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Home » डेटा नॉट फाउंड : विजयशंकर चतुर्वेदी

डेटा नॉट फाउंड : विजयशंकर चतुर्वेदी

by arun dev
June 18, 2026
in कथा
Reading Time: 8 mins read
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डेटा नॉट फाउंड : विजयशंकर चतुर्वेदी
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डेटा नॉट फाउंड
विजयशंकर चतुर्वेदी

 

जब शहर का आख़िरी पेड़ काटा गया. किसी ने शोर नहीं मचाया. पालतू जानवर तक नहीं बचे थे. उस दिन लोग सरकारी सत्यापन केंद्रों की लंबी लाइनों में खड़े थे. बाहर लगातार ठंडी फुहार पड़ रही थी, और कतार टस से मस नहीं हो रही थीं. हर आदमी अपने हाथ में कोई न कोई फ़ाइल लिए हुए था, जिसमें उसकी पूरी पहचान बंद थी. जन्म प्रमाणपत्र, समग्र आईडी, वोटर आईडी, बैंक पासबुक, राशन कार्ड, पैन कार्ड, बिजली का बिल, रेटिना स्कैन की रसीद, और एक नया सरकारी फ़ॉर्म, जिसके ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था:

“अस्तित्व प्रमाणित करने का प्रपत्र.”

शहर के ठीक बीचोंबीच लगी विशाल स्क्रीन पर मुस्कुराते चेहरे लगातार बदल रहे थे. हर संतुष्ट चेहरे के नीचे एक ही वाक्य बार-बार चमक उठता था:

“जो सत्यापित है, वही सुरक्षित है.”

भीड़ में खड़ा ईशान बार-बार अपनी जेब टटोल रहा था. मोबाइल वहीं था. फिर भी उसे अलग किस्म की बेचैनी हो रही थी. उसने तीसरी बार बटन दबाई. उसका नागरिक विश्वसनीयता स्कोर अब भी हरे रंग में था.  91.15, उसने राहत की साँस ली.

पिछले महीने सिर्फ़ एक डेटा-मिसमैच की वजह से उसका स्कोर तीन अंक गिर गया था. तीन दिन तक उसका मेट्रो एक्सेस बंद रहा था और दफ़्तर में अलग से सत्यापन कराना पड़ा था. वह अपमान अभी तक उसके भीतर फँसा हुआ था.

लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी थी. ईशान बार-बार अपनी फ़ाइल खोलकर देख लेता. सब कुछ मौजूद था. फिर भी उसे डर लग रहा था कि कहीं सिस्टम अचानक कुछ और न माँग बैठे.

उसने अनायास मोबाइल देखा. कोई नया संदेश नहीं था. लेकिन तभी डिस्प्ले काँपा: “आपकी चिंता का स्तर सामान्य से अधिक है. घबराइए नहीं. आपके क्रेडेंशियल सुरक्षित हैं.” ईशान ने तुरंत मोबाइल बंद कर दिया. उसे पल भर के लिए शर्म महसूस हुई. मानो उसकी घबराहट सबके सामने खुल गई हो.

तभी उसके पीछे खड़े एक सफ़ेद दाढ़ी वाले बूढ़े ने फुसफुसाकर पूछा, “पहली बार आए हो?”

ईशान ने मुड़कर देखा. बूढ़े की आँखें इस कोलाहल में भी असामान्य रूप से शांत थीं. उसने जवाब दिया, “हाँ. क्यों?”

बूढ़े ने कहा, “डरो मत.”

“मैं डर नहीं रहा हूँ.”

बूढ़ा मुस्कुराया, “यहाँ आने वाला हर आदमी शुरुआत में यही कहता है.”

लाइन थोड़ी और आगे बढ़ी. सामने काँच की ऊँची दीवारों वाला एक भव्य भवन था. उसके मुख्य दरवाज़े के ऊपर चमकते अक्षरों में लिखा था: “नागरिक सुविधा एवं पुनर्पहचान केंद्र.”

ईशान को याद आया— मात्र साल भर पहले तक यह जगह इस आधुनिक शहर का सार्वजनिक पुस्तकालय हुआ करती थी. यहीं बैठकर उसने पहली बार प्रेमचंद और फ़ैज़ को पढ़ा था. अब वहाँ कोई किताब नहीं थी; सिर्फ़ मशीनें थीं और मशीनों के खातों में दर्ज़ बेबस आदमी.

तभी सामने खड़ी एक औरत काउंटर पर अचानक ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी,  “मेरे पति मर चुके हैं…”

काउंटर के भीतर से एक सपाट, ठंडी आवाज़ आई, “सिस्टम में मृत्यु सत्यापन अपडेट नहीं है.”

