मैं कहता आँखिन देखी : प्रो. गिरीश्वर मिश्र
भारत अपनी संस्थाओं को नष्ट करने वाले देश के रूप में जाना जाता है, खासकर शैक्षिक संस्थाएं. विश्व के २०० श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में भी बमुश्किल भारत की एक–दो संस्थाएं अपना...
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भारत अपनी संस्थाओं को नष्ट करने वाले देश के रूप में जाना जाता है, खासकर शैक्षिक संस्थाएं. विश्व के २०० श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में भी बमुश्किल भारत की एक–दो संस्थाएं अपना...
\'विकी डोनर\' और \'मद्रास कैफे\' के बाद शूजीत सरकार की फिल्म \'पीकू\' राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है. इस संवेदनशील फ़िल्म की बारीकियों से आपका...
अधनंगी शाम और यह भटका हुआ अकेलापनमैने फिर घबरा कर अपना शीशा तोड़ दिया.कैलाश वाजपेयी चुपचाप चले गए. पर कवि अपनी अनुपस्थिति में और मुखर हो जाता है. कैलाश वाजपेयी...
इधर की हिंदी कहानियों में बतौर कथाकार प्रत्यक्षा खास मुकाम रखती हैं. उनकी कहानियों की बुनावट में धागे अलग रंग के हैं, और ‘प्लाट’ की मिट्टी अलहदा है. कथा के...
‘उन्नीसवीं सदी का भारतीय पुनर्जागरण : यथार्थ या मिथक’ नामवर सिंह के इस व्याख्यान ने जहाँ पर्याप्त ध्यान खींचा है वहीं इसने कई प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं. यह...
विज्ञापनों ने हमारे आस-पास अपनी चमकीली चुस्त दुनिया का एक घेरा बना लिया है. हम उसमें चाहते न चाहते हुए भी रहते हैं. सुबह के अख़बार से शुरू होकर देर...
सूजा की कृतिपकंज पराशर का मैथिली में एक कविता –संग्रह प्रकाशित है. इसके साथ ही आलोचना और अनुवाद की कई किताबें प्रकाशित हैं, हिंदी में भी कविताएँ लिखते हैं. सत्ता...
जनसत्ता के संपादक और लेखक ओम थानवी को उनकी यात्रा-विचार पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ के लिए २०१४ के २४ वें बिहारी पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा हुई है. क्या है मुअनजोदड़ो...
निर्देशक नवदीप सिंह की हिंदी फ़िल्म ‘एन.एच.-१०’ ऑनर किलिंग’ के मुद्दे को गम्भीरता से उठाती है. इस फ़िल्म पर समालोचन में आपने सारंग उपाध्याय का लेख पढ़ा है. जय कौशल...
अजय सिंह चार दशकों से कवितायेँ लिख रहे हैं. उनका पहला कविता संग्रह– ‘राष्ट्रपति भवन में सूअर’ इस वर्ष गुलमोहर प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. अजय सिंह गोरख पाण्डेय, पाश,...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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