| बशीर बद्र से मुलाक़ात शरद कोकास |
मुशायरा खत्म होते ही मैंने अज़हर और इम्तियाज से कहा “घर पहुँचकर सो मत जाना, अभी सुबह साढ़े सात बजे हमें स्टेशन पहुँचना है, डॉ. बशीर बद्र गोंडवाना एक्सप्रेस से भोपाल के लिए रवाना हो रहे हैं. अज़हर ने कहा ‘ऐसा क्यों न करें हम कि सीधे होटल पहुँचे, वहीं कुछ देर उनके साथ बातचीत रिकॉर्ड कर लेंगे. प्लेटफ़ॉर्म पर, भीड़-भाड में गंभीर बात होता तो मुश्किल है.”
“बिलकुल ठीक ख्याल है तुम्हारा” मैंने कहा “छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की पहली सालगिरह पर देश के इतने बड़े शायर हमारे शहर में आये हैं, उनकी शायरी से तो हम वाकिफ हैं ही, कुछ बातें हिंदी उर्दू साहित्य और समाज पर भी होनी चाहिए.”
बहरहाल, होटल पहुँचने पर पता चला कि डॉ. बशीर बद्र तो काफी पहले ही स्टेशन के लिये रवाना हो चुके हैं. हम लोग दौड़ते-भागते स्टेशन पहुँचे. पूछने पर मालूम हुआ कि ट्रेन एक घंटा लेट हैं. हमें लगा कि हमारी मुराद पूरी हो गई. पहली बार रेल महकमे का लेटलतीफी के लिये शुक्रिया अदा करते हुए हम लोग प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुँचे. प्लेटफार्म पर डॉ. बशीर बद्र भीड़ के बीच अकेले खड़े थे. पास ही कुंवर जावेद बदायूंनी और रमेश गुप्ता ‘चातक’ अपना सामान जमाने में मशगूल थे.
बशीर बद्र साहब से दुआ सलाम हुई. मैं सोच ही रहा था कि बातचीत कैसे शुरू की जाए कि नौजवान शायर इम्तियाज़ ने कहना शुरु कर दिया “शरद भाई, क्या हुल्लड़ हुआ कल रात कवि सम्मेलन में, कविगण लतीफे सुना रहे थे, पैरोडियाँ सुना रहे थे और लोगों को मज़ा आ रहा था. फिर वह डॉ. बशीर बद्र की ओर मुखातिब हुआ “लेकिन जहाँ एक तरफ लोग फूहड़ कविताओं का मज़ा ले रहे थे वहीं आपकी ग़ज़लें भी बड़े ध्यान से सुन रहे थे.”
मुझे लगा, इस युवा की इसी व्यथा को सवाल बनाकर प्रस्तुत करना चाहिए.
मैंने पूछा “डॉ. साहब, बताइए, ऐसे माहौल में हम जैसे लोग जो कुछ अच्छा सुनना चाहते हैं क्या करें? या फिर आप जैसे शायर या मेरे जैसे छोटे-मोटे कवि जो रिसालों में, अखबारों में भी छपते हैं और मंच पर भी जाते हैं… (डॉ. बशीर बद्र की यहाँ पर तात्कालिक प्रतिक्रिया थी “दोनो जगह जाना चाहिए”) लेकिन मंच पर ऐसा माहौल देखकर बड़ी तकलीफ़ होती है.”
बशीर बद्र साहब बहुत ध्यान से मेरी बात सुन रहे थे, फौरन बोल उठे
“तकलीफ़ तो हम लोगों को भी होती है, इस उमर में भी होती है, लेकिन इससे मुझे बहुत फ़ायदा हैं, जैसे आज से पचास बरस पहले जो कविता थी या आज से तीस बरस पहले हमने जो युनिवर्सिटी में पढ़ाया था उस वक्त की पहली लाइन या हमारी ही पढ़ाई हुई लाइन आज हमारे इम्तहान में आ जाए तो हम फेल हो जाएँ, इतनी मुश्किल भाषा में हम लिखते थे. आप लोगों की उम्र से ही बड़ी मैग्जीनों में छपने भी लगे थे, फिर धीरे-धीरे मंच पर भी जाना शुरू किया. मंच ने सहारा दिया, मौका दिया यह जानने का कि मीरा, कबीर, तुलसी, ग़ालिब, अमीर खुसरो से लेकर फैज़ और फ़िराक तक सिर्फ वही शेर बचे हैं जो इस भाषा में हैं जिसमें कि मैं आपसे बात कर रहा हूँ, बाकी जो जितनी कारीगरी किसी ने की है किताबों वाली भाषा में वो किताब में ही रहेगी. लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि हर आसान लिखने वाला इतना पापुलर हो जाए.”
“शेर, हिन्दोस्तान में एक हजार साल से इसी भाषा में हुए हैं उसके अलावा चाहें आप पर्शियन, अरबी, संस्कृत, अंग्रेजी किसी भाषा के स्कॉलर हो, जहाँ आपने इस भाषा को जिसमें मैं आपसे बातें कर रहा है, इसे छोड़ के जिसने लिखा वो समझो मारा गया.”