“लेकिन उनका दाह-संस्कार मैंने ख़ुद अपने हाथों से किया है…”

“सिस्टम में यह नागरिक अभी भी पूरी तरह सक्रिय है.”

औरत पत्थर बनी उसे देखती रही. फिर आँसू पोंछते हुए बोली, “तो क्या… वो अभी भी ज़िंदा हैं?”

इस बार काउंटर के भीतर बैठे लड़के ने अपना सिर ऊपर उठाया. उसकी आँखों में गहरी थकान और शून्यता थी. उसने कहा, “मैडम, सिस्टम से बाहर कोई आदमी न पूरी तरह जीवित होता है… और न ही मृत.”

भीड़ में हँसी की पतली लहर उठी, लेकिन वह लोगों के गले में ही अटक कर रह गई. ईशान ने घबराकर अपना मोबाइल देखा. तुरंत एक नोटिफ़िकेशन उभरा: “आप पिछले नौ मिनट से असामान्य तनाव में हैं. क्या आप मानसिक संतुलन सहायता सेवा सक्रिय करना चाहते हैं?” यह देखकर उसकी उँगलियाँ काँप गईं.

पीछे खड़ा बूढ़ा फिर मुस्कुराया, “अब समझे?”

“क्या?” ईशान झुँझला उठा.

“ये डिवाइस सिर्फ़ तुम्हारी बातें नहीं सुनता.” बूढ़ा थोड़ा और करीब आ गया, “ये तुम्हारे भीतर के भय को भी रिकॉर्ड करता है.”

 

 

 

बाहर अब बारिश तेज़ हो गई थी. सड़क पर लगे काले डोम कैमरे लगातार गोल-गोल घूम रहे थे. उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो पूरा शहर अब इंसानी आँखों से नहीं, बल्कि केवल लेंसों से देखता हो. तभी ईशान की जेब में मोबाइल फिर कंपन करने लगा: “आपने पिछले कुछ मिनटों में तीन बार कैमरे की दिशा में देखने से परहेज़ किया. क्या आपको कोई समस्या है?” ईशान ने तुरंत मोबाइल को जेब में गहराई से डाल लिया. उसने रूमाल से चेहरा पोंछते हुए सोचा—वह अकेला नहीं है; शायद कोई मशीन सचमुच हर पल नज़र बनाए हुए है.

जब ईशान अपनी पुरानी इमारत के कमरे तक पहुँचा, तब रात के ग्यारह बज चुके थे. यह वही पुरानी इमारत थी जहाँ कभी लोग शाम को बालकनियों में खड़े होकर खुलकर हँसते थे. अब सारी बालकनियाँ सील थीं. खिड़कियों के परदे मोटे हो चुके थे. आवाज़ें बेहद धीमी थीं और हँसी तो जैसे इस शहर से ही ग़ायब हो चुकी थी. कमरे में घुसते ही उसने मोबाइल मेज़ पर रख दिया. उसी समय स्क्रीन बिना छुए अपने आप जल उठी: “आप आज सामान्य से कम सामाजिक रहे. क्या आप हमारे संवाद सुधार कार्यक्रम में शामिल होना चाहेंगे?”

ईशान ने चिढ़कर मोबाइल को उल्टा रख दिया. चंद पलों बाद उसमें फिर एक तीव्र कंपन हुआ: “डिवाइस कवरेज बाधित. कृपया डिवाइस को खुला और सीधा रखें.” उसने अपनी ज़िंदगी में पहली बार उस मोबाइल को इस तरह देखा, जैसे वह कोई निर्जीव वस्तु नहीं… बल्कि कोई चालाक और हिंसक जीव हो. तभी उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई. तीन बार… फिर दो बार… फिर एक बार . उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा.

“कौन है?”

कुछ देर तक बाहर गहरी चुप्पी रही. फिर एक दबी हुई आवाज़ आई, “पहले अपना मोबाइल बंद करो.”

ईशान का दिमाग़ भन्ना गया. उसने मोबाइल को तकिए के नीचे दबाया और धड़कते दिल से दरवाज़ा खोला. बाहर वही सफ़ेद दाढ़ी वाला बूढ़ा खड़ा था. वह बिना पूछे सीधे भीतर आ गया. कमरे में घुसते ही उसने चारों तरफ़ अपनी खोजी नज़र दौड़ाई— दीवार, पंखा, और वॉशबेसिन के ऊपर लगा आईना. फिर वह बहुत धीमे स्वर में बोला, “इस आईने को तुरंत ढँक दो.”

“क्यों? क्या हुआ?”

“सरकार की नई स्कीम आई है.”

“कौन-सी स्कीम?”

“रिफ़्लेक्टिव मॉनिटरिंग.”

ईशान उसकी बात पर अचानक हँस पड़ा, “आप मज़ाक़ कर रहे हैं ना?”

बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया. उसने अपनी जेब से एक काला कपड़ा निकाला और ख़ुद आगे बढ़कर आईने पर डाल दिया. कमरा अचानक और छोटा तथा दमघोंटू लगने लगा.

“आप हैं कौन?” ईशान ने आख़िरकार पूछ ही लिया.

बूढ़ा खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया. नीचे खाली सड़क पर काले कपड़े वाले कुछ लोग एक व्यक्ति को घसीटते हुए ले जा रहे थे. उसने अपना राज खोला, “मैं पहले इसी सिस्टम के भीतर था.”

“मतलब?”

“निगरानी विभाग.”

कमरे में भारीपन आ गया. बूढ़ा धीमे स्वर में फिर बोला, “तुम्हें पता है अब इस देश में सबसे ख़तरनाक आदमी कौन है?”

ईशान चुप रहा.

“वही… जो अकेले बैठकर सोचता है.”

तभी तकिए के नीचे रखा मोबाइल अचानक तेज़ रोशनी के साथ चमका: “चेतावनी! कमरे में असामान्य वार्तालाप पैटर्न दर्ज़ किया गया है.” दोनों आदमी काठ की तरह स्थिर हो गए. मोबाइल की एआई आवाज़ फिर गूँजी: “अज्ञात उपस्थिति. कृपया आगंतुक का बायोमेट्रिक सत्यापन करें.”

बूढ़े की आँखों में पहली बार असुरक्षा दिखाई दी. उसने जासूसों के अंदाज़ में कहा, “अब यह सिर्फ़ सुनता नहीं है ईशान, कार्रवाई के लिए सही मौके का इंतज़ार भी करता है.”

और ठीक उसी क्षण, सड़क पर एक सरकारी जीप रुकी. पलक झपकते ही सीढ़ियों पर भारी पदचाप सुनाई देने लगी— ठक… ठक… ठक…. बूढ़े ने बिना वक्त गँवाए कमरे का मुख्य स्विच बंद कर दिया. मगर उस अँधेरे में भी तकिए के नीचे दबा मोबाइल जुगनू की तरह चमकता रहा. कदम अब तीसरी मंज़िल तक आ चुके थे.

बाहर से एक सपाट, रोबोटिक आवाज़ आई, “नागरिक ईशान. आपके पंजीकृत डिवाइस ने असामान्य मौन दर्ज़ किया है. कृपया तुरंत दरवाज़ा खोलें. यह कार्रवाई आपकी सुविधा और सुरक्षा के लिए है.”

तकिए के नीचे से मोबाइल बोलने लगा: “सहयोग करना हर नागरिक का प्राथमिक कर्तव्य है.” ईशान के हाथ-पैर काँपने लगे. तभी दरवाज़े पर एक हल्की इलेक्ट्रॉनिक बीप हुई और उसका स्मार्ट लॉक अपने आप खुल गया. उसकी रीढ़ में बर्फ़ उतर गई.

काले कपड़ों में तीन आदमी कमरे के भीतर दाखिल हुए. उनके चेहरे इतने साधारण और भावहीन थे कि उन्हें दोबारा याद नहीं रखा जा सकता था. उनमें से एक ने आगे बढ़कर ईशान का मोबाइल ढूँढ निकाला. दूसरे ने कमरे को स्कैन करना शुरू किया. तीसरा आईने के सामने जाकर रुका; उसने वह काला कपड़ा हटाया और अपने मोटे होठ हिलाए, “हूँ… पुराना मॉडल.” तभी उसकी तीखी नज़र कोने में दुबके बूढ़े पर पड़ी, “यह नागरिक कौन है?”

ईशान ने मुँह से एक बोल भी नहीं फूटा.

“आगंतुक इस परिसर के लिए सत्यापित नहीं है.”

अब ईशान ने झूठ बोलने का प्रयास किया, “ये… ये मेरे दूर के रिश्तेदार हैं.”

अधिकारी के हाथ में आ चुका मोबाइल उसी क्षण लाल होकर चमक उठा: “संभावित असत्य दर्ज़.” कमरे में मुर्दनगी छा गई. बूढ़ा अचानक हँसा— एक धीमी, टूटी हुई हँसी. तीनों अधिकारी झटके से उसकी तरफ़ मुड़े. बूढ़े ने उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “पहले सरकारें जीते-जागते आदमी से घबराती थीं… और आज आदमी अपने ही डेटा से काँपता है.”

