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समालोचन

Home » नामवर होने का अर्थ : अरविंद त्रिपाठी

नामवर होने का अर्थ : अरविंद त्रिपाठी

by arun dev
July 28, 2026
in आलेख
Reading Time: 6 mins read
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नामवर होने का अर्थ :  अरविंद त्रिपाठी
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नामवर होने का अर्थ

अरविंद त्रिपाठी

आजादी के बाद हिंदी साहित्य में जिन थोड़े से साहित्यकारों के मान और महत्व में लगातार वृद्धि उनके जीवन काल में ही हो चुकी थी उनमें आलोचना के क्षेत्र में रामविलास शर्मा और नामवर सिंह का नाम सर्वोपरि है. खास तौर से नामवर सिंह जितने महत्वपूर्ण आलोचक के रूप में विख्यात थे, उतने ही साधारण समाज के लोग–बाग के लिए लोकप्रिय बने रहे हैं. हिंदी में आमतौर पर आलोचक को वह प्रतिष्ठा नहीं दी जाती है जो कवि–कथाकार को सहज ही मिल जाती है, लेकिन नामवर सिंह इसके अपवाद थे. हिंदी साहित्य के इतिहास में ऐसी प्रतिष्ठा अपने जीवनकाल में सिर्फ रामचंद्र शुक्ल को नसीब हो पाई थी. रामविलास शर्मा का आलोचक व्यक्तित्व और अवदान नामवर सिंह से कहीं बहुत बड़ा है, पर उनकी लोकप्रियता नामवर सिंह के मुकाबले बहुत क्षीण रही है. हालांकि रामविलास शर्मा अपने उत्तर जीवन में लंबे समय तक दिल्ली के विकासपुरी इलाके में रहे. अंतिम समय तक लिखने की मेज पर डटे रहे पर उनका सार्वजनिक जीवन नहीं के बराबर था. जब कि नामवर जी का पूरा जीवन साहित्य के साथ-साथ हमेशा सामाजिक और घुमंतू रहा है. इस लिहाज से देखा जाए तो नामवर सिंह, राहुल सांकृत्यायन के बाद सबसे ज्यादा घुमंतू लेखक आजीवन बने रहे. तिरानबे वर्ष की आयु में शरीर से अशक्त हो जाने की बावजूद वे दिल और दिमाग से हमेशा चलते-फिरते बौद्धिक बने रहे. वे इस तरह हमेशा बुढ़ापे पर हावी रहे, बुढ़ापा उन पर कभी हावी नहीं हो पाया. उनका हमेशा सजग और सक्रिय बने रहने का एक बड़ा राज यह था कि वे हमेशा हमउम्रों के बजाय युवा वर्ग के लेखकों, पत्रकारों ,छात्रों और सामाजिक परिवर्तन से जुड़े कार्यकर्ताओं से घिरे रहे. फ्रांस के महान लेखक ज्या पाल सार्त्र की तरह सतत चौकन्ने और साहित्यिक, सांस्कृतिक कर्म के प्रति लगातार सक्रिय और उत्साहित.

नामवर सिंह की लोकप्रियता का राज यह भी है कि वे सिर्फ साहित्यकार भर नहीं थे बल्कि बनारस के युवा काल में काशी विश्वविद्यालय हिंदी विभाग प्राध्यापकी छोड़कर 1959 में परिवार और मित्रों की इच्छा के विरुद्ध जाकर चंदौली (वाराणसी )संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव समर में कूद पड़े. सिर्फ पाँच हजार रुपये जुटाकर एक पुरानी जीप के सहारे, गांव गांव घर-घर लोगों से जन समर्थन के लिए निकल कर साधारण लोगों के जीवन के सुख-दुख को नजदीक से जाने समझने का अवसर प्राप्त किया. कई बार भूखे ,प्यासे साइकिल और पैदल चलकर उन्होंने हर घर पहुंच कर दीन–हीन, बदहाली का जीवन जीने वाले किसानों, मजदूरों, मेहनतकशों की जमीनी हालात का जायजा लिया. यद्यपि उस चुनाव में ,वह त्रिभुवन नारायण सिंह जो कांग्रेस के उम्मीदवार थे, के मुकाबले में चुनाव हार गए थे पर नामवर सिंह जीवन से हताश और निराश कभी नहीं हुए.

विपरीत से विपरीत स्थितियों में जीने की राह ढूंढने वाले नामवर सिंह का जीवन समतल मैदान कभी नहीं रहा. देश के हिंदी विभागों के सिरमौर प्रोफेसर होने के बावजूद उन्हें स्थाई प्राध्यापकी पाने के लिए बनारस से सागर, जोधपुर शहरों की खाक छाननी पड़ी, तब जाकर जेएनयू नई दिल्ली में पक्की नौकरी कामयाब हुई. उन्हें अपने जमाने के दिग्गज प्रोफेसर नंददुलारे बाजपेयी, डॉ नगेंद्र सरीखे लोगों से कड़ी टक्कर लेनी पड़ी. इस तरह नामवर सिंह को लगभग एक दशक तक दिल्ली जीवन में विविध और कठिन जीवन जीना पड़ा.

जनयुग की संपादकी, राजकमल प्रकाशन के सलाहकार आदि नौकरियों को आजमाते हुए अंततः वे जेएनयू पहुंचे. पर वे विशुद्ध प्रोफेसरों की धंधई मे शामिल नहीं रहे. जेएनयू में भी उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के पाठ्यक्रम को आमूल चूल बदल डाला. ‘आलोचना’ पत्रिका का लंबे कालखंड तक संपादन करते हुए उन्होंने आलोचना को कम्युनिस्ट विचारधारा का घोषणा पत्र नहीं बनने दिया बल्कि ‘आलोचना’ को हमेशा समावेशी, दूसरे के विचारों का सम्मान करने वाली पत्रिका बनाने की कोशिश की. अपने विरुद्ध लिखी आलोचना बर्दाश्त करने वाले वे सचमुच आले दर्जे के संपादक थे. इन पंक्तियों के लेखक ने ‘आलोचना’ पत्रिका में नामवर जी के साथ बतौर सह-संपादक कार्य करते हुए हमेशा महसूस किया कि नामवर जी बतौर संपादक कितने कल्पनाशील, बहुआयामी और दूसरों के विचारों को हमेशा आदर देने वाले संपादक थे. वे अपने विचार दूसरों पर लादने के हरगिज विरुद्ध थे. ऐसा व्यवहार वही व्यक्ति कर सकता है जो विचारों से गहरे स्तर पर लोकतांत्रिक और सच्चा समतावादी हो. जो लोग नामवर सिंह के बेहद नजदीक और अतरंग रहे हैं उन्हें पता था कि नामवर सिंह कभी भी लकीर के फकीर नहीं बने. उनके कार्य व्यवहार और विचार में हमेशा एक नई लकीर खींचने की कोशिश दिखती रही है. उनकी यह कोशिश उनके समग्र लेखन, संपादन एवं शिक्षण कार्यों में भी देखी जा सकती है. यह विलक्षण कार्य शैली कम लेखकों में दिखाई पड़ती है.

असल में इस विलक्षण कार्य शैली को हासिल करने में नामवर सिंह का किसान संस्कृति से लगाव हमेशा कायम रहा. देखा जाय तो इस दिशा में आज भी पूर्वांचल का किसान सबसे ज्यादा जोखिम लेता और भोगता है. बाढ़, सूखा ,ऊसर जमीन प्रकृति की मार का सबसे ज्यादा शिकार किसान ही होता है, जो रात दिन जोखिम से भरा जीवन व्यतीत करता है. नामवर सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्व के निर्माण में इस किसान संस्कृति का विशेष हाथ है. मेरे जैसे नए लेखक जब उनके संपर्क में आए तो पहला आकर्षण उनका किसान-जीवन की संस्कृति का खुला मिजाज और उनकी दिनचर्या थी जो मुझे दिल्ली जीवन में सिर्फ नामवर सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी में दिखाई दी. वेशभूषा से लेकर बातचीत और व्यवहार के अंदाज में नामवर जी के किसान लगाव उनकी जन्म भूमि जीयनपुर से विरासत में मिली थी.

