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Home » दीप्ति कुशवाह की कुछ नई कविताएँ

दीप्ति कुशवाह की कुछ नई कविताएँ

by arun dev
March 18, 2026
in कविता
Reading Time: 2 mins read
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दीप्ति कुशवाह की कुछ नई कविताएँ
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दीप्ति कुशवाह की कुछ नई कविताएँ
रंगों के पार्श्व में

 

1.
एक अकेली आभा

जब कहीं ‘हाथ पीले’ करने कहे गए
तो किसी किसान ने
अपना खेत गिरवी रखा
किसी माँ ने अपने जेवर

स्वर्ण के स्वप्न में चुपचाप उगा रंग
जो मन का छलावा भी है
व्याधि का संकट भी

यह रंग मंदिर में
प्रतिमा के लिए आसन की तरह बिछा
किसी मन्नत की तरह काँपता
हल्दी की थाली में आशीर्वाद बना
और प्रेम ने अपना प्रथम रंग
पीला होना चुना

हमारी ज़िंदगी से
कहाँ चले गए वे लोग
जो पोस्टकार्ड के पीलेपन पर
लिख भेजते थे अपने खतरे और खुशियाँ

पीला वह बल्ब है
जो अनाथालय की रातों में
नींद की जगह जलता है
थकी हुई छत से लिपटा हुआ

यह वही रंग है
जो बसंत में पराग बन उड़ता है
सड़कों पर
सावधानी की चेतावनी बन
ठहर जाता है

हर बार
जब कोई ‘पीली छतरी वाली लड़की’
बारिशों में निकलती है
एक किताब अपने भीतर पढ़ती है

पीले में पीले कई हैं
हमेशा नत है अमलतास
अपने भरेपूरेपन में भी
जैसे भीतर कोई क्षमा माँगता हो

कभी भय
कभी कांति
और काग़ज़ का वह टुकड़ा भी पीला
जिस पर वसीयत नहीं
बस एक गुहार लिखी गई थी.

 

 

2.
अपनी तरह की एक ध्वनि

बैंगनी गुलमोहर की पंखुड़ियाँ
नहीं गिरतीं सीधे जमीन पर
वे हवा में घूमती हुई
किसी भूली हुई याद से टकरा जाती हैं

यह रंग इंद्रधनुष से शुरू हो कर
ध्वनि में उतरता है
और चुपचाप आत्मा में थरथराता है

जिस उछाह में यह दृश्य लिपटा था
‘दीदी तेरा देवर दीवाना…’
वह सिर्फ़ एक फ़िल्मी मुस्कान नहीं थी
एक पूरी पीढ़ी की नमी थी
बैंगनी रंग में डूबी हुई

कहीं दूर
‘पर्पल सी’ की लहरें
दो स्त्रियों के मौन प्रेम की भाषा थीं
जो तटों पर नहीं
एक निषिद्ध स्पर्श में बहती रहीं

जामुनिया अब स्फटिक नहीं
एक अस्वीकार की स्मृति है
जिसे वह स्त्री आँखों में सहेजे फिरती है
जो सिर्फ़ सुनी जाती थी
समझी नहीं गई
और जिसने फिर भी
अपने उत्तर खुद गढ़ लिए
रंगों की तरह.

 

 

3.
प्रश्न में चमकता हुआ

नीला एक नहीं है
वह आकाश से शुरू नहीं होता
न ही समुद्र में समाप्त

वह एक स्क्रीन से झाँकता हुआ
आँखों में जलन छोड़ जाता है
ब्लू रे की किरच
धूप में रंग नहीं,
थकान भरती है

एक नीली डायरी की याद
मन में
कोई पुरानी दोपहर लौटा देती है

यह रंग
पिकासो की उदासी में गहराता था
और वैन गॉग की ‘स्टारी नाइट’ में
लहरों की तरह बहता रहा

कुछ ने इसे स्कूली वर्दी कहा
कुछ ने प्रभु का रंग बताया
जैसे एक ही रंग
हर बार नई भावना पहन लेता है

एक शंख पर जमे
पुरातन समुद्र के सूखे नीलेपन में
उस नीलम सी गहराई नहीं
जो अंगुली की जगह
मन के किसी अंधे कोने में जड़ा रहा

नीला खुला भी था
पर बाँधा गया
ध्वजों में, कविताओं में

नीला ख़ामोश रहते हुए
सबसे ऊँचा शोर बन सकता है
क्या कोई शब्द है
जो इस रंग के भीतर की प्यास को बुझा सके?

