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समालोचन

Home » चंद्रभूषण से महेश मिश्र की बातचीत

चंद्रभूषण से महेश मिश्र की बातचीत

by arun dev
June 11, 2026
in बातचीत
Reading Time: 28 mins read
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चंद्रभूषण से महेश मिश्र की बातचीत
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चंद्रभूषण से महेश मिश्र की बातचीत 

 

चंद्रभूषण जी से पहली बात तिब्बत पर उनकी पुस्तक ‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’ से शुरू हुई और पहली मुलाक़ात एक साहित्यिक परिचर्चा में हुई. परिचर्चा के बाद हम दोनों एक संक्षिप्त बात करते हैं और योजना बनती है कि मिल-जुलकर एक काम किया जाए. इस मामले में कि भारत से बुद्ध धर्म लुप्त होने की कगार पर क्यों पहुँच गया जबकि सामाजिक रूप से सबसे क्रान्तिकारी प्रस्ताव तो उसी के पास थे.

हमारी कुछ छोटी मुलाक़ातें और बातें इस मामले के इर्दगिर्द हुईं लेकिन मैंने तो कुछ ख़ास किया नहीं. चंद्रभूषण जी कुछ ही महीनों में ही एक विमर्श-तलब शीर्षक के साथ सबके सामने प्रकट हो जाते हैं. यह पुस्तक, ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’ लगातार पढ़ी और सराही जा रही है.

इस तरह हमारी बातचीत साहित्य से शुरू हुई लेकिन अचानक भारत की सांस्कृतिक स्मृति, उसके ऐतिहासिक संक्रमणों और उन परम्पराओं तक पहुँच गई जिन्हें भारतीय इतिहास ने या तो हाशिये पर डाल दिया या अपने भीतर इस तरह समाहित कर लिया कि उनकी अलग पहचान ही धुँधली पड़ गई.

इसके बाद हमारे संवाद लगातार बनते रहे, साथ ही उनका काम, उस काम की गहनता और उसके दायरे बढ़ते चले गए. बुद्धचरित, रामायण, और साहित्य की अन्य धाराओं से होते हुए नाथों, सिद्धों, शाक्तों, कापालिकों, इत्यादि से आगे बढ़कर सिक्ख परम्परा तक वे लगातार काम करते जा रहे हैं और मैं उन्हें प्रशंसा से देखता जा रहा हूँ.

मैंने सोचा, एक बातचीत की जाए जो उनके इतने सारे काम को समग्रता से लेकिन संक्षेप में पाठकों तक पहुँचा सके. यह संवाद मेरी इसी आकांक्षा का परिणाम है. आप देखेंगे कि हमारे संवाद के दौरान धीरे-धीरे यह साफ़ होता गया है कि भारत का सांस्कृतिक इतिहास गौरव और निरंतरता की भी कहानी है; पर वह स्मृति, विस्मृति, वर्चस्व, समावेशन और विलोपन के संघर्ष की भी कहानी है.

ग्राम्शी का “सांस्कृतिक वर्चस्व” यहाँ किसी पराए सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि भारतीय अनुभव की तरह सामने आ जाता है. यहाँ सत्ता राजनीतिक से अधिक शायद सांस्कृतिक है और वह केवल शासन नहीं करती, बल्कि समाज की स्मृति, भाषा और उसकी आध्यात्मिक संरचना को भी अपने अनुरूप ढालती जाती है.

यह संवाद उस कड़ी में पहला तो नहीं है लेकिन इसके आयाम निस्संदेह पिछली बातचीत से वृहत्तर हैं. हम दोनों ही उम्मीद करते हैं कि यह अंतिम भी नहीं साबित होगा. बातों के फैलाव के पीछे ढाई-तीन हजार वर्षों में रचे गए संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिंदी-पंजाबी-मराठी के भी कुछ चर्चित ग्रंथों में भारतीय संस्कृति के दूसरे पहलू की खोज पर टिकी एक किताब का रचाव है.

 

 

महेश- आप जिस तरह से मध्यकाल पर काम कर रहे हैं, उससे लगता है कि यह आपके लिए कोई स्थिर कालखंड नहीं है बल्कि एक डायनामिक मोज़ैक जैसा, जैसे आप देख रहे हैं, ऐसा लगता है. मगर आप उसे बौद्धिक, सांस्कृतिक रचाव के रूप में देखते हैं. तो मैं यह समझना चाहता हूँ कि संक्रमण का असल कारण क्या था? मतलब प्राचीन से मध्यकाल और मध्यकाल से आधुनिक काल की तरफ़? धर्म था, दर्शन था, राजनीति थी या क्या था? आर्थिकी थी? या सब कुछ?

चंद्रभूषण- भारत की अकेडमिक्स ब्रिटिश राज की छाया में खड़ी हुई है, तो इतिहास का पुराना विभाजन मोटे तौर पर जैसा लोगों ने कर रखा था कि एक एँशिएँट हिस्ट्री है जिसे हिंदू पीरियड भी कहा जाता था, फिर मुस्लिम हिस्ट्री है और फिर मॉडर्न हिस्ट्री है. बाद में मुस्लिम हिस्ट्री वाले हिस्से को मेडाइवल हिस्ट्री, मध्यकालीन इतिहास ऐसा करके बोलना शुरू कर दिया. यूरोपियन बाजारों में पुरानी चीजों की डिमाँड ज्यादा थी लिहाजा अंग्रेज अफसरों ने एँशिएँट आर्कियॉलजी और हिस्ट्री पर मेहनत ज्यादा की. लेकिन वह कहाँ खत्म होती है और मेडाइवल हिस्ट्री कहाँ से शुरू होती है, ऐसा बहुत स्पष्ट, वॉटर-टाइट डिवीजन इतिहास के आम दायरे में आज भी नहीं दिखता.

प्रो. रामशरण शर्मा ने इसके लिए ‘फ्यूडलिज्म’ नाम की एक चमकीली रेखा खींची है, जिसके जरिये सत्ता के बहुत गहरे बिखराव को वे रेखांकित करते हैं. इसकी छायाएँ भवभूति के नाटकों में और बाद में राजशेखर के प्राकृत नाटक ‘कर्पूरमंजरी’ में दिखाई देती हैं. लेकिन यह बाद की बात है. यूरोप में रोमन एँपायर के पराभव और रिनेसां के बीच के पीरियड को ‘डार्क एज़’ कहने का चलन था तो उसी तर्ज पर गुप्तकाल और दिल्ली सल्तनत के बीच के समय को यहाँ भी अंधकारयुग कहा जाता रहा. लेकिन इस काल के इतने सारे ग्रंथ और पांडुलिपियां उपलब्ध हैं और भारत के सांस्कृतिक इतिहास के लिए यह समय इतना महत्वपूर्ण है कि वह शब्दावली बाद में छोड़नी पड़ी.

मध्यकालीन इतिहास के विभागों में मुख्यतः दिल्ली सल्तनत और मुगलकालीन इतिहास ही चलता है, क्योंकि उसपर काम करने के लिए अरबी-फारसी के दस्तावेजी साक्ष्य मिल जाते हैं. पूर्व-मध्यकालीन इतिहास का ढांचा बनाने के लिए कुछ मूर्तियों और शिलालेखों के अलावा कुछ साहित्यिक स्रोत ही मिलते हैं. नतीजा यह कि क्लास में पढ़ाने लायक सरल इतिहास का पाठ नहीं बन पाता. बड़े फ्रेम में देखने पर लगता है कि भारतीय इतिहास के काल विभाजन को तीन के बजाय चार हिस्सों में रखा जाए और प्राचीन इतिहास को राजा हर्षवर्धन के साथ ही समाप्त मानकर 650 ई. से 1200 ई. तक साढ़े पांच सौ वर्षों के लिए पुरातत्व की समझ और इतिहास लेखन को लेकर एक अलग दृष्टि विकसित की जाए, जो सत्ता-केंद्रित न हो, तो शायद भारत की कुछ चिरंतन गुत्थियां सुलझाई जा सकें.

रही बात इतिहास के निर्धारक तत्वों की, तो भारत के इतिहास में भी ये वही होने चाहिए, जो बाकी दुनिया के इतिहास में होते हैं. हमारी ‘विश्वगुरु’ ग्रंथि पहले तो भारत के सांस्कृतिक अंतर्विरोधों पर नज़र ही नहीं जाने देती. किसी तरह वे दिख भी जाएँ तो उन्हें किसी की महिमा से ढक देती है. जैसा गया में एक महंत ने राहुल सांकृत्यायन से कहा था- ‘हमारे शंकराचार्य जी ने बौद्धों को भारत से भगा दिया’, या मैथिलीशरण गुप्त जो बात ‘भारत भारती’ के एक छंद में कहते हैं–

‘यद्यपि सनातन धर्म की ही अंत में जय-जय रही
भगवान शंकर ने भगा दी बौद्ध-भ्रांति भयावही.’

मेरी कोशिश भारतीय संस्कृति-सभ्यता को उसकी गति में देखने की है तो टकराव मुझे दिखने ही दिखने हैं. इसकी राजनीतिक-आर्थिक वजहें भी मुझे दिखती हैं, और यह सब साहित्य के आमफ़हम ग्रंथों में ही दिखता है.

 

महेश- सांस्कृतिक इतिहास के वे बड़े बदलाव क्या हैं, जो आपको अर्ली मेडाइवल हिस्ट्री में दिखाई पड़ते हैं? मतलब ट्रांजिशन कहाँ दिखना शुरू होता है?

चंद्रभूषण- मेरे दिमाग में हर्षवर्धन एक स्थायी संदर्भ हैं. शायद इसलिए क्योंकि मेरे अध्ययन का संदर्भ बौद्ध धर्म ज्यादा रहा है. हर्ष खुद एक बड़े नाटककार थे. ‘रत्नावली’, ‘प्रियदर्शिका’ और ‘नागानंद’ उनके चर्चित नाटक हैं, जिनमें नागानंद पर बोधिसत्व के आदर्शों का स्पष्ट प्रभाव दिखता है. ह्वेनसांग ने हर्ष का वर्णन शीलादित्य नाम के प्रतापी, सुसंस्कृत बौद्ध सम्राट के रूप में किया है. हर्ष बौद्ध रहे हों या नहीं लेकिन उनकी जीवन दृष्टि में बुद्ध के लिए बराबर जगह है. उनकी एक और अच्छी बात यह है कि संस्कृत के महान गद्यकार बाणभट्ट ने अपने चर्चित ग्रंथ ‘कादंबरी’ और ‘हर्षचरित’ उनके दरबार में रहते हुए ही लिखे. राजा का लेखन और राजा पर भारतीय और चीनी, दोनों स्रोतों से सर्वसम्मत लेखन, यह एक दुर्लभ बात है. अब से 1400 साल पहले की दुनिया में अत्यंत विरल.

इससे कुछ कम, लेकिन कमोबेश ऐसी ही स्थिति दक्षिण में हर्ष के समकालीन पल्लव राजा महेंद्रवर्मन की भी थी, जिनका लिखा ‘मत्तविलासप्रहसन’ हम पढ़ते हैं. महाकवि दंडी उनके दरबार में थे, जिन्हें हम ‘दशकुमारचरित’ जैसे फिक्शन के लिए जानते हैं, जिसको एक आधुनिक उपन्यास की तरह भी पढ़ा जा सकता है. तो सन 600 से 650 ईसवी के बीच के उस समय को लेकर बहुत सारी लिखित चीजें, डॉक्युमेंट्री एविडेंस जैसी चीजें मौजूद हैं.

दरअसल, हर्षवर्धन और महेंद्रवर्मन एक भव्य ऐतिहासिक युग की आखिरी कड़ी हैं. उनके समय तक परस्पर टकराती हुई कई सत्ताओं के बावजूद भारत की सभ्यता को आप एक अविभाजित सभ्यता की तरह देख सकते हैं. औपचारिक रूप से यह युग, प्राचीन इतिहास का युग इनके सौ साल पहले गुप्त वंश के पराभव के साथ ही खत्म मान लिया जाता है. हर्ष का पुष्यभूति वंश, पुलकेशिन द्वितीय का चालुक्य वंश और महेंद्रवर्मन का पल्लव वंश इसे एक किस्म का एक्सटेंशन देते हैं.

गुप्त काल की एक ख़ासियत यह थी कि उसके समय में तीन बड़े और लगभग मैत्रीपूर्ण साम्राज्य भारत में एक साथ मौजूद थे. हिमालय से समुद्र की तरफ बढ़ते हुए उत्तर भारत में, मतलब हिमालय से नर्मदा तक गुप्त साम्राज्य, नर्मदा से गोदावरी के बीच वाकाटक साम्राज्य और फिर गोदावरी से कावेरी तक या जो भी कह लें, पल्लव साम्राज्य है. उसके बाद ठेठ दक्षिण के तीनों छोटे-छोटे राजवंश पांड्य, चेर, और चोल, ये सब हैं.

तो इन तीन बड़े साम्राज्यों का एक साथ स्थित होना, उनके राजवंशों की भाषा संस्कृत होना और उनके बीच लगभग 200 साल तक रिश्तेदारियां या मैत्रीपूर्ण संबंध बने रहना, यह एक एक ऐसी चीज है जिसके बहुत सारे फिजिकल डॉक्यूमेंट्स तो हैं ही, लगातार पढ़े जाने वाले ग्रंथों के रूप में उनकी एक बहुत साफ लिंग्विस्टिक आर्कियोलॉजी भी मौजूद है. लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि वह दौर भारत के जेनेटिक्स में दर्ज है. यह बहुत असाधारण चीज है. ऐसा साफ दिखता है कि भारत में जाति प्रथा की शुरुआत उसी दौर में हुई, क्योंकि-

महेश– कब? जाति प्रथा कब शुरू हुई?

