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Home » महादेवी वर्मा से अज्ञेय की बातचीत

महादेवी वर्मा से अज्ञेय की बातचीत

महादेवी वर्मा को 28 नवंबर 1983 को ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती मार्गरेट थैचर के हाथों दिल्ली में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया. इस पुरस्कार की घोषणा के समय अज्ञेय इलाहाबाद में ‘वत्सल निधि’ द्वारा आयोजित रायकृष्णदास स्मारक व्याख्यान देने गए हुए थे. उसी दौरान उन्होंने महादेवी वर्मा से यह बातचीत की थी जो ‘दिनमान’ के दिसंबर 1983 अंक में प्रकाशित हुई. इस संवाद में कई दिलचस्प बातें हैं, यह कि महात्मा गांधी ने महादेवी वर्मा से कहा था— “कविता नहीं सुनाओगी और कवि रहोगी.” तब से महादेवी वर्मा कविता-पाठ नहीं करती थीं. और यह कि वे छायावाद के बाद की हिंदी कविता से बहुत निराश थीं. अज्ञेय साक्षात्कारकर्ता भी कमाल के हैं. आज महादेवी वर्मा का जन्मदिन (26 मार्च,1907-11 सितम्बर, 1987) है. उन्हें याद करने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है कि इस महत्वपूर्ण बातचीत को पढ़ा जाए. मनोज मोहन ने इसे ख़ास तौर पर आपके लिए उपलब्ध कराया है.

by arun dev
March 26, 2026
in बातचीत
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महादेवी वर्मा से अज्ञेय की बातचीत
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महादेवी वर्मा से अज्ञेय  की बातचीत
प्रस्तुति : मनोज मोहन

 

II अज्ञेय II
कुछ एक बातें तो ऐसी पूछना चाहता हूँ जिनका हो सकता है कि जवाब भी जानता हूँ, लेकिन बात को एक लीक पर डालने के लिए ऐसे प्रश्न उपयोगी होते हैं. एक तो यह बताइये कि क्या शुरू से आपके मन में यह भाव था कि आप कवि बनेंगी, या कि संयोग का भी इसमें हाथ रहा?

II महादेवी II
देखिए, ऐसा था न कि तुकबंदी तो मैं करने लगी थी जब मैं छह वर्ष की थी. माँ बहुत पूजा करती थीं. रोज़ नहला कर बैठा लेती थीं और पूजा करती थीं. मैं घूमती रहती थी. सरदी लगती थी. तो मैंने रामा से पूछा, जो मेरा सेवक था, कि ‘ठाकुर जी भी कहें कि ठंड लगती है, तब माँ कोई चिंता करेगी—हमारे कहने से नहीं मानती, ठंडे पानी से नहलाती हैं. रामा ने कहा, ‘ठाकुर जी नहीं बोलते हैं, ठाकुर जी गूँगे हैं. भगवान जी कभी बोलते हैं?’ तो मुझको बड़ी दया आयी कि भगवान जी नहीं बोलते हैं. तो मैंने तुकबंदी की—

ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चंदन इन्हें लगाती
इनका भोग

हमें दे जातीं
फिर भी कभी नहीं बोले हैं
ठाकुर जी कितने भोले हैं.

यह तुकबंदी हो गयी. हमारे और भाई बहनों ने—एक ही बहिन थी उस वक़्त—उसने भी इसको कहना शुरू किया. फिर क्या हुआ कि हम इंदौर चले गये. हमारे बाबा जी तो फ़ारसी के विद्वान थे, और पिता जी ने यहाँ अंग्रेज़ी में एम. ए. किया था इलाहाबाद यूनीवर्सिटी से और वह प्रथम आ गये थे. तो अंग्रेज़ बड़े खुश थे. जो परबाबा थेः महताबराय, वह लखनऊ में अंग्रेजों से लड़ कर मरे थे. उनके भाई सिताबराय सिताबदियारा में बिहार में मरे थे. तो इस तरह वातावरण ऐसा था दूसरी तरह का.

माँ हमारी जबलपुर से आयी थीं. वह रामचरितमानस की पोथी लायीं और एक सिंहासन लायी थीं चाँदी का. वह तेरह वर्ष की थीं, पूजा करती थीं. उनके साथ हिंदी हमारे परिवार में आयी, नहीं तो हिंदी आती ही नहीं. वह यह चाहती थीं कि हम बहुत पूजा करें. तो हम तुक मिलाने लगीं. उस समय यह नहीं सोचा था कि हम कवि बनेंगे. हम जानते ही नहीं थे कि कवि क्या होता है. अच्छा लगता था, कहते थे. फिर उसके बाद जब देखा कि लगातार तुक मिलते हैं तो हमारी माँ ने कहा—माँ सूर के पद गाती थीं, मीरा के पद गाती थीं और अपने भी रचित पद गाती थीं—माँ ने कहा, पंडित जी को बुलाओ किसी को; यह तुक मिलाती है, इसको सिखा दे कुछ.