मैं समझ गया, डॉ. बशीर बद्र का मतलब लेखक के रूप में मारे जाने से या. बशीर बद्र बहुत आसान भाषा में अपने शेर कहते हैं यह जानकर मैंने पूछा “तो क्या कवि को बोलचाल की भाषा में या जनभाषा में ही कविता लिखनी चाहिए? “ “बिलकुल” वे बोले
“लेकिन हमे बहुत देर में यह पता चला और बहुत सारे हमारे साथियों, हमारे लोगों को आज तक पता नहीं चला, वो किताब की ज़बान ही लिखते हैं. हाँ कवि सम्मेलनों से मुझे फायदा मिला क्योंकि बेसिकली मैं उर्दू का शायर हूँ. कवि अगर उर्दू पढ़ने लगें और उर्दू के मुशायरों में जाएँ तो उन्हे और फायदा होगा. हाँ, अंग्रेजी शायरी से भी मैंने बहुत कुछ सीखा है, मगर मैं मज़ाक उड़ाता हूँ अंदर से. उनसे बस थोड़ा बहुत सीख लिया लेकिन उनके यहाँ ऐसी कोई विधा नहीं है जैसे ग़ज़ल. तो जो रोमांटिक पीरियड के बाद शायरी उनके यहाँ बस इंटेलेक्चुअल आदमी के खेल होकर रह गई और दिल तक तो बस फ़कीर जैसा आदमी पहुँचता है, ऐसा आदमी जो खोया हुआ हो जो… बस ‘फ़कीर’ अच्छा शब्द है उसके लिये. मीर हो या मीरा हो उसके लिये फ़कीर होना जरूरी है. फ़कीर का रिश्ता भगवान से, इंसान से बराबर के दर्ज़े पर होता है. वो खुद कुछ नहीं होता बस अकड़ होती है उसमें. वो हर आदमी से बात करना चाहता है, उसे लगता है जो बहुत पढ़े लिखे या बहुत दौलतवाले हैं, माफ कीजियेगा, सब बेवकूफ है ये आर्टिस्ट जो होता है बस ऐसे ही होता है”.
बशीर बद्र साहब को मैंने टी. वी. पर भी देखा था, रु-ब-रु भी सुना था और मंच पर भी. मुझे लगा कि मंच पर वे कुछ नाटकीय हो जाते हैं. अब कल ही मंच पर उन्होंने शुरुआत कुछ इस तरह की…” एक तरफ अटलबिहारी हैं. दूसरी तरफ जनरल मुशर्रफ और कैमरा यूँ घूम के मेरी तरफ आता है और मैं शेर पढ़ता हूँ…
मौहब्बत में दिखावे की दोस्ती ना मिला
गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी ना मिला
मुझे लगता है बशीर बद्र साहब इतने बड़े शायर हैं कि शेर पढ़ने से पहले उन्हें कोई भूमिका बांधने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. मैं पूछना चाहता था क्या आप हूट होने से डरते हैं लेकिन मैंने सवाल को जनरलाइज किया.. मुशायरों मे जब आप पढ़ते हैं या अन्य शायर पढ़ते हैं उस वक्त अगर ऐसा माहौल हो जाए कि लोग हूट करने लगें या फिकरे कसने लगें तो मंच पर जमे रहने के लिये ऐसी कौनसी चीज़ है जो शायर को ताकत देती है?
बशीर बद्र साहब छूटते ही बोले
“नहीं नहीं.. फिकरा तो वो शुरु में अच्छे से अच्छे शायर पर भी कसते हैं, वो लोग एक परसेंट या ज़ीरो परसेंट के बराबर होते हैं. अगर दो-चार आदमी हमारा या नीरज का कुछ बिगाड़ना चाहें तो वो नहीं बिगाड़ सकते. हाँ, हम अपना ही न पढ़ पायें या उनसे पढ़ते ही न बन रहा हो तो बात अलग है.”
“मतलब होते तो हैं ही आखिर ऐसे लोग?“ मैंने कहा.
“वो होते हैं, बेवकूफ, बेचारे, उनका कोई भरोसा नहीं, बकते रहते हैं” बद्र साहब बोले.
बद्र साहब ने जैसे ही नीरज का नाम लिया तो मुझे याद आया कि हिन्दी के कवि आलोचक डॉ. प्रमोद वर्मा ने इस बात का ज़िक्र किया था कि नीरज भी एक बार कवि सम्मेलन में हूट हो गए थे.
बशीर बद्र साहब जो कहना चाहते थे, मैं समझ गया था, फिर भी सवाल जेहन में था इसलिए पूछ बैठा..
“मतलब हम ये सोच लें कि हमें लोकप्रियता से कुछ नहीं लेना है, बस अपनी कविता पढ़नी है?”
“नहीं नहीं”
डाक्टर साहब ने कहा
“लोकप्रियता से लेना तो है, लेकिन मुझे लगता है जो पढ़े-लिखे नहीं होते, या जो पढ़े लिखे बनते हैं ख़तरा उन्हीं से है. उन्हें अवाइड करना चाहिए. वो समझ रहा है कि हम बहुत काबिल हैं, हम सब कुछ हैं फिर भी वो… खैर उसको माइंड नहीं करना चाहिए. हाँ अगर सब मिलकर आप को हूट कर रहे हैं तो वो मजमे की सायकलाजी हो सकती है. हो सकता है वो आप को सुन ही नहीं रहे हों और अगर सुन के हूट कर रहे हैं तो फिर खतरा है. खतरा ये हो सकता है, फर्ज कीजिए जैसे हम ग़ालिब का शेर सुना रहे हों”
“शुमार-ए- सुबहः मर्गूब -ए- बुत-ए-मुश्किल पसंद आया
तमाशाए – बयक – कफ बुर्दन ए सद दिल पसंद आया.”