चंद्रभूषण- यही जो स्वर्ण युग वाला समय दिखता है न, गुप्त, वाकाटक और पल्लव साम्राज्यों का. दुनिया के इतिहास में इतने बड़े भूगोल पर इतने लंबे समय तक आपस में बहुत बड़ी मारकाट की लड़ाइयों में न लगी रहने वाली सत्ताओं का कोई और उदाहरण शायद ही खोजा जा सके. यह नालंदा महाविहार की स्थापना का समय है. राजाओं द्वारा बौद्धों की घेरेबंदी के प्रमाण भी इस इस दौर में नहीं मिलते.

मुख्यधारा का संस्कृत साहित्य और जाति-प्रथा, दोनों शाश्वत-सी लगती संरचनाएँ इस दौर की ही उपज हैं. बहुत अजीब बात है, लेकिन इसके प्रमाण दिनों-दिन जुटते ही जा रहे हैं. दोनों के बीज रूप पहले से मौजूद थे. मौखिक महाकाव्य, पाणिनीय व्याकरण और वर्ण व्यवस्था, तीनों पुरानी चीजें हैं. लेकिन एक बुद्धचरित को छोड़कर लिखित संस्कृत साहित्य का बड़ा हिस्सा, और पुराने मौखिक महाकाव्यों का ग्रंथ रूप इसी दौर की उपज है. वर्ण व्यवस्था में मौजूद थोड़ी-बहुत लोच तक को सिरे से खत्म कर देने वाली जाति व्यवस्था भी इसी दौर से निकली है.

महेश- तो मतलब, वर्ण से जाति का संक्रमण यहाँ आप देखते हैं?

चंद्रभूषण- वर्ण से जाति का एक बहुत बड़ा संक्रमण यहाँ दिखता है, क्योंकि भारत का जेनेटिक पूल इसी दौर में अचानक बहुत छोटा हो गया. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमोडिकल जिनॉमिक्स, कल्याणी (पश्चिम बंगाल) की 2016 में आई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय मानी गई एक पियर रिव्यूड रिसर्च से यह साबित हुआ कि अब से 70 पीढ़ी पहले, यानी सन 500 ई. के आसपास भारत में स्ट्रिक्ट एँडोगैमी, यानी संतानोत्पत्ति के संबंध एक बहुत छोटे, निश्चित दायरे में ही बनाने की व्यवस्था पाँच-सात पीढ़ियों में ही सख्ती से लागू हो गई.

जैसे मान लीजिए, आपकी 72वीं पूर्वज पीढ़ी का डीएनए माँ और पिता, दोनों तरफ की दस-बीस पुश्तों को मिलाकर 1000 तरह का वैरिएशन दिखाता था, तो इसके डेढ़ सौ साल बाद 65वीं पीढ़ी के पूर्वज में यह मात्र 100 तरह के वैरिएशन दिखाने लगा. फिर यह इतने पर ही रह गया और वही छोटा जेनेटिक पूल चलते-चलते यहाँ तक आ गया.

महेश- दैट मींस समाज में खुलेपन की कमी.

चंद्रभूषण- हाँ, वह भी बहुत कम समय में.

महेश- रिस्ट्रिक्शंस. शादी-ब्याह में रिस्ट्रिक्शंस.

चंद्रभूषण- जी. तो स्थिरता और समृद्धि का वह अच्छा दौर भारत की जेनेटिक हिस्ट्री में बुरे दौर की तरह दर्ज है. प्रसिद्ध रसायनज्ञ डॉ. प्रफुल्ल चंद्र रॉय भारत में जाति व्यवस्था को विज्ञान के विकास में सबसे बड़ी बाधा बताते थे, क्योंकि इसने शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी. देश के सांस्कृतिक इतिहास में भी इसे एक डिवाइडिंग लाइन के रूप में चिन्हित करना होगा, चाहे जैसे भी किया जाए. उसके बाद कई बहुत बड़े बदलाव होते हैं, जिस पर जवाब अभी बहुत लंबा न हो जाए इसलिए इसको मैं कट-शॉर्ट करता हूँ.

 

महेश- जी. लेकिन आप सांस्कृतिक निरंतरता भी तो देख रहे हैं न– प्राचीन से मध्यकाल और मध्यकाल से आधुनिक काल के बीच में? लगातार एक डायनेमिज़्म आपको कल्चरल लेवल पे दिख रहा है न? मतलब इन्हें स्टैटिक खांचों में तो नहीं बाँट सकते न?

चंद्रभूषण- निरंतरता एक मामले में टूटती है. और बातों के अलावा संस्कृति के स्तर पर भी. बुनियादी निरंतरता, दार्शनिक धारणाओं की निरंतरता, ये सब चीज तो है, लेकिन जो फिलॉस्फिकल स्वीप है, चिंतन के लिए अमूर्तन के बड़े ढांचों का मौजूद होना, वह चीज हर्ष के बाद वाली सदी में, आठवीं सदी ईसवी में अचानक कम होनी शुरू हो जाती है. नए दार्शनिक ग्रंथों के कम लिखे जाने में यह परिघटना देखी जा सकती है.

बड़े साम्राज्य गायब हो जाते हैं. छोटी रियासतें, उनके देवी-देवता, उनकी आस्थाएँ, उनकी भाषा, उनकी पहचानें, ये काफी ताकतवर होनी शुरू हो जाती हैं. इससे एक बड़ा धक्का बुद्धिज़्म को भी लगता है, क्योंकि मुक्ति के दर्शन के रूप में वह किसी भी भूगोल में अपने को सीमित नहीं करता. वो उतना ही चीन के लिए भी वैलिड है जितना जापान के लिए है, जितना श्रीलंका के लिए है, जितना रोम के लिए है, जहाँ पर अभी कुछ ही सालों पहले बुद्ध की इतनी अच्छी मूर्ति पाई गई. उसके आचार्यों के जो आग्रह गांधार में हैं वही उत्तरी बंगाल के गौड़ देश में भी हैं.

तो वह धर्म की एक ऐसी बड़ी परिभाषा है, दर्शन जैसी परिभाषा है जो मनुष्य मात्र के लिए लागू होती है. किसी की नाक खड़ी है या चपटी, वह गोरा है काला, गोमाँस खाने या सुअर खाने को लेकर उसमें हिचक है या नहीं, पूरा शरीर ऊपर से नीचे तक ढक के रहता है या नंगा रहता है, खुद को राक्षस कहता है या देवता की संतान बताता है, चेहरे पे खड़िया पोते रहता है या काला रंग लगा के घूमता है, कुछ फर्क नहीं पड़ता. मनुष्य मात्र के लिए, हर किसी की मुक्ति के लिए वो फिलॉसफी थी. एक-दूसरे से लड़ते हुए छोटे राजाओं के कई सौ साल लंबे दौर ने समाज में न केवल उसका आकर्षण घटाया, बल्कि हर तरह की दार्शनिक चिंता और चिंतन के लिए जगह कम कर दी.

महेश- पर सवाल तो यह भी है कि लोगों के जीने और सोचने का तरीका बदल जाए, ऐसा बदलाव ऊपर से थोपा जा सकता है क्या?

चंद्रभूषण- बड़े साम्राज्यों का समाप्त होना, छोटे-छोटे महत्वाकांक्षी शासकों के बीच लड़ाइयों का कई-कई पीढ़ी लंबा दौर शुरू हो जाना जनता के स्तर पर क्या कोई मामूली बात है?

चार बड़े, सुसंस्कृत साम्राज्य सौ-डेढ़ सौ साल के अंदर खत्म हो गए. गुप्त, वाकाटक, पल्लव, और पुष्यभूति. कोई 500 ई. में गया, कोई 550 तो कोई 650 आते-आते. आगे चलकर चालुक्य वंश भी कई बार जाते-जाते बचा, वह भी इसलिए क्योंकि उसकी एक सीमा समुद्र से सुरक्षित थी. यह दौर खत्म होने के साथ छोटे राज्यों का दौर शुरू होता है.

महेश- इससे धर्म की संस्था भी कमजोर पड़ी होगी, कम से कम बौद्ध—

चंद्रभूषण- हाँ, दर्शन कमजोर पड़े, तंत्र और कर्मकांड मजबूत हुआ. जातियों के जोर से नियतिवाद की शक्ति बढ़ी.

महेश- ओके, ठीक बात.

चंद्रभूषण- साफ कर दूं कि दार्शनिक घराने कम नहीं हुए. उनकी तो उस दौर में भरमार दिखती है. लेकिन मान लीजिए, विदिशा के इर्द-गिर्द किसी सामंत ने अपनी स्वतंत्र रियासत खड़ी की तो नया-नया मुकुट पहनने के साथ ही वह अपनी कुलदेवी का भव्य मंदिर बनवाता है, अपने कुलगुरु या कुल-पुरोहित से देवी का एक महात्म्य लिखवाकर उन्हें सृष्टि की संचालिका सिद्ध करता है. फिर किसी के हमले में वह राजा गया और उसकी रियासत भी गई, लेकिन संस्कृत में लिखा हुआ वह देवी महात्म्य कहीं नहीं गया और देवी भी बगलेश्वरी या किसी और विचित्र नाम से हमारे बीच पड़ी रह गईं. ऐसे में कोटिश: देवी-देवता की गुंजाइश बनना स्वाभाविक ही है.

डीपी चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘लोकायत’ में ‘गणेश गीता’ का हवाला देते हुए कहा है कि गीता नाम से ही कई ग्रंथ उस दौर में आ गए थे. पुराणों का तो कहना ही क्या. और हर पुराण में आप पाएँगे कि कोई एक देवता ही पूरी सृष्टि को बनाए हुए है और वही इसको चला भी रहा है. स्वीप ऑफ़ फिलॉसफी जो है न कि आप संसार की निर्मिति और उसके संचालन का, जीवन-मृत्यु का, बंधन और मुक्ति का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण कारण खोजते हैं. जैसे सुकरात-प्लेटो-अरस्तू ने पकड़ा, भारत में बुद्ध ने कुछ फिलॉस्फाइज किया, वैदिक दर्शनों ने भी अपने-अपने प्रस्ताव रखे, चीन में यिन-यांग और क्या-क्या हुआ, वो स्वीप ऑफ़ फिलॉसफी आठवीं सदी से शुरू हुए मेडाइवल टाइम में पनाह माँग गया. छोटी रियासतें आपस में टकरा रही हैं, उनके ऊपर कोई सुपर बॉस नहीं है, उनकी कोई रूलिंग फिलॉसफी नहीं है, उनके सत्ता में आने या जाने का कोई पैटर्न नहीं है.

फिर सामंत की डेफिनेशन यह है कि ऐसा राजा जो किसी और राजा से पराजित हो गया हो या बिना लड़े ही उसके अधीन रहना स्वीकार कर लिया हो. बड़े साम्राज्यों के पतन के बाद ऐसे सामंतों की बन आई. बाद में उनमें कुछेक के राज्य तो बड़े हो गए लेकिन दर्शन और महाकाव्य जैसी चीजें उनके एजेंडे पर नहीं आईं. तो इस फेज़ में निरंतरता टूटती हुई सी लगती है. बहुलता अचानक बहुत सारी दिखती है लेकिन साथ रहकर खुश होने वाली नहीं,  काटने वाली, निचोड़ लेने वाली, खून बहा के मार देने वाली, इस तरह की बहुलता है, इस दौर में. मिसाल के तौर पर भवभूति के साथ ही यशोवर्मन के दरबार में मौजूद कवि वाक्पतिराज को लें. उनका बहुत प्रसिद्ध प्राकृत ग्रंथ है ‘गौड़वहो’, यानी गौड़ का वध. उत्तरी बंगाल का नाम तब गौड़देश था. कन्नौज के राजा ने गौड़ के राजा को लड़ाई में मार दिया, इस पर लिखा गया वीर रस का खूब सराहा गया ग्रंथ रामायण या बुद्धचरित की पांत में तो नहीं रखा जा सकता.

 

महेश- जी. अच्छा, आप बौद्ध धर्म पर इतना काम कर रहे हैं तो उसके विलोप पर, खास करके उसी में आप असंग, वसुबंधु, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति और अश्वघोष, इन सब से गुजर रहे हैं, इन सब के साहित्य से गुजर रहे हैं, इन सब की दृष्टि से गुजर रहे हैं, तो इससे गुजरते हुए आपकी दृष्टि क्या बनती है? आपसे बातचीत में एक बात आई थी कि कालिदास के यहाँ अश्वघोष का कोई जिक्र नहीं है. तो ऐसा क्या किसी पोलराइजेशन के चलते है? वह पोलराइजेशन क्या था? मतलब क्या पोलराइजेशन उस समय भी कोई था इस तरह का, बौद्ध-जैन वर्सेज हिंदू या कैसे पोलराइजेशन की आप बात कर रहे थे? यही तो वो गुप्त साम्राज्य का भी काल था जिसे हम स्वर्ण काल मानते हैं? तो क्या इस स्वर्ण काल को प्रश्नांकित कर रहे हैं आप सांस्कृतिक स्तर पर?

चंद्रभूषण- बुद्ध का जो दर्शन है, बुनियादी तौर पर उसके कुछ बिंदुओं से हम वाकिफ हैं. जैसे प्रतीत्यसमुत्पाद, मतलब हर चीज दूसरी चीजों से बनती है और एक क्रम में दूसरी चीजों को प्रभावित करती है और दूसरी चीजों से प्रभावित होती है.

महेश-  कॉज़ेशन.

चंद्रभूषण- हाँ, और एक क्रम में वो इतनी बदल जाती है कि हम कहते हैं कि भई अब ये तो रह ही नहीं गई, इट इज़ डेड, और अब ये दूसरी चीज उसकी जगह बन गई.

