• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » ‘देखने के तरीक़े’ यानी तरीक़े से देखना : दीपक त्रिपाठी

‘देखने के तरीक़े’ यानी तरीक़े से देखना : दीपक त्रिपाठी

by arun dev
April 22, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 4 mins read
A A
‘देखने के तरीक़े’ यानी तरीक़े से देखना : दीपक त्रिपाठी
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
‘देखने के तरीक़े’ यानी तरीक़े से देखना
दीपक त्रिपाठी

कभी-कभी हमें ऐसे विषय पर किताब मिल जाती है कि हम चौंक जाते हैं कि इस विषय पर किताब भी हो सकती है. जॉन बर्जर की किताब ‘देखने के तरीक़े’ एक ऐसे ही दुर्लभ विषय पर आधारित किताब है, जिस पर कम ही किताबें देखने को मिलती हैं. इसमें सैद्धान्तिक और व्यावहारिक स्तर पर चित्रों (Paintings) को देखने-समझने के कुछ तरीक़े या सिद्धान्त प्रस्तावित-अनुमोदित कियह गयह हैं. इस किताब में प्रस्तावित तरीक़ों का प्रयोग करके हम कुछ अन्य कलाओं को भी समझने में मदद ले सकते हैं, लेकिन मूलतः चित्रकला को ही ध्यान में रखकर इस किताब के सिद्धान्त निर्धारित-निष्पादित कियह गयह हैं.

इस किताब का संक्षिप्त परिचय यह है कि इसे 1972 में बुकर पुरस्कार (उपन्यास ‘G’ के लिए) प्राप्त जॉन बर्जर (1926-2017) ने लिखा है, जो मूलत: इंग्लैण्ड के रहनेवाले थे और द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश आर्मी की तरफ़ से 1944 से 1946 तक लड़े भी थे. जॉन बर्जर ने बुकर पुरस्कार में प्राप्त धनराशि का आधा हिस्सा ‘ब्रिटिश ब्लैक पैंथर आन्दोलन’ को दान कर दिया था. बी.बी.सी. ने ‘Ways of seeing’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ टेलीविज़न पर जनवरी 1972 में प्रसारित की थी, जिसे जॉन बर्जर और उनके कुछ मित्रों ने मिलकर बनाया था. बाद में इसी नाम (Ways of Seeing) से ही पुस्तक भी प्रकाशित हुई. टेलीविज़न सीरीज़ चार एपिसोड में थी जबकि किताब में कुल सात अध्याय हैं. हिन्दी में यह किताब पहली बार 2025 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है. अंग्रेज़ी से हिन्दी-अनुवाद आशीष मिश्र ने किया है, जो कि स्वयं हिन्दी के एक कवि हैं और प्रायः विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर आलोचना-समीक्षा आदि लिखकर अपनी गम्भीर उपस्थिति दर्ज करवाते रहते हैं.

यह किताब हमें पेंटिंग देखने से अधिक भी बहुत-कुछ सिखाती है. यह किताब सिर्फ़ देखने का तरीक़ा ही नहीं बताती, बल्कि हमें क्या देखना चाहिए यह भी बताती है. दृष्टिकोण ही नहीं देती, बल्कि दृष्टि भी देती है. जब कोई चित्र निर्मित किया गया था, तब से लेकर आज तक भर में उसे देखने के क्या-क्या दृष्टिकोणगत परिवर्तन हुए हैं, इसको भी यह किताब स्पष्ट करती है. यह किताब उस समाज को भी व्याख्यायित करने का प्रयास करती है जिसमें किसी चित्र का निर्माण हुआ है, या यह भी कह सकते हैं कि यह किताब हमें यह भी समझाती है कि किसी भी चित्र के माध्यम से आप उस समाज को कैसे समझें जहाँ उस चित्र का निर्माण हुआ हो.

