| अच्छी आलोचना पाठक से सहमति की माँग नहीं करती. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: हाशिये का समाज और हिंदी उपन्यास महेश मिश्र |
“साहित्य सहमति का स्थल नहीं होता. पाठक लेखक के साथ बहना चाहता है, लेकिन साथ ही वह लेखक से अपेक्षा भी करता है कि वह उसे उसकी ज़मीन से उठा कर किसी अन्य लोक में ले जाए, जहाँ एक बेहतर भविष्य उसकी बाट जोह रहा हो.”

पुस्तक की भूमिका में रोहिणी अग्रवाल जब अपनी साहित्य संबंधी मान्यता को पाठ-पद्धति का रूप देती हैं, तब यह पाठक को उसकी ज़मीन से उठा कर किसी समृद्ध विचार-लोक में ले जाने की आकांक्षा है. लेकिन इसमें एक दूसरी माँग भी छिपी हुई है: पाठक लेखक के साथ बहते हुए भी उससे इतनी दूरी बनाए रखे कि उसकी जाँच कर सके. यानी पाठक केवल ग्रहण करने वाला न रहे, वह सह-सर्जक भी बने. समय को वे तटस्थ नहीं मानतीं; उसे “सत्ता-संरचना के तमाम उपकेन्द्रों” की आंतरिक गतिशीलता को बनाए रखने वाला कैटलिस्ट मानती हैं. ऐसा लगता है मानो उनका बरसों का आलोचना- कर्म यहाँ सान्द्र रूप में एक साथ इस भूमिका में उपस्थित हो गया हो.
एक पाठक के तौर पर साहित्यिक विधाओं में मुझे सबसे जरूरी विधा उपन्यास ही लगती है क्योंकि वही सभ्यता और जीवन को सर्वांगीण परिप्रेक्ष्य में देखने की सामर्थ्य रखती है. कोई अन्य विधा उसके आस-पास भी नहीं लगती है। उपन्यास का अपना संसार बहु-विध है और किसे महत्त्वपूर्ण माना जाए और किसे गैर-महत्त्वपूर्ण, इसको लेकर विवाद होते रहे हैं और होते रहेंगे; लेकिन किसी समर्थ आलोचक में अगर इसको लेकर किसी किस्म का कोई पक्षपात, राग-द्वेष जन्मे या कोई अन्य स्पर्श-कातरता दिखे तो उसको क्षम्य मानना मुझे साहित्य की अवधारणा के ही विरुद्ध समझ में आता है। किसी उपन्यास का चयन अपने-आप में आलोचना नहीं है; असली प्रश्न यह है कि उसे किस स्थापना के लिए और किस कसौटी पर पढ़ा जा रहा है.
रोहिणी अग्रवाल की नई पुस्तक ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: हाशिये का समाज और हिंदी उपन्यास’ को पढ़ते हुए यह भी ध्यान में रहता है कि इसकी रचना दो बड़े वृत्तों में होती है: एक ओर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सत्ता-संरचना, दूसरी ओर उसी संरचना के भीतर हाशिए पर धकेले गए मनुष्य और समुदाय. इसलिए इतिहास-चेतना, राजनीति-दर्शन, स्त्री, आदिवासी, झोंपड़पट्टी, पारिस्थितिकी और क्वीयर जीवन पर लिखे उपन्यास अलग-अलग विषय होकर भी अंततः एक ही बड़े सवाल के भीतर आते हैं: किसी भी सभ्यतागत आख्यान में मनुष्य की जगह कहाँ है?
किताब की शुरुआत में नागरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जो तनाव उभरता है, वह आगे के अधिकांश विश्लेषणों की पृष्ठभूमि बन जाता है. नागरिक राष्ट्रवाद की वैधता नागरिक की समानता, अधिकार और लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व से आती है; सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अपने शुद्ध रूप में किसी साझा सांस्कृतिक पहचान को इतना प्रधान कर सकता है कि नागरिक की स्वतंत्र इकाई पीछे छूट जाए. रोहिणी अग्रवाल की दिलचस्पी इसी विस्थापन में है. अलबरूनी से लेकर बंकिमचंद्र तक वे इतिहास की परतों को एक सीधी रेखा में नहीं, बल्कि सर्पिल ढंग से खोलती हैं. यह उनकी आलोचना की ताकत है.
