज़ में एक हिंस्र गुर्राहट प्रकट होती है. वह दाँत पीसते हुए कहता है कि अभी थोड़ी देर में तुम्हें तुम्हारी औकात न याद दिला दी तो मैं अपने बाप की पेशाब की औलाद नहीं.
सतीश का दायाँ हाथ अभी भी वकील साहब के हाथों में कसा हुआ है. फिर भी उसके मुँह से निकलता है कि वह तो आपको देखकर ही पता चल गया था कि आप पेशाब की पैदाइश हैं.
बदले में कुछ देर से चुप वकील साहिबा फिर से सतीश को डपटती है कि तमीज से बात करो, सॉरी बोलो, बाप की उमर के हैं तुम्हारे.
सतीश कुछ कहे उसके पहले वकील साहब फिर बोल पड़ता है. सॉरी बोलने का वक्त गया इनका. अब इनकी मैया की ऐसी की तैसी करने का वक्त है.
सतीश की आवाज़ में ऐसा कुछ है जिससे पता चल जाता है कि उसका अपने ऊपर से नियंत्रण खत्म हो रहा है. वह अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए वकील साहिबा पर चिल्लाता है कि मैडम आप औरत होकर इस तरह की गालियों पर चुप कैसे रह सकती हो? शर्म नहीं आती आपको!
महिला वकील उतना ही जोर से चिल्लाते हुए कहती है चुप बहनचोद.
सतीश को ऐसा लगता है जैसे वह किसी भीषण फंतासी में फँस गया है. कोई बहुत विशाल मकड़ी है जिसका जाल उसके ऊपर कसता जा रहा है. उसे लगता है कि इस जाल के पतले तार सब तरफ से उसे काट रहे हैं. वह चौथी बार चिल्लाता है, रिक्शा रोको. रिक्शा नहीं रुकता, चलता जाता है.
उसका दायाँ हाथ अभी भी वकील की गिरफ्त में है. उसे छुड़ाने की कोशिश में वह पाता है कि जैसे-जैसे कॉफी हाउस नजदीक आ रहा है वकील साहब की ताकत बढ़ती जा रही है. वकील साहब का हाथ उसके हाथों पर और कसता जा रहा है. वकील साहब उसे गरियाते हुए कहता है आज तुम्हें पता चल जाएगा कि किसी मर्द से भिड़ने का क्या मतलब होता है.
सतीश पाँचवीं बार चिल्लाता है और ड्राइवर से कहता है रिक्शा रोको. रिक्शा नहीं रुकता, चलता जाता है. ई-रिक्शा इन्दिरा भवन पहुँचने को है. पल भर में कॉफी हाउस आ जाने वाला है.
सतीश झटके से अपने बाएँ हाथ को वकील साहब की गर्दन के पीछे से ले जाता है और अपनी कलाई से उसकी ठुड्डी के नीचे से कस लेता है. वकील का गला दबता है तो सतीश के हाथों पर उसकी पकड़ कमजोर पड़ जाती है और सतीश अपना दायाँ हाथ छुड़ा लेता है.
अब देर से कसे हुए हाथ अपना काम करने के लिए खुले हुए हैं. सतीश के बाएँ हाथ से वकील का गला कसा हुआ है. वकील के गले से गोंगों-गालियाँ निकल रही हैं. अब महिला वकील चिल्ला रही है रिक्शा रोको. रिक्शा नहीं रुकता, चलता जाता है.
सतीश अपने दाएँ हाथ से वकील साहब के मुँह पर एक के बाद एक कई हाथ मारता है. इस पल वह अपने आप में नहीं है. महिला वकील चिल्ला रही है, वकील साहब छूटने को छटपटा रहा है कि सतीश पाता है कि उसके हाथों में वकील साहब का एक दाँत आ गया है और वकील साहब के मुँह से खून टपक रहा है.
पल भर के लिए सतीश की दुनिया लाल हो जाती है और उसके तुरन्त बाद जैसे सब तरफ काला भर जाता है. इसी काले में डूबा हुआ वह एक बार फिर से रिक्शा वाले को रुकने के लिए कहना चाहता है कि वह पाता है कि रिक्शा रोक दिया गया है.
वह रिक्शे से उतरता नहीं, कूदता है. वकील साहिबा चिल्लाती है कोई पकड़ो उसे, मार के भाग रहा है.
सतीश को भागते हुए एक सीढ़ी दिखाई देती है. वह बिना कुछ सोचे उस पर चढ़ता चला जाता है. ऊपर एक हेयर कटिंग सैलून है जिसमें वह घुस जाता है. उसकी आँखें सब तरफ देखते हुए कोई ऐसी जगह खोज रही हैं जहाँ छुपा जा सके.
इस एक पल में थोड़ी देर पहले का सतीश खो गया है. अब वह संसार का सबसे डरा हुआ जीव है. उसके रोम-रोम से पसीने की बारिश हो रही है. गले में काँटे उग आए हैं. वह बेहिसाब काँप रहा है. उसके भीतर एक भीषण भूकम्प आया हुआ है और भीतर का सब कुछ तहस-नहस हो रहा है.
सड़क पर मचे शोर को चीरती हुई, उसके भीतर से एक फटी घिघिआई अपरिचित-सी आवाज़ निकलती है. मुझे बचा लीजिए. वे लोग मार डालेंगे मुझे.
एक लम्बा साँवला-सा अधेड़ आदमी है जो नाई है या बाल कटवाने आया कोई ग्राहक यह सतीश को कभी पता नहीं चल पाएगा. वह कहता है बैठो आराम से, कोई ऐसे कैसे मारेगा तुम्हें!
वह सतीश को पकड़कर एक बेंच पर बैठाता है और खिड़की का काँच सरकाते हुए नीचे झाँकता है. नीचे ई-रिक्शा उसी जगह पर रुका हुआ है. वकील साहब जमीन पर पैर लटकाकर ई-रिक्शा की फर्श पर बैठा हुआ है. अब वह जैसे एक स्तब्ध मनःस्थिति में है. उसके मुँह से टपकता हुआ खून उसके हाथों में दिख रहा है. उसकी काली कोट और काली हो रही है.
वकील साहिबा लगातार फोन पर है और फोन पर लोगों को जल्दी से जल्दी बुलाने के साथ-साथ रिक्शे को घेरकर खड़े लोगों को भी घटना की जानकारी देने की दोहरी जिम्मेदारी निभा रही है. बीच-बीच में वह ऊपर दुकान की तरफ इशारा करते हुए लोगों को बता रही है कि वह ऊपर गया है. वह ऊपर गया है.
मददगार आदमी को कम से कम इतना समझ में आ जाता है कि मामला इतना सीधा सादा नहीं है और उसके सामने जो डर से काँपता हुआ आदमी है वह भी कुछ कारनामा करके ही यहाँ आया है. वह कहता है कि वकील को मारकर आए हो तुम! चलो बाहर निकलो यहाँ से. मारते समय नहीं पता चला कि क्या कर रहे हो? निकलो बाहर.
वह लगातार बहुत गन्दी-गन्दी गालियाँ बक रहा था. मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ. मुझे पता नहीं क्या हो गया था. मुझे बचा लो. सतीश के भीतर से जैसे आर्तनाद फूटा.
