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Home » डॉली पार्टन : देह, प्रेम और स्त्री-स्वायत्तता की असाधारण आवाज़ : त्रिभुवन

डॉली पार्टन : देह, प्रेम और स्त्री-स्वायत्तता की असाधारण आवाज़ : त्रिभुवन

by arun dev
September 21, 2026
in संगीत
Reading Time: 17 mins read
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डॉली पार्टन : देह, प्रेम और स्त्री-स्वायत्तता की असाधारण आवाज़ : त्रिभुवन
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डॉली पार्टन
देह, प्रेम और स्त्री-स्वायत्तता की असाधारण आवाज़


त्रिभुवन

 

 

यह निर्धनता के नागपाश से वैभव के प्रवाल-द्वीप तक की एक विलक्षण यात्रा है. लेकिन साथ ही यह असाधारण कथा है अँधकार भरे जीवन में चाँदनी उतार लाने की. देह, प्रेम, अभाव और स्त्री-स्वायत्तता की. सांसों में सौरभ भरकर प्राणों को भीनी लहरों से आप्यायित करने की. और धमनियों में जलते हरे जंगलों के बीच स्वरलहरियों की धार-धार वर्षा करती महान गायिका डॉली पार्टन की.

 

 

वह निर्धनता की उन कसती हुई बाँहों के बीच 19 जनवरी, 1946 को पैदा हुई थी, जहाँ अभाव कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं, जीवन का ऋतुचक्र थे. कभी वसंत किसी छोटी उम्मीद की तरह रेत पर उग आए रंगीन फूल-सा फूटता, फिर ग्रीष्म आता और दुःख पसीने की तरह देह से चिपक जाता. वर्षा में संताप नमी बनकर दीवारों, बिस्तरों और मन के भीतर उतरता, शरद निर्मल उजास में घर की रिक्तताओं को और अधिक साफ़ दिखा देता. हेमंत की कठोरता चुनौतियों को हड्डियों तक ले आती और शिशिर का नैराश्य बर्फ़ीली उँगलियों से बच्चों की त्वचा, माँ की चिंता और पिता की थकी हथेलियों को एक साथ छूता.

अभाव रसोई के खाली डिब्बों में खनकते और बच्चों की कोमल देहों पर माँ के टाँके रंग-बिरंगे पैबंदों की तरह चढ़े रहते. निर्धनता एक कमरे वाले उस झोपड़े में वस्तुओं की अनुपस्थिति भर नहीं थी, जीवन की आपदाओं का मौसम-ए-गु़ल था. उसी के भीतर कहीं डॉली की आवाज़ पहला और असंभव वसंत तैयार कर रही थी. उसने मक्के के रेशों से बनी एक गुड़िया ‘लिटिल टाइनी टैसलटॉप’ पर पाँच साल की उम्र में गीत लिखा. दस वर्ष की उम्र में नॉक्सविल के कास वॉकर फार्म एंड होम आवर में रेडियो और टेलीविजन पर गाना शुरू कर दिया. उनके चाचा बिल ओवेन्स ने पहला गिटार खरीदकर दिया तो गीत लिखती और उन्हें गाती रहती. गीत लिखना तो उसके पूरे जीवन का स्वभाव बना रहा. उन दिनों को याद करते डॉली ने 2002 में द टाइम्स से कहा था कि वे पेंसिल-काग़ज़ या टेप रिकॉर्डर से कभी दूर नहीं रहतीं, विमान, बस या नहाने के टब तक में लिखती रहती थीं, क्योंकि

“मेरे भीतर अब भी कुछ सुलगता-सा रहता है.”

 

 

भारतीय समय के अनुसार 26 अगस्त की अल-सुबह जब वह अमेरिका के टेनेसी राज्य में नैशविले स्थित विश्व प्रसिद्ध वैंडरबिल्ट-इंग्राम कैंसर सेंटर में उपचार के दौरान इस दुनिया से रुख़सत हुई तो दृश्य जैसे विडंबनाओं में चमक उठे. जिन अभावों ने कभी उसके जीवन को रूखे कपड़ों, अधूरे भोजन और सीमित इच्छाओं में बाँधना चाहा था, अब अपनी सबसे उद्दाम बेटी को राइनस्टोन्स, सुनहरे बालों, ऊँची एड़ियों और असंभव दीप्ति में लपेटकर विदा कर रहे थे. निर्धनता ने अंततः पराजय स्वीकार की और उन्हीं हाथों से उस विलक्षण स्त्री का शृंगार किया, जिसने जीवन भर उसे लज्जा से नहीं, अलग ही दीप्ति के बाणों से बींधे रखा था.

 

 

विश्व संगीत की उस महानायिका की कहानी को दुनिया के शीर्ष अख़बारों ने एक ख़ास उलटबांसी में ढाला : “रैग्स टू राइनोस्टोन्स’. थिगलियों से कृत्रिम, लेकिन नायाब हीरों की नयनाभिराम छब तक. मगर इन दो ध्रुवों के बीच एक कोमल स्त्री थी. और आवाज़ इतनी वैभवशाली कि अमेरिका और उसके सत्ता प्रतिष्ठान शक्ति-संपन्नता के बावजूद उसके सामने मुफ़लिस थे.

यह हैरानीजनक था कि उनके सम्मान में सबसे बड़ा और व्यापक कवरेज़ उनके गृहराज्य के दो प्रतिद्वंद्वी अख़बारों ‘दॅ टेनेसियन’ और ‘नॉक्सविले न्यूज़ सेंटिनल’ ने 160 पन्नों का एक विशेष ऐतिहासिक स्मारक संस्करण जारी करके किया था. ‘दॅ न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने तो अपना पहला पन्ना ही उन्हें समर्पित कर दिया. ब्रिटेन के प्रसिद्ध अख़बार ‘दॅ इंडिपेंडेंट’ ने 36 पन्नों की एक अद्वितीय लेखमाला जारी की. ‘यूएस टुडे’ ने 16 पन्नों का सप्लीमेंट छापा और ‘रॉलिंग स्टोन’ ने 50 पन्नों की विशेष कवर स्टोरी की और पूरा ट्रिब्यूट स्पेस डॉली पार्टन की विरासत को समर्पित किया.

 

 

4.

क्या यह वही अभागी नवजात थी, जिसका जन्म हुआ तो पिता को धन के अभाव में प्रसव कराने वाले डॉक्टर रॉबर्ट एफ थॉमस को फीस के रूप में यूएस डॉलर नहीं, मक्के का एक बोरी आटा देना पड़ा था?

कौन जानता था, पूँजीवादी विनिमय की इस बोरी से निकलती मक्के की गंध जिस नवजात से जुड़ी, उसके पीछे एक दिन करोड़ों डॉलर का संगीत-साम्राज्य खड़ा होगा और अख़बार इस तरह उसका प्रशस्ति-गान करेंगे.

दरअसल, मनुष्य के भीतर कुछ चीज़ें भूख से भी अधिक जिद्दी होती हैं. कंठ से फूट निकलने वाला स्वर उनमें पहला है. शब्द दूसरा और स्वप्न तीसरा. उस नन्ही बालिका के पास ये तीनों थे. और चौथी अपने ऊपर किसी दूसरे का स्वामित्व स्वीकार न करने की वह जैविक वृत्ति, जो आगे चलकर उसकी पूरी ज़िंदगी के आत्मसम्मान का आलाप बनने वाली थी.

लेकिन उसने गरीबी को कभी सौंदर्यशास्त्रीय लज्जा की तरह नहीं पहना. उसने उसे बहुत नफ़ासत और नज़ाकत से सजाया. उस पर मोहक, मायावी और मनोहारी नन्हे-नन्हे पत्थर जड़े. देह को वैसे ही निर्मित किया, जैसे कोई गीत रचता है. और कंठ को आख़िर तक कमाया.

बिजलियाँ चाहे जितनी गिरती रहीं, उसकी सल्तनत वही का वही छोटा-सा आशियाना था. जीवन के मरुस्थल में उसकी पहली मिल्कियत बस अपनी आशा आप्लावित आवाज़, सिंधु से उद्दाम स्वप्न और उड़ने की ज़िद को जी रहे बेचैन कामनाओं के पँख थे.

 

 

5.

उस बालिका के कस्बे में एक स्त्री थी, जिसे कथित सभ्य लोग “सस्ती”, “आवारा” या “बदचलन” कहते. उसके प्लैटिनम जैसे बाल, लंबे नाखून, लाल होंठ, हाई हील सैंडिल और चटख वस्त्रों को देखकर नन्ही डॉली कोमल कंधे उचकाकर चहकती, “मैं तो ऐसी ही बनूँगी!” सुनने वाले अवाक.

