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Home » विश्लेषण : जंतर-मंतर पर नागरिकता का रंगमंच : रविन्द्र कुमार

विश्लेषण : जंतर-मंतर पर नागरिकता का रंगमंच : रविन्द्र कुमार

by arun dev
July 25, 2026
in आलेख
Reading Time: 6 mins read
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विश्लेषण : जंतर-मंतर पर नागरिकता का रंगमंच : रविन्द्र कुमार
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जंतर-मंतर पर नागरिकता का रंगमंच
रविन्द्र कुमार

 

पिछले एक महीने से भी अधिक समय से दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में हज़ारों छात्र-छात्राएँ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे. यह पूरा आंदोलन सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक मीम से शुरू हुआ था, जिसके कुछ ही दिनों में मिलियंस सब्सक्राइबर पार हो गए थे. बाद में अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में अध्ययनरत छात्र अभिजीत दिपके ने भारत लौटकर अपने सहयोगियों के साथ इसे एक संगठित जन-आंदोलन का रूप दिया. देखते ही देखते कारवाँ बढ़ता गया. शुरुआत में भारत के मध्यमवर्गीय बौद्धिक समाज ने इसे कोई खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन जैसे-जैसे ज़मीनी स्तर पर युवा पीढ़ी के बीच इसकी व्यापकता बढ़ी, लोग इसे गंभीरता से लेने पर मजबूर हुए. इसके बाद देश भर के अनेक प्रबुद्ध नागरिक और बुद्धिजीवी भी इसके समर्थन में आ खड़े हुए.

जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की संख्या लाखों पार करने लगी, तो CJP ने ‘संसद चलो’ का आह्वान किया. इसका नतीजा पुलिसिया कार्रवाई के रूप में सामने आया, सोशल मीडिया पर ऐसे दृश्य तैरने लगे जहाँ निहत्थे मासूम छात्रों को पुलिस बेरहमी से पीट रही थी. इस दमन ने बहुत-से लोगों को उनके ड्रॉइंग रूम्स से बाहर निकलने पर विवश कर दिया.

मैं भी अमेरिका में अपनी पीएच.डी. की पढ़ाई के बीच गर्मियों की छुट्टियाँ बिताने भारत आया हुआ हूँ. यह सब मेरे बिल्कुल आसपास ही घट रहा था. वैचारिक तौर पर सहमति होने के बावजूद शुरुआती दिनों में मैं वहाँ नहीं गया था. लेकिन लाठीचार्ज वाले दिन के बाद अंदर से बहुत आत्मग्लानि हुई. आखिरकार मैं धरना-स्थल पर गया, एक दिन, दो दिन, तीन दिन. वहाँ ज़मीन पर डटे लोगों से बात की, आंदोलन के ताप को अपनी आँखों से देखा, तो मेरे खुद के कई संशय दूर हो गए.

जिस समय मैं अपने कंप्यूटर पर यह सब टाइप कर रहा हूँ, उसके कुछ ही घंटे पहले देश के प्रधानमंत्री का सांत्वना भरा संदेश और वीडियो आ चुका है. उन्हें फ़ॉलो करने वाले कई सेलिब्रिटी के tweets भी तैर रहे हैं. फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले हिंदी के कई ‘सार्वजनिक बुद्धिजीवियों’ के पोस्ट और वीडियो भी सामने आने लगे हैं. हालाँकि इस पूरे घटनाक्रम पर अंतिम राय बनाना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन अपनी सीमित समझ से मैं इस पूरे मसले को विश्लेषित करने की कोशिश कर रहा हूँ. देश में उफ़नता यह छात्र-आक्रोश केवल परीक्षा-धांधली या प्रशासनिक लापरवाही का तात्कालिक परिणाम मात्र नहीं रह गया है. यह पूरा मामला अब CJP की सांगठनिक सीमाओं से कहीं आगे निकल चुका है; यहाँ समाज के अलग-अलग वर्गों की जमाशुदा शिकायतें एक साथ टकरा रही हैं. यह उफ़ान नवउदारवादी भारत में चरमराते सामाजिक अनुबंध, परजीवी कोचिंग-तंत्र, बंद होते वैश्विक अवसरों और ‘ग्लास फ़्लोर’ के भीतर छटपटाती युवा आबादी के आर्थिक और अस्तित्वगत संकट की साझा परिणति है.