 

 

4.
एक धीमा उजाला

कभी यह आँख के भीतर
डुबकी लेती स्मृति है
कभी दीवार पर छाया बनी
चुपचाप बैठी पीठ

एक पुराना स्वेटर है पति का
अलमारी में टंगा अब भी
जिसमें समय की धड़कन
छाती के पास सुनाई देती है

यह रंग कोयले की खदान से निकला
रात के अँधेरे में रहस्य की तरह फैला
और किसी पुराने घाव की तरह
सूख गया

एक काली पट्टी थी
कभी वेदना की गवाही
कभी असहमति की चुप घोषणा
असल में वही थी
हमारे चुप हो जाने की आखिरी सीमा

‘काले मेघा पानी दे’
रेणु के गाँवों में सुनी गई एक पुकार
जिसे साहित्य ने नहीं
धरती की प्यास ने रचा था

वह क्षण
जब ‘ब्लैक’ की रानी मुखर्जी ने
अक्षरों से पहले
अँधेरे को पढ़ा

यह एक लकीर भी
जिसके उस पार जाना था
पर जाया नहीं गया
एक पर्स था
रेल में छूट गया
उपहार की गाढ़ी स्मृति में

इसी रंग ने स्लेट बन कर
आखर के उजाले बाँटे
स्याही बन कर
शब्दों को सुबहें दीं.

5.
देखने से बाहर

हरे को देखा जा सकता है
पर छुआ नहीं जा सकता हमेशा
एक पर्दा
जिसके पीछे
हम अपने सबसे अंतरंग सच को
क्रोमा की तरह गायब कर देते हैं

असलियत को ओझल कर
संभावनाओं की सीमा बढ़ा देता है
यह रंग
यह वही है
जो बैनरों पर चमकता है
पर खेत की मेड़ तक
उसकी छाया नहीं पहुँचती

जिसे झंडे पर रख कर
हम उसे जमीन से काट चुके हैं

इस रंग को कविता में बचाया जा रहा है
शुष्क नारों में तपाया जा रहा है

‘हरी घास पर क्षण भर’ का आलिंगन था
जिसमें पृथ्वी ने अपना स्पर्श दिया

कभी उँगली में पहना गया पन्ना
सच को बोलने की ताक़त देता है
तो कभी किसी कागज़ के नीचे दबा मिला हरा
जहाँ उसे नीयत के खिलाफ़
रिश्वत की तरह रखा गया था

मन की जमीन नम हो
तो दूब की लुनाई में
गहराता है हरा
और सरहद पर खड़ी सतर्कता तक
फैल जाता है

यह रंग हर बार याद दिलाता है
कि कुछ रंग
बस रंग नहीं होते
वे तय करते हैं कि हम
किस ओर देखते हैं
किसे ओझल करते हैं.

 

 

6
बीच का ताप

नारंगी में लाल पूरा नहीं है
पीला भी अधूरा
पर दोनों की दहक
इसमें अधिकार की तरह थिरकती है

यह चटख है पताकाओं में
मद्धम संध्या के विस्तार में

इस रंग को
केवल दीप्ति की तरह फैलना आता है
यह मौन में सुलगती एक दीर्घ पुकार है
बहुरंगी छवियों में

लाल जब विद्रोह का चेहरा गढ़ रहा था
भगवे ने समर्पण की आँखें दीं
एक जला अन्याय पर
दूजा ठहर गया जब साधना हुई
दोनों जड़े हैं एक ही देह में
एक ने लड़ना सिखाया
दूसरे ने तपना

पारिजात की सफेद देह
एक नारंगी तंतु से बँधी हुई
जो भूमि तक पहुँचने से पहले
गंध में ठहर जाती है
जो संतरों की सुगंध है
और कभी-कभी
जलती चिट्ठी का काग़ज़

कहीं जब एक बेटा
पिता को खो कर लौटता है
उस पर सूरज की अंतिम किरण
नारंगी ही पड़ती है.

 

 

7.
एक अनुपस्थिति की उपस्थिति

सफेद अस्पताल की चादरों में नहीं
वह उस साँस में है जो लौट न सकी

यह रंग कभी अश्रुपूर्ण संधियों का
धुँधलाता हुआ व्रत
कभी शून्य का विस्तार
सदियों को समेटता हुआ

वह झूठ की सतह पर भी बिछ सकता है
और सत्य की ऊँचाई पर भी टिक सकता है
बिना कोई पक्ष लिए

किसी ने झूठ को सफेद बनाया
किसी ने नमक कहा
दूध, गौरैया का अंडा या बर्फ की परत
सफेद हर जगह है
और फिर भी नहीं है

वह वही सफेद है
जो चरखे के सूत में नहीं
प्रतिरोध की लय में घूमता था
वहाँ वस्त्र नहीं था, विचार था
जिसे पहना नहीं
जिया गया

जब ‘उम्र बरस कर सुफैद’ हो जाती है
समय रुई के फाहे सा उड़ता है
थमता नहीं

इस रंग ने खुद को कभी नहीं सँवारा
सबने उसे अपने अर्थ से भर दिया
वह स्वीकार करता रहा
रंगों को, ध्वनियों को, मौन को, चिरशांति को

सफेद दरअसल एक आरंभ भी है
और समापन भी
एक ऐसा कैनवास
जिस पर समय
अपनी सबसे धीमी लिपि में लिखता है.