महेश- जी.

चंद्रभूषण- तो ये प्रतीत्य समुत्पाद का दर्शन है. दूसरी तरफ भारत का जो पारंपरिक दर्शन रहा है- वेदों में मौजूद अनेक दृष्टियों में से एक स्थायी हो जाने वाली दृष्टि- उसमें एक शाश्वत तत्व है. परम पुरुष, जो था, है, और रहेगा.

महेश- ब्रह्म.

चंद्रभूषण- हाँ, ब्रह्म ही. वो अविचल है. परम पुरुष है, बाद में ब्रह्म हो जाता है. ब्रह्मा-विष्णु-महेश हो जाता है, अवतार भी लेता है, लेकिन उसकी भूमिका नहीं बदलती. सबकुछ को स्थिर किए हुए वह खुद भी स्थिर रहता है.

महेश- स्थिर स्वरूप.

चंद्रभूषण- हाँ, सर्वव्यापी है, सर्वज्ञ है और भूत-भविष्य-वर्तमान जैसा उसके लिए कुछ नहीं है. शाश्वत है, कभी बदलता नहीं है. अब ये एक बुनियादी टकराव तो था. बुद्ध खुद पोलराइजेशन में यकीन भले न करते हों लेकिन उनकी फिलॉसफी पोलराइज़ करती थी. उनका चीजों को तोड़कर, खोलकर समझने का दृष्टिकोण जो है, वो पोलराइज़ करता था. कालिदास, माघ, भारवि, दंडी आदि संस्कृत के महान कवियों के यहाँ वाल्मीकि और व्यास का बार-बार ज़िक्र होता है, कहीं-कहीं भरत मुनि और भास के नाम भी मिल जाते हैं लेकिन अश्वघोष का कोई ज़िक्र एक बार भी क्यों नहीं आता. बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ में सिर्फ एक जगह शुरुआत में ही उनका नाम आता है. यह चीज किसी तरह के पोलराइजेशन की ओर तो इशारा करती है. या किसी के पास कोई और वजह हो तो बताए.

बहुत सारे लोग बुद्धिज्म को इस झंझट में लाना ही नहीं चाहते. वे इसको इस रूप में ले आते हैं कि भई जो मौर्य वंश का समापन है, वो एक तरह से भारत में बुद्धिज़्म का ख़त्म होना ही है. थेरवादी आस्थाओं वाले जो बहुत सारे देश और समाज हैं, वे तो मानते हैं कि बुद्धिज़्म भारत से अशोक का वंश डूबने के साथ ही चला गया. उसके बाद जो आया, महायान वगैरह, वह तो ब्राह्मनिकल फिलॉसफी ही है, बुद्ध का तो उसमें नाम भर है, ऐसा वे लोग कहते हैं.

महेश– महायान, वज्रयान वगैरह को बुद्धिज्म नहीं मानते?

चंद्रभूषण- बाद में यह पूछने पर कि मौर्यवंश के समापन के लगभग डेढ़ हजार साल बाद जिस बुद्धिज्म का भारत से विलोप हुआ, क्या उसको वे लोग बुद्धिज्म मानते ही नहीं, वो लोग कहते हैं कि भई चाहे जिस भी रूप में लेकिन बुद्ध का नाम तो वे लोग लेते रहे होंगे, तो जैसा भी था बुद्धिज़्म खत्म हुआ तो बुद्ध का नाम ख़त्म हुआ, हमको तो ये ख़राब लगता ही है, ऐसा कहते हैं थेरवादी लोग. आप ये कह सकते हैं कि मौर्य वंश की समाप्ति के बाद एक बड़ा झटका बुद्धिज़्म को लगा था लेकिन उससे जमीन पर बुद्धिज़्म खत्म हो गया हो, ऐसा तो नहीं कह सकते.

अब जैसे, ‘मिलिंदपञ्हो’ ग्रंथ को ही लें. जो भिक्षु नागसेन इसकी धुरी हैं वे कोई मौर्य वंश के प्रतिनिधि तो थे नहीं जो जाके मिलिंद यानी मिनांडर से बहस कर रहे थे. न ही उसकी राजधानी शाकल यानी सियालकोट के आसपास मौर्य वंश का शासन था. तो कोई अगर यह मान ले कि मौर्य वंश से ही बुद्धिज़्म पूरी तरह बँधा हुआ था, तो ऐसा नहीं है.

 

 

महेश- नहीं नहीं. तो आगे बढ़ते हैं अब.

आप जब रामायण का पुनर्पाठ कर रहे हैं और उसमें ‘यज्ञ के धुएँ में बुद्ध की गंध’ जैसी कोई बात कह रहे हैं, तो इसमें बुद्ध की फिलॉसफी के एसिमिलेशन जैसी बात है क्या? आपको लगता है कि भारतीय परंपरा में कई बार अपने सबसे बड़े वैचारिक प्रतिद्वंदी को खारिज करने के बजाय सांस्कृतिक स्तर पर उसे अपने अंदर समाने की प्रवृत्ति ज्यादा रही है, एसिमिलेट करने की? जैसे यह कहा जाता है कि शंकराचार्य प्रच्छन्न बौद्ध थे. यानी बुद्ध की फिलॉस्फी को उन्होंने अद्वैत की फिलॉसफी में कन्वर्ट कर लिया. तो क्या कहना है इस पर?

चंद्रभूषण- देखिए, जो मैं ‘बुद्धचरित’ को पहली बार हिंदी में उसके अट्ठाइसों सर्ग लेके आया, आधा हिस्सा उसका संस्कृत में उपलब्ध था और आधा हिस्सा चीनी से अंग्रेजी के जरिए आया हिंदी में, तो एक चीज तो मैंने यह ग़ौर की कि बुद्धिज़्म के भीतर बुद्धिज़्म वर्सेज नॉन-बुद्धिज़्म जैसा कोई पोलराइजेशन नहीं है. वो एक फिलॉस्फिकल डिबेट है और राम से जुड़े हुए अनेक प्रसंग बुद्धचरित में मौजूद हैं. जो बुद्ध का एक मित्र है, कपिलवस्तु के प्रधानमंत्री का पुत्र, वह उनको भोग-विलास की तरफ ले जाना चाहता है. वह कहता है कि राम की बहन शांता ऋष्यशृंग को उठाकर जंगल में ले गई जब ऋष्यशृंग दुनियादारी के बारे में कुछ भी नहीं जानता था. तो जो भोग-विलास है, जो यौन कर्म है, वो जीवन का आधार है, इसको छोड़कर सृष्टि की कल्पना कहाँ की जा सकती है. और विश्वामित्र घृताची (मेनका) के पीछे चल पड़े,  वगैरह अनेक ऐसे उदाहरण वो देता है जो सारे वैदिक, या फिर महाकाव्यात्मक किस्सों में आते हैं. तो बुद्धचरित में ऐसी कहीं कोई बात नहीं है कि बुद्ध किसी को हल्के में खारिज कर रहे हों.

वो फिलॉस्फिकल आधार पर एक नई प्रस्थापना जीवन को लेकर देते हैं और जो दृष्टि उस समय की है कि बचपन और किशोरावस्था में शिक्षा, जवानी में अर्थ और काम, बुढ़ापे में मोक्ष, उसको खारिज करते हैं. वो कहते हैं कि जीवन ऐसे नहीं चलता. पचीस साल की उम्र में किसी की मृत्यु हो जाए तो वह अपनी मुक्ति की चिंता करने के लिए पचहत्तर का होने का इंतजार कैसे करेगा? कब कौन मर जाएगा, कौन चला जाएगा, कौन अलग हो जाएगा, यह तो कोई नहीं जानता, यानी यह दृष्टि तो कृत्रिम दृष्टि है. जब भी आपकी समझ ऐसी बन जाए, और आप सांसारिक बंधनों से मुक्ति की तरफ बढ़ सकें तो उम्र का ख्याल किए बग़ैर आपको इस तरफ बढ़ जाना चाहिए.

जो रामायण पर मेरा जितना काम है, उसके आधार पर मुझे ऐसा लगता है कि एक मौखिक ग्रंथ के रूप में यह- जैसे स्मृति काव्य परंपरा भारत में थी, जिस तरह से वेदों-उपनिषदों को याद रखने की परंपरा थी- उसी तरह से रामायण को भी एक मौखिक काव्य ग्रंथ के रूप में याद रखने और शाम के मज़मों में सुनाने की परंपरा किसी समय चल पड़ी. मूलतः वह एक मौखिक ग्रंथ था और लिखित रूप से इतर भी ऐसा बना रह गया. आज भी रामलीलाओं के जरिए लोग रामकथा को ज्यादा जानते हैं. ग्यारहवीं-बारहवीं सदी ईसवी में अद्दहमाण (अब्दुल रहमान) अपने संदेशरासक में इसका जिक्र कहते हैं. फिर चौदहवीं सदी में मुल्ला दाऊद के ‘चंदायन’ में भी ‘बरुआ राम रमायन कहहीं‘ ऐसी एक पंक्ति आती है, कि मतलब वटु लोग आकर राम-रमायन की कथा कह रहे हैं.

महेश- वह साइड की चीज़ बनी रही?

चंद्रभूषण- हाँ, अब्दुल रहमान सिंध के आदमी हैं और वे राम की क़िस्सागोई बता रहे हैं. तो रामायण एक मौखिक ग्रंथ था जिसको बीच में किसी समय लिखित रूप दिया गया. निश्चित रूप से यह एक स्टेट स्पॉन्सर्ड काम था. इसके लिए किसी को सारे काम-धंधे छोड़कर एकाध साल बैठना पड़ता था. भोजपत्र या ताड़पत्र जुटाकर पक्की लिखाई करने में कुछ धन भी लगता था. सबसे बड़ी बात यह कि अंत में गांठ बांधकर बनाई गई पोथी (ग्रंथ का शाब्दिक अर्थ) पक्की है, इसका प्रतिपादन राजकीय स्तर पर होना जरूरी था. यह कितना टेढ़ा काम था, यह जानने के लिए आपको लेखन का इतिहास पलटना होगा. मसलन, दक्षिण भारत की पोथियों के बारे में हम जानते हैं कि सूखे ताड़ के पत्ते की एक ख़ास प्रॉसेसिंग के बाद उसपर लोहे की कलम से खुरच कर लिखा जाता था. फिर उस पर कालिख पोत दी जाती थी, जो सुखाकर झाड़ देने के बाद खुरचे हुए अक्षरों में भरी रह जाती थी. अभी सौ साल पुरानी किताबें भी कम मिलती हैं लेकिन उस तकनीक से लिखी गई कुछ क़िताबें हजार साल से भी ज्यादा समय तक बची रहीं.

महेश- बिल्कुल.

चंद्रभूषण- महाभारत के लेखन के बारे में भी बात आती है कि व्यास बोलते हैं सिर्फ. लिखने का काम गणेश का है. वाल्मीकि के भी लिखने का जिक्र कहीं नहीं आता. वे श्लोक बोलते हैं और लोग उनका अभ्यास करके याद रखते हैं. मौखिक रचना का नमूना हैं भारत के ये दोनों महाकाव्य. ऐसा ही त्रिपिटक के साथ भी है, जो अशोक के समय में लिपिबद्ध किए जाने से पहले, यानी डेढ़-दो सौ साल केवल भिक्षुओं की स्मृति में सुरक्षित था. रामायण पर वापस लौटें तो मेरी समझ यही बनती है कि स्मृति काव्य के रूप में वह बुद्ध से थोड़ा पहले का है, लेकिन उसका लिखित रूप बुद्ध के बाद का है. रामायण में दो-तीन प्रसंग भी ऐसे आते हैं, जिन्हें पढ़कर आपको उसका न केवल बुद्ध के बाद बल्कि अश्वघोष द्वारा बुद्धचरित लिख लिए जाने के बाद ही लिखा जाना तय लगता है.

महेश- ऐसा कोई प्रसंग याद आ रहा है?”

चंद्रभूषण- एक तो अयोध्याकाण्ड में ही वह श्लोक आता है जिसमें एक प्रसंग में राम, जाबालि को डाँटते हुए तथागत बुद्ध को चोर कहते हैं. प्रसंग तब का है जब राम वन-गमन हो चुका है. भरत उनको वापसी के लिए मनाने गए हैं, उनके साथ बहुत सारे ऋषि-मुनि भी गए हैं, जिसमें जाबालि भी शामिल हैं. जाबालि की जो स्थिति है, लोकायत दर्शन के चिंतक जैसी है. उनके तर्क भौतिकतावादी हैं. मरा हुआ व्यक्ति स्वर्ग गया, नरक गया या कहीं नहीं गया, यह तो आजतक किसी ने नहीं देखा. किसी ने अच्छे कर्म किए या बुरे कर्म किए, मृत्यु के बाद उसे इसका क्या प्रभाव भुगतना पड़ा, यह सिर्फ अनुमान है. इसलिए राजा दशरथ की मृत्यु हो चुकी है. उनको जो कहना-सुनना था, उन्होंने कह दिया, और उसकी जो परिणतियां होनी थीं वे उनके साथ गईं. अब आप अयोध्या चलिए. भरत भी आपको मनाने आए हैं. सारी स्थितियाँ अनुकूल हैं. चलकर राज करें, अपने कर्तव्य का पालन करें. पिता क्या कहकर गए, वह सब छोड़िए. पत्नी और भाई के साथ चौदह साल आप वन में रहें, शेर खा जाए, यह तो मूर्खता है.

जवाब में राम, जाबालि को बुरी तरह डाँटते हैं.

निन्दाम्यहं कर्म पितुः कृतं तद् यः त्वाम् अगृह्णात् विषमस्थबुद्धिम् |
बुद्ध्यानयैवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् || 2-109-33
यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धः तथागतं नास्तिकमत्र विध्हि |
तस्माद्धि यः शङ्क्यतमः प्रजानाम्, न नास्तिकेनाभिमुखो बुधः स्यात् || 2-109-34

‘तुम्हारे जैसे विषम बुद्धि वाले, अपनी स्पष्ट नास्तिक बुद्धि का उपयोग करके लोगों को धर्ममार्ग से हटाने वाले व्यक्ति को अपने साथ रखने के लिए मैं पिता की निंदा करता हूँ. बुद्ध तथागत और नास्तिकों का विधान वैसा ही है जैसा किसी चोर का होता है. इसलिए मैं प्रजाजनों को सजग करता हूँ कि समझदार लोग इनके सामने ही न पड़ें.’ 

 

महेश- राम की ऐसी प्रतिक्रिया का कारण क्या है?

चंद्रभूषण- राम का कहना है कि इस भौतिकवादी तर्क का अनुसरण करेंगे तो राज्य चल ही नहीं सकेगा.

महेश- धर्म का लोप हो जाएगा?

चंद्रभूषण- यह कि राज्य तो हमेशा संकल्प और वचन की शक्ति पर ही चलता है. अगर मैं पिता से किया हुआ वादा नहीं निभा सकता, दिवंगत पिता के आदेश की अवहेलना कर जाता हूँ, तो मेरी कही हुई बात कोई क्यों मानेगा?

महेश- क्या बात है!

चंद्रभूषण- तो जाबालि को डाँटने के क्रम में राम तथागत और बुद्ध का नाम लेते हैं. इसका कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि जाबालि की सलाह में बुद्ध का कोई ज़िक्र नहीं है और बहुत रोकने के बाद भी स्वयं राज्य छोड़ देने वाले बुद्ध की मान्यता राम को राजपाट में वापस लाने की तो हो ही नहीं सकती थी. लेकिन विचार को एक तरफ रख दें और रामायण को बुद्ध के अस्तित्व में आने से पहले लिखा हुआ ग्रंथ मानकर चलें तो इस ज़िक्र की जगह कहाँ बनती है?

 

 

महेश- आगे बढ़ते हैं.

इस बीच एक बात सुनने में आई. मतलब आलोचना में बार-बार नज़र आई. उसे गंभीर आलोचना तो मैं नहीं मानता, लेकिन बहुत सारे लोग उसे इस्तेमाल करते हैं कि ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ जैसी कोई चीज़ नहीं है.

मैंने अमीर खुसरो का थोड़ा-सा काम देखा है. बहुत गहराई से नहीं कह सकता कि देखा, पर उनका काव्य देखा. तो जो 12 वीं- 13वीं शताब्दी का भारत था, ऐसा लगता है कि वहाँ इस्लाम और भारतीय आस्था-परंपराओं का मिलन हो रहा है. संघर्ष भी हो ही रहा होगा. लेकिन आज की बहसें अक्सर इसे केवल संघर्ष की तरह पढ़ती हैं कि आकर डॉमिनेट कर लिया.

आपको क्या लगता है कि उस समय के भारत में एक सभ्यतागत पुनर्संयोजन भी चल रहा था, न कि केवल संघर्ष, जिसके प्रभाव आज भी हम अपनी भाषा, आस्था और सामाजिक संकल्पना में देखते हैं. गंगा-जमुनी तहज़ीब जैसी कोई चीज़ क्या उसी समय आकार ले रही थी? या इसे बस ख़्याली पुलाव और भारतीय आज़ादी के आंदोलन का कृत्रिम प्रोजेक्ट मानकर छोड़ दिया जाए?

चंद्रभूषण- 1270 ई. के आसपास भगत नामदेव का जन्म है. संत ज्ञानेश्वर से वे थोड़े बड़े हैं, मतलब उनकी मैच्योर उम्र भी 1300 के आस-पास हो गई होगी. उनका एक बहुत महत्वपूर्ण पद है-

‘आउ कलंदर केसवा, धरि अबदाली भेसवा.’

कुमार गंधर्व ने इसे गाया है और सवा चार सौ साल पहले इसे गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित किया गया था.

महेश: इसका अर्थ स्पष्ट करें.

चंद्रभूषण- ‘हे केशव! तुम कलंदर बनकर आओ, अब्दाली के वेश में आओ.’ कलंदर शब्द सूफी मुर्शिदों (गुरुओं) के लिए आता रहा है और अब्दाली फकीर को बोलते हैं.

महेश- अच्छा! ‘अब्दाली’ सुनकर [हँसते हुए]… वह तो बहुत बाद की बात लगती है.

चंद्रभूषण- हाँ , अहमद शाह अब्दाली तो नामदेव भगत के पांच सौ साल बाद की चीज है… हो सकता है उसके नाम में ‘अब्दाली’ वैसे ही आया हो, जैसे बहुत सारे लोगों के नाम में दास या ‘फकीर’ आता है.

महेश: हाँ, अब्दाली कहीं पुराना शब्द रहा होगा.

चंद्रभूषण- फकीर नाम वाले कुछ मर्डरर भी हुए ही होंगे [हँसते हुए]. लेकिन ‘अब्दाली’ कोई व्यक्ति-नाम नहीं, एक शब्द के रूप में उस दौर में था.

महेश- और यह 13वीं शताब्दी है?

चंद्रभूषण- जी, 13वीं शताब्दी है- ‘आउ कलंदर केसवा, धरि अबदाली भेसवा.’

महेश: तो यहाँ तो वही दिख रहा है कि आस्थाओं का मिलन हो रहा है.

चंद्रभूषण- फिर उसमें आता है कि

‘जिनि आकास कुलह सिरि कीनी कउसै सपत पयाला, चमर पोस का मंदरु तेरा इह बिधि बने गुपाला’.

अब, कुलह क्या है? नमाज़ पढ़ने वाली टोपी को कुलही बोलते हैं. लेकिन जिन केसवा या गोपाल को फकीरों के भेस में बुलाया जा रहा है, उनकी कुलही आकाश की है और पैरों में उन्होंने पाताल की चप्पल पहन रखी है. और वे रहते कहाँ हैं? चमड़े की पोशाक वालों (मनुष्यों) के शरीर को ही मंदिर बनाकर वे रहते हैं.

महेश- अच्छा (विस्मय से)!

चंद्रभूषण– ‘आकाश की कुलही पहन के आओ, पाताल की पनही डाल के आओ’ और ‘बीबी कउला सन काइनु तेरा, निरंकार आकारै’ यानी आकार तो तुम्हारा निरंकार है लेकिन तुम्हारा निकाह बीबी कमला (लक्ष्मी देवी) के साथ हुआ है. मतलब केशव के एक ऐसे कॉस्मिक रूप की वंदना नामदेव कर रहे हैं, जो मुसलमान फकीर जैसा दिखता है.

महेश- जी.

चंद्रभूषण– तो बड़ा दिमाग हुआ ना? बड़ा मन हुआ. जो लोग लड़ रहे होंगे, वे लड़ रहे होंगे…

महेश: स्वीकार का भाव भी साथ में चल रहा है.

चंद्रभूषण- रूप कोई भी हो, साधक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, न ही पूज्य को कोई फर्क पड़ने वाला है कि वह नमाजी टोपी डाल के आए या काली कमली ओढ़कर आए या पीतांबर धारण करके, मोर मुकुट पहनकर आए. उसका कपड़ा-लत्ता देखकर ही उसे पूजा जाएगा- ऐसा नहीं है.

महेश- ऐसा तो नहीं कि यह डर का प्रभाव रहा हो?

चंद्रभूषण- डर का तो कोई तत्त्व नामदेव में नहीं है. बहुत निर्भय क़िस्म का जीव है. घूमते रहने वाला जीव. एकमात्र ऐसा कवि है जिसे आप मराठी भी कह सकते हैं, हिंदी भी और पंजाबी भी. गुरु ग्रंथ साहिब में नामदेव भगत का बहुत ऊँचा स्थान है. और वह ठेठ पंढरपुर से आ रहा है. महाराष्ट्र के दक्षिणी छोर से [हँसते हुए]. और उनसे भी कम-से-कम सौ साल पहले सदन कसाई हुए हैं. सदन कसाई, जिनके नाम पर हरियाणा में मस्जिद है, अभी भी.

महेश- अच्छा!

चंद्रभूषण- और जितने भी वैष्णव भजन आप सुनते हैं- “सदना तरा कसाई”– यह आपने अपने गाँव में भी दादी से सुना होगा- क्या…’गीध, अजामिल, गणिका तरिगे, सदना तरा कसाई.’

महेश- जी.

चंद्रभूषण- सदन का समय नामदेव से भी सौ साल पुराना है. और उनका इलाका पंजाब और सिंध के मेल वाला क्षेत्र है. मुल्तान के रहने वाले थे.

और उनसे भी सौ साल पहले अब्दुल रहमान हैं. ‘संदेशरासक’ उनकी किताब है.

महेश- हम्म.

चंद्रभूषण- पूरी किताब पढ़ जाइए, इस्लाम का तो उसमें ‘इ’ तक नहीं है. बल्कि कापालिकों का ज़िक्र उसमें बड़ी इज्जत के साथ, उन्हें चरम विरह का प्रतीक बनाते हुए आता है- ‘कावालिनि किय कावालिय तुय विरहेण.’ हे कापालिक! तेरे विरह ने मुझे कापालिनी बना दिया. अगर यह सब किसी भय के कारण लिखा जा रहा होता तो मुसलमान कवि हिंदू प्रतीकों में क्यों लिखते? सदन कसाई क्यों लिखते–

‘मैंहो करमी तुम मेटना औगुन सब मेरा
कूरा कपटी रामजी सधना जन तेरा…’
?

महेश-  ठीक बात.

चंद्रभूषण- और बाद में भी… खैर, केशव को कुलही तो सिर्फ नामदेव ने पहनाई है, लेकिन कोई समय ऐसा नहीं है जब मुसलमान कवियों ने हिंदू आस्था के क़रीब जाकर न लिखा हो. अब्दुल रहमान से लेकर रसखान तक, बाद में नज़ीर भी इस सूची में दम-ख़म से शामिल हैं, लगातार मिलते हैं ऐसे उदाहरण. ऐसा नहीं कि कभी एक-दो लोगों का मन किया और उन्होंने लिख दिया. यह एक सतत धारा है.

तो जो आप कह रहे थे गंगा-जमुनी… गंगा-जमुना का इलाका तो बहुत छोटा इलाका हुआ. कितना? मान लीजिए दिल्ली से प्रयाग तक.

महेश– प्रयाग.

चंद्रभूषण– हाँ, दिल्ली से प्रयाग तक. मुल्तान या सिंध में थोड़े ही न गंगा-जमुना बहती है [हँसते हुए]. तो ज़मीन पर, जनता के स्तर पर आस्थाओं का मिलना एक पहलू है. दूसरा पहलू भारतीय संस्कृति की अपनी दो धाराओं का है, जिनमें भयानक टकराव है. संपूर्ण नकार का भाव दोनों ही पहलुओं पर दिख रहा है. आप देखिए कि बौद्ध स्थलों पर कब्ज़े हुए, बुद्ध और बोधिसत्त्वों की मूर्तियों को विकृत करके शिव और विष्णु ही नहीं, साड़ी पहनाकर देवियों की मूर्तियाँ बना दी गईं. शक्ल बदल दी गई, नाक रेत दी गई और कहा गया कि ये डीह बाबा हैं या तेलिया बाबा हैं. बौद्ध धारा के ग्रंथों की तो बात ही क्या कहें, धर्मग्रंथ छोड़िए, साहित्य, व्याकरण और तंत्र तक के ग्रंथ अब सिर्फ तिब्बती और चीनी अनुवादों में बचे हुए हैं. यह सब मुसलमानों का तो किया हुआ नहीं है, हमारी ही करतूत है.

 

महेश- लेकिन क्या इसे कल्चरल एडॉप्टेशन नहीं कह सकते? इसे हिंसा के रूप में क्यों देखना? अपनी पसंद का देवता बनाने की कोशिश के रूप में क्यों नहीं?

चंद्रभूषण- कई तरह की चीज़ें हो सकती हैं. मैं इससे इंकार नहीं कर रहा. लेकिन निश्चित रूप से वैदिक और अवैदिक परंपराओं के बीच, गृहस्थ और गृहत्यागी आस्थाओं के बीच टकराव दिखाई देते हैं. उनके काव्य-प्रमाण भी मौजूद हैं. इसमें एक बात को जोर देकर कहना जरूरी है कि गृहस्थ धारा के साथ जाति भी गहराई से जुड़ी हुई है.

महेश- हम्म, गृहस्थ के साथ बहुत सारे राइडर्स हैं.

चंद्रभूषण: किसका छुआ खाना है, किसका छुआ नहीं खाना. घर में कोई कहाँ तक आ सकता है. कोई सिर्फ दालान तक, कोई आंगन तक, कोई चौका भी छू सकता है लेकिन चूल्हा नहीं. लेकिन एक भिक्षु के लिए, चाहे वह बौद्ध हो या कापालिक या नाथपंथी, छूत-अछूत का तो कोई सवाल नहीं हो सकता. बाद में नाथपंथी इससे हट गए लेकिन शुरू में उनके यहाँ भी ऐसा ही था कि खाने को जो मिल जाएगा, जहाँ से मिल जाएगा, उसे खा लेना है.

महेश- हाँ.

चंद्रभूषण- असल बात यह कि गृहस्थ के साथ जो सोशल हायरार्की है, जो जन्म आधारित हायरार्की है, वह जुड़ जाती है. बच्चा पैदा होते ही उसकी हायरार्की तय हो जाती है. दुनिया में हर जगह हायरार्की है, लेकिन भारत में जन्म के साथ ही जीवन भर के लिए तय हो जाने वाली हायरार्की एक अलग ही चीज है.

महेश- यह तो है.

चंद्रभूषण- पड़ोस के अफगानिस्तान में यह नहीं बनी. गांधार बहुत बाद तक भारत का अभिन्न अंग रहा लेकिन वहाँ भी नहीं बनी. पंजाब में बनी, अभी के बांग्लादेश में खूब फली-फूली लेकिन बर्मा में नहीं बनी. नेपाल में खूब दिखती है, लेकिन बनी तो आधी-अधूरी ही. तो यहाँ अलगाव का फिलॉस्फिकल कॉन्सेप्ट एक फिजिकल एँटिटी बन जाता है. इसीलिए भारत में गृहस्थ होना उतना जेंटिल नहीं है. गृहस्थ और गृहत्याग का विभाजन यहाँ सिर्फ घर में रहने और घर छोड़ देने तक सीमित नहीं है. यह बहुत पेचीदा है. बौद्धों के खिलाफ, कापालिकों के खिलाफ, नाथपंथियों के खिलाफ- इनके अलावा और भी जो छिटपुट गृहत्यागी धाराएँ थीं, सभी के खिलाफ यह शत्रुता का भाव दिखता है. यहाँ तक कि रामचंद्र शुक्ल जब हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते हैं, तो नाथपंथियों को अनपढ़ बताते हुए उनके लिए लगभग अपशब्द इस्तेमाल करते हैं. अभी सौ साल भी नहीं हुए उनकी मशहूर किताब को आए हुए.

महेश- जी.

चंद्रभूषण- 1929 में ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ आई थी. अभी 2026 ही हो रहा है. ज़्यादा समय नहीं हुआ.

महेश- 100 साल भी नहीं…

चंद्रभूषण- मतलब यह है कि भारत में गृहस्थ होना दुनिया के बाकी गृहस्थों से काफी अलग है. यहाँ इसके साथ बहुत सारे बंधन जुड़े हैं और एक बहिष्कारवादी दृष्टि बिना चाहे इससे नत्थी चली आती है. मैंने ज़मीन पर इसे देखा है. कथित ऊंची जातियों को एक तरफ कर दें, दलित समाज की दो जातियों से आने वाले लड़के और लड़की की शादी भी आप नहीं करा सकते. बिरादरियों में इसका विरोध एक को दूसरे से नीचा बताते हुए किया जाता है.

महेश- रिस्ट्रिक्शंस. जी.

अभी आप नाथ पंथ की बात कर रहे थे. नाथ, सिद्ध और बाद की भक्ति परंपराओं को पढ़ते हुए लगता है कि बुद्ध का प्रत्यक्ष लोप भले हो गया, लेकिन उनकी लोकतांत्रिक और प्रतिरोधी ऊर्जाएँ दूसरी धाराओं में चली गईं.

क्या यह मानना ठीक है?

चंद्रभूषण: भारत में एक धारा हमेशा जन्म-आधारित बंटवारे को ख़ारिज करती रही. शुरू में केवल बुद्ध को मानने वालों ने ऐसा किया. बाद में कापालिकों ने नहीं माना, नाथों ने नहीं माना, कर्नाटक की वीरशैव परंपरा ने नहीं माना.

महेश: हम्म, बसवन्ना.

चंद्रभूषण: जी. और एक समय ऐसा आया कि ऐसी धाराओं के लिए सर्वाइव करना मुश्किल हो गया. उनके सामने दो ही विकल्प बचे. या तो वे शंकराचार्य की स्मार्त परंपरा वाले हिंदू बनें, शैव शाक्त वैष्णव पूजा पद्धति अपनाएँ और किसी जाति में- भरसक नीची जाति में- अपने लिए जगह बनाएँ. इसपर राजी न हों तो मुसलमान बन जाएँ. यह दबाव सबसे ज्यादा नाथपंथियों ने झेला. पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल में उनकी बड़ी तादाद सीधे इस्लाम में गई.

महेश- राजसत्ता का नहीं, सामाजिक दबाव?

चंद्रभूषण- जी. बौद्धों के धर्मस्थलों पर कब्ज़ा कर लिया गया था, उनका जीवन नारकीय हो चला था, लेकिन तेरहवीं सदी आते-आते बाकी गृहत्यागी आस्थाओं वाले लोग भी कई इलाकों में अंडरग्राउंड ज़िंदगी जीने लगे थे.

महेश- नाथ, सिद्ध, कापालिक वगैरह?

चंद्रभूषण- जी. नाथों का प्रभाव अफ़ग़ानिस्तान तक था. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी की ‘नाथ संप्रदाय’ में मिलता है कि बहुत बड़ी संख्या में मुसलमान भी नाथपंथी थे, ‘अलख-अलख’, ‘गोरख-गोरख’ कहते घूमते थे. आज भी सिंध में ऐसे लोग हैं. दूर क्या जाएँ, गोरखपुर में मुसलमान नाथपंथी जोगियों के कई गांव हैं. हाल तक वे सारंगी बजाकर गांव-गांव राजा भरथरी के गीत गाते थे. इधर उनपर हमले होने लगे तो उन्होंने फेरा डालना छोड़ना दिया.

तो मान लीजिए, गांधार का कोई नाथपंथी गाय को भी बाकी जानवरों जैसा ही मानता है. ‘इधर रहो या उधर, बीच के होकर नहीं रह पाओगे’ की मजबूरी सामने रख देने पर वह हिंदू धर्म में फिट नहीं हो सकता था. सिर्फ सम्मान का सवाल नहीं था. उसके संस्कार, आदतें, जीवन-शैली- बहुत कुछ उसे अनफ़िट बना देता था.

 

महेश- एक बड़ा अच्छा सवाल सूझा है. क्या भारत में संन्यासी, योगी, भिक्षु परंपराओं की इतनी अधिकता की वजह यह भी हो सकती है कि गृहस्थ जीवन बहुत दबावकारी था? संन्यास लेने पर आदमी अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र हो जाता था?

चंद्रभूषण- है न. इसका सबसे बड़ा प्रमाण ‘थेरीगाथा’ है.

महेश- मतलब आप मानते हैं इस बात को?

चंद्रभूषण- जी. थेरीगाथा बहुत पुरानी बौद्ध रचना है. कविता संकलन कह लें. जैसे थेरीगाथा है वैसी ही थेरगाथा भी रही है. लेकिन थेरगाथा में भिक्षु अपनी साधना और आध्यात्मिक अनुभव लिखते हैं. जबकि थेरीगाथा में भिक्षुणियों का गृहस्थ जीवन से मोहभंग बहुत ठोस और भौतिक सवालों से जुड़ा है. वह पूरी तरह मुक्ति का गीत है.

महेश- अच्छा.

चंद्रभूषण: “छूटी मैं दिन-रात की चक्की से, रातों को जागने से, जीवन भर आकाश न देख पाने से…” यह जो भाव है- “मैं पनिया भरन से छूटी”- यह वहीं से आता है. हालांकि बाद में सूफी परंपरा में जाकर उसका रूप बदल जाता है. वहाँ स्त्री की आवाज में पुरुष ही इसे गाने लगते हैं. लेकिन शुरुआत में थेरीगाथा स्त्रियों की महिमामंडित दासता से मुक्ति का गीत है.

महेश- जी.

चंद्रभूषण- आपको आश्चर्य होगा कि भवभूति के दोनों राम संबंधी नाटकों में सीता लगातार प्राकृत में बोलती हैं.

महेश- हम्म… सीता को भी संस्कारित नहीं किया गया?

चंद्रभूषण- जी. सारथी संस्कृत में बोलता है, सूत संस्कृत में बोलता है, लेकिन सीता प्राकृत में बोलती हैं.

महेश- इसका आशय?

चंद्रभूषण- गृहस्थ स्त्री संस्कृत नहीं जान सकती- यह भाव है.

महेश- भवभूति का समय?

चंद्रभूषण- लगभग 700 से 730 ईसवी के बीच का उनका लेखन माना जाता है. ‘महावीरचरित’ और ‘उत्तररामचरित’ में सीता, कौशल्या, मंदोदरी, शूर्पणखा– सारी स्त्रियाँ प्राकृत में बोलती हैं. कुछ स्त्री चरित्र भी संस्कृत बोलते हैं, जैसे अरुंधति (वशिष्ठ की पत्नी) और वनदेवी वासंती, लेकिन उनका स्वरूप देवियों जैसा है. जबकि सूत लगातार संस्कृत बोलता है, क्योंकि उसे राजाओं से संवाद करना है.

महेश- हम्म. कोई विशेष सूत रहे होंगे…

चंद्रभूषण- जिन सूतों की कहानियाँ मिलती हैं, वे प्रायः राजाओं के रथ हाँकने वाले हैं. इसीलिए वे कथा के पात्र बनते हैं. ‘महावीरचरित’ में शुरू में ही जनक के भाई कुशध्वज आते हैं. जनक वहाँ उपाधि है. सीरध्वज जनक सीता के पिता हैं. जनक मिथिला के राजा की उपाधि है. कुशध्वज जनक संकास्य के राजा हैं, जहाँ से बुद्ध स्वर्ग गए और स्वर्ग से वापस आकर जहाँ उतरे. ऐसा ज़िक्र बुद्धचरित में आता है, त्रिपिटक में भी है.

महेश- इसका तो ईसाई धर्म की मान्यता से साम्य है- जाना और फिर वापस आना.

चंद्रभूषण- हाँ. लोग कहते हैं कि ईसाई धर्म की बहुत सारी चीज़ें सीधे-सीधे बौद्ध धर्म से उठाई गई हैं.

महेश- कॉन्सेप्चुअल लेवल पर?

चंद्रभूषण- बुद्धचरित में भी हमने यह देखा है. उसका चीनी अनुवाद अंग्रेजी में गया. वहाँ ईसाइयत की बहुत सारी चीज़ें बुद्ध से मिलती-जुलती हैं. बुद्ध के जो शिष्य होते हैं, श्रावस्ती के बड़े सेठ अनाथपिंडक, ईसा के एक अमीर शिष्य नथानिएल भी हूबहू वैसे ही हैं.

महेश- पैरलल हैं कथानक में?

चंद्रभूषण: पहले यूरोपियन धर्म-प्रचारकों को लगा कि चीनी बौद्ध धर्म में सब कुछ ईसाई धर्म से उठा लिया गया है. लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि ये ग्रंथ तो भारतीय बौद्ध ग्रंथों के अनूदित रूप हैं, जो ईसाइयत से बहुत पुराने हैं.

 

महेश- भारत में गृहस्थ जीवन के दबावों और गृहत्याग के आकर्षण पर वापस लौटा जाए.

चंद्रभूषण- स्त्रियों की मुक्ति की जो गाथा है, उसमें यह साफ दिखता है. सबसे ज़्यादा बंधन तो स्त्रियों के ही हिस्से आते हैं और जो श्रम-प्रधान, संख्यात्मक रूप से काफी बड़ी जातियाँ हैं, उनके गले पड़ते हैं. बाकी लोगों के गले भी ये पड़ते हैं, ऐसा नहीं कि वे बच जाते हैं. तो हुआ यह कि धर्म के भीतर संसार से नहीं, सांसारिक मुक्ति की भी एक बहुत बड़ी गुंजाइश पैदा हुई. बौद्ध दार्शनिक और बुद्धिस्ट इंटेलेक्चुअल्स आपको कई क्षत्रिय मिलेंगे, कई वैश्य मिलेंगे, कुछ शूद्र मिलेंगे, और कई ऐसे भी मिलेंगे जिन्हें वर्णसंकर कहा जा सकता है- वह शब्द, जो गीता में ठंडे भय की तरह आता है- “जायते वर्णसंकरः…”. ठहरकर देखें तो नालंदा महाविहार के दोनों शुरुआती कुलपति, दार्शनिक असंग और वसुबंधु, दोनों ही वर्णसंकर हैं. ब्राह्मण माता और क्षत्रिय पिता की संतान. लेकिन इस धर्म में मनुष्य इकाई है, उसका जन्म उसकी पहचान नहीं है. किसी के जन्म से ही उसको पापकर्मी या नीच मान लिया जाना, वर्णसंकर या कमतर मनुष्य मानना बुद्ध के दर्शन में भरोसा रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए सिरे से एक फालतू बात है.

महेश- जी.

चंद्रभूषण- जो भी इससे बाहर झाँकना चाहता था- जाति के दायरे से बाहर- उसे अपने लिए एक दूसरी संभावना दिखाई देती थी. और यह बहुत समय तक दिखती रही. अकबर के समय टोडरमल हैं. बंगाल की जिस लड़ाई में अकबर का एक बहुत मशहूर मुगल सिपहसालार मोर्चे को असंभव जानकर मुंगेर से ही भाग आया, टोडरमल उसे फतह करके ही लौटे. भारत के पारंपरिक सामाजिक नज़रिये में तो वैश्य पृष्ठभूमि के चलते शायद उन्हें तलवार बांधने लायक ही न समझा जाता. पदों और पेशों का जन्म से संबंध अकबर ने तोड़ दिया तो गुप्तकाल के बाद जैसे थोड़े समय के लिए एक दूसरा स्वर्णकाल भारत में लौट आया.

 

महेश- क्या आप यह कह रहे हैं कि सामाजिक बंधन तोड़ने से अधिक समग्र विकास और प्रगति संभव होती है? मसलन, जातीय ढाँचा खत्म करने से जो एनर्जी होगी, वह वृहत्तर भलाई लेकर आएगी?

