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Home » बुर्क़े वाली लड़कियाँ और अन्य कविताएँ : पूजा तिवारी

बुर्क़े वाली लड़कियाँ और अन्य कविताएँ : पूजा तिवारी

पूजा तिवारी की कुछ कविताएँ देखिए, ख़ासकर ‘बुर्क़े वाली लड़कियाँ’. बड़ी संलग्नता के साथ लिखा गया है. जो है, जैसा है—उसी में जो कुछ बेहतर हो रहा है, उसकी ओर संकेत करती हुई एक आंतरिक लय के साथ आगे बढ़ती है यह कविता. किसी युवा कवि में जो तीव्रता होती है और उसे संभालने का जो सलीक़ा होता है, वह मौजूद है. प्रस्तुत है.

by arun dev
April 8, 2026
in कविता
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बुर्क़े वाली लड़कियाँ और अन्य कविताएँ : पूजा तिवारी
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बुर्क़े वाली लड़कियाँ और अन्य कविताएँ
पूजा तिवारी

बुर्क़े वाली लड़कियाँ

 

बुर्क़े वाली लड़कियाँ
बुर्क़े में क़ैद हैं
लेकिन
जब किताबें लेकर हाथ में चलती हैं
हजारों लाखों हूरें1
मुँह बिचकाए उन जैसा बनने की तमन्ना करती हैं
फूल बरसाती हैं उनपर
बहिश्त2 से उतर आना चाहती हैं
तमाम हुज़ूरों की सेवा करते-करते ऊब चुकी हैं हूरें
वे किताब थामें बुर्क़े वाली लड़कियाँ बन जाना चाहती हैं.

किताब थामें बुर्क़े वाली लड़कियाँ
पहली इबारत3 सी लगती हैं
वे पाक़4 दुआ सी लगती हैं
जो पूरी हुई हों जैसे
वे फ़रमान5 लगती हैं
उनके ही पक्ष में जारी हुआ सा
तमाम इब्राइल-जिब्राइल6 उनपर कुर्बान हो जाते हैं
पस-ओ-पेश में फँसे दिलों को रास्ता दिखाती
किताब थामे बुर्क़े वाली लड़कियाँ

उनका पूरा वजूद ढका है पर्दे में
लेकिन उन्होंने खोल रखी हैं आँखें
उन खुली आँखों से सपने देखती हैं
एक जोड़ा पर्दे में छुपी आँखें

पूरी कायनात7 लगती हैं
जब किताब थामती हैं अपने हाथों में
उस समय
कुदरत की सबसे खूबसूरत रचना लगती हैं
किताब थामें बुर्क़े वाली लड़कियाँ

लगता है
फिर से लिखेंगी काएनात के तख़्लीक़8 की कहानी
जिसमें किसी की पसली से कोई नहीं जन्मा होगा
सहचर होंगे दोनों
साथ-साथ पनपेंगे, बढ़ेंगे और बढ़ाएंगे एक दूसरे को
अज़वाज9 सी लगती हैं
इल्म और अक़ीदे10 का मेल सी लगती हैं
किताब थामें बुर्क़े वाली लड़कियाँ

कोई फ़लसफ़ा11 लगती हैं
कामयाबी के बुत-सी
किसी पुरानी रवायत के ख़िलाफ़
गुस्ताख़ी सी लगती हैं
हिम्मत लगती हैं, जज़्बा लगती हैं
धो देती हैं इतिहास के पन्नों पर बिखरी स्याही को
जो उन्हें ज़र्ब12 देते हैं बार-बार
अकेली उठी तर्जनी की ऊँची आवाज लगती हैं
बुर्क़े की काली बदरी के बीच चमकती कोई कुदरती बिजली लगती हैं
किताब थामे बुर्क़े वाली लड़कियाँ

लगता है, थामी है पूरी सृष्टि
अल-शिफा13, खदीजा14 और आयशा15 और खौला16 सी लगती हैं
अल्लाह की नेमत लगती हैं
इल्म की वारिस लगती हैं
हिजाब में लिपटा साहस लगती हैं
किताब थामे बुर्क़े वाली लड़कियाँ

किताब थामे बुर्क़े वाली लड़कियों
सुनो! ध्यान से
तुम समाज द्वारा पहनाए हिजाब  उतारो या न उतारो
लेकिन
याद रखो!
यौम-अल-दीन17 के दिन
तुम खुद अपने कर्मों के हिसाब में लिखोगी
अपनी नुसरत18 का क़सीदा19.