दुकान में आमने-सामने आईने लगे हुए हैं तो यह करते हुए सतीश ने अपने आप को देखा. आईने में वह अपने आपको नहीं पहचान पाता. इसके पहले कि वह अपने इस हाल के बारे में कुछ सोच पाता कि उसके मुँह से दोबारा वही आवाज़ निकली, मुझे बचा लीजिए प्लीज. मेरी एक छोटी सी बेटी है.
जिस फंतासी में सतीश फँसा हुआ है, इस पल में उसका फन्दा और कस गया है. सामने आईने में उतनी ही डरी हुई उसकी बेटी दिख रही है. जिसे पकड़े हुए उसकी पत्नी खड़ी काँप रही है. दोनों के रंग उड़े हुए हैं.
सतीश के गले में जैसे काँच का चूरा भर उठा है. उसी गले से वह एक बार फिर से कहता है कि मुझे बचा लो प्लीज.
मददगार आदमी पल भर में फैसला करते हुए कहता है कि यहाँ से निकलने का वही रास्ता है जिसे चढ़कर तुम यहाँ तक आए हो. मैं नीचे उतर रहा हूँ. मैं उनसे बात करता रहूँगा और बस दस सेकेंड में तुम दाईं तरफ निकल भागना. उसके बाद तुम जानो और तुम्हारी किस्मत जाने.
मददगार इनसान की दो मीटर दूर परछाईं की तरह सतीश उसके पीछे-पीछे उतरा और दाईं तरफ मुड़कर अपनी पूरी ताकत से निकल भागा. जब तक लोग कुछ समझ पाएँ वह कम से कम तीस-चालीस मीटर आगे जा चुका होता है.
सामने से कोई एक उस पर झपटता है जिसके हाथ में सतीश के पिट्ठू बैग की एक लटकती हुई पट्टी भर आती है जो फिसल जाती है. वहीं बगल में बेल के शरबत का एक ठेला है. यह झपटता हुआ आदमी एक बेल उठाता है और अपनी पूरी ताकत से सतीश पर निशाना लगा देता है.
बेल सतीश की गर्दन और दाएँ कन्धे के बीच कहीं जा लगता है और छितरा जाता है. भीतर का पका हुआ फल और उसका लसलसा हिस्सा सतीश की पीठ और गर्दन पर जगह-जगह चिपक गया है. बेल की इस चोट से सतीश लगभग गिरने-गिरने को हो आता है पर उतनी ही तेजी से वह अपने आप को सँभाल लेता है और भागता जाता है.
पीछे एक घातक शोर है पर सतीश की पीछे देखने की हिम्मत नहीं होती. पता नहीं इस पल उसे बचपन में सुनी हुई ऐसी बहुत सारी कहानियाँ याद हैं या नहीं जहाँ कोई राजकुमार पीछे देखते ही पत्थर के बुत में बदल जाता था. वह भागता जाता है.
उसके पीछे एक शोर है. गला इतना सूख गया है कि उसमें जैसे दरारें फट रही हैं. उसके आसपास की हवा इतनी गाढ़ी हो रही है कि सतीश से साँस भी नहीं ली जा रही है. उसका मुँह खुला हुआ है और वह हाँफ रहा है. पैर पत्थर हो रहे हैं.
और इसी पल लगभग बे-होश और बद-हवास सतीश देखता है कि उसकी बेटी और पत्नी भी उसके साथ भाग रही हैं. उनके चेहरे जैसे सतीश के ही चेहरे का आईना हैं. उनकी आँखें जैसे चेहरे से बाहर निकल आना चाह रही हैं.
सतीश उन्हें इस हाल में देखकर विकल हो रहा है पर उसकी आँखें इस पल यह देखते रहने के लिए अभिशप्त हैं. वह आँखें मूँदकर भाग नहीं सकता और किसी जादू के जोर से यह सम्भव भी हो जाए तो पत्नी और बेटी के डरे हुए बदहवास चेहरे गायब हो ही जाएँगे, ये कौन जानता है!
इस पल में सतीश के दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया है. इसके बावजूद पैर अपना काम कर रहे हैं. यह पैर ही थे जिन्होंने पाया कि वे देर तक भाग नहीं पाएँगे. ये पैर ही थे जो बिना सोचे समझे एक सँकरी गली में मुड़ गए.
गली में घुसते ही बगल में एक पुराना घर था जो खंडहर में बदल रहा था. पैर उसकी बाउंड्री फाँद गए. नीचे सूख रही झाड़ियाँ थीं, उनमें पैर फँसे और सतीश मुँह के बल जा गिरा.
बहुत देर तक सतीश वैसे ही पड़ा रहता है. उसकी आँखें खुली हैं पर अभी फिलहाल वह सामने के दृश्यों से परे किसी और दुनिया में देख रही हैं. उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ है. भीगे हुए शरीर में मिट्टी और सूखी वनस्पतियाँ जहाँ-तहाँ चिपक गई हैं. जैसे सतीश का रूप बदलकर वे उसे छुपा और बचा लेना चाहती हों.
इस पल सतीश में उठने की न इच्छा बची है न ही ताकत. ऐसे ही जमीन पर पड़े हुए साँस धीरे-धीरे सम पर आ रही है. धक-धक की आवृत्ति में बदलाव है. खून अपनी गति पर वापस आ रहा है. आँखों में दृश्य वापस आ रहे हैं. तभी सतीश पाता है कि उसे प्यास लगी हुई है, उसके शरीर का रोम-रोम पानी माँग रहा है. प्यास इतनी ज्यादा है कि थोड़ी देर और पानी न मिला तो कोशिकाएँ बिखरना शुरू कर देंगी.
सतीश को याद आता है कि उसके बैग में पूरा एक बोतल पानी है. वह उठता है, बोतल निकालता है और गटागट पानी पीना शुरू कर देता है. गला इसके लिए इस तरह से तैयार नहीं है. पानी गले में अटक जाता है.
सतीश को खाँसी आती है और आती ही चली जाती है. खाँसी का साथ देते हुए आँखों में आँसू आते हैं. यह जिन्दगी के इलाके में वापसी है. यह इस बात की गवाही है कि वह किसी प्रेत में नहीं बदल गया है. अभी भी वह सतीश ही है.
वह दोबारा बोतल मुँह से लगाता है और बिना किसी जल्दबाजी के धीरे-धीरे दो तीन घूँट पानी पीता है. एकदम इसी पल उसके भीतर से एक तेज आवाज़ रुलाई फूटती है. यह अभी कायदे से बाहर आ भी नहीं पाई होती कि वह पूरी ताकत से अपना मुँह दाब लेता है कि कहीं रुलाई लोगों के उस तक पहुँचने का जरिया न बन जाए.
अब यह रुलाई कहीं बाहर न जाकर उसकी रग-रग में उतर रही है. इसी पल में उसे पता चलता है कि शायद वह भीड़ के हत्थे आने से बच गया है. उसके भीतर हवा की जिन्दा लय अभी भी जस की तस बनी हुई है. थोड़ा पस्त ही सही पर दिल अभी भी धड़क रहा है. वह उठता है, मिट्टी और पत्तियाँ झाड़ता है पर मिट्टी से पूरी तरह से मुक्त होना असम्भव है. वह धीरे से खड़ा होता है और बाहर झाँकता है.