जीयनपुर को ऊसर गांव भी कहा जाता है जहाँ बाजरे की खेती ज्यादा उपजती थी. नामवर के पिता नागर सिंह मूलतः किसान और पेशे से प्राथमिक स्कूल के शिक्षक थे. एक छोटे काश्तकार और स्कूल मास्टर की संतान नामवर सिंह भूख,अभाव और अशिक्षा से भरे सामाजिक परिवेश की उपज थे. शुरुआती जीवन में बाजरे की रोटी और मठ्ठा पीकर उन्होंने पढ़ाई – लिखाई आरंभ की थी. पिता शिक्षक थे, अतः चाहते थे कि बेटा भी अध्यापक बने, कहीं ऊँची जगह जाए. गौर किया जाए तो कालांतर में नामवर सिंह का बनारस पहुंचकर पूरा अध्यवसाय, अध्ययन और अध्यापन का ही बना रहा. फिर उनका सानिध्य जब हजारीप्रसाद द्विवेदी से हुआ तो साहित्यिक ज्ञान की भूख और साहित्य के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने की चाहत आगे बढ़ने लगी. नामवर सिंह शुरू में गीत लिखा करते थे. उस दौर में शंभूनाथ सिंह के गीतों की बनारस में धूम थी. बाद में ठाकुर प्रसाद सिंह, विजय देवनारायण साही और खुद नामवर सिंह ‘पुनीत’ उपनाम से गीत लिखने लगे थे. जाहिर है तब मंच की कविता की लोकप्रिय विधा गीत थी. नामवर सिंह उस दौर में गीत लिखकर मंचों की शोभा बढ़ाया करते थे. उस दौर में वे अपने पहले गीतों के संकलन को ‘नीम के फूल’ के नाम से प्रकाशित करना चाहते थे, पर जिस प्रेस से वह संकलन छपने की प्रक्रिया में था वह अचानक तालाबंदी का शिकार हो गया. इस तरह नामवर सिंह के कवि ‘पुनीत’ अचानक दुर्घटना के शिकार हुए.

उनकी दूसरी पुस्तक जो अब पहली पुस्तक के रूप में जानी जाती है ‘बकलम खुद’ प्रकाशित हो गयी. नामवर सिंह के अभिन्न मित्र केदारनाथ सिंह उन दिनों बनारस जीवन के शुरू में गीत ही लिखा करते थे. अब यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि नामवर सिंह के आलोचक व्यक्तित्व के निर्माण में उनके कवि व्यक्तित्व की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. इस सिलसिले में केदारनाथ सिंह का यह है निकर्ष महत्वपूर्ण है कि

“यह प्रकृति का विचित्र न्याय है कि उनका निबंध संग्रह ‘बकलम खुद’ तो छप कर आ गया जबकि वे निबंधकार के रूप में जाने नहीं जाते थे और वे जाने जाते थे कवि के रूप में ही. मैं कई बार सोचता हूँ कि यदि वह संग्रह आ गया होता तो नामवर जी के विकास का ग्राफ क्या वही होता जिसे आज हम जानते हैं ? आज यदि कहा जाए कि नामवर सिंह मूलतः कवि हैं तो बहुतों को अटपटा लगेगा और कइयो को विश्वास भी नहीं होगा. पर सच्चाई यह है कि अपने आलोचना कर्म के बीच भी उनके भीतर का कवि हमेशा जीवित रहता है जीवित ही नहीं सक्रिय और रचनारत भी. ”
(पहल : नामवर सिंह विशेषांक :पृष्ठ 47- 48)

कहना न होगा कि नामवर सिंह के आलोचकीय व्यक्तित्व के निर्माण में उनके भीतर छिपे हुए कवि का बहुत बड़ा योगदान है. उनका वह कवि स्वभाव बराबर कविता की आलोचना के प्रति उन्हें उदग्र, अनुरागी और रसग्राही बनाता है. गौर किया जाए तो नामवर सिंह मूलतः कविता के बड़े आलोचक हैं. यद्यपि उन्होंने कहानी आलोचना भी लिखी है पर उनका मन काव्यालोचना में ज्यादा रमता है. जहाँ वे श्रेष्ठ अवदान कर पाए. बाद के वर्षों में कहानी आलोचना को उन्होंने देवी शंकर अवस्थी के हवाले कर दिया. उनकी आलोचना दृष्टि में कविता के प्रति उनका आकंठ लगाव बराबर नई रचनाशीलता के प्रति उन्हें हमेशा उत्सुक ही नहीं, बल्कि बेचैन रखता है. वे अक्सर मिलने पर या फोन पर नए कवियों की कविताओं पर मुझसे राय लेते थे. उन दिनों मैं अपनी आलोचना में नए कवियों को फोकस करके लगातार लिखने की प्रक्रिया में होता था. कई बार मैं संकोच में पड़ जाता कि कविता के इतने बड़े पारखी को भला मैं क्या सलाह दे सकता हूँ पर उन्हें मेरी राय का हमेशा इंतजार रहता था. पर उनके इस भावबोध में उनका बड़प्पन छुपा होता था. मेरे प्रति उनका अनुराग भी कहना चाहिए. नई पीढ़ी के प्रति उनका यही लगाव उन्हें एक बड़ी आलोचक प्रतिमा के सम्मुख खड़ा करता है. उनकी पूर्ववर्ती और परवर्ती पीढ़ी में कम आलोचक पैदा हुए जो नई प्रतिभाओं को मुक्त मन से सराहते हैं. उन्होंने 1997 में आलोचना पुनर्नवा के प्रकाशन की शुरुआत की तो दिल्ली के किसी आदमी को नहीं पता था कि नामवर जी मुझे ‘आलोचना’ का सह संपादक नियुक्त करने का निर्णय ले चुके हैं. मैं तब दिल्ली आकाशवाणी केंद्र पर हिंदी कार्यक्रम का प्रमुख अधिकारी और साहित्यिक कार्यक्रमों का प्रसारक था. हालांकि कविता और आलोचना के क्षेत्र में लगातार सृजनरत था. वह नामवर जी ही थे जिन्होंने मेरी कविता की तारीफ करने के बावजूद मेरे आलोचनात्मक लेखन को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते थे. उन्होंने एक दिन कहा ‘आप आलोचना के क्षेत्र में आगे बढ़िए. कविता तो काफी लोग लिख रहे हैं पर उनमें आलोचना दृष्टि का अभाव है. आप अपने काम को आगे बढाईये’. गौर करने की बात है कि मेरी आलोचना पुस्तक ‘आलोचना की साखी’ उन्हीं को समर्पित की गई है.

आप गौर करें शुरू में उनके साहित्यिक व्यक्तित्व निर्माण में जिस किसान संवेदना और लगाव की बात मैंने लिखी है वह उनकी आलोचना में वैचारिक स्तर पर सर्वत्र दिखाई दे सकता है. उन्हीं के शब्द है

“एक सजग आलोचक का सबसे बड़ा अस्त्र है— उसके लोचन, लोचन का कार्य है साफ देखना और निर्भय देखना.”

नामवर सिंह की आलोचना में सबसे बड़ी ताकत उनकी दृष्टि की बहुलता और निर्भयता है. दृष्टि की इसी बहुलता और निर्भयता ने उन्हें विवेक और साहस दिया है जो वस्तुतः भारतीय किसान संस्कृति की देन है. भारतीय किसान साहसी ,विनम्र किंतु स्वाभिमानी होता है. वह अपने स्वाभिमान की रक्षा अपने संघर्ष करने की क्षमता के कारण संभव कर पाता है. नामवर सिंह शुरू से अंत तक प्रगतिशील जीवन दृष्टि के पुरोधा बने रहे तो इसके पीछे उनकी किसान संवेदना का अक्खडपन और लड़ाकू प्रवृत्ति विशेष रूप से कारगर लगती है. कहना न होगा कि उनकी आलोचना दृष्टि में प्रगतिशीलता एक छौंक भर नहीं है बल्कि जीवन दृष्टि है जो किसान संस्कृति की उपज लगती है. मार्क्सवाद उनके जीवन में हमेशा आक्सीजन की तरह था.