 

 

8.
एक अनकही तपिश

लाल
न तो युद्ध है, न प्रेम
वह वह तपिश है
जो धमनियों में बिना नाम के बहती है
कभी रक्त की तरह
कभी गुलाब की राजस सुगंध की तरह

यह वह लोकधुन है जिसमें कोई ग्राम्या
अपने प्रीतपल को
कसीदे की तरह टाँकती है
“अरे रामा बीरबहूटी चुन लाई रे सखी…”

वह लाल किला है
जिसकी दीवारों ने इतिहास को जिया

यह रंग
सभाओं के बीच उठे हाथों में
सपनों की तरह रिसा
जहाँ विचारों की रक्तवाहिनियाँ
जनपथ बन कर उभरती हैं

यह रंग उस माँग की सूक्ष्मरेखा में
अदृश्य हो गया था
जिसमें प्रेम तो अमर रहा
पर प्रतीक छीन लिए रूढ़ियों ने

लाल एक पान की हँसी में
छूटे हुए वाक्य की तरह है
या उस पत्र की लिखावट
जिसमें शब्द कम
शोक अधिक होता है

नारे की गरज में यह है
गालों पर उभरी शर्म में
और विद्रोह के अनकहे स्वर में भी है

‘लाल टीन की छत’ पर
यह साँझ के अकेलेपन सा उतरता है
जहाँ स्मृति की गिरहें
खुलती हैं धीरे-धीरे
और भीतर चुपचाप कुछ भीगता है.

 

 

दीप्ति कुशवाह
(नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश)
‘आशाएँ हैं आयुध’ कविता संग्रह प्रकाशित
deepti.dbimpressions@gmail.com
Tags: 20262026 कवितादीप्ति कुशवाह
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Comments 13

  1. जावेद आलम ख़ान says:
    5 months ago

    रंगों को केंद्र में रखकर दर्शन रचा है दीप्ति जी ने.सभी कविताएं बहुत अच्छी लगीं लेकिन सफ़ेद रंग वाली एक अनुपस्थित सी उपस्थिति बेहतरीन है.दीप्ति जी को बहुत बहुत बधाई इससे पहले उनकी आभूषणकेंद्रित कविताएं भी शानदार थीं.

    Reply
  2. गिरीश पंकज says:
    5 months ago

    रंगों को लेकर लिखी गई दीप्ति की कविताएँ अद्भुत हैं. शायद यह पहली बार हो रहा है कि हिंदी कविता में विविध रंगों को लेकर इतनी सुंदर कविताएँ रची गईं. कवयित्री की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है. बधाई.

    Reply
  3. Rakesh pathak says:
    5 months ago

    दीप्ति जी की एक अपनी भाषा है जिसमें बहुत बेहतरी से वे भाव प्रधान कैनवास पर शब्दों की कूची चलते है. आज रंगों के केंद्र में रखकर चित्र नहीं आत्मा को शब्द चित्रित किया है. रंगों में अध्यात्म और दर्शन के वे बिंब पढ़ने को मिले जो प्रायः कम ही लिखी जाती है इस तरह की कविता! कविताएं बेहद गंभीर और दर्शन से भरी हुई हैं ।
    राकेश पाठक

    Reply
  4. मनोज छाबड़ा says:
    5 months ago

    कविताएं हैं कि पेंटिंग्स…
    ❤️

    Reply
  5. Vijay Rahi says:
    5 months ago

    बहुत सुंदर कविताएं। दीप्ति जी को बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। पढ़कर समृद्ध हुआ हूं। दोबारा पढ़ूंगा। शुक्रिया समालोचन ♥️

    Reply
  6. Vikash Anand says:
    5 months ago

    शब्दों से पूरा चित्र-पट बना दिया है दीप्ति जी ने।

    Reply
  7. Braj Shrivastava says:
    5 months ago

    रंगों के दर्शन को बयान करतीं ये अभिव्यक्तियाँ हमारी कला और सौंदर्य बोध को और अधिक जागृत करतीं हैं। जैसी कविता हम पढना चाहते हैं। ये ऐसी ही कविताएं हैं।