पल भर बाद जब वह बाहर की तरफ दोबारा बाउंड्री फाँद रहा होता है तो बगल के बँगले के गार्ड की निगाह में आ जाता है. गार्ड उसे कोई गरदुल्ला समझ लेता है जो स्टेशन के आसपास आयोडेस्क या थिनर जैसे सस्ते और घातक नशे में झूलते हुए पड़े रहते हैं.
इसलिए गार्ड सतीश के पास आना भी जरूरी नहीं समझता. वह वहीं से गाली बकता है कि दोबारा यहाँ दिखे तो खाल में भूसा भर दूँगा. उसके मुँह से भूसा सुनकर सतीश जानता है कि गार्ड दूर या पास के किसी गाँव से आया है और यहाँ नौकरी कर रहा है.
एकदम यही दुनिया सतीश की भी है. वह गार्ड को एक अजीब से लगाव से देखता है और चुपचाप आगे बढ़ जाता है. आगे वह सिविल लाइंस और स्टेशन के बीच का रास्ता लेता है. जाहिर है कि अभी भी वह पर्याप्त सतर्क है और इस बात से डर भी रहा है कि कहीं वह अपनी अतिरिक्त सतर्कता की वजह से ही लोगों की निगाह में न आ जाए.
तभी सड़क पर उसकी बगल से एक पुलिस वैन गुजरती है और तब उसकी पसलियों में ठंडे चाकू की तरह एक खामोश डर उतरता है कि वकील ने जरूर उसके खिलाफ एफ आई आर किया होगा. सड़क पर चारों तरफ सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. किसी न किसी में तो उसकी शक्ल दर्ज हो ही गई होगी. उसकी हड्डियों में एक कँपकँपी उतरनी शुरू होती है और यह एक छोटी-सी शुरुआत भर है.
अगले ही पल सतीश को लगता है कि आसपास इतने सारे लोग थे, किसी न किसी ने तो उसे पहचान ही लिया होगा. क्या पता उसका कोई रिश्तेदार, पड़ोसी या परिचित उस वक्त वहाँ मौजूद रहा हो, या मॉल में खरीददारी के लिए आने वाले तमाम ग्राहकों में से कोई एक! पल भर में वह न जाने कितने लोगों का अन्दाजा लगा डालता है जो उस समय वहाँ मौजूद रहे हो सकते हैं.
अगले ही पल उसे लगता है कि किसी न किसी ने अपने मोबाइल पर उसका वीडियो बना लिया होगा. क्या पता कई लोगों ने बनाया हो! तो क्या उस आदमी को पीटते हुए या उसके बाद बेतहाशा और बेसुध भागते हुए वह वायरल होने वाला है! इस पल उसे फिर से अपनी पत्नी और बेटी की याद आती है.
तभी उसे उस ई-रिक्शा ड्राइवर की याद आती है जिसने न जाने कितनी बार बिना कहे ही उसे उसके शापिंग मॉल के बाहर उतारा है. क्या पता वह वकील को या पुलिस को यह बात बता भी चुका हो! क्या पता न ही बताया हो! वह क्यों इस तरह के पचड़े में पड़ेगा!
यहीं पर सतीश के मन में एक आह की तरह से एक और बात उतरती है कि रिक्शा रोका क्यों नहीं उसने! इसी पल एक दूसरा सवाल सतीश के भीतर उतरता है कि क्या ड्राइवर भी चाहता था कि बात किसी सिरे लग ही जाए या कि उसे इस बात का अन्दाजा ही नहीं रहा होगा कि बात इस हद तक जा सकती है?
सतीश उस आदमी का चेहरा याद करना चाहता है जिसका एक खून में डूबा हुआ दाँत थोड़ी देर पहले उसके हाथों में था. उसकी आँखों में जो छवि उतरती है उसमें काला कोट है, फाइलों का गट्ठर है, सब कुछ है, बस चेहरा ही नहीं है.
इसके बाद उसका ध्यान वकील साहिबा की तरफ जाता है. वहाँ भी चेहरे की जगह खाली है. और वकील साहिबा की बगल वाली सवारी की जगह तो पूरी तरह से खाली है. बस ड्राइवर का चेहरा बिना किसी कोशिश के सामने आता है. यह न जाने कितनी बार टकराते रहने का नतीजा है. यह सोचते हुए सतीश के मन में एक राहत उतरती है कि शायद वकील साहब और वकील साहिबा भी उसका चेहरा भूल गए होंगे.
यह सब सोचते हुए वह सड़क पर होते हुए भी सड़क पर नहीं है. इसलिए उसे पता नहीं है कि कई लोगों ने उसे बुदबुदाते हुए, खुद से बात करते हुए नोटिस किया है. कि कई लोगों से वह टकराते-टकराते बस इस वजह से बच गया है कि वे लोग सड़क पर ही थे और उसका हाल देखकर खुद ही बगल हो गए थे.
जब एक सूखे पेड़ से टकराने से किसी तरह से बचते हुए वह दोबारा सड़क पर आया तो उसे एक सिगरेट की तलब हुई जो वह यूँ ही कभी-कभार पी लिया करता था. सिगरेट जलाते हुए उसने एक वकील को देखा जो किसी से कुछ पूछ रहा था. वह सिहर सा गया. वकीलों की संगठित ताकत का डर लम्बे समय तक उसका पीछा करने वाला है.

2.
शॉपिंग मॉल पहुँचकर अँगूठा लगाने और देर से आने के लिए मैनेजर की घुड़कियाँ खाने के बाद सतीश अपने काम पर लग जाता है. ये कितनी बड़ी सहूलियत है कि शॉपिंग मॉल के कर्मचारियों के लिए एक निश्चित ड्रेस कोड है और यहाँ पहुँचते ही पहला काम कपड़े बदलने का होता है. कम से कम रात आठ बजे तक वह अपने कपड़े की वजह से तो नहीं ही पहचाना जाएगा.
इसके बावजूद वह डरा रहता है. न जाने कौन उसे पहचान रहा हो. एक बार दो वकील अन्दर आए तो सतीश का जिस्म जैसे सिकुड़-सा गया. यह गनीमत रही कि दोनों वकील उनके पास आए बिना ही बाहर निकल गए. शॉपिंग मॉल का ड्रेस कोड उसे कब तक बचा पाएगा! उनके मन में एक शंका उतरी.
शाम को पहने हुए कपड़े ने मॉल के कूड़ेदान में जगह ले ली है. जूता अभी दो माह पहले ही खरीदा गया था उसे फेंकना सम्भव नहीं है. कम से कम आज तो उसे पहनकर घर जाना ही होगा. कल से पुराने जूते पर वापस आ जाना है.