उनके व्यक्तित्व में खाटी बनारसीपन की अदा तो थी जो उन्हें हमेशा किसान पोशाक धोती–कुर्ते में सदाबहार बने रहने के लिए आधुनिक शहर देश की राजधानी दिल्ली में अकड़ कर चलने के लिए अभ्यस्त करती रही है. हालांकि अब दिल्ली में नित्यानंद तिवारी को छोड़कर अब धोती कुर्ता पहनने वाले कम लेखक दिखाई पड़ते हैं. इस तरह नामवर सिंह के नामवर बनने की कहानी का मूल मंत्र किसान संवेदना का संघर्ष और उसका विस्तार दोनों है. वे शुरू से अंत तक जबरदस्त पढ़ाकू बन रहे. वे घर पर या यात्राओं में लगातार नई किताबें-पत्रिकाओं से घिरे हुए दिखाई पड़े. जब भी मिलते नए कवियों- लेखकों के संग्रहों पर बात करते. ऐसी प्रवृत्ति कम लेखकों में दिखाई पड़ती है.कहना न होगा कि यह प्रवृत्ति नामवर के लेखन का मूलमंत्र या प्राणशक्ति है.

नामवर सिंह ने अपनी आलोचना पद्धति में अपने चौकन्ने लोचन को अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया है. कई बार बोलते वक्त मैंने देखा है कि उनकी आंखें सिवान पर खड़े किसी बारहसिंघे की तरह चमक जाती हैं पर कई बार मैंने उन्हें पढ़ते हुए और कई बार उनको बोलते हुए उनकी आंखों को नितांत सजल भी देखा है. यह सजलता ही आलोचक का हृदय प्रदेश होता है. जिसका विस्तार ही उनके बड़े आलोचक होने का सबूत है. विश्वनाथ त्रिपाठी नामवर जी के अंतेवासी रहे हैं , उन्होंने अपने एक दिलचस्प संस्मरण में नामवर जी के व्यक्तित्व का जो खाका खींचा है वह किसान जीवन की ही गाथा है. वे लिखते हैं

“नामवर जी अभी भी युवक लगते हैं तब तो लगता था मानो अभी खेत में कुदाल चला कर आए हैं. पसीना पोंछ कर सफेद खादी का कुर्ता धोती चप्पल पहनकर क्लास लेने, चौड़ा सीना ,लमछर शरीर, नाति गौर वर्ण, कस के भांजी हुई रस्सी की तरह तनी खुरदुरी खाल, व्यवहार में गंवई आत्मीयता”
( हक अदा न हुआ : विश्वनाथ त्रिपाठी संस्मरण में नामवर सिंह :पृष्ठ 149 )

देखा जाए तो साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मोर्चे पर नामवर सिंह के उस दौर में प्रमुख मोर्चे थे— साम्राज्यवाद ,सांप्रदायिकता, व्यक्तिवाद और फिर कलावाद से खुली और नंगी भिडंत. जाहिर है पूंजीवादी सभ्यता की शैतानी प्रवृत्तियों से लड़ने के लिए प्रगतिशील आंदोलन की बुनियादी शर्त यही थी. कहना न होगा कि नई कविता के दौर में नामवर सिंह इन्हीं अमानवीय प्रवृत्तियों से लड़ रहे थे. नई कविता के भीतर अज्ञेय बनाम मुक्तिबोध की लड़ाई में नामवर सिंह मुक्तिबोध का पक्ष चुनते हैं. कविता के नए प्रतिमान में उनका सारा जोर व्यक्तिवाद और कलावाद को अपदस्त करना था. वे रामविलास शर्मा के उस मत के विरुद्ध थे कि नई कविता में भारतीय काव्य परंपरा का उन्मेष नहीं है. सच्चाई यह है कि वैचारिक शीत युद्ध के उसे दौर में नई कविता के भीतर व्यक्तिवाद के ‘क्लोज सिस्टम’ को तोड़ने के लिए मुक्तिबोध जिस तरह संन्नध थे, उसी तरह मुक्तिबोध के बाद नामवर सिंह लगातार कई मोर्चे पर आत्मसंघर्ष करते दिखाई देते हैं. इस तरह देखा जाए तो नामवर सिंह आलोचना के रणक्षेत्र में वैचारिक शीत युद्ध की उपज थे. उनके अवदान का मूल्यांकन करते वक्त इस ऐतिहासिक सच्चाई को भूलना कठिन है और जानना बेहद जरूरी.

नामवर सिंह के अवदानों की श्रृंखला इस लिहाज से विराट स्तर की है. यहाँ उनकी आलोचना की भाषा का जिक्र जरूरी है, क्योंकि भाषा ही लेखक का सबसे बुनियादी अस्त्र है. हिंदी आलोचना में नामवर सिंह जैसे आलोचक की उपस्थिति अनेक कारणों से हमेशा विवादास्पद, उत्तेजक बनी रही तो शायद इसलिए, क्योंकि नामवर सिंह ने आलोचना में वृहत्तर संघर्ष किया. इसीलिए उनकी आलोचना इधर के वर्षों में न केवल आलोचना-जगत की केंद्रीय थीम रही है, बल्कि रचना और विचार की परिणति भी. आज जब हम उनकी आलोचना पर विचार करने बैठते हैं तो हमें उनकी आलोचना-शक्ति का बीज तत्त्व उनकी भाषा में दिखाई पड़ता है. उनकी आलोचना-दृष्टि में अगर तीक्ष्णता, बेलागपन और हाजिरजवाबी के साथ हमेशा एक ताप दिखाई देता है, तो उसके पीछे उनकी आलोचना की भाषा का बहुत बड़ा हाथ छिपा हुआ दिखाई देता है. उनकी भाषा को पढ़ते हुए कभी आचार्य रामचंद्र शुक्ल की स्पष्टवादिता, तत्त्व-चिंतन और हाजिरजवाबी झलकती है तो कभी महावीरप्रसाद द्विवेदी जैसा शब्दानुशासन, तो कभी-कभी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसा मस्तमौला-फक्कड़पन और कबीर जैसी बेहिसाब ठाठफकीरी झलकती है.

महाकवि निराला ने गद्य की भाषा को ‘जीवन-संग्राम की भाषा’ जिन अर्थों में कहा था वह नामवर सिंह की आलोचनात्मक भाषा में देखा जा सकता है. लड़ाई के मोर्चे पर लड़ते हुए सैनिकों का तुमुल उद्घोष, हाहाकार की ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं. नामवर सिंह की आलोचना की भाषा के तरकश में ऐसे असंख्य तीर भरे पड़े हैं. चाहे वह मुक्तिबोध को लेकर नई कविता के रणक्षेत्र में उतरने का दौर हो, या फिर नई कहानी के मूल्यांकन क्रम में निर्मल वर्मा की वकालत का सवाल हो, या फिर इधर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को लेकर ‘दूसरी परंपरा की खोज’ की बात हो. आश्चर्य होता है कि नामवर सिंह की भाषा पर अब तक बहुत कम विचार हुआ है. सब लोग ज्यादातर उनकी आलोचनात्मक पैंतरेबाजी की ही मीमांसा करते देखे गए हैं. जबकि सच्चाई यह है कि नामवर सिंह की आलोचनात्मक धाक में उनकी पारदर्शी दोटूक भाषा का सबसे बड़ा योगदान है. ऐसी भाषा जिसने अपनी सिद्धि का फल पा लिया है.