 

 

स्टेट-हेलिंग

जंतर-मंतर पर केंद्रीय माध्यमिक व उच्च शिक्षा की परीक्षाओं में हुई धांधली और भ्रष्टाचार के खिलाफ CJP तथा विभिन्न छात्र संगठनों के बैनर तले उभरा यह प्रतिरोध भारतीय लोकतंत्र की समकालीन स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है. धरना-स्थल के आसपास भारी पुलिस बल की तैनाती, बहुस्तरीय बैरिकेडिंग, बख्तरबंद गाड़ियाँ, छात्रों और पुलिस के बीच हुई झड़प तथा आंसू गैस का प्रयोग केवल ‘कानून-व्यवस्था’ बनाए रखने की तकनीकी कार्रवाई भर नहीं रहकर राज्य की गहरी राजनीतिक बेचैनी का प्रतीक बन चुका है.

दिल्ली पुलिस द्वारा धारा-१४४ का प्रवर्तन और राजीव चौक, जनपथ, पटेल चौक, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट तथा सेवा तीर्थ जैसे रणनीतिक मेट्रो स्टेशनों के द्वारों की नाकेबंदी इस बात का भौगोलिक प्रमाण है कि राज्य संसद के ठीक मुहाने पर खड़े युवाओं को ‘नागरिक’ नहीं, बल्कि स्थापित सत्ता के लिए एक ‘संभावित खतरा’ मान रहा है.

जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक लिसा मिचेल अपनी पुस्तक ‘हेलिंग द स्टेट‘ में स्पष्ट करती हैं कि चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का केवल एक हिस्सा भर हैं. चुनावों के अंतरिम कालखंड में धरना, जुलूस और सार्वजनिक स्थानों पर घेराबंदी नागरिकों द्वारा राज्य को उसकी नैतिक जवाबदेही के लिए ‘पुकारने’ का प्राथमिक जरिया होती है. CJP का यह आंदोलन यही कार्य बखूबी कर रहा है, जब वह राज्य को जवाबदेह होने की बात कर रहा है, उससे कठिन सवाल पूछ रहा है, और छात्रों की जायज माँग रख रहा है. लेकिन जब राज्य मेट्रो स्टेशनों को बंद करता है या बैरिकेड्स की भौतिक दीवारें खड़ी करता है, तो वह वस्तुतः नागरिक और सत्ता के बीच होने वाले इसी लोकतांत्रिक संवाद को बाधित करने का प्रयास करता है.
डिजिटल सार्वजनिक वृत्त

सड़क पर जारी इस भौतिक संघर्ष के समानांतर डिजिटल सार्वजनिक वृत्त में प्रतिक्रियाओं का एक जटिल और छद्म रंगमंच देखा जा रहा है. प्रधानमंत्री का ट्वीट और सांत्वना देता वीडियो संदेश पहली नज़र में संवेदनशील महसूस होता है, लेकिन वह आंदोलनकारी छात्रों की बुनियादी और ठोस माँगों का कोई सीधा उत्तर नहीं देता. इस संदेश के तुरंत बाद फ़िल्मी सितारों, खिलाड़ियों, मुख्यधारा के इन्फ्लुएंसरों  और सांस्कृतिक हस्तियों के tweets की बाढ़ आ गई. इनमें से अधिकांश वक्तव्य सत्ता-अनुकूल, नपे-तुले और महज़ एक performative औपचारिकता तक सीमित थे.

हालाँकि, ऐसा भी नहीं है कि पूरा बौद्धिक या सांस्कृतिक जगत खामोश था. देश के कई संवेदनशील बुद्धिजीवियों, फ़िल्म कलाकारों और चर्चित हस्तियों ने पहले ही दिन से इस आंदोलन के समर्थन में अपनी बात रखी; कुछ तो इन बच्चों के साथ सड़कों पर चले, तो कइयों ने कम से कम अपनी वैचारिक सहमति और एकजुटता खुलकर व्यक्त की. प्रोफ़ेसर राजीव भार्गव जैसी हस्तियाँ तो खुद धरना-स्थल पर छात्रों के बीच उपस्थित थीं. इसके साथ ही, कई स्वतंत्र मीडियाकर्मी और युवा रिपोर्टर पहले ही दिन से अपने फोन और कैमरों के माध्यम से इस आंदोलन की ज़मीनी हकीकत को लगातार कवर कर रहे थे.