इसी संदर्भ से देखने पर ‘आनंदमठ’: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पहला भाववादी ड्रॉफ्ट’ मुझे इस पूरी किताब पर एक मुकम्मल दृष्टि की तरह मौजूद दिखाई देता है। बंकिमचंद्र ने 1876 में ‘साम्य’ निबंध लिखा था. रोहिणी अग्रवाल ‘आनंदमठ’ के विश्लेषण में उसे इसलिए लाती हैं क्योंकि लेखक-विचारक बंकिमचंद्र का विकास-क्रम वहीं से पकड़ में आता है. वे मानती हैं कि ‘साम्य’ आर्थिक-सामाजिक न्याय का एक विजनरी डॉक्यूमेंट है. उसमें पतनशील हिन्दू समाज की कड़ी परीक्षा थी, लेकिन बंकिमचंद्र उस पर टिके न रह सके. तर्क, बुद्धि और विज्ञान से वे आस्था, आकांक्षा और धर्म की ओर इस हद तक मुड़े कि 1880 के दशक में अपना ही निबंध ‘साम्य’ वापस ले लिया.
रोहिणी अग्रवाल इस विडंबना को कुशलता से पकड़ती हैं—
“‘साम्य’ में जहाँ तर्कपूर्ण रीजनिंग के साथ स्वायत्त वैयक्तिक इकाई के रूप में मनुष्य, उसकी मानवीय अस्मिता और अधिकारों को वरीयता दी गई है, और इस प्रकार एक प्रगतिशील समाज की संरचना का स्वप्न संजोया गया है, वहीं ‘आनन्दमठ’ में भाववादी अप्रोच स्थितियों और निष्कर्षों को पूरी तरह से धुंधला (मिस्टिफाई) और प्रतिगामी बना देती है… ‘आनन्दमठ’ में जिस हिन्दू राष्ट्रवाद की संकल्पना की गई है, उसके गर्भ में तीन बीज शब्द छिपे हैं—हिन्दू, हिंसा और हिन्दू राष्ट्र. ये तीनों बीज शब्द आगे चलकर तीन विपरीत शब्द-युग्म (अपोजिट बाइनरी) बनाते हैं—हिन्दू-मुसलमान, हिंसा-अहिंसा और हिन्दू राष्ट्र बनाम अंग्रेजी शासन. उल्लेखनीय है कि प्रत्येक शब्द-युग्म ‘शत्रु’ के रूप में मुसलमान (जिसे उपन्यास में यवन कहा गया है) को संकल्पित कर उसका शिरोच्छेद कर देने की आक्रामकता से बिंधा हुआ है.”
‘आनंदमठ’ का विश्लेषण करते हुए उनका एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष है कि हिंसा अपने आप में असमाधेय स्थिति है; उसे स्थायी मूल्य नहीं बनाया जा सकता. बंकिमचंद्र ने इतिहास-चेतना को अपनी सीमित दृष्टि और सुविधा के कारण ऐसे ट्रैप में फँसा दिया जो केवल कृति की सफलता-असफलता तक सीमित नहीं रहता, सामाजिक-राजनीतिक चेतना को भी धुँधला करता है. रोहिणी अग्रवाल इस ट्रैप को कुछ ठोस सवालों से खोलती हैं—युद्ध के बाद यह प्रस्तावित राष्ट्र अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय और नागरिक जीवन को किस आधार पर व्यवस्थित करेगा? हिंसा में प्रशिक्षित ‘संतान’ शांति की सामाजिक आधारशिला कैसे बनेगी? स्त्री, दलित और अल्पसंख्यक के प्रति संचित घृणा किस प्रक्रिया से सद्भाव में बदलेगी? ‘दिव्य पुरुष’ के पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं. वहाँ किंकर्तव्यविमूढ़ता है, और वही अंततः प्रवंचना और पलायन में बदलती है; नेतृत्त्व मसीहा बनता है और जनता भीड़.
उपन्यास का यह विश्लेषण तुरंत ही बंकिमचंद्र और ‘आनंदमठ’ की सीमा से आगे चला जाता है. दोनों समयों की संधि-रेखा पर आलोचक का मूल्यवान निष्कर्ष हमारे सामने होता है कि किसी भी समाज का वैचारिक खोखलापन ज़रूरी परिवर्तन की आकांक्षा को अमूर्तन में धकेल देता है. मुझे यहीं उनकी अंतर्दृष्टि का वह सिरा मिलता है जो इस किताब के बेहतर हिस्सों का मेरुदंड है.
