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Home » संस्कृतवाङ्मय में समुद्र और समुद्रयात्रा पर बहस: राधावल्लभ त्रिपाठी

संस्कृतवाङ्मय में समुद्र और समुद्रयात्रा पर बहस: राधावल्लभ त्रिपाठी

by arun dev
July 5, 2026
in आलेख
Reading Time: 28 mins read
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संस्कृतवाङ्मय में समुद्र और समुद्रयात्रा पर बहस
(विशेष सन्दर्भ – महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा की प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा)


राधावल्लभ त्रिपाठी

 

(क)
संस्कृतवाङ्मय में समुद्र

 

ऋग्वेद विश्वसाहित्य की सबसे पुरानी और बहुमूल्य धरोहर है. इसमें कलकल करती छलछलाती और रँभाती गायों की तरह अपने बछड़ों के लिये बेतहाशा भागती शतुद्रि (सतलज) परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम) या गंगा आदि नदियों की अनेक छवियाँ हैं, जो सागर की ओर सरण कर रही हैं. नदियों को निम्नगा कहा गया है, क्यों कि वे नीचे की ओर जाती हैं. ऋग्वेद के कवि कहते हैं कि जैसे हमारी कविताएँ देवताओं को पोसती हैं, वैसे ही नदियाँ सागर को पोसती हैं. जैसे खूब निचोड़कर परोसा गया सोम इन्द्र को तृप्त करता है ऐसे ही नदियाँ सागर को तृप्त कर रही हैं. सागर कवि की कल्पना की तरह अथाह है, और देवता कवि की सुन्दर कल्पनाएँ हैं.

वेद के कवि कहते हैं कि सागर हवा की तरह बहता है, जंगल की तरह बढ़ता है. जल को शीतल माना गया है, शीतलता उसकी प्रकृति ही है. इस शीतलता के भीतर कैसी आग छिपी होती है. ऋग्वेद के कवियों ने अग्नि को ले कर बार-बार कहा है कि अग्नि सागर के कपड़े पहने हुए है.

वेदों या उपनिषदों के ऋषि जल को परमतत्त्व का एक रूप मानते हैं. ब्रह्म जिस तरह अनंत है, और सर्वव्यापी है उसी तरह जल भी अनंत है, और सारे ब्रह्मांड में व्याप्त है. छान्दोग्य उपनिषद् में परमतत्त्व के प्रतीक के रूप में आपोदेवता या जलदेव की उपासना का उपदेश देते हुए कहा है–

‘इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी है– पृथ्वी, अंतरिक्ष, आकाश, पर्वत, देव, मनुष्य, पशु-पक्षी, तिनके, वनस्पतियाँ, हिंस्र प्राणी, कीट-पतंग आदि ये सब जल से ही उपजे हैं. इसलिये जल की उपासना करो.’

बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा है –

‘जल सृष्टि का प्रथम तत्त्व है, उसी से सत्य उपजा है, सत्य ही ब्रह्म है.’

बृददारण्यक उपनिषद् में वर्णित उस समय के बुद्धिजीवियों के बीच हुए सबसे ब्रह्मोद्य या इंटेलेक्चुअल डिबेट में गार्गी याज्ञवल्क्य से पूछती है-
याज्ञवल्क्य, यह सब कुछ किसमें ओतप्रोत है?

याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं–

जल में.

सारे पुराण सृष्टि के चक्र की व्याख्या में यही कहते हैं कि आरंभ में जल ही जल था, इस महासागर में एक परब्रह्म उत्पन्न हुआ. वही नारायण था, वह उस महासागर में सोता रहा.

सागर अपनी गहराई और विस्तार में अतुलनीय है, उसी तरह संस्कृत साहित्य भी अपनी गहनता, विविधता और विस्तार में अनुपम है. सागर की तरह संस्कृत और उसका साहित्य मनुष्य की जिजीविषा और मेधा की अमरता और आनंत्य का महागान है. मनुष्य ही है, जो सागर की गहराई और अपार विस्तार को छोटी-सी नाव से मापने का साहस करता है. मेरे गीतधीवरम् में धीवर (मल्लाह) और सागर को ले कर लिखे गये गीत हैं, उन्हीं में से एक गीत की ये पंक्तियाँ है-

सीमानो न भवन्ति जलधौ
सीमन्तायते जलभाले भाले सा केवलमेका नौका

सीमाएँ नहीं होतीं सागर में
सीमांत रच देती है बस उसके भाल के ऊपर
केवल एक नौका.

सेतुमन्विष्यति सदैव मानव आजीवनं
प्रचीयते जीवनं विलीयते च बुद्बुदप्रभं
सेतुर्नहि कोऽपि भवति तज्जलधौ
सेतूयतेऽत्र सुस्थिरं सा केवलमेका नौकाI

जीवन भर सेतु खोजता है आदमी
जीवन ही हो जाता है समाप्त बुलबुले की तरह
सेतु कोई कहाँ होता है सागर में
सेतु तो बन सकती है उस पर
केवल एक नौका

सागर से पार नहीं पाया जा सकता, इसलिये उसे पारावार कहते हैं. संस्कृत साहित्य का भंडार भी ऐसा ही अगाध है कि उसकी थाह लेना या पार पाना असंभव ही है.

संस्कृत एक ऐसी भाषा भी है, जिसके कवि या लेखक प्राचीनकाल से आज तक इस महादेश के हर नगर, गाँव, जनपद और प्रदेश में जन्म लेते या रहते आये हैं. उनमें से अनेक कवि भृगुकच्छ (भड़ोंच), भुज, द्वारका, ताम्रलिप्ति, बंग, कलिंग, उत्कल, अपरांत आदि सागर के तटवर्ती इलाकों में भी जन्मे, बसे या आते रहे, और सागर के सौंदर्य, गांभीर्य और भयावहता की अगणित विविध रूपछवियाँ उन्होंने अपनी कविताओं में उकेरीं.

सातवीं शताब्दी के महाकवि माघ ने राजस्थान के श्रीमाल या भिन्नमाल (भीनमाल) शहर में जन्म लिया, द्वारका उनके पड़ोस में थी. उन्होंने कृष्ण के समय की समुद्र में बसी द्वारका का वर्णन किया है. वे कहते हैं –

सागर में वह सोने से चमकती नगरी ऐसी लगती थी जैसे बडलाग्नि की लपटें ऊपर उठ रही हों. समुद्र उछाल-उछाल कर उस नगरी के परकोटे के इर्दगिर्द शंख और सीपियाँ बिखेर देता, तो वे शंख और सीपियाँ सुमेरु पर्वत की प्रदशिणा करते ग्रह-नक्षत्रों जैसे लगते. उसके परकोटे को अपनी ऊँचाई से जीतने के लिये सागर की लहरें ऊपर ऊठतीं, पर उतने ऊपर न जा पाने के कारण लज्जित हो कर पलट-पलट कर लौट जातीं. समुद्र उसकी प्राकारभित्ति या परकोटे पर माथा पटक कर रह जाता

(शिशुपालवध, ३.३३-४१)

 

 

२.

भारत के पत्तनों (समुद्री बन्दरगाहों) और नौसैनिक अभियानों का एक गौरवपूर्ण चित्र संस्कृत साहित्य में प्राप्त होता है. पाश्चात्य विद्वानों ने, जिन्होंने भारतविद्या अथवा प्राच्य अध्ययन का अनुसरण किया, भारत और अन्य एशियाई देशों के मध्य समुद्री यात्राओं तथा आवागमन के माध्यम से भारत में प्राच्य ज्ञान के विकास की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया. वासुदेवशरण अग्रवाल ने संस्कृत साहित्य में वर्णित ग्यारह पत्तनों का उल्लेख किया है. ये हैं— प्रभास, भृगुकच्छ, शूर्पारक, मुरुचि, नाग, कावेरी, द्रमिल, मुसुलि, विशाखा, कलिङ्ग तथा प्रियङ्गु. इनमें से कावेरीपत्तन की महिमा तमिल महाकाव्य शिलप्पदिकारम् में भी गायी गयी है.

ऋग्वेद में समुद्र, बन्दरगाहों, नौकाओं और समुद्री यात्राओं के अनेक वर्णन उपलब्ध हैं. ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सूक्त ११६ में समुद्र में संचालित होने वाले जहाज़ों का वर्णन मिलता है. वहाँ भुज्यु नामक एक ऋषि का उल्लेख है, जो समुद्री तूफ़ान में फँस जाता है और तीन दिन तथा तीन रात तक असहाय अवस्था में पड़ा रहता है. अंततः अश्विनीकुमार उसकी रक्षा के लिए आते हैं. इस सूक्त में सौ अरित्रों (चप्पुओं) द्वारा संचालित एक विशाल नौका का भी वर्णन किया गया है.

महाभारत में भी विभिन्न द्वीपों की यात्राओं के संकेत मिलते हैं. कथा-साहित्य में अनेक द्वीप वर्णित हैं. कालिदास और बाण जैसे कवियों ने भी उनका उल्लेख किया है. इन लेखकों ने तेरह अथवा अठारह द्वीपों का वर्णन किया है. कालिदास ने अपने रघुवंश (VI.38) में माहिष्मती के राजा को अष्टादशद्वीपनिखातयूपः कहा है, अर्थात् वह राजा जिसने अठारह द्वीपों में यूप स्थापित किए थे. बाणभट्ट ने इन अठारह द्वीपों की तुलना पृथ्वीरूपी हार के अठारह मोतियों से की है.  ये अठारह द्वीप हैं—

कुमारी, इन्द्र, कसरुमान, ताम्रपर्णी, गभस्तिमान, नाग, सौम्यक, गन्धर्व, वरुण, कर्मरङ्ग, नारिकेल, वारुशक, बाली, यव, मलय, कटाह, सुवर्ण तथा कर्पूर. इनमें भारतवर्ष को कुमारीद्वीप कहा गया है.

सिन्धु सभ्यता के दो नगर मोहेंजोदड़ो और हना नदी के द्वारा सम्बद्ध थे. इन दोनों नगरों का पारस्परिक सम्बन्ध बहुत अधिक था. इस सम्बन्ध का आयो-जन नदी में चलने वाली नावों के द्वारा संभव हो सका होगा. तत्कालीन मुद्राओं पर नावों की आकृतियाँ मिलती हैं. वैदिक काल में बहुत बड़ी नावें बनने लगी थी. कुछ नावों में १०० अरित्र तक लगाये जाते थे.

रामायण-युग में नाव वाहन-संयुक्त, कर्ण-ग्राहवती, शुभ (सुन्दर), सुप्रतार (शीघ्र तैरने वाली), दृढ़ और रुचिर होती थी. ऐसी नावें सागर-गामिनी होती थी. नाव के घाट बने हुये थे, जिन्हें तीर्थ कहा जाता था .

नाव को चलाने के लिए अनेक नाविक होते थे. कर्णधार उसकी दिशा ठीक करता रहता था. प्रयाग के निकट गंगा के एक घाट पर ५०० नावें थीं.

कुछ नावें स्वस्तिक शैली पर बनाई गई थीं और कुछ महाघण्टाघरा थीं. उन पर पताकायें फहराती थीं. सबसे अच्छी नाव पाण्डु कम्बल से संवृत थी. इस पर नन्दिघोष होता था. इन नाव पर रथ घोड़े आदि सभी गंगा नदी पार कर सकते थे. कुछ लोग प्लव, कुम्भघट आदि से नदी पार कर लेते थे.

नाव के मार्गों की देख-भाल करने के लिए राजा की ओर से नावाध्यक्ष नियुक्त होता था. वह समुद्र, नदी, झील आदि के जलमार्गों का निरीक्षण करता था राजा की नावें भी यात्रियों की सहायता के लिए प्रस्तुत होती थीं. नावाव्य उन नावों की भली-भाँति रक्षा करता था, जो तूफान में पथ-भ्रान्त होकर उस क्षेत्र में आ जाती थीं. वह चोर-डाकुओं की नावों को नष्ट कर देता था. नावों पर शासक, नियामक, दात्र, रश्मिग्राहक और उत्सेचक – पाँच अधिकारी होते थे. ऐसी नावें महानदियों में चलती थीं, जिनमें साल भर भरपूर जल रहता था. नावाध्यक्ष की स्वीकृति से छोटी नदियों में छोटी नावें चला करती थीं. नावों पर चढ़ाकर ऊँट, भैंस, छोटी-बड़ी गाड़ियाँ आदि पार हो सकती थीं. यदि नावों पर यथोचित कर्मचारियों के न होने से अथवा उनके जीर्ण-शीर्ण होने के कारण किसी यात्री की हानि होती तो नावाध्यक्ष उसकी पूर्ति करता था.

राजा की ओर से नाव-भाड़े का नियन्त्रण होता था. नावों पर गाड़ियों और उनका पूरा सामान भी पार हो सकता था. भाड़ा नदी-प्रदेश और समय की दृष्टि से भी निर्धारित होता था. समुद्र-यात्रा के लिए भाड़े का कोई नियंत्रण नहीं था. दो मास से अधिक की गर्भिणी स्त्री, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी, ब्राह्मण आदि से भाड़ा नहीं लिया जाता था. यदि मल्लाहों की मूल या असावधानी से कोई वस्तु नष्ट हो जाती तो सभी मल्लाह मिलकर उस वस्तु का मूल्य स्वामी को दे डालते थे.

महाभाष्य के अनुसार अनेक प्रकार के जलवान थे. नौका उनका साधारण नाम था. राज-नौ राजाओं के उपयोग में आता था. भस्मा मसक था, जो तैरने के काम आता था. इनके अतिरिक्त उत्संग, पिटक, उत्पद आदि विविध प्रकार की छोटी-बड़ी नावें थीं. घटिक से पार करने वालों को और बैल की पूंछ पकड़ कर पार करने वालों को गौपुच्छिक कहा जाता था.

परवर्ती युग में पुण्य के लिए राजाओं के द्वारा घाटों पर नावें रखवाने के उल्लेख मिलते हैं. उषवदात के द्वारा इवा, पारादा, दमणा, तापी, करवेणा तथा दाहनुका नदियों पर निःशुल्क नाव यात्रियों को पार कराने के लिए रखने के उल्लेख मिलते हैं.

बड़ी नावों के साथ समुद्र में कभी-कभी छोटी नावें भी सम्बद्ध होती थीं. ऐसा इसलिए किया जाता था कि यदि कहीं बड़ी नाव को किसी प्रकार हानि हो तो छोटी नाव का उपयोग किया जा सके. लंका से चीन की यात्रा करते हुये फाह्यान जिस नाव पर सवार हुआ, उस पर २०० से अधिक आदमी और व्यापार की सामग्री थी. वे ९० दिनों तक यात्रा करने पर जावा द्वीप पहुँचे. इन यात्राओं में प्राण का अतिशय संशय रहता था. फाह्यान ने अपने संकटों का विवरण इस प्रकार किया है-

‘दुर्भाग्यवश तीन दिन चलने पर तूफान का सामना करना पड़ा. नाव में छेद हो जाने से जल भरने लगा. लोग छोटी नाव में जाकर भरने लगे. उन लोगों ने छोटी नाव को बाँधने वाली रस्सी को शीघ्र ही काट कर अलग कर लिया कि कहीं अधिक लोगों के भर जाने से छोटी नाव भी न डूब जाये. सब यात्री घबड़ा गये. उससे सामान बाहर फेंका जाने लगा. मैं डरा कि कहीं मेरी वह पोटली न फेंक दी जाये, जिसमें धार्मिक ग्रन्थों की प्रतिलिपियाँ बँधी हैं. हृदय में अवलोकितेश्वर का ध्यान किया. हान देश के भिक्षु-संघ को प्राण अर्पित किया कि मैंने धर्म की खोज में विदेश की यात्रा की है. मुझे अपना तेज और प्रताप देकर लौटा कर स्थान पर पहुँचाओ’.

फाह्यान ने सामुद्रिक यात्रा की कठिनाइयों का वर्णन करते हुये लिखा है-

‘समुद्र में अनेक डाकू रहते हैं. उनसे यदि सामना पड़ा तो कोई बचाव नहीं. यह समुद्र अतिविस्तृत है. दिशाओं का ज्ञान नहीं. सूर्य, चन्द्र और तारों को देखकर ठीक मार्ग पर चलते हैं. तूफान जिधर चाहता है, ले जाता है. रात के अंधेरे में केवल ऊँची लहरें परस्पर टकराती दिखाई पड़ती हैं. समुद्र में अग्नि की ज्वालाओं का आभास मिलता है. अनेक छोटे-बड़े जन्तु निकलते हैं. लोग नहीं जानते कि कहाँ जा रहे हैं- गहरा समुद्र और कहीं ओर-छोर नहीं. लंगर डालने और ठहराने का ठौर नहीं. आकाश खुल गया तो पूर्व-पश्चिम सूझने लगा. फिर लौट कर ठीक मार्ग पर चलना पड़ता था. कहीं गुप्त चट्टान मिली तो कोई बचाव नहीं.’

लंका से जावा जाने में उसे ९० दिन लगे. इतनी कठिनाइयाँ होते हुये भी उस युग में लोगों का भारत से चीन आना-जाना लगा रहता था.

भोज के ग्रन्थ युक्ति-कल्पतरु के अनुसार सर्वमन्दिर, मध्यमन्दिर तथा अग्र मन्दिर नामक नावें सर्वोच्च कोटि की कही जा सकती हैं. सर्वमन्दिर में चारों ओर कमरे बने हुये थे. इसमें कोश, पशु, तथा अन्तःपुर की स्त्रियाँ आ जा सकती थीं. यह पूरा प्रासाद ही था. मध्य-मन्दिर में रहने के कक्ष केन्द्र में थे. यह क्रीडा-नौका थी और प्रायः वर्षा ऋतु में काम आती थी. अग्रमन्दिर में आगे की ओर रहने के कमरे बनते थे. वे दूर-दूर तक भयंकर समुद्रों में यात्रा करने के लिए होते थे. भोज के युक्तिकल्पतरु में २७ प्रकार की नावों का वर्णन है. इनमें से सबसे बड़ी २७६ × ३६ × २७ घनफुट की होती थी. इसका भार कम से कम २७,००० टन होगा.

व्यापार के लिए जल-मार्ग स्थल मार्ग की अपेक्षा अल्प व्यय-साध्य होता है. प्राचीन काल के प्रमुख नगर प्रायः नदियों के तट पर अथवा समुद्र के किनारे थे. ऐसी परिस्थिति नाविक व्यापारियों के लिए समीचीन रही.

सिन्धु-सभ्यता के युग में हड़प्पा और मोहेंजोदड़ो दोनों नगर जिस नदी के तट पर थे, वह व्यापारियों की नावों के लिये उपयुक्त रही है. तत्कालीन निवासी नाव बनाने और चलाने के विज्ञान में निष्णात थे.

वैदिक काल में लोग बड़ी नावों से परिचित थे. उनकी नौकाओं में १०० तक अरित्र होते थे. इस युग के व्यापारी अपनी बड़ी नौकाओं से द्वीप द्वीपान्तरों में जाकर अधिकाधिक धन व्यापार के माध्यम से प्राप्त करते.

 

3.

वैदिक युग से लेकर सदा ही परवर्ती युग में समुद्र की नौ-यात्राओं के उल्लेख मिलते हैं. सामुद्रिक यात्राओं के लिए उस प्राचीन युग में उतनी सुविधायें न थी, जैसी आजकल हैं. नौकास्थान निश्चित नहीं थे. समुद्र में चलते हुए दिशा और अवस्थिति का ज्ञान नहीं रहता था. जाते हुए जहाँ-कहीं कोई द्वीप मिल जाता, वहीं नाव रोककर यथासाध्य सामग्री प्राप्त कर ली जाती थी. वहीं से आगामी यात्रा के लिए सूचनायें मिल सकती थीं. परवर्ती युग में शनैः शनैः अनुभव के आधार पर नावों की गतिविधि का आकलन किया जाने लगा और साधारण परिस्थितियों में नाविकों को ज्ञात रहने लगा कि किस द्वीप से कितने दिनों में किस दिशा में चलते हुए नाव कहाँ पर पहुँचने वाली है.

परवर्ती युग में बौद्ध-साहित्य के अनुसार व्यापारी विशेष लम्बी सामुद्रिक यात्रायें करते थे. ऐसी यात्रायें कभी-कभी छह मास की दीर्घ अवधि तक की होती थीं. नौकाओं पर चलने वाले मल्लाह स्थल की दिशा जानने के लिए दिशा-काक रखते थे. बावेरु जातक के अनुसार एक दिशा-काक बेबीलौन में ५०० कार्षापण पर बिका था. जातक साहित्य में भारत की बड़ी नदियों में चलने वाली व्यापारिक नावों का उल्लेख मिलता है. नदियों के द्वारा प्रायः सभी बड़े नगर सम्बद्ध थे और वे नगर तत्कालीन उच्चकोटि के व्यापारिक केन्द्र थे. इनमें से काशी का उल्लेख है. समुद्र से धन पाने की चर्चा ऋग्वेद ७.६.७ में मिलती है. ऋग्वेद ७.८८. ३-४ के अनुसार वसिष्ठ ने सामुद्रिक यात्रा की थी. लोगों ने समुद्र में आने-जाने के लिए मार्गों की खोज की थी, जिनसे वे किसी अभीष्ट स्थान पर शीघ्र पहुँच सकते थे.