उसके जीवन का यह छोटा-सा दृश्य स्त्री-सौंदर्य के इतिहास में किसी घोषणापत्र से कम नहीं था. जिस स्त्री को समाज ने अपमान के लिए दृश्य बनाया था, डॉली ने उसी दृश्यता को सत्ता बना लिया और उम्मीदों के आकाश में विचरण करने लगी. जिस कृत्रिमता पर दुनिया हँसती थी, उसने उसी को अपना कवच बनाया.

सुनहरे, बारोक आभा वाले विग, चेहरे को चमकदार मुखौटे में बदलता अतिशय मेकअप, देह की हर वक्रता पर दूसरी त्वचा की तरह चढ़े स्किन-टाइट परिधान, पैरों को नुकीली ऊँचाई देते स्टिलेटोस और रोशनी पड़ते ही चिंगारियों की तरह फूटते राइनस्टोन्स! उसने फै़शन के कथित विद्रूप, कृत्रिमता और अतिशयोक्ति को इस कौशल से बरता कि वही उसका सिग्नेचर ग्लैमर बन गया. जो किसी और पर किच या तमाशा लगता, उसकी देह पर वह हाई-कैम्प सौंदर्यशास्त्र में बदल जाता. रूप का एक निर्भीक, रसमय और सम्मोहक निमंत्रण.

 

 

6.

उसकी देह में एक विचित्र द्वंद्व था. वह प्रदर्शित थी, मगर उपलब्ध नहीं. वह उत्तेजक थी, मगर अधीन नहीं. उसके वस्त्र स्त्री-देह को छिपाते नहीं थे, उत्सव मनाते थे. लेकिन यह पुरुष की बेकाबू इच्छाओं से और अदमनीय कामनाओं के लिए गढ़ी देह न थी. वह अपने शरीर के चारों ओर चमक को इस तरह कसती थी, जैसे कोई स्त्री महीनों बाद अचानक एक रात में कुछ लम्हों के लिए मिले अपने प्रेमी के चारों ओर बाहुपाश कसे और नींद की निस्तब्धता में डूब जाए.

यहीं डॉली पार्टन केवल कंट्री सिंगर या नवोदित गायिका भर नहीं रहतीं, स्त्री की सेल्फ़-इन्वेंशन बन जाती हैं. वह अभी तरुणी ही है. और उसी समय अपने पेशेवर साथी (प्रेमी नहीं) पोर्टर वैगनर से अलग होते समय उसके कंठ से एक गीत फूट पड़ता है :

“आई विल ऑल्वेज़ लव यू”. प्रेम की सबसे सौम्य और सुसंस्कृत विदाई वाला ऐसा प्रेमगीत, जिसमें प्रेम अपनी सबसे कठिन अवस्था में आता है और हर लम्हे पर अपना अधिकार छोड़ देता है.

यह पोर्टर वैगनर से डॉली का पेशेवर और भावनात्मक अलगाव था. सात वर्षों की पार्टनरशिप के बाद वह स्वतंत्र कॅरियर चाहती थीं. वैगनर सहमत नहीं थे. डॉली ने तर्क की जगह गीत लिखा. पोर्टर को सुनाया. वह रो पड़े. और उन्हें जाने दिया.

ध्यान दीजिए कि गीत की बुनियादी नैतिकता क्या है. मैं जा रही हूँ, लेकिन हमारे बीच जो था, उसे नष्ट नहीं करूँगी. यह प्रेम में असाधारण परिपक्वता है. हम अक्सर संबंध टूटने के बाद अतीत को भी अपराध घोषित करना चाहते हैं. डॉली ऐसा नहीं करतीं. वह कहती हैं, अलग होना इस बात का प्रमाण नहीं कि प्रेम झूठ था.

कभी-कभी प्रेम का सबसे ईमानदार कर्म साथ रहना नहीं, एक-दूसरे की देह और स्मृति से बाहर निकल जाना होता है. साहिर लुधियानवी के अमरगीत की पंक्ति, “चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों” इसीलिए असह्य रूप से सुंदर है. दो लोग, जिन्होंने एक-दूसरे की साँस, त्वचा, मौन और कमज़ोरियों तक का ज़ुग़राफ़िया पढ़ लिया हो, वे फिर उस बिंदु पर लौटना चाहते हैं, जहाँ स्पर्श अभी घटित नहीं हुआ और स्मृति ने देह पर अपना अधिकार नहीं लिखा था. अजनबी होना अब संभव नहीं, फिर भी वही मुक्ति की अंतिम इच्छा है. साहिर वियोग नहीं लिखते, वे प्रेम को उसकी ही गर्म राख से उलटा चलाकर उस पहली ठंडी दूरी तक ले जाना चाहते हैं, जहाँ इच्छा थी, अधिकार नहीं, आकर्षण था, इतिहास नहीं. प्रेम की कल्पना में इससे अधिक निर्मम और सुंदर विरोधाभास दुर्लभ है.

प्रेम यदि दूसरे की स्वतंत्रता निगल जाए तो वह लालसाओं की लाश बन जाता है. और इसीलिए डॉली का यह मूल गीत व्हिस्परिंग इंटिमेसी का आबशार है. वह एंथम नहीं, अंतरंग की बातचीत है. आवाज़ आपके सामने नहीं खड़ी होती, “आई विल ऑल्वेज़ लव यू” गाती हुई सटकर बैठती है.

यह क्या ही गीत है. डॉली पार्टन ‘आई विल ऑलवेज़ लव यू’ में शब्दों को गाती नहीं, मानो हथेली पर रखकर धीरे-धीरे खोलती हैं. उनकी साँस, विराम और मुलायम कंट्री ट्वैंग हर अक्षर को स्पर्श देते हुए जैसे शब्दों को किसी शिशु की तरह दुलार रहे हों. गायन इतना मद्धिम और तरल है, जैसे दो प्रेमी आलिंगनबद्ध होकर शांत जल में तैर रहे हों. अलग भी, फिर भी एक-दूसरे की ऊष्मा में पूरी तरह भीगे हुए.

 

 

7.

कुछ समय बाद उस समय के महान गायक एल्विस प्रिस्ले इस प्रेमगीत को सुनते हैं और उनके रुधिर में तूफान मच जाता है. वे इस गीत को ख़ुद रिकॉर्ड करना चाहते हैं. सोचिए, एक नई गायिका और दूसरी ओर एल्विस जैसा हिमालयी शिखर! स्वयं रॉक ऐंड रोल का बादशाह. ऐसा प्रस्ताव, जिसके सामने किसी नवोदित कलाकार का उसी क्षण नैतिक और व्यावसायिक विवेक घुटनों पर आ जाए.

नवोदित गायिका डॉली जाती हैं. रिकॉर्डिंग की तैयारियाँ हो जाती हैं, लेकिन अचानक एल्विस के मैनेजर कर्नल टॉम पार्कर शर्त रखते हैं, रिकॉर्डिंग तभी होगी जब गीत के अधिकारों का एक बड़ा हिस्सा प्रिस्ले को मिले. डॉली उसी क्षण उन्हें मना कर देती हैं. कुछ देर बाद प्रिस्ले ने संदेश भेजा, दफ़ा हो जाओ!

वह रात भर रोई. मगर अधिकार नहीं दिए. यह आँसू और कॉपीराइट के बीच खड़ी एक स्वाभिमानी स्त्री थी. उसने आँसू चुने, आत्मसमर्पण नहीं. उसे काफी धमकियाँ मिलीं. उसे इंडस्ट्री से बाहर कर दिए जाने का भय तक दिखाया गया. उसके जीवन में निविड़ अंधकार था, लेकिन अपनी उम्मीदों के चाँद को अपनी हथेलियों के बीच रखे वह मानो सारी चाँदनी निचोड़ डालने वाली मुद्रा में थी.

 

 

8.

कहानी एल्विस के यहाँ से लौटने के बाद उसी रात समाप्त हो जाती तो भी सुंदर थी. मगर विकल और विभ्रांत जीवन कहानियों से कहीं अधिक नाटकीयताओं से भरे होते हैं. 9 अक्टूबर 1973 को एल्विस और प्रिसिला प्रेस्ली का विवाह कानूनी रूप से समाप्त होता है. वे अदालत की सीढ़ियों से उतर रहे हैं. वहाँ उपस्थित थीं वे दैहिक स्मृतियाँ, जो मुहब्बत, झगड़े, थकान और विचित्र कोमलताओं में लिपटी रहती हैं, लेकिन चेतना में तब लौटीं जब तलाक़ के काग़ज़ों पर हस्ताक्षर हो गए.