तो पंडित जी आये. पंडित जी ने आ कर हम को अलंकार, यह सब सिखाना शुरू किया और समस्या देना शुरू किया. तो हमने वही पहले ब्रजभाषा में लिखा है, समस्यापूर्ति की है. अच्छा लगता था लिख कर, लेकिन हम कवि होंगे यह पता नहीं था. फिर उसके बाद बहुत लिखा. ब्रज भाषा में तो वही हमने लिखा. वह दे गये समस्या तो हम लिखने बैठे. बस यह समझिये स्याही गाल से लगायी, नाक में लगायी, किसी तरह जोड़ रहे हैं, उसमें कष्ट होता था, लेकिन आनंद भी आता था, नहीं तो क्यों जोड़ते. उसके बाद जब हम यहाँ आये सन् 17 में, तब देखा सुभद्रा जी लिखती थी सीधी-सीधी बात खड़ी बोली में लिखती थी. तो हमने अपना ढंग बदला. बदल कर फिर हम खड़ी बोली में लिखने लगे.

 

II अज्ञेय II
तो ब्रज भाषा से खड़ी बोली में आने का कारण यही हुआ, या आपको ऐसा भी लगा कि जो बात आप कहना चाहती हैं वह ब्रज भाषा में नहीं कही जा रही है?

II महादेवी II
अब उस समय की बात, यह कहना बड़ा मुश्किल है क्या था. लेकिन यह लगा कि जो बोलचाल की बात है उसी में कहें तो ठीक है. बोलते कुछ और हैं और लिखते कुछ और हैं. और सुभद्रा जी का प्रभाव तो था ही. फिर उसके बाद पंत जी आये सन्’ 19 में और उनसे भेंट हुई है सन्’ 22 में—श्रीधर पाठक के यहाँ. तभी यह था कि ‘चाँद’ ने जो लिखा है सीधा-सीधा—लेकिन दिशा वही बनी है धीरे धीरे.

II अज्ञेय II
आपने अभी कुछ प्रारंभिक कविताएँ बाद से सुनायीं. आपको जो कुछ आपने लिखा है सब याद है या नहीं? बाद की रचनाएँ भी उसी तरह याद रहती हैं या नहीं रहतीं?

II महादेवी II
बाद की कुछ याद रहती हैं, कुछ नहीं रहतीं.

II अज्ञेय II
तो कोई कारण आप सोचती हैं कि कविता के स्वभाव में ऐसा है कि एक तरह की कविता याद रहती है, दूसरी तरह की नहीं रहती?

II महादेवी II
नहीं ऐसा कुछ नहीं.

II अज्ञेय II
क्योंकि जो पारंपरिक ढंग के कवि थे उनको सब कुछ याद रहता था और वह थी भी वाचिक परंपरा की कविता, उसके लिए याद रहना आवश्यक था. मुझको लगता है अब हमलोग जिस स्थिति में लिखते हैं, जिसमें कविता की प्रस्तुति एक प्रत्यक्ष समाज को सुनाकर नहीं की जाती, न कविता वैसे की जाती है—किताब से पढ़ते हैं—उसमें कविता का याद रहना अनावश्यक हो गया, जब चाहें किताब से पढ़ सकते हैं. और इसका असर कविता के स्वभाव पर भी पड़ा है. ऐसा आपको लगता है या नहीं?

II महादेवी II
लगता है.

II अज्ञेय II
स्वयं अपनी रचना के दौरान भी कभी आपने अनुभव किया है कि इस कारण भी परिवर्तन है?

II महादेवी II
सोचा तो नहीं कि ऐसा है. और अब तो ऐसा है कि संभव ही नहीं है. जो अब है उसमें संभव ही नहीं है, जैसे हम को याद है वह. तो शायद वह छंद ऐसा था कि याद रहता था. अब उसको कंठस्थ करें भी क्यों?

II अज्ञेय II
यह बात तो दोनों तरह कही जा सकती है—छंद ऐसा था इसलिए याद रहता था, और याद रहना आवश्यक था इसलिए छंद वैसा था.

II महादेवी II
नहीं. बहुत से लिख कर पढ़ते थे.

II अज्ञेय II
तो स्वयं अपनी रचना में आपने लक्ष्य किया कि किसी तरह का परिवर्तन आता है?

II महादेवी II
इस पर सोचा नहीं. परिवर्तन आना है, आया, भाषा में भी आया, छंद में भी आया, लेकिन संस्कार पुराना ही रहा होगा क्योंकि फिर गीत लिखने का लोभ तो था ही और गीत में छंद न हो, गुनगुनाया न जाये, गाया न जाये तो किसी काम का नहीं होगा. लंबी कविताएँ कम हैं मेरी, जो है गीत में है. बहुत विस्तार हो भी नहीं सकता. और क्योंकि भावाकुलता कुछ क्षणों में रहती है, हमेशा नहीं रह सकती. तो जो कविता वैचारिक है उसके लिए तो यह समय है, लेकिन गीत के लिए भाव में तीव्रता है, और कुछ तो है नहीं.