काशी से समुद्र-यात्रा के लिये नाव छूटती थीं. नदियों के प्रवाह में भवन-निर्माण के लिये बनाई हुई लकड़ियाँ बहा दी जाती थीं और अभीष्ट स्थान पर उनको पकड़ लिया जाता था. इस प्रकार प्रयास के बिना ही व्यापार की वस्तुएँ व्यापारिक नगरों में पहुंचाई जाती थीं. नदियों से होकर जो नावें चलती थीं, उन पर नगर के लिए आवश्यक वस्तुएँ वहाँ पहुँचाई जाती थीं. ऐसी नदियों में गंगा सुप्रसिद्ध थी. नदी के तट पर नाव के ठहरने के लिय नगर के समीप पत्तन होते थे. पत्तन की देखभाल के लिये राजा की ओर से जल-पथ-कर्मिक नियुक्त होता था.

जल-पथ-कर्मिक को नावों के आने-जाने की सूचना रहती थी. इस युग की नौकायें बड़ी होती थीं. समुद्रवाणिज जातक के अनुसार १००० बढ़ई एक ही नौका में यात्रा कर सकते थे. नौकाओं में तीन कूपक (मस्तूल) लगाये जाते थे. साथ ही इनमें लंगर, जोते आदि होते थे. संख जातक के अनुसार ८०० हाथ लम्बी कुछ नौकायें होती थीं. उपर्युक्त विवरण में अतिशयोक्ति मान लेने पर भी इतना निश्चय प्रतीत होता है कि समुद्र में यात्रा करने के लिये बड़ी नावें अवश्य ही बनती थीं. गंगा में बड़ी नावें समुद्र तक जाती थीं. इस युग में गम्भीर, मरुकच्छ, रोरुक, सुप्पारक, कावेरीपत्तन, आदि प्रमुख सामुद्रिक नौस्थान थे. काशी से नावें समुद्र यात्रा के लिये नियामक के नेतृत्व में चलती थीं. तारों का ज्ञान रखने वाले पण्डित रात्रि के समय दिशाओं का परिचय कराते थे.

अर्थशास्त्र में जल-मार्ग को व्यापार के लिये यद्यपि स्थल-मार्ग से अच्छा नहीं माना गया, फिर भी नदी और समुद्रों से व्यापार करने का प्रचलन रहा.

सम्भवतः छठी शती ई० पू० में बंगाल के राजा विजय ने लंका पर चढ़ाई की. उन्होंने जिस नाव का उपयोग किया था, उसमें ७०० से अधिक लोग बैठ सकते थे और साथ ही उनकी आवश्यक वस्तुएँ रखी जा सकती थीं.

जैन साहित्य में भी व्यापारियों की समुद्र-यात्रा के अनेक उल्लेख मिलते हैं. समुद्र में चलने वाली नाव का नाम प्रवहण था और कभी-कभी उसे लगातार छह मास तक चलते रहने पर ही अभीष्ट स्थल मिलता था. चम्पा से समुद्र-यात्रा के लिये नाव छूटती थी. प्रारम्भ में देवताओं के लिये पुष्पोपहार अर्पित किया जाता था, सामुद्रिक पवन की पूजा होती थी, मस्तल पर श्वेत ध्वजा फहराई जाती थीं, शुभ शकुन का दर्शन किया जाता था और यात्रा-पत्र (राजवर-शासन) लेकर व्यापारी बाजे-गाजे के तुमुल निनाद के बीच चल पड़ते थे. वायु के वेग से नाव की गति बढ़ जाती थी. नाव में नौकादण्ड, वलयवाह, वातवसन, लांगल आदि लगे होते थे. उसके संचालकों में नियामक सर्वोच्च व्यक्ति होता था. नियामक के अतिरिक्त खेने वाले (कुच्छिधारय), कर्णधार आदि होते थे.

पहली शती ई० पू० में स्ट्राबो ने लिखा है कि मिस्र और भारत में सीधे व्यापारिक सम्बन्ध की स्थापना हो चुकी है. उसको सूचना मिली थी कि २५ ई० पू० के १२० व्यापारिक नाव मिस्र से  भारत के लिए लाल सागर के नौकास्थान म्योज होरमोज से चले थे. कुछ ग्रीक व्यापारी नाव पर पूरे दक्षिण भारत का चक्कर लगाते हुए गंगा के मुहाने तक पहुँचते थे. नावें समुद्र के तटीय भाग अरब, फारस, मक्रान आदि से होती हुईं भारत आती थीं. पहली शती ई० में हिप्पालस नामक नाविक ने पूरे अरब सागर को मानसून की सहायता से पार करते हुए सीधे भारत पहुँचने का मार्ग निकाला. इधर भारतीय नाविक अपनी नावों पर माल लाद कर अरब जा पहुँचते थे.

उपर्युक्त व्यापार में डाके पड़ते थे. प्रारम्भ में इस सामुद्रिक व्यापार की सुरक्षा के लिए व्यापारियों की नावों पर कुशल धनुर्धर जाते थे, पर आगे चलकर डाकुओं का सामना शतघ्नी, गोले और बारूद से होने लगा. इस युग में भारत में कावेरीपत्तन तत्कालीन विश्व के महत्त्वपूर्ण सामुद्रिक व्यापारिक केन्द्रों में से था. इस नौस्थान पर ग्रीस से लेकर चीन तक के सभी देशों के व्यापारी आते थे. भारतीय व्यापारी इस युग में नावों से बंगाल, तक्कोल, चीन, सौवीर, सुरत, सिकन्दरिया, कारोमण्डल आदि प्रदेशों में जाकर घन उपार्जित करते थे.

भारतीय नाविकों की चरित-गाथा के कुछ कथानक विदेशी साहित्य में प्रतिष्ठा पा चुके हैं. टेसिटस नामक रोम के इतिहासकार ने लिखा है कि एक भारतीय नाविक की नौका इंगलैण्ड के आगे उत्तर सागर तक जा पहुँची थी. एक अन्य भारतीय व्यापारी यवनों को अपनी नौका पर बैठाकर भारत लाया था. मिस्र के एक प्राचीन लेख में किसी भारतीय नाविक का नाम सोफन इण्डोस मिलता है.

चौथी शती में फाह्यान नामक चीनी यात्री भारत से चीन लौटते समय व्यापारी नाव से गया. नावों में कभी-कभी छेद हो जाने की आशंका रहती थी. बड़ी नाव के साथ कुछ छोटी नावें सम्बद्ध रहती थीं, जिनका उपयोग ऐसी दुर्घटनाओं के समय हो सकता था. इस युग की भारतीय नावें अजन्ता के चित्रों में तथा बोरोबुदुर मन्दिर की मूर्तियों में अमर प्रतिष्ठा पा सकी हैं. व्यापार के लिये इस युग में ताम्रलिप्ति का नौकास्थान पूर्व में, कुदूर तथा घंटशाल के नौका-स्थान दक्षिण की नदियों के तट पर, कावेरीपट्टन (पूहर) और तोर्दै सुदूर दक्षिण में, कोरकै तथा सलिपुर पाण्ड्य देश में, मुजरिस (क्रांगनूर) मलाबार तट पर, कल्याण, चौल, भड़ौच तथा खम्भात के नौकास्थान पश्चिमी तट पर तथा देवल और सोरठ सिन्धु-प्रदेश में थे. प्रायः सभी नौकास्थानों पर बड़े बाजार होते थे, जहाँ विदेशों से आया हुआ माल थोड़े समय में स्थानीय दुकानदारों के द्वारा खरीद लिया जाता था. नौकास्थानों पर व्यापारियों के सुरक्षित रूप से ठहरने की व्यवस्था राजा की ओर से की जाती थी.

सातवीं शती के पूर्वी व्यापारिक मार्ग का परिचय नसांग और इत्सिंग के वर्णव से मिलता है. इसके अनुसार जल-मार्ग उन विभिन्न बन्दरगाहों से होकर, जाता था, जो गुजरात, मलाबार, ताम्रपर्णी (लंका), चोलदेश, द्रविड़ देश, आन्ध, कलिय, तथा समतट के तटों पर स्थित थे. सबसे अधिक चालू मार्ग वह या. जो (बंगाल में स्थित) ताप्रलिप्ति से बंगाल की खाड़ी में होकर जाता या और सुमात्रा द्वीप के कथा नामक बन्दरगाह का स्पर्श करता था. वहाँ से वह सुमात्रा के उत्तरी तट से होता हुआ मलय उपद्वीप के बन्दरगाह का स्पर्श करके जलडमरूमध्य को पार करता हुआ सुमात्रा की राजधानी ‘श्रीभोग’ तक पहुँचता था.

इस स्थान से यह मार्ग चीन की खाड़ी के ठीक बीच से होता हुआ और कम्बो-डिया प्रायद्वीप के चारों ओर चक्कर लगाता हुआ अन्त में चीन के बन्दरगाह क्वांग-(आधुनिक कुंगतुंग) पहुँचता था. चीनी यात्री इत्सिंग ने इसी मार्ग का अव-लम्बन किया था. चीन जाने वाले जलयान इतने बड़े होते थे कि उनमें केवल जलयान से सम्बद्ध एक सहस्र आदमी होते थे. इनमें से छह सौ जलयान चलाने वाले तथा ४०० धनुर्धर या भाला चलाने वाले सैनिक होते थे. प्रत्येक बड़े जलयान के साथ तीन छोटी नावें दुर्घटनाओं से बचाने के लिए सम्बद्ध होती थीं.’

सातवीं शती के पश्चात लगभग ६०० वर्षों तक भारत के वैदेशिक व्यापार में ईरान और अरब के व्यापारियों का प्रमुख हाथ दिखाई पड़ता है. इन दोनों देशों के नाविक व्यापारी समुद्र तटों से होते हुए बंगाल, आसाम, पूर्वी द्वीप-समूह और चीन तक पहुँचते थे और लौटते हुए भारतीय वस्तुओं को यूरोप के देशों तक पहुँचाने के माध्यम बनते थे. इस मार्ग के अतिरिक्त अरब के बन्दरगाहों से नावें सीधे भारतीय तट तक आती थीं. भारत के समुद्र तट से नावों पर जो वस्तुएँ लाई जाती थीं, वे यमन के बन्दरगाह पर उतार ली जाती थीं और वहाँ से स्थल-मार्ग के द्वारा वे शाम, मिस्र तथा योरपीय देशों में पहुँचाई जाती थीं. उपर्युक्त देशों की वस्तुएँ इसी पद्धति से भारत भी पहुँचती थीं.

 

4.

सातवीं शती से फारस की खाड़ी में इराक प्रदेश में बसरे के समीप नौका-श्रय उबला भारतीय व्यापार का एक केन्द्र था. उस समय उबला भारत का एक टुकड़ा ही समझा जाता था. चीन और भारत को आने-जाने वाली नावें यहाँ उतरती थीं. नवीं शती तक यह नौकाश्रय अभ्युदयशील रहा. नवीं शती से फारस की खाड़ी में सैराफ नामक नौकाश्रय का अभ्युदय हुआ. भारत और चीन के लिये आने-जाने वाली नावें सैराफ से होकर निकलती थीं. लगभग ४०० वर्षों तक सैराफ का नौकाश्रय अतिशय अभ्युदयशील रहा. इसके पश्चात् उमान के समीप फारस की खाड़ी में कैश द्वीप में स्थित कैश नामक नौकाश्रय के बन जाने पर इसकी महत्ता क्षीण हो गई.

उमान के शासक ने इस नौकाश्रय को नित्य संवर्धित किया. राजा की निजी व्यापारिक नावें थीं. याकूत नामक इतिहासकार ने तेरहवीं शती में कैश का वर्णन करते हुए लिखा है-

यह छोटा-सा द्वीप भारतीय व्यापार के कारण बहुत सुन्दर और हरा-भरा हो गया है. भारत के सभी जलयान यहीं ठहरते हैं. भारत के राजाओं में इस छोटे से द्वीप के अरब हाकिम की मान-मर्यादा बहुत अधिक है.

कैश भारतीय व्यापार की मण्डी बन चुका था. भारत की सभी अच्छी वस्तुएँ व्यापार के लिये यहाँ लाई जाती थीं. आठवीं शती से ग्यारहवीं शती तक के भारतीय नौकाश्रयों के नाम अरबी ग्रन्थों में इस प्रकार मिलते हैं- सिन्ध में देवल, गुजरात में थाना, खम्भात, सोपारा और जैमूर तथा मद्रास में कोलममली, मलावार और कन्या-कुमारी.

दसवीं शती में जलयानों के आने-जाने की सुविधाओं का परिचय अरबी ग्रन्थों से मिलता है. पहले बसरे और उमान से सब वस्तुएँ सैराफ में आ जाती थीं और वहाँ जलयानों में लादी जाती थीं. वहीं से पीने के लिये मीठा पानी भी ले लिया जाता था. सैराफ से चलकर जलयान मस्कत में रुकते थे और पीने के लिये पानी लेकर भारत की ओर चल देते थे. एक मास तक चलने के बाद जलयान कोलममली पहुँचते थे. फिर वहाँ से चीन की ओर जाने वाले जलयान आगे की यात्रा आरम्भ करते थे. कोलममली में जलयान बनाने और उनके नवीकरण के लिये कर्मशालायें थीं. वहाँ मीठा जल यात्रा की आवश्यकता के लिये मिलता था.

भारत की ओर से आने वाले जलयान उमान पहुँचते थे और वहाँ से अदन, जद्दा और जार (शाम का समुद्र तट पर) होकर लाल सागर में पहुँचते थे. इस प्रकार लाल सागर के सिरे तक व्यापारिक वस्तुएँ पहुँच जाती थीं. जद्दा में मिस्र देश जाने वाले जलयान मिलते थे, जो सैराफ के नाविकों की सामग्री अपने देश में ले जाते थे. सैराफ के व्यापारी विशेष लाभ के लिये भारत और चीन के समुद्रों में व्यापार करना चाहते थे. दसवीं शती में जड़ा में भारत, जंजीबार, हब्श और फारस आदि देशों की व्यापारिक वस्तुएँ मिलती थीं.

अरबी साहित्य के उल्लेखों से ज्ञात होता है कि व्यापार के लिये जो नावें बनती थीं, वे बहुत बड़ी होती थीं और उनमें दीर्घकालीन आवास के लिये यथोचित सुविधायें प्रस्तुत की जाती थीं. जलयानों में दो खण्ड होते थे और अलग-अलग कक्ष बने होते थे. पीने के पानी और भोजन के लिए घर अलग से होते थे. यात्रियों के रहने के लिये तथा व्यापारिक सामग्री रखने के लिए अलग-अलग स्थान बने होते थे. जलयान में काम करने वाले खलासी, मल्लाह और रक्षक या तीर चलाने वाले सिपाही आदि की संख्या एक सहस्र होती थी. इनके अतिरिक्त सैकड़ों की संख्या में यात्री होते थे.

ग्यारहवीं शती के पूर्वार्ध में रचे हुए राजा भोज के युक्तिकल्पतरु नामक ग्रन्थ से ज्ञात होता है कि सैकड़ों प्रकार की नावें बनाई जाती थीं. इनके बनाने की शैली वैज्ञानिक थी और बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता था कि किस प्रयोजन के लिये नाव बनाई जा रही है. इस ग्रन्थ के अनुसार आकार-प्रकार की दृष्टि से नाव दो प्रकार की होती थी- दीर्घा और उन्नता.

इनमें से दीर्घा के दस भेद होते थे-दीर्घिका, तरणी, लोला, गत्वरा, गामिनी, तुरी, जंघाला, प्लाविनी, धारिर्ण तथा वेगिनी.

उन्नता भी पाँच प्रकार की होती थीं-ऊर्ध्वा, अनूर्ध्वा, सुवर्णमुखी भिणी तथा मन्थरा. उपर्युक्त कोटि की नावें समुद्र में चलाने के लिये होती थीं. नदियों और झीलों में चलने वाली नावों की कोटि सामान्य थी और उनके भी क्षुद्रा, भीमा, मध्यमा आदि अनेक भेद प्रमुख थे. नावों को अलंकृत करने के लिए सोना, चाँदी, ताँबा आदि बहुमूल्य धातुओं का उपयोग होता था.

सागर अपनी गहराई और विस्तार में अतुलनीय है, उसी तरह संस्कृत साहित्य भी अपनी गहनता, विविधता और विस्तार में अनुपम है. सागर की तरह संस्कृत और उसका साहित्य मनुष्य की जिजीविषा और मेधा की अमरता और आनन्त्य का महागान है. मनुष्य ही है, जो सागर की गहराई और अपार विस्तार को छोटी-सी नाव से मापने का साहस करता है – तितर्षुर्दुस्तरं मौहादुडुपेनास्मि सागरम् – यह कालिदास ने जब लिखा, तो वे दुस्तर सागर को अपनी एक डोगी से पार कर लेने के मनुष्य के जीवट की स्तुति भी कर रहे थे. हमारे पुरखे सागरसन्तरण को एक चुनौती मान कर उसका वरण करते रहे हैं. वरुण देवता जैसे उन्हें निरन्तर आमन्त्रण देते रहते हैं. वैदिक साहित्य के साक्ष्य से तो यह भी कहा जा सकता है कि हमारी वर्तमान सृष्टि हमारे आद्य पूर्वज मनु की सागर यात्रा के कारण ही बची रह सकी.

मनु के लिये सबेरा होने पर (सेवक) हाथ-पाँव धोने के लिये जल ले कर आये. जब वे हाथ-पैर धो रहे थे, तो उनके हाथ में एक मत्स्य (मछली) आ गया. उसने इनसे कहा– मुझे पाल लो, मैं तुम्हें पार लगाऊँगा. (मनु ने पूछा) – कैसे मुझे पार लगाओगे? (मत्स्य ने कहा)- बाढ़ इस सारी जनता को बहा ले जायेगी, तब मैं तुम्हें पार ले जाऊँगा. (मनु ने पूछा) – तुम्हें कैसे पालना है? (मत्स्य ने कहा)-  जब तक हम छोटे होते हैं, बहुत जन्तु हमारा नाश करने वाले रहते हैं. बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है. मुझे घड़े में रख देना. जब मैं उस घड़े से बड़ा हो जाऊँ, तो गड्ढ़ा खोद कर मुझे उसमें डाल देना. जब मैं उससे भी बड़ा हो जाऊँ, तो मुझे समुद्र में डाल देना. तब मेरा कोई नाश नहीं कर सकेगा.

वह मत्स्य निरंतर बढ़ता गया. फिर उसने बताया कि अमुक तिथि को बाढ़ आयेगी, तब नाव तैयार कर के मेरे पास आना. फिर बाढ़ आने पर मनु ने नाव तैयार की, मत्स्य तैरते हुए उसे पार ले गया. मनु ने उसके सींग में नाव की रस्सी बाँध दी. वह उससे उसे उत्तर के पर्वत की ओर ले गया. फिर उसने कहा – मैंने तुम्हें पार लगा दिया, अब नाव को पेड़ से बाँध दो. मत्स्य जैसे जैसे पानी बढ़ता, मनु को पहाड़ की ओर ले जाता. जिधर-जिधर से पानी बढ़ता वह उधर से पीछे हटता जाता. बाढ़ ने सारी प्रजा को बहा दिया, केवल मनु अकेले बचे रहे.

शतपथ ब्राह्मण का यह पूरा प्रसङ्ग किस्सागोई का बेहतरीन नमूना है, और इसे पूरा इसलिये भी यहाँ उद्धृत किया गया है कि साहित्य में कथा की परम्परा कैसे बनती और जारी रहती है – यह इससे भी जाना जा सकता है. वैदिक वाङ्मय और पुराणों से लगा कर कामायनी तक यह प्रसङ्ग हमारे साहित्य में आवाजाही करता हुआ परम्परा और आधुनिकता की गलबाहीं करता रहा है.

नारायण राव पारंगी का मत है कि ऋग्वेद (10.136.5) में वर्णित भूगौलिक स्थिति के अनुसार सप्तसिन्धु प्रदेश उस समय दोनों ओर से पूर्वी और पश्चिमी समुद्र से घिरा हुआ था. पश्चिमी समुद्र आज का अरब सागर था. पूर्वी समुद्र उस समय आज के पंजाब के पूर्व में था. ऋग्वेद में अन्यत्र (9.3.3.6 तथा 10.4.7.2) भी सप्तसैन्धव प्रदेश के समुद्र से घिरे होने की बात कही गयी है. यदि आर्य जन सप्तसिन्धु प्रदेश में हिमालय के आसपास हैं, तो वे समुद्र को में नावों से पार कर करके कहाँ आवाजाही कर रहे हैं?