एक अधिकारी ने तुरंत अपनी जेब से स्कैनर निकाला. उसकी तेज़ रोशनी बूढ़े के चेहरे पर पड़ी. स्कैनर अजीब तरह से बीप-बीप करने लगा: “रिकॉर्ड अनुपलब्ध. डेटा नॉट फाउंड.” तीनों अधिकारी बेहद असहज हो गए. दूसरे अधिकारी ने किसी मशीन की तरह बोलना शुरू किया—

“आपका नागरिक क्रमांक? आप आख़िरी बार ऑनलाइन कब थे?”
“पिछले बायोमेट्रिक सिंक का टाइमस्टैम्प बताइए.”
“क्या आपकी न्यूरल-प्रोफ़ाइल अभी भी केंद्रीय सर्वर से लिंक्ड है?”
“आपकी अंतिम लोकेशन-पिंग किस ज़ोन से दर्ज़ हुई थी?”
“क्या आपके पास वैध व्यवहार-स्कोर प्रमाणन है?” “

बूढ़े ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया. उसकी धँसी हुई आँखों में इस वक़्त एक अजीब, लगभग जंगली चमक तैर रही थी. शायद उसने काफी पहले डरना छोड़ दिया था. उसने स्थिर आवाज़ में जवाब दिया,

“जिस दिन मैंने इस कृत्रिम सिस्टम को छोड़कर अपनी आँखों से असली दुनिया को देखना शुरू किया था… उसी दिन से मैं तुम्हारे रिकॉर्डों से ग़ायब हूँ.”

 

 

 

 

अधिकारियों को क्या मालूम था कि जिस आदमी को वे “डेटा नॉट फाउंड” की शक्ल में देख रहे थे, वह इस डेटा-साम्राज्य का शिल्पकार रह चुका था. लोग उसे “आर्किटेक्ट” कहा करते थे. सबसे पहले उसीने प्रस्ताव रखा था कि मनुष्य की अस्थिर, भावुक और त्रुटिपूर्ण प्रवृत्तियों को डेटा के अनुशासन से नियंत्रित किया जा सकता है.

शुरुआत में सब कुछ अद्भुत लगा था. अपराध घट गए. दुर्घटनाएँ कम हो गईं. मशीनें लोगों को समय पर दवा लेने, सही भोजन करने, सही साथी चुनने और सही शब्द बोलने तक की सलाह देने लगीं. शहर पहले से अधिक शांत, अधिक व्यवस्थित और अधिक “सभ्य” दिखाई देने लगा.

लेकिन धीरे-धीरे आर्किटेक्ट ने पाया कि लोगों ने स्वयं निर्णय लेना बंद कर दिया था. बच्चे रास्ते याद नहीं रखते थे. रिश्ते एल्गोरिद्म आधारित संगतता स्कोर में बदल गए. माएँ बच्चों के रोने का अर्थ समझने के लिए स्क्रीन देखने लगी थीं. और आदमी अपने भीतर उठते दुःख को भी ऐप से सत्यापित करने लगा था.

फिर एक दिन उसकी पत्नी को हृदयाघात हुआ. मदद के लिए वह आपातकालीन नेटवर्क सक्रिय करता रहा, लेकिन केंद्रीय सिस्टम ने बार-बार एक ही जवाब दिया, “प्राथमिकता का निम्न स्तर.“ उसे समझ में आ चुका था कि सिस्टम अब वैसा नहीं रह गया, जैसा उसने बनाया था. कुछ “अधिक उत्पादक” नागरिकों को सेवाओं में वरीयता दी जा रही थी. अन्य विकल्प हटा दिए गए थे.

आख़िरकार उसकी आँखों के सामने ही पत्नी ने दम तोड़ा. आर्किटेक्ट पहली बार अपने ही बनाए सिस्टम से डर गया. उसे लगा जैसे उसने कोई अदृश्य कारागार बना दिया है, एक ऐसा चक्रव्यूह जिसमें पूरा समाज फँस चुका है… और अंततः वह स्वयं भी उसी में क़ैद हो गया था.

कई महीनों तक उसने भीतर रहकर सिस्टम बदलने की कोशिश की. लेकिन हर संशोधन, हर मानवीय हस्तक्षेप, हर नैतिक आपत्ति को एल्गोरिद्म “भावनात्मक त्रुटि” कहकर अस्वीकार कर देता.

तब एक रात उसने अपना नागरिक क्रमांक मिटा दिया. अपनी न्यूरल-आईडी तोड़ दी. और शहर के डिजिटल नक़्शे से हमेशा के लिए ग़ायब हो गया.

एक अधिकारी ने दूसरे के कान में कहा, “यह एक डेंजरस ऑफ़लाइन एलिमेंट है….” तीसरे ने तुरंत अपने कान के पास लगे कम्युनिकेटर को सक्रिय किया, “श्रीमान… हमें एक ‘अनलिंक्ड’ व्यक्ति मिला है…”

करीब आधे मिनट तक हेडक्वार्टर के निर्देश आते रहे, फिर उस अधिकारी का चेहरा और सपाट हो गया. उसने अपने साथियों से कहा, “कंट्रोल का आदेश है कि इन्हें हर हाल में हेडक्वार्टर पहुँचाना है. जीवित.”