लेकिन इसी जगह से मेरी एक असहमति भी शुरू होती है. स्टीवन लेवित्सकी और डेनियल जिब्लाट की ‘How Democracies Die’ पर रोहिणी अग्रवाल का भरोसा मुझे उनकी अपनी आलोचनात्मक पद्धति की तुलना में कुछ अधिक उदार लगता है. यह पुस्तक लोकतंत्र के क्षरण को संस्थाओं, राजनीतिक मानदंडों, गेटकीपिंग, म्यूचुअल टॉलरेशन और इंस्टीट्यूशनल फॉरबेयरन्स के टूटने से बहुत प्रभावी ढंग से दिखाती है; लेकिन अंततः उसका लोकतंत्र उदार लोकतंत्र की संस्थागत चौहद्दी में ही सुरक्षित और परिभाषित रहता है. वह यह बताती है कि लोकतंत्र कैसे मरता है, लेकिन लोकतंत्र के भीतर कौन-सी सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ, प्रतिनिधित्व का संकट, सत्ता और पूँजी के गठजोड़, जातीय-नस्ली-धार्मिक वर्चस्व और नागरिक की क्रमशः बढ़ती राजनीतिक निरर्थकता ऐसी मृत्यु की जमीन तैयार करते हैं: उसकी पड़ताल अपेक्षाकृत कमजोर है.
मेरी अपेक्षा थी कि रोहिणी अग्रवाल इस पुस्तक को भारतीय लोकतंत्र के लिए चेतावनी की तरह ग्रहण करने के साथ-साथ उसकी इस सीमा को भी खोलतीं. जिसने ‘आनंदमठ’ को उसके घोषित सरोकारों के सामने खड़ा करके टेक्स्ट के भीतर की प्रवंचना पकड़ ली, वह ‘How Democracies Die’ को भी उसकी उदारवादी वैचारिकी के सामने उसी कठोरता से खड़ा कर सकती थी. यहाँ उनका विवेचन पुस्तक की उपयोगिता को तो ग्रहण करता है, पर उसकी एपिस्टेमिक सीमा तक पूरी तरह नहीं पहुँचता. लोकतंत्र सिर्फ संस्थाओं के बिगड़ने से नहीं मरता; कभी-कभी संस्थाएँ ठीक-ठाक दिखती रहती हैं और लोकतंत्र का सामाजिक पदार्थ भीतर से सूखता जाता है. मुझे लगता है कि यह प्रश्न उनके लेख को कहीं अधिक दूर तक ले जा सकता था.
प्लेटो-संबंधी लेख को लेकर भी मुझे कुछ ऐसी ही अनुभूति हुई. उसकी शुरुआत और उसके द्वारा खोले गए प्रश्न पाठक में बड़ी उम्मीद जगाते हैं. प्लेटो का संदर्भ आते ही ज्ञान और सत्ता, दार्शनिक और शासक, भीड़ और विवेक, स्वतंत्रता और अनुशासन तथा आदर्श राज्य और वास्तविक मनुष्य के बीच का तनाव एक बड़े दार्शनिक कैनवस पर खुल सकता था. रोहिणी अग्रवाल के पास अपने पूरे विमर्श—सत्ता-संरचना, व्यक्ति, बहुसंख्यक, अनुशासन और हाशिए—को वहाँ एक गहरे दार्शनिक तल पर जोड़ देने की संभावना थी. लेख उस संभावना की झलक देता है, पाठक को आश्वस्त भी करता है कि अब कोई बड़ा निष्कर्ष सामने आएगा, लेकिन मेरी पाठकीय अपेक्षा में वह संभावना अंत तक उसी घनत्व में पूरी नहीं हो पाती. शायद इसी अधूरेपन के कारण वह लेख मुझे थोड़ा निराश करता है.