समुद्र आर्यावर्त से सुदूर दक्षिण में नहीं उनके पास ही है. भूगर्भीय परिवर्तनों से कालान्तर में समुद्र सूख गया, और वह आज राजस्थान की खारी झीलों, कृष्ण सागर (कैस्पियन सागर) और बाल्कश झील के रूप में शेष है. वर्तमान राजपूताना दक्षिण समुद्र का स्थान था और सरस्वती नदी इसी में गिरती थी. सरस्वती तो लुप्त हो गई और समुद्र दूर हटता गया. लोकमान्य बालगङ्गाधर तिलक भी आपने महाग्रन्थ दि आर्कटिक होम आफ दि वेदज में यही मत उपन्यस्त करते हैं.

हरिवंश पुराण में श्रीकृष्ण द्वारका में एक ब्राह्मण के मृत नवजात पुत्र के लेने के लिये सागर के भीतर कथित वरुणलोक हो कर जाते हैं और सागर के पार कर के उत्तरकुरु पहुँच जाते हैं. सागर पार कर के कोई हिमालय के उस पार उत्तरकुरु तभी पहुँचेगा जब सागर ऐन हिमालय की ढलानों को छू रहा हो. श्रीकृष्ण समुद्र से अनुरोध करते हैं कि हमें आगे का रास्ता दो. हरिवंश के विष्णुपर्व अध्याय ११३. १२-१६ में फिर क्या हुआ यह अर्जुन के शब्दों में बताया गया है – समुद्र ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली. फिर हम सब लोग स्तम्भित हुए जल के मार्ग से चले. वह मार्ग भूमिपर स्थित प्रकाशमान मणियों की प्रभा से उद्भासित हो रहा था. तत्पश्चात् समुद्र को पार करके हम उत्तर कुरु में जा पहुँचे. फिर एक ही क्षण में गन्धमादन पर्वत को भी लाँघ गये. तदनन्तर जयन्त, वैजयन्त, नील, रजतपर्वत, महामेरु, कैलास और इन्द्रकूट नामवाले सात पर्वत भगवान् श्रीकृष्णकी सेवा में सब-के-सब उपस्थित हुए.

मनु की समुद्रयात्रा सृष्टि के बीज बचाये रखने के लिये थी. श्रीकृष्ण की समुद्रयात्रा ब्राह्मण के बालकों को लाने के लिये थी.

समुद्र हमारी सभ्यता के आविर्भाव के समय से हमारे साथ कितना जुड़ा रहा है. यदि हमारे पहले पुरखे मनु की समुद्रयात्रा से हमारी वर्तमान मानवसृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ, तो सुरों और असुरों के द्वारा समुद्र में उतर कर उसे मथने से से सृष्टि के चौदह रत्नों का प्रादुर्भाव हुआ.

ऋग्वेद में समुद्रयात्रा के संदर्भ भरे पड़े हैं. फिर भी पश्चिम के अध्येता हमें बताते आये हैं कि हम हिमालय के उस पार से आये. ऋग्वेद के उषस् सूक्तों में कहा गया– भोर होते ही उषा जैसे ही आती है, कई कई रथ चल पड़ते हैं, और सागर में कई नौकाएँ निकल पड़ती हैं – समुद्रे न श्रवस्यवः.

ऋग्वेद के समय के क्षत्रिय वीर बड़ी-बड़ी नौकाओं से समुद्र में विजय अभियान के लिये निकलते रहे हैं. नौकाएँ डगमगातीं हैं, तूफान के थपेड़ों में डोलने लगती हैं. ऐसे में नौका में सवार वैदिक जन मरुत्, अश्विनीकुमार और पूषन् – इन देवों का स्मरण करते हैं, ये सामुद्रिक सङ्कटों के बचाने वाले देवता हैं. ऋग्वेद में तुग्र के पुत्र भुज्यु के समुद्री तूफान में फँस जाने का वर्णन है.

सायण ने इस का खुलासा करते हुए बताया है कि राजा तुग्र ने अपने पुत्र भुज्यु को शत्रुओं पर विजय के लिये समुद्री मार्ग से भेजा था. ऋग्वेद के कवि कहते हैं कि भुज्यु बीच सागर में तूफान में फँस गया. वह अनाधार, अनारम्भ और अग्रहण की स्थिति में था – उसकी नाव के लिये न कोई सहारा था, न वह किसी वस्तु को पकड़ सकता था. (ऐसा वर्णन वही कवि करेगा जिसने समुद्रयात्रा के जोखिम को टाइटेनिक जहाज के यात्रियों की तरह भोगा हो.) तब अश्विनीकुमार सौ अरित्रों (पतवार या चप्पुओं) वाली नाव ले कर आये और उसे तूफान से बाहर निकाला. भुज्यु के साथी उसे छोड़ कर जा चुके थे, वह अकेला था.

सौ चप्पुओं वाली बड़ी नौका के उल्लेख वेदों में अन्यत्र भी मिलते हैं.

एक अन्य प्रसङ्ग वसिष्ठ के द्वारा समुद्रयात्रा करने का है. यह ऋग्वेद के सातवें मण्डल के ८८वें सूक्त में है. इसमें ऋषि मैत्रावरुणि वसिष्ठ कहते हैं –

मुझे वरुण का रूप अग्नि के जैसा तेजस्वी लगा, जो अन्धकार में विद्युज्ज्योति की तरह मुझे खींच रहा था. अब मैं और वरुण नाव पर चढ़ गये. हम दोनों बीच समुद्र में अपनी नौका को खे रहे थे. लहरों के शिखरों पर हम विहार करते जैसे झूले में झूलते हुए जा रहे हों.

इस वसिष्ठ को रख लिया नाव पर वरुण ने, उसे ऋषि बना दिया, अपने अनुभव से उस कुशलकर्मा ने. वरुण से हमारी मित्रता के वे दिन कहाँ चले गये, जब कभी पहले सरल भाव से हम साथ-साथ रहे थे. हे स्वधावान् वरुण, बड़े ऊँचे मान के सहस्त्र द्वार वाले तुम्हारे घर में गया था.

वसिष्ठ को यह बोध है कि वे जो ऋषि बन गये, वह वरुण के सान्निध्य में समुद्रयात्रा करने के अपने साहस के कारण. ऋषि का भी एक लक्षण यह भी है कि वह जो हो चुका है और जो होने वाला है, दोनों के तार जोड़ देता है. ऋषि परम्परा और आधुनिकता के गत्यात्मक सम्बन्ध के निर्माता हैं.

समुद्र से धन पाने की चर्चा ऋग्वेद ७.६.७ में मिलती है. समुद्र के यात्रापथ की पहचान करने वाले भी ऋषि ही थे. उन्होंने समुद्र में आने-जाने के लिए मार्गों की खोज की थी.

समुद्रयात्रा करने वाले साहसी यायावर या वणिक् किसी विशिष्ट देवता को अपना अभिभावक और रक्षक मान कर अभियान पर निकलते हैं. वैदिक काल में तो समुद्रयात्रियों के देवता वरुण और अश्विनीकुमारद्वय ही हैं. स्वाभाविक ही है कि ऋग्वेद के एक अश्वनीसूक्त में अनोखे बिम्बों में देवताओं की इस युगलजोड़ी का वर्णन करते हुए कवि कहता है-

जैसे दो नौकाएँ लोगों को सिंधु (नदी) पार करा रहीं हों, ऐसे ही आप हमें पार कराते हैं.

वाल्मीकि-रामायण में बड़ी नावों के वर्णन बहुत हैं. ऐसी नावें सागर-गामिनी होती थीं. नावों के लिये अलग से घाट बनाये जाते थे. नाव को चलाने के लिए अनेक नाविक होते थे. कर्णधार उसकी दिशा ठीक करता रहता था.

महाभारत में मार्मिक प्रसङ्ग है. रामायण में राम लङ्कापति रावण से समर करने के लिये समुद्र पार करते हैं. महाभारत की रामकथा में सेतुबन्ध के प्रसंग में नवीनता है. राम सागर को कैसे पार किया जाये इस पर वानर सेना के वीरों के साथ परामर्श कर रहे हैं. कुछ वानर यह सुझाते हैं कि यहाँ के वणिक्-जनों की नावें ले ले कर हम उस पार जा सकते हैं. राम कहते हैं-

नावो न सन्ति सेनाया बह्व्यस्तारयितुं तथाI
वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत्II
(वही, २६६.२८)

(एक तो इतनी नावें मिलेगी ही नहीं कि हम सब उनसे सागर पार कर सकें, दूसरे वणिक्-जनों के व्यवसाय की क्षति हमारे जैसा व्यक्ति कैसे कर सकता है.)

कितने करुणामय हैं वाल्मीकि के राम. वे जानते हैं कि वानर सैनिकों को एक बार संकेत भर दे दिया कि कब्जा कर लो यहाँ से लङ्का जा कर व्यापार करने वाले सारे व्यापारियों के जहाजी बेड़ों या नावों पर– तो वे नावें छीनने के लिये झपट पड़ेंगे और ग़रीब व्यापारी राम-रावण के युद्ध में नाहक मारे जायेंगे. पर महाभारतकाल में भारत और लंका के बीच नावों जहाजों से समुद्रयात्रा तो खूब हो रही है – यह भी इस प्रसङ्ग से स्पष्ट है.

हरिवंशपुराण की कृष्णकथा में इन्द्र विश्वकर्मा को द्वारकापुरी के निर्माण के लिये भेजते हैं. कृष्ण समुद्र को आदेश देते हैं कि उनके कहने से वह यहाँ से अपने जल को सङ्कुचित कर के बारह योजन दूर हटा ले. इससे यह समझा जा सकता है कि जरासन्ध के भय से कृष्ण ऐसे सुरक्षित स्थान पर नगर बसाना चाहते थे, जो पानी से सब ओर से घिरा होने कारण स्वतः एक दुर्ग बन जाये.

माघ ने द्वारका को सागर के बीच में बसी बताया है. आगे चल कर द्वारका के विषय में यह आख्यान या मिथक चल पड़ा कि वह गहरे सागर के भीतर बसी हुई है. दसवीं शताब्दी के महाकवि भट्ट लक्ष्मीधर चक्रपाणिविजय महाकाव्य में कहते हैं कि द्वारका में उषा के लिये अनिरुद्ध की खोज करती करती चित्रलेखा ने निराशा के कारण समुद्र में अपने को गिरा दिया, तब उसने पाताल से भी अधिक विशाल रमणीय नगरी समुद्र के भीतर देखी.

 

5.

सातवीं शती के पूर्वी व्यापारिक मार्ग का परिचय ह्वेनसांग और इत्सिंग के वर्णन से मिलता है. चीन जाने वाले जलयान इतने बड़े होते थे कि उनमें केवल जलयान से सम्बद्ध एक सहस्र आदमी होते थे. इनमें से छह सौ जलयान चलाने वाले तथा ४०० धनुर्धर या भाला चलाने वाले सैनिक होते थे. प्रत्येक बड़े जलयान के साथ तीन छोटी नावें दुर्घटनाओं से बचाने के लिए सम्बद्ध होती थीं.

सातवीं शती के पश्चात् लगभग ६०० वर्षों तक भारत का वैदेशिक व्यापार ईरान और अरब के साथ खूब फला फूला. इन दोनों देशों के नाविक व्यापारी समुद्र तटों से होते हुए बंगाल, आसाम, पूर्वी द्वीप-समूह और चीन तक पहुँचते थे और लौटते हुए भारतीय वस्तुओं को योरप के देशों तक पहुँचाने के माध्यम बनते थे. इस मार्ग के अतिरिक्त अरब के बन्दरगाहों से नावें सीधे भारतीय तट तक आती थीं. भारत के समुद्र-तट से नावों पर जो वस्तुएँ लाई जाती थीं, वे यमन के बन्दरगाह पर उतार ली जाती थीं और वहाँ से स्थल-मार्ग के द्वारा वे मिस्र और फिर यूरोप के देशों में पहुँचाई जाती थीं. नौकास्थानों (पत्तनों या बन्दरगाहों) पर व्यापारियों के सुरक्षित रूप से ठहरने की व्यवस्था राजा की ओर से की जाती थी.

भारत की ओर से जलयान उमान पहुँचते थे और वहाँ से अदन, जद्दा और जार होकर लाल सागर में पहुँचते थे. इस प्रकार लाल सागर के सिरे तक व्यापारिक वस्तुएँ पहुँच जाती थीं.

सातवीं शती के संस्कृत नाटककार कान्यकुब्जनरेश श्रीहर्ष की रत्नावली नाटिका का घटनाचक्र सिंहल और भारत के बीच होने वाली समुद्रयात्रा पर आधारित है.

माघ न केवल अपने महाकाव्य शिशुपालवध में सागर के बीच बसी, दिशाओं को स्वर्णरचित वप्र या परकोटे की आभा से पिशङ्ग बनाती द्वारका का वर्णन करते हैं, समुद्र का भी वर्णन उनका अनूठा है, पर साथ ही कृष्ण के रैवतक पर्वत पर पड़ाव में विभिन्न द्वीपों पर अपना सामान बेच कर नौकाओं में धन लाद लाद कर स्वदेश लौटाने वाले वणिक्-जनों (3.76) को वे नहीं भूलते. माघ लोकजीवन के अनुपम चितेरे हैं. श्रीमाल (वर्तमान में राजस्थान में भीनमाल) उनका निवास था, पर समुद्रतट. वहाँ से की जाने वाली यात्राएँ और वहाँ के बाजार तथा व्यापारिक गतिविधियों को उन्होंने गुजराज तक जा कर प्रत्यक्ष देखा होगा.

दसवीं शती के प्रख्यात गद्यकाव्य तिलकमंजरी का नायक अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट् मेघवाहन का पुत्र हरिवाहन है और नायिका दक्षिण में वैताढ्य पर्वत पर स्थित रथनूपुरचक्रवाल नगरी के विद्याधरचक्रवर्ती चित्रसेन की पुत्री तिलकमंजरी है. सिंहलद्वीप के राजा चंद्रकेतु का पुत्र समरकेतु इस कथा में सहनायक है और कांची के राजा कुसुमशेखर की पुत्री मलयसुंदरी सहनायिका. वाणिज्य और समुद्रयात्रा, सामुद्रिक व्यापार तथा उससे जुड़े अनेक रोचक प्रसंग इस औपन्यासिक कृति में हैं.

बारहवीं शताब्दी के मुनि रामचन्द्र के कौमुदीमित्रानन्द प्रकरण में समुद्रयात्रा के कारण ही सारा रोमाञ्चक और सङ्कटाकुल घटनाचक्र घूमता है. कौमुदी, मित्रानन्द और मैत्रेय समुद्रयात्रा में एक दूसरे से अलग हो जाते हैं.

पुष्पदूषितक एक अत्यंत रोचक प्रकरण था, जो दुर्भाग्य से अनुपलब्ध है. इस प्रकरण के प्रसङ्गों को अभिनवगुप्त, कुन्तक आदि ने उद्धृत किया है. समुद्रदत्त, सार्थवाह सागरदत्त आदि इसके पात्र हैं. यात्रा पर जाते हुए समुद्रदत्त अपनी प्रिया नन्दयन्ती को एक अँगूठी दे कर जाता है. उस अँगूठी के द्वारा आगे चल कर वह अपने पुत्र को पहचान पाता है.

इन प्रसङ्गों में से वेद के तुग्रतनय भुज्यु और वसिष्ठ की समुद्रयात्रा के प्रसङ्गों के साथ रत्नावली नाटिका के प्रसङ्ग को महामहोपाध्याय ओझा जी ने अपनी प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा में उद्धृत किया है. इस पुस्तक की चर्चा आगे की जा रही है.

भारत के लोग धर्मप्रचार तथा व्यापार के लिये समुद्रयात्रा वैदिक काल से मध्यकाल तक खूब करते रहे, समुद्र से रत्न निकालने के लिये गोताखोरी का अभ्यास करने वाले भी प्रत्येक देशकाल में हमारे यहाँ होते रहे. कथा है कि हनुमान् ने वाल्मीकि का मन रखने के लिये पत्थर की शिलाओं पर लिखे अपने रामकथाविषयक अपने नाटक की प्रति समुद्र में बहा दी. कई शताब्दियों के बाद राजा विक्रमादित्य या राजा भोज को सागर से ये शिलाएँ मिलीं, जिन पर यह नाटक उत्कीर्ण था और उन्होंने दामोदर मिश्र से उसका उद्धार करवाया.

रामभद्राम्बा के द्वारा प्रणीत रघुनाथाभ्युदयमहाकाव्य संस्कृत के सर्वश्रेष्ठ महाकाव्यों में एक है. इसमें तञ्जौर के राजा रघुनाथनायक को चरितनायक बनाया गया है. रामभद्राम्बा रघुनाथनायक की साहित्यसभा की सम्मानित विदुषी थीं. इस महाकाव्य में रघुनाथ नायक की विजययात्राओं के प्रसङ्गों में एक प्रसङ्ग है कि रघुनाथ नायक का शत्रु चोलग एक समुद्री द्वीप में छिपा था. राजा रघुनाथ ने एक पुल का निर्माण करवाया और समुद्र के मार्ग से जा कर करके चोलग को पराजित किया. इसके बाद प्रसङ्ग है कि नेपालनरेश अपने सङ्कट का वर्णन करते हुए उनसे सहायता का प्रार्थना करते हैं. रघुनाथ तुरन्त समुद्रतट की ओर प्रस्थान कर देते हैं. समुद्र के पार करने के लिये नावों का पुल बनाया जाता है.

 


(ख)
समुद्रयात्रा पर असमञ्जस और बहस

 

समुद्रयात्रा के वैदिक परम्परा के ग्रन्थों, बौद्धों, जैनों के वाङ्मय में इतने प्रसङ्ग होने पर भी हमारे अपने समय में, विज्ञान और नवजागरण के युग में,  ऐसा कैसे हुआ कि अध्ययन के लिये या देशहित के लिये समुद्रयात्रा करने वाले मनस्वी और मनीषी जनों को तथाकथित धर्मधुरन्धर धर्मध्वजाधारी पुङ्गव पण्डित प्रायश्चित्त के लिये बाध्य करने लग गये?

आनन्दराम बरुवा (१८५०-१८८९) उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी की चिरस्मरणीय और महनीय विभूतियों में से हैं. (असमिया में कदाचित् वोडुवा– या ऐसा कुछ उच्चारण होता है.) उन्होने संस्कृतविद्या पर अपने अनुसन्धान और अध्ययनों से उस काल में नये मानक स्थापित किये. मालतीमाधव की संस्कृत टीका और भारतीय भूगोल आदि पर उनके ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण हैं. वे आसाम के पहले आइ.सी.एस. अफसर थे, देश के पहले आइ.सी.एस अफसर भी थे. आइ.सी.एस. अफसर के रूप में बरुवा निरन्तर लोककल्याण के लिये कार्यरत रहे. उसके साथ शिक्षा के क्षेत्र में– विशेषतः स्त्रीशिक्षा के लिये भी आनन्दराम बरुवा ने महत्त्वपूर्ण कार्य किये. इनमें से नोआखाली में कन्याओं के लिये उन्होंने पाठशाला स्थापित की, जिसमें उस समय के श्रेष्ठ विद्वान् अन्नदाचरण चूडामणि को अध्यापक नियुक्त किया, यही अन्नदाचरण काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए तथा संस्कृत के एक बड़े महाकवि के रूप में भी उनका यश है.

आनन्दराम बरुवा जब विदेश से पढ़ाई पूरी कर के आये, तो समुद्रयात्रा करके परदेस जाने के पाप के प्रक्षालन के लिये उनसे प्रायश्चित्त करने को कहा गया. आनन्दराम बरुआ ने प्रायश्चित्त के अनुष्ठान करने से मना कर दिया. आइ.सी.एस. अधिकारी के रूप में नियुक्ति तथा उत्तम प्रशासन और संस्कृत सेवा सम्बन्धी प्रकृष्ट कार्यों से जो उनकी धाक बनी उसके कारण इस प्रकरण में प्रायश्चित्त के लिये आग्रह करने वालों की तो जिह्वा सदा के लिये बन्द हो गई. पर काशी की महनीय धर्मपरायण धर्मनिष्ठ पण्डितमण्डली अपने आग्रहों का कैसे त्याग करती?

काशी के एक उद्योगपति के सुपुत्र लक्ष्मीचन्द्र अग्रवाल रसायन विद्या का अध्ययन करने के लिये इङ्ग्लैण्ड गये. लौट कर जब वे अपने ज्ञान और प्रशिक्षण के आधार पर एक उद्योग काशी में लगाना चाहते थे, तो अग्रवाल सभा में कुछ लोगों ने उन्हें समुद्रयात्रा का पापी बताते हुए उद्योग लगाने से रोका. इस पर धर्मसभा बुलाई गई, जिसमें काशी की पण्डितमण्डली के मुकुटमणि महामहोपाध्याय शिवकुमार शास्त्री को आमन्त्रित किया गया. उन्होंने सेठ गोविन्ददास जी द्वारा दी गई दक्षिणा राशि लौटाते हुए कहा कि आप की इच्छा के अनुसार में समुद्रयात्रा के पक्ष में व्यवस्था नहीं दे सकता, अतः मेरा आना उचित न होगा.[1]

 

2.