 

1 इस्लाम धर्म के अनुसार जन्नत में मौजूद वे सुन्दर स्त्रियाँ जो मोमिनों (ईमान वालों) की सेवा के लिए उपलब्ध रहती हैं.
2 स्वर्ग
3 पहली रचना
4 पवित्र
5 आदेश
6 इस्लाम धर्म में मान्यता है कि जिब्राइल अल्लाह का सबसे प्रिय फ़रिश्ता था.
7 सृष्टि
8 रचना या जन्म
9 पवित्र स्त्री
10 विश्वास
11 तार्किक ज्ञान या सत्य
12 चोट या अघात
13 पैगम्बर मुहम्मद के समय की एक सम्मानित साक्षर महिला
14 इलाम धर्म में मान्यता है कि ये पैगम्बर मुहम्मद की पहली पत्नी, इस्लाम धर्म स्वीकार करने वाली पहली महिला और एक सफल व्यवसायी थीं.
15 इस्लाम धर्म में मान्यता है कि ये पैगम्बर मुहम्मद की तीसरी पत्नी थीं और इस्लामिक शिक्षाओं, हदीस और चिकित्सा के क्षेत्र में विशेषज्ञ थीं.
16 इस्लाम धर्म में मान्यता है कि ये एक साहसी, निडर और अपने हक के लिए लड़ने वाली महिला थीं. मान्यता है कि इन्होने ‘जिहार प्रथा’ (जिसमें पत्नी को माँ के सामान कहकर उन्हें तलाक दे दिया जाता था) के लिए मुहम्मद साहब से न्याय के लिए गुहार लगाई थी. उनके अटल प्रण को देखकर अल्लाह ने सूरह-अल-मुजादिला नाम की एक अलग आयत मुहम्मद साहब के नाम से भेजकर इस प्रथा को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया.
17 इस्लाम धर्म की मान्यता के अनुसार कयामत का दिन जब अल्लाह एक-एक व्यक्ति से उसके कर्मों का हिसाब लेगा.
18 जीत
19 स्तुति गान

 

 

युद्ध रोक दो

मैं देख रही हूँ
तो सोच रही हूँ !
ये जो युद्ध से उजड़े देश, शहर, गाँव, लोग
मनुष्य और उसकी उजड़ती मनुष्यता है,
यह कहाँ ले जाएगी हमें?

एक तरफ
प्रकृति दिन राज सृजनरत है
आरोग्यरत है, सहला रही है अपने घावों को
निरंतर नया रचने में निमग्न
शांत-सी बैठी, लेकिन कुपित!

दूसरी तरफ
मनुष्य रौंदता हुआ प्रकृति के सृजन को
खून से लथपथ हाथों में अपने विकास की पताका को फहराता,
ये विकास की पताका उन शवों के कफ़न सी लगती हैं मुझे
ये जलते गाँव, जलते भस्म होते लोग
किसी अभिशाप की परिणति से लगते हैं
जो लगा है मनुष्य जाति को
धूं धूं करता धुआ अपने घने अंधकार के साथ
उड़ा ले जा रहा है हमारे भीतर का विश्वास, सह अस्तित्व और सहजीविता
धूम-धड़ाम बजते बमों की तीव्र ध्वनि सुन्न कर रही है हमारी चिंतन की क्षमता को
नहीं दिख रहा विजय के आगे कि हम पराजित हो रहे हैं
जिस दुनिया में चीथड़े उड़ रहे हों कक्षा में किताब लेकर पढ़ती बच्चियों के,
खाने के कौर खाते बच्चों के
और
अपने आंचल से दूध पिलाती मांओं और दुधमुंहे बच्चों के
और
घोंसलों में अपनी चोंच से नन्हे पक्षियों का पेट भरती मेहनती चिड़िया और उनके चूजों के
और
हरे भरे फलों-फूलों से लदे वृक्षों के

और
जहाँ प्रेम और शांति स्वीकृत नहीं
युद्ध सहज हो उठा हो
उस दुनिया को जीतकर भी क्या करेंगे हम ?