नामवर सिंह की आलोचना की भाषा पर जब हम विचार करते हैं तो दो मूलभूत स्रोतों पर ध्यान जाता है. पहला है-लोकजीवन और दूसरा है-अपनी समृद्ध परंपरा. एक तीसरी भी ताकत है जो मार्क्सवादी विचारधारा से पैदा हुई है. मुख्य रूप से ये तीन स्रोत हैं, जो नामवर सिंह की आलोचना की भाषा की विरासत है. इस विरासत में सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीय लोकानुभव की है जिससे वे बेहिचक ऊर्जा ग्रहण करते हैं. इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यह है कि उनकी शायद ही कोई किताब हो जिसमें लोकानुभव की भाषा का इस्तेमाल न किया गया हो. सबसे बड़ी बात यह है कि उनके जितने भी लेख और स्थापनाएँ चर्चित और प्रतिष्ठित हुई, उनमें इस लोकानुभव की भाषा का बेहतर इस्तेमाल देखा जा सकता है. इस लिहाज से 1982 में प्रकाशित उनकी एक चर्चित और विवादास्पद किताब ‘दूसरी परंपरा की खोज’ सामने रखकर इस बात का परीक्षण किया जा सकता है. इस किताब की भूमिका से ही कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करता हूँ :

“वे आकाशधर्मी गुरु थे, हर पौधे को बढ़ने के लिए उन्मुक्तता देने के विश्वासी. यह उन्मुक्तता ही उनकी परंपरा का मूल स्वर है. लेकिन यह उन्मुक्तता जितनी सहज दीखती है उसे समझ पाना उतना सहज नहीं है. अपनी ओर से इसे समझाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. पर ‘समुझो नहिं तसि बालापन तब अति रहेऊ अचेत’. यह बात तब की है. जब 1950 में वे शांतिनिकेतन से काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के आचार्य होकर आए और एम.ए. अंतिम वर्ष के छात्र के रूप में मुझे उनके चरणों में बैठकर कुछ सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. मेरा ‘सूकर खेत’ काशी ही था. अभिधा में भी. पूरी तरह सचेत होने का दावा तो अब भी नहीं है.”

दरअसल इस लोकानुभव की भाषा की परंपरा का सूत्रपात नामवर सिंह से पूर्व हिंदी के दो आचार्यों रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी में दिखाई पड़ता है. शुक्ल जी की आलोचना की भाषा में भारतीय काव्य-परंपरा और लोक अनुभव का जितना अच्छा इस्तेमाल दीखता है लगभग उसी स्तर पर नामवर सिंह भी अपने को आजमाते हैं. शुक्ल जी काव्य के जितने बड़े तत्त्व-चिंतक थे नामवर सिंह कविता के उतने ही बड़े सिद्ध आलोचक. वे अकसर इसीलिए कविता की आलोचना करते वक्त कविता की भीतरी आत्मा में प्रवेश करते हुए खो नहीं जाते, बल्कि सामाजिक जीवन की कसौटी पर कसकर उसकी सामाजिकता सिद्ध करते हैं. कविता की आलोचना करते वक्त शुक्ल जी भी यही फार्मूला अख्तियार करते हैं. आलोचना में निर्णय की भाषा का जितना प्रयोग नामवर सिंह करते हैं वह शुक्ल जी की ही विरासत है. यह शायद इसलिए हो पाता है क्योंकि अपने आलोचनात्मक विवेक में जितने स्पष्ट और चौकस शुक्ल जी दीखते हैं, उतने ही नामवर सिंह भी. नामवर सिंह के साथ एक सुविधा इस विवेक को और अधिक स्पष्ट और परिभाषित करने के लिए मार्क्सवाद है. पर जब कविता का वे मूल्यांकन करने बैठते हैं तो उनके ट्रीटमेंट शुक्ल जी की तरह होते हैं-नपी-तुली भाषा, छोटे-छोटे वाक्य, धारदार और गंभीर. उनकी भाषा में शुक्ल जी की तरह अगर दोटूकपन है तो इसके पीछे उनके विचारों की प्रतिबद्धता का ही असर है. प्रायः गैर-प्रतिबद्ध आलोचक इसीलिए दोटूक भाषा का प्रयोग नहीं कर पाते हैं. इस लिहाज से नामवर सिंह की ‘छायावाद’ किताब खास तौर से उल्लेखनीय है. एक उद्धरण सामने है-

“बुद्धि विवेक को वाद देने वाले तथा हृदयवाद का प्रचार करने वाले अंत में समाज से भागकर इसी तरह एकांतवास करते हैं और दूसरों को भी काम-धंधा छोड़कर अपने यहाँ आने का उपदेश देते हैं. इसी तरह वे संसार में समानता व प्रेम का राज्य प्रतिष्ठित करने का सपना देखते हैं. इसी चिंतन-प्रक्रिया की तर्कसंगत परिणति अबुद्धिवाद है.”
(पृष्ठ 144)

यह उद्धरण छायावादी कविता में वैयक्तिक चेतना के एकांत गुहाँ धकार के विरोध में लिखा गया है, जो नामवर सिंह की आलोचना में दोटूक भाषा का उदाहरण है. हिंदी के वे आलोचक जो अपने आपको सृजनशील आलोचक मानते हैं उन्हें मार्क्सवादी आलोचना की दोटूक निर्णय-शैली पसंद नहीं. उनकी स्थापना है कि आलोचना कृति की ओर इशारा है जबकि मार्क्सवादी आलोचना यह मानती है कि आलोचना कृति के बाहर और भीतर से गुजरकर सामाजिक कर्म की कसौटी पर परखने वाली एक प्रक्रिया है. जैसे कोई सुनार अपनी कसौटी पर धातु को कसकर यह बता सकता है कि इसमें कितना स्वर्ण है और कितनी मिलावट. दरअसल आलोचना का काम कुछ ऐसा ही है. इसलिए जब भी किसी कृति की आलोचना की जाएगी तो उसके प्रतिमान स्थिर होंगे और स्थिर प्रतिमानों पर जब बहस की जाएगी तो उसकी भाषा दोटूक, निर्मम और तत्त्वान्वेषी होगी. नामवर सिंह की भाषा अगर दोटूक निर्णय देने वाले तेवर अख्तियार करती है तो इससे किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए.

विजयदेवनारायण साही ने एक सिद्ध आलोचक की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा था कि एक आलोचक को सबसे पहले निर्भय और साहसी होना चाहिए. दरअसल यह साहस और निर्भयता ही किसी आलोचक की भाषा को दोटूक, बेलाग और निर्मम बनाती है, क्योंकि वह सच कहने से चूकता नहीं. इस प्रसंग में नामवर सिंह की भाषा और उनकी दृष्टि हमारी हिंदी आलोचना में आज भी सर्वोत्तम उदाहरण है. जनता के साहित्य की जब बात उठी थी तो अज्ञेय वगैरह ने यह कहकर खिल्ली उड़ाई थी कि इसमें व्यापकता तो होती है पर गहराई नहीं होती. नामवर सिंह ने इसका जवाब देते हुए सही जगह वार किया जो उनकी दोटूक भाषा का सर्वोत्तम उदाहरण है-

“देखना यह है कि किसी लेखक में व्यापकता के होते हुए भी जब हम गहराई की कमी पाते हैं तो वस्तुतः वह गहराई की कमी व्यापकता की ही कमी तो नहीं है. इसी तरह यदि कोई लेखक संकीर्ण होते हुए भी गहरा मालूम हो तो विचार की जरूरत है कि कहीं हमारी उस गहराई में ही तो कमी नहीं है. अनुभूति की गहराई की परीक्षा करते हुए हम इसकी व्याप्ति में जा पड़ेंगे. किसी को गहराई तक प्रभावित करने का अर्थ है, उसके संपूर्ण अस्तित्व, व्यक्तित्व और भावसत्ता को प्रभावित करना और बहुत देर तक प्रभावित किए रहना. अनुभूति की गहराई का निर्णय एक व्यक्ति और एक क्षण से नहीं किया जा सकता. गहराई का निर्णय दिक् और काल-सापेक्ष है.” अपनी इस बात को सिद्ध करने के लिए उनकी फिर उसी लोक-अनुभव की भाषा का इस्तेमाल देखिए-“ताल के सूखने से उसकी व्यापकता के साथ गहराई भी कम होती है.”
(इतिहास और आलोचना, पृष्ठ 13 और 22)

उल्लेखनीय है कि इस तरह की जिरहदार भाषा वही आलोचक लिख सकता है जिसके दिमाग की खिड़कियाँ खुली हों, जो समाज की सक्रिय हवा की आवाजाही को अपने भीतर हमेशा महसूस करता हो तभी वह आलोचना की जमीन पर सधे पैरों खड़ा होकर दोटूक निर्णय सुना सकता है कि क्या गलत है और क्या सही. कहना न होगा कि नामवर सिंह अपने इसी दोटूकपन की भाषा के चलते हिंदी आलोचना में इतने अधिक जुझारू, जीवंत और विवादास्पद साबित हुए हैं. दोटूकपन की इस भाषा का प्रयोग लगभग उनकी सभी आलोचनात्मक कृतियों में शुरू से आखीर तक मौजूद हैं. सन् ’80 के बाद कलावादी ताकतों का साहित्य में जो उभार हुआ उसके विरोध में एक बड़ी ताकत के रूप में नामवर सिंह जिस तरह खड़े रहे हैं उसमें उनकी आलोचना की दोटूक भाषा का विशेष योगदान है. और यह दोटूकपन इसलिए आया है क्योंकि उनके अंदर साहस सबसे ज्यादा है.