प्रिसिला ही ने बाद में डॉली को बताया था कि तलाक़ स्वीकार हो जाने के बाद उन्हीं सीढ़ियों पर बुदबुदाता एल्विस उसकी ओर झुका और गुनगुनाने लगा, “आई विल ऑल्वेज़ लव यू.” जिस गीत को वह रिकॉर्ड नहीं कर पाया, वह उसकी ज़िंदगी के सबसे निजी विदा-क्षण में उसके काम आया.

शायद महान गीतों की यही नियति है. वे रिकॉर्ड कंपनियों से बच निकलते हैं. चार्ट से उतर जाते हैं. फिर किसी अदालत की सीढ़ियों पर दो टूटे दिलों के बीच गरम उच्छ्वास की तरह बहने लगते हैं और अमरता प्राप्त कर लेते हैं.

 

 

 

9.

आधुनिक लोकप्रिय संगीत के इतिहास में “आई ऑल्वेज़ लव यू” जैसी अत्यल्प कम्पोज़िशन्स ने ही ऐसी लोकप्रियता पाई है. 1974 में डॉली. 1982 में फिर डॉली. 1992 में व्हिटनी ह्यूस्टन. फिर अनगिनत संस्करण.

व्हिटनी ह्यूस्टन ने उसी गीत को विराट पाॅप बैलेड में बदलकर दूसरे ही ब्रह्मांड में पहुँचा दिया. व्हिटनी का वर्ज़न वोकल आर्किटेक्चर है. आरम्भिक अ कैपेला वल्नरेबिलिटी. फिर ऑर्केस्ट्रल एक्सपैंशन. फिर वह महान बेल्ट. स्वरलहरियाँ ऊपर उठती हैं, फैलती है, सीलिंग तोड़ देती है. यानी व्हिटनी के संस्करण में प्रेम नभ की ओर उठता है और डॉली के अंदाज़ में प्रेम दरवाज़ा बंद करने से पहले एक क्षण पीछे मुड़ता है.

डॉली स्वयं व्हिटनी के वर्शन की उदार प्रशंसक थीं, उनका कहना था कि गीत उनका था, रिकॉर्डिंग व्हिटनी की. 1992 का वर्शन द बॉडीगार्ड से जुड़कर 14 सप्ताह अमेरिकी पॉप चार्ट के शीर्ष पर रहा.

कितना विचित्र दृश्य रहा होगा.

 

 

10.

“काफ़्का ऑन दॅ शोर’ में एक जगह हारुकी मुराकामी कहते हैं, “स्मृतियाँ आपको भीतर से ऊष्मा देती हैं. लेकिन वे आपको बुरी तरह तोड़ भी तो डालती हैं.’ लेकिन जिस समय ऐसी यादों के कारण ज़िंदगी किसी मुफ़लिस की क़बा जैसी होती है और जिस पर वक़्त हर घड़ी दर्द का एक नया पैबंद टाँकता रहता है, तब कोई नया दर्द आँसू में गलता है तो गीत में भी ढलता है.

डॉली के जीवन में ऐसी ही एक याद थी, जो उसे भीतर से छीलती रहती थी. बचपने में उसकी माँ ने अलग-अलग रंगों की थिगलियाँ जोड़कर उसे एक कोट सीकर दिया था. ये वही थिगलियाँ थीं, जो किसी ने अपने कपड़े सीने के बाद डिब्बा भरकर उसकी माँ की तरफ फेंक दी थीं. वर्षों बाद डॉली ने उसी घटना को याद करते हुए ‘कोट ऑव मैनी कलर्स’ लिखा तो अभावों की याद दिलाती वे चिंदियाँ संगीत के क्षितिज पर इंद्रधनुष बनकर इठलाने लगीं और गु़रबत की वह दुर्लभ स्मृति दुनिया भर में गाई जाने लगी.

 

 

 

11.

कोट ऑफ मेनी कलर्स में ग़रीबी, क्लास शेम, मैटरनल लेबर, डिग्निटी, चाइल्डहुड क्रुएल्टी, कंजम्प्शन और वेल्थ की वैकल्पिक परिभाषा एक साथ रहती है. माँ सिलती है और हर टुकड़े में श्रम, ध्यान, कहानी, स्पर्श और चुम्बन पिरो देती है. बेटी वह कोट पहनकर स्कूल जाती है और दूसरे बच्चे हँसते हैं. यहीं कैपिटलिज़्म पहली बार क्लासरूम में प्रवेश कर जाता है. बच्चे एडम स्मिथ नहीं पढ़े, कॉमोडिटी फेटिशिज़्म नहीं जानते, फिर भी समझ चुके हैं कि कपड़े का बाज़ार-मूल्य मनुष्य की प्रतिष्ठा निर्धारित कर सकता है.

ग़रीबी केवल वस्तुओं की कमी नहीं होती, वह वो क्षण भी है जब दूसरे आपकी कमी आपको दिखाकर आनंद लेते हैं. चाइल्डहुड ह्यूमिलिएशन वर्ग-व्यवस्था की सबसे शुरुआती शिक्षा है. बच्चा सीखता है कि उसके जूते दूसरे के जूतों जैसे नहीं, उसका लंच बॉक्स वैसा नहीं, कपड़े पुराने हैं, घर छोटा है और पिता का ऑक्युपेशन “प्रेस्टीजियस” नहीं. यहाँ वर्ग पहले अर्थशास्त्र नहीं, त्वचा बनता है. डॉली इस पूरी हिंसा का उत्तर क्या देती हैं? क्रांति? नहीं. वह माँ के श्रम का मूल्य बदल देती हैं. वह कहती हैं मेरा कोट प्रेम से बनाया गया था, इसलिए मैं अपने आप को धनी महसूस करती थी.

 

 

 

12.

कोट ऑफ मेनी कलर्स ग़रीबी को महान नहीं बताता, वह बाज़ार के उस दावे को चुनौती देता है कि मूल्य केवल कीमत से निकलता है. यहीं गीत मार्क्स के कॉमोडिटी और यूज़-वैल्यू के प्रश्न को घर के भीतर ले आता है. माँ के हाथ से सिला कोट बाज़ार में बेकार है, बेटी के लिए अमूल्य. यहाँ श्रम एलियनेटेड नहीं, प्रेम से संयुक्त है. वस्तु कॉमोडिटी नहीं रह जाती, रिलेशनशिप बन जाती है. और जो बात पॉलिटिकल इकॉनमी की पूरी पुस्तक दिमाग़ी रूप से तो समझा देती है, उसे आत्मसात नहीं करवा पाती. लेकिन डॉली उसे एक माँ की सूई से रूह में पिरो देती हैं.

डॉली की आवाज़ इस गीत में विशेष रूप से सुंदर है. वह बच्ची और वृद्ध कथावाचक के बीच झूलती है. एक क्षण माँ के पास है, दूसरे में स्कूलयार्ड की चोट और फिर वयस्क ज्ञान उस पुराने अपमान को पुनः अर्थ देता है. यही नैरेटिव टाइम का चमत्कार है. घटना अतीत की, घाव बच्ची के हृदय का, भाषा वयस्क की और आवाज़ दोनों की. उनकी कला यह है कि वे बचपन की घटना को वयस्क बुद्धि से समझती हैं, लेकिन सुनाती बच्चे की चोट के साथ हैं.

 

 

 

13.

डॉली का टिम्बर कहें या उनकी आवाज़ के फिंगरप्रिंट, दमक में चाँदी को मैला साबित करते हैं. वह चेहरे के अग्रभाग में, नोज़-मास्क रेज़ोनेंस के निकट, एक तीखी चमक के साथ प्रकट होता है. कंट्री सिंगिंग में जिसे ट्वैंग कहते हैं, डॉली उसकी उत्कृष्ट मिसाल हैं. ट्वैंग नाक से गाना नहीं, यह रेज़ोनेंस का ऐसा फॉरवर्ड प्लेसमेंट है, जो अपेक्षाकृत कम शारीरिक दबाव में भी आवाज़ को तीखा और स्पष्ट प्रोजेक्शन देता है. जैसे बत्तख की “क्वैक-क्वैक’ की आवाज़ या नन्हे बच्चे के रोते समय जो “न्या-न्या’ होता है. इसी कारण डॉली की पतली-सी लगने वाली आवाज़ किसी डेंस अरेंजमेंट के बीच भी तुरंत पहचान में आ जाती है.