उन्नीसवीं शताब्दी में धर्मशास्त्र के व्याख्याकारों के बीच विधवाविवाह को ले कर जबरदस्त वाद–विवाद चल रहा था, और उसके पक्ष और विपक्ष में संस्कृत में नये धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ लिखे जा रहे थे. अब समुद्रयात्रा को ले कर भी इसी तरह बहस छिड़ गई. समुद्रयात्रा के पत्र और विपक्ष में ग्रन्थ लिखे जाने लगे. बङ्गाल के संस्कृत जगत् के शलाकापुरुष तारानाथ तर्कवाचस्पति (१८१२-१८८५) स्त्रीशिक्षा, विधवाविवाह, आदि समाजसुधार के आन्दोलनों में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के मित्र, अभिभावक और गुरु थे. १८७०ई. में तर्कवाचस्पति ने धर्मशास्त्रों का अध्ययन कर के इस सम्बन्ध में अपना अभिमत पुस्तकाकार प्रकाशित कराया. इस पुस्तक में उन्होंने स्थापना दी कि विद्याध्ययन के लिये कोई छात्र विदेश जाता है, वह अपने वर्णधर्म का त्याग यदि नहीं करता, नित्यनैमित्तिक कर्म करता रहता है, सन्ध्यावन्दन आदि का अच्छी तरह अनुष्ठान भी करता रहता है, तो वह शास्त्र के अनुसार किसी भी पाप का भागी नहीं हो सकता.

तर्कवाचस्पति की यह पुस्तक उस समय इंग्लैंड जा कर भारत लौटने वाले कई व्यक्तियों के लिये बड़ा सहारा बन गई. इन्हीं में से एक थे नेपाल देश के महाराजा जङ्गबहादुरसिंह.

तारानाथतर्कवाचस्पतिचरितम् में रामकृष्ण शास्त्री लिखते हैं,

‘इसी पुस्तक में दी गई व्यवस्था का सहारा ले कर होल्कर राज्य का आवश्यक काम निपटाने के लिये राजा होल्कर बहादुर के द्वारा भेजे गये गणेश के समान बुद्धिमान् गणेशशास्त्री जो बहुत कीर्तिशाली, सदाचारसम्पन्न और आस्तिक थे, म्लेच्छदेश गये और वे पङ्क्तिपावन ब्राह्मण बने रहे.’[2]

रामकृष्ण शास्त्री ने तर्कवाचस्पति की समुद्रयात्रा पुस्तक के मुख्य अंश  अपने तारानाथतर्कवाचस्पतिचरितम् में उद्धृत किये हैं. तदनुसार– यदि व्यापार के काम से, राजा की आज्ञा से कोई व्यक्ति अपने धर्म का अनुष्ठान करता हुआ और म्लेच्छ लोगों से संसर्ग न रखता हुआ वहाँ रहे, और यदि वह ब्राह्मण है तो उसे प्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं है. यदि शूद्र है, तो वह प्रायश्चित्त करके शुद्ध हो सकता है. यदि कोई धर्म के लिये समुद्रयात्रा करता है, या अपना धर्म छोड़ देता है, म्लेच्छों से बहुत संसर्ग करता है, तो प्रायश्चित्त करने पर भी वह पवित्र नहीं हो सकता, भले ही वह ब्राह्मण हो. इसके आगे धर्मशास्त्र के ग्रन्थों तथा पुराणों से इसके लिये प्रमाणस्वरूप उद्धरण तर्कवाचस्पति ने दिये हैं.

तर्कवाचस्पति का कहना है कि हमारे शास्त्र वास्तव में समुद्रयात्रा का निषेध नहीं करते. म्लेच्छों के संसर्ग में  उनके साथ अन्न-जल ग्रहण करने पर प्रायश्चित्त का विधान शास्त्र करते हैं, इससे स्पष्ट है कि समुद्रयात्रा तो की जा सकती है, पर म्लेच्छों के देश में म्लेच्छसंसर्ग वर्जित है.

किसी कार्य का जब तक निषेध न किया जाये, तब तक वह वर्जनीय है, यह नहीं मान लेना चाहिये. समुद्र में नौका से यात्रा करने से पाप होता है– यह भी किसी शास्त्र  नहीं कहा गया. इसके आगे कलियुग में वर्जनीय बातों के विषय में बृहन्नारदीयराण का लम्बा उद्धरण दे कर उस पर टीका तर्कवाचस्पति ने की है तथा निष्कर्ष दिया है इस पुराण में समुद्रयात्रा को जहाँ वर्जनीय बताया गया है, वहाँ आशय दूसरे के धर्म को स्वीकार करने के लिये की गई समुद्रयात्रा से है, वाणिज्य तथा विद्याध्ययन के लिये की गई समुद्रयात्रा से नहीं.

तर्कवाचस्पति ने प्राचीन ऋषियों के उदाहरण भी दिये गये हैं, जिन्होंने समुद्रयात्रा की. पराशरस्मृति में शतयोजन विस्तीर्ण रामसेतु का दर्शन ब्रह्महत्या के पाप को भी दूर करने वाला कहा गया है. समुद्र के किनारे से दूर से सेतु की झलक तो पाई जा सकती है, पर शतयोजन विस्तीर्ण सेतु का दर्शन  जहाज में बैठे बिना और उस तक पहुँचे बिना कैसे किया जा सकता है? यदि कहा जाये, कि दूर से थोड़ा-सा दर्शन कर लेने पर ही पाप दूर हो ही जायेगा, तो यह कहना ठीक नहीं, क्यों कि ब्रह्महत्या का महापाप सम्पूर्ण सेतु के दर्शन से ही दूर हो सकता है, दूर से यत्किञ्चित् देख लेने से नहीं. मीमांसा दर्शन में जैमिनि ने कहा ही है कि सम्पूर्ण प्रयास करने ही सम्पूर्ण फल मिलता है. इसके आगे तर्कवाचस्पति ने याज्ञवल्क्यस्मृति, वेद के भाष्यकारों सायण, माधवाचार्य तथा वेदान्त के ग्रन्थ वेदान्तपरिभाषा से सन्दर्भ दिये हैं तथा बताया है कि संस्कृत नाटकों से नायकों के द्वारा समुद्रयात्रा के भी उल्लेख मिलते हैं, भाषाचण्डी नामक पुस्तक में श्रीमन्त नामक व्यापारी के समुद्रयात्रा का वर्णन है. तर्कवाचस्पति का कहना है कि इसी परम्परा में आज भी वाणिज्य के लिये व्यापारी समुद्रयात्रा करते हैं.

निष्कर्ष यह है कि धर्मप्रचार या दूसरे के धर्म के स्वीकार के लिये समुद्रयात्रा करना तो निषिद्ध है, अन्य कार्यों से समुद्रयात्रा करना निषिद्ध नहीं है.

 

3.

परम्परा की ग्लानि और नवीन स्फुरण की आवश्यकता का अवसर एक बार फिर उस समय उपस्थित हुआ जब जयपुर के महाराज सवाई माधवसिंह को १९०२ ई. में आयोजित एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक में इङ्ग्लेण्ड जाना था. माधवसिंह की राजसभा से सम्बद्ध एक धर्मसभा थी, जिसकी स्थापना महाराजा ने ही की थी. इसे मौजमन्दिर सभा कहा जाता था. इसमें जयपुर के बड़े-बड़े पण्डित सदस्य थे. इस धर्मसभा के धर्म और परम्परा को रूढ़ और जड मान कर चलने वाले पण्डितों ने उनकी समुद्रयात्रा को धर्मसम्मत नहीं माना. एक जटिल स्थिति उत्पन्न हुई.

महाराजा ने महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा से परामर्श किया. वे उस समय तक मौजमन्दिर सभा के सदस्य नहीं थे. वे जयपुर के महाराजा संस्कृत कालेज में प्रोफेसर थे. अन्ततः ओझाजी की परम्परा की सही समझ महाराजा माधवसिंह के क्लेश और द्वन्द्व के निवारण का उपाय बनी. यह ओझाजी की मनस्विता और धर्म के नाम पर फैलाये जाने पर मिथ्या प्रपञ्च को चुनौती देने का साहस भी कहा जा सकता है कि महाराजा के अनुरोध पर ओझा जी स्वयं भी उनके साथ १९०२ ई. में इङ्ग्लेण्ड गये.

अठारहवीं उन्नीसवीं शताब्दियों में भारत के नैष्ठिक ब्राह्मणों में किसी ने इसके पहले कदाचित् ही ऐसा जीवट से भरा साहस किया होगा. फिर महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा तो हमारे समय के एक मूर्धन्य विद्वान् और वेद के मौलिक भाष्यकार के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित कर रहे थे. अपने विचारों में वे परम्परा के परम पक्षधर हैं. उन्होंने समुद्रयात्रा कर के एक जोखिम उठाया. इतने तक ही वे नहीं रुके. वापस आ कर भविष्य में आने वाली भारतीय सन्ततियों के सामने ऐसे असमञ्जस की स्थिति न हो, इस उद्देश्य से उन्होंने प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा नामक पुस्तक की रचना की. इस पुस्तक में महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा ने समुद्रयात्राविषयक सारे मन्तव्यों और साहित्यिक उल्लेखों का पुनःसन्धान किया.

उनका निष्कर्ष यह है कि स्वदेश के कल्याण और स्वधर्म के पालन के लिये समुद्रयात्रा करना वर्ज्य ही नहीं, संस्तवनीय है. इस अर्थ में बीसवीं शताब्दी से इनेगिने मूर्धन्य पण्डितों में एक होते हुए भी मधुसूदन ओझा उनसे कितने अलग हैं.

सवा सौ साल पहले किया गया मधुसूदन ओझा का यह उपक्रम आज मामूली बात लग सकती है, और कहा जा सकता है कि नाहक इसे तूल दिया कोई जहाज में बैठ कर उस पार चला गया तो हो क्या गया? सवा सौ साल पहले के पारम्परिक भारत और उस समय के हिन्दू समाज का ध्यान करें, तो उनका इङ्ग्लेण्ड जाना और प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा रचना अपने आप में क्रान्तिकारी घटनाएँ थीं.

ओझाजी की प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा परम्परा की तात्त्विकता का परीक्षण करते हुए और आधुनिकता से उसके बलात् खड़े किये जा रहे कलह का सहज निवारण करती है.

महामहोपाध्याय विद्यावाचस्पति पण्डित मधुसूदन ओझा की कृति संस्कृतरत्नाकर मासिक में पूर्व में प्रकाशित हुई थी. संस्कृतरत्नाकर उस समय की बड़ी तेजस्विनी संस्कृत पत्रिका थी. यदि ओझा जी ने इसे पत्रिका के सम्पादक और संस्कृत के बीसवीं सदी के एक युगप्रवर्तक साहित्यकार मथुरानाथ शास्त्री को स्वयं छापने के लिये दिया, तो यह भी ओझा जी की, आज के मुहावरे में, प्रगतिशील सोच का परिचायक है.

पण्डित रामदेव शर्मा के हिन्दी अनुवाद के साथ बाद में यह पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुई. इसका पुनः सानुवाद प्रकाशन राजस्थान संस्कृत अकादेमी जयपुर से २००३ में किया गया.

महामहोपाध्याय मधुसूदन  ओझा (१८६६-१९३९) वेद के एक अप्रतिम भाष्यकार हैं. उन्होंने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों में वेदाध्ययन की नवप्रतिष्ठा की. उनका सम्पूर्ण जीवन वेदरक्षा और वेदशिक्षा को समर्पित रहा, इसके साथ ही वे परम्परा की गतिशीलता और नवोन्मेष के भी एक जीवन्त प्रतीक हैं. उनके अध्ययन में मिथिला, काशी और जयपुर की तीन विद्यापरम्पराओं की त्रिवेणी का समागम हुआ. वे आधुनिक विश्व के लिये वेद और ब्राह्मणग्रन्थों  की नवीन व्याख्या के एक अग्रदूत बने. वास्तव में ओझा जी पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि के स्तर के वैयाकरण हैं, पिङ्गल और भरतमुनि के समतुल्य छन्दःशास्त्रविधानज्ञ हैं, कपिल, कणाद, गौतम और जैमिनि की कक्षा के दार्शनिक हैं तथा स्कन्द, उद्गीथ, सायण और श्रीअरविन्द के समतुल्य वेद के भाष्यकार हैं.

पण्डित मधुसूदन ओझा ने संस्कृत में लगभग दौ सौ मौलिक ग्रन्थों की रचना की. अधिकांशतः ये ग्रन्थ वेदविषयक हैं. प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा उनकी अपेक्षाकृत लघुकाय पुस्तक है. इसमें धर्मशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक युग में की जाने वाली समुद्रयात्रा या विदेशयात्रा के औचित्य पर विचार किया गया है.

महामहोपाध्याय मधूसूदन ओझा अपने पूर्ववर्ती तारानाथ तर्कवाचस्पति की पुस्तक से परिचित नहीं थे– यह उनकी प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा से स्पष्ट है. उन्होंने स्मृतियों, धर्मशास्त्र के ग्रन्थों के अनेक सन्दर्भ वे ही दिये हैं, जो तारानाथ दे चुके थे. पर उनकी यह पुस्तक तारानाथ के समुद्रयात्राविषयक प्रबन्ध की तुलना में पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष की प्रबल तर्कों के साथ सर्वाङ्गीण प्रस्तुति की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है. ओझा जी ने जितने प्राचीन ग्रन्थों के प्रामाणिक उद्धरण दिये हैं कि पाठक उनकी असाधारण मेधा, अनुसन्धान की अद्भुत क्षमता पर चकित हुए बिना नहीं रह सकता. यद्यपि आधुनिक शोध की प्रणाली के अनुसार वे सन्दर्भ नहीं देते. आजकल के शोधकर्ताओं के लिये यह पुस्तक एक सबक भी है कि स्रोतःसामग्री का चयन कैसे किया जाये, और अपने प्रतिपाद्य को सन्दर्भों से कैसे पुष्ट किया जाये.

पराशर स्मृति, कालमाधव, निर्णयसिन्धु, बृहन्नारदीयपुराण, हेमाद्रि का ग्रन्थ, आदित्यपुराण, संस्कार-कौस्तुभ, मनु शुक्र, शंख, वशिष्ठ और मरीच्यादि स्मृतियाँ,  माधवीय-स्मृति, मुक्ताफल, बोधायन, वायुपुराण, वृद्धपराशर, आपस्तम्बसूत्र, सुमन्तु सत्यव्रत, बृहस्पति, मिताक्षरा, नारदस्मृति, मनुस्मृति के व्याख्याकार रघुनन्दनाचार्य भविष्यपुराण, प्रायश्चित्तविवेक, टीकाकार गोविन्दानन्द, मीमांसा-बालप्रकाश, माधवीय, पृथ्वीचन्द्रोदय, सामवेद, विष्णु-सूक्त, स्मृतिरत्नाकर, विधानपारिजात तथा भाष्यकार सायण के साथ काव्यों में कालिदास का रघुवंश, महाभारत, राजतरङ्गिणी, जानकीहरण काव्य आदि के मूल उद्धरण देते हुए मधुसूदन ओझा अपने मतको उपन्यस्त करते हैं.

ओझा जी ने ग्रन्थों से तो मूल पाठ उद्धृत किया है, पर ग्रन्थ के अध्यायसङ्ख्या या पर्वसङ्ख्या श्लोकसङ्ख्या आदि का सन्दर्भ नहीं दिया. अनुवादक रामदेव शर्मा ने भी अपने अनुवाद में ग्रन्थों से सन्दर्भ अङ्कित नहीं किये. यहाँ यह कह देना भी जरूरी समझता हूँ कि यह अनुवाद निहायत गैर-जिम्मेदाराना ढङ्ग से किया गया है, और कहीं-कहीं ग़लत भी है. इस लेख में यथासम्भव सन्दर्भ दिये गये हैं. यह युवाशोधकर्ताओं के लिये एक कार्य है कि वे इस ग्रन्थ के सारे उद्धरणों के प्रामाणिक संस्करणों से सन्दर्भ खोजें.

पण्डित मधुसूदन ओझा जयपुर के प्रतिष्ठित संस्कृत महाविद्यालय में आचार्य थे. वहाँ के पुस्तकालय का उन्होंने उपयोग किया ही होगा. वे महाराजा सवाई माधवसिंह (द्वितीय) के समय में वे धर्मसभा के सदस्य बने तथा बाद में अध्यक्ष भी रहे. संवत् १९५२ में (ई. सन् १८९५-९६) में उन्होंने महाराजा के सङ्केत पर राजकीय पोथीखाने (पुस्तकालय) की देखरेख के कार्य के लिए आवेदन किया और वे पोथीखाने में कार्य करने लगे. यहाँ उन्हें मूल ग्रन्थ और भी सहजता से मिलने लगे (जयपुर पोथीखाना की पत्रावलियों में उक्त संदर्भ दर्ज है).

महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज के विषय में कहा जाता है कि वे जब सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष रहे, तो उन्होंने पुस्तकालयाध्यक्ष की सारी परिभाषा को बदल दिया. राजेश्वर शास्त्री द्रविड के अनुसार कविराज जी अपने पुस्तकालय में एक लाख पुस्तकों को कण्ठगत कर चुके थे, और उन पर साधिकार चर्चा कर सकते थे. लगता है कि मधुसूदन ओझा जी ने जयपुर महाराज के पोथीखाने का काम सँभालते हुए वहाँ की सारी पोथियों को देख, पढ़ और समझ लिया है.

 

4.

प्रत्यन्तदेश की सीमाएँ

ओझा जी की पुस्तक प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा यह नाम भी बड़ा सटीक है. प्रत्यन्त का लक्षण इस प्रकार बताया गया है-

देशः प्राग्दक्षिणः प्राच्यः उदीच्यः पश्चिमोत्तरःI
प्रत्यन्तो म्लेच्छदेशः स्यात् मध्यदेशस्तु मध्यमःII

इस लक्षणवाक्य में चार देश उद्दिष्ट हैं– प्राच्य देश, उदीच्य देश, म्लेच्छ देश तथा मध्यमदेश. म्लेच्छदेश ही प्रत्यन्तभूमि है. इसका शाब्दिक अर्थ है-

प्रतिगतो अन्तमिति प्रत्यन्तःI

प्रत्यन्त तक साम्राज्य की रक्षा का दायित्व चक्रवर्ती सम्राट् का होता था. रघुवंश में कालिदास कहते हैं-

सगुप्तमूलप्रत्यन्तः शुद्धपार्ष्णिरयान्वितः
रघु ४.२५

प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा कलिवर्ज्यताखण्डनम्, समुद्रयायिनः श्राद्धवर्ज्यताखण्डनम्, ब्राह्मणवर्ज्यत्वम् आदि खण्डों विभाजित है.

 

 5.

व्यापक दृष्टि, विश्वबोध तथा ग्रन्थ के अनुबन्धचतुष्टय

प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा का प्रथम मङ्गल पद्य ही महामहोपाध्याय पण्डित मधुसूदन ओझा की विश्वदृष्टि को उन्मीलित करता है.

आत्मा भूमिर्भुवनं पवनः पवमानपावकौ गगनम् I
रविरिति यस्य हि तनवो दुरितादवतादनारतं स शिवः ॥१॥

अष्टमूर्ति शिव के स्तवन के द्वारा ओझा जी ने अपने ग्रन्थ के उद्देश्य, लक्षण और परीक्षा तथा अनुबन्धचतुष्टय (अधिकारी, विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन) का भी सङ्केत कर दिया है. निखिल भुवन के कण-कण में शिव समाये हुए हैं. इसलिये समस्त जगत् को ईशाधिवासित मान कर उसमें सर्वत्र परमतत्त्व का दर्शन करने वाले के लिये कौन-सा देश वर्ज्य हो सकता है? फिर धर्मरक्षा के लिये प्रत्यन्तदेशगमन का अवसर हो, तो इसमें हिचकिचाहट क्यों? इसलिये अगले पद्य में ग्रन्थ का अभीष्ट बता दिया है. अगला पद्य है-

प्रत्यन्तदेशं व्रजतामार्याणां धर्मरक्षिणाम् I
इयं प्रस्थानमीमांसा धर्माधर्मौ विवेचयेत् ॥२॥

धर्म की रक्षा करने वाले श्रेष्ठ आर्य जनों की प्रत्यन्तदेशयात्रा का उनके धर्म या अधर्म के विचार के लिये यह प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा लिखी जा रही है. आशय यह कि सभी आर्यजन इस ग्रन्थ के अध्ययन के अधिकारी हैं, विशेषतः वे आर्यजन जो प्रत्यन्तदेश या भारत के बाहर के किसी देश में जाने का विचार कर रहे हैं या कर सकते हैं. प्रत्यन्तदेशगमन के औचित्य अनौचत्य पर विचार इस ग्रन्थ का प्रयोजन है.