रात में घर पहुँचकर सतीश ने दरवाजा खटखटाया तो पत्नी ने खोला. उनके अन्दर आने पर जब वह पानी का गिलास और अदरक वाला गुड़ लेकर आती है तो सतीश बेटी के बारे में पूछता है. पत्नी ने बताती है कि वह सो गई है. और तब जाकर वह जवाब देने की स्थिति आती है जिसे घर आते हुए सतीश मन में लगातार दोहराता रहा है.
पत्नी चौंकते हुए सतीश से उसके कपड़ों के बारे में पूछती है. सतीश बताता है कि जाते हुए सिविल लाइंस में ई-रिक्शा एक ऑटो की टक्कर खाकर पलट गया था. कपड़े कई जगहों से फट गए थे इसलिए नए खरीदने पड़े.
पत्नी पल भर में परेशान हो जाती है. वह सतीश का पहना हुआ टी-शर्ट और पैंट लगभग जबरन उतार डालती है. गनीमत है कि गर्दन और दाएँ कन्धे के बीच बेल की मार के गहरे निशान और दीवार फाँदते हुए नीचे गिरने की कुछ हल्की-फुल्की खरोंचे उसके जिस्म पर मौजूद हैं. पत्नी के हाथ उन जगहों पर फिसलते हैं और वह सतीश को अपनी बाँहों में भर लेती है और देर तक भरे रहती है. फिर वह घर के कोने में रखे लकड़ी के मन्दिर के सामने जाती है और देर तक आँखें मूँदे और हाथ जोड़े खड़ी रहती है.
इसके बाद सतीश नहाता है. कभी चुप कभी ज्यादा बोलते हुए खाना खाता है. कमरे में सोई हुई बेटी का माथा चूमता है और यह सब करते हुए रोने-रोने को होता रहता है. सोते समय पत्नी सतीश को देर तक अपनी बाँहों में भरे रहती है. दिन में जो कुछ घटा है वह सतीश की आँखों में बार-बार आ रहा है पर इस पल वह सुरक्षित हाथों में है. इस पल मौत भी आएगी तो उसे देखकर चुपचाप लौट जाएगी.
वह भीतर ही भीतर घुटनों पर बैठा, पत्नी और बेटी से माफी माँग रहा है कि अपने पागल गुस्से में कैसे उसने उन सबको खतरे में डाल दिया था जो उसे सबसे ज्यादा प्यारे हैं. उसे एक बार फिर से वह दृष्य याद आता है जब उसने उन्हें अपने साथ भागते हुए देखा था और वह सिहर जाता है.
इसी सब के बीच उसे नींद भी आनी है जहाँ एक से बढ़कर एक दुःस्वप्न उसके इन्तजार में हैं. ऐसे ही किसी दुःस्वप्न में जकड़े हुए पसीना-पसीना होकर उसे चीख पड़ना है और देर तक काँपते रहना है. और पत्नी का उठकर उसे अपने भीतर ऐसे समेट लेना है जैसे वह खुद को ही समेट रही हो.
इस पल सतीश को पता चल जाना है कि पत्नी सच भले न जानती हो पर झूठ उसने पकड़ लिया है. वह सतीश से प्रेम करती है इसलिए वह सतीश को वक्त देगी कि एक दिन सारी बातें वह खुद ही उसे बता दे.
वह जानती है कि थोड़ी देर से ही सही पर यह होगा ही. आज तक तो यही होता आया है. अँधेरे में एक उदास मुस्कुराहट पत्नी के होंठों पर प्रकट होनी है और सतीश की पीठ सहलाते हुए सोचना है कि जब थोड़े दिनों बाद इस आदमी को सब कुछ बता ही देना होता है तो आखिरकार यह झूठ बोलता ही क्यों है!
अगले दिन सुबह पत्नी सतीश को छुट्टी मारने के लिए बोलने वाली है और सतीश उसे बिना किसी ना-नुकुर के मान लेने वाला है. जब वह घर में रुक ही गया है तो उसे यह याद आना ही है कि उसके बाल बहुत लम्बे हो गए हैं और उन्हें कटा लेना चाहिए. और तब नाई की गलती से मूँछ गायब हो जानी है जो अब आने वाले कई महीनों तक गायब ही रहनी है.
नाई के यहाँ अपनी बारी का इन्तजार करते हुए सतीश अखबार के पन्ने पलट रहा है. उसकी निगाह अखबार के स्थानीय पृष्ठों पर लगातार कुछ खोज रही है. अगले कई दिनों तक यह खोज बनी रहने वाली है.
नौकरी पर जाते हुए ऊपर से सहज दिखते हुए हर पल डरे रहना है. रास्ता बदलना है, अपना पिट्ठू और जूता बदलना है. जीवन और मौसम में गर्मी और उमस चाहे जितनी ही हो उसे अपना एटीट्यूड बदलना है, मुस्कुराते हुए बात करनी है.
मोबाइल में कोई कुछ देखकर चौंके या मुस्कुराए तो वीडियो वायरल होने से डरना है. यह सोचते रहना है कि गलती से भी कोई वीडियो पत्नी या किसी और के पास पहुँच ही गया तो उसे बात किस तरह से सँभालनी है?
और बेटी ने देख लिया तो! इस सवाल के जवाब में भीतर से आती एक धकधक है. इसका कोई जवाब वह किसी भी तरह से नहीं ढूँढ़ पाना है.
जहाँ यह सब घटा था उस जगह से गुजरते हुए हर दिन एक धक हो ही जानी है और एक चोर निगाहों से आसपास देखना है जिसमें सीसीटीवी कैमरे की चोर खोज भी शामिल है.
उनके भीतर यह इच्छा बारम्बार जोर मारनी है कि एक दिन नाई की उस दुकान पर अपने बाल बनवाने या कि शेविंग करवाने के लिए पहुँच जाए. पर उसने किसी जासूसी उपन्यास में यह पढ़ रखा है कि हर अपराधी कभी न कभी अपराध की जगह पर जरूर जाना चाहता है और कई बार यही उसकी सबसे बड़ी गलती होती है. इसलिए जाहिर है कि सतीश को घटना स्थल से रोज-ब-रोज गुजरते हुए अपनी इस इच्छा से लड़ते रहना है.
वहीं दो कदम आगे सुभाष चौक पर एक पुलिस बूथ है जिसके सामने से गुजरते हुए अपने चेहरे पर बस उतना ही डर रखना है जितना पुलिस को देखकर किसी भी भले आदमी के मन में आता है.
और हफ्ते दस दिन बाद इस डर के कम होने पर उसे वकील साहब के बारे में भी थोड़ा अलग तरह से सोचना है. क्या पता वह उतना बुरा आदमी न ही हो! क्या पता उस दिन वह किसी वजह से बहुत तनाव में रहा हो. आखिरकार दोनों ई-रिक्शा से चलने वाले हैं.
क्या पता उसकी वकालत जरा भी न चलती हो और फाइलों की वह गठरी भ्रम बनाए रखने के लिए रोज-रोज ढोई जाती हो. क्या पता अपने वकील होने का हिंसक गुमान न जाने कितनी हीन भावनाओं के भीतर से प्रकट हुआ हो! क्या पता उसकी काली कोट पर उमस और पसीनों के कितने धब्बे हों.
