आलोचना

उपन्यास की वैचारिक सत्ता : आशुतोष भारद्वाज

कवि, रंग-समीक्षक, अनुवादक और संपादक नेमिचन्द्र जैन (१६ अगस्त-१९१९ : २४ मार्च २००५) का यह शती वर्ष है जिसके अंतर्गत उपन्यास, कविता, रंगमंच, संस्कृति, स्मृति-व्याख्यान आदि अनेक समारोह हो रहे...

पितृ-वध : आशुतोष भारद्वाज

(sculpture by great ketelaars)पुत्र एक समय के बाद पिता बन जाता है. क्या वह पिता को अपदस्त करके पिता बनता है ? सत्ता के लिए पुत्र द्वारा पिता का वध...

सावित्रीबाई फुले की कविताई : बजरंग बिहारी तिवारी

महान सुधारक सावित्रीबाई फुले कवयित्री भी थीं. उनके मराठी में दो संग्रह प्रकाशित हुए- ‘काव्यफुले’ (१८५४) तथा ‘बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर’ (१८९१).‘क्रांतिज्योति’ सावित्रीबाई फुले की कविताएँ औपनिवेशिक भारत में  समाजिक-धार्मिक क्रान्ति की...

उपन्यास के भारत की स्त्री (चार) : आशुतोष भारद्वाज

(Amrita Shergil : Self-portrait)‘उपन्यास के भारत की स्त्री’ के अंतर्गत अब प्रस्तुत है समापन क़िस्त ‘स्त्री का एकांत: अपूर्णता का विधान’. इससे पहले आपने पढ़ा है -(एक) ‘आरंभिका : हसरतें और...

उपन्यास के भारत की स्त्री (तीन) : आशुतोष भारद्वाज

(by DianeFeissel voilee)मुहम्मद हादी रुसवा ने ‘उमराव जान अदा’ उपन्यास में तवायफ उमराव की कथा कह दी, कम लोग जानते हैं रुसवा के दूसरे उपन्यास ‘जुनून-ए-इंतजार’ (१८९९) में इसी उमराव...

उपन्यास के भारत की स्त्री (दो) : आशुतोष भारद्वाज

(by Annem Zaidi)उपन्यासों के उदय को राष्ट्र-राज्यों की निर्मिति से जोड़ कर देखा जाता है. ‘वंदे मातरम्’ उपन्यास की ही देन है. आशुतोष भारद्वाज भारत के प्रारम्भिक उपन्यासों में स्त्री...

उपन्यास के भारत की स्त्री (एक) : आशुतोष भारद्वाज

( by Rabindranath Tagor)उपन्यासों को आधुनिक युग का महाकाव्य कहा जाता है. आधुनिकता, जनतंत्र और राष्ट्र-राज्यों के उदय से उनका गहरा नाता है, स्त्रियों की सामजिक गतिशीलता के बगैर उपन्यास संभव...

दलित साहित्य – २०१८ : बजरंग बिहारी तिवारी

हिंदी का दलित साहित्य अब कलमी पौधा न होकर एक भरा पूरा वृक्ष है. सिर्फ आत्मकथाएं नहीं, उपन्यास, कहानी, कविता, अनुवाद आलोचना सभी क्षेत्रों में आत्मविश्वास और परिपक्वता दिखती है....

सबद भेद : सेवासदन : हुस्न का बाज़ार या सेवा का सदन : गरिमा श्रीवास्तव

१०० वर्ष पूर्व प्रकाशित ‘सेवासदन’ को कथाकार प्रेमचंद का ‘पहला मुख्य उपन्यास’ माना जाता है, इस शताब्दी वर्ष में इसका गंभीर विवेचन-विश्लेषण होना चाहिए. ‘Illegitimacy of Nationalism: Rabindranath Tagore and...

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