 

 

II अज्ञेय II
यह तो ठीक है, लेकिन यह जो कविता में परिवर्तन आया, वो उदाहरण लूँ—दिनकर जी लिखते थे, पहले बँधे हुए छंद में लिखते थे, बच्चन जी वैसा ही करते थे और वह कविता उनकी लोकप्रिय भी हुई. उधर तो कोई कारण नहीं था कि वह मुक्त छंद में लिखने लगें, दूसरी तरह के कारण हो सकते हैं, लेकिन दोनों ने ही छंद छोड़ कर दूसरी तरह की भाषा, दूसरी तरह की प्रक्रिया अपना ली और मुझको लगता है दोनों ही उसमें सफल नहीं हुए क्योंकि उनका संस्कार वही है, बंधे हुए छंद का और वाचिक परंपरा का. दूसरी भाषा उन्होंने अपनायी लेकिन वह छंद उनसे सधा नहीं. आपकी तो कभी मुक्त छंद की तरफ़ प्रवृत्ति नहीं हुई?

II महादेवी II
मुक्त छंद दो चार लिखे होंगे, लेकिन भूल भी गयी हूँ और वह संग्रह मिलता भी नहीं. बहुत कविताएँ खोयी हैं मेरी. लेकिन एक-दो बार प्रयत्न किया मैंने. लेकिन मुझको आनंद इसी में मिलता है क्योंकि मैं गुनगुनाती हूँ.

II अज्ञेय II
लेकिन जो प्रयत्न किया तो क्यों?

II महादेवी II
प्रयत्न यह देखने के लिए कि कैसा लगता है. कभी कभी मन ऐसा होता है लिख कर देखें, लेकिन संतोष नहीं हुआ उस पर.

II अज्ञेय II
तो यह जो बात है कि लिख कर देखें, इसके मूल में एक तो यह हो सकता है कि ‘लिख कर देखें और लिखने के बाद पढ़ कर देखें कि अपने को कैसा लगता है,’ एक यह हो सकता है कि ‘लिख कर देखें कि दूसरों पर वैसा ही असर होता है जैसा गीतों का था?’

II महादेवी II
नहीं होता है वैसा असर. लेकिन बहुत पहले से दूसरों को सुनाना तो बंद कर दिया था मैंने. सन्—’35 में बंद कर दिया था. उसके बाद दूसरों को सुनाने का प्रश्न नहीं उठता.

 

(श्रीमती थैचर, श्रीमती इंदु जैन, ज्ञानपीठ के प्रबंध न्यासी अशोक जैन और महादेवी वर्मा )

II अज्ञेय II
दूसरी बातें जो आपने कही—जहाँ विचार प्रधान हों वहाँ दूसरी तरह की कविता भी हो सकती है. तो ऐसा भी तो हो सकता है कि आपने कविता के माध्यम से कुछ विचार प्रेषित करना चाहा हो?

II महादेवी II
ऐसा है कि विचार जब आये तो हमने गद्य ही लिखा. ऐसा संयोग हुआ या उसमें जिज्ञासा इतनी थी, तर्क देना था, तो जब विचार की बात आयी मैंने गद्य लिखा. दोनों चीज़ें थीं, समाधान भी, जिज्ञासा भी, तर्क भी, वह कविता में नहीं आता था, गीत में तो नहीं आ सकता. चाणक्य की नीति को गा तो नहीं सकते.

II अज्ञेय II
लेकिन आपके गद्य में बहुत से ऐसे गुण हैं जो काव्य के माने जाते हैं. वैसे मानक गद्य है वह, लेकिन काव्यमय भी बहुत है. तो गद्य लिखने की ओर आपकी रुचि इसलिए हुई या बढ़ी, या अभी तक आप यही मानती कि गद्य का क्षेत्र अलग है, काव्य का अलग है?

II महादेवी II
ऐसा मानती हूँ अब भी. क्योंकि एक में हम बुद्धि को छूना चाहते हैं, जिज्ञासा जगाना चाहते हैं और चाहते हैं कि प्रश्न करे कोई. और एक में हम संप्रेषण चाहते हैं. एकदम एकता चाहते हैं. तो ऐसा होता है कि कविता में हम बहा ले जाते हैं—जिसको साधारणीकरण कहें या न कहें लेकिन वह हृदय को छूना चाहती है. तो माया का फ़र्क हो ही जायेगा. और एक में हम तर्क करना चाहते हैं, समाधान लेना या देना चाहते हैं. तो कविता में उसका विस्तार, लगता है, नहीं है, महाकाव्य में हो सकता है.

II अज्ञेय II
लेकिन संप्रेषण की बात या साथ ले चलने की बात गद्य के लिए भी उतनी ही आवश्यक है, वह बहा न भी ले चले.

II महादेवी II
लेकिन बुद्धि ग्रहण दूसरी तरह करती है, हृदय दूसरी तरह करता है. आप किसी को रोते देखें या कोई घटना देखें तो उसका प्रभाव बुद्धि पर दूसरा पड़ता है, हृदय पर दूसरा पड़ता है.

II अज्ञेय II
तो क्या इष्ट यह नहीं हो सकता कि दोनों का सामंजस्य हो?