ईशान इस पूरे रहस्य को समझ नहीं पा रहा था. बूढ़ा उसकी उलझन समझ कर ख़ुद ही बताने लगा, “इंसानों को क़ैद करने के लिए यह डिजिटल पिंजरा बनाया गया है.”

और ठीक उसी क्षण समूचे शहर की बिजली गुल हो गई. घने अँधेरे ने सबको घेर लिया. फिर दूर कहीं से एक दर्दनाक चीख़ सुनाई दी… फिर दूसरी… और देखते ही देखते शहर अजीब कोलाहल और आवाज़ों से भरने लगा. लोग इस अँधेरे के आदी नहीं रह गए थे, इसलिए वे बदहवास भाग रहे थे, चिल्ला रहे थे और अपने बंद पड़े मोबाइलों को झिंझोड़ रहे थे. चारों तरफ़ बस यही शोर था कि नेटवर्क कहाँ गया, और बिना निर्देशों के हम कैसे जीवित रहेंगे.

तीनों अधिकारी अब हेडक्वार्टर की रेंज से बाहर थे. किसी निर्देश की अनुपस्थिति में वे जल्दी-जल्दी बाहर निकल गए.

सड़क के बीचोंबीच खड़ा एक भ्रमित आदमी अपने मोबाइल को बार-बार चेहरे के सामने ला रहा था, मानो स्क्रीन फिर से जल उठेगी और उसे बताएगी कि किस गली में मुड़ना है. जब कुछ नहीं हुआ, तो वह काँपती आवाज़ में आसपास के लोगों से पूछने लगा, “मेरा मकान क्रमाँक क्या है?”

एक औरत फुटपाथ पर बैठ गई थी. उसकी गोद में रोता हुआ बच्चा था, लेकिन वह उसे चुप कराने के बजाय लगातार अपनी कलाई पर बँधे हेल्थ-बैंड को थपथपा रही थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि बच्चे को भूख लगी है, डर लगा है या बस उसे माँ की बाँहों की ज़रूरत है.

उधर लगभग दस साल का एक लड़का बंद दरवाज़े के सामने खड़ा रो रहा था. स्मार्ट-लॉक ने काम करना बंद कर दिया था. वह दरवाज़े को हाथ से धक्का देने की कोशिश तक नहीं कर रहा था. बस वॉइस-कमांड दोहरा रहा था— “ओपन होम. ओपन होम. ओपन होम…”

लेकिन आदिम अँधेरा किसी सर्वर से जुड़ा नहीं था.

 

 

 

बूढ़े ने आगे बढ़कर खिड़की के कपाट पूरी तरह खोल दिए. बाहर सारे कैमरे मृत पड़े थे. स्क्रीनें बुझ चुकी थीं. और कई महीनों में पहली बार आसमान के तारे साफ़ दिखाई दे रहे थे. नीचे सड़क पर लोग अँधेरे में भटक रहे थे. कुछ असहाय होकर रो रहे थे, तो कुछ बिल्कुल स्तब्ध खड़े थे; समझ ही नहीं आ रहा था कि स्क्रीन के निर्देशों के बिना उन्हें अपने पैरों का क्या करना चाहिए.

तभी दूर बस्तियों के किसी गहरे कोने से एक लंबी, फटी हुई और जंगली आवाज़ उठी. हुबहू भेड़ियों जैसी. लेकिन सब जानते थे कि कंक्रीट के इस शहर में कोई भेड़िया नहीं था.

ईशान का पूरा शरीर काँप उठा, “ये… ये आवाज़ कैसी है?”

बूढ़ा अँधेरे में मुस्कुराया, “बहुत समय से लोगों ने अपनी असली आवाज़ सुनी ही नहीं थी.”

उसी समय नीचे की सीढ़ियों पर फिर से भारी कदमों की धमक गूँजी. इस बार वे और तेज़ थे. बैकअप पावर सिस्टम को समय से पहले चालू किया जा चुका था. दूर आसमान में सुरक्षा ड्रोनों की लाल बत्तियाँ फिर से टिमटिमाने लगीं.

बूढ़ा तुरंत ईशान के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया. उसने उसके कंधे झिंझोड़े, “अब मेरी बात ध्यान से सुनो. अगर तुम इस पिंजरे से सचमुच हमेशा के लिए बचना चाहते हो… तो तुम्हें इस व्यवस्था से पूरी तरह ‘ऑफ़लाइन’ होना पड़ेगा.”

ईशान ने घबराकर पूछा, “अगर मैं मोबाइल से अपना सारा डेटा ही डिलीट कर दूँ तो?”