अब मुझे यहीं उनकी अंतर्दृष्टि का वह दूसरा सिरा दिखता है जो हाशिए के समाज से जुड़े उपन्यासों को पढ़ने की उनकी कसौटी बन जाता है. राष्ट्र, संस्कृति, सत्ता, अनुशासन, बहुसंख्यक की कल्पना और व्यक्ति के विस्थापन को वे एक-दूसरे से अलग नहीं देखतीं. किसी भी बड़े सांस्कृतिक आख्यान के सामने उनका प्रश्न है—उसमें मनुष्य कहाँ है? उसकी स्वतंत्रता कहाँ है? उसका अपना विवेक कहाँ है? उसकी असहमति के लिए कितनी जगह है? और जो इस निर्मित ‘राष्ट्र’ या ‘समाज’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता, उसका क्या होता है? इस अर्थ में ‘हाशिया’ इस पुस्तक में केवल सामाजिक श्रेणी नहीं, बल्कि सत्ता और संस्कृति द्वारा निर्मित एक स्थिति है.
रोहिणी अग्रवाल के स्त्री-विमर्श को इसी पृष्ठभूमि में समझने की कोशिश करें तो हम पाएँगे कि वे यह काम काफी सूक्ष्म तरीके से करती हैं. शिवमूर्ति की स्त्री-दृष्टि के बरक्स वे शिवेन्द्र और अमित ओहलाण की दृष्टि को अपने परीक्षण की विषय-वस्तु बनाती हैं. शिवमूर्ति के लेखन को वे केवल सहानुभूति के आधार पर नहीं पढ़तीं; वहाँ यह भी देखती हैं कि प्रगतिशीलता की घोषित मुद्रा के भीतर पुरुष-दृष्टि किस तरह बची रह जाती है. ‘कुच्ची का कानून’ के संदर्भ में उनकी आपत्ति इसीलिए अधिक तीखी हो जाती है कि सामाजिक सरोकारों की बहस के भीतर कामुकता और लम्पटता की ऐसी अन्तर्धारा उपस्थित हो सकती है जो एक ओर लेखक को स्त्री-संवेदी दिखाए और दूसरी ओर पितृसत्ता से अनुकूलित पाठक को स्त्री-देह का उपभोग भी उपलब्ध कराए.
“शिवमूर्ति के यहाँ थोड़ी-सी सहानुभूति और ढेर सी शोषणपरक पीड़ा, थोड़ा-सा संघर्ष और ढेर सारी विवशता है.”
ऐसे स्त्री पात्रों को मेल-गेज़ से दिखाते हुए भी लेखक प्रगतिशील बने रहने का दावा कर सकता है. ऐसे पात्र पुरुषसत्ता को ही संबोधित हैं; वे मुक्ति का पाठ न पढ़ सकते हैं, न पढ़ा सकते हैं. यहाँ रोहिणी अग्रवाल की आलोचना की धार इसलिए विश्वसनीय लगती है कि वे रचना की घोषित वैचारिकी से प्रभावित होकर उसके भीतर की दृष्टि को माफ नहीं करतीं.
शिवेन्द्र और अमित ओहलाण की कृतियों—‘चंचला चोर’ और ‘मेरा यार मरजिया’—की चर्चा करते हुए वे इन युवा लेखकों की स्त्री-दृष्टि की प्रशंसा करती हैं और वह क्यों करती हैं, वह दृष्टव्य है. दोनों रचनाएँ स्त्री को केवल सहानुभूति की वस्तु बनाकर नहीं रखतीं; पुरुष को ही अपने समय और पितृसत्ता के अपराध-बोध के सामने खड़ा करती हैं. इस कंट्रॉस्ट में आलोचना की पद्धति भी लगे हाथ मिल जाती है:
“यह संयोग नहीं कि मुक्तिकामी उड़ान भरते ये दोनों उपन्यास ‘चंचला चोर’ और ‘मेरा यार मरजिया’ विखंडन को समाज-मनोविज्ञान के विश्लेषण का क्रिएटिव टूल बनाते हैं. विखंडन यानी समय का क्रिटीक. विखंडन समय की गोद में बैठे बहुत से सक्रिय सत्ता-उपकेन्द्रों की पहचान भर नहीं है, बल्कि शक्ति और अर्थ के निर्माण में इनकी अन्तर्क्रियात्मक भागीदारी को भी देखता है.”