 

 

अँधेरी रातें उगा रहे हैं !

हम समस्याओं को खत्म करते क्यों नहीं

काँटे उगा रहे हैं!
जो होनी ही नहीं चाहिए वो बाते उगा रहे हैं !
दिन की रोशनी चुभती है कहकर
सब
अँधेरी रातें उगा रहे हैं!

 

सवाल

डाँटकर माँ ने एक दिन, चाँद से पूछ ही लिया
जब तुम बच्चों के मामा हो, तो कुछ लाते क्यों नहीं?
ये मेरी ससुराल है, कुछ लिहाज़ तो रखो
रात को आते हो
दिन में आते क्यों नहीं?

 

 

फूलों की शिकायत

फूलों ने एक दिन शिकायत कर दी
उन्होंने तारों का टिमटिमाना नहीं देखा
दिन का सूरज तपा देता है उनके कोमल बदन को
उन्हें चाँद की रौशनी में खिलना है!

 

पूजा तिवारी
अनुवाद, आलोचना, और वृत्तचित्र पटकथा लेखन में सक्रिय
पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, विद्या भवन महिला महाविद्यालय, सिवान, बिहार
tipu1615@gmail.com

Tags: 20262026 कवितापूजा तिवारी
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Comments 5

  1. अशोक अग्रवाल says:
    4 days ago

    बेहद प्रभावशाली और नई तर्ज़ पर लिखी गई युवा कवि की कविताएं। पूजा तिवारी को बहुत-बहुत बधाई।

    Reply
  2. रूप राजपाल says:
    4 days ago

    बुर्क़े वाली लड़कियाँ पढ़ते ही असरार उल हक़ मजाज़ की ग़ज़ल ‘नौ जवान ख़ातून के नाम’ याद आ गई जिसका मतला है,” हिजाब ए फ़ित्ना परवर अब उठा लेती तो अच्छा था। ख़ुद अपने हुस्न को पर्दा बना लेती तो अच्छा था।।” मजाज़ जो कह रहा है साफ़ साफ़ कह रहा है न कि किसी दायरे में रह कर। उसके दृष्टिकोण में कोई विभ्रांति नहीं है। ग़ज़ल का मक़्ता है, “तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन। तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था।।

    Reply
  3. Bajrang Bihari says:
    4 days ago

    नाज़ुक विषयों को अपनी रचना का विषय बनाते वक़्त जिस सावधानी और संवेदनशीलता की ज़रूरत होती है वह पूजा तिवारी के यहाँ मौज़ूद है। कमाल की बात है कि कवि ने बुर्के वाली का पक्ष लेकर भी बुर्के का महिमामंडन नहीं किया है।
    व्यक्तित्व न पोशाक से बनता है, न ओहदे से। वह ज्ञान-संवलित आत्मबोध है जो शख़्सियत का पाया बनता है।

    Reply
  4. नीरज कुमार पाठक says:
    2 days ago

    कवयित्री पूजा तिवारी की कविताएं मैंने पढ़ी। ये कविताएं समकालीन जीवन की जटिलताओं, मानवीय संवेदनाओं और प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक चेतना, मानवीय करुणा और सरल भाषा के माध्यम से गहरे विचारों को व्यक्त करने की क्षमता दिखाई देती हैं।