बूढ़ा हँसा, जैसे उसने संसार के सबसे बड़े भ्रम को अपने सामने खड़ा देख लिया हो. “तुम समझते हो कि तुम्हारा जीवन इस छोटे-से उपकरण में कैद है? नहीं. यह तो सिर्फ़ दरवाज़ा है. तुम्हारी परछाई तक उन विशाल सर्वरों की अंधेरी सुरंगों में हमेशा के लिए दर्ज़ हो चुकी है.”

ईशान के शरीर में सिहरन दौड़ गई, “मतलब… वे मेरे बारे में सब कुछ जानते हैं?”

बूढ़े की आवाज़ पत्थर की तरह ठंडी थी, “तुम्हारी हर साँस, हर कदम, हर संबंध का हिसाब उनके पास है. तुम्हें जेल में डालने के लिए उन्हें हथकड़ी की ज़रूरत नहीं. तुम्हारी इच्छाएँ, तुम्हारे डर, तुम्हारी पसंद, सबकी नक्शानवीसी हो चुकी है.”

ईशान ने अनायास अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं.

बूढ़ा आगे बोला, “वे तुम्हें गोली मारकर ख़त्म नहीं करेंगे. तुम्हारी पहचान मिटा देंगे. और एक दिन तुम इस दुनिया के बीच खड़े होकर भी साबित नहीं कर पाओगे कि तुम मौजूद हो.”

ईशान बूढ़े की ओर मुँह बाए देखता रहा.

“अगर सचमुच आज़ाद होना है,” बूढ़े ने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “तो उस भय से डिस्कनेक्ट होना होगा, जो उन्होंने तुम्हारे भीतर इंस्टॉल कर दिया है.”

ईशान को पहली बार समझ आया कि क़ैद हमेशा सलाखों की नहीं होती. उसके चारों ओर खड़ी सबसे मज़बूत दीवारें उसकी अपनी आदतों और आशंकाओं से बनी थीं.

बूढ़ा उसके कान के पास झुका और फुसफुसाया, “मोबाइल फेंक दो. अपनी इस थोपी हुई पहचान से बाहर निकलो. और सबसे ज़रूरी… अपने भीतर के भय को जड़ से उखाड़ फेंको.”

ईशान की नज़र मेज़ पर छोड़े गए अपने मोबाइल पर गई. उसके भीतर मशीनी आवाज़ जीवित हो उठी थी: “चेतावनी! डिवाइस निष्क्रिय करना एक गंभीर राष्ट्र-विरोधी गतिविधि.”

ईशान उस चमकते यंत्र को देखता रहा. उसकी हथेली पसीने से तरबतर चुकी थी. तभी स्क्रीन ने अचानक रंग बदला. संदेश उभरा— “आपका नागरिक विश्वसनीयता स्कोर अस्थायी समीक्षा में भेजा गया है.” हरे रंग का 91.15 अब पीले में बदल चुका था — 63.04.

फिर एक के बाद एक संदेश चमकने लगे:

“आपका बैंक खाता निगरानी श्रेणी में रखा गया है.”

“आप फिलहाल अपनी कुल जमा राशि का केवल 10% ही निकाल सकते हैं.”

ईशान ने घबराकर अपना बैंक ऐप खोला. स्क्रीन पर उपलब्ध राशि अब भी वही थी…लेकिन उसके नीचे लाल अक्षरों में लिखा था,  “निकासी सीमा लागू.”

उसे याद था कि अगले हफ़्ते घर का किराया कटना था, और स्वास्थ्य बीमा की किस्त भी.

तभी कुछ और संदेश चमके: “यात्रा-अनुमति अस्थायी रूप से निलंबित.”

“सामाजिक संपर्क-मानचित्र पुनर्मूल्यांकन के अधीन.”

ईशान ने तुरंत एक परिचित नाम पर क्लिक किया. लाल स्क्रीन बोली— “अनधिकृत संपर्क.”

“चेतावनी: व्यवहार-पैटर्न में विचलन दर्ज़.”

“स्कोर 32.57, आवासीय अधिकार सीमित.”

ईशान ने अविश्वास से बूढ़े की तरफ़ देखा, “ये… ये लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

बूढ़ा बोला, “वे अब स्कोर में क़ैद करते हैं.”

ईशान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई. उसे अपने पिता की आख़िरी रात याद आई. तब वह बहुत छोटा था. दो अधिकारी ठीक इसी तरह घर आए थे. उनके चेहरों पर कोई क्रोध नहीं, कोई भाव नहीं, बस ठंडी प्रशासनिक तत्परता थी.

“बिजली के स्मार्ट मीटर में असामान्य व्यवहार दर्ज़ हुआ है. आपकी गतिविधियाँ देर रात तक चलती हैं.”
“कृपया सत्यापन हेतु हमारे साथ चलिए.”