रोहिणी अग्रवाल लेखक के कद और उसके साथ अपने संबंधों को शायद कहीं भी कृति के मूल्यांकन का क्राइटेरिया नहीं बनातीं; कृति के चयन में वह हो सकता है. जब वे स्त्री-विषयक संदर्भों की बात कर रही होती हैं तो भी उनकी संवेदनशीलता उनकी वैचारिक प्रखरता के आड़े नहीं आती. जयश्री रॉय और मृदुला गर्ग की रचनाशीलता की तुलना में उनके मानदंड उतनी ही प्रखरता से सक्रिय हैं. जयश्री के संदर्भ में वे कहती हैं कि प्रेम की मांसलता प्रगीति की सघनता में तो गुँथती है, पर अपने किरदारों से विलग होकर किसी जज्बे या मुक्ति का रचनात्मक रूप नहीं ले पाती. इसके बरअक्स मृदुला गर्ग की वह दृष्टि उन्हें अधिक सार्थक लगती है जहाँ ‘बलिदान के बाद प्रेम प्रेम नहीं रहता, परोपकार बन जाता है.’
आलोचक रोहिणी अग्रवाल के पास एक ऐसी दृष्टि है जिसके केंद्र में रचना है और मूल्यांकन के लिए सभ्यता को कुछ कदम आगे ले जाने की जिद भरी साफ निगाह. इसलिए पारिस्थितिकी संरक्षण संबंधी लेखन पर उनका अध्याय भी केवल ‘विषय’ की प्रशंसा नहीं करता. वहाँ ज्ञान-विज्ञान की दूसरी शाखाओं से साहित्य के संबंध की चर्चा है और उससे अंतर का विशद पर्यवेक्षण भी. वे साहित्य को दायित्व मानती हैं—ज्ञान-विज्ञान से उसका आदान-परक रिश्ता स्वीकार करते हुए भी साहित्य को उच्चतर दायित्व देती हैं कि वह वैचारिक गहनता और संश्लिष्ट संवेदना को विन्यस्त करके दर्शन के स्वरूप तक ऊपर उठ सके.
उनके यहाँ पाठक की इकाई भी छोटी नहीं है. वह लोभी पाठक भर न रहे; सृजन का सहभागी बने, परिवर्तन का कारक बने. शायद इसी कारण जहाँ लेख अपेक्षित ऊँचाई तक पहुँचता है वहाँ वह पाठक को सचमुच अपनी जमीन से उठाता है, और जहाँ कोई संभावना अधूरी रह जाती है—जैसे मुझे ‘How Democracies Die’ या प्लेटो-संबंधी लेख में लगा—वहाँ वही पाठ-पद्धति पाठक को आलोचक से असहमत होने का अधिकार भी देती है. मेरे लिए इस पुस्तक का मूल्य इसी द्वंद्व में है.
आदिवासी समाज पर लिखे गए उपन्यासों के संदर्भ में उनका मौलिक सवाल केवल इतना नहीं है कि आदिवासी समाज को साहित्य में जगह मिली या नहीं. सवाल है—किसने उसे देखा? किस दृष्टि से देखा? और क्या वह देखने वाला स्वयं सत्ता-संरचना के बाहर खड़ा है? श्रीप्रकाश मिश्र, राकेश कुमार सिंह, प्रतिभा राय, रणेन्द्र, महाश्वेता देवी आदि के उपन्यासों के सहारे वे यह परखती हैं कि किस रचनाकार ने आदिवासी अस्मिता को मानवीय गरिमा और विशिष्टता दे पाने में सफलता अर्जित की है और किस हद तक. महाश्वेता देवी नायक तलाशती हैं तो प्रतिभा राय अपने संभ्रांत चरित्र को विलोपित करके पूरे आदिवासी समाज को परिवर्तन की प्रक्रिया का सहभागी बनाती हैं. उद्धारक की भूमिका में बैठकर दायित्व समाप्त नहीं हो जाता.
किसी भी एकरेखीय विचार के विरुद्ध रोहिणी अग्रवाल की सावधानी यहाँ भी दिखाई देती है. वे न तो ‘विकास’ को अपने आप में खलनायक मानती हैं और न ‘परंपरा’ को अपने आप में पवित्र. सवाल फिर वही है—किसके लिए विकास? किसकी कीमत पर विकास? किसकी आवाज़ के साथ विकास? यही दृष्टि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रश्न को आदिवासी विमर्श से जोड़ देती है.
झोंपड़पट्टी की समस्याओं को केन्द्र बनाकर लिखे गए उपन्यासों पर वे अपनी वेधक दृष्टि डालना नहीं भूलतीं और न ही यह चेताना कि साहित्य समाजशास्त्रीय अध्ययन से क्यों और कितना विलग है:
“समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण-अध्ययन समस्याओं को नंगी आँख से देखने का नैतिक साहस जरूर देते हैं किन्तु अपनी ठोस (ठस्स) तथ्यपरकता के कारण समस्या को थ्री-डाइमेंशन में देख-विश्लेषित नहीं कर पाते.”