और उसका लगातार गालियाँ बकना? इस पर सतीश को देर तक अपने भीतर फँसे रहना है, फिर जैसे इस सवाल से पीछा छुड़ाते हुए खुद से पूछना है कि हर चौथा-पाँचवाँ आदमी गालीबाज है. हर दूसरे तीसरे कोई न कोई गालीबाज बगल में बैठा होता होगा जो जरा सी किसी बात पर गाली बकना शुरू कर सकता है तो क्या तुम सबको मारोगे?
और मान लो कि इसी मामले में कल को पकड़ ही लिए गए होते तो पुलिस की तरफ से मिली गालियों के जवाब में क्या किसी पुलिस वाले का भी मुँह तोड़ देते? जवाब में एक चुप्पी पसरी है. सतीश इस सवाल का जवाब खुद को भी नहीं देना चाहता. वह जानता है कि वह कोई फिल्मी सुपरमैन नहीं है.
ठीक इसी पल सतीश को खुद की जगह वकील साहब को रखकर देखना है. मार खाते हुए वकील साहब का भी वीडियो वायरल हो सकता था. उसके बच्चे कितने बड़े होंगे. वकील साहब भाड़ में जाएँ पर सतीश के लिए यह सोचना भी कितना कठिन है कि कोई बच्चा सार्वजनिक रूप से अपने बाप को मार खाते हुए देखे.
3.
इस घटना के कई दिन बाद एक दिन सतीश हनुमान मन्दिर पहुँचता है तो पाता है कि वही वकील साहब वैसे ही अपनी फाइलों की गठरी बगल की सीट पर रखे बैठा हुआ है. सतीश सामने बैठने को होता है कि वह अपनी गठरी उठाकर अपनी गोद में रख लेता है. सतीश उसे शुक्रिया कहता है तो वकील साहब कहता है कि कौन सा बुक करा लिया है मैंने. बस दस मिनट की बात है.
बदले में सतीश उसी उल्टी सीट पर बैठ जाता है जिस पर बैठना उसे कभी नहीं भाता. यह कहते हुए कि अरे थोड़ी देर तो आराम से बैठिए आप, कोई आएगा तो उठा लीजिएगा.
थोड़ी देर में वकील साहिबा भी यह शिकायत करते हुए आकर बैठ जाती हैं कि इस देश के लोग कभी भी, कहीं भी ग़लीज़ गालियाँ बकना शुरू कर देते हैं. न जाने इतनी गन्दगी लोगों के दिमाग में कहाँ से आती है. ऐसे लोग अपने घर की औरतों के सामने भला कौन सा मुँह लेकर जाते होंगे. अपनी बेटी या माँ को देखकर उन्हें जरा भी शर्म आती होगी क्या?
वकील साहब कसमसाते हुए कहता है कि सब यही सोचने लगें तो गालियाँ बकें ही क्यों! इसके बाद मौसम, महँगाई और राजनीति की बातें शुरू हो जाती हैं.
आगे थोड़ी सतर्कता बरतते हुए सतीश अपने शॉपिंग माल के सौ मीटर पहले ही उतरता है और बुदबुदाते हुए वकील साहब से माफी माँगता है कि उस दिन के लिए माफ कर दीजिए सर, पर आपको भी इतनी गालियाँ नहीं बकनी चाहिए थीं.
सतीश के यह कहते ही वकील साहब दोबारा उबल पड़ता है कि अच्छा तो तू वो है मादरचोद. रुक साले.
सतीश जाग जाता है और पसीना-पसीना होकर हाँफता है. बिजली कटी हुई है इसलिए सब तरफ अँधेरा ही अँधेरा है. वह बिस्तर पर पत्नी की तलाश में हाथ फैलाता है और तब उसे याद आता है कि पत्नी बेटी के साथ हफ्ते भर के लिए मायके गई हुई है.
वह नीचे से पानी की बोतल उठाता है और गटागट पी जाता है. फिर पानी पीने की यह आवाज़ भी खो हो जाती है. अब सब तरफ अँधेरा ही अँधेरा है और इस अँधेरे में सतीश पूरी तरह से अकेला है.
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मनोज कुमार पांडेय 7 अक्टूबर, 1977 को इलाहाबाद के एक गाँव सिसवाँ में जन्म. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए. (2001). लम्बे समय तक लखनऊ और वर्धा में रहने के बाद 2020 से दोबारा इलाहाबाद में. कुल पाँच कहानी संग्रह – शहतूत, पानी, खजाना, बदलता हुआ देश और प्रतिरूप तथा प्रेम-कविताओं का संग्रह प्यार करता हुआ कोई एक प्रकाशित. देश की अनेक नाट्य संस्थाओं द्वारा कई कहानियों का मंचन. एक कहानी ‘खाल’ पर शॉर्ट फिल्म, दूसरी कहानी ‘आपकी टंकी भर गई है भाई साहब’ पर निर्माणाधीन. कुछ कहानियों और कविताओं का उर्दू, पंजाबी, नेपाली, मराठी, उड़िया, बांग्ला, गुजराती, मलयालम तथा अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद. कहानियों के लिए स्वयं प्रकाश स्मृति सम्मान (2021) वनमाली युवा कथा सम्मान (2019), राम आडवाणी पुरस्कार (2018), रवीन्द्र कालिया स्मृति कथा सम्मान (2017), स्पन्दन कृति सम्मान (2015), भारतीय भाषा परिषद का युवा पुरस्कार (2014), मीरा स्मृति पुरस्कार (2011), विजय वर्मा स्मृति सम्मान (2010), प्रबोध मजुमदार स्मृति सम्मान (2006). ई-मेल : chanduksaath@gmail.com |




बहुत बढ़िया कहानी, बिना किसी भाषाई और वैचारिक आडंबर के, आपकी कहानी की सहजता ही इसे बड़ी कहानी बनाती है, बधाई मनोज, आज की पहली कहानी आपकी पढ़ी, जो पूरे रविवार मेरे साथ चलेगी
बहुत अच्छी कहानी। यह फॉर्म मनोज ने न सिर्फ अपनाया है बल्कि उसे विकसित किया है जिसमें चीजें वैसी उतरती हैं जैसी वे रचनाकार के मन में होती हैं। यह दरअसल उस सामाजिकता और परिवेश को समझने का फॉर्म है जिसके भीतर ऐसी दुस्वप्न सरीखी स्थितियां घटित हो रही हैं, जिसमें सतीश और उस पर घटित होने वाले अत्याचार हैं। सधी हुई कहानी!