II महादेवी II
पूरी तरह नहीं होगा कभी सामंजस्य, ऐसा मुझको लगता है. गद्य रहेगा अपने ढंग से और शायद बहुत शक्तिशाली भी. जहाँ तक कविता का प्रश्न है वह प्रभाव छोड़ती है, संस्कार छोड़ती है और मैं समझती हूँ कि अच्छी कविता आपको किसी समस्या में उलझा कर नहीं छोड़ेगी. अपने आप समस्या उसमें सुलझ जाती है जैसे, अब नवगीतकार फिर वहीं लौट आये इतने दिन के बाद. सब हो चुका, मुक्त छंद हो चुके, कविता हो चुकी और उसके बाद नवगीतकार वहीं लौट आये. अच्छे गीत लिखे हैं, लेकिन अब नकल उसी की चली.

 

 

II अज्ञेय II
लेकिन अब एक विचार-कविता भी तो चल रही है, विचार-कविता नाम की भी तो एक धारा है जो विचार पर बल देती है. अरे, एक ने लिखी है ‘कैपसूल कविता’. ‘सूत्र कविता’, न जाने कितनी तरह की कविताऐं हैं, लेकिन लगता है वह मन को उतना हिला नहीं पाती है.

II अज्ञेय II
ये कुछ वैसी ही चीज़ें हैं जैसे पुराने चित्रकाव्य वगैरह होते थे. यह तो खिलवाड़ हैं या व्यायाम हैं.

II महादेवी II
यह तो है, लेकिन अब कविता कहाँ जायेगी. कुछ नहीं कहा जा सकता. या तो समाप्त हो जायेगी. क्या आपको नहीं लगता है कि समाप्त होने जैसी बात है?

II अज्ञेय II
ऐसा मैं मानता तो नहीं हूँ. और अगर जो बात आपने कही, हृदय को छूने की—अगर हृदय रहता है (जिसको हम—स्थूल अर्थ में तो नहीं—हृदय कहते हैं वह रहता है) तो विचार की आवश्यकता भी रहनी चाहिए, क्यों समाप्त हो जायेगी कविता?

II महादेवी II
अब देखिए, ऐसा है कि आदमी इतना विकल है और वह केवल चाहता है—या तो ऐसी कविता जो चोट करे दूसरे पर—आप कवि सम्मेलन देखते होंगे, हमने भी कुछ देखे हैं, उसमें यह है, व्यंग्य है और आघात है, बहुत तरह की चीज़ें हैं लेकिन उसमें मन का वह मेल नहीं जो पहले होता था. वह अब नहीं है. यह तो फ़र्क बहुत बड़ा हो गया.

II अज्ञेय II
लेकिन कवि सम्मेलन में जो कविताएँ पढ़ी जाती हैं उनको ही आप प्रमाण मानेंगी, या उनके अलावा भी कविता में समाज की रुचि है? एक तो जो चोट करे वह एक तरह की कविता है. और जो सहलाये वह भी…

II महादेवी II
आप लोगों के समय में जो कविता थी या जैसी विचारधारा आप लोगों की थी वैसी इन लोगों की नहीं है जो अब हैं नये. और प्रगतिवादी तो पहले भी नहीं थे. वह तो मार्क्स का दर्शन लाते हैं या और किसी का लाते हैं. तो ऐसा है कि मुझको लगता है कि कविता का या तो परिवर्तन होगा समाज का, जीवन का, और नहीं होगा तो शायद कविता की उपयोगिता आज जैसी मैं देखती हूँ बड़ी अजीब है.

II अज्ञेय II
यह बात आप सिर्फ कविता के बारे में कह रही हैं या साहित्य मात्र के?

II महादेवी II
साहित्य मात्र के कह लीजिए, यह बात भी ठीक है. आदमी जब इतना विकल है, एक ही बात उसके मन में है, रोटी के अतिरिक्त कुछ नहीं है. और जानता है कि शासक जो कर सकता है वह नहीं करता तो रात-दिन उसके सामने शासक है. तो अच्छी कविता के सामने शासक हमेशा नहीं रहता. मनुष्य रहता है. लेकिन आज तो शासक है. और वैसी कोई कविता मैंने नहीं देखी जो उन लोगों पर चोट करने वाली न हो.

II अज्ञेय II
लेकिन यह बताइए, आप मानती हैं कि सचमुच ऐसी स्थिति है? अगर अख़बार देखें या समाचार सुनते रहें तब तो लगता कि यह स्थिति है, लेकिन क्या सचमुच समाज में इस एक ग्राहक के सिवा कुछ नहीं है? सचमुच ऐसा है?

II महादेवी II
पत्र-पत्रकार यह करते हैं यह ठीक है. लेकिन समाज की स्थिति भी तो ऐसी है. मनुष्य में कुछ दूसरी ध्वंसात्मक प्रवृत्तियाँ जाग गयी हैं.