उस आवाज़ में डॉली के मूल इलाक़े एपलैचिया का एक्सेंट भी जीवंत रहता है. वॉवेल्स थोड़ा फैलते हैं, कुछ सिलेबल्स मुड़ते हैं और एक स्वर से दूसरे स्वर तक जाते हुए महीन स्लाइड्स सुनाई देते हैं. जैसे कि मींड. कभी शब्द के अंतिम हिस्से में हल्की-सी टूटन आती है, कभी योडल से उतार-चढ़ाव की कोई दूरस्थ छाया, कभी गॉस्पेल का खुलता हुआ आसमान और कभी बैंजो. और कभी फिडल और गिटार जैसे वाद्ययंत्रों के साथ ब्लूग्रास की पहाड़ी धार. यह ऐसी आवाज़ है, जो किसी कंज़र्वेटरी में पॉलिश होकर अपनी जन्मभूमि को भूल नहीं गई. तकनीक ने उसकी मिट्टी नहीं पौंछी, उलटे उसी मिट्टी को अधिक चमकदार बना दिया. इसमें मुख्य रूप से होता है. इसकी गायकी में एक खास तरह का देहातीपन, सादगी और तीखापन होता है.

 

 

14.

डॉली के कंठ से एक और अद्वितीय गीत फूटता है : “जोलीन”.

लोकप्रिय गीतों में कोई दूसरी स्त्री किसी के दांपत्य-प्रेम के लिए ख़तरा बने तो उसे मनहूस करार दिया जाता है. जैसे “वह बदचलन है”, “जादूगरनी है” और वह “मेरे पति या प्रेमी को छीन रही है” कहकर.

दरअसल, पैट्रियार्की स्त्रियों में पुरुष के स्वामित्व को लेकर उन्हें आपस में युद्धरत रहना सिखाती है. लेकिन डॉली का गीत एक अजीब मोड़ लेता है. वह उसके सौन्दर्य को स्वीकार करती है. इतनी ईमानदारी से कि सम्मोहन पैदा हो जाता है. उसके बाल. त्वचा. आँखें. आवाज़. मुस्कान. एक स्त्री दूसरी स्त्री को पुरुष की आँखों से नहीं, अपनी डरपती आँखों से देखती है. यहीं जोलीन  डाह के गीत से कहीं आगे निकलकर रूप की आराधना और प्रेम के आलिंगन का गीत बन जाता है. वह डिज़ायर और इनसिक्योरिटी के बीच पतला, गरम, काँपता हुआ स्थान भी बन जाता है, जहाँ प्रेम स्वामित्व से अलग होने लगता है. यहीं बोध होता है कि प्रेम मनुष्य की सबसे कठिन आत्मतृप्ति है.

 

 

 

 

15.

गिटार का प्रसिद्ध पैटर्न इस गीत में आश्चर्यजनक है. वह सेंटिमेंटल बैलड की तरह फैलता नहीं. बेचैन है. ऑब्सेसिव. जैसे मस्तिष्क में एक विचार घूम रहा हो, जिसे रोकने की कोशिश जितनी करें, उतना तेज़ लौटता है. और फिर नाम. जोलीन. एक ही नाम चार बार. काम ख़त्म. नाम यहाँ रिफ्रेन नहीं रह जाता. मंत्र बन जाता है. कभी पुकार. कभी भय. कभी विनती. कभी उस सौन्दर्य का इरॉटिक फ़ैसिनेशन, जिससे यह सॉन्ग-टेलर स्वयं आतंकित है.

जोलीन स्त्री के आत्म-मूल्य के उस लम्हे के बारे में अधिक है, जब वह स्वयं की तुलना किसी और से करती है और अचानक अपना शरीर, चेहरा, उम्र, आकर्षण आदि को किसी अदृश्य तराज़ू पर रखने लगती है. यह पैट्रियार्कल ब्यूटी इकॉनमी का गीत भी है.

उसकी सॉन्गराइटिंग की यही शक्ति थी. सरल राइम, कन्वर्सेशनल लैंग्वेज, रिपीटिशन और स्लैंट राइम.

बहादुरी हमेशा तलवार लेकर लड़ती वीरांगना ही नहीं होती. कभी-कभी वह ऐसी स्त्री भी होती है, जो पूरी संवेदना के झरने बहाते कह सके, मैं डर रही हूँ!

 

 

 

16.

जोलीन के जन्म की कथा भी अब फोकलोर है. एक सुंदर बैंक टेलर कार्ल डीन के साथ फ़्लर्ट करती थी. सच और किंवदंती समय के साथ थोड़ा घुलते हैं, मगर इस गीत ने कहीं बड़ी उम्र पा ली. ऐसा होना ही था, क्योंकि यह गीत हर उस दिल से जुड़ा है, जो किसी के प्रेम में उल्लसित है, लेकिन बिछोह से आशंकित है. और बिछोह की आशंकाओं की इन्हीं उत्तप्त लहरों पर सवार होकर यह परिधियों से पार होता चला गया.

व्हाइट स्ट्राइप्स ने इस गीत को रॉक की रॉ सेक्सुअलिटी दी तो माइली साइरस ने इसे धुएँ वाला मेज़ो रंग. माइली ने इसे इतना सुंदर गाया है कि बहुत से लोगों को वह डॉली पार्टन के गाए गीत से भी अच्छा लगता है. आख़िर माइली को डॉली पार्टन ने धर्मपुत्री का दर्जा ऐसे ही तो नहीं दिया होगा. बेयोंसे ने इस गीत को वैवाहिक और सांस्कृतिक कथा में रूपांतरित किया. फिर भी डॉली का मूल वर्शन सबसे विलक्षण है. सबसे साहसी भी.

 

 

 

17.

यह स्त्री-डाह का गीत होकर भी स्त्री-द्वेष का गीत नहीं बनता.

याद करिए कि यह वही सुकंठी थी, जिसने गायन के एक बेताज बादशाह को अपने गीत के आधे अधिकार देने से इनकार कर दिया था. यानी प्रेम में विनम्र. व्यवसाय में निर्मम. देह में उन्मुक्त. बुद्धि में अनुशासित. यही विरोधाभास डॉली पार्टन है. यह स्त्री की असुरक्षा, उसकी भीतरी थरथराहट और प्रेमजन्य आत्म-संशय का एक अद्भुत मिनिएचर है.

जिस लड़की की शिक्षा अभावों से आहत हुई थी, उसी ने बाद में अपने डॉलीवुड फाउंडेशन के माध्यम से बच्चों की पढ़ाई को अपना बड़ा सार्वजनिक मिशन बनाया. सातवीं और आठवीं के विद्यार्थियों से कहा गया कि हाईस्कूल पूरा करो और पाँच सौ डॉलर पाओ. नतीजा यह हुआ कि स्कूलों की ड्रॉपआउट दर 35 प्रतिशत से 6 प्रतिशत रह गई. बाद में उनकी इमेजिनेशन लाइब्रेरी से करोड़ों पुस्तकें बच्चों तक पहुँचाने वाली विश्वव्यापी पहल बनी.

जैसे वह उस छोटी पहाड़ी बच्ची के पास बार-बार लौट रही थी, जिसके घर में किताबों से अधिक बच्चे और पैसों से अधिक सपने थे. डॉली दस भाई-बहनों में ही तो एक थी.

 

 

 

18.

कोरोना महामारी आई. मनुष्य ने पहली बार अपने स्पर्श से डरना सीखा. प्रेमियों के बीच दूरी थी. बच्चों और बूढ़े माता-पिता के बीच प्लास्टिक और काँच था. अस्पतालों में साँसें एक आर्थिक और वैज्ञानिक प्रश्न बन गई थीं. उसी समय डॉली ने वैंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के कोविड अनुसंधान के लिए एक मिलियन डॉलर दिए. उस धन ने उन प्रारंभिक शोधों में भी सहायता की, जिनका संबंध मॉडर्ना के mRNA-1273 वैक्सीन पर काम से था.

जिस बच्ची के जन्म की फीस डॉक्टर को मक्के के आटे से चुकाई गई थी, उसने अस्सी वर्ष के भीतर चिकित्सा-विज्ञान को दस लाख डॉलर लौटा दिए. किसी जीवनी को इससे सुंदर वृत्त शायद ही मिलता है. अगर हम अपने गायकों या सिने-सितारों को देखें तो हमें अपने देश के सिने गगन में शून्यता का सन्नाटा सुनाई देता है.

 

 

 

19.

डॉली का नाम विज्ञान में भी एक विचित्र और शरारती ढंग से अमर हुआ.