मनोज कुमार पांडेय की कहानी ‘बस एक सीट के लिए’ आज के दौर के उस क्रूर यथार्थ को सामने लाती है जहाँ जीवित रहने की न्यूनतम शर्तें भी एक हिंसक युद्ध में बदल चुकी हैं। कहानी के आरंभ में ही यह रेखांकित किया गया है कि दृश्य माध्यमों (सिनेमा, सोशल मीडिया, ओटीटी) की चकाचौंध के बरक्स आज कहानी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह शब्द के भीतर मनुष्य के उस अकेलेपन और भीतरी दरार को कैसे बचाए रखे जिसे कैमरा अक्सर छोड़ देता है।
इस कहानी में ‘सीट’ केवल किसी रेल, बस या वाहन की भौतिक जगह नहीं है; यह इस साधनहीन, घनी और बाज़ारवादी व्यवस्था में मनुष्य के ‘होने’ (अस्तित्व) का एक बहुस्तरीय रूपक है। यह सीट आजीविका की भी हो सकती है, नागरिक पहचान की भी, और उस न्यूनतम सुरक्षा की भी जिसके लिए एक साधारण नागरिक रोज़ अपनी आत्मा को गिरवी रखने पर मजबूर है।
कहानी किसी बड़े खलनायक की तलाश नहीं करती, बल्कि यह दिखाती है कि कैसे एक भीड़भाड़ वाली, लाचार व्यवस्था में सामान्य और भले लोग भी महज़ ‘एक सीट’ बचाने या छीनने के चक्कर में एक-दूसरे के प्रति संवेदनहीन, हिंसक और स्वार्थी हो जाते हैं। व्यवस्था का ढाँचा ही ऐसा है जो पीड़ित को दूसरे पीड़ित के ख़िलाफ़ खड़ा कर देता है।
सुंदर टिप्पणी।
कहानी उस द्रुतगामी ट्रेन की तरह है जिसका एक ही स्टापेज है -इलाहाबाद। लेकिन यह वकील एकदम्मै रसगुल्ला छाप है जो चिरकुटई किस्म के केस लड़कर जीविका चलाता होगा। तभी तो ई-रिक्शा या आटो में चलता है। असली इलाहाबादी हाईकोर्ट वाले वकीलों की बात ही अलग है।
खैर, वकीलवा सही ढूंढ़े हैं पांडेजी। अतरसुइया या सोहबतियाबाग से निकला होगा। कहानी की शानदार परंपरा कायम रखने के लिए साधुवाद। वरना, कहानियों में भी ऐसे कणाद मुनि और मुनिया घुस गए हैं कि लगता है कि हम लोग पुराने तो नहीं पड़ गए।
ऊपर से देखने पर ‘बस एक सीट के लिए’ एक विशुद्ध यथार्थवादी कहानी प्रतीत होती है, लेकिन इस कहानी की ताकत उस मानसिक यात्रा में निहित है, जो हिंसा के बाद सतीश के भीतर सक्रिय होता है। ऊपर से दिखते एक साधारण टकराव को यह कहानी जिस कलात्मक युक्ति से आज के मनुष्य की आंतरिक असुरक्षाओं, भय, अपराध-बोध और आत्मग्लानि के गहन विश्लेषण में रूपांतरित करती है, वह इसे विशिष्ट बनाता है।
बाहरी संघर्ष के बाद की मानसिक अवस्था इस कहानी का नाभि केंद्र है। सतीश जिस भय से संचालित होता है, वह पुलिस, वकीलों या भीड़ के भय से बहुत आगे की बात है, जो अपने ही कर्म के परिणामों, सामाजिक पहचान के विखंडन और पारिवारिक उत्तरदायित्व के प्रति गहरे अपराध-बोध से निर्मित होता है। घटना के बाद उसका लगातार भागते रहना एक ऐसी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति बाहरी दुनिया से अधिक अपने विवेक और स्मृतियों से पीछा छुड़ाने की कोशिश करता है।
कहानी आधुनिक जीवन की उस मानसिक संरचना को उद्घाटित करने में सफल हुई है, जहाँ निगरानी, सार्वजनिक अपमान, सामाजिक निर्णय और आत्मग्लानि एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं। यह कहानी की ताकत है कि सतीश या वकील साहब को पीड़ित या पीड़क की तरह नहीं देखती बल्कि उनके साथ वकील साहिबा को भी एक बड़ी व्यवस्था के भुक्तभोगियों की तरह बरतती है।
बाहरी घटना के बहाने आंतरिक त्रासदी को जाहिर करनेवाली इस कहानी के लिए मनोज भाई को बहुत भाई!
कहानी की रफ़्तार बड़ी तेज है। परन्तु बुनियाद कमज़ोर। गालियों को ज्यों का त्यों परोस कर यथार्थ के नाम पर रचनाकार की अयोग्यता को पाठक सहन करने लिए बाध्य बनता है और सर्जक को उसका प्रत्युत्तर देना चाहता है। कहानी में मुख्य किरदार की मानसिक यात्रा भी सरपट दौड़ लगाती है। कहानी का खुरदरापन चुभता है।
बहुत शानदार कहानी है । इलाहाबादी वकीलवे होते तो हैं बड़े वाले बकैत । मनोज ने अपनी कहानी में हुबहू रुबरु कराया । खौफ के अंदर की खौफ .. उफ़
कहानी में घटनाओं की जो रफ़्तार है, एक पाठक के तौर पर मैं उसके बारे में सहज ही सोचता रहा। बीतते समय के साथ जीवन किस हद तक मुश्किल होता गया है, यह कहानी इसे कई स्तरों पर दर्ज़ करती है। मामला महज़ एक सीट का नहीं है; इस पृथ्वी पर कुछ लोगों के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं है। और इन ‘कुछ लोगों’ की आबादी बहुत बड़ी है। विडंबना यह है कि इन लोगों को दर्ज़ करने की कोशिशें बहुत कम होती हैं। सतीश के माध्यम से आज का समय अपने पूरे तनाव और बेचैनी के साथ कहानी में उपस्थित हुआ है। आज के समय पर इतनी गहरी पकड़ बनाने के लिए मनोज भाई को बहुत-बहुत बधाई। साथ ही, इस स्मरणीय प्रस्तुति के लिए Arun Dev सर का भी हार्दिक आभार।
पढ़ गया। खूब प्रवाह है। बिना वार्तालाप के कहानियां लिखने में मनोज पांडेय जी सिद्ध हस्त हो गए हैं। एक आकस्मिक दुर्घटना के बहाने आजकल के आम इंसान के डर, असुरक्षा और एक हद तक सनक को बढ़िया से रखा है।
ज़बरदस्त लिखा है। कहानी की असली ताक़त मार-पीट में नहीं, उसके बाद के डर और अकेलेपन में है — और “रिक्शा नहीं रुकता, चलता जाता है” तो दिमाग़ में बैठ गया। पढ़ते हुए मुझे अपनी वो दिल्ली वाली गर्मी याद आ गई, 1999, पहली नौकरी के दिन, जब खाल पिघलने वाली उमस में नोएडा से राजेंद्र प्लेस तक तीन बसें बदलकर जाता था।
अच्छी कहानी है मनोज भाई