II अज्ञेय II
लेकिन मनुष्य अगर मनुष्य है तो जहाँ तक पहुँचा है—यह तो ठीक है कि ध्वंस की या हिंसा की एक प्रवृत्ति उसमें थी, वह बिल्कुल उन्मीलित तो नहीं हुई, बनी हुई थी और उसको बहुत बढ़ावा मिला है. लेकिन और भी तो बहुत सी प्रवृत्तियाँ हैं, और विकास के क्रम में…

II महादेवी II
इस समय दब गयी हैं, और ये होगी अवश्य. अच्छे काम भी होते होंगे, अच्छे व्यक्ति विचार करने वाले भी हैं, लेकिन जो होता है देखिए आज…

II अज्ञेय II
क्या कविता उनको छू नहीं सकती, उनको फिर से…

II महादेवी II
कवि छू सकता है, लेकिन कवि तो हमारे यहाँ अब नहीं है, जो लिखते हैं उनको हम कवि तो नहीं कहते हैं. उस अर्थ में कवि नहीं हैं, चाहे वह तुक मिलाकर कुछ इसको गाली दे या उसको गाली दें. उस पर चोट करते हैं, व्यंग्य करते हैं. यह तो कविता का लक्ष्य नहीं है. तो उस अर्थ में—एक समय में सभी कवि हैं, हर एक कविता कहता है. एक भी आदमी नहीं ऐसा जो कहता है कि हम कविता नहीं लिखते हैं और वही लिखते हैं, सब जगह वही लिखते हैं. तो मुझको लगता है कि आदमी इतना विकल है. जब तक बदले नहीं समाज तब तक शायद कवि उस तरह का नहीं होगा. और हम लोगों का युग तो बहुत समृद्ध युग था. अब वैसा नहीं है. और बाज लिखता इसलिए है कि और क्या करें, कोई काम नहीं है.

II अज्ञेय II
आपने कहा वह युग समृद्ध था. आपसे एकाएक पूछा जाये कि कुछ कवियों के नाम लीजिए तो आप किनके नाम लेंगी?

II महादेवी II
बहुत हैं.

II अज्ञेय II
बताइए.

II महादेवी II
कथा के युग में दद्दा हैं ही, मैं मानती हूँ बड़े अच्छे कवि हैं. और श्रीधर पाठक भी, अगर उनका संग्रह किया जाये तो छायावादी हैं, बहुत अच्छे है. और भी उस समय के हैं, फिर हम लोगों के समय में पंत जी थे ही, ‘निराला जी’ थे, और कई बहुत से थे. फिर आप लोगों के युग में हैं ही, ऐसा नहीं है कि नहीं हैं. आज ऐसा एक नाम बताइए, आप कि नाम ढूँढ़ें तो नहीं मिलेगा जो उस स्तर पर पहुँच कर लिखता है, ऐसा नहीं मिलेगा. सब हैं, लेकिन मानो चेहरा नहीं है, पहचान नहीं है. और पहचान तब होगी जब व्यक्ति उसमें डूबकर लिखेगा. ऐसा नहीं है उनका, देखिए लिखने वाला है, उसे नौकरी मिल जाये तो छोड़ देगा.

II अज्ञेय II
इस कोटि के आदमियों को तो छोड़ दीजिए. लेकिन यह जो पहचान की बात है, क्या रीति काव्य के जो कवि थे उनकी कोई पहचान थी?

II महादेवी II
हाँ, पहचान थी. वह अपने आप पहचान में आते हैं. एक ही समय में पंत. ‘निराला’ लिखते थे, लेकिन ‘निराला’ जान पड़ता है अलग, पंत अलग जान पड़ते हैं.

II अज्ञेय II
छायावाद में ही पहले-पहल यह बात है कि व्यक्तित्व की पहचान माँगी भी जाती है और कविता में आती भी है. उससे पहले रीति-प्रधान युग में कवि के व्यक्तित्व को तो पहचान नहीं होती, सभी अच्छे कवि एक से….

II महादेवी II
उनकी आस्था की, विश्वास की पहचान होती है. दद्दा की पहचान नहीं है? अपनी उनकी पहचान है. माखनलाल जी की अपनी पहचान है. ऐसा नहीं है कि पहचान नहीं है उनकी. ‘नवीन’ जी की अपनी पहचान है. एक युग में लिखने वाली की पहचान थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब मेरे पास इतनी पांडुलिपियाँ आती है, भगवान बचाये, क्या सोचते हैं पता नहीं. बस, कुछ लिख दीजिए. और किसी की पहचान नहीं. इसमें उसका नाम रख दो तो पता नहीं चलेगा वैसे ‘निराला’ की एक पंक्ति होगी तो आप तुरंत पहचान लेंगे.

II अज्ञेय II
लेकिन यह तो नयी ही प्रवृत्ति है. रीति काल तक तो यह बात नहीं थी. उसमें भी यह था कि आप अच्छे कवियों की किसी रचना में नाम अदल-बदल कर दीजिए तो बहुत अंतर नहीं पड़ता था.

II महादेवी II
नहीं, ऐसा नहीं कर पाते हैं. एक-आध पंक्ति मिल जाये तो दूसरी बात है, लेकिन अपनी कल्पना, अपना बिंब, अपना विश्वास, अपना भाव-चिंतन सब जो उसमें आता है अपना होता है, वह पहचान है अलग. आज के कवि के पास पहचान नहीं है और मुझे लगता है कि उभर कर कोई भी कवि नहीं आया जिसे आप कहें कि वह है इस युग का.