यह किताब इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि यह कला के माध्यम से कुछ नए विमर्श प्रस्तावित करती है. यह ‘प्रस्तावित विमर्श’ आधुनिकता के दौर में आधुनिक ढंग से कलाओं को समझने के दौरान यूरोपीय चिन्तनधारा से निसृत हुए हैं. यह विमर्श पहले से प्रचलित विभिन्न विमर्शों में जुड़‌कर उन्हें और भी सार्थकता प्रदान करते हैं. उदाहरण के लिए स्त्री-विमर्श आधुनिक और उत्तर आधुनिक विभिन्न प्रमुख विमर्शों में से एक है. इसी विमर्श में यदि अलग-अलग युगों में बनायी गयी स्त्रियों की पेंटिंग की व्याख्या को जोड़कर स्त्री-विमर्श को और अधिक व्यापकता के साथ विकसित करने का प्रयास किया जाये तो इसमें हर्ज ही क्या है.

स्त्रियों के चित्रों में व्यक्त नग्नता या अर्द्धनग्नता को भी यदि तार्किक ढंग से समझने का प्रयास किया जाये तो बेशक पूरा स्त्री-विमर्श एक नयी दिशा में विकसित होता दिखायी देगा. जॉन बर्जर ने इस किताब में इसी तरह के प्रयास किया हैं. कुछ विमर्शों में अपने विश्लेषण से नए बिन्दु जोड़े हैं और कुछ जगहों पर नयी दृष्टि, नये विचार या नये विमर्शों की तरफ़ इशारा करके ‘चित्रकला’ को ‘चित्र-विचार’ के रूप में प्रस्तुत किया है.

लेखक जॉन बार्जर ने मध्य मध्ययुगीन विभिन्न पेंटिग का ही विश्लेषण नहीं किया है, बल्कि आधुनिक समय में प्रचलित चित्र पर आधारित विज्ञापनों को भी विश्लेषित किया है और उन विज्ञापनों को मध्यकालीन दृष्टि से जोड़कर आधुनिक सन्दर्भों में समझने की दृष्टि विकसित की है. लेखक ने आधुनिक विज्ञापन-शैली को बहुत बारीकी से ऑयल पेंटिंग से जोड़ा है. दोनों की शैली और उनके उद्देश्य तथा दोनों की सांकेतिक व्यवस्था में क्या समानताएँ हैं, इसको विवेचित किया है. यद्यपि यह विवेचन उन विज्ञापनों पर आधारित है जो इस पुस्तक के प्रथम प्रकाशन (1972) तक उपलब्ध थे, फिर भी विज्ञापनों में प्रयुक्त मनोविज्ञान किस प्रकार ऑयल पेंटिंग के परम्परागत मनोविज्ञान से मेल खाता है, इसका विश्लेषण बहुत तार्किक ढंग से किया गया है.

जॉन बर्जर ने तुलना के जो बिन्दु प्रस्तुत किये हैं वे एक प्रकार से तुलनात्मक अध्ययन के लिए सूत्र हैं. पेंटिग या विज्ञापन के माध्यम से एक मानसिकता, एक आदर्श या एक अवधारणा स्थापित करने का प्रयास समय-समय पर किया जाता रहा है. इसी सबको स्पष्ट करते हुए वे अचानक कह उठते हैं–

“बिना विज्ञापन के पूंजीवादी ज़िंदा नहीं रह सकता.” (पृ. 179)

लेखक ने कैमरे के आविष्कार हो जाने पर पेंटिंगों पर पड़नेवाले इसके प्रभाव को भी सूक्ष्मता से उद्घाटित किया है. फोटोग्राफी के कैमरे ने अलग ढंग से चित्रकला को प्रभावित किया और वीडियोग्राफी के कैमरे ने अलग ढंग से. पेंटिंग देखना और पेंटिंग की फोटो देखना या पेंटिंग की वीडियो रिकार्डिंग देखना सर्वथा अलग-अलग अनुभूतियों से गुज़रना है. यह ‘कला और तकनीक’ का नव्य सम्बन्ध है.