तीसरे आयाम यानी साहित्यिक कल्पनाशीलता और प्रभावशीलता के अभाव को वे बहुत महत्त्वपूर्ण मानती हैं क्योंकि उसके बिना मानवीय तन्तु हिलते नहीं, चेतना आंदोलित नहीं होती और वह परिवर्तन का कारक नहीं बन पाती. संलग्न हुए बिना लेखन कोरा घोषणापत्र बन सकता है, परिवर्तन का दस्तावेज़ नहीं. कथाकार संजीव और अखिलेश के उपन्यासों पर भी वे मजबूत और कमजोर बिंदुओं को इसी डिसपैशनेट ढंग से देखती हैं.
हिजड़ा या क्वीयर समाज पर उनका लेखन एक अलग ही ऊँचाई और औदात्य पाता हुआ दिखता है. जूडिथ बटलर की ‘परफॉर्मेटिविटी’ अवधारणा की सीमा बताते-बताते वे भारतीय लेखन का वैशिष्ट्य और चुनौती भी बताती हैं. मनुष्य को लैंगिक श्रेणियों में बदलकर ही देख पाने की सांस्कृतिक विवशता को रेखांकित करते हुए चित्रा मुद्गल के कंट्रॉस्ट में किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी का लेखन रखती हैं. यहाँ प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है; प्रतिनिधित्व की प्रकृति असली प्रश्न है.
क्वीयर व्यक्ति साहित्य में आया—यह पर्याप्त नहीं. वह किस रूप में आया? क्या वह केवल देह है? केवल यौनिकता? केवल पीड़ा? केवल सामाजिक बहिष्कार का प्रतीक? या वह ऐसा मनुष्य है जिसके भीतर प्रेम, महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या, स्वप्न, हास्य, विवेक, राजनीति और असहमति—सब कुछ मौजूद है? यही प्रश्न उनके आलोचना-कर्म को ‘प्रतिनिधित्व’ की नैतिक संतुष्टि से आगे ले जाता है.
अंत में, इन तमाम रचनाओं को पढ़ते हुए पुस्तक का सबसे बड़ा प्रश्न लेखक कौन है या कौन-सा उपन्यास बेहतर है, इससे कहीं आगे जाता है. रोहिणी अग्रवाल रचना और रचनाकार के नाभिक में छिपी संवेदनशीलताओं और तर्कों को पकड़ती हैं और साथ ही सत्ता की सूक्ष्मतम संरचनाओं को भी. जहाँ वे टेक्स्ट को उसके अपने अंतर्विरोधों के बीच घेरती हैं, वहाँ उनकी आलोचना असाधारण रूप से समर्थ है. लेकिन इसी कारण जहाँ वे किसी स्थापित वैचारिक फ्रेम—विशेषकर उदार लोकतांत्रिक फ्रेम—को पर्याप्त कठोरता से नहीं जाँचतीं, वहाँ कमी दिखाई देती है.
इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे ई. एम. फोर्स्टर की ‘The Aspects of the Novel’ की याद आई, लेकिन शायद उससे भी अधिक यह अनुभव रहा कि अच्छी आलोचना पाठक से सहमति की माँग नहीं करती. वह उसे इतनी जमीन देती है कि वह आलोचक की उपलब्धि को स्वीकार करते हुए उससे असहमत भी हो सके. रोहिणी अग्रवाल की यह पुस्तक मुझे कई जगह समृद्ध करती है, कई जगह चुनौती देती है और कुछ जगह इसलिए अधूरी लगती है कि वहाँ उसने स्वयं अपनी पैदा की हुई उम्मीद पूरी नहीं की.
मेरे लिए किसी आलोचना-पुस्तक की इससे बड़ी सार्थकता शायद यही है कि पढ़ना समाप्त होने के बाद भी उसके साथ बहस समाप्त न हो.
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महेश मिश्र सांस्कृतिक मामलों के जानकार और टिप्पणीकार हैं. |




रोहिणी जी एक प्रतिबद्ध और दृष्टि सम्पन्न आलोचक है। इस कृति के लिए बहुत बहुत बधाई।