 

II अज्ञेय II
इस बारे में मैं आपसे और एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ. आपने कहा कि आपकी कुछ कविताएँ आपको याद हैं, कुछ भूल गयीं. क्या यह संभव है कि कोई पंक्ति आप के सामने आये और आप यह नहीं बता पायें कि यह आपकी लिखी हुई है या नहीं है, या कि तुरंत आप कहेंगी यह मेरी नहीं हो सकती.

II महादेवी II
मेरी लिखी होगी तो मुझे याद आ जायेगी.

II अज्ञेय II
यह कैसे होता है?

II महादेवी II
क्योंकि लिखने के समय कोई एक संस्कार बन जाता है. तो पंक्ति मुझे ऐसे याद न हो, लेकिन अगर आप उसे सुनायें तो मुझे याद आ जायेगी.

II अज्ञेय II
एक तो यह हुआ कि याद आ जायेगी. दूसरे यह कि याद न भी आये पर कहें कि नहीं, यह मेरी पंक्ति नहीं हो सकती.

II महादेवी II
ऐसा भी हो सकता है. जो मेरे विश्वास, चिंतन सबके विपरीत है ऐसी कोई पंक्ति मेरी नहीं होगी. तो यह तो हर लिखने वाले को मालूम रहता है. क्या आपको नहीं पहचान है यह?

II अज्ञेय II
वही मैं जानना चाहता हूँ कि वह क्या चीज़ है जिससे यह पहचान होती है.

II महादेवी II
उसके साथ इतनी तन्मयता होती है कि वास्तव में उसका संस्कार गहरा हो जाता है, वह मिटता नहीं… ‘मैंने ऐसा नहीं सोचा होगा.’

II अज्ञेय II
यह तो बात तब कही जा सकती है जब कोई विचार हो और कहें कि यह मेरा विचार नहीं है. न उसमें विचार के आधार पर कहा जा सके, न शब्दावली ऐसी अपरिचित हो, न भाव के आधार पर, फिर भी यह पहचान रहती है कि नहीं, यह मेरी नहीं हो सकती है, वह क्या चीज़ है?

II महादेवी II
वह वही चीज़ है. जितना गहरे डूब कर आप लिखेंगे उतना गहरा संस्कार होगा और आप पहचान भी लेंगे और कह भी देंगे कि मैंने नहीं सोचा यह सब. कोई चीज़ तो है ही. धारणा हो, स्मृति हो, संस्कार हो, पता नहीं मन की कौन प्रवृत्ति है. मन के तो तीन स्तर हैं, जैसे एक स्थूल मन है बाहर की चीज़ हम जानते हैं, एक स्थूल मन है जिसमें अंतर्निहित तत्व जानते हैं; एक कारण मन है, वह तीन स्तर मिल जाते है. तो कौन सा मन है जो याद रखता है, यह आज कहना तो मुश्किल है. लेकिन मनोवैज्ञानिक मानते हैं. उसी तरह चेतना के तीन स्तर हैं, अवचेतन भी है, चेतन भी है, पराचेतन भी है. तो अवचेतन मन में न जाने कितनी बातें होती हैं जो हम लोग नहीं जानते, लेकिन आप कहें तो तुरंत याद आ जायेंगी. उसी अवचेतन से चेतन में आ जायेगा. तो किस बिंदु पर वे मिल जाते हैं यह कहना मुश्किल है. कवि के लिए मुश्किल है. मनोवैज्ञानिक के लिए तो ठीक है.

II अज्ञेय II
आपने जितनी कविताएँ लिखीं सब गीत ही, गीत ही आपने लिखे. लेकिन सुनाती नहीं हैं आप कहीं. इसमें क्या कहीं कोई विरोध नहीं है? जो चीज़ गाने के लिए है, कान से ग्रहण करने के लिए है, उसे…

II महादेवी II
अपने आप तो मैं गा लेती हूँ, अपने आप उसको गुनगुनाती हूँ और मुझे संतोष हो जाता है.

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना, इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली

दूसरे गाते हैं तो सुनना अच्छा लगता है. अब ऐसा एक बार हो गया था, बहुत से ऐसे निश्चय लिये मैंने जो गांधी जी के कारण हुए. उन्होंने कहा, कविता नहीं सुनाओगी और कवि रहोगी. तो फिर मैंने वह नियम तोड़ा भी नहीं और तोड़ना भी नहीं चाहिए.

II अज्ञेय II
यह तो ठीक है, लेकिन वैसी कविता जिसका स्वभाव ही यही है कि वह सुनकर ग्रहण की जाये और सुना कर संप्रेषित की जाये, उसको न सुनाने का निर्णय लेना क्या अपने लिए कष्टकर नहीं है?

II महादेवी II
हो सकता है—क्या कहें इसके बारे में. अब तो सुनाती नहीं, इतने दिन हो गये. पहले गाकर तो सुनाया नहीं कहीं. एक तो सस्वर सुनाना है, और एक गाना है, और एक सीधे पढ़ लेना है. तो इन तीनों में अंतर तो है ही.

II अज्ञेय II
अंतर तो है ही, लेकिन पढ़ देने में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यह गाने के लिए है यद्यपि पढ़ कर सुनाया जा रहा है. उतना तो कर सकते हैं. यह तो ज़रूरी नहीं है कि हर कवि अच्छा गायक भी हो.