जॉन बर्जर ने ‘कला और तकनीक’ की बाइनरी के अतिरिक्त अन्य कई बाइनरी को ज़ेरे-बहस रखते हुए चित्रकला ही नहीं, बल्कि अन्य कलाओं को भी समझने के सूत्र प्रदान किए हैं, जैसे– ‘कला और बाज़ार’, ‘कला और व्यवसाय’, ‘कला और धर्म’ आदि. इसके अलावा– न‌क़ली और असली पेंटिंग का प्रश्न कहाँ तक महत्त्वपूर्ण है, अमीर और ग़रीब की पेंटिंगों में तात्त्विक अन्तर क्या है, किसी पेंटिंग की सैकड़ों-हज़ारों कॉपियाँ प्रिंट होकर लोगों में फैला देना किस प्रकार की प्रवृत्ति है, टी-शर्ट पर ‘मोनालिसा’ की पेंटिंग प्रिंट करके बेचना ‘मोनालिसा’ को समझने की परम्परागत दृष्टि को कैसे प्रभावित करता है, आदि-इत्यादि ऐसे बिन्दु हैं जिन पर जॉन बर्जर ने बहुत मौलिक चर्चा की है.

कुछ सौन्दर्यबोध और संवेदनाएँ ऐसी होती हैं जो किसी परिस्थिति विशेष या समाज-विशेष की उपज होती हैं. कला और तकनीकी विकास का क्या अन्तस्सम्बन्ध है, इसे वही समाज बख़ूबी समझ और समझा सकता है जहाँ यह दोनों मौजूद हों. यूरोप में चित्रकला और मूर्तिकला की एक सुदीर्घ परम्परा रही है और आगे चलकर तकनीक पर आधारित औद्योगिक क्रान्ति भी यूरोप में ही सर्वप्रथम घटित हुई. कला और उद्योग के इस नये बन्धन-गठबन्धन को भी यह किताब तार्किक ढंग से समझाती है.

इस किताब को पढ़ने से कहीं ऐसा होगा कि आपकी दृष्टि में वृद्धि होगी और कहीं ऐसा भी हो सकता है आपकी दृष्टि ही परिवर्तित हो जाय; पक्ष में रहते हुए परिवर्तित होने से लेकर परिवर्तित होकर विपक्ष में हो जाने तक. यद्यपि जॉन बर्जर ने कई पेंटिंग को समझने की दृष्टि दी है, लेकिन मुझे लगता है कहीं-कहीं उनकी व्याख्या या उनके निर्वचनों से असहमत भी हुआ जा सकता है.

कहीं-कहीं जॉन बर्जर ने चित्रकार के मंतव्य को उस चित्र में उपस्थित व्यक्ति का मंतव्य बनाकर पेश कर दिया है या इसके विपरीत चित्र में उपस्थित व्यक्ति के मंतव्य को चित्रकार का मंतव्य बता दिया है. मंतव्य का यह अनुमान या मंतव्य का यह स्थानान्तरण सही भी हो सकता है और ग़लत भी हो सकता है, लेकिन यह एक तरह से ‘चित्रकार की हत्या’ जैसा प्रयास है या ‘लेखक की मौत’ की तर्ज़ पर ‘चित्रकार की मौत’ जैसी रची गयी कोई अवधारणा है. यानी चित्र जब बनकर तैयार हो गया तो कोई भी उसमें अपने विचार आरोपित करके उसका अर्थ निकाल सकता है और ज़रूरी नहीं कि उस निष्पत्ति से चित्रकार का कोई लेना-देना हो. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जॉन बर्जर चूँकि एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी थे और विभिन्न कालखंडों की कलाओं तथा मॉडर्न आर्ट की अवधारणा की व्याख्या मार्क्सवादी नज़रिये से करने के कारण प्रायः विवादित भी होते रहे, इसलिए हो सकता है ‘चित्रकार की हत्या’ के पीछे उनकी कोई विचारधारा सम्बन्धी मानसिकता भी जुड़ी हो. इस सन्दर्भ में अन्ततः इतना तो कहा ही जा सकता है कि उनका कोई भी विचार भले ही अन्तिम सत्य जैसा या अन्तिम निर्णय जैसा न हो, लेकिन एक मौलिक दृष्टि से युक्त तो है ही.