आर्यजन शब्द का प्रयोग ओझा जी ने वैदिक परम्परा से अपने जुड़ाव के कारण किया है, आर्यसमाज से इसका सम्बन्ध नहीं है.

  

6.
ओझा जी की सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टि

इस पुस्तक से सवा सौ साल पहले के भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों की कुछ झलक मिलती है, तथा देश, समाज और धर्म के स्वरूप पर ओझा जी के दृष्टिकोण की भी यह परिचायक है.  आरम्भ में ही ओझा जी बताते हैं –

अथेह कश्चित् त्रैवर्णिकधर्मपक्षपाती क्षत्रियवीरः सूर्य्यवंशावतंसो महाराजाधिराजः प्रत्यन्तदेशस्थप्रभुवरसम्राड्विशेषराज्याभिषेकमहोत्सवोपलक्षे सत्कृत्याभिनिमन्त्रितो- ऽनुल्लङ्घनीयबलवद्राजनिदेशमनुरुध्य नव्यतरमेकमर्णवपोतं बहुमूल्यदानेन स्वायत्तीकृत्य वेदमन्त्राभिमन्त्रिताभिरद्भिरभिनिर्णिक्तं सकुशश्रीगङ्गाजल-प्रोक्षितं वास्तुप्रतिष्ठया च प्रतिष्ठिताभिर्देवताभिरधिष्ठितं तमारुह्य परःशतपरिचरपरिवारशूर-सामन्तसहितो विद्वद्धिर्ब्राह्मणैश्च विभूषितः समुद्रमार्गेण म्लेच्छदेशमगच्छत्I तत्र च सहगच्छतां सर्वेषामेव योगक्षेमाय सम्भावितोपयोगामर्थसामग्रीमेकान्ततः स्वदेशसम्भूतामेव सहोपनिनायI श्री गङ्गाजलप्रधानेनैवाभ्यवहरणादिव्यवहारेण च तत्र समयमतिवाहपामास
तदित्थं सम्भृत्य-सम्भारो विदुषां ब्राह्मणानामुपदेशानुसारेण त्रैवर्णिकधर्मरक्षानुकूलविशिष्टप्रबन्ध- माहात्म्याशयादंशतोऽपिसमुचिताहारविहारादिसम्बन्धेन नित्यनैमित्तिकधर्मानुष्ठानादि-सम्बन्धेन वा धर्महानिमजनयन्नेव तत्र प्रत्यन्तदेशे द्वित्रिमासानुषित्वा स्वाचारविचारमनु-वर्तमानः पुनरेव स्वदेशमार्यावर्तं कृतकृत्यः प्रत्यावर्ततI सर्वैरपि चार्यधर्ममनुवर्तमानै- र्महाराजाधिराजैरन्यैश्च त्रैवर्णिकप्रवरैः सादरं साभिनन्दनञ्च सम्मानितःI

तद्यद्येवमेवान्योऽपि कश्चित् त्रैवर्णिकः प्रत्यन्तदेशं गत्वा प्रतिनिवर्तेत्त, तर्हि तस्य तथा प्रवर्तमानस्य कश्चित् प्रत्यवायगन्धः शास्त्रमर्यादया प्राप्नोति न वेत्युपतिष्ठते जिज्ञासा I

(ऐसा हुआ कि ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य रूप त्रैवर्णिक धर्म की दृढ़तापूर्वक रक्षा करने वाले किसी क्षत्रिय वीर को, जो कि सूर्यवंश का कुलभूषण है, प्रत्यन्त देश के सम्राट् के विशिष्ट राज्याभिषेक महोत्सव के उपलक्ष्य में सत्कारपूर्वक निमन्त्रित किया गया. राजादेश का अनुल्लङ्घनीयरूप से पालन करना था, इसलिये पालनीय होने के कारण उस क्षत्रिय वीर ने एक एकदम नवीन जहाज बहुमूल्य राशि प्रदान करके स्वायत्त किया, उस जहाज को वैदिक मन्त्रों से अभिनिर्णिक्त कराया, कुशसहित  और गङ्गाजल का प्रोक्षण उस पर कराया, वास्तु-प्रतिष्ठा विधि से उस जहाज में प्रतिष्ठापित  देवताओं को उस जहाज पर अधिष्ठित करवाया. फिर वह क्षत्रियवीर, सैकड़ों सेवक-जनों से घिरा हुआ, सामन्तों के साथ, विद्वान् ब्राह्मणों से विभूषित हो कर समुद्र मार्ग से म्लेच्छ देश गया. वहाँ साथ जाने वाले समस्त परिजनों के योग-क्षेम के लिए सम्भावित समस्त उपयोग सामग्री, जो पूर्ण रूप से स्वदेशी थी, वह साथ में ले गया.

गङ्गाजल से निर्मित भोजन का ही वह वहाँ उपभोग करते हुए उसने वहाँ समय बिताया. इस प्रकार समस्त सामग्री से युक्त होकर तथा विशिष्ट विद्वान् ब्राह्मणों के आदेश के अनुसार त्रैवर्णिक धर्म की रक्षा के अनुकूल विशिष्ट प्रबन्ध के माहात्म्य के कारण उसने समुचित आहार विहार के सम्बन्ध के कारण रत्ती भर भी उसने धर्म की हानि नहीं होने दी. इस प्रकार प्रत्यन्त देश में दो–तीन महीने बिता कर अपने आचार-विचार का पालन करता हुआ वह फिर स्वदेश आर्यावर्त में कृतकृत्य हो कर लौट आया. लौट कर आने पर उस वीर का महाराजाधिराजों तथा तीनों वर्णों के श्रेष्ठ जनों के द्वारा सादर अभिनन्दन किया गया.

इस प्रकार उसी के जैसा यदि अन्य भी कोई त्रैवर्णिक ऐसे ही प्रत्यन्तदेश जा कर उसके ऐसा करने से शास्त्र की मर्यादा के अनुसार कोई प्रत्यवाय का गन्ध तो नहीं आ जायेगा– यह यहाँ जिज्ञासा है.)

प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा का रामदेव शर्मा का जो हिन्दी अनुवाद छपा है, उसमें नौका या जहाज को धुलवा कर गणेशादि देवों की स्थापना करके स्वयं उसमें बैठे– यह अनुवाद किया गया है. यह स्वैर अनुवाद है, ओझा जी ने वैदिक पद्धति से नौका की प्रतिष्ठाविधि का वर्णन किया है, जिसके अंश को शर्मा जी ने छोड़ दिया है. आगे अनुवाद में लिखा है-

‘इस प्रकार वे जयपुर नगर में सनातन धर्म के अनुयायी धार्मिक पुरुषों, अनेक त्रैवर्णिक श्रेष्ठों तथा राजा-महाराजाओं द्वारा सम्मानित रूप से अभिनन्दन प्राप्त करके सुखपूर्वक राजमहल में विराजमान हुए.’

ओझा जी की मूल पुस्तक में न तो कहीं भी जयपुर नगर का नाम लिया गया है, औ न महाराजा माधवसिंह का नाम कहीं लिया गया है. जयपुर के राजमहल  महाराजा के लौट कर आने की बात भी ओझा जी ने नहीं कही. वे न किसी श्रत्रिय वीर को नायक बनाते हैं, और न उसे स्वदेश आर्यावर्त में लौट कर आने की बात कहते हैं. रामजेव जी का मनमाना अनुवाद है. ओझा जी की दृष्टि का इसमें कुछ हनन होता है.

ओझी जी मनस्वी पण्डित हैं. काशी में उनके समय के दिग्गज पण्डित इस समय महारानी विक्टोरिया की प्रशस्ति में धड़ाधड़ विक्टोरियाष्टकम् और विक्टोरियाचरितम् जैसे काव्य रच रहे हैं. हिन्दी साहित्य के युगपुरुष भारतेन्दु तक महाराज एडवर्ड के आगमन पर संस्कृत और हिन्दी में उनके सम्मान में दो कवितासङ्ग्रह सम्पादित और मुद्रित करवा कर उन्हें समर्पित करने के लिये जाते हैं और इसके लिये स्वयं सम्मानित होते हैं.

गाँधी को कई दशकों बाद अवतरित होना है, तिलक के आने की भी कोई आहट अभी नहीं है. सामान्य जनों और विशेष रूप से सदा से राजभक्त रहे काशी के संस्कृतपण्डित समाज में ‘अंग्रेजराज सब प्रजा सुखारी’ का भाव ही है. इस परिप्रेक्ष्य में ओझा जी को इस बात का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिये कि उन्होंने अंग्रेजराज के लिये न तो कोई प्रशस्ति के वचन उचारे, न किसी शासक का कहीं कोई नाम तक अपनी पुस्तक में लिया, अपने शिष्यतुल्य महाराज सवाई माधवसिंह के लिये भी रञ्चमात्र चाटुकारिता करने का कोई उपक्रम कहीं नहीं किया. संस्कृत के ग्रन्थों में प्रायः आदि  में अन्त में या कम से कम पुष्पिका या ग्रन्थान्तवचन में तो अपने समय के राजा के लिये कुछ स्वस्तिवाक् रहती है. ओझा जी ने ग्रन्थ के मन्तव्य का ध्यान कर इसकी भी आवश्यकता नहीं समझी. मन्तव्य सार्वभऔम मानवता का कल्याण है, जयपुरनरेश का कल्याण नहीं, उसे तो वे पहले कर चुके हैं.

पूरे उपोद्घात वक्तव्य  में ओझा जी जिन बातों पर जोर दे रहे हैं वे हैं– वैदिक धर्म की स्थापना, वैदिक आचार व्यवहार का पालन, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग तथा विदेश में जाना पड़े तो वहाँ अपने आचार–विचार का निर्वाह करना.

उपर्युक्त उपोद्घात से स्पष्ट होता है कि समुद्रयात्रा पर मौज मन्दिर की धर्मसभा के धर्मज्ञ पण्डितों की ओर से उठाई गई विप्रतिपत्ति का तो महाराजा की इङ्ग्लैण्ड यात्रा के पहले ही ओझा जी के अभिमत के साथ निराकरण हो गया था. अतः महाराजा सवाई माधवसिंह ने महामहोपाध्याय ओझा जी के अभिमत को स्वीकार कर के जब इङ्ग्लैण्ड जाने का निश्चय किया और इङ्ग्लेण्डयात्रा भी की तथा वहाँ से लौट कर आये– तब उनका सर्वत्र निर्विकल्प निर्द्वन्द्व भाव से सबके द्वारा स्वागत दिया गया. अतः इस पुस्तक की रचना का उद्देश्य महाराजा की यात्रा को निर्विकल्प, निर्द्वन्द्व बनाना नहीं था, ऐसी निर्विकल्पता और निर्द्वन्द्वता तो सिद्ध हो गई थी. तब इसका साध्य भविष्य के लिये मार्गदर्शन तथा लोककल्याण ही माना जाना चाहिये.

 

7.
पूर्वपक्ष

समुद्र यात्रा के सम्बन्ध में पूर्वपक्षी कहते हैं कि समुद्रमार्ग द्वारा विदेशगमन करने वाले तीनों वर्गों को अवश्य ही तीन प्रकार के घोर पापों का भागी होना पड़ता है. वे पाप हैं –

(1) समुद्र यात्रा करने से उत्पन्न दोष,

(2) प्रत्यन्तदेशगमन से होने वाले दोष,

(3) पतित-जनों के संसर्ग से होने वाले दोष.

पूर्वपक्ष की प्रस्तुति के लिये ओझा जी ने यहाँ पराशरमाधवीय, निर्णयसिन्धु आदि ग्रन्थों में उद्धृत बृहन्नारदीय पुराण तथा हेमाद्रि के ग्रन्थ में उद्धृत आदित्यपुराण और संस्कारकौस्तुभ आदि ग्रन्थों से अविकल उद्धरण प्रस्तुत किये हैं. इन सभी उद्धरणों में समुद्रयात्रा कलिवर्ज्य कृत्यों की सूची में सम्मिलित है. इसके साथ ही मनु के ये वचन पूर्वपक्ष की कुक्षि में निक्षिप्त करते हुए उन्होंने उद्धृत किये हैं–

अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयीI
समुद्रयायी बन्दी च तैलिकः कूटकारकःII

एतान् विगर्हिताचारानपाङ्क्तेयान् द्विजाधमान्I

द्विजातिप्रवरो विद्वानुभयत्र विवर्जयेत्II

(घरों में आग लगाने वाले, विष खिला कर हत्या करने वाले, कुण्ड या जारज पुरुष के साथ भोजन करने वाले, विष का विक्रय करने वाले, समुद्रयात्रा करने वाले, जलयात्री, विष-तेल बनाने वाले, विषयुक्त वस्तु बनाने वालो या इसप्रकार के निन्दनीय कर्म करने वाले एवं जाति बहिष्कृत अधम ब्राह्मणों को श्रौत स्मार्त कर्मों में सम्मिलित नहीं किया जाय.)

इसी प्रकार के कथन शुक्रस्मृति, शङ्खस्मृति तथा वसिष्ठस्मृति से भी ओझा जी ने उद्धृत किये हैं. मरीचि का भी ऐसा ही कथन है. आदित्यपुराण में तो देवर के साथ नियोग करके सन्तान उत्पन्न करने वाली विधवा और जहाज से समुद्रयात्रा कर के लौट कर आये हुआ ब्राह्मण- इनको प्रायश्चित्त कर लेने पर भी कलिवर्ज्य माना गया है. पराशर भी यही कहते हैं –

समुद्रयानगमनं ब्राह्मणस्य न शस्यते I
सम्भवेद् यदि मोहेन पुनः संस्कारमर्हति II

इसी प्रकार उशनस्, शङ्ख, वशिष्ठ और मरीचि आदि के स्मृतिवचनों में समुद्रयात्रा का निषेध ब्राह्मण के लिये विशेष रूप से किया गया है. पर पराशर तो ब्राह्मण के लिये समुद्रयात्रा प्रशंसनीय नहीं है– यह कह कर प्रकारान्तर से अन्य वर्णों के लिये समुद्रयात्रा के अनुमत होने का संकेत दे देते हैं.[3]

संस्कार-कौस्तुभ में लिखा है कि

“नौका द्वारा समुद्रयात्रा करने वाले ब्राह्मण का शोधन करके भी संग्रह नहीं करना चाहिये.”

इस नियम के आधार पर विदेशगमन करके लौटने पर पुनः संस्कार किये जाने पर भी ब्राह्मण का शोधन न मानने के कारण कलियुग में विदेशयात्रा का निषेध किया गया है. इस प्रकार संस्कारकौस्तुभ प्रायश्चित्त करने पर भी बहिष्कार जारी रखने का निर्देश देता है. शुक्र, शङ्ख, वशिष्ठ और मरीच्यादि स्मृतियों में लिखा है कि वेद को बेचने वाले (पैसा लेकर पढ़ाने वाले), समुद्रपार यात्रा करने वाले तथा असमान वर्ण के लोगों को यज्ञ कराने वाले पतित होते हैं.

समुद्रयात्रा कर ली गई है तो उसके लिये तीन वर्ष तक चलने वाले  प्रायश्चित्त के अनुष्ठानों का निर्देश भी इन स्मृतिकारों ने किया है. इन सभी स्मृतियों में आर्यावर्त और वहाँ के निवासियों की श्रेष्ठता का अभिमान है, प्रत्यन्तदेशों अथवा  आर्यावर्त के बाहर के देशों को म्लेच्छदेश कहा गया है. समुद्रयात्रा हो या आर्यावर्त के बाहर के देशों में स्थलमार्ग से गमन– दोनों समान रूप से पातित्यप्रयोजक या पतन के गर्त में गिराने वाले कहे गये हैं. सौवीर, सौराष्ट्र और विदेशों में निवास करने वाले भी पतित ही हैं, तथा बिहार, बंगाल, उड़ीसा जाने पर पुनः संस्कार की आवश्यकता होती है.

म्लेच्छदेश का एक सुस्पष्ट लक्षण ही इन स्मृतिकारों के वचनों से यह निर्धारित होता है कि जिस देश में चातुर्वर्ण्यव्यवस्था न हो वह म्लेच्छदेश है. जहाँ चातुर्वर्ण्यव्यवस्था हो वह आर्यावर्त है.[4]

म्लेच्छदेश में गमन तो पातित्यप्रयोजक या अधःपतित करने वाला है ही, म्लेच्छ के बनाये हुए कूप, सरोवर आदि में स्नान या इनके जल का पीने के लिये उपयोग भी उसी प्रकार निषद्ध है. वृद्धपराशर के अनुसार चाण्डालों के द्वारा खोदे कुए कूप या प्रत्यन्तदेशों के कूप तथा अन्त्यजों के द्वारा काम में लाये गये कूप वर्जनीय हैं.[5]

बोधायन कूप के साथ सेतुओं का भी उपयोग वर्जित मानते हैं.[6]

हेमाद्रि द्वारा उद्धृत ब्रह्माण्डपुराण के अनुसार जिस कूप का सबके लिये उत्सर्ग न किया गया हो, जहाँ म्लेच्छ पानी पीते हों उसका जल स्नान और पान के लिये वर्ज्य है. किसी सम्पन्न व्यक्ति के द्वारा बनवाये गये कूप, तडाग आदि को सार्वजनिक बनाने के लिये उत्सर्गविधि नाम से अनुष्ठान किया जाता रहा है. उत्सर्गविधि यदि सम्पन्न नहीं हुई है, तो ऐसे कूप, तडाग के जल का सेवन पातित्यप्रयोजक माना जाता है.

कलिवर्ज्य से आशय उन कृत्यों से है जो सत्ययुग, त्रेता युग या द्वापर युग तक किये भले ही वर्ज्य न रहे हों, पर पर कलियुग में आचरणीय नहीं रह गये. इन कृत्यों को कलियुग में करने पर प्रायश्चित्त का विधान है, प्रायश्चित्त न करने वाला भी कलिवर्ज्य या बिरादरी से बाहर हो जाता है.

ओझा जी पूर्वपक्ष की ओर से इस प्रकार के छत्तीस वचनों को उद्धृत करते हैं. फिर पूर्वपक्षी इनके आधार पर जो निष्कर्ष देता है उसे उसके शब्दों में बताते हुए कहते हैं –

इत्येवंविधानेकवाक्यबोधितप्रतिषेधविषयाणां म्लेच्छदेशेनान्तरीयकतासिद्वेन पतितसंसर्गेण दूषिताहारविहारनित्यनैमित्तककर्मानुष्ठानादिविषयजातानामनुष्ठानाननुष्ठानयोरुभयथापि तत्कर्मातिपातसम्भवादवश्यं तादृशपतितसंसर्गं कुर्वाणस्य त्रैवर्णिकस्य पातित्ययोग्यता प्राप्नोतीति सिद्धम्I

(इस प्रकार अनेक वचनों द्वारा बोधित विषयों में से म्लेच्छ देशों में गमन करने पर पतित-जनों से संसर्ग अवश्य हो जाता है इस कारण तथा वहाँ के दूषित आहार-विहार आदि से, नित्य-नैमित्तिक अनुष्ठान न करने से, वहाँ के पतित जनों से संसर्ग करने से तीनों वर्णों के लोगों का पतन हो जाता है – यह सिद्ध हुआ.)

 

 

8.
उत्तरपक्ष

पूर्वपक्ष की इतनी प्रबल तर्ककर्कश प्रस्तुति के पश्चात् उसके प्रतिवाद में ओझा जी का उत्तरपक्ष बड़ा सधा हुआ और सटीक है. यह उनकी विश्लेषणक्षणता और सूक्ष्मेक्षिका का प्रमाण है. पहली बात तो वे यह कहते हैं कि जितने भी छत्तीस वचन स्मृतियों से समुद्रयात्रा को पातित्यप्रयोजक बताने के लिये उद्धृत किये गये हैं, उन सब के विषय विविध हैं. केवल समुद्रयात्रा का निषेध करने वाला उनमें से कोई वचन है ही नहीं. कविवर्ज्यों और श्राद्धवर्ज्यों  की सामान्य सूची में समुद्रयात्रा को भी जोड़ लिया गया है. वर्ज्यताप्रकार भी अनिश्चित हैं, कुछ निषिद्ध कलिवर्ज्य बताये गये हैं, कुछ श्राद्धवर्ज्य (जिनके करने पर ब्राह्मण श्राद्ध करने और श्राद्ध में निमन्त्रित होने का अधिकार खो देता है).

अनुवादक रामदेव शर्मा ने ओझा जी के कथनों का अनुवाद करने में विचित्र प्रमाद किया है. क्योंकि उन्होंने अपने अनुवाद में यह वाक्य यहाँ रखा है-

“यहाँ जो विभिन्न विषयों से सम्बद्ध वचन दिये गये हैं, वे इस महाराजा माधवसिंह जी की विदेश यात्रा से सम्बन्धित न होने के कारण लेशमात्र भी दोषपरक नहीं है.”