“मतलब ग़ालिब जैसे बड़े शायर भी अगर ऐसे शेर पर हूट हो जायें तो उसमें क्या ताज्जुब? मैं भी हूट करनेवालों में शामिल हो जाऊंगा. वो उस वक़्त भी इस शेर पर हूट होता और आज भी. ये शायरी की ज़बान नहीं है भाई, देखिए आपको मिसाल मिल गई. मैंने ग़ालिब के दीवान का पहला शेर पढ़ा, बड़ी कोशिश के बाद भी ग़लत पढ़ा. क्या दाद दी जाएगी इस पर? उस ज़माने में भी, और सबसे बड़े शायर को. यही ग़ालिब जब आगे बढ़ेगा और जब असली शायर हो जाएगा तो फिर ऐसे शब्दों में बात कहेगा”
“हमको उनसे वफा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफा क्या है.“
“तो हमें दाद देना पड़ेगा. तो काबिलीयत बनाओ. ये जानकर कि यह बहुत बुरा शेर है ये चाहे जो हो कभी नहीं चलेगा, इसको कहने की हिम्मत नहीं थी पहले, चाहे जो समझो. बहुत बड़े काबिल आदमी का शेर है यह. इसके अंदर झाँको तो इसके बहुत से मायने निकलेंगे. शायरी, हिसाब लगा कर और किताब लिख कर और डिक्शनरी ले कर कभी नहीं हो सकती. ऐसा शेर क्लासिकी वगैरह के लिए जरूर कोई कोट कर सकता है लेकिन शेर की पहली ज़रूरत यह कि वो यूं निकले और सीधे दूसरे को याद हो जाए, और वो सिर्फ बोलचाल की भाषा में हो. अब देखिए इसमे जो इमेज उसने बनाई है हमीं नहीं समझ पाते. हम समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे. अब दूसरे वाले से आप कहें..’ नीली नीली कमीज़ आसमान की तरह’ तो समझ में आ रहा है, इसमें मज़ा आने लगा. अब उस आदमी ने क्या कहा था- पागल है हम जो पता लगाएँ? हम कोई जासूस हैं? दुनिया में अगर कोई चीज़ ऐसे ही पता लगाना है तो म्यूजियम में नहीं चले जाएंगे.”
बशीर बद्र साहब की बात पर मुझे भोपाल का साहित्य का म्यूजियम याद आ गया. बशीर बद्र साहब धाराप्रवाह अपनी रौ में बोले चले जा रहे थे..
“पागल हैं हम? जो टाइम खराब करें, खोल खोल के ढूंढे, गिलाफ खोले, फिर गिलाफ फाड़ें. वो पहले के ज़माने में जब शायरी बीस आदमियों के लिये की जाती थी, बाहर में एक नवाब साहब होते थे, उनके यहाँ जब मुशायरा होता था या और किसी के यहाँ तो तीस चालीस आदमी बुला लेते थे, वो सब मज़ा ले लेते थे. आज तो माइक है, सुनने वाले हैं.”
इतना कहकर बशीर बद्र साहब रुके, वो ट्रेन का अनाऊंसमेट सुनने लगे.
“और शायरी का मतलब केवल शब्दों के मीनिंग जानना नहीं है. कोई मुअम्मा नहीं है. जैसे ‘आसमाँ ये नीला नीला वो देखो रोशनी हो रही है’ ये लाइन अच्छी लग रही है बस, अब इसके अंदर कितना केमिकल है? कितना सोना है? कौन-सा तारा है? उससे कोई मतलब नहीं हम को.“
बातचीत चल ही रही थी कि पंजाबी के सुप्रसिद्ध कथाकार और दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति के अध्यक्ष गुलबीर सिंह भाटिया वहाँ पहुँच गये. मैंने बद्र साहब से उनका परिचय करवाया तो उन्होंने कहा “अच्छी तरह जानता हूँ भाई इन्हें.” मेरे शहर के दोनों नौजवान शायर अज़हर और इम्तियाज़ बहुत धैर्य के साथ डॉ. बशीर बद्र को सुन रहे थे. उनके जेहन में भी कुछ सवाल कुलबुला रहे थे. मौका देखकर अज़हर ने पूछ ही लिया
“आज सुबह जब कवि सम्मेलन अपने अंजाम पर था, आपने कहा था कि अज़ान से पहले मुशायरा खत्म हो जाना चाहिए अज़ान होने पर मैं पढ़ना बंद कर दूंगा.”