जॉन बर्जर ने अपने लेखन के दौरान ऐसे-ऐसे कथन भी पेश किये हैं जो रोचक होने के साथ-साथ बहुत महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष भी प्रस्तुत करते हैं. कुछ कथन उद्दृत करना उपयुक्त होगा–

(1) “किसी भी समय की कला प्रभु वर्ग के वैचारिक हितों की सेवा करती है.”
(पृ.101)

(2) “बिना यह बताये कि अच्छे और सामान्य चित्रों में क्या फ़र्क़ है, महान कलाकृतियाँ औसत चित्रों से घिरी हुईं अपना वैशिष्ट्य खो देती हैं.” (पृ.103)

(3) “अगर आप पेंटिंग ख़रीदते हैं तो इसका मतलब आप उसमें चित्रित वस्तुओं को भी ख़रीद रहे हैं. चीज़ों के स्वामित्व और चित्रित रूप में उन्हें देखने में एक समानता है.” (पृ.97)

(4) “चित्रों का अर्थ इसके अनुसार बदलता रहता है कि दर्शक ने इसके ठीक पहले या बाद में क्या देखा.” (पृ.35)

(5) “हर स्त्री की उपस्थिति से यह प्रदर्शित होता है कि उसकी उपस्थिति में क्या स्वीकार्य है और क्या स्वीकार्य नहीं है.” (पृ.55)

(6) “पुरुष स्त्री को देखता है. स्त्रियाँ अपने आपको देखे जाते हुए देखती हैं.” (पृ.56)

(7) “स्त्री के सन्दर्भ में पुरुष भगवान का एजेण्ट बन जाता है.” (पृ. 57)

(8) “किसी जुनूनी को उसका जूनून वस्तुसंगत और स्वाभाविक ही लगता है.” (पृ. 129)

(9) “किसी भी देश को जीतने के लिए यह ज़रूरी था कि वहाँ के लोगों को ईसाई बनाया जाये. तभी सभ्यतागत श्रेष्ठता साबित होगी. कला भी उस सभ्यता का हिस्सा है.” (पृ.111)

किसी अनूदित किताब पर चर्चा करने के दौरान उस किताब की विषय-वस्तु के साथ-साथ उसके अनुवाद पर भी चर्चा करना एक अपरिहार्य बिन्दु माना जा सकता है. कभी-कभी महत्त्वपूर्ण किताबों का अनुवाद ही उसे बोझिल बना देता है और कभी-कभी अनुवाद का स्फूर्तिदायक प्रवाह ही नीरस विषयवस्तु को भी पठनीय बना देता है. इस किताब की विषयवस्तु और आशीष मिश्र के अनुवाद में निहित प्रांजलता ने इस किताब को आश्चर्यजनक ढंग से रुचिकर और पठनीय बना दिया है.

मैं इस किताब की अनुवादगत विशेषताओं का उल्लेख इस लेख के अन्त्तिम हिस्से में इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि बिना विषय-वस्तु को समझे अनुवाद की बारीकियों को नहीं समझा जा सकता. यद्यपि यहाँ पुस्तक-समीक्षा के क्रम में इतना अवकाश नहीं है कि बहुत विस्तार से अनुवाद पर चर्चा की जाये, फिर भी कुछ बातें संकेत-रूप में कही जा सकती हैं.

अनुवादक ने इस हिन्दी-अनुवाद में संस्कृतनिष्ठ शब्दों, उर्दू (यानी अरबी-फ़ारसी आदि) के अलफ़ाज़ तथा अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों को बरतने में किसी प्रकार का कोई परहेज़ नहीं किया है. जहाँ जैसे ज़रूरत पड़ी वहाँ वैसे ही शब्दों का प्रयोग करते हुए सम्प्रेषणीयता को ही सर्वोपरि रखा है. कई स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेज़ी में जिस तापमान के शब्द प्रयोग किया गया थे अनुवादक ने हिन्दी में उसी तापमान के शब्दों को ढूँढ़कर लाने की कोशिश की है. जैसे हिन्दी के कुछ शब्द देखें– ‘वंचना’, ‘काम्य’, ‘रहस्यीकरण’, ‘दृष्टिभ्रम’, ‘पुनर्संस्कारित’ आदि. कुछ शब्द गढ़े हुए भी लगते हैं, लेकिन उनका अर्थ समझने में मुश्किल नहीं होती– ‘दृश्यरतिक’, ‘अप्रश्नेय यथार्थ’, ‘घनवादी कलाकार’, ‘संवेदनक्षम’, ‘विवस्त्र या विवस्त्रता’ आदि.