उसके पिता बार-बार सिर्फ़ एक बात कह रहे थे. “मैंने कुछ ग़लत नहीं किया…मैं सिर्फ़ पढ़ता रहता हूँ.”

लेकिन अधिकारियों की आँखों में वह आदमी नहीं, सिर्फ़ एक त्रुटिपूर्ण रिकॉर्ड था.

जब वे उन्हें ले जा रहे थे, तब उसके पिता ने एक क्षण के लिए पीछे मुड़कर ईशान को देखा था. वह न डर था, न ग़ुस्सा. बस एक असहाय कोशिश, जैसे कोई अपने बेटे का चेहरा आख़िरी बार याद कर लेना चाहता हो.

उसके बाद वह कभी लौटकर नहीं आए. अगले दिन घर की केंद्रीय स्क्रीन पर सिर्फ़ एक पंक्ति चमकी थी, “सुरक्षा असंगति के कारण नागरिक प्रोफ़ाइल निष्कासित कर दी गई है.”

ईशान को वह पुनर्पहचान केंद्र भी याद आया, जहाँ कभी पुस्तकालय हुआ करता था… और वह लाचार औरत जिसका मृत पति सिस्टम के खातों में ज़बरदस्ती जीवित रखा गया था.

ईशान ने अपने पिता को सिस्टम में ढूँढने की आख़िरी कोशिश की. काँपते हाथों से उसने मोबाइल में उनका नागरिक क्रमांक, पुरानी पहचान-सूचनाएँ और बायोमेट्रिक कोड डाले. स्क्रीन कुछ पर कुछ देर तक प्रोसेसिंग का पहिया घूमता रहा. फिर एक नामुराद पंक्ति उभरी.  “डेटा नॉट फाउंड.”

ईशान को पहली बार महसूस हुआ कि इस शहर में आदमी का मरना भी इतना भयावह नहीं था…

बाहर ड्रोनों की गड़गड़ाहट अब और पास आने लगी थी. बूढ़े ने कड़े स्वर में कहा, “वक़्त नहीं है…!”

ईशान ने आगे बढ़कर मोबाइल को अपने हाथ में उठा लिया. उसकी हथेली बुरी तरह काँप रही थी. एक संदेश पढ़ने में आया— “आपकी स्वतंत्रता हमारे पास सुरक्षित है.”

उसने बिना एक पल गँवाए खिड़की खोल दी. नीचे अधिकांश शहर अब भी अँधेरे में डूबा था. उसकी उँगलियाँ मोबाइल पर जमी रहीं. जैसे वह कोई डिवाइस नहीं… अपनी पूरी दर्ज़ की गई ज़िंदगी फेंकने जा रहा हो. कुछ ही क्षण बाद नीचे से एक ‘टप’ की आवाज़ लौटी. फिर सन्नाटा.

उसी सन्नाटे में दूर कहीं से एक लंबी, फटी हुई हुंकार उठी. फिर दूसरी. फिर तीसरी.

अँधेरे में नीचे कहीं उसका मोबाइल पड़ा था.  उसे नहीं मालूम था कि वह सचमुच बंद हो चुका है…

या अब भी चुपचाप सब कुछ रिकॉर्ड कर रहा है.

 

विजयशंकर चतुर्वेदी
15 जून, 1970 (सतना, मध्यप्रदेश)
पत्रकार-लेखक

कविता संग्रह ‘पृथ्वी के लिए तो रुको’ राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित.
vijaysshankarchatturvedi@gmail.com

Tags: 20262026 कहानीडिस्टोपियन कथा-साहित्यडेटा नॉट फाउंडविजयशंकर चतुर्वेदी
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उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन : अजय कुमार यादव
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उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन : अजय कुमार यादव

Comments 8

  1. मनोज मोहन says:
    4 weeks ago

    हमारी निजता बाधित है, हमारे बिहेवियर पैटर्न को प्रभावित किया जा रहा है…सब कुछ को एक-सा कह/कर देना… यह सब अब इतना सामान्य है कि लोगों का ध्यान नहीं जाता…यह कल का सच नहीं है…यह तो आज का सच है…
    लोग पत्थर दिल हो रहे हैं
    पत्थरों जैसे चेहरे
    हरकतें एक-सी
    विजयशंकर चतुर्वेदी जी को धन्यवाद