लेकिन इस डिजिटल परिदृश्य में सबसे निराशाजनक और चिंताजनक भूमिका हिंदी के स्थापित ‘सार्वजनिक बुद्धिजीवियों’ की रही. जहाँ एक तरफ स्वतंत्र डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स और युवाओं ने तुरंत रील तथा वीडियो के माध्यम से परीक्षा-माफिया के पूरे तंत्र को बेनकाब किया, वहीं हिंदी साहित्य और अकादमिक जगत का एक बड़ा वर्ग आपराधिक तटस्थता साधे रहा.

इन ‘फेंस-सिटर्स’ की वैचारिक कायरता बेहद उजागर थी. उन्होंने या तो पूरी तरह चुप्पी साधे रखी या फिर ऐसी गोलमोल और जलेबीदार भाषा में पोस्ट लिखे, जिनसे यह समझना लगभग असंभव था कि वे पीड़ित छात्रों के पक्ष में खड़े हैं या राज्य-व्यवस्था के बचाव में. जब सड़क पर छात्र लाठियाँ झेल रहे थे, तब हिंदी के ये तथाकथित संरक्षक सत्ता की गाज से बचने और ‘बुद्धिजीवी’ कहलाने के अपने तमगे को बचाए रखने के बीच झूल रहे थे. यह रणनीतिक अस्पष्टता हिंदी बौद्धिक वर्ग के उस नैतिक पतन को रेखांकित करती है जहाँ जन-संघर्ष के समय स्पष्ट स्टैंड लेने के बजाय “दोनों पक्षों के गुण-दोष” गिनवाने का ढोंग रचा जाता है. और अब, जब स्थिति को थोड़ा सँभलते देख या कम से कम देश के सत्ता-प्रतिष्ठान की ओर से सार्वजनिक संदेश आने के १२ घंटों के भीतर ही, इनमें से कई लोग अचानक अपने दड़बे से बाहर निकल आए हैं. उन्हें यकायक याद आया है कि पिछले एक महीने से भी अधिक समय से चल रहे इस छात्र-आंदोलन का समर्थन करने का ‘सुरक्षित समय’ अब आ चुका है!

 

 

 

कोचिंग मंडी का परजीवीपन और एल्गोरिदम का खेल

छात्र-आक्रोश के बीच भारत की विशाल एड-टेक और कोचिंग मंडी का परजीवी चरित्र एक बार फिर पूरी नग्नता के साथ सामने आया है. देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग चलाने वाले, जिसमें सेलिब्रिटी मास्टर लाल बत्ती का सालों से सपना बेचते आए हैं, और छात्रों से लाखों की मोटी फ़ीस वसूलते हैं, इस एवज़ में कि नौकरी तो केवल बस एक ही है, बाकी सब नौकर हैं……

या आपको हमारे नोट्स के अलावा कुछ पढ़ने की ज़रूरत नहीं है…… मगर पहले एक काम करो, काउंटर पर लाख-दो लाख जमा कर दो, भले ही अपनी ज़मीन बेचो या घर.

यह एक परीक्षा का हाल नहीं है. जिस पेपर-लीक वाले पूरे मामले पर यह धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं, उसका भी इतना ही बड़ा कारोबार है जो सैकड़ों करोड़ का है. दिल्ली, जयपुर, बॉम्बे कहीं चले जाइए, इनके होर्डिंग-पोस्टर मुँह बाये खड़े मिलेंगे कि आओ, अपने बच्चों को 6th क्लास से ही हमारे पास भेज दो ताकि उसको औरों से बढ़त मिले और वह देश के किसी प्रतिष्ठित IIT, IIMs, AIIMS में जाकर पढ़ाई करे, आप लोगों का नाम रोशन करे…… मगर इसके लिए भी…… इतने लाख काउंटर पर जमा करवा दो. हालाँकि पेपर-लीक भारत में कोई बिल्कुल भी नयी बात नहीं है, मगर इस बार NEET के पेपर-लीक ने २० के लगभग मासूम बच्चों की जान ले ली और यह पूरा मामला यहाँ से शुरू होकर अभी एक जन-आंदोलन में तबदील होता नज़र आ रहा है.