अनुवादक ने ‘नैकेड’ के लिए ‘निर्वस्त्र’ या ‘विवस्त्र’ और ‘न्यूड’ के लिए ‘नग्न’ शब्द का प्रयोग किया है. चूँकि ‘नैकेड’ और ‘न्यूड’ शब्द को लेखक ने अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया है, इसलिए अनुवादक द्वारा हिन्दी में भी इन्हें ठीक ढंग से अलगाने की कोशिश की गयी है. इन दोनों की परिभाषाएँ किताब में मिल जायेंगी.

इसी प्रकार हिन्दी-अनुवाद के अन्य कई उदाहरण वाक्य-स्तर पर भी मौजूद हैं, जिनमें शैलीगत सौन्दर्य मौजूद हैं. कई उदाहरण इस बात के भी हैं जहाँ हिन्दी और उर्दू के शब्दों का एक साथ सुन्दर प्रयोग किया गया है. कुल मिलाकर अनुवादक ने विषय-वस्तु की गम्भीरता को समझते हुए अत्यन्त सावधानी से अनुवाद किया है, जिसके कारण यह किताब पठनीय हो गयी. कला की समझ में अपने को समृद्ध करने के लिए यह किताब अनिवार्य है.
…………………….
पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें

 

दीपक त्रिपाठी
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी-विभाग
रामकृष्ण कॉलेज, मधुबनी, बिहार- 847211
 ईमेल : deepakruhani@gmail.com
Tags: 20262026 पेंटिंग2026 समीक्षादीपक त्रिपाठीदेखने के तरीक़े
ShareTweetSend
Previous Post

कैफ़ी हाशमी की लम्बी कहानी चाबी

Next Post

संस्कृत का शूद्र कवि शूद्रक और मृच्छकटिकम् : प्रेमकुमार मणि

Related Posts

लाना डेल के मादक क्षितिज पर टेलर स्विफ्ट का मोहक इंद्रधनुष: त्रिभुवन
नृत्य

लाना डेल के मादक क्षितिज पर टेलर स्विफ्ट का मोहक इंद्रधनुष: त्रिभुवन

शैलेन्द्र चौहान की कविताएँ
कविता

शैलेन्द्र चौहान की कविताएँ

उर्मिला शिरीष की पच्चीस कहानियाँ : प्रकाश कान्त
समीक्षा

उर्मिला शिरीष की पच्चीस कहानियाँ : प्रकाश कान्त

Comments 2

  1. Shampa Shah says:
    4 weeks ago

    जॉन बर्जर की लिखी पुस्तक ‘देखने के तरीक़े ‘ अपने में एक क्रांतिकारी पुस्तक है. इसे हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध कराने का बेहद ज़रूरी काम आशीष मिश्र ने किया और क्या ख़ूब किया! इसके लिए उनके प्रति कोटि कोटि आभार ☘️ दीपक त्रिपाठी ने इस पुस्तक का बड़ा सारगर्भित विश्लेषण और अनुवाद की विशेषताओं को भी अपने आलेख में बखूबी व्यक्त किया है. यह आलेख अवश्य ही कला- साहित्य में रुचि रखने वाले उन लोगों को इस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करेगा जिन्होंने इसे अभी तक नहीं पढ़ा है☘️ दीपक त्रिपाठी जी की बात से सहमत होते हुए मैं भी यह जोड़ना चाहती हूँ कि यह पुस्तक एक अनिवार्य रीडिंग है और यकीन मानिए यह आपके देखने-समझने के तरीक़े को आमूल-चूल बदलने का माद्दा रखती है ☘️☘️☘️

    Reply
  2. kamlanand jha says:
    4 weeks ago

    आशीष जी का काम ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण तो है ही, लेकिन दीपक जी ने अत्यंत मनोयोगपूर्वक अनुवादक के आशय को समीक्षा में रखा है। लेखक, अनुवादक और समीक्षक को बहुत बधाई।

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक