| स्त्रीबुद्ध बौद्ध कालीन दस थेरियाँ पवन करण |
1.
धम्मदिन्ना
धम्मदिन्ना के वचन प्रभावित करते हैं शाक्यमुनि
उनमें बारिश के जल जैसी नवीनता है
वे दर्पण जैसे हैं जिनमें जन स्वयं को देख सकते हैं
उनमें ऊन जैसा उलझाव नहीं
उनकी कुलांच सीधे हृदय में प्रवेश करती है
तथागत कथन को वे और भी समृद्ध करते हैं
जब मैंने उससे जानना चाहा कि पृथ्वी क्या है
उसने कहा पृथ्वी संपूर्ण है, कुछ कम नहीं उसके पास
न हरा कम है, न नमी कम है न गति कम
प्रकाश से उसका रिश्ता प्रकाश की
पहचान जितना प्राचीन है
उसके घुमाव और कंपन में कोई खोट नहीं
यह उसकी स्वयं रचित संतुलित संरचना है
हमारे कदमों में उसकी वह निरंतरता ही है
जो उसने पशु पक्षियों प्रकृति और मनुष्य को सौंपी है
मैंने उससे कहा फिर मन क्या है, उसने कहा
मन वायु है हर तरफ बहती कभी धीमी-कभी तेज
देखना असंभव मगर किया जा सकता है उसे महसूस
कभी शांत न रहने, हर समय बहने
और हर समय सृजन या विध्वंस रचने को तत्पर
सिद्धार्थ को भी यही लाई तथागत तक चलाकर
अग्नि क्या है मेरे प्रश्न पर उसने उत्तर दिया
अग्नि रचना है, जीवन रचना, तपती और दहकती
हर समय हर स्थान पर मौजूद हमारे लिए
धातुओं के ये नवरूप उपहार अग्नि के
चक्रों की गति में अथक भाग अग्नि की
प्रकृति की देह में दहकती यह
हर क्षण नष्ट और निर्माण की सहचरी
मेरे यह पूछने पर कि अंधेरा क्या है
उसने बताया कि अंधेरा दृष्टि का अभाव है
हृदय में प्रकाश का क्षीण होना है
जिन्हें दिखाई देता है उनके जीवन में
प्रकाश का अभाव नहीं है,
उनके लिए आठों पहर उजाले से भरे हैं
उनके कदम हर समय गतिमान हैं
वे पीछे से सीखते हैं उसमें लौटते नहीं
पीछे लौटना अंधेरे में लौटना है
बुद्ध अंधेरे को पीछे छोड़कर आये हैं
धन क्या है मेरे पूछने पर उसने कहा
धन व्यवहार है विनिमय है व्यापार है
मगर उससे भी ऊपर वह आत्मघाती लोभ है
सदैव अपना सहस्रफण फैलाए रहने वाला
डसने को आतुर लोभ, उसकी फुफकार से
जो स्वयं को बचा लेता है, वह उसे नाथ लेता है
जो उसके डसाव से ख़ुद की रक्षा
नहीं कर पाते वह उनके भीतर निरंतर
अपनी वंशवृद्धि करता रहता है
जब मैंने उससे त्याग के विषय में जानना चाहा
उसने कहा त्याग शीर्ष मानसिक परिपक्वता है
एक दीर्घ-यात्रा है स्वयं के भीतर
इसे अल्प अवधि में भी किया जा सकता है हासिल
आयु से इसका संबंध नहीं कोई
तथागत इसका श्रेष्ठ और शीर्ष उदाहरण हैं
इसका प्रश्नों से घिरे रहना इसमें समाहित धैर्य का
सतत जारी रहने वाला परीक्षण है
धम्मदिन्ना का मानस उत्तरों से भरा है
प्रश्नों के प्रति उसकी उत्सुक-आतुरता आंकते बनती है.
(एक प्रमुख भिक्खुनी. जिसे प्रथम उपदेशिका कहा गया.
जिसने त्रिरत्न की शरण में अपने पति विशाख के प्रश्नों के सही और संतोषप्रद उत्तर दिये. विशाख ने इसकी चर्चा बुद्ध से की.)
2.
वृद्धा सोणा
पुत्रों के द्वारा मेरा तिरस्कार किया जाना
और मेरी कोख का मुझसे प्रश्न करना
साथ-साथ हुआ प्रारंभ, वह मुझसे प्रश्न करती
क्या तुम्हारे ये वही पुत्र हैं जो अंदर रहे मेरे
तुमने जैसा चाहा ठीक वैसा, अपने भीतर
मैंने सहेजा जिन्हें, जन्म लेने तक इनके
उसी तरह नाज़ुक देखभाल की इनकी,
जैसे जन्म देने के बाद की तुमने
हर समय इन पर अपनी आँख टिकाये
तुम्हारी तरह मैंने भी पलक नहीं झपकने दी अपनी
जब ये मेरे भीतर पनपना प्रारंभ करते
तुम अपने भीतर अपना रहना भूल जातीं
और हर बार इनके साथ-साथ तुम भी,
मेरे भीतर शुरु कर देतीं रहना, मैं तुमसे कहती
क्यों इतनी चिंता करती हो, मैं हूँ तो
क्या इससे पहले कोई चूक हुई मुझसे
मगर मुझ सरीखे विश्वस्त अपने ही अंग की
तुम एक नहीं मानतीं, फिर हम दोनों मिलकर
इनकी निगरानी में अपना गुइयाँपा निभाते
भीतर से हंसते हुए मैं तुम्हें संकेत भेजती
अरे पेट खाली हो गये हैं इनके और इसके लिए
जरूरी है कि तुम पेट भरो अपना
जिससे भूख मिटे इनकी, अब तुम्हारी भूख
तुम्हारी नहीं, तुमसे पहले इनकी है
इन दिनों तुम्हारे मन का खाना भी,
मन का नहीं तुम्हारे, मन का है इनके
कभी बेमन का कुछ खा बैठतीं तुम इनके
तो तत्काल मैं तुम्हें भीतर से ही देती डपट
तुम जो भी इनसे बातें करतीं वे मुझे भी देतीं सुनाई
तुम इन्हें लेकर जो भी सोचतीं, मैं भी
सोच रही होती वैसा, इन्हें लेकर तुमने
जितने भी सपने देखे सुखद
उन्हें मैने भी देखा आँख से तुम्हारी
आशंकाएँ मेरे भी भीतर तुम्हारे बराबर पनपीं
इन्हें बढ़ते हुए तुम्हारा देखना मुझ तक पहुंचता
हमने इनसे हासिल खुशी को सुख-दुख की साथिन
दो सहेलियों की तरह बांटा आपस में
जैसे इनके द्वारा किया जाता तुम्हारा तिरस्कार
इन दिनों तुम्हारे साथ बांट रही हूँ मैं
अपमान से तिलमिलाई जब तुम कहती हो
क्या इनसे ये सब सहने के लिए
अपने गर्भ में रखा था इन्हें, सुनकर
मैं अपने आप में सिकुड़ जाती हूँ सहमकर
याद करती हूँ तो याद आता है अपनी ओर से
हम दोनों ने ही कोई कमी नहीं आने दी
इनके पल्लवन में, तब ये भी चंद्रमा हमारे
आखिर दागदार हो ही गये हमारे लिए
मेरे साथ-साथ इन्होंने तुम्हें भी भर ही दिया
उस विकलता से जो अब सांझी थी हमारी
सदा की तरह बौद्ध-भिक्खुनी होने के निर्णय में
मैंने तुम्हें भी किया शामिल, तुमसे पूछा
मेरे बराबर हताश मेरी हृदय-सखी तुम, मेरे साथ
तथागत-पथ पर बढ़ने से स्वयं को कैसे रोक सकती थीं.
वृद्धा सोणा : पुत्रों द्वारा तिरस्कृत एक बौद्ध भिक्षुणी.
3.
गुप्ता
तथागत का कथन है माँ, कि मुझे, प्रवज्या लेने से पूर्व
पिता और आपसे आज्ञा ग्रहण करनी चाहिए
बुद्ध नहीं चाहते कोई स्त्री या पुरुष तरुण
बिना अपने जीवन-दाताओं की आज्ञा के संघ में हो शामिल
अत: मुझे भिक्खुनी-संघ का हिस्सा बनने की आज्ञा दें आप
आपकी आज्ञा साथ रहेगी, तो संघ में मेरी दृढ़ता भी
साथ रहेगी मेरे, कोई हिला नहीं सकेगा उसे
थेरी का जीवन दृढ़ता का उदाहरणित जीवन होता है
हालाँकि यह बहुत अलग नहीं स्त्री जीवन से
भिक्षुणी जीवन में नवजीवन ढूंढती
दीर्घावधि के पश्चात समझ सकी मैं यह
भिक्खुनी होने के लिए संकल्पित स्त्री के निर्णय में
माता-पिता की आज्ञा क्यों हो शामिल, जब मैंने
शाक्य के सामने प्रश्न रखा यह, जब मैंने बताया
मेरे कुछ होने के लिए क्या मेरा निर्णय नहीं पर्याप्त
तथागत ने कहा, यह मेरा आज कथन है
कल क्या होगा तुम्हें नहीं बता सकता मैं स्वयं भी
तुम चाहो तो इसे आज नकार सकती हो
वृक्ष पर पत्ते झरते हैं झरते हैं आते हैं आते हैं
यदि माता-पिता ही किसी स्त्री के भिक्खुनी होने के
निर्णय में अकारण बन उठें अवरोध, अपने प्रेम को
स्त्री के राह में किसी भीत सा कर दें खड़ा
या जताने पर उतर आयें अपना दिया जीवन
लालन-पालन, वस्त्र-भोजन, सुरक्षा-औषध तब क्या करे वह,
शाक्य ने उत्तर दिया तब वह स्वयं निर्णय करे,
स्वयं वह माता-पिता को त्यागे अथवा
माता-पिता के त्याग के आगे शीश नवादे
हक को चुनौती देता जीवन तो एक बीज है
वह माता-पिता से पहले भी था तुम्हारे बाद भी होगा
गुप्ता तुम्हारे तर्क तब भी मेरे आज के कथन को
नहीं बदल सकते आज, भिक्खुनी-संघ में भिक्खुनी की
प्रमुख और प्रखर सहायिका उसकी दृढ़ता ही होगी
न कि साथिन भिक्खुनियाँ, यहाँ भी प्रारंभ में
सभी भिक्खुनियाँ स्त्रियाँ ही होंगीं, साधारण स्त्रियाँ
समर्थ-समर्पित भिक्खुनियाँ तो वे बाद में होंगीं
जीवनशीला से उनकी यात्रा तर्कशीला की होगी
भिक्खुनी होने के लिए किसी स्त्री का माता-पिता से
आज्ञा हासिल करना जितना कठिन है, माता-पिता का भी
अपनी प्रिय को भिक्खुनी होने के लिए आज्ञा दे देना
आसान नहीं, मोह से मारक माया भी नहीं
भिक्खुनी होने में कोई दोष नहीं है
दोष भिक्खुनी होने का तप को साध न पाने में हैं
मेरे कथन में कोई चूक नहीं गुप्ता, नहीं कोई त्रुटि
तर्क में तुम्हारे, प्रश्न स्त्रीदृढ़ता का है यहाँ
और मैं नहीं चाहता कि भिक्खुनी होने की चाह जीती
कोई स्त्री इस मार्ग में पीछे छूट जाये,
संभव है, वही स्त्री इस मार्ग पर चल पाये
जो अपने पीछे सब छोड़कर आये
ध्यान रहे, माता-पिता से भिक्खुनी-संघ में शामिल होने हेतु
मिली आज्ञा भी उसे वहीं छोड़कर आना है
किसी प्रमाण की तरह उसे साथ नहीं लाना है
जो संघ में रिक्त हाथों आयेगा वहीं इसका रह पायेगा.
गुप्ता : एक थेरी जो अपने माता-पिता की आज्ञा से भिक्खुनी बनी.

४.
ज्योर्तिलेखा
विवाह आवश्यक है अथवा नहीं मैं इस विमर्श का
भाग बनना नहीं चाहती मगर स्त्री का
विद्वान होना आवश्यक है यह धारणा है मेरी
ऐसी विद्वान नहीं कि जिसके चलते वह अपनी
विद्वता प्रमाणित करती भटके स्थान-स्थान
ऐसी विद्वान कि जिसके चलते समझ सके वह
कि जीवन क्या है और क्या है वह स्वयं
समाज के भीतर से मुझे लेकर जो स्वर फूटता है
वह चलकर पहुंचता है मुझ तक भी
कि विवाह के अभाव ने मुझे विदुषी होने का
कराया अवसर उपलब्ध अन्यथा इस कोटि की
उपाध्याय नहीं हो सकती थी मैं,
मैं भी एक स्त्री होती साधारण जैसे अनेक
जिसके चलते मैंने अपनी आँख ें सौंपी स्वयं को
जिसके चलते मैंने अपनी आँखों से
देखना प्रारंभ किया स्वयं को,
देखना कि सब तरफ़ क्या और कैसा है
और उस सब तरफ़ में मैं कहाँ और कैसी हूँ
मैंने देखा कि मैं दिखाई दे रही हूँ स्वयं को
और इस संसार में बाधाओं के बीच निर्बाध जैसी
अपनी उपस्थिति गढ़ रही हूँ निरंतर
जल में मैं वैसी ही दिखाई दे रही हूँ जैसी मैं हूँ
जल के मन मुझे लेकर कोई भेद नहीं
फिर जिन आँखों में जल रहता है
उनमें मुझे लेकर भेद चला आया कहाँ से
लगता है उन्होंने अपनी आँखों के लिए
जल से जल तो कर लिया हासिल मगर अपने लिए
जल से जल जैसा मन नहीं ले सके वह
भाषा का बर्ताव मेरे साथ ठीक वैसा ही है,
जैसा मेरा सबके साथ सहनशील और उदार
बरतने को मेरे लिए इसमें एक भी शब्द कम नहीं
भाषा ने मुझसे कहा मैं सबकी और सबके लिए
पूरी हूँ किसी के भी लिए ज्यादा या कम नहीं,
तुम मुझे पूरा घूम लो छान लो मेरा कोना-कोना
और अपने पीछे-पीछे ले आओ सबको और यह देखो
कि सब कितने अपरिचित हैं मुझ संपूर्ण से
मार्ग का भी मेरे लिए यही कथन था परिचित
कि तुम मुझे मापना तो करो प्रारंभ
मैं स्वयं तुम्हारे आगे खुलता चला जाऊंगा
मुझ पर बढ़ते चले जाने वालों के प्रति
मेरा प्रमाणित सुभाव भी यही है प्राचीन
फिर मुझे तो तुम्हारे साथ-साथ तुम जैसीं
अन्य अनन्याओं की प्रतीक्षा है कब से कि वे आयें
और मुझे अपनी पग ध्वनियों से भर दें
कर दें मुझे अपने अपूर्ण होने के दोष से मुक्त
स्वयं को जानने के क्रम में, विवाह में विलंब
उपलब्धि की तरह नहीं था मेरे लिए,
मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है, सब के लिए
समझ तो प्राप्त करनी ही थी मुझे
मेरी तरह जिसे कोई भी कर सकता है हासिल
जीवन में एक ठहराव की तरह था वह
जिसे ठुकराकर बढ़ गई मैं आगे.
ज्योर्तिलेखा : श्रावस्ती की एक अत्यंत रूपसी प्रख्यात उपाध्याया जिसने त्रिवेद एवं दूसरी शिक्षाएँ ग्रहण कीं.
विवाह में विलंब होने के कारण जिसे पद्मविदुषी बनने का अवसर मिला.
५.
कंजगला
भिक्खुनि कंजगला तुम्हारे मुख से यह सुनना, स्वयं को,
कितने आश्चर्य से भरते हुए देखना है
कि बुद्ध के उपदेश सुनने की आकांक्षा ने
भिक्खुनि होने के लिए दृढ़ किया तुम्हें
और वही भिक्खुनी-संघ तक भी आई तुम्हें लेकर
संघ में कितनी भिक्खुनियाँ हैं जिनके हृदय
और जिव्हा पर बुद्ध के उपदेश नहीं,
संतुष्ट होने के लिए स्वयं का भिक्खुनि हो जाना
और बताने के लिए अपना पीड़ादायी अतीत है बस
जिनसे बुद्ध-कथन पर विमर्श करो
वे अपनी व्यथाएँ बखानना प्रारंभ कर देती हैं
यह भी नहीं कि जिन भिक्खुनियों के पास
दुखदायी पूर्व सुनाने के सिवा कुछ नहीं
वे सब स्त्रियाँ साधारण हैं कई सामान्य
मस्तिष्क-धारिणी, धन-शक्ति-संपन्ना,
राज-वैभव-त्यागिनीं स्त्रियाँ ऐसी भी हैं
जिनके पास पीछे छूटे सुख और उसकी स्मृति के
विविध-विवरण बखान के अलावा
स्वयं के बारे में स्वयं का कोई कथन नहीं,
प्रारंभ में, संघ में, अब भी,
सक्रिय-मस्तिष्क-संपन्न भिक्खुनियों की
अधिकांश ऊर्जा जिन्हें नियंत्रित करने में व्यर्थ होती है
एक प्रश्न उठता है क्या बुद्ध का आकर्षण
बुद्ध-कथन से अधिक प्रभावी है, मैंने अनुभव किया है
कि तब तुम कितनी पीड़ा से भर जाती हो
जब कोई भिक्खुनि तुम्हारे समक्ष यह कथन करती है
कि उसने तो बस बुद्ध से प्रभावित होकर
निर्णय लिया भिक्खुनि होने का, जब सुना
कि भिक्खुनि-संघ स्त्रियों के दुखों का
निवारण स्थल है तब मेरे कदम ठहरे ही नहीं वहाँ
वे स्वयं मुझे खींचकर ले आये संघ तक
मेरी स्मृति में तुम्हारा यह कथन दर्ज है
कि कहीं भिक्खुनि-संघ की पहचान मात्र ऐसे
बृहद-बाड़े में बदलकर न रह जाये, जहाँ बस
स्त्रियाँ बसती हों आकर, जहाँ स्त्रियों के लिए
अनुशासित-संयमित व्यवहार तो हो मगर उन्हें
विमर्श के लिए प्रेरित करता कोई विचार नहीं
वह प्रथम भिक्खुनि भी तुम रहीं जिसने
भिक्खुनि-संघ में पुस्तकालय की प्रस्तावना को
बुद्ध के समक्ष पहुंचाया, जिसके चलते
तथागत ने मिलने की इच्छा जाहिर की तुमसे
तथागत के आमंत्रण से उपजा संतोष
तुम्हारे चेहरे पर मैंने आंका नज़दीक से
भिक्खुनियाँ पुस्तकें पढ़कर विचारशील होने के
साथ-साथ तर्कशील हों, भिक्खुनियों से सदैव
यह चाहती रहीं तुम, उस दिन रह गईं चकित
जब भिक्खुनि सुखदा ने एक दीर्घ वचन को
तथागत के बिना थमें और खाये बिना हिचकोले
दोहरा दिया भिक्खुनि-सभा में निर्बाध
भिक्खुनि कंजगला मैं साधारण लघु-मस्तिष्क,
सदैव बुझी सी रहती भिक्खुनि कृत्या
संगत पाकर तुम्हारी स्वयं के भीतर
जल उठी दीप-सी तुम्हारा रोपा प्रकाश
अपने साथ-साथ मैंने कई भिक्खुनियों के भीतर देखा पनपते.
कंजगला : एक प्रमुख भिक्खुनी एवं उपदेशिका. बुद्ध के प्रवचन सुनने की आकांक्षी.
सुखदा: वाराणसी की एक अन्य कुशाग्र भिक्खुनि जो आगे चलकर कंजगला के साथ सह उपदेशिका हुई.
भिक्खुनी कृत्या-एक अन्य विचार-जिज्ञासु भिक्खुनि.
६.
भिक्खुनि प्रकृति
हाँ यह सत्य है कि मैंने, हम स्त्रियों के लिए संघ के
द्वार खोलने वाले, बुद्धप्रिय श्रमण आनंद से
प्रेरित होकर भिक्खुनि होने का निर्णय लिया
बुद्ध के विचारों तक तो कुछ बाद में पहुंची मैं
मेरे और मुझ सरीखीं संघ-प्रवेश-इच्छुक
स्त्रियों के लिए बीच यह बहुत था कि श्रमण आनंद
बुद्ध के समक्ष हम स्त्रियों का पक्ष रख रहे हैं
हमें उम्मीद थी कि भदन्त हमारे लिए
संघ का बंद-द्वार खोले बिना नहीं रहेंगे
फिर एक दिन हमने सच होते हुए देखा यह
भदन्त आनंद के लिए बुद्ध को मनाना
आसान नहीं रहा, तथागत अपनी स्त्री-ग्रंथी से
बाहर निकलने को तैयार ही नहीं थे
फिर यह तो निद्रालीन यशोधरा को त्यागकर
गृहस्थ जीवन से बाहर निकले बुद्ध ही
बता सकते हैं कि क्या उन्होंने उस रात
यशोधरा के साथ-साथ धरा पर संसार की
समस्त स्त्रियों की उपस्थिति को कर दिया था निरस्त
जिनमें एक प्रिय जन्मदात्री भी उनकी
क्या बुद्ध स्त्री को दुख का कारण मानते थे
दुख आर्य सत्य है, तब क्या स्त्री आर्य सत्य नहीं
दुख से भागकर दुख से छुटकारा
नहीं पाया जा सकता, दुख से मुक्ति
सिवाय भ्रम के कुछ नहीं, दुख पर विचार
किया जा सकता है, उससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता
दुख पर विचार ही दुख से
मुक्त होने का अहसास भर है बस
फिर स्त्री-पुरुष का तो एक-दूसरे से
छुटकारा संभव ही नहीं, एक बीज से निर्मित
आखिर वे एक-दूसरे से कैसे विलग सकते हैं,
बस वे स्वयं को नष्ट कर सकते हैं
मगर वह सदैव-सक्रिय-उल्लसित-हर्षित बीज
जिस पर किसी एक का स्वामित्व नहीं
उन्हें फिर से निर्मित कर देगा तत्पर
श्रमण आनंद निरंतर तथागत के समक्ष
हम स्त्रियों की सतत संवेदन-सक्रियता बखानते
मगर बुद्ध भदन्त आनंद के हमारे विषय में कहे
किसी कथन पर प्रतिकथन नहीं करते,
लगता जैसे, दोनों बौद्धिकों की बीच बस
कहते जाने और सुनते जाने की दृढ़ता बंधी है
मगर आनंद कहने से कहाँ थमने वाले थे
वे अपने पीछे हमें खड़ा देख रहे थे असंख्य
फिर हम सबके लिए संघ के द्वार खोलता
वह दिन आया जब सिंहशाक्य और
भदन्त आनंद के बीच लगी यह गांठ खुलकर
भिक्खुनी-संघ के गठन की सहमति में बदली
कोई नहीं बता सकता कि इस निर्णय से पूर्व
तथागत ने भदन्त आनंद के पक्ष में कैसे मत दिया
या श्रमण आनंद ने बुद्ध से कैसे तर्क किये
हम स्त्रियों के संघ-प्रवेश को लेकर
तथागत और भदन्त आनंद के बीच क्या कथन घटे
इस प्रसंग में संघ और संघ के बाहर
मत और विचार अनेक मगर उनकी सत्यता
प्रामाणिक हो सकती तभी जब
तथागत और श्रमण आनंद में से कोई एक
या दोनों इस संबंध में कथन करें कभी.
भिक्खुनी प्रकृति : गौतम के प्रिय शिष्य आनंद से प्रेरित होकर बौद्ध धर्म की ओर आकृष्ट हुई विचारशील भिक्खुनि.

७.
श्यामावती
माता-पिता की मृत्यु भूख में अधिक भोजन करने से नहीं हुई मेरे,
भूख के भय से हुई, कई दिन की प्राण-हरणी
भूख के पश्चात उन्हें भोजन मिला तो उन्होंने
अधिक मात्रा में ग्रहण करना शुरु कर दिया उसे
उन्हें भय था कहीं भोजन फिर दूर न चला जाये उनसे
महामारी थी कि दूर जाने का नाम नहीं ले रही थी नगर से
महामारी में भूख से प्रथम और अंतिम बार
सामना हुआ उनका, इससे पूर्व तो उनके पास निरंतर
रिक्त होता पेट था और उसे भरने को तत्पर भोजन
लगता जैसे भोजन की प्रचुरता और उसका वैविध्य
भूख का मनोरंजन है उनकी, वह जितना
खाया जाता, उससे कहीं अधिक बर्बाद होता
घर में वे भोजन के आस-पास ही बने रहते
रिक्त रसोईघर में कठिनाई से पहुंचे अल्प-खाद्यान्न पर
गड़ी रहती उनकी दृष्टि, घर से बाहर भोजन के लिए
मचा हाहाकार भय में वृद्धि करता उनके
महामारी के बढ़ते प्रसार के बीच मेरा कोई आश्वासन
विश्वास नहीं दिला पा रहा था उन्हें
भोजन प्राप्त करने के लिए मची मची त्राहि देखकर
उन्हें लगता उनसे उनका भोजन न छीन ले कोई,
मुझे लगता नगर में पसरी महामारी उन्हें न छीन ले मुझसे
उनका भय मेरा और अपना जीवन बचाने को लेकर था
मेरा भी भय उनका जीवन बचाने के लिए था
सच तो यह था महामारी कभी भी हम में से
किसी का भी जीवन पहले छीन सकती थी,
वे महामारी और भूख दोनों से ही नहीं मरना चाहते थे
उन्हें लगता भोजन बचाकर अपना जीवन
बचा सकते हैं वे, अपने साथ बचा सकते हैं मुझे भी
मगर उनका बचाया भोजन भी नहीं बचा सका उन्हें
उनके बचाये ने ही भोजन प्राण हर लिए उनके
भिक्खुनी-संघ में अब यह प्रसंग पहचान बनकर
रह गया है मेरी, श्रमणाओं के बीच मैं
भद्रावति-भिक्खुनी नहीं, भोजनी-भिक्खुनी हूँ
संघ में शामिल होते समय कहा गया मुझसे
यह पितृधन-धन जिसकी स्वामिनी एकमात्र अब तुम
इसकी संभाल और इसमें वृद्धि कर राजसी जीवन
जी सकतीं अपना, आवश्यकता कहाँ
तुम्हें सब त्यागकर भिक्खुनी होने की
मगर अपने साथ-साथ पितृसंपदा का ढेर
संघ के समक्ष समर्पित करने में
मुझे हिचक न हुई जरा, जब धन की तरह
बचाया खाद्यान्न ही मृत्यु से रक्षा नहीं कर सका
जिनकी, तब उनका कोषालय
शेष जीवन में क्या रक्षा कर पाता मेरी
मगर देखती हूँ कि भिक्खुनी-संघ में भी
भोजन को लेकर कम भय नहीं
भिक्खुनियों की चर्चाओं में भोजन का भय
किसी महामारी जैसा ही आता है नजर,
वे बुद्ध से अधिक भोजन के विषय में सोचती हैं
भोजन के लिए घर-घर और दर-दर पर निर्भरता ने
भिक्खुनियों की भूख को भय में बदल दिया है?
लगता है जैसे उनके बीच भोजन का प्रश्न बुद्ध से बड़ा है
भूख से पैदा होते भय से कहीं छुटकारा नहीं
महामारी से मरता भद्रावती हो अथवा भिक्खुनी-संघ.
भद्रावति नगर के श्रेष्ठी की रूपवती कन्या. प्लेग के फैलते कौसांबी गमन. भूख में अधिक भोजन करने से माता-पिता दोनों की मृत्यु.
८.
सुक्का
बुद्ध-जन आपने ठहरकर कभी गौर से
अपने कदमों को देखा है, नहीं तो ऐसा करके देखिए
अमाप चल चुके अपने इन पैरों के साथ
कुछ समय बिताइये, इनसे बात कीजिए
ये पैर ही हैं जो हृदय के आदेश पर मुझे और आपको
तथागत तक आयें हैं लेकर, इन्होंने
आपके मन की मानी इनके आदर में झुकिये
सत्य तो यह कि यही तथागत को भी
तथागत तक ये आये लेकर, अपने कथन में
तथागत ने स्वीकार भी किया इसे
हम भिक्खुनियों को ठहरकर स्वीकार मिला
संघ में शामिल होने का, तब तक हमारे कदम
ठहरे और कसमसाते रहे बुद्ध-पथ पर बढ़ने
इस बीच हमने अपने कदमों को परखा
और उनसे सखा-भाव से बात की निर्द्वंद
विचार कीजिए इनकी तरफ हमारा ध्यान
कम जाता है कितना जबकि ये श्रमिक
हमें हर समय आगे ही ले जाने में रहते हैं जुटे
और पारिश्रमिक के तौर पर एवज में
इन्हें चाहिए भी क्या बस पादुकाएँ
सोचिए ये हमसे कितना कम चाहते हैं
आंकिए कि स्वयं आगे बढ़ने और आगे बढ़कर
जन को प्रेरित करने वाले कितना कम चाहते हैं
कल्पना यह कि क्या पादुकाएँ चीवर हैं चरणों की
शायद इसका उत्तर हमें हाँ में ही मिले
परिधान और पादुकाएँ दोनों की सूझ
प्रकृति ने सौंपी हमें प्रथम, अपने अनुकूल
हमने इन्हें सृजित उसके पश्चात किया
नित नव-सृजन करते हाथों में बसे
हमारे कदम हैं वे जो हमें
हाथों के रास्ते आगे बढ़ाते ही रहते हैं अथक
देह की दौड़ कदमों पर होती है आश्रित
देह संग होती है, कदम साथ होते हैं
मगर दृष्टि की दौड़ देह पर नहीं करती निर्भर
दृष्टि स्वयं में कदम है निरंतर
दृष्टि सामने देखती है, अपने कदमों पर
आगे बढ़ती है, दो पैर, दो आँखें, दो हाथ
इस तरह छह कदम धारी हुए तथागत
और तथागत ने अपने छहों कदम सौंपे सब को
बुद्ध-जन जिसके पास दूर-पार तक
जाकर देखती आँखें हैं, निरंतर चलते-बढ़ते कदम हैं,
लगातार सृजन-सक्रिय क्रियाशील हाथ हैं
वहीं संसार का पालक है, पोषक है, विचारक है
हमारे बीच तथागत का आना, आना है दृष्टिदाता का
सर्वप्रथम स्वयं दृष्टि प्राप्त की उन्होंने
तत्पश्चात छह कदमों पर चलकर अपने
हमारे मध्य वे हुए उपस्थित सत्य साधारण
बुद्ध स्वयं अपने पैरों पर चलकर आये हैं
मैं स्वयं अपने पैरों पर चलकर आयी हूँ
धम्मोपदेश सुनने आप सब इस ‘राजगृह’ में
अपने पैरों पर चलकर आये हैं
किसी के लिए कोई ‘शिविका’ नहीं यहाँ
बुद्ध ने सीधे उसका त्याग किया
हम सबने उसकी इच्छा का त्याग किया
हम सब अपने-अपने कदमों से आगे बढ़ रहे हैं
हमारे कदमों में छह कदम शामिल हैं तथागत के.
सुक्का : राजगृह में अत्यंत प्रभावशाली धम्मोपदेश देकर श्रोताओं को प्रभावित करने वाली शालीन भिक्खुनी. बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका.
शिविका : पालकी

९.