महाराज माधवसिंह की तो कोई चर्चा या नामोल्लेख भी ओझा जी ने पूरी पुस्तक में नहीं किया है. वे सब के लिये यह पुस्तक लिख रहे हैं, जिस क्षत्रियवीर की चर्चा आरम्भ में की गई है, उसकी समुद्रयात्रा के औचित्य का विचार बीती बात हो चुकी थी.

अस्तु ओझा जी ने सारे छत्तीस वचनों का विश्लेषण करते हुए उनमें समुद्रयात्रा के निषेधों की तीन श्रेणियाँ मानी– नारदपुराण और आदित्यपुराण के कथनों के अनुसार समुद्रयात्रा का कलिवर्ज्य होना, मनु और मरीचि आदि के वचनों में इसका श्राद्धवर्ज्य होना, तथा पाराशर और बौधायन के वचनों में इसका ब्राह्मण के लिये वर्ज्यत्व. इस तरह ये सारे स्मृतिवचन समुद्रयात्रा का समानरूप में सामान्यतया निषेध नहीं करते. कुछ इसे कविवर्ज्य मानते हैं, कुछ श्राद्ध की दृष्टि से ही वर्ज्य बताते हैं, तो कुछ केवल ब्राह्मणों के लिये इसे निषिद्ध बताते हैं. यदि समुद्रयात्रा को केवल कलिवर्ज्य मानते हैं, तो इसका सार्वकालिक निषेध करने वाले मनु आदि के वचनों से नारद आदि के उन वचनों का विलोप हो जायेगा, जो इसे कलिवर्ज्य  मानते हैं.

यदि समुद्रयात्रा सर्वदा निषिद्ध है तो कलियुग मात्र के लिये उसका निषेध करना अनावश्यक है. मनु आदि स्मृतिकार समुद्रयात्रा का सर्वयुगीन निषेध करते हैं, पुराण केवल कलियुग के लिये निषेध करते हैं और अन्य स्मृतिकार केवल ब्राह्मण के लिये उसका निषेध करते हैं. तब प्रश्न उठता है कि समुद्रयात्रा का निषेध सर्वजातीय है या एकजातीय या प्रकरणानुसार भिन्न भिन्न जातियों के लिये पृथक् पृथक् रूप से वह निषिद्ध की जा रही है?

कोई व्यक्ति समुद्रयात्रा छह प्रयोजनों से कर सकता है –

(१) प्रायश्चित्त

(२) तीर्थयात्रा

(३) शिक्षा, युद्ध, व्यापार, व्यवसाय

(४) बलवान् सम्राट् की अनिवार्य आज्ञा

(५) आजीविका तथा

(६) चित्तविनोद (सैरसपाटा).

इनमें से पुराण-वचनों के अनुसार सभी प्रकार की समुद्रयात्राओं का निषेध माना जायेगा या किसी एक विशेष प्रकार की यात्रा का निषेध माना जायेगा? यदि कहा जाये कि सभी का निषेध माना चाहिये, तो ऐसा कहना समीचीन न होगा, क्योंकि फिर तो जो लोग द्वारिका आदि तीर्थों की यात्रा करते हैं, उसका भी निषेध हो जायेगा. इसमें किसी एक देशकाल के व्यक्तियों को ही आपत्ति नहीं होगी, अपितु समस्त देशकालों में जो शिष्टजन द्वारिका की यात्रा करते हैं, उन सबका विरोध होगा. अतः किसी एक विशेष प्रकार की यात्रा का ही निषेध मानना पड़ेगा न कि सभी प्रकार की समुद्र यात्राओं का.

अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि कौन-सी यात्रा का निषेध माना जाये और कौन-सी का नहीं? ओझा जी यहाँ बुद्ध द्वारा अपनाई गई विभज्यवाद की तार्किक प्रणाली का आश्रय ले कर समुद्रयात्रा के औचित्य के प्रश्न पर होने वाले सारे विकल्पों को बिखेर कर ग्राह्य और अग्राह्य विकल्पों का चयन करते हैं. चयन और निरसन की पद्धति के साथ वे आपेक्षिक सत्यता व आपेक्षिक असत्यता की जाँच करते हैं. तदनुसार चूँकि द्वीपान्तर की समुद्रयात्रा का विरोध श्रुतियों और स्मृतियों में कहीं भी उपलब्ध नहीं होता है, तो उसका अवश्य ही विधान मानना चाहिये.

सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग में भी चिरकाल से आज तक होने वाली समुद्रयात्राओं के प्रवर्तन का शिष्टाचार या शिष्ट जनों का आचार चला आ रहा है– यह भी तथ्य है. अतः समुद्रयात्रा अवश्यकर्तव्यता की श्रेणी में आती है-  यह प्रमाणप्रतिपन्न दूसरा तथ्य हुआ. अब इस पर कुछ स्मृतियों के वचनों से संशय उत्पन्न हो गया. तो ऐसे संशय के समाधान के लिये क्या करना चाहिये?

ओझा जी इसके समाधान के लिये तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली का यह प्रसिद्ध वाक्य उद्धृत करते हैं-

“अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वित्तविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्याद् ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनो युक्ता आयुक्ता अलूक्षा धर्मकामाः स्युः यथा ते तत्र वर्तेरन् तथा तत्र वर्तेथाः”

“यदि तुम्हें कर्म के विषय में कोई शङ्का हो, वित्त के विषय में कोई शङ्का हो, या वृत्त (आचरण) के विषय में कोई शङ्का हो, तो जो ज्ञानी जन विचारशील, उचित कर्म करने वाले, पूज्य, धर्मनिरत जैसा आचरण करते हैं, वैसा ही आचरण तुम भी करो.”

उस तरह के श्रुतिवाक्यों और “श्रुतिः स्मृतिः सदाचारो धर्ममूलमिदं स्मृतम्” इत्यादि स्मति वाक्यों से ऐसा परम्परागत आचरण धर्ममूलक सिद्ध होता है, जो श्रुति और स्मृति से समर्थित  हो.

समुद्रयात्रा श्रुतिसमर्थित है यह बताने के लिये ओझा जी भुज्यु के पुत्र तुग्र की समुद्रयात्रा तथा मैत्रावरुणि वसिष्ठ की समुद्रयात्रा के ऋग्वेद में वर्णित प्रसङ्गों का उल्लेख करते हैं. रघुवंश में कार्तवीर्य को अष्टादशद्वीपनिखातयूपः (अठारह द्वीपों में जिसने यूप (यज्ञस्तम्भ) गड़वाये) कहा है.

पूरा श्लोक इस प्रकार है

संग्रामनिर्विष्टसहस्रबाहुरष्टादशद्वीपनिखातयूपःI
अनन्य साधारणराजशब्दो बभूव योगी किल कार्तवीर्य्यःII
रघुवंश ६.३८

सहस्रों भुजाओं से सङ्ग्राम करने वाले
अठारह द्वीपों में यूप गड़वाने वाले

अप्रतिम अनोखे राजा
योगी कार्तवीर्य हुए.

यदि पूर्वपक्षी कहे कि महायोगी कार्तवीर्य अर्जुन स्वयं अठारह द्वीपों में नहीं गये, यज्ञ के यूप उन्होंने अपने सेवकों को भेज कर गड़वा दिये थे, तो यह कहना ठीक नहीं, क्यों कि यूप वहाँ गाड़े जायेंगे, जहाँ यज्ञ सम्पादित होगा, और यज्ञ जहाँ सम्पादित होगा, वहाँ यजमान और याजक का साक्षात् उपस्थित रहना आवश्यक है.

सहस्रार्जुन का उदाहरण त्रेता युग का है. द्वापर युग में क्षत्रियों के द्वारा समुद्रयात्रा के उदाहरण के लिये ओझा जी महाभारत से पाण्डवों की दिग्विजय यात्रा के अनेक प्रसङ्ग मूलपाठ के उद्धरणों के साथ प्रस्तुत करते हैं, जिनमें पाण्डवों की भारत के बाहर द्वीप-द्वीपान्तर की यात्राएँ वर्णित हैं. इसमें पुराणों में जो समुद्रयात्रा के वर्णन हैं वे भी संज्ञान में लिये जा सकते थे.

कलियुग से क्षत्रियों की समुद्रयात्रा के उदाहरण के लिये वे काश्मीर के प्रतापी राजा जयापीड की समुद्रयात्रा के प्रसङ्ग उद्धृत करते हैं, जिसका वर्णन कल्हण ने राजतरङ्गिणी में किया है. किंवदन्तियों पर आधारित कालिदास की समुद्रयात्रा और सिंहलप्रवास का उदाहरण भी है. प्रत्यक्षानुभूत या जाने माने उदाहरण लिये जाये, तो कोङ्कण के व्यापारी वाणिज्य के लिये समुद्रयात्रा करते रहते हैं. इन सभी उदाहरणों में ऐसा कोई नहीं, जिसमें समुद्रयात्रा करने वाले से प्रायश्चित्त की अपेक्षा की गई हो. यदि कहा जाये, कि प्रायश्चित्त का विधान कलियुग में की जाने वाली समुद्रयात्रा के लिये है, तो उसके उत्तर में ओझा जी कहते हैं –

सत्यु से लगा कर कलियुग तक समुद्रयात्रा का अविच्छिन्न पारम्पर्य हम प्रामाणिक उदाहरणों से सिद्ध कर चुके, इसलिये अन्य युगों में समुद्रयात्रा अनुमत थी, कलियुग में अननुमत हो गई– यह नहीं कहा जा सकता. पूर्वपक्षी यह कह सकता है कि प्रकरणभेद से भेद माना जायेगा, कलियुग में समुद्रयात्रा के जो प्रकरण उद्धृत किये गये, वे विशिष्ट प्रसङ्ग हैं, वे समुद्रयात्रा की संस्तुति करने वाले सामान्य विधिवचन नहीं माने जा सकते, जब कि कलियुग में समुद्रयात्रा का निषेध करने वाले मनु आदि के वचन विद्यमान हैं.

ओझा जी की ओर से इसका सुस्पष्ट उत्तर है –

श्रुतिप्रमाण स्मृतिप्रमाण से बलवत्तर है.

अब यहाँ प्रश्न यह आता है कि स्मृति श्रुतिविरुद्ध तो हो नहीं सकतीं, इसलिये श्रुति और स्मृति में समुद्रयात्रा को ले कर जो परस्पर विरोध हो रहा है उसका सामञ्जस्य कैसे होगा?

इसका उत्तर ओझा जी की ओर से यह है कि समुद्रयात्रा का स्मृतियों में निषेध सामान्य निषेध नहीं है, प्रकरणविशेष की अपेक्षा से निषेध है. यदि समुद्रयात्रा के निषेध को सामान्य निषेध मान लेंगे, तो तीर्थयात्रा के निमित्त से की जाने वाली समुद्रयात्रा भी निषिद्ध हो जायेगी. फिर सेतुबन्ध आदि तीर्थों की यात्रा का जो माहात्म्य पुराणों में बताया है वह निरर्थक हो जायेगा.

स्मृतियों में तो ब्रह्महत्या आदि पापों के प्रायश्चित्त के अनुष्ठान के लिये निर्देश है कि समुद्रयात्रा कर के द्वीपान्तरस्थित तीर्थों में जा कर ही ये प्रायश्चित्त किये जायेंगे. इस सम्बन्ध पराशर को ओझा जी ने उद्धृत किया है–

चातुर्विद्योपपन्नस्तु विधिवद्ब्रह्मघातकेI
समुद्रसेतुगमनं प्रायश्चितं विनिर्दिशेत्II
१II ६४
दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्I

रामचन्द्रसमादिष्टं नलसञ्चयसञ्चितम् II
१२II६६
सेतुं दृष्ट्वा समुद्रस्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति II
६६
सेतुं दृष्टवां विशुद्धात्मा त्ववगाहेत सागरम् II

यजेत वाश्वमेधेन राजा तु पृथिवीपतिः II
१२II

(चतुर्विद्याओं (आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता तथा दण्डनीति) को जानने वाला ज्ञानी ब्रह्महत्या करने वाले के लिये विधिवत् प्रायश्चित्त का इस प्रकार निर्देश करे– रामचन्द्र के द्वारा बनवाये गये, नल नामक वानर के द्वारा एकत्र कराये गये पत्थरों के सञ्चय से तैयार किये गये सेतु का दर्शन कर के विशुद्ध अन्तःकरण वाला प्रायश्चित्ती सागर में अवगाहन करे, अथवा राजा हो तो वह अश्वमेध यज्ञ करे.)

अब पूर्वपक्षी इस पर यह कहे कि सेतुदर्शन कर के प्रायश्चित्त हो जायेगा– यह स्मृतिकार ने कहा है. तो सेतु का दर्शन इस पार से दूर से ही कर लिया जाये, समुद्रयात्रा कर के सेतु के निकट क्यों जाया जाये. इस ओझा जी कहते हैं कि पराशर ने दस योजन विस्तीर्ण आदि के द्वारा जो सेतु का आयाम बताया है उससे आशय यह है कि उतने विस्तार में पूरे सेतु का दर्शन कर के ही प्रायश्चित्त होगा. पूर्वपक्षी की ओर से इन आपत्ति और उसका यही समाधान तारानाथ तर्कवाचस्पति भी समुद्रयात्राविषयक अपने निबन्ध में बता चुके थे. यह भी नहीं कह सकते कि ऐसा प्रायश्चित्त सत्ययुग, त्रेतायुग में यदि ब्रह्मवध हो जाये, तो उसके लिये है, कलियुग के लिये नहीं, क्यों कि पराशर ने कलियुग के ही लिये सेतुदर्शन के द्वारा प्रायश्चित्त का विधान बताया है. तारानाथ तर्कवाचस्पति ने भी समुद्रयात्राविषय अपने प्रबन्ध इन प्रश्नों पर इसी तरह विचार किया है.

इस पर पूर्वपक्षी फिर सवाल उठाता है-

व्रात्ययज्ञ, अश्वमेध यज्ञ आदि कतिपय यज्ञों को सर्वपापनाशक कहा गया है, तो यदि ब्रह्महत्या का पाप हो भी जाये, तो समुद्रयात्रा करने को कोई क्यों जाये, सर्वपापविनाशन इतने यज्ञ हैं, उनमें से किसी को कर ले. इसके उत्तर में ओझा जी ने गौतम के वचन उद्धृत किये हैं. गौतम का कहना है कि अश्वमेध के द्वारा जाने अनजाने किये गये पापों का शोधन हो जाने पर भी सेतु के दर्शन कर के ब्रह्महत्या के पाप का शोधन करना ही चाहिये. अश्वमेध का विधान इसलिये है कि तत्काल समुद्रयात्रा नहीं कर पा रहा हो, तो अश्वमेध का अनुष्ठान कर ले.

स्मृतिकारों का यह भी कथन है कि जानबूझ कर सगुण या गुणवान् ब्राह्मण की हत्या करने के पाप की निष्कृति नहीं होती अर्थात् उससे कोई छुटकारा नहीं है. तब फिर पूर्वपक्षी प्रश्न कर सकता है कि यदि निष्कृति ही नहीं होगी, तो फिर प्रायश्चित्त के लिये समुद्रयात्रा की झंझट क्यों पाली जाये? इसके उत्तर में ओझा जी का कथन है कि जिन पापों से निष्कृति नहीं होती, उनके लिये भी प्रायश्चित्त नरक से निर्वृति के लिये है.

वे यहाँ प्रायश्चित्तविवेककार का कथन उद्धृत करते हैं, जिसके अनुसार निष्कृति के अभाव का कथन, प्रायश्चित्त के अभाव का निर्देश नहीं माना जाना चाहिये. प्रायश्चित्तविवेक के टीकाकार गोविन्दानन्द को भी ओझा जी इसके समर्थन के लिये उद्धृत किया है. यहाँ धर्मशास्त्रों में समुद्रयात्रा की वर्ज्यता बताते वाले कथनों की एक बड़ी विचारणीय व्याख्या ओझा जी कर देते हैं. उनका कहना है कि समुद्रयात्रा के निषेधपरक वचन पूर्वापरप्रसङ्गों के अवलोकन से ब्रह्महत्या जैसे निष्कृतिविहीन पापों के प्रायश्चित्त के लिये समुद्रयात्रा करने वाले विप्र की समाज में त्रैवर्णिक व्यवस्था में उसके समावेश की वर्जनीयता बताते हैं, समुद्रयात्रा का निषेध वे नहीं करते, समुद्रयात्रा करने पर भी बिरादरी से बहिष्कार तो जारी रहेगा– यह आशय है. यदि पूर्वपक्षी इन वचनों का अपने दुराग्रहवश यह अर्थ निकालने लग जाये कि ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त तो सेतु के दर्शन से हो गया, पर किसी भी निमित्त से, भले ही वह सेतुतीर्थदर्शन का निमित्त ही क्यों न हो, की जाने वाली समुद्रयात्रा चूँकि  कलियुग में निषिद्ध है, अतः उसके पाप के कारण उसका बहिष्कार किया जाता रहेगा, इसलिये तीर्थाटन या प्रायश्चित्त के लिये की गई समुद्रयात्रा भी पाप ही है– तो यह भी अर्थ का अनर्थ ही होगा.[7]

संस्कारकौस्तुभ का जो उद्धरण ओझा जी ने दिया है, उससे भी यही आशय लिया जाना चाहिये कि निष्कृतिविहीन पाप का प्रायश्चित्त कर लेने पर नरक से निवृत्ति भले हो जाये, पर समाज में ऐसे पापी की अस्वीकार्यता की निष्कृति नहीं होती-

“सत्यपि नरकनिवृत्ति-प्रयोजके प्रायश्चिते व्यवहार्यत्वाप्रयोजकप्रायश्चित्ताभाव-प्रतिपादकत्वमेवावसीयते.”

अतः प्रायश्चित्त का निषेध नहीं, बहिष्कार को निरस्त करने का निषेध किया जा रहा है. टीकाकार गोविन्दानन्द ने यहाँ संस्कारकौस्तुभ के आशय को एकदम खोल दिया है-

समुद्रयात्रयापि ब्रह्मघातिनः स्वीकारो नास्तीति वा तदर्थःI

यदि समुद्रयात्रा कर लेने से पाप होता है और उसका प्रायश्चित्त कर लेने पर भी समुद्रयात्रा के पापी का बहिष्कार जारी रहेगा– ऐसा अनुचित अर्थ ले लिया जाये, तो इसमें उत्तरपक्ष की ओर से दूसरी प्रबल आपत्ति यह होगी कि तीर्थाटन या प्रायश्चित्त के निमित्त से समुद्रयात्रा करने वाले व्यक्ति का बहिष्कार पहले कभी किया गया हो ऐसा इतिहास में उदाहरण नहीं मिलता. अतः यदि शास्त्रवचनों की शब्दावली में दो अर्थ निकल भी रहे हों, तो समुद्रयात्रा के पापी का बहिष्कार किया जाता रहेगा– यह अर्थ प्रमाणाभाव के कारण निरस्त हो जायेगा. यदि धर्मशास्त्र के वचनों का यह आशय लिया जाये कि प्रत्यन्तदेश में पहुँचने के लिये की गई समुद्रयात्रा में दो प्रकार से यात्री पापभागी बनता है– एक तो प्रत्यन्त देश में जाने का पाप, दूसरा समुद्रयात्रा करने का पाप.

यदि प्रत्यन्त देशनिवास के पाप का प्रायश्चित्त कर के समाज में उसकी स्वीकार्यता हो भी जाये, तो समुद्रयात्रा के पाप के कारण स्वीकार्यता नहीं होगी– तो यह भी अनुचित है. एक पाप के प्रायश्चित्त से दूसरे पाप का प्रायश्चित्त नहीं हो जाता यह बात तो स्वतः सिद्ध ही है– इसे कहना ही अनावश्यक है. प्रत्यन्तदेशदमन का प्रायश्चित्त हो भी जाये, तो समुद्रयात्रा करने के पाप का प्रायश्चित्त नहीं होगा– ऐसा अर्थ लेना भी अनुचित होगा, क्योंकि कि पराशर के वचन से वह बाधित हो जाता है. पराशर ब्राह्मण के लिये समुद्रयात्रा करने पर पुनःसंस्कार का विधान बताते हैं. इस दृष्टि से नारदपुराण और आदित्यपुराण के समुद्रयात्रा का निषेध करने वाले वचन भी प्रत्यन्तदेशगमनार्थ की गई समुद्रयात्रा का निषेध नहीं करते– यही अर्थ लेना समीचीन है. यहाँ तक कलिवर्ज्यताखण्डन नामक प्रथम प्रकार का विचार है.