    Reply
  2. ऐश्वर्य मोहन गहराना says:
    4 weeks ago

    जिस समय मुझे विभिन्न रिटर्न फ़ाइल करने के लिए हर तिमाही में लगभग 7-8 बार “एक विशेष संख्या” का प्रयोग करते हुए “एकल-प्रयोग-कूटांक” प्रयोग करना होता है, मैं अक्सर इस प्रकार के भयभीत होता रहा हूँ। पिछली बार मैं संबन्धित मोबाइल रीचार्ज करना भूल गया था तब यह एकल-प्रयोग-कूटांक समय पर प्राप्त नहीं हुआ, इस कारण रिटर्न फ़ाइल करने में देर हुई और पेनल्टी देनी पड़ी थी। मेरे जैसे कुछ करोड़ लोग यह अब विकल्प हीनता के कारण ही नहीं बल्कि आदतन कर रहे है।
    आज वस्तु-सेवा-कर आयकर, आदि आम हो चुके रिटर्न भरते हुए पर हम में से हर कोई अपने आप को सुविधा-पूर्वक संख्या में बदल चुका है। अब विद्यालय छात्रों से नाम, पिता का नाम पता नहीं पूछते एक संख्या ही पूछते हैं।
    कहना यह है कहानी “डाटा नॉट फाउंड” नॉन-फ़िक्शन में कल्पना का बघार भर है। फिर, मुझे इतना क्यों डरा रहीं है?

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    • रोहिणी अग्रवाल says:
      4 weeks ago

      तकनीककेंद्रित अमानुषिक सभ्यता के निस्पंद चेहरे का बखान करती कहानी। मानो हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी के इरीटेटिंग सच को पूरी ताकत से बयान करती हो।
      लेकिन डिस्टोपिया भयावहता या विकृत-विद्रूप राजनीतिक अधियनायकवादी बर्बरता का ब्यौरा मात्र नहीं। वह व्यक्ति, समाज और समय के राजनीतिक-सांस्कृतिक मनोविज्ञान में गहरी पैठ बनाकर इनके अंतर्संबंधों को जांचने का विवेक है।
      जनता की असहायता क्या सिर्फ सिस्टम की निरंकुशता है? या सुविधाभोगी अवसरवादी आत्मकेंद्रित जनता का कछुआ धर्म भी इसमें गहरी भूमिका निभाता है?
      कहानी का बूढ़ा इसका जवाब है। पर वह कहानी का केंद्र या आंख नहीं। वह 1984 उपन्यास के ओ’ब्रायन और विंस्टन दोनों के परस्पर विरोधी (फिर भी परस्पर आश्रित) चरित्र की बेमिसाल गूंज बन सकता था यदि कहानी डर के अभिधात्मक ब्यौरे देने की बजाय उसके मनोविश्लेषणात्मक द्वंद्व को पकड़ती। डिस्टोपिया संवेदना की आँख में बहुत से कैमरे उगा कर एक ऐसी मशीनी जांच से तैयार समय का ब्लूप्रिट है जो मनुष्य की विकलता और संघर्ष, हताशा और जिजीविषा के परस्परविरोधी युग्म को ठीक एक ही पल में जीवित कर देता है।
      फिर भी नये आस्वाद की कहानी तो यह है ही। बधाई।

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    • विकास नैनवाल says:
      2 weeks ago

      बेहतरीन कहानी।तकनीक हमें सुविधा देने के नाम पर पंगु बनाकर क़ैद करते जा रही है। कहानी संभावित भविष्य को दर्शाने में पूरी तरह सफल होती है। हाँ, बूढ़े का ईशान के पास आने का कोई कारण नहीं दिया गया। वो दिया होता तो और अच्छा होता।

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  3. ऐश्वर्य मोहन गहराना says:
    4 weeks ago

    इस कहानी को पढ़ते हुए, मुझे मोहनदास बहुत याद आए। वह वाले नहीं जो गाँधी कहलाते हैं, एक और हैं। मेरे मन में उनके प्रति बहुत आदर-सम्मान है।

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  4. सवाई सिंह शेखावत says:
    4 weeks ago

    एक चौंकाने और व्यवस्था को लेकर चाक-चौबंद करने वाली कहानी।जो हमें यंत्र-व्यवस्था व उसके खतरों प्रति सचेत करती है कि यदि समय रहते हमने उनका हल नहीं खोजा तो वह समूची मनुष्यता के लिए ख़तरे का बायस हो सकती है।पर जैसा कि विजयशंकर जी ने उस व्यवस्था के कभी सूत्रधार रहे उस बूढ़े के मुख से कहलाया है निर्भय रहो और उसका अंग होने से इनकार कर दो ही एकमात्र रास्ता है।

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  5. कुमार अम्बुज says:
    4 weeks ago

    यह अच्छी कहानी इसलिए भी है कि इसमें कल्पनाशीलता की एक सर्जनात्मक सुसंगत लय है। भाषा ध्यातव्य है। तत्व कुछ काफ्कियन ‘ट्रायल’ जैसे।

    Reply
  6. पवन करण says:
    3 weeks ago

    खूब अच्छी कहानी है।……उल्लेखनीय और प्रशंसनीय। पढ़ने के दौरान पिछले दिनों पढ़ी कैफी हाशमी की कहानी याद आती रही।

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