अच्छी कहानी है। बढ़िया घुमाव लेती है। …खूब।
अच्छी कहानी लगी।
कहानीकार ने कथ्य के रूप में महत्त्वपूर्ण विषय चुना है।
वकील और वकालत दोनों गुण्डई और दलाली का पर्याय बनते जा रहे हैं। सतीश का भय, आज समाज का भय बन गया है। हालाँकि सतीश के बहाने वकील साहब में कुछ मानवीय पक्ष भी ढूँढने की कोशिश की गई है, जब उनकी ज्यादतियों को उनकी परिस्थितियों की उपज के रूप में सतीश देखता है, पर यह बेमानी लगती है। हाँ, सतीश का वहाँ उदात्त रूप जरूर उभर आता है।
भागते हुए सतीश की चढ़ी हुई साँस, रोम-रोम से झरते हुए पसीने की बूँदें और सूखे हुए गले की प्यास को संभवतः सभी पाठकों ने अनुभूत किया होगा। मैंने भी अनुभूत किया और कहानी के इस मोड़ पर रुककर एक ग्लास पानी पीते हुए आगे बढ़ा।
इस कहानी में एक और बात है, जो इसके नायकत्व को जन सामान्य से जोड़ता है। भारतीय मानस में नायक को तारणहार के रूप में देखने की परंपरा है। पाठक उसे कभी हारते या डरते हुए देखने का अभ्यस्त नहीं है, पर यहाँ सतीश, नायक के गुण के अनुरूप वकील को मारता भी है और नई की दुकान में छुपकर बचाने की गुहार भी लगाता है। नायक का यह रूप, उसे जन सामान्य से जोड़ता है और उसे उसके पारम्परिक रूप से विलग भी करता है।
कहानी के मध्य भाग, जिसमें डरा हुआ सतीश अपनी पत्नी के बगल में आकर सो जाता है, के बाद, कहानी के ‘कहाव’ में शैलीगत दोष जान पड़ता है। वैसे हो सकता है कि पांडेय जी की यह अपनी शिल्पगत विशेषता हो, पर कहानी वहाँ आकर थोड़ी खटकती है। आना है, जाना है, रहना है, देखना है जैसे वाक्यान्त ने कहानी को थोड़ा शिथिल किया है और ऐसा लगता है, जैसे वह इन शाब्दिक माध्यमों से पाठक को बेतरतीब सपने की ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर दौड़ाना चाह रहे हों।
खैर, कहानी ज़बरदस्त है। शुरू से ही पाठक को पूरा बाँधकर चलती है। पाठक को तनिक भी कसमसाने की फ़ुर्सत नहीं मिलती।
कहानी के लिए पाण्डेय जी को बधाई।
अच्छी कहानी।
2014 के बाद का डर है। जैसे मैं ही सतीश हूँ। ग़ाली न निकल जाए, उनकी आलोचना करने से बचूँ, किसी का पक्ष न लूँ — यही सब हो रहा है। ऐसा ही हरेक समझदार व्यक्ति कर रहा है। कहानी राजनीतिक नहीं है, लेकिन पढ़ते हुए लगता है कि है। डर। सिर्फ़ डर। डर डर डर डर!! कैसा हो गया है देश। या हम लोग कैसे हो गये हैं।
ये कहानीकार दिन प्रतिदिन खतरनाक होता जा रहा है और इसके विषय हैरतअंगेज ढंग से आम। रोज़मर्रा की घटनाओं, जिन्हें देखने के अभ्यस्त होते जाने को अभिशप्त हैं हम, के भीतर मनोज समाज और इंसान का क्षरण बड़ी सहजता से पकड़ लेते हैं। कितनी ईर्ष्या की जाय इस मरदूद कहानीकार से जो हर बार अच्छी ही कहानियां लिखता जा रहा है। हद्द है किस्सागोई की…
अच्छी कहानी है. स्पीड इतनी ज़बरदस्त है कि माथे पर पसीना चुहचुहाने लगता है. और इलाहाबाद के टटपुन्जिये वकीलों की बात तो क्या ही जाए. उनकी अपनी ज़िन्दगी की भी बहुत सारी विसंगतियां होती है. अदालत में झूठ बोलते-बोलते खुद से भी झूठ बोलने लगते हैं. लेकिन समझते हैं खुद को तोप…खुद ग़रीब होते हैं दिमाग से भी जेब से भी, लेकिन गरीबों पर गालियाँ उड़ेलना इनके पेशे में समाहित है.
बधाई मनोज!
रोजमर्रा की आवाजाही की भिड़ंत में स्वाभिमान की प्रतिक्रिया लेकिन अनजाने डर की विषयवस्तु पर प्रवाहमयी कहानी।
ਪੂੰਜੀਵਾਦੀ ਵਿਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਮਨੁੱਖੀ ਦੌੜ ਭੱਜ ਦਾ ਯਥਾਰਥ ਪੇਸ਼ ਕਰਦੀ ਹੈ ਇਹ ਕਹਾਣੀ, ਇਕ ਅਵਿਵਸਥਿਤ ਵਿਵਸਥਾ ਦਾ ਸਤਾਇਆ ਮਨੁੱਖ ਕਿਸ ਹੱਦ ਤੱਕ ਮਾਨਸਿਕ ਰੋਗੀ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਇਸ ਦਾ ਖੂਬ ਚਿਤਰਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ ਇਸ ਕਹਾਣੀ ਵਿੱਚ। ਅਫਸੋਸ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਹੈ ਕਿ ਪੀੜਿਤ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਮਨ ਵਿੱਚਇਸ ਵਿਵਸਥਾ ਨੂੰ ਬਦਲਣ ਬਾਰੇ ਖਿਆਲ ਵੀ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ।
यह कहानी क्षणिक आक्रोश से शुरू हो कर अनियोजित हिंसा फिर अपराध-बोध और अंततः भयावह परिणति की आशंका से उत्पन्न होने वाले डर की मार्मिक कहानी है। एक छोटी-सी घटना अनायास एक हादसे में तब्दील हो जाती है जिसमें कथा नायक जो एक आम-सा मध्यम वर्गीय इंसान है, स्वयं को हर तरफ़ से घिरा हुआ पाता है. आज के बेहद हिंसक समय में यह घटना एक तरह से हर आम और निरीह व्यक्ति की स्थिति का स्टेटमेंट बन जाता है. जाने कब, जाने कहाँ वह किस हादसे का शिकार हो जाय और स्वयं को हर तरह से विवश और दिशाहारा पाये. समाज और शासन हर तरफ़ जैसे उसकी और पीठ किए खड़ा है!
कहानी एक औचक और अप्रत्याशित घटना को महज बाहरी संघर्ष के रूप में ही नहीं दिखाती अपितु कथा नायक सतीश के भीतर इस घटना से उपजने वाले भयावह मानसिक तनाव और मनोवैज्ञानिक प्रभाव को भी जीवंतता से चित्रित करती है. कथा पात्र के भीतर उपजी असुरक्षा और मनोवैज्ञानिक संकट को पाठक जैसे अपने भीतर महसूस कर पाता है.
ई-रिक्शा की सीमित परिधि में एकदम से जैसे हमारा वर्तमान समाज अपने तमाम पूर्वाग्रह, विडंबनाओं और ऊँच-नीच की दीवारों और सीमा रेखाओं के साथ प्रकट हो जाता है. दो सीटों के बीच वर्ग जनित अहंकार, तनाव और विद्वेष, सामाजिक विभेद और हिंसा का एक अखाड़ा ही जैसे उत्पन्न हो जाता है.