1996 में वयस्क कोशिका से क्लोन की गई दुनिया की पहली प्रसिद्ध भेड़ को वैज्ञानिकों ने डॉली नाम दिया, क्योंकि उसके लिए कोशिका मैमरी ग्लैंड से ली गई थी और शरारती वैज्ञानिकों ने नामकरण में डॉली पार्टन के ब्रेस्ट्स पर चुटीला संकेत किया. डॉली इस पर नाराज़ नहीं हुईं. वह समझती थीं कि जिस स्त्री ने स्वयं अपनी देह के मिथक को रचा हो, उसे दुनिया की हँसी इतनी आसानी से आहत नहीं कर सकती. स्वयं डॉली ने हँसते हुए वैज्ञानिकों की पुरुषवादी मानसिकता पर कटाक्ष किया, मैमरी ग्लैंड्स यानी “बूब्स”, पुरुष लोक का ध्यान हमेशा इन्हीं पर अपलक रहा है, लेकिन क्या वैज्ञानिक भी?

 

 

 

20.

अमेरिकी सत्ता ने उसे कई बार सम्मानित करना चाहा. डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने प्रेजिडेंशल मेडल ऑव फ्रीडम की पेशकश दो बार की. बाद में बाइडन की ओर से प्रस्ताव आया तो भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया. वह व्हाइट हाउस के मेडल के सहारे बड़ी होना नहीं चाहती थी.

 

 

 

21.

और फिर 26 अगस्त 2026 आया. अमेरिका में उस समय 25 अगस्त का दिन था. अस्सी वर्ष की उम्र में डॉली पार्टन चली जाती हैं.

अमेरिका के राष्ट्रपति ने आदेश दिया कि व्हाइट हाउस से लेकर संघीय इमारतों, सैन्य ठिकानों और विदेशों में अमेरिकी दूतावासों तक राष्ट्रीय ध्वज 1 सितंबर की संध्या तक आधा झुका रहेगा. न्यूयॉर्क का ऐंपायर स्टेट बिल्डिंग गुलाबी रोशनी में नहा गया.

न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान क्वामे ममदानी लिखा, “यह वास्तव में दिल दहला देने वाला है. डॉली पार्टन एक असाधारण इंसान और श्रमजीवी वर्ग की एक अपूरणीय चैंपियन थीं. उनके होने से हमारा देश बेहतर बना.”

ब्रिटेन में बंकिंघम पैलेस के सामने किंग्ज़ गार्ड ने उनका “9 टू 5” बजाया. दुनिया उस स्त्री के लिए झुक रही थी, जिसे कभी उसके कपड़ों के कारण “चीप” कहा गया था.

 

 

 

22.

डॉली पार्टन को समझने के लिए केवल उनके गाने सुनना पर्याप्त नहीं है. उन्हें देखना भी पड़ेगा. उनके सुनहरे बालों की असंभव ऊँचाई को. उनके कपड़ों पर चमकते नकली हीरों को. उस देह को, जिसे परंपरागत अमेरिकी लोक ने तमाशा समझा और जिसने स्वयं को स्वायत्तता में बदल लिया. उस हँसी को, जिसमें पहाड़ की लड़की अब भी रहती थी. और उस आवाज़ को, जो ऊँचाइयों तक जाकर भी कभी अपनी मिट्टी से अलग नहीं हुई. वह आवाज़ जो कभी अदम्य जीवंतता जैसी तो कभी करुण विलाप-सी लगती है और कभी महीन रेशम-सी खिंची हुई सोप्रैनो. ऊंची, उजली और ऊपरी स्वरों में सहज स्त्री-आवाज़. कई बार एलिसन क्रॉस और मारिया कैरी का भ्रम पैदा करती हुई.

जैसे हिन्दुस्तानी गायन पद्धति में मंद्र, मध्य और तार सप्तक होते हैं, यहाँ भी ऐसा ही है. सोप्रैनो के बाद मेज़ो-सोप्रानो यानी मध्यवर्ती, अपेक्षाकृत गरम और मांसल. जैसे कि एडेल, लेडी गागा और माइली साइरस गाती हैं. और इसके बाद कॉन्ट्राल्टो . दुर्लभ, गहरी और निचले स्वरों में सहज आवाज़ का जादू. जैसे कि नीना सिमोन, ट्रेसी चैपमैन और पॉप की देवी मानी जाने वाली शेर (Cher) का गायन है.

वह आवाज़ ऊपरी रजिस्टर या यों कहें कि तार-स्वर प्रदेश में इतनी हल्की, महीन और आगे की ओर रखी हुई थी, नासिका की हल्की चमक और एपलाचियन ट्वैंग से काँपती हुई कि पहली सुनवाई में किसी किशोरी की आवाज़ लग सकती थी, लेकिन उसकी तहों में किसी बूढ़ी पहाड़ी स्त्री की स्मृति सोई रहती थी. यही उसका विचित्र जादू था. स्वर का चेहरा मानो लड़की का था और उसकी देहात्मा बहुत वृद्ध. वह कान के पास आते ही केवल सुनाई नहीं देती थी, अपनी फॉरवर्ड रेज़ोनेंस की चमक खोए बिना धीरे-धीरे भीतर उतरती जाती थी, जैसे पहाड़ की ढलान से आती कोई बहुत पुरानी पुकार पहले त्वचा को छुए, कर्णद्वय में रस घोले, फिर रक्त में घुले और अंततः स्मृति में अपना घर बना ले. वह आवाज़ जिसने ग़रीबी को आँकड़ा नहीं बनने दिया, स्त्री को केवल पीड़िता नहीं रहने दिया, प्रेम को स्वामित्व में नहीं बदला और श्रम को घोषणापत्र के बिना राजनीति बना दिया.

 

 

 

23.

अब 26 अगस्त की सुबह के बाद जब जोलीन या इन दॅ गेटो सुनते हैं तो गिटार पूर्ववत है. टेम्पो वही. नाम वही. आवाज़ वही. फिर भी बहुत कुछ बदल गया है. अब उस आवाज़ की काया का कोई अंग संसार में नहीं. संगीत का यह विचित्र सम्मोहन है. मृत मनुष्य की साँस जीवित रहती है. हम हेडफ़ोन या ईयरबड लगाते हैं और वह साँस सीधे कान के भीतर आती चली जाती है. इतनी निकट कि जीवित व्यक्ति भी शायद इतनी निकटता से कभी न आया हो. गायक का मूल स्वर कंठ में बनता है, लेकिन असली रंग केवल कंठ तय नहीं करता. वह ध्वनि मुँह, गले, नासिका-प्रदेश, सिर की गुहाओं और वक्ष में प्रतिध्वनित होकर अलग-अलग गुण ग्रहण करती है.

 

 

24.

मृत्यु जीवन के विरुद्ध मनुष्य का सबसे सुंदर छल है.

डॉली ने 1960 या 1970 के दशक में माइक्रोफोन के सामने पहली बार मुँह खोला था. वायु ने वोकल फोल्ड्स को प्रकम्पित किया. वह कम्पन इलेक्ट्रिकल सिग्नल बना. टेप पर गया. फिर डिजिटाइज़्ड हुआ. दशकों बाद संगीत प्रेमियों के कमरों में स्पीकर मेम्ब्रेन काँपती है. हवा हिलती है. जिस स्त्री की देह अब धरती की खला में समा चुकी है, उसकी साँसों के अनुनाद हमारे जिस्मों के भीतर स्वरों की अनुगूूंज से भरते रहते हैं.

क्या संगीत से अधिक ऐन्द्रिक कोई कला है?

चित्र को हम देखते हैं. मूर्ति को छूते हैं. लेकिन आवाज़ स्वयं हवा बनकर हमारे शरीर के भीतर प्रवेश करती है. इसलिए गायकों की मृत्यु लेखकों की मृत्यु से अलग होती है. लेखक की आवाज़ हमें बनानी पड़ती है. गायक अपनी आवाज़ हमारे पास सुरक्षित छोड़ जाता है. डॉली अब भी “जोलीन” कहती हैं. हर बार वर्तमान काल में. कभी “कहा था” नहीं. यही कंठ की अमरता है.

 

 

 

25.

डॉली को समझने से पहले हिन्दी के पाठक के लिए उस संसार को थोड़ा समझ लेना आवश्यक है, जिसे हम बहुत सहजता से वेस्टर्न पॉप म्यूज़िक कहकर एक ही अलमारी में रख देते हैं.

पॉप कोई एक अखंड सांगीतिक प्रजाति नहीं.