द्वितीय तथा तृतीय प्रकारों में विषयविशेष की व्यवस्था के अनुसार कलिवर्ज्यता की व्यवस्था पर विचार है. ओझा जी का यह कहना सर्वथा युक्तियुक्त है कि पूरे कलिवर्ज्य प्रकरण में सारे धर्मशास्त्रों ने सर्वत्र एक ही रूप से समुद्रयात्रा का निषेध नहीं किया है. कहीं सामान्य शास्त्रों द्वारा विहित का निषेध है, तो कहीं रागपूर्वक या स्वार्थवश की जाने वाली यात्रा का निषेध कर दिया गया है और कहीं किसी दोषप्रसंग के अनुसार अथवा कहीं सामान्य दुर्बल लोगों के द्वारा समुद्रयात्रा का करना असमर्थता के कारण अथवा शक्ति के अभाव के कारण अनुग्रहपूर्वक समुद्रयात्रा का निषेध कर दिया गया है.

इस प्रकार विषयभेद के अनुसार यात्रा-प्रतिषेध के प्रकार भी भिन्न-भिन्न हैं. अतः भिन्न-भिन्न प्रकार के निषेध वचनों को लोकस्थिति के अनुसार ही समन्वय करते हुए निषेधवाक्यार्थ में निषेध की व्यवस्था अथवा कारण को देखते हुए कहा गया है कि महात्माओं ने लोकरक्षा के लिए व्यवस्था देकर निषेध वाक्य कहे हैं, अन्यथा स्मृतिकार यही कहते कि कलियुग में समुद्रयात्रा कभी नहीं करनी चाहिये.

पौराणिक वचन तथा स्मार्त वचन विषयभेद से व्यवस्थित हैं, सर्वयुगसाधारणता से व्यवस्थित नहीं है, सर्वयुगसाधारणतया तो केवल श्राद्धकर्म में समुद्रयायी विप्र का वर्जन है-  तस्मादवश्यं तानि पौराणिकस्मार्तवचनानि विषयभेदेनैव व्यतिष्ठमानानि सन्तीति वक्तव्यम् तथा च सर्वयुगसाधारण्येन तावच्चाद्धकर्मणि समुद्रयायिनः प्रतिषेध इति धर्मस्मृत्यर्थः.

इस तार्किक प्रणाली से निगमन करने पर विषयभेद से व्यवस्थापित किये जाने पर इन समृतिवचनों में परस्परोपमर्दकभाव (एक दूसरे को दबोचने की तत्परता) नहीं रह जाता और सामञ्जस्य स्थापित हो जाता है-

इत्येवं विषयभेदेन व्यवतिष्ठमानानां तेषां वचनानां स्वस्वविषये निष्प्रतिपक्षं प्रवर्तमानतया नास्ति परस्परोपमर्द इति सामञ्जस्यम् I

मीमांसा शास्त्रों में छह प्रकार के निषेध विधि की व्यवस्था की गई है-

(1) सामान्य निषेध,

(2) विशेष निषेध,

(3) अपवादपरक निषेध,

(4) आज्ञापरक निषेध,

(उपसंहाररूप निषेध), तथा

(6) व्यवस्थारूप से निषेध.

इनमें आज्ञापरक निषेध की कोटि बड़ी दिलचस्प है. शास्त्र निषेध कर रहा है, और जिस काम को करने से मना कर रहा है, उसकी आज्ञा भी दे रहा है. कोई माँ पहाड़ पर ट्रेकिंग की प्रतियोगिता में जाने वाले अपने चेम्पियन बेटे को आज्ञा दे रही है कि मत जा, पर इस आज्ञा के भीतर अनुज्ञा छिपी है, माँ जानती है कि बेटा यदि चेम्पियन हो कर लौटेगा, तो उसका और परिवार की कितना गौरव बढ़ेगा. इसी तरह शास्त्रों की आज्ञाएँ वस्तुतः अनुग्रहाज्ञाएँ होती हैं. ऐसी आज्ञा व्यक्ति की अशक्ति को ध्यान में रख कर या उसके प्रति स्नेह के कारण दी जा सकती है. ऐसी स्थिति में समर्थ या शक्ति से युक्त व्यक्ति आज्ञा न होने पर भी  करणीय कार्य को कर सकता है.

माता-पिता, गुरुजन आदि स्नेह के कारण कोई कार्य न करने की आज्ञा दे देते हैं, पर उनके प्रति आदर के कारण ही पुत्र या शिष्य अपने सत्कर्म के सम्पादन के उत्साह तथा शक्ति का विचार कर के उनकी आज्ञा को तोड़ कर उनके और समाज के हित के लिये निषिद्ध कार्य कर लेते हैं. उन्हें गुरुजनों की आज्ञा भङ्ग करने के पाप का भागी नहीं माना जा सकता, क्यों कि उनके द्वारा कि गया कार्य सार्वत्रिक रूप से प्रशंसनीय और अभिनन्दनीय बन जाता है. गुरुजन या माता-पिता प्रसन्न होते हैं कि इसने हमारी आज्ञा न मान कर अच्छा ही किया. हम तो वास्तव में चाहते ही थे कि यह हमारी आज्ञा का भङ्ग कर दे.

पूर्वपक्षी कह सकता है कि ऐसे में गुरुजनों की अवज्ञा और माता-पिता की आज्ञा का पालन न करने का महापातक तो फिर भी लगेगा. इस पर ओझा जी का जो मन्तव्य है, वह सर्वाङ्गर्मणीय ही कहा जा सकता है. वे कहते हैं- इनमें आज्ञारूप निषेध के विरुद्ध आचरण करने में न तो कोई पाप होता है और न उसका किसी प्रकार का प्रायश्चित्त ही किया जाना होता है, ऐसा मीमांसकों का कथन है. माता-पिता-गुरुजनों की आज्ञा भंग करते हुए भी उत्साहपूर्वक अथवा अपनी शक्ति के अनुसार कार्य क्षमता के कारण अथवा कार्य के औचित्य के कारण उस कार्य को दोषपूर्ण न मानते हुए उस कार्य को यदि यथावत् करता है तो भी वह कार्य गुरुजन की आज्ञा भंग करने से निन्दनीय नहीं हैं अपितु गुरुजनों द्वारा निषिद्ध होते हुए भी वह कार्य अन्य विशिष्ट जनों के द्वारा प्रशंसनीय होकर अभिनन्दित होता है, ऐसा लोकव्यवहार में देखा जाता है.[8]

ओझा जी का मन्तव्य यही है कि शास्त्रव्यवस्थाएँ लोकानुग्रह तथा लोकसङ्ग्रह के लिये होती हैं, लोक को प्रतारित करने के लिये नहीं.

ओझा जी शास्त्र को लोककल्याण के लिये सन्नद्ध ही नहीं, लोक के लिये परमकरुणामय भी मानते हैं. इसके लिये वे आर्षप्रमाण के रूप में वे यह श्लोकार्ध उद्धृत करते हैं–

शास्त्रं हि वत्सलतरं मातापितृसहस्रतः

शास्त्रसहस्रों माता-पिताओं से अधिक वात्सल्यपूर्ण होता है.

शास्त्र के लिये यह एक सर्वोच्च मानदण्ड ओझा जी ने यहाँ प्रस्तुत कर दिया है. स्मरणीय है कि इसी उक्ति को ब्रह्मसूत्र (१.१.७) पर श्रीभाष्य में भी

“…मातापितृसहस्रेभ्योऽपि वत्सलतरं शास्त्रम्”

इस पाठ के साथ उद्धृत किया गया है. रङ्गमाहात्म्य में ऐसा श्लोक मिलता है:-

अप्युपद्रव साहस्रमतीत्य सुखमेधतेI
शास्त्रं च वत्सलतरं मातृवत्पितृवत्ततःII

ओझा जी के मन्तव्य का विस्तार करते हुए यह भी कहा जा सकता है कि माता-पिता तो स्वार्थवश केवल अपनी ही सन्तान के लिये वत्सल होते हैं, शास्त्र तो निःस्वार्थभाव से बिना की भेद-भाव जन-जन के प्रति कृपामय और करुणामय होते हैं. शास्त्रों के निषेध भी कई बार इस वात्सल्य के कारण अशक्त लोगों के लिये कृपाभाव से प्रेरित हो सकते हैं, वे शक्तजनों के लिये अभ्यनुज्ञारूप निषेध बन जाते हैं.

 

९.

मीमांसादर्शन में बताये गये निषेध के प्रकारों में ओझा जी के अनुसार समुद्रयात्रा का स्मृतिकारों द्वारा किया गया निषेध अभ्यनुज्ञानिषेध की श्रेणी में आता है. अर्थात् निषेध किया गया है, पर विशिष्ट स्थितियों में निषिद्ध के लिये अनुमति उसमें छिपी हुई है. कलियुग के लिये समुद्रयात्राप्रतिषेध के प्रसङ्ग में भी निषेध से तात्पर्य यही है कि कलियुग में सामान्यतया अशक्त्यवस्था का विचार करके आज्ञारूप निषेध के माध्यम से समुद्रयात्रा का निषेध किया गया है. अर्थात् निषेध कमजोर, बीमार और ग़रीब लोगों पर लागू किया जाना चाहिये, ताकतवर लोगों पर नहीं. और यह अभ्यनुज्ञानिषेध अनुकम्पापरक है, अर्थात् कमजोर या ग़रीब लोगों को इससे छूट देना उनके प्रति एक अनुग्रह है. अभ्यनुज्ञानिषेध में आज्ञा अनुल्ङ्घनीय न हो कर अतिक्रमणीय हो जाती है, यही समुद्रयात्रा के प्रसङ्ग में निषेध का आशय है.

अब यह प्रश्न किया जा सकता है इतनी सरी कवायद क्या यह उल्टा अर्थ निकालने के लिये की गई कि समुद्रयात्रा न करे इसका मतलब है समुद्रयात्राकर ले. तब ओझा जी के पक्ष में यह कहा जा सकता है कि कविता का भी सही अर्थ बताने के लिये कभी-कभी विपरीत लक्षणा की जाती है.

‘तू बावड़ी पर नहाने ही गई थी, तू इस अधम के पास गई ही नहीं.’

दूती के प्रति नायिका के इस कथन से तू बावड़ी पर नहाने नहीं गई, तू तो उस अधम से मिल कर ही आ रही है, लक्षणा से यह उल्टा अर्थ लिया जाना वाजिब है.

धर्मशास्त्र में भी कभी-कभी निषेध या नकार का अर्थ स्वीकार लिया जाना अपेक्षित हो सकता है. यहाँ ओझा जी ने मीमांसाबालप्रकाश का प्रमाण दिया है. मीमांसा-बालप्रकाशकार का आशय यह है कि ऐतरेय ब्राह्मण में समय पर देना चाहिये और समय पर नहीं देना चाहिये– ये दोनों परस्परविरोधी वाक्य दान के विषय में आये हैं. उनका मन्तव्य यह है कि धनी को तो समय पर दान करना चाहिये. दारिद्र्य की अवस्था में यदि दान न भी करें तो कोई दोष नहीं लगता है.

अभ्यनुज्ञारूप प्रतिषेध वस्तुतः दीन दुखी लोगों के लिये शास्त्र का परम अनुग्रह है –

विधर्मिसाहित्येनैकाकिना गमने च धर्महानिशङ्काऽस्तीत्यतः परमानुग्राहकेण शास्त्रेण समुद्रयानविषयकोऽभ्यनुज्ञारूपः प्रतिषेधो विधीयतेI

मीमांसादर्शन में दुष्टवचनमूलकस्मृति के अप्रामाण्य की भी व्यवस्था है. ओझा जी ने उसे आश्रय लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी. उनका आशय यही लगता है कि स्मृतियों में दुष्टवचन नहीं है, उनकी व्याख्या करने वालों के अभिप्राय दुष्ट हो सकते हैं.

मीमांसादर्शन की युक्तियों का प्रामाणिक नियोजन कर के ओझा जी ने स्मृतिवचनों की जो पुनर्मीमांसा की है, वह एक बड़े भाष्यकार की सिद्धि है. नित्य अग्निहोत्री या आहिताग्नि विप्रों के लिये समुद्रयात्रा के निषेधपरक वचन एक प्रकार से अनुग्रह ही हैं. अनुष्ठान की नित्यता का विधिविधान से पालन करने वाले ऐसे विप्रों को न तो सैरसपाटे के लिये स्वतन्त्रता मिल सकती है, न तीर्थाटन कर के पुण्यार्जन करने का अवसर उनके लिये है. राज्याभिषेक के महोत्सव समाप्त होते ही अपने पिता जनक के अयोध्या से तत्काल मिथिला वापस चले से अनमनी वैदेही को समझाते हुए भवभूति के उत्तररामचरित में राम कहते हैं

किन्त्वनुष्टाननुत्यत्वं स्वातन्त्र्यमपकर्षतिI
सङ्कटा ह्याहिताग्नीनां प्रत्यवायैर्गृहस्थताII

(अनुष्ठान की नित्यता स्वातन्त्रता को छीन लेती है. आहिताग्नियों की गृहस्थता प्रत्यवायों से घिरी होती है.)

शास्त्र मानवता के कल्याण के लिये है, मनुष्य की स्वतन्त्रता के उच्छेद के लिये नहीं. इसलिये शास्त्रों के सारे निषेध सापेक्ष ओर पुनर्विचारणीय होते हैं, कोई भी निषेध एकान्तिक और आत्यन्तिक नहीं हो सकता.[9]

शास्त्रों की व्यवस्थाओं के पीछे तर्क और कारणकार्य का विचार रहता है. सारे शास्त्र तथा धर्म सोपपत्तिक होते हैं, शास्त्र का काम मनुष्य जीवन को युक्तिसङ्गत बनाना है. ओझा जी भी यह मानते हैं कि सारे धर्मों के पीछे तर्क काम करता है –

सर्वेषामेव धर्माणां सोपपत्तिकत्वानुगमात्I

अतः धर्माचरण और धर्मविचार में तर्क का आश्रय ले कर अनुसन्धानबुद्धि से काम लेना चाहिये-

नाकारणो हि शास्त्रेऽस्ति धर्मः सूक्ष्मोऽपि जाजलेःI
कारणाद्धर्ममन्विच्छन् स लोकानाप्नुते शुभान् II
१II
आर्षधर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना I

यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म्मं वेद नेतरः 
॥

पराशरमाधवीय में कलिवर्जना-प्रकरण से यह भी निश्चित होता है कि निषेध के वचन युगधर्म के अनुसार ही होते हैं. तदनुसार समुद्रयात्रादि जैसे निषेध वाक्यों में निषेध से विधि का अर्थ भी लेना चाहिये, अन्यथा विधान ही व्यर्थ हो जायेगा. अनुपपत्ति दो प्रकार की होती है- दृष्ट और अदृष्ट. दृष्ट अनुपपत्ति में विहित का अनुष्ठान करने अथवा न करने पर वह निन्दनीय नहीं होता है.

समुद्रयात्रा का निषेध सार्वजनीन नहीं है. वह उन लोगों के लिये है जिन्हें ले कर प्रत्यन्तदेशप्रवास में धर्महानि की आशङ्का हो, या अथवा प्राणान्तक कष्ट की आशङ्का हो. श्रुति के वचन व्यापक हैं उनका सङ्कोच करने का आग्रह यदि पूर्वपक्षी करता है तो वह अनुचित है. आशय यह कि श्रुति की उदार आर्ष दृष्टि के द्वारा स्मार्त धर्म को परिष्कृत और व्यापक बनाया जाना चाहिये.

व्याकरण-शास्त्र के सिद्धान्त के अनुसार ओझा जी कहते हैं कि समुद्रयात्री और समुद्र शब्दों की सिद्धि के अनुसार इन शब्दों के अर्थ जिनका जीविका के लिए निरन्तर आना-जाना होता रहता है, उन्हीं के लिए चरितार्थ होता है. जैसे-समुद्र- यात्री शब्द में पाणिनीय सूत्र “सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये” से णिनि प्रत्यय जाति अर्थ में ही होता है. यहाँ समुद्र शब्द जातिवाचक नहीं है, अतः सूत्र के अनुसार ताच्छील्य अर्थ में णिनि प्रत्यय होता है और यहाँ ताच्छील्य का अर्थ है समुद्र यात्रा करने का जिसका स्वभाव है अर्थात् व्यापारादि के लिए जो बार-बार समुद्रयात्रा करता है. इसके अतिरिक्त क्रियासमभिहार का अर्थ है पुनः पुनः करना. यहाँ अर्थ होगा कि जो पुनः पुनः समुद्रयात्रा करता है वह समुद्रयायी या सामुद्रिक कहा जायेगा. “बहुलमाभीक्ष्ण्ये” अर्थात् पौनःपुन्यार्थ में भी णिनि प्रत्यय होता है.

इस प्रकार पाणिनि के दोनों सूत्रों के अनुसार समुद्रयायी से तात्पर्य है कि जो व्यक्ति जीविका के लिए व्यापारादि के लिए बार-बार समुद्रयात्रा करता है वही समुद्रयायी है, एक बार यात्रा करने वाला नहीं. यदि कोई महान् व्यक्ति यह कहे कि “करणे यजः” सूत्र के अनुसार जो समुद्र में गया हो वही समुद्रयायी हो जाता है. तब ओझा जी प्रतिवाद में कहे हैं कि यहाँ व्याकरण की दृष्टि से ताच्छील्य का अर्थ लिया जायेगा या यज् धातु का अन्य अर्थ करके किसी तरह से शास्त्रविरुद्ध कार्य करना जिसका स्वभाव है ऐसा कपोलकल्पित अर्थ लिया जायेगा?

महाभारत में इसी प्रकार समुद्रयायी की तरह अर्थ रखने वाले सामुद्रिक शब्द का भी प्रयोग किया गया है. सामुद्रिक शब्द का अर्थ है समुद्र में जाने का जिसका स्वभाव है. ये शब्द समुद्रयात्रा की सामाजिक स्वीकृति के द्योतक हैं.

श्राद्ध में वर्ज्यता बताने वाले कथन समुद्रयात्रा का निषेध नहीं करते, वे केवल यह निर्देश देते हैं कि श्राद्ध में ऐसे ब्राह्मण को निमन्त्रित न किया जाये, जो समुद्रयात्रा पर गया हो या जाता रहा हो. श्राद्ध में सङ्ग्रह निषिद्ध है, सङ्ग्रहसामान्य निषिद्ध नहीं है, अर्थात् ऐसे ब्राह्मण श्राद्ध में अनामन्त्रित रहेगें, अन्यथा वे सम्माननीय ही रहेंगे. समुद्रयायी की श्राद्ध में भागीदारी से श्राद्ध की विगुणता होगी, समुद्रयायी की नहीं.

अब फिर पूर्वपक्षी की ओर से आपत्ति उठाई जा सकती है कि समुद्रयात्रा पातित्य की प्रयोजक है– ये कथन तो लागू होंगे ही. उसके लिये प्रायश्चित्त करना ही होगा. पर यहाँ यह विचारणीय है कि अलग-अलग वर्णों के लिये प्रायश्चित्त की व्यवस्था अलग-अलग है. प्रायश्चित्त के लिये विषय या सम्बोध्य भी अलग अलग हैं. ब्राह्मण के लिये सामान्यतया निषेध मान भी लिया जाये तो वह क्षत्रिय के लिये नहीं लागू हो रहा है. ओझा जी का कथन है कि पूर्वपक्षी जितने तर्क उठा सकता है, वे सुन्दोपसुन्दन्याय से एक दूसरे को नष्ट कर देते हैं.

यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि जो भी समुद्रयात्रा निषेध और उससे पातित्यप्राप्ति आदि का व्याख्यान किया गया है, वह चाहे वृत्ति के लिए हो अथवा चित्त के विनोद के लिए हो, उससे जो पातित्य की प्राप्ति दिखाई गई है, वह केवल दाक्षिणात्य ब्राह्मणों के सम्बन्ध में ही लिखी गई है.

उत्तरदेशीय ब्राह्मणों के लिए ये निषेध विधान नहीं कहे गये हैं. दाक्षिणात्य और उत्तरदेशीय ब्राह्मणों के आचार भिन्न भिन्न बताये गये हैं. भगवान् बोधायन ने दाक्षिणात्यों के लिए समुद्रयात्रा का निषेध माना है और उत्तरदेशीय ब्राह्मणों के लिए कोई दोष नहीं है.

यदि कोई कहता है कि नारद-पाराशरादि में समुद्रयात्रानिषेध और बोधायन-व्यासादि के वचनानुसार समुद्रयात्रा का विधान होने से दोनों के सामञ्जस्य के लिए ही पूर्वोक्त उत्तर-दक्षिण सदाचार भेद दिखलाकर बोधायनादि के वचन पाँच प्रकार की विप्रतिपत्ति इत्यादि से कलियुग से इतर विषय में संकोच करने लिए ही निर्दिष्ट किये गये हैं, तो ऐसा कहना उचित नहीं होगा. क्योंकि कलि में नारद और पाराशरादि के वचनों में स्पष्ट रूप से ब्राह्मणों के लिए वृत्ति के रूप में समुद्रयात्रा का निषेध है, बोधायन के वचनों से दाक्षिणात्य से इतरब्राह्मणों के लिए आनुषङ्गिक रूप से समुद्रयात्रा का विधान ही किया गया है.