II महादेवी II
पढ़ देने में एक लय तो है ही. सस्वर पढ़ने में भी अच्छा जैसे वेदपाठी हो तो उसका पढ़ना कभी-कमी मूर्छित कर दे सकता है आपको. बद्रीनाथ में मैंने यही देखा. जब अच्छे पंडित वेद-पाठ करते हैं मंत्रमुग्ध आदमी मानो समाधि में चला जाता है, इस तरह गूँजता है. और माना, संगीत तो दूसरी चीज़ है. संगीत में तो ध्वनि प्रधान है और कविता में अर्थ प्रधान है. अर्थ न हो तो जो चाहे ‘आ-आ’ करते रहो. लेकिन राग-रागिनी केवल ध्वनि पर है.

II अज्ञेय II
लेकिन अगर कविता सिर्फ अपनी अभिव्यक्ति नहीं है, संप्रेषण भी है, दूसरे तक पहुंचाती भी है, तो आपने यह जो निर्णय कर लिया कि पढ़ेंगी भी नहीं-गाने की बात छोड़ दीजिये पढ़ कर भी नहीं सुनायेंगी तो इससे क्या उस संप्रेषण में कठिनाई नहीं होती? आपको यह विश्वास होना चाहिए कि यह चीज दूसरे तक पहुंच सकती है, ऐसी बन गयी कि पहुंचेगी. मुझे विश्वास रहता है, पहुंच, जाती है.

II महादेवी II
मुझे विश्वास रहता है, पहुँच जाती है.

II अज्ञेय II
जो चीज़ पढ़ने के लिए ही है, उसको न पढ़ने का आपने निश्चय कर लिया, तो इसमें कठिनाई नहीं होती?

II महादेवी II
नहीं, कुछ नहीं होती. लिख दिया मैंने, दूसरे पढ़ेंगे. अब क्या है ‘सब आँखों के आँसू उजले, सब के सपनों में’. मैं जानती हूँ दूसरे के पास पहुँच जायेगा, ठीक है.

II अज्ञेय II
बहुत-सा ऐसा है. लेकिन कुछ ऐसा भी हो सकता है कि जिस के बारे में यह बात सच न हो. क्योंकि अगर आप कविता पढ़ कर सुनाते हैं तो यह संभावना की जा सकती है कि इसमें आपकी भाषा बदल जाती, जो है इससे कुछ भिन्न हो जाती.

II महादेवी II
यह तो है. लेकिन अब संयोग ऐसा होगा, नहीं तो पहले सुनाया ही मैंने. गीत सन् ’35 तक सुनाये हैं, लेकिन फिर ऐसा निश्चय कर लिया, तब से नहीं सुनाया, लेकिन इससे कोई हानि नहीं हुई मेरी. मैं लिख देती हूँ, अच्छा लगता है.

II अज्ञेय II
अगर मैं यह कहूँ कि जब तक आप सुनाती भी रहीं तब तक परिवर्तन भी उसमें होता रहा और वह दीखता भी है, और अपने सुनाना बंद कर दिया तो फिर वह स्थिर भी हो गया, परिवर्तन फिर आगे नहीं हुआ?

II महादेवी II
नहीं, ऐसा नहीं है. परिवर्तन तो है उसमें. पहले से वहाँ तक देखिए, अभी तक, तो दूसरी कविता हो ही गयी. मैं अपने आप जानती हूँ कि परिवर्तन हो गया.

II अज्ञेय II
कैसे या किस तरह का परिवर्तन?

II महादेवी II
जैसे पहले मैं ऐसी चुनौती भरी कविता नहीं लिखती थी जैसी वह कविता जो ‘धर्मयुग’ में छपी थी ‘सृजन के विधाता को आज कैसे… ऐसा पहले नहीं लिखती थी. या ‘आज मंदिर के घंटे-घड़ियालों में, न वो अब चुनौती है पुजारी में…’ तो यह अंतर तो है ही. मैं अपने आप जानती हूँ या ‘ठुकरायेगा नहीं, आज उद्धत रह कर… कौन जाग कर तुझे पार तक पहुँचायेगा.’ वैसा नहीं लिखती थी पहले. आज जैसा लिखती हूँ. अंतर तो आता ही है. और फिर मैं अपनी पुरानी कविता देखती नहीं, बहुत कम देखा मैंने और बहुत कम काट-छाँट’ की है. बहुत-सा समय तो ऋग्वेद के अनुवाद में लग गया मेरा. इसलिए अंतर तो आया ही है. अब मैं उतनी क्लिष्ट भाषा भी नहीं लिखती हूँ.

II अज्ञेय II
उतनी क्लिष्ट न हो, लेकिन अब भी बोलचाल की भाषा से तो काफ़ी दूर है.

II महादेवी II
अब भी दूर है, गद्य में भी दूर है. बोलचाल में तो बीस शब्द हों तब भी काम चल जाता है. जैसे बोल रहे हैं हम लोग, थोड़े शब्द चाहिए, लेकिन लिखने के समय हमें दूसरे शब्द चाहिए.