पॉपुलर म्यूज़िक वह महानगर है, जिसमें पॉप-रॉक, सॉफ्ट रॉक, सोल-पॉप, डांस-पॉप, सिंथ-पॉप, एडल्ट कंटेम्पररी, फोक-पॉप, पावर बैलड, कंट्री-पॉप और अनेक संकर रूप घर बनाए बैठे हैं. कंट्री अपने इतिहास, वाद्य-संसार, गायन-विन्यास और कथा-परम्परा वाला स्वतंत्र ज़ॉन्र है, लेकिन बीसवीं सदी के मध्य से उसका पॉप से इतना गहरा संसर्ग हुआ कि कंट्री-पॉप और नैशविल साउंड या कंट्रीपॉलिटन जैसी धाराएँ विकसित हुईं. चेट एटकिन्स जैसे निर्माताओं ने ग्रामीण कंट्री संरचना को ऑर्केस्ट्रल और पॉप प्रोडक्शन से मिलाकर व्यापक शहरी श्रोताओं तक पहुँचाया.

कंट्री की देह दूसरी जगह से आती है. उसमें एपलैचियन बैलड्स हैं. ब्रिटिश आइल्स से पहुँची लोकधुनों के दूरस्थ अंश हैं. अफ्रीकन-अमेरिकन ब्लूज़ है. गॉस्पेल है. फिडल है. बैंजो है. अकूस्टिक गिटार है. माँ-बाप, खेत, रेलगाड़ी, शराबखाना, चर्च, प्रेमी, धोखा, नौकरी, घर छोड़ती लड़की, बूढ़ा होता पिता, आख़िरी सांसें लेती माँ की पुकार, निर्धनता, मृत्यु और किसी छोटे शहर की शामें हैं.

 

 

26.

“एपलैचियन म्यूज़िक” स्वयं कोई शुद्ध, बंद परम्परा नहीं, उसमें अनेक जातीय और सांगीतिक धाराएँ घुलती रही हैं और उससे ब्लूज़, ब्लूग्रास, गॉस्पेल, कंट्री और पॉप तक ने संवाद किया. यानी कंट्री म्युज़िक को समझने के लिए हमारे यहाँ शायद पंजाबी गीत, टप्पे, बोलियाँ, भंगड़ा, आल्हा, लोकगाथा, बिरहा, कबीर, पहाड़ी लोकगीत और फ़िल्मी गीत आदि सबकी थोड़ी-थोड़ी स्मृति साथ रखनी चाहिए.

यह समानता संगीतशास्त्रीय नहीं, संवेदनात्मक है. कंट्री का महान गीत अमूर्त विचार से आरम्भ नहीं करता. वह कोई दृश्य रख देता है. जैसे फटा जूता. माँ का हाथ. खाली रसोई. धूल भरी सड़क. एक गर्भवती लड़की. दफ़्तर की घड़ी. दूसरी स्त्री की नीली आँखें. और फिर तीन मिनट के भीतर मनुष्य का पूरा दर्शन खुल जाता है.

 

 

27.

डॉली इसी परम्परा के गीतों की असाधारण कथाकार थीं.

उन्होंने स्वयं अपने लिए एक अद्भुत शब्द इस्तेमाल किया था साॅन्ग-टेलर. सिर्फ़ सॉन्गराइटर नहीं.

उनके अच्छे गीत कविता होने की कोशिश नहीं करते. बस बन ही जाते हैं. जैसे पैटी स्मिथ के गीत. वे भारी रूपक खोजने नहीं निकलते. कोई भी पुरानी चीज़ उठा लेते हैं. दार्शनिक शब्दावली नहीं बनाते. किसी स्त्री की छोटी-सी आशंका सुन लेते हैं. राजनीतिक घोषणापत्र नहीं लिखते. किसी सरकारी बाबू की सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक की थकान पकड़ लेते हैं. और यही वह जगह है, जहाँ डॉली हमारे समकालीन बुद्धिजीवियों से कहीं अधिक बेहतर व्योम रचती हैं, जिसमें प्रेमांकुरित स्वरों में विचारशीलता पल्लवित होती दिखती है.

 

 

28.

‘इन द गेटो’: जिस बात को साम्यवादी और मानवाधिकारवादी सिद्धांत पुस्तकें बनाकर भी नहीं समझा पाते, यह कारुणिक गीत इतनी तरल आवाज़ में मनुष्य के भीतर उतरता है और अवाक् कर देता है.

मैं इन द गेटो सुनता था तो मेरे भीतर का रिपोर्टर बार-बार प्रश्न करता था कि मानवाधिकारों पर मोटी किताब लिखने वाला विद्वान्, मार्क्सवादी वर्ग-संरचना समझाने वाला सिद्धांतकार, क्रिमिनोलॉजिस्ट, वेल्फेयर इकॉनमिस्ट या समाजशास्त्री जिस बात को कई अध्यायों में खोलता है, यह छोटा-सा गीत उसे एक बच्चे के जन्म और मृत्यु के बीच रखकर कितनी सरलता से जीवन और समाजशास्त्र की जटिलताओं को खोलता है.

हालांकि इन द गेटो डॉली पार्टन ने लिखा नहीं था. इसके रचयिता मैक डेविस थे. एल्विस प्रेस्ली की 1969 की रिकॉर्डिंग ने इसे प्रसिद्ध बनाया था. डॉली ने उसी वर्ष इसे रिकॉर्ड किया, उनका संस्करण उनके चौथे सोलो एल्बम माय ब्लू रिज माउंटेन बॉय में आया. उस आवाज़ से, जिसने उस कहानी को अपने पहाड़ी निर्धन बचपन के ताप से छुआ. मैक डेविस की मूल अवधारणा ही “व़िशॅस सर्कल” थी.

 

 

 

मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को विनिमय-मूल्य में बदल देने वाली व्यवस्था की सबसे बड़ी क्रूरता यह नहीं कि वह इन्सान की मेहनत खरीदती है, उसकी अश्लीलता यह है कि वह धीरे-धीरे उसकी देह, उसकी इच्छाओं, उसके भय, उसकी गरिमा, उसकी स्मृतियों और अंततः उसके भविष्य पर भी अपना प्राइस-टैग टाँक देती है. फिर मनुष्य मनुष्य नहीं रहता. वह श्रम-घंटों, वेतन-पर्चियों, किराये, क़र्ज़, अपराध-संभावनाओं और चुनावी आँकड़ों में विभाजित एक जीवित वस्तु हो जाता है. उसकी त्वचा अपनी रहती है, मगर उसके भीतर दौड़ता रक्त किसी और अर्थव्यवस्था के अनुशासन में है. उसकी भूख निजी है, लेकिन भूख पैदा करने वाली व्यवस्था सार्वजनिक. उसकी रातें उसकी अपनी हैं, सुबहें भी मानो उसी की हैं, लेकिन उन सुबहों की राह में निविड़ अँधकार किसी अदृश्य बाज़ार ने पहले ही बिछा रखा है. उसकी सारी चाँदनियाँ, उसके सारे सवेरे, उसकी सपनीली कामनाओं के उजास तक झूठे आश्वासनों, कुछ चुनावी वादों और थोड़ी-सी उधार दी गई उम्मीद के बदले बहुत पहले मॉरगेज़ करवा लिए जाते हैं. वह जागता अपने बिस्तर पर है, पर उसकी अगली सुबह की मिलकियत कहीं और दर्ज रहती है.

इसलिए जब डॉली गाती हैं, “पीपल, डोंट यू अंडरस्टैंड. द चाइल्ड नीड्स अ हेल्पिंग हैंड. ऑर ही’ल ग्रो टु बी एन ऐंग्री यंग मैन सम डे. टेक अ लुक ऐट यू ऐंड मी. आर वी टू ब्लाइंड टु सी? डू वी सिम्प्ली टर्न आवर हेड्स ऐंड लुक द अदर वे?’

और डॉली जिस क्रॉनी कैपिटलिज़्म की हृदयस्थली में खड़ी होकर जब यह गाती हैं तो वह गायन भर नहीं करतीं. वह इस दुनिया में व्याप्त अमानुषिक व्यवस्था की उस महीन, अदृश्य हिंसा की ओर उँगली उठाती हैं. भूख चूल्हा न जलने पाने का दु:ख नहीं, राजनीतिक-सत्ता और समाज-सत्ता की निर्मिति है. अँधेरा केवल रात का गुण नहीं, सत्ता की अनीति का कुफल है. इसीलिए वे कहती हैं, “पीपल, डोंट यू अंडरस्टैंड?”