अतः विषयभेद के अनुसार व्यवस्था दी गई है तो शङ्का व्यर्थ है. और यदि विरोध ही माना जावे तो दाक्षिणात्येतर ब्राह्मणों के लिए अतिरिक्त रूप से सङ्कोच मानना पड़ेगा. पूर्वपक्षी कह सकता है कि नारदादि पुराण के वचन उपपुराण वचन है और वे बोधायन वचन के शेषभूत वचन हैं तथा बोधायन के वचन मन्वादि वचनों के शेषवचन मात्र है. परन्तु इस प्रकार का शेषशेषी भाव कहीं भी प्रमाण रूप से उपलब्ध नहीं होता है. सभी शास्त्र स्वतन्त्र रूप से स्वयं में पूर्ण है. वे सब विभिन्न विषयक है और परस्पर अविरुद्ध हैं. एक के लिए एक का विषयसंकोच नहीं हो सकता है. दाक्षिणात्यों के लिए भी अन्य युगों में वर्ज्यत्व प्राप्त नहीं होता है, अथवा न ही कलियुग में भी उत्तरीय ब्राह्मणों के लिए कोई निषेध प्राप्त होता है.

 

10.
निष्कर्ष

स्मृतियों या धर्मशास्त्रों के विधान कूटस्थनित्य या अकम्प्य और अचल नहीं हैं. वे प्रवाहनित्य कहे गये हैं. वाक्यपदीय में भर्तृहरि कहते हैं- ष्टैर्विनिर्मीयमानत्वात् न व्यवच्छिद्यते स्मृतिः –

शिष्टजनों के द्वारा प्रणीत होने से स्मृति का व्यवच्छेद या उच्छेद नहीं होता. इसकी वृत्ति में कहा गया है – प्रवाहनित्यत्वान्न व्यवच्छिद्यते – स्मृति प्रवाहनित्य है अतः उसका व्यवच्छेद नहीं होता. परम्परा सनातन भी है और गतिशील भी है. मधुसूदन ओझा जी ने प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा में परम्परा की सनातनता और गतिशीलता दोनों की रक्षा की है.

एक बात जो तारानाथ तर्कवाचस्पति तथा महामहोपाध्याय ओझा जी के सारे विवेचनों से निकलती है, (यद्यपि दोनों पण्डितों से इसे कण्ठतः कहा नहीं है), वह यह कि समुद्रयात्रा से बच कर रहा जाये यह शास्त्र नहीं कहते, समुद्रयात्री से बच कर रहा जाय – यह कहते हैं. यह तो जाहिर है कि शास्त्रों में समुद्रयात्रा का आत्यन्तिक निषेध नहीं किया गया, समुद्रयात्रा करने वाले के बहिष्कार की बात कही गई है, यह बहिष्कार इसलिये भी अपेक्षित माना जा सकता है कि म्लेच्छदेश में जा कर हो सकता है  समुद्रयात्री सङ्क्रामक रोग या रोगों के जीवाणु ले आया हो. शास्त्रों में पाप शब्द उस अर्थ में भी है जिसे आजकल अनहाइजनिक कहा जाता है.

ओझा जी शास्त्र की सीमाओं का विस्तार करते हैं, वे महर्षि दयानन्द की तरह पुराणों को गपोड़पन्थी नहीं कहते और मनुस्मृति के अतिरिक्त शेष सब स्मृतियों को खारिज नहीं करते. सनातनी आस्थाओं को पूरे तरह सहेजते हुए भी वे सनातन की गतिशीलता का प्रत्यय देते हैं. वे तर्क का सटीक और सधे हुए ढंग से रचनात्मक उपयोग करते हैं. तर्क कुतर्क बन कर विध्वंसक भी हो सकता है, तर्क समाज को जोड़ने, रचनात्मक संवाद स्थापित करने में भी कारगर हो सकता है. ओझा जी ने प्रत्यन्तप्रस्थानमीमंसा में रचनात्मक तर्क का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है.

शास्त्रव्यवस्थाएँ लोकानुग्रह तथा लोकसङ्ग्रह के लिये होती हैं, लोक को प्रतारित करने के लिये नहीं. महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा लोकहित, लोकमर्यादा को ऊपर रखते हैं. वेदाविभिन्नाः स्मृतयो विभिन्नाः को चरितार्थ करते हैं, इस मतिविभ्रम में सन्मार्ग खोज कर निदर्शित करने वाले महापुरुष ओझा स्वयं हैं. ओझा जी इस बात को स्वयं शास्त्र के द्वारा भी  उपपादित भी करते हैं. उन्होंने आदित्यपुराण से उद्धरण दिया है, जिसे हेमाद्रि ने उद्धृत किया है. उसमें स्पष्ट कहा गया कि लोकगुप्ति (लोकरक्षा) के अभिप्राय से कलियुग में ये कर्म वर्जित किये गये –

एतानि लोकगुप्त्यर्थं कलेरादौ महात्मभिः l
निवर्तितानि कर्माणि व्यवस्थापूर्वकं बुधैः II

शास्त्रों को ले कर हमारे समय में तीन दृष्टियाँ आधुनिक बुद्धिजीवियों तथा पण्डितों के समाज में रहीं हैं. एक अस्वीकारपरक, निषेधादारित वर्जनशील दृष्टि है, जो यह मानती है कि आज के समय में पहले के सारे शास्त्र निरर्थक और विषवत् परित्याज्य हैं. इस दृष्टि से यह कहा जाता है कि ऐसे शास्त्र का क्या काम जो लोक की सहज समुन्नति के ही आड़े आ जाये, जो इस तरह मनुष्यजीवन को हथकड़ियाँ लगा दे कि उसके लिये जीवननिर्वाहार्थ सहज व्यापार भी सम्भव न रह जायें. आधुनिक  वामपन्थियों की यह दृष्टि हो सकती है.

एक दूसरी दृष्टि  सर्वस्वीकार की है. इस दृष्टि से चलने वाले कहते हैं कि मनु ने कहा है इसलिये बाबावाक्यम् प्रमाणम् के न्याय से मानना चाहिये, वे तो सर्वज्ञ थे, हम आज के अज्ञानी प्राणी हैं. रूसी लेखक आर्थर कोएस्लर ने इन दोनों का मजाक उड़ाते हुए लिखा कि एक को विचारपरम्परा का अपच और अतिसार (डायरिया) है, दूसरे को विचारपरम्परा का कब्ज.  एक तीसरी दृष्टि शास्त्र के मूलउद्देश्यों का विचार कर उसकी लोकहित में युगसम्मत व्याख्या कर के परिष्कार की है, जिसमे शास्त्र की मर्यादा भी अव्याहत बनी रहे और लोकमङ्गल भी हो. ओझा जी की दृष्टि यही है.

अपनी वेदनिष्ठा तथा श्रुति में अकम्प्य आस्था के साथ ओझा जी परम्परा की गत्यात्मकता के प्रतिनिधि बन जाते हैं.

ओझा जी ने अपना सारा साहित्य संस्कृत में ही लिखा है, और उनका लिखा सदैव गहन, गम्भीर और दुरूह होता है. प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा में अनेकत्र पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष की अलग अलग व्यवस्थापित कर के वर्गीकृत व्याख्या नहीं की गई. उनके इस ग्रन्थ को बोधगम्य बनाने के लिये प्रयास किया जाना चाहिये.

संदर्भ

[1] वही, पृ. 238-39
[2] रामकृष्ण शस्त्री के ‘तारानाथचर्कवाचस्पतिचरितम्’ का मेरा हिन्दी अनुवाद मधुमती पत्रिका में प्रकाशित है।
[3] पराशरोऽप्याह-
समुद्रयानगमनं ब्राह्मणस्य न शस्यते ।
संम्भवेद् यदि मोहेन पुनः संस्कारमर्हति इति ।।
 [4] चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं यस्मिन् देशे न विद्यते ।
स म्लेच्छदेशो विज्ञेय आर्यावर्तस्ततः परः ।।७।।
यत्र पानमपेयस्य देशेऽभक्ष्यस्य भक्षणम् ।
अगम्यागामिता यत्र तं देशं परिवर्जयेत् ।।८।। (पराशरः)
[5] चाण्डालैः खानिताः कूपा ये च प्रत्यन्तदेशजाः ।
अन्त्यावसायिभिर्भुक्ता स्नानादौ तान् विवर्जयेत् ।।१।।
इति वृद्धपराशरः ।
[6] निरुद्धासु न कुर्वीरन्नंशभाक् तत्र सेतुकृत् ।
तस्मात् परकृतान् सेतून् कूपांश्च परिवर्जयेत् । १।।
इति बोधायनस्मृतिः ।
[7] समुद्रस्य ब्रह्महत्यां व्यपोहती” त्यत्रकलौप्रायश्चित्ते व्यवहार्य्यत्वाभावप्रतिपादकमक्षरमदृष्ट्वा तत्सिद्ध्यभिमानेन प्रवर्तमानः स्यात्तादृशं पुरुषं प्रत्येवेदमुपतिष्ठते प्रकरणान्तरस्य संवादिशास्त्रम्- “समुद्रयात्रास्वीकारः कलौ वर्ज्य” इति। समुद्रयात्रायाः स्वीकारः संग्रह-सिद्धिपर्यन्तो नास्तीति वा, समुद्रयात्रायां कृतायामपि तस्य स्वीकारी नास्तीति वा, समुद्रयात्रयापि ब्रह्मधातिनः स्वीकारो नास्तीति वा, तदर्थः। एतमेवार्थ स्पष्टमावेदयितुं वचनान्तरैकवाक्य-तानुरोधेन निर्णयसिन्धौ “समुद्रयातुः स्वीकारः” इति पाठः प्रकल्पितो दृश्यते। एतदर्थानुमोदनपराष्येव च।
द्विजस्याब्धी तु नौयातुः शोधितस्यापि सङ्ग्रहः ।
इत्यादीनि वचनानि द्रष्टव्यानि । ब्रह्महत्याप्रायश्चित्तार्थ समुद्रे नौकया गच्छतो निवृत्तहत्याकल्मषस्यापि व्यवहार्य्यत्वं नास्तीति तदर्थात्। यत्तु समुद्र नौकया यातुः समुद्रयानप्रयुक्तदुरितोपशान्त्यर्थ कृतप्रायश्चितस्यापि व्यवहार्यत्वं नास्तीति केचिदर्थमुपकल्पयन्ति, तदसत्। निर्दिष्टरीत्या पुराकल्पादारभ्येदार्नी यावदविच्छिन्नपरम्परा-सिद्धसमुद्रयात्राकर्तॄणां प्राचां व्यवहार्य्यत्वाभावस्य दूषितत्वकलङ्कस्यापि वा कुत्राप्युपाख्यानादावस्मरणत्तद्विरोधाच्चैतादृशार्थ-स्याप्रामाणिकत्वात् ईदृशार्थतात्पर्य्यग्राहकवचनान्तरानुपलम्भेन तथाभूतार्थस्य स्वकपोलकल्पित-त्वाच्च । सम्भवत्यर्थद्वये वचनान्तरानुगृहीतस्यैवार्थस्य प्रामाणिकतया ग्रहीतुमौचित्यात् । न हि समुद्रयात्रायाः स्वातन्त्र्येण पातित्यप्रयोजकत्वे तादृशपातित्य-शोधनस्य वा व्यवहार्य्यत्वप्रयोजकत्वे तादृशपातित्यशोधनस्य वा व्यवहार्य्यत्वप्रयोजकत्वाभावे किञ्चिद्वचनान्तरं प्रमाणमुपलभामहे यदेकवाक्यतानुरोधेनैतस्य वाक्यस्य तदर्थतात्पर्यं सुगृहीतं स्वात्। तस्मादनुपादेयमेतत् ।
[8] अवश्यं हि परेण कारयितव्यतयेष्यमाणमपि किञ्चित्कर्म कर्तुमनादिष्ट एव व्यवस्यमानः कश्चित् सुयोग्यबालकादिरशक्तत्वबुद्ध्या वा प्रतिष्ठितत्वबुद्धया वा आदरबुद्ध्या वा प्रेमतो वा केनचिद्विशिष्टानुरोधेन वा किञ्चिद्दोषानुषङ्गशङ्कया वा पित्रादिगुरुजन-वार्य्यमाणोऽपि यद्युत्साहभरेण स्वस्मिन् शक्तियोग्यतामौचित्यं वा दर्शयन् दोषसंसर्गमनासाद्यचैव तत् कर्म्म यथावत् साधयेत् न स तत्तर्हि गुरुजनाज्ञाभङ्ग-कारित्वेनावगीयते, प्रत्युत निषेधकेनापि गुरुजनेनान्यैश्च विशिष्टैरसौ भूयसाऽभिनन्द्यत इति दृश्यते लोके। एवमेवेहापि “शास्त्रं हि वत्सलतरं मातापितृसहस्रतः” इत्यार्षप्रामाण्यात् परमानुग्राहकेण शास्त्रेण क्वचिदशक्यत्वादि-बुद्धया यदि-किञ्चिन्निषेध्यते न तत्र शक्तस्य दप्यतिक्रमे कश्चिद्दोषो निरूप्यते।
[9] तस्मान्नायमेकान्तात्यन्तप्रतिषेधः। किन्तु दूरदेशगमने स्वधर्म-हानिशङ्का प्राणान्तिकक्लेशा-नुबन्धशङ्का च तत्प्रतिषेधे बीजं स्यात्। (प्रत्यन्तप्रस्थानमीमांसा)

 

राधावल्लभ त्रिपाठी
जन्म : 15 फरवरी, 1949
मध्य प्रदेश के राजगढ़ ज़िले में शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी., डी.लिट्.
सन् 1970 से विश्वविद्यालयों में अध्यापन शिल्पाकार्न विश्वविद्यालय, बैंकॉक; कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क में संस्कृत के अतिथि आचार्य. राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में पाँच वर्ष कुलपति (2008-13).  शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में फैलो जर्मनी, इंग्लैंड, जापान, नेपाल, भूटान, आस्ट्रिया, हालैंड, बांग्लादेश, रूस, थाइलैंड आदि देशों की यात्राएँ
प्रकाशन : ‘आदिकवि वाल्मीकि’, ‘संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा’, ‘संस्कृत काव्यशास्त्र और काव्य-परम्परा’, ‘नाट्यशास्त्र विश्वकोश’, ‘बहस में स्त्री’, ‘नया साहित्य : नया साहित्यशास्त्र’, ‘भारतीय काव्यशास्त्र की आचार्य-परम्परा’ आदि समीक्षात्मक पुस्तकों सहित हिन्दी में दो उपन्यास और
तीन कहानी-संग्रह व अनेक नाटक प्रकाशित; संस्कृत में तीन मौलिक उपन्यास, दो कहानी-संग्रह, तीन पूर्णाकार नाटक तथा एक एकांकी-संग्रह प्रकाशित ‘सागरिका’, ‘नाट्यम्’ आदि पत्रिकाओं का सम्पादन पुरस्कार : ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’, ‘शंकर पुरस्कार’, कनाडा का ‘रामकृष्ण संस्कृति सम्मान’, यू.जी.सी. का ‘वेदव्यास सम्मान’, महाराष्ट्र शासन का ‘जीवनव्रती संस्कृत सम्मान’ आदि
radhavallabh2002@gmail.com
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Comments 4

  1. Mahesh Mishra says:
    1 week ago

    मुझे इस विश्लेषण में समस्या दिख रही है…
    इस हिस्से को देखें
    “नारायण राव पारंगी का मत है कि ऋग्वेद (10.136.5) में वर्णित भूगौलिक स्थिति के अनुसार सप्तसिन्धु प्रदेश उस समय दोनों ओर से पूर्वी और पश्चिमी समुद्र से घिरा हुआ था. पश्चिमी समुद्र आज का अरब सागर था. पूर्वी समुद्र उस समय आज के पंजाब के पूर्व में था. ऋग्वेद में अन्यत्र (9.3.3.6 तथा 10.4.7.2) भी सप्तसैन्धव प्रदेश के समुद्र से घिरे होने की बात कही गयी है. यदि आर्य जन सप्तसिन्धु प्रदेश में हिमालय के आसपास हैं, तो वे समुद्र को में नावों से पार कर करके कहाँ आवाजाही कर रहे हैं?
    समुद्र आर्यावर्त से सुदूर दक्षिण में नहीं उनके पास ही है. भूगर्भीय परिवर्तनों से कालान्तर में समुद्र सूख गया, और वह आज राजस्थान की खारी झीलों, कृष्ण सागर (कैस्पियन सागर) और बाल्कश झील के रूप में शेष है. वर्तमान राजपूताना दक्षिण समुद्र का स्थान था और सरस्वती नदी इसी में गिरती थी. सरस्वती तो लुप्त हो गई और समुद्र दूर हटता गया. लोकमान्य बालगङ्गाधर तिलक भी आपने महाग्रन्थ दि आर्कटिक होम आफ दि वेदज में यही मत उपन्यस्त करते हैं.
    हरिवंश पुराण में श्रीकृष्ण द्वारका में एक ब्राह्मण के मृत नवजात पुत्र के लेने के लिये सागर के भीतर कथित वरुणलोक हो कर जाते हैं और सागर के पार कर के उत्तरकुरु पहुँच जाते हैं. सागर पार कर के कोई हिमालय के उस पार उत्तरकुरु तभी पहुँचेगा जब सागर ऐन हिमालय की ढलानों को छू रहा हो. श्रीकृष्ण समुद्र से अनुरोध करते हैं कि हमें आगे का रास्ता दो. हरिवंश के विष्णुपर्व अध्याय ११३. १२-१६ में फिर क्या हुआ यह अर्जुन के शब्दों में बताया गया है – समुद्र ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली. फिर हम सब लोग स्तम्भित हुए जल के मार्ग से चले. वह मार्ग भूमिपर स्थित प्रकाशमान मणियों की प्रभा से उद्भासित हो रहा था. तत्पश्चात् समुद्र को पार करके हम उत्तर कुरु में जा पहुँचे. फिर एक ही क्षण में गन्धमादन पर्वत को भी लाँघ गये. तदनन्तर जयन्त, वैजयन्त, नील, रजतपर्वत, महामेरु, कैलास और इन्द्रकूट नामवाले सात पर्वत भगवान् श्रीकृष्णकी सेवा में सब-के-सब उपस्थित हुए.”
    ऐसे निष्कर्ष सब घाल मेल कर रहे हैं… वेद, पुराण में समुद्र का वर्णन या भौगोलिक वर्णन विशाल जल राशि इत्यादि को इंगित करने के लिए लगते हैं और आज जिसे हम समुद्र मानते हैं उससे यह भिन्न है…
    वज़ह यह है कि सप्त- सिन्धु प्रदेश में समुद्री हलचल करोड़ों लाखों साल पहले हुई है यह बात भौगोलिक प्रमाण, पुरातात्विक प्रमाण, जीवाश्म अध्ययन से साबित होती है.
    पुराण और वेदों से ऐतिहासिक निष्कर्ष निकालने में जो सावधानी अपेक्षित है उसका ध्यान मुझे लगता है, नहीं रखा गया है.
    साहित्य और मिथ- इतिहास के आधार पर निष्कर्ष निकालने में शायद और अधिक सावधानी अपेक्षित है.
    सादर

    Reply
  2. सविता मोहन says:
    6 days ago

    अद्भुत।
    अत्यंत ज्ञान वर्धक आलेख पढ़ने के लिए उपलब्ध कराने हेतु धन्यवाद

    Reply
  3. Garima Srivastava says:
    6 days ago

    ज़रूरी और शानदार शोध.आदरणीय त्रिपाठी जी शोधकर्ताओं के लिए प्रेरक हैं.

    Reply
  4. सवाई सिंह शेखावत says:
    3 days ago

    प्रिय अरुण जी ऐसी प्रतिमानी पोस्टों ने हो ‘समालोचन’ को विष्णु खरे प्रिय समालोचन बनाया है।मेरी ओर से राधावल्लभ त्रिपाठी जी और आप दोनो को बधाई!☺️मुझे भी यह सौभाग्य हासिल है कि मधुसूदन ओझा जी के पटु शिष्य पं.मोतीलाल शास्त्री जी के ज़रिए उनके वैदुष्य का रसास्वादन करने अवसर मिला।अब चूँकि त्रिपाठी जी तो उम्र के उस मोड़ पर हैं जहाँ उनसे इसे लेकर कोई आशा करना ज्यादत्ति होगी।पर संस्कृत-हिंदी पर समान रूप से अधिकार रखने वाला कोई आधुनिक दृष्टि सम्पन्न ओझा के किये-धरे का मूल्यांकन करे तो वह भारतीय मनीषा द्वारा किए गए के शोध एक को युग सन्दर्भ में जानने-समझने का क्रांतिकारी उद्यम होगा।

    Reply

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