डाक्टर साहब तुरंत बोले
“अज़ान हो रही हो तो उसमें डिस्टर्ब करके मैं क्यों पढूंगा? खुदा का कलाम पढ़ा जा रहा है, मैं कैसे पढूँगा अपना कलाम? अज़ान क्या, आप रामायण पढ़ने लगिए मैं फौरन चुप हो जाऊँगा. नहीं चुप होऊँ तो गोली मार देनी चाहिए. जो आदमी अपनी रामायण की इज़्ज़त नहीं कर सकता वो कैसे हिन्दुस्तान बनाएगा. या फिर कोई ईसा का जिक्र कर रहा हो तो भी. अव्वल तो मैं कहूँगा ये क्यों हो रहा है मतलब मैं ग़ज़ल सुना रहा हूँ आप ये काहे सुना रहे हैं. अगर वो कहे ग़लती हो गई तो.. खैर छोडिए. मतलब, हमारे लिये रात भर पढ़िये मगर घंटा बजे राम मंदिर का चाहे अजान हो तो बंद कर दीजिए. इसीलिए ही तो लड़ाई होती है साहब. “
बात धर्म और साम्प्रदायिकता पर आई तो मैंने उन्हें बताया कि ‘दंगे के बाद’ शीर्षक से मैंने कुछ कविताएँ लिखी हैं जो ‘कल के लिए’ नामक पत्रिका में छपी हैं. मैं उनसे मेरठ के दंगों के बारे में पूछना चाहता था जिसमें उनका घर जला दिया गया था लेकिन मैं उनसे कोई सवाल करता उससे पहले इम्तियाज़ ने एक सवाल कर दिया..
“इस्लाम में, शायरी को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता, ऐसा क्यों है?”
डॉ. बशीर बद्र ने इम्तियाज के सवाल की गंभीरता समझते हुए फौरन जवाब दिया..
“नहीं नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है, रसूल अल्लाह के जो बहुत प्यारे शायर थे उनका नाम हस्सान था.. अब आज एक आदमी….”
इतना कहकर वे रुक गये. फिर अपना सूटकेस खोलकर उन्होंने एक किताब निकाली और कहा
“देखिए, ये देखिए, ये तस्वीरें हैं. ये इंदिरा गांधी, मीनाकुमारी, ज्ञानी जेलसिंह मौजूदा प्रेसिडेंट आफ इंडिया, मौजूदा प्रधान मंत्री अटलबिहारी, उनकी ये तस्वीरें हैं, उनकी तहरीरों की, लगी हैं इस किताब में, जिन्होने मुझसे ऐसे इश्क़ किया जैसे लड़कियाँ लड़कों से या अपने हीरो से करती हैं. अब हमारी तरह ऐसे भी हज़ारों शायर होंगे जो नफरत फैलायेंगे, जंग करायेंगे तो उनसे नफरत भी करेंगे यही लोग. तो मैं कह रहा था कि रसूल अल्लाह के बड़े महबूब शायर थे, उनका नाम ‘हस्सान’ था हस्सान इब्न साबित. जैसे मैं आज इंदिरा गांधी का महबूब हूँ, मीना कुमारी का महबूब हूँ. वो ऐसे हजारों शायरों की बुराई करेंगी तो फर्क तो है ना? उस शायरी को बुरा कहा गया है. अब हमें देखो, हम अपनी ग़ज़ल पढ़ रहे हैं लेकिन अगर मंदिर का घंटा बजे या मस्ज़िद की अज़ान होगी तो मैं नहीं पढूँगा. इसमें कोई ड्रामा नहीं है, पढ़ने से बड़ी इम्पोर्टेन्ट चीज़ हो रही है. पूजा से बढ़कर मेरी ग़ज़ल थोड़े ही है यार.”
मुझे लगा अब सही वक्त है उनसे मेरठ के हादसे के बारे में पूछ लेना चाहिए. मैंने कहा “डाक्टर साहब, एक बेकार-सा सवाल है लेकिन बहुत दिनों से जेहन में घूम रहा है. मेरठ में, दंगे में आपका घर जलने के बाद जब आपने ग़ज़ल पढ़ी तो क्या आपके मन में कहीं पर कुछ खौफ था?” “नहीं बिलकुल नहीं” उन्होंने तुरंत प्रतिवाद किया. आप देख सकते हैं मुझ पर लिखी इस किताब में वो शेर है जो मैंने उसके बाद लिखा था..
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाने बस्तियाँ जलाने में”
“जी हाँ, इस पर पोस्टर भी बने थे, पूरे देश में चस्पा किये गये थे.“ मैंने कहा. बशीर बद्र साहब फिर किताब की तस्वीरें दिखाने लगे “ये देखिये ये मौजूदा प्रेसिडेंट आफ इंडिया हैं जो तकरीर कर रहे हैं, कह रहे हैं ‘नहीं कह पा रहा हूँ इसलिये बशीर बद्र के सहारे अपनी बात कह रहा हूँ.‘ ये देखिये ये अटलबिहारी हैं ये मैं हूँ. ये लता जी हैं, ये कह रही हैं मुझे बशीर बद्र ने बता दिया है,
“शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है. “
टाइम्स ऑफ़ इंडिया बॉम्बे में और ज्ञानी जैलसिंह जब मरे तो उनकी जुबान पर खुदा का नाम नहीं बशीर बद्र का शेर था..
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए.“
“ये देख लीजिए इंडिया टुडे ने लिखा है, मैंने थोड़े ही लिखा है.”
मैंने उन्हें बीच में ही रोककर कहा
“इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद भी तो हुआ है. “
हाँ वाणी वाले ने किया है, उन्होंने बताया “उसमें उर्दू में लिखने वाले नहीं है, तस्वीरें सब वाणी की हैं जो हमने इसमें लगा दी हैं.“ इतना कहकर वे फिर किताब के पन्ने पलटने लगे
“और ये देखिये, ये इंदिरा गांधी के एक दोस्त का ख़त है उसने लिखा था कि “बशीर बद्र से वो इश्क़ करती थी, मुझे उसने खत लिखा था, ऐसा ये लिख रही हैं, रांची युनिवर्सिटी की डीन फैकल्टी आफ आर्ट्स. वो कहती थी, ठीक है भाई मैं कहीं ज्यादा उनके फंक्शन में नहीं जा सकती या उनको खतो किताबत नहीं कर सकती, मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ मतलब ये के ज़ाहिर है उनकी मजबूरी थी. मैं ड्रामा बना देता जैसे मैं आज कह रहा है उस वक्त कह देता तो गड़बड़ होता.”