सुमेधा
मैंने ‘विवाह’ करने के लिए नहीं ‘विचार’ करने के लिए जन्म लिया है
और प्रवज्या विचार-वृत में प्रवेश करने की कुंजी है,
जिसे हासिल करके मैं विचार-विपन्न भिक्खुनी-संघ को,
विचार-संपन्न श्रमणा-संघ में बदल देना चाहती हूँ
भिक्खुनी-संघ अनजाना घेरा नहीं मेरे लिए
उसकी काषाय-रज्जुओं से उतना ही पुराना परिचय मेरा
जितना चीवरों का भिक्खुनियों के मौन से
खुद को नया न सूझने देना स्वयं को यातना देना है,
दोहराव से अधिक घातक क्रिया कोई नहीं
भिक्खुनी-संघ का दिन वह नहीं जो सबके लिए है
उनकी रात भी वह नहीं जिसमें सब ठहरते हैं
उनके पास ज्यादा शब्द नहीं हैं, जितने हैं,
उन्हें उनको किफायत से करना होता है खर्च
हम भिक्खुनियाँ क्यों हैं, श्रमणाओं के समक्ष
मेरी पहली जिज्ञासा यह होगी, भिक्खुनी होकर
इसका पहला पक्ष मेरा होगा, मैं कहूँगी
चाहती हूँ सर्वप्रथम भिक्खुनियाँ स्वयं से तर्क करें
स्वयं से पूछें, आखिर वे भिक्खुनियाँ क्यों हुईं
क्या उनके समक्ष भिक्खुनी-संघ में
शामिल होने के अलावा अन्य मार्ग नहीं था कोई
जैसे में अपनी कहूँ मेरे किसी दुख ने
मुझे भिक्खुनी होने के लिए विवश नहीं किया
किसी प्रिय की मृत्यु ने नहीं पहुंचाई मुझे पीड़ा
न हीं किसी तरह के अभाव ने धकेला मुझे संघ-शरण में
भिक्खुनी-संघ में पसरा विचाराभाव
मुझे लेकर आया यहाँ, तथागत की तरह पूर्व से
मेरा तो जीवन-साथी भी नहीं था यहाँ कोई
जिस जीवन को पीछे छोड़कर वे भिक्खुनी हुईं
बस उसमें दुख ही दुख थे ? दुख को स्वीकारने
और उसे पराजित करने का साहस नहीं था वहाँ ??
क्या संघ शरण में आकर दुख का निराकरण हुआ???
संघ के बाहर सब गंवाया, संघ के भीतर स्वयं को
दुख कहीं पीछा नहीं छोड़ते, कितनी भिक्खुनियाँ
इसे स्वीकार करेंगी आकर आगे, क्या वे कहेंगी
वस्त्र बदले हैं, रूप बदला है, उदरपूर्ती का मार्ग बदला है
एक जीवन वह था, एक जीवन यह है, बस
इसके आगे फिर वही स्त्री-जीवन है, जिसकी छाया
कहीं किसी स्त्री का नहीं छोड़ती पीछा
पुरुष, पुरुष के बाहर भी पुरुष है
स्त्री, स्त्री के बाहर स्त्री भी नहीं
तथागत-पथ और तथागत-कथन बस पुरुष कथन है
जिसका यहाँ उन सबको करना होता पीछा,
अर्हत-पद-प्राप्त स्त्री का कथन कहाँ हैं इसमें
कहीं कुछ अंश है भी तो वह
स्त्री कथन की तरह क्यों नहीं देता सबको सुनाई
कितनी भिक्खुनियाँ हैं जिनकी भिक्खुनी-संघ से
बाहर निकलकर पुराने जीवन में लौटने की इच्छा होती है
क्या उनके लिए वापस लौट पाना आसान है
क्या अपमान और उपहास का भय उन्हें रोकता है
अपमान और उपहास का कारण तो वह तब भी बनीं
जब वे सब छोड़कर श्रमणा संघ में हुईं शामिल
संघर्षों से भागती स्त्रियाँ कहा गया उन्हें
मैं चाहती हूँ भिक्खुनियों के पास संघ-सदस्या होने के
तर्क हों अकाट्य, जिन्हें उन्होंने तथागत से
नहीं किया हो हासिल, तथ्य उजले और उनके हों
क्या तर्कहीन भिक्खुनी शव के समान नहीं
क्या संघ से बाहर वह अपने संकट में जीवित नहीं थीं.
मंतावती के क्रोंच राजा की पुत्री.
बचपन से ही भिक्खुनी संघ से संपर्क. विवाह वारणवती के राजा अनकीरत से तय.
माता-पिता के समक्ष प्रवज्या लेने का दृढ़संकल्प. स्वयं अपने केश काटे. माता-पिता को कष्ट .
10.
विमला
नगरकल्याणियो तुम्हारी जिज्ञासा उचित है
कि भिक्खुनी होने के पश्चात वेश्या नहीं रहूँगी न मैं
इस पुंश्चला होने से अपने, छुटकारा
मिल जायेगा न मुझे, अपनी जेबों में कार्षापण भरे
घर का द्वार खटखटाने फिर कोई मागधी
या लिच्छवी तो नहीं आयेगा न
मगर नगरबधुओ यह जिज्ञासा मात्र तुम्हारी नहीं
स्वयं मेरी भी है, मेरे मन में भी यह खटका
श्रमणा होने का निर्णय लेने के दिन से
विचरण कर रहा है और मैं दृढ़ मगर बेचैन
उसे भी कोई उत्तर नहीं दे पा रही हूँ फिलहाल
सर्वप्रथम तो यही कि मैं एक ऐसी प्रथम
जो नगरशोभिनी से होकर श्रमणा
उस भिक्खुनी-संघ में रख रही अपने कदम
जिसमें जनपद की सम्मनित पौरबधुएँ अनेक
जिनमें कुछ की तो मैं शत्रु सीधे
जिन्हें मेरे रूप ने अपने ही अर्धांग के समक्ष
दीर्घावधि तक किया पराजित,
जिनके शाप मुझ तक पहुंचते रहे निर्बाध
क्या वे वहाँ शक्ल में अपनी सी श्रमणा की