सतीश का चरित्र कई शेड्स लिए है. कहानी में वह मात्र एक पीड़ित की तरह नहीं आया है. आवेश में आ कर वह हिंसा कर बैठता है. मगर यह उसका सहज स्वभाव नहीं. हाथ उठाने के तुरंत बाद वह जैसे होश में आता है और उसे समझ आता है कि उससे ग़लती हो गई है. वह भयभीत हो उठता है परिणाम के बारे में सोच कर.
भीड़ से बच कर भागते हुए पत्नी और बेटी की छवियों का उसके साथ भागना उसके अपराध-बोध और पारिवारिक उत्तरदायित्व को बयान करता है. यह दृश्य वास्तव में एक अत्यंत प्रभावी मनोवैज्ञानिक बिम्ब बन पड़ा है जो कहानी को एक अलग ही स्तर पर ले जाता है. इसी तरह का एक दूसरा अर्थ गंभीर दृश्य है कहानी में जहाँ डरा हुआ कथा नायक सतीश आईने में स्वयं को पहचान नहीं पाता. यह उसके टूट कर रेज़ा-रेज़ा हुए आत्मबोध को रेखांकित करता है। हर तरह से घिरे और डरे हुए आम इंसान की यह एक मार्मिक तस्वीर है.
कहानी में कुछ शब्दों का बार-बार दोहराव जैसे अँधेरा, गर्मी, पसीना, पानी प्रतीकात्मक प्रतीत होते हैं. मौसम की ऊमस, गर्मी सतीश के भीतर बेचैनी भर देती है. वह घुटन से भर जाता है. एक प्रच्छन्न चिढ़, तनाव उसमें पैदा हो जाता है. जो आगे चल कर कहीं ना कहीं उसके अचानक उग्र हो उठे व्यवहार के पीछे का कारण बनते हैं.
यह कहानी जिस सामाजिक पृष्ठभूमि में घटित होती है उसमें कहानी में प्रयुक्त हुई भाषा और गालियाँ अस्वाभाविक प्रतीत नहीं होती. यह इस समाज की वास्तविकता है.
कहानी का अंत विचारणीय है. कथा नायक सपने में उस वकील से पुनः मिलता है. इस बार वहाँ सब कुछ अच्छा है. वह अच्छा महसूस करता है. यही आत्मीय और सौजन्य से भरा वातावरण उसका काम्य है.
मगर यह सुंदर सपना भी सपने में ही जल्द टूट जाता है. फिर उस पर गालियों की बरसात होने लगती है. वह एकदम से घबरा उठता है.
यह प्रसंग इस बात का इंगित करता है कि सतीश उस भयानक हादसे से अब तक मानसिक रूप से उबर नहीं पाया है. उसके भीतर वह भय, आशंका और चिंताएं कहीं गहरे जड़ जमाये बैठी हैं.
पत्नी और बेटी की अनुपस्थिति में उसके भीतर कुंडली मार कर बैठा डर और अपराध बोध और अधिक बढ़ जाता है. वह अंधेरे में डूबने लगता है.
कहानी अंत में पाठकों के मन में एक प्रश्न पैदा करती है कि इस तरह की अनायोजित और अप्रत्याशित हिंसा से एक आम मनुष्य किस तरह से स्वयं को बचाये. क्या डर, आशका और अपराध बोध में जीना ही उसकी नियति है या कहीं कोई मुक्ति का रास्ता भी है उसके लिए! हिंसा का असली दंड कौन देता है?कानून या मनुष्य का अपना अन्तःकरण?
कहानी, विशेष कर इसका अंत बहुत सार्थक है.
बेहतरीन कहानी। पिछली कहानी आपकी पानी की टंकी में जिस तरह एक मामूली सी लगने वाली घटना को केंद्र में रखकर मनोज भाई ने जो कहानी के जो तेवर बदले हैं वो इस कहानी में आकर और परिपक्व हुए हैं। इतनी सीधी सादी चित्रात्मक भाषा में एक रोज़मर्रा की घटना को पूरे तनाव में बदलना एक बेहद कलात्मक काम है जिसे मनोज ने सिद्ध कर लिया। बहुत बढ़िया से पूरी कहानी को साधा है।
आज, जगदलपुर, बस्तर में एक राइटिंग वर्कशॉप में मैंने इस कहानी का वाचन करवाया। बस्तर के आदिवासी युवाओं ने कहा जैसे वो इलाहाबाद और सतीश को करीब से जान गए।
कमाल, मनोज भाई, ऐसे ही ये रचनात्मकता नए आयाम, नई लय पाती रहे। समालोचन को शुक्रिया, ये कहानी सामने लाने के लिए।
मनोज कुमार पांडेय की यह कहानी भय, आत्मग्लानि और आत्म-संवाद की कहानी है. नीत्शे की प्रसिद्ध चेतावनी कि राक्षसों से लड़ने वाले को सावधान रहना चाहिए कि कहीं वह स्वयं राक्षस न बन जाए, सतीश के क्षणिक उन्माद और उसके बाद के काँपते पश्चात्ताप में मूर्त हो उठती है. “रिक्शा रोको. रिक्शा नहीं रुकता. चलता जाता है” की आवृत्ति निर्मम संसार की गति और व्यक्ति की बेबसी का रूपक है. बाह्य और आंतरिक जगत की इस यात्रा को शब्द देने के लिए मनोज जी को बधाई.
छोटी सी बात पर गुस्सा कितना खतरनाक रूप ले सकता है यही इस कहानी का मूल है। सतीश की बेचैनी, डर और तनाव का वर्णन अद्भुत है। शानदार कहानी के लिए मनोज जी को बधाई।
आज मैंने बड़े दिनों बाद इतनी प्रवाहमान कहानी पढ़ी है कि मन देर तक कहानी के अलग-अलग भाव पर टिका रहेगा। मुझे याद है जब मैंने सालों पहले अपराध और दंड उपन्यास पढ़ा था, तब भी मेरा हाल यही था। यह भाषा को इस क़दर बरते जाने का कमाल है कि मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि मुझे स्वप्न आएगा और मैं जहांँ-तहाँ दौड़ती, भागती, गिरती घर पहुंँचूंँगी और स्वप्न में साँस अटकने को होगी पसीना-पसीना होकर एकदम से उठूंँगी तो याद आएगा कि यह सपना था ! और एक गिलास गटागट पानी पीने के बाद एक बार फिर से कहानी के बारे में सोचूंँगी और धीरे-धीरे सो जाऊंँगी; यह होता है पर कभी-कभी ही होता है। इस कहानी में लिखित एक-एक शब्द, एक-एक भाव की जो फ़ोटोग्राफ़ी हुई है कमाल है, कमाल का ऑब्जर्वेशन !
कहानी के मूल में भय है. ऐसा भय जो सतीश जैसे निम्न मध्यमवर्गीय नौकरी पेशा लोगों के जीवन में हमेशा बना रहता है. नौकरी जाने का भय. किसी से अपमानित होने का भय. भय ही उन की नियति है. इस भय से ही गुस्सा जन्म लेता है. गुस्से से गलती होती है और भय का यह दुष्चक्र चलता रहता है.
एक बेहतरीन कहानी के लिए मनोज भाई को बहुत-बहुत बधाई.