इस महत्त्वपूर्ण तथ्य का भी हवाला देना आवश्यक है कि स्वयं नामवर सिंह का आलोचना की भाषा के बारे में क्या विचार है. इस लिहाज से ‘वाद-विवाद-संवाद’ में प्रकाशित उनका एक महत्त्वपूर्ण लेख ‘आलोचना की भाषा’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है. इस लेख के बहाने नामवर जी ने आलोचना की दुनिया में भाषा की विपन्नता से ‘घोर विचार-शैथिल्य और बुद्धि का आलस्य फैलने का खतरा’ की ओर इशारा किया है. साथ ही ‘समालोचना का हवाई होना और विचारशीलता का ह्रास’ भी आसन्न माना है. दरअसल ये खतरे कभी शुक्ल जी ने भी महसूस किए थे. नामवर जी का कहना है-

“रिचर्ड्स को अंग्रेजी में जिस वाग्जाल का सामना इस शताब्दी के दूसरे दशक में करना पड़ा, हिंदी में शुक्ल जी को यह स्थिति तीसरे दशक में मिली और हमें यदि वही बात आज भी दुहराने की जरूरत महसूस होती है तो बहुत कुछ इसलिए कि अपने यहाँ आलोचना के क्षेत्र में भाषा के स्तर पर दृढ़ता के साथ उस संघर्ष को आगे नहीं बढ़ाया गया. आलोचना के दायित्व और आलोचना के प्रतिमान की बातें बहुत हुई किंतु जिस भाषा के माध्यम से वह दायित्व संपन्न होता है उसकी चर्चा बहुत कम हुई.”
(पृष्ठ 19)

इस तरह नामवर जी मानते हैं कि आलोचना की भाषा का सवाल केवल भाषा का सवाल नहीं है, बल्कि उसके साथ उस दृष्टि का भी सवाल है जिससे एक समर्थ आलोचक की भाषा का निर्माण होता है.

नामवर सिंह के अवदानों की चर्चा करते हुए इस तथ्य की चर्चा जरूरी है कि भारतीय बौद्धिक समुदाय में नामवर सिंह की लोकप्रियता का सबसे बड़ा राज उनके बोलने की कला में छिपा है. उन्हें अपने समय का सबसे बड़ा ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ यदि कहा जाता है जो उसकी वजह है उनकी वाणी का वैभव. जिसकी चर्चा यहाँ जरूरी लगती है.

“बातें बातें बातें. बातें ही तो करता रहता हूँ अब तक. कभी इनसे बात करना, कभी उनसे बात करना. और नहीं तो आप ही आप. यह भी एक बहाना है न लिखने का और लिखने का भी. इसी व्यापार का एक अच्छा-सा नाम है- ‘संवाद”.
(‘कहना न होगा’ की भूमिका ‘सफाई’ से)

नामवर सिंह को बातें करते, बहस करते, बहस में हस्तक्षेप करते, अपने विपक्षी वक्ता की काट के लिए नजीरें पेश करते, किसी विशाल व्याख्यान कक्ष में धाराप्रवाह व्याख्यान करते एक जमाना बीत गया. मैं भी उन्हें अपने होश सँभालने के साथ कोई चालीस वर्षों से देखता-सुनता रहा हूँ. दिल्ली के जीवन में कोई दो दशकों तक लगातार नामवर जी को देखता-सुनता रहा हूँ. कई बार तो ऐसा भी होता है कि नामवर जी अपने भाषणों, बहसों की त्रिकाल संध्या कर रहे हैं. इस तरह कमोबेश उन्हें रोज सुनने का मौका मिल जाता था. वह आकाशवाणी भवन के स्टूडियो का माइक हो या फिर कोई साहित्य-सभा, या विश्वविद्यालय का जनसमूह से भरा कोई सभागार. नामवर जी हमेशा की तरह धोती-कुर्ते का साधारण किंतु विशिष्ट दिखने वाला बाना धारण किए मुँह में पान दबाए बोलने के लिए. व्यूह रचते मंच पर दिखाई पड़ते थे. जाहिर है अक्सर सभाओं में नामवर जी या तो शुरू में बोलते थे, या बिल्कुल अंत में. अवसरानुकूल वे प्रारंभ या अंत का चुनाव कर लेते थे.

नामवर जी को ठीक-ठीक पहली बार बोलते हुए कब सुना जब याद करता हूँ तो गोरखपुर में सन् ’80 के वे दिन याद आते हैं. पहली बार नामवर जी को गोरखपुर विश्वविद्यालय हिंदी विभाग द्वारा आयोजित ‘भक्तिकाल का समाजशास्त्र’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में लगातार तीन दिनों की बहस के बीच उन्हें भर आँख देखा और सुना. उस मजमे में देश-भर के भक्तिकाल के धराऊ विद्वान और काव्य-भक्त-रसिक पहुँचे थे. पर मुझे याद है कि पूरी बहस जिन दो वाग्वीरों के बीच में थी वे थे-नामवर सिंह और विजयदेवनारायण साही. शेष लोग खैर भक्ति भाव से या तो मूक श्रोता थे अथवा किंकर्तव्यविमूढ़. वहाँ मैंने पहली बार देखा नामवर सिंह की ओजस्वी वक्तृता, वाक्पटुता, वाक्विदग्धता, प्रयत्न लाघव, अशेष भूमंडल में गर्जन-नाद, मूर्छा और मूर्छा के बीच जागरण, वक्तृता की हिकमतें, उनके चिर-परिचित पैंतरे और इन सबके बीच निर्मल शास्त्र और उपाख्यान की गंध मिश्रित वाक् बौछारों का आक्रमण और एक विनम्र किंतु अपने विचारों के प्रति दृढ़ वकील वक्ता का आत्मनिवेदन.

नामवर सिंह की वक्तृता के इतिहास और उनकी विरासत पर जब हम विचार करते हैं तो पाते हैं उनकी वक्तृता की बनावट में भारतीय मनीषा, यहाँ की वाचिकता, यहाँ की संस्कृति की हजारों वर्षों से अविरल बह रही बौद्धिकता और रसिकता और एक खास तरह के चौकन्नेपन की प्रवृत्ति, यहाँ की मिट्टी के रूप-रस और गंध की आहट, यहाँ के साधारण जन से लेकर विशिष्ट और तथाकथित भद्रजन की कुलीनता तक की परख जैसी चीजें नींव का काम करती रही हैं. उनकी वाणी में गंगा की निर्मलता की जगह गंगा-जमुना और सरस्वती के संगम के बीच बह रहे दोआब की उपजाऊ मिट्टी जैसी उर्वरता की महक थी. कहना चाहिए, उनकी वाणी में भारतीय समाज, साहित्य, संस्कृति के भीतर एक सामाजिक, सामूहिक और सामासिक संस्कृति के आह्वान की अनाहत पुकार है. उनकी वाक्कला में गंगा जैसी प्रवाहमयता, जमुना जैसी धीरता और सिंधु जैसी गहराई और ब्रह्मपुत्र जैसा चढ़ाव उफान और सरयू जैसे कटाव के साथ बूढ़ी गंडक जैसी विनम्रता भी है. वे सिर्फ धारा में विद्यानिवास मिश्र की तरह बहने वाले साधु वाचक नहीं हैं, बल्कि उफनती हुई ब्रह्मपुत्र में थहा थहा धारा के विरुद्ध चलकर बोलने वाले वाणी-विनायक थे.