स्वीकार करेंगी मुझे , तथागत-कथन
आत्मसात करने के लिए मुझे समझा सकेगा उन्हें
अपने जिव्हा-प्रतोद से मुझे, प्रताड़ित करने का,
कोई अवसर वे स्वयं को गवाने देंगी
उनके हाथ मेरी ग्रीवा तक तो नहीं आ पहुंचेंगे
तब वे ही क्यों, घरों से निकलकर अपने श्रमणा हुईं
अन्य स्त्रियाँ साधारण-असाधारण
जिनका पीड़ा प्रवाह पहचाना हम सबका
स्थान पर वेश्या के, ठीक अपनी-सी
हाड़-मास से बनी स्त्री मानेंगी मुझे
वहाँ देखेंगी वे अपनी पीड़ा से मेरी और मेरे रास्ते
हम गणिकाओं की पीड़ा का करके मिलान
सोचती हूँ भिक्खु जो बौद्धिक-व्यवहारिक संरक्षक
भिक्खुनी-संघ के, उसका हिस्सा बनना मेरा
करेंगे किस तरह स्वीकार, उनमें कुछ के चेहरे
तो पहचान में आ सकेंगे आसानी से
भिक्खु होने से पहले जो विचरते रहे
बीथिकाओं में हम गणिकाओं की
संयम-शालीनता धारण करने बढ़ती रूप संपन्नता मेरी
कहीं वहाँ भी उन्हें कर तो नहीं देगी विचलित
रात-बिरात, अकेले-दुकेले में कहीं
मेरा साथ हासिल करने की कामना, कहीं वहाँ भी
पहले सी आक्रामक तो नहीं बना देगी उन्हें
यह तो वहाँ पहुंचकर ही जान सकूंगी
जिस तरह वैभव, संपन्नता, अपमान, तिरस्कार
पश्चाताप और पीड़ा त्यागकर शामिल हुई मैं
भिक्खुनी संघ में मेरे आगमन से पूर्व
क्या अपने भीतर से उन्होंने भी अतीत त्याग दिया मेरा
मेरे चेहरे में शामिल है चेहरा हम सबका
मेरी पहचान में घुली है हम सबकी पहचान
विश्वास दिलाती हूँ तुम्हें, न तो स्वयं को
मैं किसी विचलन का शिकार होने दूंगी
न किसी के भटकाव को आखेट करने दूंगी अपना.
विमला : वैशाली की एक वेश्या. जो स्थिर महामौद्ग्लयन के धम्मोपदेश से प्रेरित होकर संघ में भिक्खुनी हुई.
| पवन करण (18 जून, 1964; ग्वालियर, म.प्र.) ![]() __________________ प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित. सम्मान : ‘रामविलास शर्मा पुरस्कार’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान आदि से सम्मानित. |





बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।मैने मूल पालि से सभी थेरी गाथाऐं पढीं हैं ,समय समय पर इन पर विमर्श करती रही हूं । ” इत्थि भावो किं करिया ‘ अर्थात् स्त्री भाव हमारा क्या करेगा ऐसी स्वाधीन अस्मिता का उद्घोष करती थेरीयां नारी मुक्ति की विद्रोही चेतना की गाथाऐं हैं ।
आपकी चयन रुची को सलाम अरुण जी. अद्भुत थेरी गाथाएं और कैसा घुटता, दमित, व्याकुल, प्रश्नांकित करता अंतस. सच, पढते हुए लगा जैसे किसी अंधेरी गुहा के भीतर प्रवेश कर रही हूं.
पुरुष, बाहर भी पुरुष
स्त्री, बाहर भी स्त्री नहीं.
अनेक धन्यवाद इस पोस्ट के लिये
इन कविताओं ने जैसे इतिहास के एक ऐसे स्त्रीलोक का दरवाज़ा खोला जिसकी ओर हमारी निगाह कम गई है। बुद्धकालीन इन थेरियों के बारे में बहुत-सी बातें मैंने पहले नहीं पढ़ी थीं। खास बात यह है कि कवि इन स्त्रियों को केवल बुद्ध की अनुयायी या त्यागमयी भिक्षुणियों के रूप में नहीं देखते। वे उनके भीतर के संशय, तर्क, भूख, अपमान, आकांक्षा और आत्मनिर्णय को भी सुनते हैं। औरतों को देखने के लिए कवि के पास अपनी एक स्त्री-दृष्टि है, वह बाहर से स्त्री को देखती हुई दृष्टि नहीं, उसके अनुभवों के भीतर उतरने की कोशिश करती हुई दृष्टि है। यही कारण है कि ये कविताएँ केवल ढाई हजार वर्ष पुराने समय का पुनर्निर्माण नहीं करतीं, आज की स्त्री के प्रश्नों तक भी पहुँचती हैं। मुक्ति क्या सचमुच संभव है, यह प्रश्न हमारे सामने भी खड़ा हो जाता है।
वाह 👌 ” स्त्री मेरे भीतर ” का कवि होना इसे ही कह सकते हैं। इन कविताओं से गुजरते हुए बार बार यह महसूस होता है कि कवि ने किस तरह परकाया प्रवेश किया है, स्त्री मन, स्त्री जीवन की तत्कालीन दुनिया को लिखना और वह भी कविता में, आसान नही था स्त्री मन को बूझे बिना। समालोचन लगातार समृद्ध कर रहा है🌹 प्रिय कवि Pawan Karan ji को हार्दिक बधाइयां, शुभकामनाएं🌹 इन कविताओं को पुस्तक रूप में आने की प्रतीक्षा रहेगी। शुक्रिया Arun Dev ji.
बहुत समय बाद ऐतिहासिक कविताएं समकालीनता के साथ पढ़ने को मिली, साथ ही बौद्ध भिक्षुणियों से परिचित हुआ। पवन करण और समालोचन का आभार।