एक मज़ेदार वाक्या आपको बताता हूँ. जंतर-मंतर पर जिस दिन लाठीचार्ज हुआ, उस दिन मैं जब घर आ रहा था तो हमारे घर के पास वाले मेट्रो से उतरते ही, बिल्कुल मेरे मुँह के सामने एक इश्तहार मुँह बाये खड़ा होता है, कोई ‘फ़िज़िक्स वाला’ कोचिंग बाबा के होर्डिंग और पोस्टर पूछ रहे थे, “क्या आपको NEET 2027 में सफल होना है? होना है तो आइए हमारी अनुभवी टीम के मार्गदर्शन में.” यह दृश्य व्यवस्था के नंगे दोहरेपन को स्पष्ट उजागर करता है: एक तरफ बेरोजगारी और धांधली से टूटा युवा सड़क पर अपने लोकतांत्रिक अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है, तो दूसरी तरफ बाजार के ये कोचिंग संस्थान अगली परीक्षा के नाम पर उनसे मोटी फीस वसूलने के नए जाल बिछा रहे हैं.

यह कोचिंग, चपरासी से लेकर क्लर्क और क्लर्क से कलेक्टर सबके लिए उपलब्ध है. इस आंदोलन के शुरुआती १२-१४ घंटों तक इन कोचिंग बाबाओं के सोशल मीडिया हैंडल पूरी तरह शांत रहे. अभी शायद इस पूरे आंदोलन को एक महीना होने को आया है, हिंदी के ढुलमुल बुद्धिजीवियों की तरह इन्होंने भी पहले अपने किराए के ‘स्काउट’ भेजकर स्थिति का जायजा लिया कि कहीं सरकार का डंडा उन पर न चल जाए. जैसे ही लगा कि खतरा टल गया है, ये कोचिंग दिग्गज अपने सुसज्जित स्टूडियोज में कैमरों के सामने आकर लच्छेदार भाषण देने लगे: “देखो, युवाओं के साथ कितना गलत हो रहा है!” मुझे यह सब कोई स्टेज शो जैसा तमाशा लगता है जिसमें कोई वास्तविक सहानुभूति न होकर, युवाओं के जनाक्रोश को व्यावसायिक रूप से ‘मोनोटाइज़’ करने की सोची-समझी रणनीति है. कुछ प्रधानमंत्री के वक्तव्य के बाद अचानक से हरकत में आए हैं, कुछ आएंगे, कुछ अपने स्काउट को ही बोलने देंगे.

दूसरी ओर, डिजिटल मीडिया पर एक शक्तिशाली काउंटर-नैरेटिव भी तैयार किया गया. एल्गोरिदम के जरिए एक अलग वर्ग के डिजिटल फीड्स पर ऐसी रील्स की भरमार कर दी गई जिनमें “दंगाई भीड़” के सामने डटे पुलिसकर्मियों को राष्ट्र-रक्षक के रूप में दिखाया जा रहा था और पृष्ठभूमि में देशभक्ति के भावुक गाने बज रहे थे “ए देश मेरे, तेरी मट्टी में मिल जावाँ…”. इस नैरेटिव को वैचारिक वैधता प्रदान करने के लिए केंद्रीय विश्वविद्यालयों के सत्ता-पोषित प्रोफेसरों और प्रशासकों से लच्छेदार हिंदी व अंग्रेजी में लेख लिखवाए गए और री-ट्वीट्स की बाढ़ ला दी गई, जिनका मूल संदेश यही था कि “सरकार सब ठीक कर रही है और विरोध करने वाले छात्र अराजक तत्व हैं.”

 

 

‘ग्लास फ़्लोर’ का टूटना

मुख्यधारा का मीडिया (पक्ष और विपक्ष दोनों साइड का) अक्सर इस प्रकार के छात्र-आंदोलनों को “अचानक उपजा युवा आक्रोश” या “सड़क पर उतरा देशभक्ति का भाव” बताकर पल्ला झाड़ लेता है. किंतु एक गहन विश्लेषणात्मक दृष्टि से यह सवाल पूछना आवश्यक है: जब भारत में परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और पेपर-लीक १९९० के दशक से ही आम रहे हैं, तो यह अभूतपूर्व जनाक्रोश इसी समय क्यों भड़का?