डॉ. बशीर बद्र की बातों से हमें इतना तो समझ में आया कि जिस तरह रसूल अल्लाह के महबूब शायर हस्सान थे उसी तरह बद्र साहब भी कई बड़े बड़े सुविख्यात लोगों के महबूब शायर रहे हैं, लोग उनसे इश्क़ करते रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि उनसे इश्क़ करने वालों में, उन पर मरने बालों में हर वह आदमी शामिल है जिसने उनकी शायरी को गहराई से महसूस किया है. चाहे वह ख़ास हो चाहे आम.
बशीर बद्र साहब किताब के पन्ने पलटते हुए कह रहे थे “ये देखिए गुलज़ार ने लिखा है, ‘बशीर बद्र मेरे उस्ताद जैसे हैं’, फिल्म वाले गुलज़ार है ये. ये फ्रेंच में मेरा ट्रांसलेशन हुआ है, आप पढ़के देख लो.”
भाटिया जी ने पूछा, “क्या ये वही किताब है जो वाणी से हिन्दी में आई है? बद्र साहब ने बताया “वाणी से हिन्दी में आई है. उर्दू वालों ने उर्दू में निकाली है इसके लिखने वाले दूसरे हैं. इसमें जलने का सिर्फ इतना जिक्र है… मेरठ के जलने के बाद” वे फिर तस्वीरें दिखाने लगे “ये घनश्याम सिंह, ये मेरी बेटी, ये सुनीता, ये फलाँ, सब हैं फिर क्या जला आपका?”
मुझे लगा था कि मेरठ के दंगों में अपने घर के जलने का ज़िक्र वे पीछे छोड़ चुके हैं लेकिन अब वो उसका खुलासा कर रहे थे… “जब आप कह रहे हैं कि मेरठ के जलने के बाद आपका यह कारनामा है. मेरा नक्शा देखिये, अब भी पाजिटिव हूँ, आप पाजिटिव रहिए हमेशा.” बशीर बद्र साहब को यह सवाल चुभ गया था, वे लगातार बोले जा रहे थे.. “आप कहते हैं मेरा घर जल गया, कहाँ आपका घर जला? कौन सा जला बताइये? तीन कमरे में आप रहते थे, आज दस कमरों में आप रहते हैं, यह बताने के लिये है, जवाब देने के लिये है ताकि आपको गलतफहमी न हो इसलिये में कह रहा हूँ के दस कमरों में रहता हूँ मैं अब, मेरे तीन गाडियाँ हैं, मेरे तीन ड्राइवर हैं. क्या जला मेरा बताइये?
उन्हें भावावेश में आता देख मैंने माहौल को हल्का करना चाहा, जी हाँ, घर तो घर है, घर कमरों से तो होता नहीं पहली बात. गुलबीर सिंह भाटिया जी को लगा कि मैं कहीं उनकी बात का और मतलब तो नहीं ले रहा हूँ, उन्होंने स्पष्ट किया “जी हाँ बशीर साहब का भी मकान ही जला था वो मकान ही था, घर कैसे जल सकता है.”
डॉ. बशीर बद्र घर और मकान की इन परिभाषाओं में उलझने वाले नहीं थे, हमारी परेशानी को समझते हुए वे बोले..” नहीं जलना-वलना मतलब सब जल रहा था. जलाने वाले अगर एक थे तो बनाने वाले दस थे. आप ये क्यों नहीं कहते कि जिसने इत्तफाक से मेरा एक कमरा जलाया था उसका नाम एक.. एक… प्रकाश सिंह था लेकिन दूसरे दस प्रकाश सिंह ने एक कमरे के बजाय दस कमरे बना दिये.“
मेरठ के दंगों में घर के जलने के इस जिक्र को मैं यहीं खत्म करना चाहता था. मैंने कहा “डाक्टर साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया, आप की ये बेशकीमती बातें हम लोगों को बहुत आगे तक दिशा दिखाएगी.” लेकिन उनका मेरठ एपिसोड अभी खत्म नहीं हुआ था, उस जिक्र ने उन्हें भावुक कर दिया था और वे लगातार कुछ न कुछ कहे जा रहे थे… “ देखिए मैं जो तस्वीर दिखा रहा हूँ, ये घनश्याम सिंह राजा की है, वो मेरा बेटा था उसने कहा कि बाप का घर जल गया है, इसमें रहो मेरे पास, उस वक्त तक मैं वहीं रहा. फिर जब तक उससे अच्छा घर मेरा नहीं बन गया. तो बताइये कहाँ जला? वो जहाँ मैं रहा मेरी बहू थी, वो मेरे नाती पोते थे, सब हिन्दू.“
भाटिया जी ने अपनी टिप्पणी दी “जो बिगाड़ने वाले हैं उनकी नज़र जानबूझकर वहाँ नहीं पड़ती, उनकी नज़र वहाँ पड़ती है जहाँ से कुछ बिगड़ता है.” इस बीच मेरा ध्यान प्लेटफार्म पर भीख मांगने वाली उस भिखारन की ओर चला गया जो हम लोगों के पास आकर खड़ी हो गई थी.. “खाना दे दे बेटा, रुपया आठ आना दे दे बेटा, मोर दूनो पैर नहीं चले हैं बेटा..”में सोचने लगा वह मेरा धर्म, जाति, ओहदा कुछ भी जाने बगैर मुझे बेटा कह रही है, यही तो है रिश्तों का अहतराम. यह हमारा ही देश है जहाँ बशीर बद्र अपना घर जलने पर अपने बेटे घनश्याम सिंह के यहाँ रह सकते हैं. बशीर बद्र साहब अब इस किस्से को खत्म करने जा रहे थे..
“मुझे कंपनसेशन दिया गया, मैंने वापस कर दिया. मैंने कहा मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ. तो जैसे बिजनेस हैं कि आपने दस लगाया और सौ कमाया. फिर इससे मेरी आइडियालॉजी मज़बूत हुई कि जो निगेटिव है वो सर्वाइव नहीं करेगा और ये के जो हिन्दू मुस्लिम राइट हैं ये हिन्दू-मुस्लिम में होता ही नहीं है, गुंडे लूटते हैं शरीफ आदमियों को.”
अजहर और इम्तियाज डॉ. बशीर बद्र से उनकी रचना-प्रक्रिया पर बात करना चाहते थे लेकिन उन्हें अब तक मौका ही नहीं मिला था. बात खत्म हुई जान कर अज़हर ने तुरंत सवाल किया..”लिखते वक्त आपके जेहन में क्या आता है?”
बद्र साहब ने जवाब दिया-
“बस खयाल आता है, लिखते हुए कुछ पता नहीं होता, हाँ फाइनल टच होते होते उसमें जान पड़ जाती है. असल में कोई भी आर्टिस्ट जब आपकी तस्वीर बनाने लगता है तो उसको लगता है जैसे वो लकीर खींच रहा है और लास्ट में उसने आपको बना दिया. अब आपके साथ आपका दिल भी बन जाता है. बनने के बाद उससे हमारा ताल्लुक बहुत कम होता है. हर शेर की, हर आर्ट की एक अलग हैसियत होती है वो अपने बनाने वाले से बिलकुल अलग हो जाता है याने खुदा के मुकाबिल, ये मैं कह सकता हूँ, बस बना दिया, निकल गए. ऐसे मेरी चीजें निकल जाती हैं, बनके कभी वो दुश्मन भी बन सकती हैं मेरी आइडियालॉजी की. जैसे बाप सोच नहीं सकता कि गरीब आदमी का लड़का इतना बड़ा आदमी हो जाएगा वैसे मेरे शेर भी हो जाते हैं और मेरे ही रहते हैं और इनमे से जो नालायक होते हैं, मुझसे भी ज़ियादा नालायक होते हैं वो मर जाते हैं. बस क्रियेशन के बाद, या जैसे माँ-बाप बनने के बाद आप आज़ाद हो जाते हैं.“
अज़हर ने मौका देखकर फिर एक विद्यार्थी की भांति सवाल किया, “लिखने के लिए बेहतर वक्त कौन-सा मानते हैं आप?” बद्र साहब साहित्य के छात्रों के ऐसे सवालों के शायद आदी थे तुरंत बोले “नहीं कोई वक्त नहीं, बिलकुल नहीं. ग़ज़ल की राइटिंग तो दो लाइन की राइटिंग है. एक पूरा खयाल, एक पूरा आइडिया, एक पूरा शहर बसाता रहता हूँ.”
इस बीच उनकी ट्रेन आ गई. मुझे लगा अब विदाई का वक्त आ गया है. मैंने बातचीत को समाप्त जान उनसे कहा “आपसे हुई तमाम बातें, आपके विचार हम लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं यह बातचीत यदि में किसी रिसाले या अखबार में दूँ तो आप को कोई एतराज तो नहीं?” वे बोले आप बिलकुल दीजिए, जरूर दीजिए और मैं मना करूँ तो ये भी लिख दीजिए के वो मना कर रहे थे और दे दीजिए.”
हँसते हुए हम लोगों ने उनका सामान उठाया और ट्रेन में खिड़की के पास उनकी रिज़र्व सीट पर उन्हें बिठाकर खुद नीचे प्लेटफार्म पर आकर खड़े हो गए. बातचीत का सिलसिला फिर शुरु हो गया. मैंने उनसे पूछा “आपको मैग्जीन वगैरह तो करीब-करीब सभी देखने को मिल जाती होंगी वहाँ? उन्होंने बताया “हाँ बहुत सारी तो मेरे पास आती हैं. कुछ लायब्रेरी वगैरह में देखने को मिल जाती है. बांबे के, भोपाल के कुछ बड़े पर्चे जब ग़ज़ल अंक वगैरह छापते हैं तो ग़ज़लें मंगाते हैं.“
मैंने पूछा हमारे यहाँ से ‘सापेक्ष’ नामकी एक पत्रिका निकलती है, महावीर अग्रवाल उसके सम्पादक हैं उसके ग़ज़ल अंक में आपकी ग़ज़ल थी, मिली होगी आपको?” “हाँ हाँ मिली थी” उन्होने बताया. फिर मैंने कहा “ग़ज़लें तो आजकल सभी पत्रिकाएँ छाप रही है हिन्दी की, भोपाल से ‘वसुधा’ निकलती है, कमला प्रसाद जी उसके सम्पादक हैं. जबलपुर से ज्ञानरंजन जी ‘पहल’ निकालते हैं पाकिस्तान की शायरी पर भी उन्होने अंक निकाला है.”
बात अब पाकिस्तान की शायरी पर आ गई. बशीर बद साहब कहने लगे
“आप देखिये पाकिस्तान के शायरों की ग़ज़ल का भी वही शेर मशहूर हुआ जो उस जुबान में हुआ जिस लैंग्वेज का शेर इंडिया में ग़ज़ल का होता है. बाकी उनके यहां पर्शियन के शब्द ज़ियादा आते हैं. इसकी एक वज़ह यह है कि उनकी और सिस्टर लैंग्वेजेस जो वहाँ के पठान, पश्तो और सिंधी बोलते हैं, पर्शीयिनाइज्ड ज़ियादा है. पर्शियन का असर हमारी उर्दू, हमारी हिन्दी पर बहुत है मसलन हिन्दी, हिन्दू, हिन्दोस्तान ये सब अरबी के शब्द है. फ़र्ज़ कीजिए हम टीचर हैं, आप पूछते जाइये हम आपको बताते जायेंगे, बेसिकली कौन-सा शब्द अंग्रेजी फारसी या अरबी का है. लेकिन अल्टीमेटली अब आखिर में जो बात मैं आपसे कह रहा हूँ आप तीनों को चौंकाने वाली बात होगी. इम्तहान में जीरो दे दिया जाएगा अगर मैं ये बात न कहूँ कि उर्दू बारहवीं तेरहवीं शक्ल है संस्कृत की. इसका अपनी खानदान के लिहाज से अरबी फारसी से कोई तआल्लुक नहीं. खड़ी बोली से हमारी ज़बान निकली है उर्दू, हिन्दी दोनों और दोनों जब तक अपनी लिपि में नहीं लिखी जाती कोई नहीं बता सकता कि ये उर्दू है या हिन्दी. उसे आप अंग्रेजी में भी लिख सकते है, पश्तो में भी. लिखने से कुछ नहीं होता. दो सौ साल से उर्दू इसी लिपि में ज़रा ज्यादा अच्छी लिखी जाती है, यह फारसी से मिलती जुलती है लेकिन फारसी है ही नहीं इसमे आठ नौ हर्फ ऐसे हैं जो फारसी में है ही नहीं ड़ ट ढ द वगैरह.”
डॉ. बशीर बद्र एक भाषाविद की तरह अपना बयान दे रहे-
“देखिए ये मेरे सामने टेप रखा है (हम उनकी बातें एक टेप रिकॉर्डर में टेप कर रहे थे) मैं आपको बताता हूँ कि अगर लाहौर, पेशावर, ढाका कहीं भी एम.ए. में यह सवाल आये कि उर्दू किस भाषा से निकली है ओरिजनली और कोई संस्कृत के अलावा कुछ और लिख दे तो उसे जीरो दे दिया जाएगा. ये ज़रूर है कि संस्कृत की पाली हुई फिर अपभ्रंश हुई, फिर ये हुई वो हुई, दिल्ली के पास खड़ी बोली, मथुरा के पास ब्रजभाषा हुई. मौहम्मद हुसैन आज़ाद लिखते हैं कि जन भाषा से हुई तो ब्रज भाषा तेरहवीं शक्ल है संस्कृत की. कुछ लोगों ने कहा कि खड़ी का असर है तो खड़ी भी तेरहवीं शक्ल है संस्कृत की. आप लाहौर के ईरान, बंगलादेश, अलीगढ़ के किसी लिंगविस्टिक के प्रोफेसर से पूछ लीजिए. हाफिज़ महमूद शीरानी ने लिखा कि उर्दू पंजाबी से निकली, किसी ने लिखा सिंधी से निकली, लेकिन पंजाबी सिंधी भी तो संस्कृत से निकली है. ‘लिंगविस्टिक सर्वे आफ इंडिया’ किताब ग्रियर्सन ने लिखी है उसने भी यही लिखा है.”
अपनी बात के पक्ष में डॉ. बशीर बद्र तर्क दे रहे थे “इसमें कोई बहस है ही नहीं. ‘इट हैज नो कंसर्न विद अरबी फारसी’. हां यह बात अलग है कि जो भाषा हम इस्तेमाल करते हैं जैसे जहाँ आप खडे हैं- प्लेटफार्म, ट्रेन, रिजर्वेशन, तीस परसेंट तो अंग्रेजी के शब्द है बाकी तीस परसेंट अरबी, पर्शियन के होंगे. हिंदी, हिन्दू, उर्दू, किताब, शाम, सुबह सब फारसी के शब्द है लेकिन आऊंगा, जाऊँगा, खाऊँगा, नहीं लडूंगा ये संस्कृत से आए लफ्ज़ हैं. दुनिया में ज़बान व्हर्ब से पहचानी जाती है और व्हर्ब हिंदी है हमारा और वह निकला है संस्कृत से. हिन्दी उर्दू दो अलग जबान है ही नहीं, लिपि अलग है.