    1. युद्ध रोक दो- कविता में कवयित्री युद्ध की विभीषिका और उसके कारण उत्पन्न मानवीय संकट को रेखांकित करती हैं। युद्ध से उजड़ते शहर, गांव और लोगों की पीड़ा के माध्यम से वह यह प्रश्न उठाती हैं कि मानव सभ्यता किस दिशा में बढ़ रही है। कविता में प्रकृति और मनुष्य के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास प्रस्तुत किया गया है- एक ओर प्रकृति निरंतर सृजन और उपचार में लगी है, वहीं दूसरी ओर मनुष्य विनाश और हिंसा में डूबा हुआ है। मासूम बच्चों, माताओं और पक्षियों तक पर युद्ध के प्रभाव का चित्रण कविता को अत्यंत मार्मिक बना देता है।

    2. अँधेरी रातें उगा रहे हैं- कविता प्रतीकात्मक शैली में आधुनिक समाज की विडंबनाओं को उजागर करती है। इसमें यह संकेत दिया गया है कि मनुष्य समस्याओं को समाप्त करने के बजाय उन्हें और बढ़ा रहा है। अंधेरी रातें उगाना और कांटे उगाना – जैसे प्रतीक समाज की नकारात्मक मानसिकता को व्यक्त करते हैं।

    3. सवाल- कविता में बाल-सुलभ जिज्ञासा और कल्पना का सुंदर चित्रण है। चांद से किया गया प्रश्न कविता में हास्य और सहजता का वातावरण बनाता है। लेकिन इसक माध्यम से एक बड़ी बात सहज – सधे शब्दों में कही गई है। वहीं फूलों की शिकायत कविता में प्रकृति को मानवीय रूप देकर उसकी कोमल संवेदनाओं को व्यक्त किया गया है।

    4. बुर्क़े वाली लड़कियां- कविता शिक्षा, स्त्री-सशक्तीकरण और सामाजिक चेतना की प्रभावशाली अभिव्यक्ति है। इसमें बुर्क़े में रहने वाली लड़कियों को केवल परंपरा की प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और परिवर्तन की वाहक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जब ये लड़कियां हाथ में किताब लेकर चलती हैं, तो वे उम्मीद, साहस और नई चेतना का रूप बन जाती हैं। कविता में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रयोग करके शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया गया है। साथ ही यह संदेश भी दिया गया है कि सच्ची पहचान बाहरी आवरण से नहीं, बल्कि ज्ञान, कर्म और आत्मविश्वास से बनती है। यह कविता स्त्री स्वतंत्रता और प्रगतिशील सोच की सशक्त अभिव्यक्ति है।

    अंतत: इन रचनाओं के आधार पर जो मैंने समझा-
    कवयित्री पूजा तिवारी संवेदनशील, सामाजिक सरोकारों से जुड़ी और विचारशील रचनाकार हैं। उनकी कविताओं में मानवीय करुणा, शांति की आकांक्षा, प्रकृति के प्रति प्रेम और स्त्री-सशक्तीकरण की चेतना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। युद्ध रोक दो – जैसी कविता में वे युद्ध और हिंसा के विरोध में मानवता की आवाज़ उठाती हैं, जबकि बुर्क़े वाली लड़कियां में शिक्षा और आत्मविश्वास के माध्यम से स्त्री की शक्ति को उजागर करती हैं। उनकी भाषा सरल, सहज और प्रभावपूर्ण है, जो पाठक के मन में गहरी संवेदना जगाती है। इन रचनाओं से कवयित्री की प्रगतिशील दृष्टि और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है। समग्र रूप से इन कविताओं की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। आपने प्रतीकों, बिंबों और कल्पनाशीलता के माध्यम से सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना और प्रकृति के सौंदर्य को सफलतापूर्वक अभिव्यक्त किया है। इन कविताओं में शांति, सह-अस्तित्व और संवेदनशील समाज की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। आपकी ये रचनाएं मर्मस्पर्शी हैं।
    बहुत – बहुत शुभकामनाएं।

    Reply
  5. पवन करण says:
    2 days ago

    डाँटकर माँ ने एक दिन, चाँद से पूछ ही लिया
    जब तुम बच्चों के मामा हो, तो कुछ लाते क्यों नहीं?
    ये मेरी ससुराल है, कुछ लिहाज़ तो रखो
    रात को आते हो
    दिन में आते क्यों नहीं?…..खूब…..बढ़िया।

    Reply

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