इसका उत्तर भारत के आंतरिक शैक्षणिक ढांचे से अधिक वैश्विक पूँजी, श्रम बाजार और जातिगत संरचना के बदलते समीकरणों को टटोलने से कुछ मिल सकता है.

अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘मीट द सवर्णाज़’ में समाजशास्त्री रवीकांत किसाना भारत की सामाजिक संरचना को ‘ग्लास सीलिंग’ के बरक्स ‘ग्लास फ़्लोर’ की अवधारणा से समझाते हैं. समाज का एक विशाल बहुजन वर्ग बेसमेंट में फंसा हुआ है, जबकि उसके ऊपर एक कांच की छत (जो अभिजात वर्ग के लिए फर्श है) बनी हुई है, जिस पर बैठकर सवर्ण वर्ग सत्ता, संसाधनों और अवसरों के सभी स्विच नियंत्रित करता है.

ऐतिहासिक रूप से, औपनिवेशिक काल से ही सामान्यतया, और 1980 तथा विशेषतया मंडल आंदोलन के बाद, भारत का शिक्षित सवर्ण और उच्च-मध्यम वर्गीय युवा देश में आरक्षण और प्रतिस्पर्धी दबाव का हवाला देकर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे पश्चिमी देशों की ओर पलायन कर जाता था. यह ‘सवर्ण एक्सोडस’ या पलायनवादी सवर्ण, जिनमें आपको नेता, अभिनेता, बुद्धिजीवी, हाँ वही जिनके बारे में आप सोच रहे हैं, उनके बेटा-बेटी, देखिए कि कहाँ पढ़कर आए हैं, हिंदी में लिखने वाले प्रोफेसर्स हों या अंग्रेजी में, मध्यवर्गीय, सवर्ण खुद, जो आज यूनिवर्सिटीज में हैं, स्टडीज में हैं, बिजनेस हाउसेस में हैं, पार्लियामेंट में हैं, स्टेट असेंबलीज़ में हैं, अभी इनके बच्चे कहाँ पढ़ रहे हैं, भारत के कई नेता खुद अमेरिकन यूनिवर्सिटियों  से पढ़े हैं और धड़ल्ले से अपने स्पीच में कहते हैं कि वहाँ हमें फलां फेमस प्रोफेसर पढ़ाता था. अभी इनमें से बहुतों के बच्चे पढ़ रहे हैं. भारत में एक ऐसा अभिजात वर्ग है जो अमेरिका-यूरोप के किसी भी टियर-वन यूनिवर्सिटी की फीस आसानी से अफ़ोर्ड कर पाता है. इंटरनेट ने चीज़ों को इतना पारदर्शी तो किया ही है कि आप गूगल पर हर यूनिवर्सिटी का इंटरनेशनल स्टूडेंट्स पर लगने वाला ट्यूशन फीस देख सकते हैं, आप देखिए आपके जनप्रतिनिधियों के बच्चे कितना सालाना पैसा देकर उधर पढ़ते हैं.

किंतु पिछले कुछ वर्षों में परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है. अमेरिका द्वारा H-1B, F1, J-1 वीज़ा पर कड़े प्रतिबंध, ब्रिटेन और कनाडा में आप्रवासन नीतियों की सख्ती, तथा विदेशों में दक्षिण एशियाई छात्रों के प्रति बढ़ती आर्थिक व नस्लीय जटिलताओं ने इस पलायन मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है. जब विदेशी विश्वविद्यालयों का रास्ता बंद हो गया और वैश्विक कॉरपोरेट क्षेत्र में छंटनी का दौर शुरू हुआ, तो सवर्ण और उच्च-मध्यम वर्गीय युवाओं के पास सुरक्षित भविष्य के लिए भारत के भीतर ही जगह बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. यह सवर्ण अभिजात तबका हमेशा अपनी सामाजिक पूंजी और अंतर-पीढ़ीगत विशेषाधिकारों को छिपाकर खुद को ‘सेल्फ़-मेड’ और ‘Meritorious’ के रूप में पेश करता रहा है. पलायन से पहले इनमें से अधिकांश देश के केंद्रीय संस्थानों, मसलन IITs, IIMs, AIIMS जैसे संस्थानों में पढ़े-गढ़े हैं. लेकिन जब NEET और केंद्रीय संस्थानों की प्रतियोगी परीक्षाएँ ही भ्रष्टाचार और पेपर-लीक की भेंट चढ़ने लगीं, तो इस वर्ग का संस्थागत सुरक्षा-चक्र भी ढहने लगा है.