 

 

 

असल में दुनिया की हर सत्ता अपने लिए उस समय का एक कंठ ईजाद करती है, जिसे वह मनमाने नामों से पुकारती और धिक्कारती है. कहीं वह कवि है, जो आधिकारिक प्रसन्नता के बीच दुःख का नाम लेने की हिमाक़त करता है, कहीं विश्वविद्यालय का अध्यापक, जो इतिहास की चमकाई हुई सतह पर उँगली फेरकर नीचे जमा रक्त दिखा देता है, कहीं पत्रकार, जो सरकारी रोशनी की दिशा में कैमरा घुमाने के बजाय उसके पीछे पड़े अँधेरे को दर्ज करता है, कहीं गायिका, जो प्रेम या करुणा का गीत गाते-गाते अनायास उस पूरी सामाजिक मशीनरी की त्वचा उधेड़ देती है, जिसके भीतर वर्ग, भूख और हिंसा एक-दूसरे से सटे हुए साँस लेते हैं.

सत्ता को बंदूक से उतना भय नहीं होता, जितना उस वाक्य से होता है, जो मनुष्य को उसकी वास्तविक स्थिति का बोध करा दे. क्योंकि बंदूक शरीर को घायल करती है, विचार उस सम्मोहन को तोड़ता है, जिसमें व्यवस्था चाहती है कि शोषित मनुष्य अपने शोषण को भाग्य, परंपरा, बाज़ार या ईश्वर की इच्छा समझता रहे. इसीलिए हर युग असहमत लोगों के लिए अलग-अलग शब्दकोश तैयार करता है. संबोधन बदलते रहते हैं, आशय वही रहता है, जो उस अँधेरे में सुबह का असली रास्ता दिखाए, उसे पहले संदिग्ध घोषित किया जाता है. इसीलिए डॉली पार्टन के बालों, बूब्स और बॉडी पर असंख्य अश्लील चुटकुले बनाए गए और बेहद बेशर्मी से उनसे प्रश्न पूछे गए. लेकिन वह हारी नहीं. वह हारी कहाँ? एक ऐसी जगह, जहाँ ‘डॉली पार्टन जैसी दिखने’ की प्रतियोगिता चल रही थी और उसमें वे बिना किसी को बताए चली गईं और एक पुरुष प्रतियोगी से हार गईं!

और जब-जब उन्हें निशाना बनाया गया, इन द गेटो की बेचैनी यहीं सबसे अधिक राजनीतिक होती गई. डॉली पार्टन किसी मंच से व्यवस्था-विरोधी भाषण नहीं देतीं, वे बस एक बच्चे, एक माँ, एक भूखे मुहल्ले और एक मृत्यु को अपनी आवाज़ की गर्म त्वचा में रख देती हैं. लेकिन कभी-कभी इतना भर ही सत्ता के पूरे नैतिक स्थापत्य पर सबसे गहरा प्रश्नचिह्न होता है.

 

 

 

पूरी आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना फिर इसी अदृश्य स्पर्श की तरह काम करती है. पहले बहुत हल्के से प्रेम की किसी भ्रामक उँगली की तरह, फिर वह त्वचा के नीचे उतरती है, नसों को पहचानती है, इच्छाओं को अनुशासित करती है और अंततः मनुष्य को इस तरह अपने भीतर समो लेती है कि दासता भी उसे स्वाभाविक दिखाई देने लगती है. परंपरा, संघर्ष और मनुष्य होने के लंबे इतिहास से प्राप्त वे अधिकार, जिन्हें कभी अनपहरणीय समझा गया था, धीरे-धीरे अपदस्थ होते जाते हैं और उनकी जगह एक ऐसी अंतःकरण-शून्य राजनीतिक मशीन खड़ी हो जाती है, जिसे हम सुविधा से लोकतंत्र मानते रहते हैं, जबकि वह जम्हूरियत नहीं, जम्हूरियत का बिजूका होता है.

 

 

जम्हूरियत का अर्थ था लोगों का, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए संचालित जीवन.

लेकिन पूँजी और सत्ता के संसर्ग में उसी लोकतंत्र को ऐसी शैया में बदल दिया गया, जिस पर जनता की देह तो उपस्थित रहती है, लेकिन इच्छा अनुपस्थित. कुछ राजनीतिक दल, कुछ आर्थिक समूह, कुछ अभिजात संस्थाएँ उसके भविष्य पर इस तरह अधिकार रखते हैं जैसे उसके शरीर की भाषा उनसे पूछे बिना लिखी जा सकती हो. चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, भाषणों के वस्त्र बदलते हैं, मगर ‘गेटो’ अपनी जगह अविचलित और अपरिवर्तित पड़ा रहता है. ग़रीबी की उसी सीलन, उन्हीं अधनंगी दीवारों, उसी थकी हुई मातृत्व-गंध और उन्हीं बच्चों के बीच, जिनके जन्म के साथ अवसर नहीं, केवल संभावित दुर्घटनाओं की एक लंबी फ़ेहरिस्त जन्म लेती है. इस तरह “व़िशॅस सर्कल” कोई समाजशास्त्रीय पद नहीं रह जाता, पीढ़ियों के गले में पड़ा वह अदृश्य फंदा है, जो ढीला इतना रहता है कि इन्सान जीवित भर रहे और कसा इतना कि कोई उसकी पकड़ से बाहर न निकल सके.

 

 

 

और ठीक यहाँ डॉली पार्टन जब इन द गेटो गाती है तो उसकी आवाज़ बहुत विचलित करती है. कोमल, स्त्री-सुलभ करुणा में भीगी हुई, लेकिन उस कोमलता के भीतर व्यवस्था की नग्न देह अचानक दिखाई देने लगती है. उसकी आवाज़ जैसे गीत के वस्त्र की एक-एक तह हटाती जाती है और नीचे वह धार्मिक-परोपकारी, राजनीतिक और नैतिक भ्रमजाल की परतें हटने लगती हैं, जिनके भीतर अमानुषिक शोषण अपनी सबसे सभ्य और सम्मोहक पोशाक पहनकर मुस्कुराते हैं. हम मंदिर, चर्च, संसद, चुनाव, दान और नैतिकता की बातें करते रहते हैं, जबकि किसी गली के अँधेरे गर्भ में एक बच्चा पहले ही उस नियति के लिए तैयार किया जा रहा होता है, जिसे बाद में समाज स्वयं “अपराधी” कहेगा.

यह व्यवस्था पहले उसके हिस्से की रोशनी कम करती है, फिर उसके रास्ते संकरे करती है, फिर उसके हाथों में उपलब्ध विकल्प छीनती है, फिर उसकी भूख को अपराध की दिशा में धकेलती है और अंत में, जब वही युवा अपनी बनाई हुई सामाजिक भूलभुलैया में हिंसा तक पहुँच जाता है तो व्यवस्था अचानक निर्दोष न्यायाधीश की मुद्रा में तनकर खड़ी हो जाती है. उसके ख़िलाफ़ अभियोग प्रमाणित नहीं हो तो ‘मुल्क़ की मुराद’ कहकर उस पर मुहर लगा दी जाती है. दुनिया में इन्साफ़ के नाम पर ऐसे फ़ैसलों की नज़ीर कम नहीं हैं.

यह कौन नहीं जानता कि निर्धनता केवल वर्तमान अभाव नहीं, भविष्य के व्यवहार की परिस्थितियाँ बनाती है. बच्चा भूख में जन्मता है. सामाजिक मदद मिलती नहीं. वही बालक धीरे-धीरे सड़क, चोरी, हिंसा और अपराध की तरफ़ धकेला जाता है. फिर एक दिन मर जाता है. और ठीक उसी सामाजिक भूगोल में दूसरा निर्धन बच्चा पैदा होता है. चक्र फिर आरम्भ. इतनी-सी कथा.

“दु:ख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!’ लेकिन कोई साहित्य यहीं आकर चुप रह जाए और निराला को क़िताबों, आख्यानों, व्याख्यानों और साहित्यिक वक्तृताओं में ही पढ़ता-पढ़ाता रहे और भूतल पर कुछ न करे तो उनमें और उन प्रतिगामी लोगों में क्या अंतर है, जो मध्ययुगीन शक्तियों के प्रशंसक और उपासक बनकर अकर्मण्यता और आलस्य का सम्मोहन गढ़ते रहते हैं. लेकिन डॉली चुप नहीं रहतीं. ख़ुद ही लिखती और ख़ुद ही गाती हैं :

“देन वन नाइट इन डेस्परेशन
द यंग मैन ब्रेक्स अवे
ही बाइज़ अ गन, स्टील्स अ कार
ट्राइज़ टु रन, बट ही डोंट गेट फार
ऐंड हिज़ मामा क्राइज़’

 

 

34.