उनकी वाणी में एक साथ मंथरता, विराम और अचानक मंद-मंद से तेज गति पकड़ने वाली ट्रेन की रफ्तार थी. वे शब्दों-वाक्यों से रफ्तार को तेज करते हुए भी अपनी वाणी के आरोह-अवरोह को छोटे-छोटे स्टेशनों पर रोककर विचारों के ऊँचे-ऊँचे जंक्शनों से जोड़ने का काम करते थे. उनकी वक्तृता की यह कला अचूक और नायाब दोनों है. कहा जाता है यह गुण उन्हें अपने गुरुदेव हजारीप्रसाद द्विवेदी से मिला था. एक छोटा-सा आंखों – देखा उदाहरण देखिए जो उन्होंने दिल्ली में 24 फरवरी, ’96 को श्रीकांत वर्मा रचनावली के लोकार्पण के अवसर पर कही है—

“श्रीकांत निराला की तरह शब्दों के कवि हैं, रघुवीर सहाय वाक्यों के. श्रीकांत के शब्द कविता के भीतर इस तरह छूटते हैं जैसे भरी बुलेट से लगातार गोलियाँ चलती हैं. वे पाठक के दिल में गोली की तरह सीधे उतरते हैं.”

नामवर जी इतना क्यों बोलते हैं ? यह भी लोगों के लिए एक आलोचनात्मक मुद्दा रहा है. जैसे नामवर जी क्यों नहीं लिखते? गौर किया जाए तो हमारे साहित्य की महान जड़ें वाचिकता की परंपरा में निहित हैं. आज हम जिस सभ्यता में साँस ले रहे हैं, उसमें साहित्य के लिए कोई खास जगह बच नहीं पाई है. हिंदी समाज और हिंदी प्रदेशों का आंतरिक बिखराव इतना भयानक है कि कहीं कोई संवाद की स्थिति नहीं है. ऐसे में अगर नामवर जी जैसे लोग हिंदी की आंतरिक शक्ति को जनता के बीच प्रकट करने का उद्यम करते रहे हैं तो इससे गुरेज की स्थिति क्यों ? नामवर जी खुद कहते हैं कि ‘आलोचना एक बेहतर संवाद है.’ हिंदी में आज यह संवाद लगभग क्षीण है. इसलिए मुझे लगता है कि ‘बोलना’ उनके लिए शगल या पेशा नहीं बल्कि एक संवाद है-एक बेहतर संवाद. हिंदी-जगत का यह सौभाग्य रहा है कि नामवर जी लगभग आधी शताब्दी से ऊपर इस अलख को जगाए हुए थे. अगर ज्ञानरंजन के लिए ‘पहल’ संवाद का एक लिखित मंच रहा है और इसे जिलाने में उन्होंने अपना रचनात्मक लेखन होम कर दिया है तो नामवर जी के लिए ‘बातें, बातें, बातें’ ‘बोलना, बोलना, बोलना’ भी एक सीधा साहित्यिक ‘विमर्श’ है. अगर इस विमर्श से कुछ लोग परेशान और हैरान रहे हैं तो महज इससे नामवर जी का विमर्श रुक नहीं सकता था.

नामवर जी अपने ऊपर हो रहे प्रहारों को बड़े आराम के साथ सहते रहे हैं. वे रियेक्ट उस तरह भी कभी नहीं हुए कि धोती-कुर्ते से बाहर आ जाए. अपने ऊपर आरोपों की सफाई कभी मौन होकर और ज्यादा हुआ तो दो-तीन वाक्यों में दे देते हैं. मसलन अपनी वक्तृता के ऊपर अशोक वाजपेयी के आरोपों का जवाब उन्होंने ‘नामवर विमर्श’ में बहुत सटीक दिया है कि “मैं समझता हूँ कि अवसरवाद अवसर के अनुकूल बात कहे जाने में फर्क किया जाना चाहिए. मेरे खिलाफ इस पर आरोप लगाए जा सकते हैं, लेकिन मैं अप्रासंगिक कभी नहीं बोलता और न लिखता हूँ. बहुत-से लोग हैं कि प्रसंग कोई भी हो लेकिन अपने दिल की भड़ास निकालने के लिए जो उनको कहना है वह कहेंगे. एक ही बात शायद ही हुआ कि मन से किसी आदमी को मैं पसंद नहीं करता, आदमी माने उसकी रचना को और वह वहाँ बैठा हो तो उसकी उपस्थिति मात्र से, चाहे उसका जन्मदिन मनाया जा रहा हो, उसके ग्रंथ का लोकार्पण हो रहा हो, मैं न चाहते हुए भी उसको प्रसन्न करने के लिए प्रशंसा कर दूँ आज तक कभी मैंने ये नहीं किया. अशोक जी को तो नहीं कहना चाहिए कि यह अचूक अवसरवाद है. दो प्रसंगों का उदाहरण. बाकी छोड़ देता हूँ. उनकी दो पुस्तकों का लोकार्पण उनके जन्मदिन पर हुआ था, जिसमें उनको मैंने देह और गेह का कवि कहा था.यदि देह और गेह का कवि कहा है अशोक को तो उनकी सीमा बताने के लिए. और यह भी कि कुछ आलोचनात्मक बातें भी दिखाई थीं.”

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे सिर्फ संदर्भ में बात करते थे. न इधर और न उधर. पूरब और पश्चिम के ज्ञान को मथकर वे सिर्फ नवनीत ही श्रोताओं के समक्ष परोसते थे. वे किसी कठिन और दुर्वह बात को भी इस तरह प्रस्तुत करते थे कि ग्रहीता को समझने में कठिनाई नहीं होती. विगत साठ–सत्तर वर्षो में उन्होंने हजारों यादगार भाषण दिए होंगे, बहसें की होंगी, रेडियो, दूरदर्शन पर वार्ताएँ, परिसंवाद, परिचर्चाएँ की होंगी. जिसमें से यह खोज पाना किसी के लिए भी कठिन काम हो सकता है कि उन्होंने कब कहाँ सर्वोत्तम कहा. देश के किसी इलाके, सूबे में चले जाइए और नामवर जी के भाषण के बारे में पूछिए तो लोग यही कहते मिलेंगे-“नामवर जी का जवाब नहीं. वे पिछले दिनों जब यहाँ आए थे कितना गजब बोले कि पूछिए नहीं”.

उनकी वाणी की गरिमा का एक नया अर्थ रहा है. मराठी के जाने-माने कवि नामदेव ढसाल का मानना है कि

“उन्हें सुनने के बाद ऐसा नहीं लगता कि कोई सवाल बचा है” मैं सच कहूँ तो उनकी बात कामरेड डांगे की तरह है.”

यहाँ मैं नामवर जी की वक्तृता के बारे में अंतिम बात नीचे उनके एक बयान को उद्धृत करके समाप्त करना चाहता हूँ.

“इसे अलग छोड़िए और बताइए कि आज ऐसी कौन-सी चीज है जो संदेह की बात में शामिल नहीं है? हर चीज पर शक हो गया है. हर चीज को देखने पर ऐसा लगता है कि ‘साकी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में.’ अच्छी-खासी दोस्त भी जब प्याला हमारी तरफ बढ़ा कर देखती है तब शक का पता चलता है हमारी तरफ से.”

इसे विडंबना ही कहा जायेगा और नियति का निर्णय भी कि हम हिंदी के समकालीन वाचिक संसार में कोई दूसरा मिलता – जुलता नामवर नहीं पैदा कर पाए. आज नामवर सिंह भौतिक रूप से उपस्थित नहीं है पर उनके शब्द काल और हवा मे हमेशा गूंजते हुए जब-तब सुनाई पड़ जाते है. अभी हाल ही में कथाकार काशीनाथ सिंह ने नामवर जी को याद करते हुए कहा कि ‘फुलवा मरिगा रह गयी बास’

नामवर वह फूल है जो अब नहीं है लेकिन उनकी सुगंध अब भी जीवन मे बची हुई है.