भारत एक बेहद जटिल और बहुस्तरीय समाज है. इसमें जितनी भिन्नताएँ, पदानुक्रम, भेदभाव और विषमताएँ हैं, वैसी शायद ही दुनिया के किसी अन्य समाज में हों. हमारे ही देश का हाल, जैसा कि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन और ज्यां द्रैज़ ने रेखांकित किया है, ‘सब-सहारा अफ्रीका की ग़रीबी के समुद्र में समृद्धि के द्वीप’ जैसा है. जंतर-मंतर पर हो रहा यह धरना-प्रदर्शन भी इस जटिलता को दर्शाता है. एक तरफ इसमें उस ‘ग्लोबल मिडिल क्लास’ के बच्चे शामिल हैं, जिनका पहनावा, भाषा, रहन-सहन और विरोध प्रदर्शन का तरीक़ा पूरी तरह वैश्विक मानकों वाला है. आप इंस्टाग्राम पर तैरती सैकड़ों रील्स देखिए, जिनमें ये बच्चे शुद्ध अंग्रेजी में अपनी बात रख रहे हैं, यहाँ तक कि उनकी गालियों और तंज़ पर भी एक ख़ास अभिजात्य आवरण चढ़ा हुआ है. यह एक ऐसा ग्लोबल मिडिल क्लास है, जिनकी पढ़ाई-लिखाई एकदम टॉप-टियर कॉन्वेंट स्कूलों में हुई है, जो विचारों, खान-पान, रहन-सहन से वैश्विक नागरिक हैं, बस उनके पासपोर्ट पर एक मुहर भर की दरकार होती है. उनके बाप-दादाओं के टाइम पर यह मुहर लगना आसान था, मगर अब वे स्टैम्प लगना मुश्किल होता जा रहा है.

ऊपर से इनका ग्लोबल लिटरेचर और कल्चर से एक्सपोज़र इनको कम से कम थ्योरी में तो और ज़्यादा समावेशी और लोकतांत्रिक बनाता है. यह मेरा मानना है और यह जंतर-मंतर वाली घटना में भी परिलक्षित होता है, क्योंकि भले ही इनमें से किसी ने गांधी, अंबेडकर या भगत सिंह को अकादमिक रूप से स्टडी न किया हो, मगर वे इन प्रतीकों का प्रयोग जिस प्रकार से अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए कर रहे हैं, वह बहुत कुछ कहता है. अभिजीत दिपके के घोषित रूप से दलित बैकग्राउंड होने के बावजूद भी ऐसा कहीं देखने को नहीं आया कि Gen-Z उनकी लीडरशिप को लेकर किसी भी प्रकार के शक-सुभान या पूर्वाग्रह में है. यह एक बहुत ही शानदार और अच्छी शुरुआत है. यह आंदोलन इस देश की सदियों से चली आ रही रूढ़ियों और जातिगत दूरियों को कम कर पाएगा या नहीं, यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है, मगर नौजवानों का एक कॉमन कॉज़ के लिए डटे रहना आशा से भरता है.

अतः जंतर-मंतर की सड़कों पर उमड़ी यह भीड़ केवल “अचानक जागे नैतिक आदर्शवाद” का परिणाम नहीं है. यह आर्थिक और वर्गीय अस्तित्व की वह सीधी लड़ाई है जहाँ युवाओं को समझ आ चुका है कि यदि वे भारत के भीतर पारदर्शी और न्यायसंगत संस्थानों के लिए नहीं लड़ेंगे, तो उनके पास जीवन में आगे बढ़ने का कोई अन्य ठिकाना नहीं बचेगा. यहाँ व्यवस्था का वर्ग-चरित्र भी पूरी तरह बेनकाब होता है, भारत का राजनीतिक और प्रशासनिक अभिजात वर्ग अपने बच्चों को करोड़ों रुपये फ़ीस देकर हार्वर्ड, प्रिंसटन और ऑक्सफ़ोर्ड भेजता है, जबकि देश का सामान्य युवा जर्जर सरकारी संस्थानों और धांधली-ग्रस्त परीक्षाओं के दुचक्र में पिसने के लिए छोड़ दिया जाता है.

 

प्रदर्शनकारी नागरिकता और उच्च शिक्षा का संकट

राज्यीय संरचनाओं के इस क्षरण के बीच, जंतर-मंतर पर नागरिक एकजुटता का एक अभूतपूर्व मॉडल देखने को मिल रहा है. आंदोलनकारियों के लिए भोजन और जल की व्यवस्था केवल पारंपरिक लंगर तक सीमित नहीं रही है. देश के विभिन्न शहरों, जयपुर, लखनऊ, मुंबई और बेंगलुरु, और यहाँ तक कि विदेशों में बैठे आम नागरिकों और पूर्व छात्रों ने ‘जोमैटो’ और ‘स्वीगी’ जैसे डिजिटल ऐप के जरिए जंतर-मंतर का पता डालकर ऑनलाइन खाना डिलीवर करवा रहे हैं.

यह घटना नवउदारवादी भारत में नागरिकता की एक नई परिभाषा गढ़ती है. जब राज्य अपने प्राथमिक दायित्वों, जैसे पारदर्शी परीक्षा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, से पूरी तरह पीछे हट जाता है, तो नागरिक समाज डिजिटल तकनीक का प्रयोग करके अपना एक ‘अनौपचारिक कल्याणकारी राज्य’ निर्मित कर लेता है या कम से कम कोशिश करता है, यह और कहीं दिखा हो या नहीं दिखा हो, मगर जंतर-मंतर पर ज़रूर दिखा है. यह एकजुटता दर्शाती है कि देश का आम नागरिक इस परीक्षा-संकट को केवल “विद्यार्थियों की समस्या” नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और नैतिक अन्याय के रूप में देख रहा है.

भारत में उच्च शिक्षा का संकट केवल पेपर-लीक तक सीमित नहीं है; यह रोज़गार, शोध, ज्ञान-सृजन और समाज निर्माण की पूरी प्रक्रिया के संस्थागत क्षरण से जुड़ा है. जब विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियाँ राजनीतिक सिफ़ारिशों, ‘गुरु-कृपा’, २५ लाख रुपये के पैकेज या सीधे भ्रष्टाचार के आधार पर होंगी, तो न केवल पूरा शैक्षणिक ढाँचा खोखला हो जाएगा, बल्कि समाज की आंतरिक संरचना भी गड़बड़ा जाएगी. २५ लाख रुपये की घूस देकर या किसी की ‘गुरु-कृपा’ से नौकरी पाने वाले किसी प्रोफ़ेसर से आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वह किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन में बेबाक होकर अपनी बात कह पाएगा या सत्ता-प्रतिष्ठान के विरुद्ध खड़े होने का नैतिक साहस दिखाएगा?

यह भ्रष्टाचार केवल संस्थागत न होकर एक गहरा नैतिक आयाम ले लेता है. यहाँ ‘जिसका दाना, उसका गाना’ वाला वह दुष्चक्र निर्मित हो जाता है, जहाँ एक भ्रष्ट समाज और भ्रष्ट तंत्र भ्रष्ट नागरिकों व आत्मविहीन बौद्धिकों को जन्म देता है. ये अकादमिक फिर पलटकर समाज की जड़ताओं को ही पोषित करेंगे, सत्ता के सामने अपने मूल्यों को बेच देंगे या खुद किसी चादर की तरह सत्ता के सामने बिछ जाएंगे.

जंतर-मंतर पर घट रहा यह घटनाक्रम केवल तात्कालिक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ में नवउदारवादी नीतियों द्वारा पैदा किए गए व्यापक युवा संकट का हिस्सा है. बांग्लादेश में कोटा प्रणाली के खिलाफ छात्र विद्रोह, केन्या में कर-वृद्धि के खिलाफ ‘जन-ज़ी’ का सड़क पर उतरना, और नेपाल में राजनीतिक भाई-भतीजावाद के खिलाफ आक्रोश, ये सभी दर्शाते हैं कि नई पीढ़ी अब ढहते सामाजिक अनुबंधों को अपनी नियति मानने को तैयार नहीं है.