    Reply
  8. पुरु मालव says:
    5 months ago

    रंगों पर कविताएं इस तरह भी लिखी जा सकती हैं। अद्भुत है। रंगों की ही तरह कविताओं में शब्दों को बरता गया है। न अधिक, न कम। बहुत -बहुत बधाई।

    Reply
  9. राजाराम भादू says:
    5 months ago

    कभी एकान्त श्रीवास्तव ने रंगों पर एक कविता- श्रृंखला लिखी थी। उसके दशकों बाद दीप्ति की इन कविताओं को पढ रहे हैं। दीप्ति ने रंगों की प्रकृति और संकेतार्थों को परिवेश में विस्तारित किया है। सांस्कृतिक और कलात्मक संदर्भ इन कविताओं को गहरे अर्थ प्रदान करती हैं। दीप्ति को हार्दिक बधाई !

    Reply
  10. माताचरण मिश्र says:
    5 months ago

    अरुण देव जी के समालोचन में विविध रंगों की दीप्त कविताओं के साथ कवयित्री दीप्ति कुशवाहा का आना उपलब्धि है, निम्न वर्गीय जीवन में पीले कार्डों का होना खुशी और दुःख दोनों के अपने रंग हैं, पीला,हरा और नीला सब मनुष्य जीवन की छटाएं हैं, कविताओं में रेणु और निर्मल दोनों हैं, पिकासो और वान गाग भी हैं गुएर्निका की यातनाएं हैं तो सूरजमुखी के सूर्यमुखी फूल भी हैं,यानी कि जीवन के सभी रंग मौजूद हैं, दीप्ति की ये कविताएं बहुत दूर तक जाने की हौसलामंद हैं,,, शुभकामनाएं 🙏

    Reply
  11. ज्योतिष जोशी says:
    5 months ago

    समालोचन पर दीप्ति कुशवाह की कविताएं रंगों पर निबद्ध हैं जिनमें संस्कृति, परम्परा और लोकबोध का गहरा परिपाक है. यह कविताएं सहज मन पर उतरतीं उस दृश्यलेख की तरह हैं जिनमें बिम्ब और रंगों की आभा में गृहस्थ जीवन के सुख -दुःख भी दीप्तिमान होते हैं.’ स्वर्ण के स्वप्न में चुपचाप उगा रंग ‘, ‘ जामुनिया अब स्फटिक नहीं एक अस्वीकार की स्मृति है ‘, ‘एक शंख पर जमे पुरातन समुद्र के सूखे नीलेपन में ‘, ‘इसी रंग ने स्लेट बनकर आख़र के उजाले बांटे ‘, ‘मन की ज़मीन नम हो तो दूब की लुनाई में गहराता है हरा ‘ जैसे काव्यांश रंगों को जीकर उन्हें परम्परा में परखते हुए अपने स्वप्न को आकारित करने जैसा है. इन सुन्दर कविताओं के लिए दीप्ति कुशवाह और समालोचन दोनों को बधाई.

    Reply
  12. Arvind Derhgawen says:
    4 months ago

    वाह वाह 👍👍 दीप्ति जी की कविताएं तो अत्यंत रसीली और भावपूर्ण हैं। सफेद और नारंगी रंगों ने अपनी गहराई के द्वारा अत्यंत प्रभावित किया। शब्दों के चयन की आपकी प्रतिभा सचमुच अद्भुत और विलक्षण है, कई भूले हुए शब्दों को आपने पुनः हमारे समक्ष ला दिया, धन्यवाद 🙏❤️🌹

    Reply
  13. विजय कुमार says:
    4 months ago

    ये बहुत सुंदर कविताएं हैं , मन को स्पर्श करती हैं । रंगों की चेतना का यह रेखांकन हमारे बोध का विस्तार करता है । यह सौंदर्य चेतना सूक्ष्म है चेतन और अवचेतन बहुत सारे धरातलों के स्पर्श को समेट लेती है। जीवन जगत के नाना विधि रहस्य और गतिमान विचार यहां उभरते दिखाई देते हैं।रंग इस तरह से बड़े दृश्य फलक का अनिवार्य अंग बन जाते हैं। इसमें बड़े ही सहज ढंग से कुछ लेखकीय कृतियों के नाम रंगों के साथ जिस तरह से जुड़े , वह भी बड़ा आकर्षक लगा। एक अच्छी कविता का काम यही होता है कि वह बहुत सारे जाने अनजाने पहलुओं को अपने भीतर समाहित कर संवेदना के एक विस्तृत दृश्य फलक को रचती। मेरी आपको बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं। इन कविताओं को पढ़कर मन खिल उठा।

    Reply

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