नामवर सिंह के वैचारिक सरोकारों, संघर्षों की चर्चा करते वक्त यह नहीं भूलना चाहिए कि नामवर सिंह प्रगतिशील आंदोलन के उफान के दौर से लेकर जीवन की आखिरी दिनों तक साहित्य की आलोचना के स्तर पर पाठ केंद्रित आलोचना के पक्षधर बने रहे. उन्हें हवा- हवाई आलोचना की फायरिंग में विश्वास नहीं था. इस बिंदु पर केदारनाथ सिंह का यह आकलन सटीक जान पड़ता है कि

“अन्य आलोचकों से उनकी पद्धति इस मानी में थोड़ी भिन्न है कि वह विचार से रचना की ओर कभी नहीं जाते ,रचना से गुजरते हुए विचार तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं. इसलिए हर महत्वपूर्ण रचना उनके लिए चुनौती होती है- कला की ओर से उठने वाली एक नई मांग जिसके सामने सारा पूर्व अर्जित आलोचनात्मक ज्ञान अपर्याप्त लगने लगता है. यही कारण है कि ‘चंपा काले- काले अक्षर नहीं चीन्हती’ जैसी सीधी सरल कविता भी उनके लिए आलोचना कर्म की कठोर कसौटी बन जाती है और वह दम तभी लेते हैं जब उनके लिए एक नए काव्यशास्त्र की तलाश कर लेते हैं”

(वही : पहल: पृष्ठ 51 )

असल में नामवर सिंह का पूरा जीवन और उनका साहित्य ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ लगता है. व्यक्ति से लेकर आलोचना कर्म तक. उनके व्यक्तित्व में किसान जीवनबोध की चतुराईयां भी समाहित थी. जिसके जरिए वह विरोधी को शिकस्त देने में प्रयोग करते थे. आलोचना में उनकी कई बार पैतरें बाजी ‘ विरुद्धों के सामंजस्य’ का ही परिणाम थी. वरना वे नई कहानी के दौर में अमरकांत जैसे समर्थ प्रगतिशील कहानीकार को छोड़कर निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ से नई कहानी की शुरुआत नहीं मानते. यह देखना दिलचस्प है कि बाद में नामवर जी के विचार निर्मल वर्मा के बारे में एकदम उलट गए. गौर किया जाए तो उनके मित्रों की दुनिया में केवल मार्क्सवादी लेखक विचारक नहीं थे बल्कि मार्क्सवाद से असहमत लोगों की जमात में अज्ञेय, विष्णुकांत शास्त्री, विद्यानिवास मिश्र , श्रीलाल शुक्ल आदि जैसे अनेक लोग रहे हैं जिनसे नामवर जी से निजी संबंध शुरू से लेकर आखिर तक बन रहे. वे इस बात में विश्वास रखते थे कि विचार भेद आपसी संबंधों में खटास न पैदा करें मतभेद हो किंतु मन भेद न हो. जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि वह लकीर के फकीर नहीं थे. दूसरों की लकीरों को मिटाने की कोशिश नहीं करते थे.

उनकी बराबर कोशिश रहती थी वे खुद एक नयी लकीर खींचे जो पुरानी से अलग और आगे जाए. ताकि आने वाली पीढियाँ उससे भी आगे एक नई लकीर खींच सके. आलोचना के सच की शिनाख्त करते वक्त उनका यह वक्तव्य सटीक जान पड़ता है कि

“मूल्यवान है एक भी ऐसे आलोचक का होना जो किसी भी चीज को तब तक अच्छी न कहे जबतक उस निर्णय के लिए वह अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार न हो “
(कविता के नए प्रतिमान की भूमिका से)

आलोचना की आने वाली पीढ़ियां नामवर सिंह के आलोचना के इस धर्म और मर्म को समझ कर आगे बढ़ेंगी.

 

अरविंद त्रिपाठी
जन्म : 1959 गोरखपुर

अब तक आलोचना और संपादन की दो दर्जन कृतियाँ प्रकाशित. प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं- शताब्दी, मनुष्य और नियति, हमारे समय की कविता, आलोचना की साखी, कवियों की पृथ्वी, श्रीकांत वर्मा (विनिबंध), देवीशंकर अवस्थी (विनिबंध) आदि.

श्रीकांत वर्मा रचनावली (आठ खंडों में) श्रीकांत वर्मा संचयन (स०) के अलावा कई महत्वपूर्ण कवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संकलन तथा बहुचर्चित आलोचना के सौ बरस (तीन खंडों में) का संपादन किया है.

हिंदी अकादमी दिल्ली का कविता पुरस्कार, कृति सम्मान, मध्यप्रदेश शासन का सर्वोच्च आलोचना सम्मान, आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार, देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान, उर्वरक मंत्रालय भारत सरकार का इफ्को हिंदी सेवी सम्मान, भगवत रावत स्मृति सम्मान जैसे अनेक सम्मानों से अलंकृत.

प्रसार भारती, आकाशवाणी सेवा में केंद्र निदेशक के रूप में लंबी सेवा के बाद त्यागपत्र देकर दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के हिंदी विभाग में प्रोफेसर और विभाग में स्थापित प्रेमचंद पीठ के अध्यक्ष रहे.

901, अमरावती निकुंज सिद्धार्थ इंक्लेव, तारामंडल, गोरखपुर 273017
arvindkumartripathi1234@gmail.com

Tags: 20262026 आलेखअरविंद त्रिपाठीनामवर सिंहनामवर होने का अर्थ
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Comments 12

  1. Shridhar mishra says:
    3 weeks ago

    नामवर सिंह होने का अर्थ अरविंद त्रिपाठी का महत्वपूर्ण आलेख है, इस आलेख में अरविंद त्रिपाठी ने तटस्थ व्याख्याकार के रूप में नामवर सिंह के पूरे जीवन की सहृदय विवेचना की है। अक्सर देखा गया है कि नामवर पर बातचीत करते हुए बहुतायत लोग अपने भीतर की अराजकता के शिकार हो जाते हैं व अनावश्यक रूप से या तो नामवर के विपक्ष में या पक्ष में खड़े हो जाते हैं, इस आलेख में अरविंद त्रिपाठी ने जिस कलात्मक संयम का परिचय दिया है वह ध्यातव्य है। इस आलेख से नामवर के समूचे व्यक्तिव व उनके जीवन संघर्षों को समझने में बड़ी आसानी होगी अतः यह आलेख बहुत महत्वपूर्ण है, अरविंद त्रिपाठी जी को बहुत बहुत बधाई
    व समालोचन को साधुवाद- श्रीधर मिश्र, गोरखपुर

    Reply
  2. विनोद दास says:
    3 weeks ago

    अत्यंत विशद और अनेक पहलुओं को समेटता हुआ महत्वपूर्ण आलेख

    Reply
  3. Udbhrant says:
    3 weeks ago

    नामवर जी पर इससे बेहतर लेख नहीं पढ़ा. सब कुछ को समेट लिया है. अरविन्द को अशेष बधाइयां और ‘समालोचन’ का आभार जन्मशती पर नामवर जी को इस तरह याद करने के लिए. वे हमेशा याद किये जाएंगे.