चंद्रभूषण- हाँ. तो एक बुनियादी डिकॉटमी हिंदू-मुस्लिम के भीतर दिखाई देती है. लेकिन जैसा मैंने कहा, यह डिकॉटमी पूरी नहीं है. एक स्तर पर लोगों का संश्लेषण का प्रयास भी चलता रहा. (रुककर) और एक-से-एक महान और प्रशंसित काम हुए हैं, जिन्हें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ने किया है. दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति को एकीकृत और एकाश्मी संस्कृति के रूप में देखना गलत है. यहाँ भी कई सांस्कृतिक धाराएँ हैं.

महेश- दो नहीं, कई हैं.

चंद्रभूषण- ऐट लीस्ट दो तो हैं. एक में जन्म के आधार पर मनुष्य की नियति तय है, और एक में जन्म के आधार पर मनुष्य की नियति तय नहीं है. इनमें एक धारा- जब उसके पास कोई चारा नहीं बचता- तो वह हिंदू या मुसलमान में समाहित हो जाती है और दुर्भाग्यवश खुद को विस्मृत कर देती है. हजारीप्रसाद द्विवेदी एकमात्र ऐसे बौद्धिक हैं जिन्होंने इसे स्पष्ट रूप से रेखांकित किया. वे साफ-साफ कहते हैं कि ‘नाथ-संप्रदाय’ में  आधे मुस्लिम और आधे हिंदू हैं. तो यह डिकॉटमी दोनों चीज़ों की उपेक्षा करती है- संश्लेषण की भी, और आंतरिक विभाजन की भी. हमारे साहित्य और संस्कृति को बारीकी से देखने पर ये दोनों चीज़ें अपने-आप खंडित हो जाती हैं. आपको अलग से उन्हें खंडित करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती.

 

महेश- चंद्रभूषण जी, आपके इस सभ्यता-पाठ में ‘आल्हा’ और आगे चलकर ‘राग दरबारी’ जैसे ग्रंथों का आना मुझे थोड़ा विचलित और अधिक उत्सुक दोनों करता है. सामान्यतः भारतीय सभ्यता की चर्चा जब होती है तो उसमें शास्त्रीय, दार्शनिक और ‘उच्च’ मानी गई परंपराओं को ही केंद्र में रखा जाता है, जबकि आप यहाँ एक मौखिक वीरगाथा को, जिसमें अतिशयोक्ति, भांग की तरंगों जैसी उच्छृंखल ऊर्जा, लोक-हास्य, विघटन और अंततः एक गहरा दुःख है, उसे आप सभ्यता के गंभीर पाठ में शामिल करते हैं. इसी संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचनात्मक दृष्टि पर भी प्रश्न उठाते दिखते हैं आप. शुक्ल जी की दृष्टि में ‘आल्हा’ एक ‘वीरगाथा काव्य’ है.

तो क्या भारतीय सभ्यता को समझने के लिए केवल शास्त्रीय आलोचना पर्याप्त नहीं है? क्या लोक की स्मृति, उसकी असंगति, उसकी अतिरंजना, उसका विखंडित कथ्य, उसकी सामूहिक वाचिकता ये सब भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं?

और फिर ‘राग दरबारी’ का आपके यहाँ आ जाना- क्या यह इस बात का संकेत है कि भारतीय सभ्यता की सबसे गहरी पहचान केवल उसके आदर्शों में नहीं, बल्कि उसके विडंबनात्मक आत्मबोध में भी है?

यानी यहाँ सभ्यता स्वयं को केवल महाकाव्यात्मक ऊँचाइयों में नहीं, बल्कि अपने पतन, हास्य, जुगाड़, विघटन और आत्म-व्यंग्य में भी पहचानती है?

चंद्रभूषण- सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि आल्हा का पाठ ‘निष्करुण वीरता के अंतर्विरोध’ इस महती परियोजना के लगभग बीच में आता है, जबकि ‘स्वतंत्र भारत की सभ्यता समीक्षा’ शीर्षक से मराठी उपन्यासकर भालचंद्र नेमाडे के ‘चांगदेव चतुष्टय’ और श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी के साझा पाठ इसका अंतिम हिस्सा है. यानी दोनों को निरंतरता में देखने से जो सिर-दर्द किसी को हो सकता है, उससे शुरू में ही मुक्त हो लिया जाए. पीछे, रामायण पर चर्चा के दौरान भारत में मौखिक काव्य की शक्ति को लेकर कुछ बातें हमारे बीच हो चुकी हैं. आल्हा या आल्हखंड इस परंपरा की अंतिम गौरवशाली कड़ी है.

भारत के सभ्यता विमर्श में आल्हा मेरे लिए दो पहलुओं से बहुत महत्वपूर्ण है. एक तो यह कि इसके केंद्रीय पुरुष चरित्र आल्हा, ऊदल और मलखान जाति आधारित वीरता का अतिक्रमण करते हैं. उनके समय के सारे ताक़तवर राजा उनके बनाफर कुल को नीच बताते हैं, इस कुल के बारे में कहीं कोई ठोस जानकारी भी नहीं मिलती लेकिन उनके पराक्रम की उच्चता इस समझ को बार-बार बक़वास साबित करती है. दूसरी बात, मीर तलहान सय्यद नाम का अति सम्मानित पात्र हिंदू-मुसलमान का द्वैत तोड़ता है और इसका बहुत ज़मीनी प्रभाव है. तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ऊपर से वीरता की ढम-ढम दिखने के बावजूद इस कथा का ढांचा विडंबना का है. पूरी गाथा की सबसे वीर पात्र पृथ्वीराज की बेटी बेला है, जो अपने समय के तीन बड़े राजवंशों के विनाश की साक्षी बनती है. सन 1000 ई. के आसपास बौद्ध धर्म का करुणा विमर्श गंगा घाटी से बाहर हुआ और वीरता से अफराये हुए जिन योद्धाओं ने त्रिपक्षीय युद्ध के क्रम में इस काम को अंजाम दिया, उनकी परिणति आल्हा जैसी वीरता में हुई.

रही बात चांगदेव चतुष्टय और राग दरबारी की, तो लगभग एक ही समय, 1968-69 में आई इन किताबों की मूल विषयवस्तु स्वतंत्र भारत की शिक्षा व्यवस्था है, लेकिन इनके क़िस्से ऐसे लोगों के इर्द-गिर्द घूमते हैं, जो पैसे और पावर की दुनिया से बाहर झांकना भी नहीं जानते, जिनकी कोई सभ्यता-दृष्टि नहीं है और भारतीय समाज को एक स्थायी भंवर के सामने ला खड़ा करने में जिन्हें कोई हिचक नहीं है. पीछे भारतीय सभ्यता के परस्पर टकराते हुए जिन पहलुओं के जरिये हमने उसकी आत्मगति को समझने की कोशिश की है, वह संसार के सबसे बड़े स्वाधीनता संग्राम के बाद अगर इस गति को प्राप्त हो रही है तो इस दृष्टिगत बीमारी का इलाज कैसे खोजा जाए, यह रेखांकित करने की कोशिश यहाँ की गई है. राग दरबारी को एक हास्य कृति की तरह पढ़ा जाना पता नहीं लेखक की समस्या है या हम पाठकों की, लेकिन मुझे तो इसमें लंगड़ का रोना ही याद रहता है, जो दूर से हंसने जैसा दिखाई पड़ रहा है!

 

महेश- आपने एक बड़ा आलेख ‘सत्यनारायण कथा में सिद्ध और पीर’ शीर्षक से भी लिखा है. मुझे उसका पूरा विवरण याद नहीं है, लेकिन मोटा अनुमान यह है कि भारतीय समाज ऊपर से जितना विभाजित दिखता है, नीचे उतना ही मिश्रित और संश्लेषित रूप मौज़ूद है.

तो आपको क्या लगता है कि लोक हमेशा धर्मशास्त्र से अधिक उदार और अधिक व्यावहारिक रहा है? और लोक की यह व्यावहारिकता जीवन के आग्रहों से निकलती है, इसलिए उदार होती है, या आपकी व्याख्या इससे कोई और गहरा मंतव्य निकालती है?

चंद्रभूषण- मेरी कोशिश यह रही है कि टेक्स्ट के ज़रिये ही समझा जाए कि पुराने समयों के बारे में वे हमें क्या बताते हैं. इस किताब में मैंने सिर्फ टेक्स्ट पर फोकस किया है. और ऐसे टेक्स्ट पर जो लोगों के दायरे में हों. ऐसी कोई चीज़ नहीं जिसके बारे में लोग कुछ जानते ही न हों और मैं कहूँ कि यह देखिए, मैं कोई किताब या पन्ना खोजकर ले आया. ऐसी आमफ़हम चीजों में सत्यनारायण व्रत कथा भी एक है, जो घर-घर कही जाती है. शायद आपके लिए यह सूचना नई हो कि बंगाल में इसी के समानांतर सत्यपीर की कथा भी मुसलमानों में कही जाती है.

महेश- सत्यपीर?

चंद्रभूषण– जी, सत्यपीर. और दोनों कथाओं के अंत में जो प्रसाद बंटता है, उसकी सामग्री भी कमोबेश एक ही है. जैसे हम लोग प्रसाद में पंजीरी खाते हैं- आटा, चीनी और केला. आटा भूनकर उसमें चीनी मिला दी जाती है, फिर केला काटकर डाल दिया जाता है, यही बेसिक प्रसाद है. और बंगाल में जो शीरनी या सिन्नी है, उसमें भी यही तीन चीज़ें हैं- आटा, शक्कर और केला. उसको लेई या घोल जैसा बनाकर छोटे-छोटे दोने में प्रसाद दिया जाता है.

महेश- हलवे की तरह.

चंद्रभूषण- जी. चरणामृत वहाँ नहीं बँटता.

महेश- सत्यपीर की कथा में?

चंद्रभूषण- जी. हमारे यहाँ शालिग्राम भी अलग से रखे जाते हैं.

महेश- शालिग्राम का चरणामृत होता है.

चंद्रभूषण- जी. वहाँ शालिग्राम जैसी पूज्य साकार वस्तु का कोई कॉन्सेप्ट नहीं है.

महेश- इसलिए चरणामृत भी नहीं है.

चंद्रभूषण: जी. लेकिन सत्यपीर की कथा में भी कहानियाँ वही हैं जो सत्यनारायण व्रत कथा में सुनाई जाती हैं, बस हमारे यहाँ एक-दो ज्यादा हैं.

महेश: अच्छा?

चंद्रभूषण- वही कहानियाँ वहाँ सत्यपीर की कथा में भी हैं. सत्यपीर को याद करना, उनकी कथा सुनना, उनकी तारीफ़ करना कि उन्होंने बर्बाद होते व्यापारी को बचा लिया. नदियों की पूर्वी बंगाल में कोई कमी नहीं है और समुद्र भी बगल में है. हमारे यहाँ अलबत्ता कथा सुनकर सत्यनारायण की महिमा समझने में कुछ दिक़्क़त होती है क्योंकि इधर की नदियों में बड़ी व्यापारिक नावें चलते तो हम कभी देखते ही नहीं. बिक्री के सामान से लदी हुई नाव चली जा रही है और व्यापारी बाप-बेटे दो-दो बार सत्यपीर द्वारा बचा लिए जाते हैं. सत्यपीर को आप किसी सिद्ध जैसा ही कह सकते हैं. सिद्धों के लिए लोगों के बीच वीर और पीर दोनों शब्द मिलते हैं. मैं कुछ साल आरा में था, वहाँ शहर से सटी हुई पाँचों पीर की मज़ार है. वहीं कुछ लोग इन्हें पाँचों वीर कहकर भी पूजते हैं.

कुल मिलाकर, ज़मीन पर आपको ऐसे बहुत सारे वीर और पीर मिल जाएँगे, जो सिद्धों जैसे ही किंवदंती पुरुष हुआ करते थे. ऐसे लोग जो गाँव से बाहर रहकर साधना करते थे लेकिन गाँव के लोग उनसे अपने कल्याण की अपेक्षा रखते थे. ये लोग गृहस्थ जीवन में बहुत इन्वॉल्व नहीं होते थे, अपनी ही दुनिया में रहते थे. चर्यापद और अन्य लिखित पाठों के आधार पर सिद्धों के समय को हम अधिकतम ग्यारहवीं सदी तक ला पाते हैं, वह भी ठेठ पूरब में. बिल्कुल संभव है कि ऐसे कुछ कम चर्चित व्यक्तित्व 1300-1400 ई. तक भी रहे हों. उसी का आख़िरी अवशेष सत्यपीर या सत्यवीर का मामला है, जिन्हें हिंदू दायरे में सत्यनारायण कहा जाता है.

सत्यनारायण व्रत कथा ऐसे तो हिंदी में ही बांची जाती है लेकिन इसका ढांचा सरल संस्कृत गद्य का है. हर अध्याय के अंत में- “स्कंद पुराणे रेवा खंडे सत्यनारायण व्रत कथायाम अमुक अध्यायः समाप्तः” आता है. कथा के शुरू में भी बताया गया गै कि यह स्कंद पुराण के रेवा खंड में कही गई कथा है. फिर खोजबीन हुई कि क्या सचमुच स्कंद पुराण के रेवा खंड में यह कथा है? तो पता चला कि स्कंद पुराण खुद लगभग एक हजार साल में विकसित हुई रचना है. जैसे-जैसे पुरानी प्रतियाँ मिलती गईं, पता चलता गया कि कौन सा हिस्सा इसमें पहले नहीं था, बाद में जुड़ा. पंद्रहवीं सदी ईसवी तक स्कंद पुराण विकसित होता रहा है. 1000 ईसवी वाले स्कंद पुराण में रेवा खंड ही नहीं है- रेवा यानी नर्मदा नदी. 1200 ई. के आसपास वाले संस्करण में रेवा खंड है, लेकिन उसमें सत्यनारायण व्रत कथा नहीं है. फिर 1400 ई. के आसपास वाले संस्करणों के रेवा खंड में सत्यनारायण व्रत कथा मिलती है और इसकी शुरुआत पूरब के रीसेन्शन्स में मिलती है- मिथिला और बंगाल वाले रूपों में.

इससे लगता है कि सत्यपीर की कथा और सत्यनारायण व्रत कथा में समयभेद नहीं है. एक तरफ से दूसरी तरफ जाने के बजाय यह एक साथ दोनों तरफ गई है. इसका लिखित रूप 15वीं-16वीं सदी में सामने आया. सत्यनारायण व्रत कथा के रूप में यह स्कंदपुराण का अंग बनी, जबकि एक मुस्लिम कवि शेख फैजुल्ला ने 1560 ई. के आसपास ‘सत्यपीरेर कथा’ लिखी.

महेश- यह तो गंगा-जमुनी संस्कृति का अद्भुत नमूना है…

चंद्रभूषण- गंगा-जमुनी तहज़ीब जैसी राजनीतिक भाषा में इस तरह की चीज़ें पिछले सौ सालों में ही देखी जाने लगी हैं. शुरू में मुस्लिम लीग के उभार के जवाब में इस तरह की बातें कांग्रेस की ओर से कही गईं और फिर आजाद भारत में जहाँ -तहाँ चुनाव जीतने के लिए भी कही गईं. लेकिन ज़मीन पर चीज़ें बहुत पहले से सचमुच ऐसी ही थीं. यह इस देश में जिंदा रहने की शर्त रही है, जनमत को प्रभावित करने का तरीका नहीं.

समाज बहुत लंबे समय से दो काम साथ-साथ कर रहा था—एक तरफ जन्मना असमानता का विरोध, और दूसरी तरफ बाहर से आने वाली आध्यात्मिक चीज़ों को आत्मसात करना. और जो बहुत सारे लोग मुसलमान हुए, उनमें भी अक्सर करके वही लोग थे जो जन्म आधारित विभाजन के ख़िलाफ़ खड़ी होने वाली परंपराओं से जुड़े हुए थे. ऐसा नहीं कि तुर्की या सीरिया से आए लोग यहाँ की चीज़ों को समझने की कोशिश कर रहे थे. यह उनकी अपनी आस्था-परंपरा का हिस्सा था. अभी वे खुद को अरब मिथकों से जोड़कर ज्यादा देख रहे हैं, लेकिन उनके संस्कार यहीं के हैं. आप बताइए, मुल्ला दाऊद ने 1379 में ‘चंदायन’ लिखा, क्या चार-छह पीढ़ी पहले बाहर से आया कोई आदमी अवधी सीखकर ‘चंदायन’ लिख सकता है? दोहा-चौपाई में पूरा प्रबंध काव्य लिख सकता है?

छंद सैकड़ों साल की उपज होते हैं. दो छंद लिखने में ही नानी याद आ जाएँ, और यहाँ पूरा आख्यान है- शुरू से आख़िर तक. तो यह धारणा कि फारस और मध्य एशिया से आए लोगों ने सूफ़िज़्म के प्रचार के लिए प्रेमाख्यान लिखने शुरू किए- यह टिकने वाली बात नहीं है. मुल्ला दाऊद की अपनी सामाजिक मजबूरियाँ रही होंगी कि वह ख़ुद को किसी दूसरी पहचान से जोड़ना चाहता हो, लेकिन उसका लिखा हुआ बता रहा है कि वह पुश्त-दर-पुश्त यहीं का है. और जैसे ही हम यह छोटा-सा पर्दा हटाते हैं कि भारत की संस्कृति एक नहीं, अनेक धाराओं वाली है- और एक बड़ा विभाजन जन्मना असमानता को मानने और न मानने का है- तो चीज़ें समझ में आने लगती हैं. वरना ‘चंदायन’ एक ऐसी पहेली है जिसे सुलझाया ही नहीं जा सकता. बाक़ी प्रेमाख्यान कवि- कुतुबन, मंझन, जायसी- सब बाद में आते हैं. लेकिन ‘चंदायन’ उनसे लगभग सवा सौ साल पहले मौजूद है. और उसमें हर जगह नाथपंथी आस्था दिखाई देती है. जोगी आते हैं और कहीं-कहीं देवियों के मंदिर दिखते हैं. तो यह लगता है कि मुल्ला दाऊद जिस बिरादरी और जिस आस्था-परंपरा से आते हैं, वह उसी का प्रतिबिंब है. बहुत संभव है कि वे खुद अहीर समुदाय से आए हों और उनके मातृ-पितृ पक्ष शाक्त और नाथपंथी पृष्ठभूमि के हों.

 

महेश- अब आपसे अंतिम सवाल. आपने ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को समता का अंतिम बड़ा प्रयास कहा है. क्यों? क्या आपको लगता है कि उसके बाद भारतीय परंपरा में कोई बड़ा समावेशी नैतिक प्रोजेक्ट नहीं बन पाया? फिर गांधी का प्रोजेक्ट? संविधान का प्रोजेक्ट?

चंद्रभूषण: इन्हें नकारने की बात नहीं है. आप ही सोचिए- गुरु ग्रंथ साहिब में छह गुरुओं की वाणियाँ हैं और पंद्रह भगत हैं. उन पंद्रह भगतों में चार मुसलमान हैं. और भगतों का भौगोलिक फैलाव देखिए- उड़ीसा और दक्षिणी बंगाल से लेकर मुल्तान तक, पंजाब से लेकर महाराष्ट्र तक. तीन सौ साल से ज्यादा का समय उनमें समाया हुआ है. गुरु ग्रंथ साहिब में सारी चीज़ें ऐसी चुनी गई हैं जो समता की धारा को मज़बूत करती हैं- एक ओंकार, अकाल पुरख, संगत-पंगत, “किरत करो, वंड छको” श्रम करो, बाँटकर खाओ, एक पांत में बैठकर खाओ, चाहे कहीं भी जन्मे हो, किसी भी जगह, कैसे भी परिवार में. यह चीज़ हवा से तो नहीं टपकी होगी. अगर ऐसा होता तो वह बहुत आइसोलेटेड होती. हम देख रहे हैं कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक धारा भारतीय समाज में पहले से मौजूद थी. और यह मुग़ल सत्ता के लिए भी चुनौती बन सकी, क्योंकि इसमें सिर्फ हिंदू नहीं, मुसलमान भी तेजी से आकर्षित हुए.

मुझे लगता है कि इसमें एक बहुत बड़ा स्मृति-तत्व है. आज सिक्ख धर्म दुनिया भर में फैला हुआ है, लेकिन गुरु गोविंद सिंह के बाद स्वयं इसके भीतर भी यह समझ कम होती गई कि गुरु अर्जुन देव की दृष्टि कितनी व्यापक थी. वे कोई नई आस्था नहीं बना रहे थे, बल्कि पहले से मौजूद समान परंपराओं को एकत्र कर रहे थे. इस उद्यम की शक्ति इतनी बड़ी थी कि स्वयं एक महत्वपूर्ण कवि होने और गुरु ग्रंथ साहिब का अंतिम संपादक होने के बावजूद गुरु गोविंद सिंह ने अपनी रचनाएँ इसमें नहीं शामिल कीं. सिर्फ एक रचना को लेकर कन्फ्यूजन है कि वह उन्हीं की है या गुरु तेगबहादुर की है.

यह संकलन-दृष्टि कहाँ से आई?

पश्चिम से तो नहीं आई.

इस समाज में ही उसका कोई बीज रहा होगा, जिसकी एक झलक शायद हमारी अब तक की बातचीत में भी दिखी हो. और मैंने अपने काम में ‘सिद्ध गोष्ठी’ पर लंबी चर्चा की है. गुरु ग्रंथ साहिब में 938 से 946, कुल आठ अंगों में फैला हुआ हिस्सा. गुरु ग्रंथ साहिब के हर पृष्ठ को ‘अंग’ कहा जाता है, क्योंकि उसे जीवित गुरु माना जाता है. हर पृष्ठ पर 19 पंक्तियाँ ही रहती हैं, चाहे कहीं भी छपे. इस विशाल ग्रंथ में अगर किसी को सिद्ध गोष्ठी खोजनी हो तो हर संस्करण में वह एक ही जगह मिलेगी.

महेश- ताकि एकरूपता बनी रहे.

चंद्रभूषण- मैंने लोगों से पूछा कि क्या यह दार्शनिक हिस्सा भी गाया जाता है? लोगों ने कहा- हाँ, गाया जाता है. हर जगह नहीं, लेकिन जहाँ रुचियां गंभीर होती हैं, लोग दर्शन सुनना चाहते हैं, वहाँ सिद्ध गोष्ठी का पाठ भी होता है. रागों में बँधा होने से यह ग्रंथ लोगों के जीवन-व्यवहार से जुड़ा रहता है. सिद्ध गोष्ठी में पूरी की पूरी बहस सिद्धों की गुरु नानक के साथ है. दार्शनिक बहस है और बड़े सम्मान के साथ की गई बहस है—परस्पर सम्मान के साथ.

महेश- डायलॉजिक, ऐंड मोर अकोमोडेटिव?

चंद्रभूषण- गुरु नानक शुरू में ही कहते हैं कि ‘अपना सिर काटकर मैंने उनको अर्पित किया’ साथ ही यह भी कि गुरुजनों को इसी तरह से सुना जाना चाहिए. मतलब अहं छोड़कर सुन रहे हैं, बात कर रहे हैं. पहले सिद्धों की ओर से “रे नानक” करके बात शुरू होती है और अंत में “रास्ता बताइए” तक जाती है. तो मेरा मतलब था कि समता की परंपरा का अंतिम पड़ाव गुरु ग्रंथ साहिब ही है. महात्मा गांधी का और संविधान का जो समता का प्रोजेक्ट है- किसी बुज़ुर्ग ने कहा था कि ‘हिंदुस्तान तो एक ख़्वाब का नाम है.’

महेश- बहुत सुंदर शब्दों में कहा है यह!

चंद्रभूषण- हाँ, ऐसा ख़्वाब, जिसकी तामीर होनी अभी बाकी है. बहुत सारी चीज़ें आप सीखते भी तो हैं अतीत से, पीछे जाकर समझने की कोशिश करते हैं.

आप सोचिए कि गुरु ग्रंथ साहिब का सिक्खी के दायरे से बाहर का कोई अध्ययन क्या आपकी नज़र में है? और यदि हम इसे सिर्फ सिक्ख धर्म के भीतर ही रखना चाहते हैं, तो उसमें सदना कसाई के आने को कैसे जस्टिफाई करेंगे?

उसमें जयदेव के आने को कैसे जस्टिफाई करेंगे?

ये यहाँ इसलिए हैं क्योंकि एक बहुत बड़ा विज़न है, एक बहुत बड़ी दृष्टि है. एक बहुत बड़ा भूगोल है. इतिहास ने तो उसे समेटकर छोटी जगह बना दिया है. गुरु नानक देव ने तो पंच ककार- कड़ा, केश, कंघा, कच्छा, कृपाण– नहीं दिए थे. वह तो इतिहास के किसी मोड़ पर मजबूरी में आया. और उसकी वजह से बाहरी वेश से ही आप सिक्ख को पहचानने लगे.

गुरु नानक के लिए तो सिक्ख एक आंतरिक पहचान थी. हर गुरु खुद सिक्ख (शिष्य) भी होता है. कोई परंपरा है भारत में, कोई ऐसी चीज़ है जो यहाँ आकर संघनित हुई है. इस अर्थ में मैंने कहा कि वह समता का अंतिम प्रयास है.

(सोचकर, सहमत होते हुए) अंतिम तो कुछ भी नहीं होता वैसे. महात्मा गांधी ने धर्म को लेकर कुछ बातें प्रस्तुत कीं, एक आधार दिया, लेकिन किसी ने उसे आगे नहीं बढ़ाया. इस स्तर का यह अंतिम बड़ा प्रयास था अब तक का.

महेश- आगे नया हो सकता है…

चंद्रभूषण- हाँ, हो सकता है.