II अज्ञेय II
यह तो कुछ शब्दों की बात हुई. लेकिन ढाँचा तो वही रहा.

II महादेवी II
हाँ तो कविता बन जाती है, उन्हीं शब्दों से बनेगी. पूरा वाक्य विन्यास कुछ और हो जाता है. तो मैं ऐसे बोलती हूँ, ठीक है. विद्यार्थी से बोलती हूँ, एक एक बार कहने से समझता है, एक दस बार कहने से समझता है, तो दोनों को संतोष हो, ऐसी भाषा बोलती हूँ और जब बार-बार कहना पड़ता है तो उससे सरल, उससे सरल, उससे सरल. अब जो मुस्लिम लड़कियाँ हिंदी पढ़ती है. उनके साथ बड़ी कठिनाई होती है. हिंदू लड़कियाँ साहित्य समझ लेती हैं और मुस्लिम लड़कियाँ हिंदी में एम. ए. करती हैं, लेकिन उन्हें समझाना और ज़्यादा पड़ता है. कभी ‘विनय पत्रिका’ समझानी है, कहीं ‘साकेत’, कठिन हो जाता है. तो हर बार एक दूसरी भाषा आती है. इसलिए रंग कई प्रकार के होते हैं. ख़ाली लिखती तो हूँ नहीं. मुझे पढ़ाना भी पड़ता है. तो पढ़ने वाला समझे. जो विद्यार्थी दस बार कहने से समझेगा तो दसवीं बार बिल्कुल सरल करके कहूँगी. तो बहुत तरह के प्रवाह आ गये हैं.

(दिनमान: 4-10 दिसंबर ’83, से आभार सहित)

मनोज मोहन

मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक.इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं.

manojmohan2828@gmail.com

Tags: 20262026 बातचीतअज्ञेयमनोज मोहनमहादेवी वर्मामहादेवी वर्मा से अज्ञेय की बातचीत
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Comments 9

  1. सूर्य नारायण says:
    3 weeks ago

    वाह , बहुत महत्वपूर्ण बातचीत है – दो कवियन की वार्ता !

    Reply
  2. चन्द्रभूषण says:
    3 weeks ago

    मनोज मोहन जी ने यह बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। महादेवी जी उस दौर के, यानी शायद रघुवीर सहाय के बाद के कवियों को बिना पहचान का बता रही हैं जबकि अज्ञेय जी रीतिकालीन कवियों को भी ठीक ऐसा ही बता रहे हैं। यानी कविता की विशिष्ट पहचान वाले हिंदी कवि दोनों की नजर में वही हैं जिनका लेखन स्वतंत्रता के तीसेक साल आगे-पीछे का है। उर्दू आलोचना इसको किसी शेर पर शायर की मुहर लगी होना कहती आई है। काव्यालोचना का यह भी एक शक्तिशाली बिंदु है, जो समीक्षामूलक लिखाई में कहीं छूट गया है।

    Reply
  3. अरविंद त्रिपाठी says:
    2 weeks ago

    एक विलक्षण साक्षात्कार धन्यवाद प्रस्तुत करने के लिए

    Reply
  4. Bhawna Jha says:
    2 weeks ago

    बहुत संग्रहणीय है ये वार्तालाप
    तस्वीर भी बहुत सहेजने योग्य।आभार

    Reply
  5. Dr Prakash Chandra Patel says:
    2 weeks ago

    हिन्दी के दो महान रचनाकारों की इस बातचीत को प्रस्तुत करने के लिए प्रस्तोता का हार्दिक आभार ।

    Reply
  6. Anonymous says:
    2 weeks ago

    सराहनीय प्रयास है आपका। साधुवाद!

    Reply
  7. ललन चतुर्वेदी says:
    2 weeks ago

    बहुत बढ़िया साक्षात्कार. धरोहर. मनोज मोहन जी का संग्रह लाजवाब है.

    Reply
  8. Dinesh Joshi says:
    2 weeks ago

    अच्छा साक्षात्कार है। काफी चीजें साफ हुई हैं। ‘विचार कविता का क्षेत्र नहीं है,महादेवी यह दो टूक कह रहीं हैं,उसके लिए गद्य में लिखती हूं में।’ हालांकि अज्ञेय के बाद तो विचार कविता की बाढ़ आ गयी। यह एक तरह से ह्रदय पक्ष को उपेक्षित कर बुद्धि पक्ष की तरफदारी थी। भावना,को भावुकता से जोड़ कर हीन करार दिया गया। समाजिक जरुरत या प्रगतिवाद के प्रभाव से कविता के रुप व स्वर में बदलाव आया जो अभी तक छाया हुआ है। महादेवी अपने समय के साथियों या पूर्ववर्तियों को ही सराहती लग रहीं है। बहरहाल तत्कालीन परिवेश में दो महत्वपूर्ण कवियों की बातचीत से साहित्य की शैलीगत भिन्नताओं का अच्छा विवेचन विश्लेषण इस साक्षात्कार के माध्यम से हो रहा है।

    Reply
  9. के. पी. अनमोल says:
    2 weeks ago

    अच्छी और उपयोगी वार्ता है, धन्यवाद आपका।

    Reply

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