    Reply
  4. Bhupendra Kumar says:
    3 weeks ago

    नामवर सिंह को समझने के लिए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को जानना जरूरी है और इसके लिए उनके किसी प्रियपात्र और अंतरंग व्यक्ति की भावपूर्ण स्मृति और विचारों को समझना ही एकमात्र विकल्प है।
    यह आलेख अंगरेजी के महान आलोचक डाॅ जाॅनसन के मित्र बाॅसवेल की याद दिलाता है। बाॅसवेल ने अपने मित्र को बहुत अंतरंगता से समझा था।
    समालोचन के पटल का आभार।

    Reply
  5. राजेन्द्र जोशी says:
    3 weeks ago

    ‘नामवर होने का अर्थ’ पढ़ना केवल एक लेख पढ़ना नहीं, बल्कि हिंदी आलोचना के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय से होकर गुजरना है। आपने नामवर सिंह के व्यक्तित्व, उनकी आलोचना-दृष्टि, भाषा, वक्तृत्व और किसान-संवेदना को जिस आत्मीयता और विस्तार से प्रस्तुत किया है, वह इस लेख की सबसे बड़ी उपलब्धि है। विशेष रूप से उनकी आलोचना-भाषा और वाचिक परंपरा पर आपका विवेचन अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक है।

    फिर भी, एक पाठक के रूप में मुझे लगा कि लेख में श्रद्धा का स्वर कई स्थानों पर आलोचनात्मक दूरी पर भारी पड़ जाता है। नामवर सिंह स्वयं निर्भीक और प्रश्नाकुल आलोचना के पक्षधर थे; इसलिए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के अंतर्विरोधों—जैसे उनके बदलते मूल्यांकन, वैचारिक विवादों, विश्वविद्यालयीय राजनीति, या उन पर लगे अवसरवाद के आरोपों—पर यदि कुछ अधिक निष्पक्ष और गहन चर्चा होती, तो यह लेख और अधिक संतुलित तथा ऐतिहासिक महत्त्व का दस्तावेज़ बन सकता था।

    लेख का एक अन्य पक्ष इसकी लंबाई है। कई विचार—विशेषकर किसान संस्कृति, वक्तृत्व और आलोचना-भाषा—बार-बार लौटते हैं। यदि इसे कुछ संयमित किया जाता, तो इसकी प्रभावशीलता और बढ़ सकती थी।

    इन टिप्पणियों के बावजूद, यह लेख नामवर सिंह को समझने की दिशा में एक गंभीर, श्रमसाध्य और महत्त्वपूर्ण प्रयास है। आज जब हिंदी में गंभीर आलोचनात्मक लेखन अपेक्षाकृत कम होता जा रहा है, ऐसे विस्तृत लेख स्वागतयोग्य हैं। आशा है कि भविष्य में आप नामवर सिंह के वैचारिक अंतर्विरोधों और उनके आलोचनात्मक निर्णयों की पुनर्समीक्षा पर भी इसी गहराई से लिखेंगे। वह हिंदी आलोचना के लिए एक मूल्यवान योगदान होगा।

    समालोचन को भी साधुवाद कि उसने जन्मशती के अवसर पर केवल स्मरण नहीं, बल्कि विचार-विमर्श का अवसर उपलब्ध कराया। यही किसी गंभीर साहित्यिक पत्रिका की पहचान है।

    Reply
    • राहुल सेन says:
      3 weeks ago

      बहुत अच्छे शब्दों आलेख प्रकाशित किया है !

      Reply
  6. स्वप्निल श्रीवास्तव says:
    3 weeks ago

    अरबिंद का नामवर सिंह पर लिखा लेख आत्मीय ढंग से लिखा गया है. इस लेख में उनके अवदान और व्यक्तिगत जीवन की चर्चा हुई है. मेरा मानना है कि जब तक लेखक के जीवन को नहीं जाते उसको समझना मुश्किल है. अरविन्द आलोचना पत्रिका और उनके सान्निध्य में रहे है इसलिए वे उनकी भीतरी और बाहरी दुनिया से भिज्ञ है. इतने अच्छे आलेख के लिये प्रिय मित्र अरविन्द को bdhain

    Reply
  7. RAJNISH PANDEY says:
    2 weeks ago

    आदरणीय अरविंद त्रिपाठी जी का यह आलेख नामवर सिंह के व्यक्तित्व, आलोचना-दृष्टि और वाचिक परंपरा को आत्मीयता से उद्घाटित करता है। किसान-संवेदना और लोकानुभव की भाषा को केंद्र में रखकर त्रिपाठी जी ने नामवर जी के बहुआयामी अवदान को सहृदयता से रेखांकित किया है। स्मरण-आलेख के रूप में नव लेखकों के लिए यह रचना पथ प्रदर्शक का कार्य करेगी। नामवर जी के व्यक्ति को उद्घाटित करता यह आलेख विवेच्य और मूल्यवान है।

    Reply
  8. आनन्द त्रिपाठी says:
    2 weeks ago

    सिवान पर खड़े बारहसिंघे सी चौकन्नी आँखें , क्या ग़ज़ब रूपक है ? जिसमें नामवर जी का पूरा व्यक्तित्व सा दिखता है !
    लेकिन मुझे वह इससे भी काफ़ी ऊपर दिखते हैं । बारहसिंघा का चौकन्नापन उसके अपने जीवन के प्रति निरंतर भय के कारण होता है ! जबकि नामवर जी का चौकन्नापन उनके समकालीन साहित्यिक सम्पूर्ण गतिविधियों के भरपूर अवगाहन और आलोड़न से उपजा हुआ है , जिसके बाद तो वह अपनी स्थापनाओं के अस्त्र शास्त्रों से लैश होकर साहित्य की दुनिया में शेर की मानिंद निडर टहलते थे ।

    Reply
  9. Pragya Rawat says:
    2 weeks ago

    महत्वपूर्ण आलेख।
    नामवर जी को सुनना और आलेख को पढ़ना बहुत अच्छा साम्य पैदा करता है। अरविंद जी विचार की वाचिक परम्परा में डूबे दिखे जो निधि की तरह है। इस आलेख का विस्तार बहुत जरूरी है जिससे पाठक लाभान्वित होंगे।

    Reply
  10. अमित तिवारी says:
    2 weeks ago

    कई दिनों से आपके द्वारा लिखे गए ‘नामवर सिंह होने का अर्थ’ आलेख को पढ़ता, समझता और आत्मसात करता रहा हूँ। यह केवल एक स्मृति-लेख नहीं, बल्कि नामवर सिंह जी के व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी समग्र साहित्यिक जीवन-दृष्टि का अत्यंत सारगर्भित एवं प्रामाणिक उद्घाटन है। इसे पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो नामवर जी का संपूर्ण साहित्यिक जीवन-परिचय एक ही आलेख में सजीव हो उठा हो।

    किसी विशिष्ट व्यक्तित्व पर तत्काल प्रतिक्रिया देना सहज नहीं होता; और जब विषय नामवर सिंह जी जैसा विराट हो तथा स्मृति-लेखन आदरणीय प्रो. अरविंद त्रिपाठी जी का हो, तब उसे एक बार पढ़कर छोड़ देना संभव नहीं। ऐसा लेख बार-बार पढ़ने, उस पर मनन करने और उसके भीतर निहित संकेतों को समझने की माँग करता है।

    हम जैसे युवा साहित्य-विद्यार्थियों के लिए यह आलेख केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि अध्ययन की दिशा देने वाला, दृष्टि का विस्तार करने वाला और बौद्धिक रूप से समृद्ध करने वाला प्रेरणादायी दस्तावेज़ है।

    Reply
  11. अमित तिवारी says:
    1 week ago

    इस आलेख की अपनी एक स्वतंत्र गरिमा है। इसमें नामवर जी के व्यक्तित्व से लेकर उनकी संवादधर्मिता और आलोचना-दृष्टि को व्यापक परिधि में समेटने का सार्थक प्रयास किया गया है। यह आलेख अपने आप में आलोचनात्मक स्मृति-लेखन के कौशल का सुंदर उदाहरण है। नामवर जी आलोचना में नवीनता और प्रगतिशीलता को केंद्रीय महत्त्व देते थे तथा भाषा के वैविध्य में सहजता को आवश्यक मानते थे। उनके लिए श्रेष्ठ आलोचना वह थी, जिसमें मतभेद को विचार की कसौटी पर परखा जाए, किंतु वह मनभेद में परिवर्तित न हो। इसी दृष्टि से यह आलेख नामवर जी की आलोचना-दृष्टि, संवादधर्मिता और वैचारिक उदारता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।

    Reply

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