 


महेश मिश्र
 सांस्कृतिक मामलों के जानकार और टिप्पणीकार हैं. भारतीय और वैश्विक मामलों पर दृष्टि रखते हैं. साहित्य में उनकी गहरी रुचि है और उनका लेखन लगातार सामने आ रहा है.
दिल्ली में रहते हैं.
चंद्रभूषण
(
जन्म: 18 मई 1964)

‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’ (यात्रा-राजनय-इतिहास) और ‘पच्छूं का घर’ (संस्मरणात्मक उपन्यास) से पहले दो कविता संग्रह ‘इतनी रात गए’ और ‘आता रहूँगा तुम्हारे पास’ प्रकाशित. इक्कीसवीं सदी में विज्ञान का ढांचा निर्धारित करने वाली खोजों पर केंद्रित किताब ‘नई सदी में विज्ञान : भविष्य की खिड़कियाँ’, पर्यावरण चिंताओं को संबोधित किताब ‘कैसे जाएगा धरती का बुखार’, भारत से बौद्ध धर्म की विदाई से जुड़ी ऐतिहासिक जटिलताओं को लेकर ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’, ‘बुद्धचरित और महाकवि अश्वघोष’आदि  पुस्तकें प्रकाशित.

patrakarcb@gmail.com

Tags: 20262026 बातचीतचंद्रभूषणमहेश मिश्र
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Comments 8

  1. Rohini Aggarwal says:
    1 month ago

    बेहद सघन, विचारोत्तेजक और शोधपरक अंतर्दृष्टि से संपन्न बातचीत।
    हमेशा की आदत के मुताबिक़ मनोयोग से इस बातचीत को पढ़ती रही और परिपार्श्व में अपने स्मृति-अंतरिक्ष में लटकी ध्वनियों और नाद को भी सुनती रही। लगा, ‘वोल्गा से गंगा’ की गहन ऐतिहासिक-सभ्यतागत यात्रा यहाँ एक पड़ाव की तरह आकर ठहरती है। फिर अपने जटिल राष्ट्रवादी समय की चेतावनियों से जूझने हेतु अपनी धरोहर यानी धर्मशास्त्रों, महाकाव्यों और लोकपरंपराओं के विश्लेषणात्मक पाठ की ओर मुड़ जाती है। गंगा-जमुनी तहज़ीब की बात करते हुए, पर उससे ज़्यादा इस तहज़ीब को पहली सहस्राब्दी की काल-धाराओं से निःसृत होते हुए।

    मिथ्या गौरव के अभिमान में भरकर अपने ही समय और उद्गम को कितना कम जानते-आंकते हैं हम।

    बेशक अफवाह और प्रवाद की काट पुरातात्विक साक्ष्यों, साहित्यिक स्रोतों और समकालीन लिखित सामग्रियों के अंतःसाक्ष्य से ही संभव है।

    बातचीत पढ़ती रही, लहर-दर-लहर। कथारस की तरह। एक गहरे दार्शनिक सबक की तरह। सांस्कृतिक समन्वय की थाती की संरक्षक की तरह।
    कहने की जरूरत नहीं कि चंद्रभूषण जी की विद्वत्ता, महेश जी की बहुपठित सहभागिता और अरुण जी की ज़मीन – इन तीनों ने मिलकर क्षीणतर होते जा रहे आलोचनात्मक विवेक को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।
    समालोचन से ऐसी ही नायाब रचनाओं की अपेक्षा है। रोज़-रोज़।

    Reply
  2. रामशंकर वर्मा says:
    1 month ago

    चन्द्रभूषण जी साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन के साथ लोकव्यापारों के गम्भीर एवं खाेजी अध्येता हैं। बहुआयामी मेधासम्पन्न उनके लेख इधर उनकी फेसबुक वाल पर, समालोचन पर पढ़ने को मिले। पूर्व मध्यकाल से लेकर प्रारम्भिक भारतीय इतिहास के कालखण्ड का व्यापक फलक विषयवस्तु के रूप में चुनना, फिर साहित्य, भाषा, पुरावशेषाें में लुप्त संधानित प्रवृत्तियों की बहुकोणीय उनकी पड़ताल एक दुसाध्य कार्य है। चे निष्कर्ष नहीं निकालते, स्थापनायें नहीं देते, लेकिन उनके प्रेक्षण निश्चित वस्तुस्थिति का संकेत अवश्य देते हैं। भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म, अश्वघाेष की बुद्धचरित जो उनके अथक प्रयास से प्रकाश में आर्इ, के बाद प्रकाशनाधीन इस पुस्तक का अंश पढ़कर आशा जगती है कि उनकी शाेध−सन्धानों को निकट भविष्य में साहित्य में जगह मिलेगी, उनके उद्घाटनों पर व्यापक विमर्श होगा।

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  3. शुभनीत कौशिक says:
    1 month ago

    भारतीय इतिहास, साहित्य और संस्कृति पर एक बेहद दिलचस्प बातचीत है यह।

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  4. Jyoti Modi says:
    1 month ago

    बेहद शानदार बातचीत। बौद्ध धर्म के सन्दर्भ में भारत की संस्कृति, समाज, वैचारिकी के जिन अनेक प्राचीन और आधुनिक पहलुओं को उजागर किया गया है वह प्रशंसनीय है। बुद्ध की विचारधारा में पोलराइज़ेशन वाली बात ने विस्मित भी किया और प्रभावित किया। यह सच है कि जितना पुराना इतिहास एकता का है उतना ही विखंडन का भी है। जैसा यहाँ साफ़ किया गया कि, जातिवाद, ध्रुवीकरण की नींव कालिदास और गुप्त वंश के समय से चली आ रही है। समय ने सिर्फ उसे और पुख़्ता किया है। भगत नामदेव, अब्दुल रहमान से चली आ रही गंगा जमुनी तहज़ीब का पाट कितना विस्तृत यह जानना सुखद है। वैदिक अवैदिक परम्पराओं के इतिहास में बौद्ध धारा और नाथ सम्प्रदाय की सूक्ष्मताओं, थेरीगाथा की स्त्रियों का मुक्तिकाव्य, भवभूति के नाटकों में स्त्रियों की स्थिति जैसे कई ऐतिहासिक संदर्भों में चंद्रभूषण जी का गहरा शोध और अपने विषय पर उनकी पकड़ चकित करती है। ऐतिहासिक तथ्यों को खोलकर देखना और उसपर चिंतन करना हम भूल चुके हैं। कितनी ज़रूरी चीज़ें लगभग विस्मृत हो गई हैं कितने ज़रूरी परिप्रेक्ष्य दृष्टि के सामने हो कर भी अलक्षित रहते हैं। जबकि उनमें इस जटिल समय के लिए कई संभावित समाधान हैं। यहाँ एक सुचिंतित विमर्श को चंद्रभूषण जी और महेश जी ने सम्भव किया है। अंत तक मैं डूब कर पढ़ती रही। इसे सहेज कर रखा। फिर पढ़ा जाएगा। अरुण जी धन्यवाद और शुभकामनाएँ कि वे ऐसी सुंदर, समृद्ध सामग्री पाठकों के लिए मुहैया करवाते रहें।

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  5. विजय बहादुर सिंह says:
    1 month ago

    महेश जी की चन्द्रभूषण जी से की गई बातचीत बहुत सारे नए सवालों और जिज्ञासाओं को भी जन्म देती है. जवाब देते हुए वे जिस तरह धर्म, दर्शन और इतिहास की खोहों में आते जाते हैं, उसमें राजसत्ताओं के उत्थान और पराभवों की कथा भी कुछ कम नहीं है, धर्म और दर्शन की भूमिका भी.
    असल में भारत की ज्ञानपरंपरा की कई कई धाराएँ इस बातचीत को विशिष्ट बनाती हैं. तब भी
    ये और अधिक विमर्श और संवाद की माँग करती है.
    चन्द्र भूषण जी का यह कहना कि अश्वघोष को उपेक्षित किया गया, या अनदेखी की गई और इस तरह ब्राह्मण पुरोहितवाद ने बुद्ध को अपनी चतुराई से दरकिनार कर दिया, यह तो खैर हुआ ही. और कारण फिर विमर्श की माँग करते हैं.
    बहरहाल हिन्दी के लिए तो यह नया सा आँगन है, जिसकी भूमिका तय होनी अभी बाकी है.
    तथापि इसके महत्व को तो स्वीकारना ही होगा.

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  6. Anonymous says:
    4 weeks ago

    ये बातचीत एक गवाक्ष है जिसमें धर्म संस्कृति दर्शन इतिहास की लहरों की उठापटक साकार होती, मिटती ,नया रूप लेती दिखती हैं .यह सिलसिला जा री रहना चाहिए. —हरिमोहन शर्मा

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  7. Faqir Jay says:
    4 weeks ago

    इस साक्षात्कार का स्तर इतना उम्दा है कि सहसा श्रीकांत वर्मा द्वारा ओक्टोवियो पाज़ का इंटरव्यू याद आ गया .

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  8. नरेश गोस्वामी says:
    3 weeks ago

    कुछ पाठ अपनी परिकल्पना और निहितार्थों में इतने विस्तृत होते हैं कि उन्हें एक बार में नहीं पढ़ा जा सकता। जल्दबाज़ी में पढ़ भी लें तो उनकी संरचना हाथ नहीं आती।
    ‘चंद्रभूषण की महेश मिश्र से बातचीत’ एक ऐसा ही पाठ है जिसे आख़िर तक पढ़ने और पचाने के लिए कई रीडिंग चाहिए।
    भारत के सांस्कृतिक इतिहास, बौद्ध और वैदिक चिंतन; गृहत्यागी और ग्राहस्थ परम्पराओं के द्वंदों, वर्ण और जाति-व्यवस्था के स्थिरीकरण, विशाल साम्राज्यों के अवशेषों से उगे छोटे राज्यों, धार्मिक संप्रदायों की रस्साक़शी और उनसे पैदा होने वाले सामाजिक तनावों तथा खंडन-मंडन, टकरावों और अपवर्जन के बीच सह-अस्तित्व के रास्ते तलाश करती भारतीय संस्कृति की यह चर्चा उन तमाम मुद्दों की भीतरी परतों में जाती है जहां से घृणा और बहिष्करण के बरक्स एक सामासिक इतिहास-बोध का विकल्प उभरता है।
    मसलन, मैं गंगा-जमुनी संस्कृति के इस पूर्व-इतिहास से लगभग पहली बार परिचित हुआ। यहां चंद्रभूषण पहले नामदेव भगत का यह उद्धरण देते हैं :
    ‘जिनि आकास कुलह सिरि कीनी कउसै सपत पयाला,
    चमर पोस का मंदरु तेरा इह बिधि बने गुपाला’.
    और फिर इस भाव और जीवन-संसार का विस्तार करते हुए एक के बाद एक कई सबल तर्क पेश करते हैं :
    1.केशव को कुलही तो सिर्फ नामदेव ने पहनाई है, लेकिन कोई समय ऐसा नहीं है जब मुसलमान कवियों ने हिंदू आस्था के क़रीब जाकर न लिखा हो. अब्दुल रहमान से लेकर रसखान तक, बाद में नज़ीर भी इस सूची में दम-ख़म से शामिल हैं, ऐसे उदाहरण लगातार मिलते हैं . ऐसा नहीं कि कभी एक-दो लोगों का मन किया और उन्होंने लिख दिया. यह एक सतत धारा है.
    2. एक बुनियादी डिकॉटमी हिंदू-मुस्लिम के भीतर दिखाई देती है. लेकिन जैसा मैंने कहा, यह डिकॉटमी पूरी नहीं है. एक स्तर पर लोगों का संश्लेषण का प्रयास भी चलता रहा. (रुककर) और एक-से-एक महान और प्रशंसित काम हुए हैं, जिन्हें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ने किया है. दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति को एकीकृत और एकाश्मी संस्कृति के रूप में देखना गलत है. यहाँ भी कई सांस्कृतिक धाराएँ हैं.
    3. मुल्ला दाऊद की अपनी सामाजिक मजबूरियाँ रही होंगी कि वह ख़ुद को किसी दूसरी पहचान से जोड़ना चाहता हो, लेकिन उसका लिखा हुआ बता रहा है कि वह पुश्त-दर-पुश्त यहीं का है. और जैसे ही हम यह छोटा-सा पर्दा हटाते हैं कि भारत की संस्कृति एक नहीं, अनेक धाराओं वाली है- और एक बड़ा विभाजन जन्मना असमानता को मानने और न मानने का है- तो चीज़ें समझ में आने लगती हैं.
    4.गंगा-जमुनी तहज़ीब जैसी राजनीतिक भाषा में इस तरह की चीज़ें पिछले सौ सालों में ही देखी जाने लगी हैं. शुरू में मुस्लिम लीग के उभार के जवाब में इस तरह की बातें कांग्रेस की ओर से कही गईं और फिर आजाद भारत में जहाँ -तहाँ चुनाव जीतने के लिए भी कही गईं. लेकिन ज़मीन पर चीज़ें बहुत पहले से सचमुच ऐसी ही थीं. यह इस देश में जिंदा रहने की शर्त रही है, जनमत को प्रभावित करने का तरीका नहीं.”
    इस बातचीत में चंद्रभूषण और महेश मिश्र बड़ी संरचनाओं और इतिहास के निर्णायक कालखण्डों की चर्चा करते हैं। यह इतिहास का क्यूरेटिड या गाइडिड टुअर नहीं, एक सघन सर्वे है जिसमें गढ्ढे, गह्वर, घाटी और शिखर- सब एक साथ दिखाई देते हैं।
    इसे पढ़ते हुए बार-बार इस बात की तस्दीक़ हुई कि किसी दीर्घजीवी समाज को महाख्यानों के बग़ैर नहीं समझा जा सकता। यह बात अपनी जगह दुरुस्त है कि इतिहास की विशिष्ट इकाईयां हमें ज़्यादा वस्तुनिष्ठ, बारीक और सुडौल तथ्यों से परिचित कराती हैं, लेकिन समाज का सामूहिक मानस इन तथ्यों को अपने साहित्य में व्याख्यायित करता है। इस तरह, साहित्य समाज का एक खुला अभिलेखागार बन जाता है।
    चंद्रभूषण अपने तर्क इसी खुले अभिलेखागार से उठाते हैं। वे सांस्कृतिक इतिहास के विगत समय को टेक्स्ट के ज़रिए समझते हैं। उनका यह कहना ख़ास तौर पर मानीख़ेज़ है कि ‘ मैंने सिर्फ़ टेक्स्ट पर फोकस किया है. और ऐसे टेक्स्ट पर जो लोगों के दायरे में हों. ऐसी कोई चीज़ नहीं जिसके बारे में लोग कुछ जानते ही न हों और मैं कहूँ कि यह देखिए, मैं कोई किताब या पन्ना खोजकर ले आया.’
    मुझे लगता है कि उनका यह मूव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि मौजूदा समय के घिराव से निकलने के लिए हमारी कल्पना कुछ अप्रत्याशित ढूंढने के चक्कर में फंसी रहती है, जबकि इस समय के कुटिल सवालों का जवाब देने के लिए हमारे पास पर्याप्त सुबूत मौजूद हैं।
    मुझे लगता है कि यह बातचीत एक जिल्द में आने की हक़दार है।

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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