मैंने बीच में हस्तक्षेप किया “लेकिन संस्कृत को शुरु में ब्राह्मणों, पंडितों की भाषा कहा जाता था, इसे लोकभाषा बनाने के लिये ही उसकी शक्ल बदली गई, पाली हुई फिर…” बशीर बद्र साहब तुरंत बोले “नहीं वो मिलना शुरु हो गई थी. हाँ गौर से एक बात और सुनिये, साउथ में जो ज़बान है वो द्रविड़ की है, अलग खानदान की है, द्राविड को हमने धक्का मार मार कर भेज दिया, तभी तो जयललिता डंडा लिये घूम रही है, चार हजार साल का मामला है आखिर.”
अज़हर ने एक नज़र रेल के इंजन की और डाली और अपना अंतिम प्रश्न किया
“तो उर्दू यहीं की पैदाइश है, उसका जन्म कब हुआ होगा?”
डाक्टर साहब ने बताया-
“जब उर्दू रस्मूल खत यानी लिखने की भाषा बनी यानी मुसलमानों के आने से जब पर्शियन का असर पड़ा तो हम लोगों ने सीख लिया, उस वक्त कबीर, मीरा के पहले, सात सौ पचहत्तर बरस पहले, जैसे अमीर खुसरो का शेर ‘गोरी सोवै सेज पर’ इसमें तो पर्शियन का कोई शब्द मिलेगा ही नहीं.“
मैंने ज़िहाल-ए-मिस्कीं मकुन बरंजिश” जैसी भाषा की ओर इशारा किया तो वे बोले..
“हॉ मिक्सिंग भाषा की उस वक्त भी होती थी, आज भी होती है.”
इतने में ट्रेन की सीटी सुनाई दी और ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ते हुए धीरे धीरे रेंगना शुरु किया. डॉ. बशीर बद्र ने कहा
“अच्छा अब आप लोग हट जाइये, ट्रेन चल पड़ी है.“
हम लोगों ने उन्हें शुभकामनाएँ दी और शुक्रिया अदा किया और फिर आने की दावत दी.
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शरद कोकास
sharadkokas.60@gmail.com
| बशीर बद्र (5 फ़रवरी 1935 – 28 मई 2026) पीएच.डी. (अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से) छह काव्य-संग्रह इकाई, इमेज, आमद, आस, आसमान और आहट प्रकाशित |




शरद कोकास की लरजती जुबान में एक बेहतरीन शायर से गुफ्तगू पढकर बहुत अच्छा लगा। मैं भी अनेक दफा मिला हूँ उनसे। ये बहुत महत्वपूर्ण चर्चा है।
नमस्कार भाई जी
बहुत ही अच्छा लगा… मुझे लग रहा था दुर्ग स्टेशन में तब मैं भी बैठा था शायद आप लोग के आस पास…
ऐसे अनुभव और आपकी प्रस्तुति स्तुतय एवं अनुकरणीय है।
प्रसंग को शेयर करने हृदय से आभार एवं साधुवाद।
राजीव अग्रवाल
सदभावना सदैव आपके साथ 🙏🙏
किसी भी कला में पारंगत होने के लिए डूबना पड़ता है और महान् होने के लिए मरना पड़ता है।
बशीर बद्र साहब तो शायरी के समंदर में उतराते रहे और जीते जी महान् होने का तमगा भी पाये।
गजब है भाई
स्टेशन पर ट्रेन के देरी से आने से मिली मोहलत में हुई यह बातचीत जीवन और समाज के हर पहलू को बाखूबी अपने में समेटे हुए है. हर सवाल का सच्चा,साफ़गोई भरा और बेख़ौफ़ जवाब.
बशीर बद्र बेहद संजीदा इंसान थे. बरसों पहले चंडीगढ़ में किसी के घर में हुई बहुत ही छोटी सी महफ़िल में देर रात तक उनकी कोमल और भावुक आवाज़ में गज़लें सुनना मेरी स्मृति में हमेशा दर्ज रहेगा. वह महफ़िल सिर्फ उनकी शायरी को समर्पित थी. सोचिए! कैसा माहौल रहा होगा. उनकी सादगी भी लाज़वाब थी. उन की सोहबत में थोड़ा सा वक्त गुज़ारने पर ही हर शख़्स उनसे जुड़ाव सा महसूस करने लगता. एक दो बार बड़ी महफ़िलों में भी उनसे मिलना हुआ. तुरंत पहचान लेते.
वह न रहकर भी हमारे दिलों में हमेशा महफ़ूज़ रहेंगे.
स्मृति नमन…
शरद कोकास के द्वारा मरहूम डॉ बशीर बद्र साहब,जो पद्मश्री से सम्मानित गजलकार, अदबकार थे, से लिया गया साक्षात्कार को पढ़कर बद्र साहब के जेहन के बारे में जानने समझने का मौका मिला। बद्र साहब की एक बात मुझे अच्छी लगी,सीख भी मिली कि बहुत कुछ खोकर भी हमेशा सकारात्मक ( पाज़िटिव) बने रहें। कोई एक आपका बिगाड़ता है तो दस बनाने वाले खड़े या तत्पर रहते हैं। हिन्दू मुस्लिम लड़ते नहीं,लड़वाए जाते हैं गुंडों और मवालियों के द्वारा। शुक्रिया ।
DrBasheer Badar emerged so living in this informal interview that I feel I am with them. I use some Urdu couplets in my lectures on Excellence and sometimes a bit of Hindi. I think in future when I talk about Lahore ( I was born there) I will use the eternal words of janaab Badar saheb with deep regards. Jitendramohan Professor Emeritus of Psychology, Panjab University Chandigarh. 9876491321