नियमित रूप से मीडिया पर “मन की बात” करने वाले राज्य-प्रतिष्ठान को संसद के द्वार पर खड़े इन युवाओं की “दिल की बात” भी सुननी होगी. लोकतंत्र केवल पाँच वर्षों में एक बार वोट डाल आने का नाम नहीं है; यह दो चुनावों के बीच नागरिक द्वारा अपनी संप्रभु आवाज़ को सत्ता के गलियारों तक पहुँचाने का सतत प्रयास है. यदि राज्य इस जन-आक्रोश को केवल “कानून-व्यवस्था की समस्या” मानकर ख़ारिज करता रहेगा, तो जंतर-मंतर जैसे सार्वजनिक स्थान आने वाले समय में भी सत्ता की नींद उड़ाते रहेंगे, क्योंकि जब संसद और संस्थाएँ मूकदर्शक बन जाती हैं, तो सड़कें ही लोकतंत्र की अंतिम और सबसे मुखर अदालत बनती हैं.

 

रविन्द्र कुमार ओरेगन विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के आधुनिक दक्षिण एशियाई इतिहास पर शोध कार्य कर रहे हैं.
ravinderkumar955@gmail.com

Tags: 20262026 आलेखCJPकॉकरोच जनता पार्टीजंतर-मंतरजंतर-मंतर पर नागरिकता का रंगमंचरविन्द्र कुमार
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Comments 3

  1. Keshav Yadav says:
    3 weeks ago

    It’s a great view of Mr. Ravinder kumar. I know him since last 7-8 years and can understand his writings a little. Day before yesterday we were talking about the same issue and i came to about some facts and things happened and happening at jantar mantar delhi. We can’t say much about the results of the protest but by this the public mostly the youth of india has known his powers and have learned to ask question from the govt. The youth has known power of his vote. I talked to many of my friends about the same and noticed one common thing in all of them, they all were saying that till now we had not used our vote but this time we will definitely use it. This mindset of youth may have the power to change the entire indian politics. Finally i Hope that the result of all this remain positive.

    Reply
  2. Abhishek Kushwaha says:
    3 weeks ago

    The article presents an analytical overview of the CJP protest at Jantar Mantar. It is laden with some interesting insights, like using the paradigm of the Anthropological State by Lisa Mitchell and inversely applying the notion of the Glass Floor by Ravikant.

    I particularly find the application of the Glass Floor notion intriguing in this context, as it subtly and successfully tries to answer the question: how did this routine/chronic/everyday rupture of the education apparatus (paper leaks) in India suddenly gather political steam in the form of organized protests across the nation?
    The article argues that it happened, among other things, because of the visa restrictions the Indian upper-middle class is facing these days. The interests of the privileged are threatened; therefore, there is an uprising. To my understanding, this is a valid interpretation.
    However, it appears there is more to it. This protest could gather so much steam because, along with NEET, SSC examination papers were also continuously leaked and sold. Last year, in this very month of July, there was a huge protest by around 10 lakh students against paper leaks, but that agitation was brutally suppressed. No media reported it. No political party said anything about it. The only exception was Chandrashekhar Azad, who held a solo protest on the Parliament premises.
    Therefore, I argue that the success of the CJP protest may have started with the hurt sentiments of the privileged middle class, but it was sustained and amplified by the ‘have-nots’ of the Indian student community, and not mainly by disgruntled Savarna youth.
    I also understand that since the 1990s, no segment of the Savarna population has had the ability to build a mass movement on their own. They can give birth to a mass movement (in their liberal or neo-liberal spirit), but they can’t sustain it without the participation of the Hindu Subalterns.
    As far as the ‘Hailing the State’ paradigm is concerned, it explains the relation between the elected and the electors beyond elections through the yellow prism of iron barricades. It is a brilliant application of the notion of the Anthropological State while interpreting the barricading of Lutyens to save it from “cockroaches.” However, I feel this phenomenon can also be understood and interpreted through the paradigms of biopolitics.
    Barricading is an everyday affair in India. Yet, the trail of yellow barrier blocks we observed in the CJP protests was more than just physical barriers. They were meant to control the “lives” of the protesters and reimagine them to suit the state apparatus.
    Ultimately, the article is an interesting read. It is a pleasure to read Ravindra here.

    Reply
  3. Arun Kumar Singh says:
    3 weeks ago

    नमस्कार,
    बहुत बहुत धन्यवाद, अति सुन्दर विचार, हेतु।

    Reply

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