ऐसे में, उस छोटी-सी कथा की तहों में कार्ल मार्क्स का सोशल रिप्रोडक्शन, पियरे बुरदियू का इनहेरिटेड डिसएडवांटेज, आधुनिक क्रिमिनोलॉजी का स्ट्रक्चरल डेप्रिवेशन और अमर्त्य सेन की कैपेबिलिटीज़ आदि सब मानो बिना अपना नाम लिए एक ही बच्चे की नियति में धीरे-धीरे बोलने लगती हैं. अपराधी अचानक पैदा नहीं हुआ. समाज ने धीरे-धीरे उसकी सम्भावनाएँ कम कीं. पहले भोजन. फिर शिक्षा. फिर अवसर. फिर गरिमा. फिर वैध रास्ते. और अंत में वही समाज उसके शव के पास खड़ा होकर पूछता है, यह लड़का अपराधी कैसे हो गया? राज्य की सबसे सुविधाजनक नैतिकता यही है. वह परिणाम को दंडित करता है और कारण को बजट में स्थगित कर देता है. इन द गेटो की राजनीति इसी जगह छूती है. गीत अपराध को निर्दोष घोषित नहीं करता. वह अपराध के गर्भ की ओर देखता है. और ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं.

डॉली जब इसे गाती हैं तो एल्विस की तुलना में एक अलग शारीरिक अनुभूति पैदा होती है. एल्विस का स्वर गहरा, करुण और गॉस्पेल के निकट एक पुरुष-साक्षी की तरह खुलता है. डॉली की उजली, पतली, आगे रखी हुई आवाज़ उस बच्चे की माँ के अधिक निकट आ जाती है. वह जब पुकारती है “एंड हिज़ ममा क्राईज़’ हृदय के भीतर चेतना का एक नश्तर सा उतरता है, जो बताता है कि इन आंसुओं के पीछे वही अभाव हैं, जो अपराधों के पीछे हैं! लेकिन जाने कितने ही मुल्क़ अपने व्यवस्था तंत्र को कभी यह बात समझा ही नहीं पाए.

तभी गीत के अंत में बचता है केवल वह असह्य, क्षण! एक माँ का विलाप: “ऐंड हिज़ ममा क्राईज़.”

 

 

उस एक पंक्ति में अर्थशास्त्र अचानक मातृत्व की देह से टकराता है. राजनीति आँसू बन जाती है. वर्ग-संघर्ष किसी किताब का अध्याय नहीं रहता, वह उस माँ की छाती में उठता हुआ वह दर्द है, जिसका कोई सकल घरेलू उत्पाद नहीं होता, कोई बाज़ार-मूल्य नहीं होता, कोई चुनावी प्रतिशत नहीं होता. और डॉली की कला का सबसे सुंदर और सबसे विध्वंसक पक्ष यही है. वह किसी सिद्धांत को मंच पर खड़ा नहीं करतीं, वह एक आवाज़ को इतना मानवीय, स्पर्शशील और ऐंद्रिक बना देती हैं कि व्यवस्था का अमूर्त अपराध अचानक हमारे सामने देह धारण कर लेता है.

वहाँ एक ‘गेटो’ नहीं रह जाता. वहाँ मनुष्य की त्वचा पर लिखा हुआ समूचा राजनीतिक अर्थशास्त्र दिखाई देने लगता है.

“… ऐंड हिज़ हंगर बर्न्स
सो ही स्टार्ट्स टु रोम द स्ट्रीट्स ऐट नाइट
ऐंड ही लर्न्स हाउ टु स्टील
ऐंड ही लर्न्स हाउ टु फाइट
इन द गेटो…”

 

 

36.

कभी-कभी डॉली में एक अद्भुत देहधर्मिता सुनाई देती है. वह आवाज़ आपके कान पर अधिकार नहीं करती, उसे छूती है और फिर हट जाती है. जैसे किसी यार की उँगली आपकी त्वचा पर केवल इतनी देर ठहरे कि उसके हट जाने के बाद ही आपको उस स्पर्श के सुख की निशानियाँ मिलें.

बहुत बड़े पॉप वॉकलिस्ट्स अपना कौशल पहले सामने रख देते हैं. रेंज, बेल्ट, मेलिस्मा, सस्टेन्ड हाई नोट. डॉली कई बार इसके ठीक उलट करती हैं. वह शब्द को आगे रखती हैं और स्वर को उसके पीछे खड़ा रहने देती हैं. इसीलिए उनके यहाँ गायन अक्सर गीत पर चढ़ता नहीं, गीत के भीतर घुल जाता है.

उनका वाइब्रेटो भी उल्लेखनीय है. छोटा, तेज़ और हल्का. अक्सर पंक्ति के आरम्भ में स्वर अपेक्षाकृत सीधा चलता है और अंतिम सिलेबल पर कंपन धीरे से खुलता है. इससे शब्द पहले अपना अर्थ देता है और फिर आवाज़ उस अर्थ की पीड़ा को देह प्रदान करती है. डॉली रोती नहीं हैं, वह स्वर में रो पड़ने की संभावना छोड़ देती हैं. यही तो अधिक मारक है. एक प्रशिक्षित गायिका आपको आँसू दिखा सकती है, डॉली कई बार केवल पलकों की नमी तक आती हैं और रुक जाती हैं. शेष आँसू आपका मन स्वयं बना लेता है.

उम्र के साथ उनकी आवाज़ भी बदली. शुरुआती रिकॉर्डिंग्स में लड़की जैसी नुकीली और उजली चमक अधिक सुनाई देती है. मध्यकाल में कंट्रोल और बॉडी बढ़ती है. वृद्धावस्था में हल्की ब्रीदीनैस, ग्रेन और नाज़ुकी उसमें जुड़ने लगती है, लेकिन उसकी आवाज़ के फिंगरप्रिंट कभी नहीं मिटते. कुछ आवाज़ें सुनते ही गायक याद आता है, डॉली की आवाज़ सुनते ही एक पूरा जीवन-प्रदेश स्मृति में खुलने लगता है. लकड़ी का घर, चर्च, गर्मियों की घास, रसोई, एक माँ, एक लड़की और बहुत दूर जाती हुई सड़क. उनकी बाहरी छवि कहती थी, मुझे देखो. उनकी आवाज़ कहती थी, पास आओ, कुछ बताना है.

 

 

 

37.

1970 में डाउन फ्रॉम डोवर आया.

एक अनमैरिड प्रेग्नेंट गर्ल की कथा, जिसे परिवार अस्वीकार कर देता है. यह गीत सुनते हुए समझ आता है कि डॉली का फेमिनिज़्म स्लोगन से क्यों अलग था. वह “पैट्रियार्की” शब्द नहीं बोलतीं, उसका परिणाम दिखाती हैं. एक लड़की है. उसके गर्भ में बच्चा है. जिस पुरुष की प्रतीक्षा है, वह नहीं आता. परिवार शर्म महसूस करता है. समाज नैतिकता का न्यायाधीश बनता है और सारी नैतिक लागत स्त्री की देह पर रख दी जाती है. पुरुष कहाँ है? वह अनुपस्थित हो सकता है. स्त्री नहीं हो सकती, क्योंकि गर्भ दिखाई देता है. पैट्रियार्की की सबसे प्राचीन चाल यही रही है.

यौन सम्बन्ध दो शरीरों के बीच होता है, पर उसके सामाजिक प्रमाण और परिणाम की जिम्मेदारी स्त्री ही की देह उठाती है. स्त्री देह के लिए, ख़ासकर प्रथम प्रेम में डूब जाने वाली जूही की कली सी युवतियों की हँसी अंतत: कंटकित ही मिलती है. अगर प्रेम यौवन के अतुल सौंदर्य का नैसर्गिक शृंगार है तो अपनी त्वचा से चुंबनों के चिह्न मिटाकर सारे युवक प्रेयसियों को चीत्कार के लिए क्यों छोड़ जाते हैं? हम समझते हैं, यह प्रश्न सिर्फ़ पूर्व का है, डॉली का गीत बताता है कि मिस्र के पिरामिडों, रोम की जल प्रणालियों और गोथिक गिरजाघरों से लेकर हमारी अपनी उपस्थितियों के आसपास फूटती रुलाइयों तक को जलते जंगलों की तरह अनदेखा कर दिया जाता है.

 

 

38.

डॉली इस अन्याय को सदर्न गॉथिक अँधेरे में ले जाती हैं.

यहाँ बच्चा भी सामाजिक दंड से मुक्त नहीं और सम्मान नामक संस्था कितनी बार प्रेम से विहीन होकर अधिक निर्दय, निष्ठुर और हृदयहीन रही है. धर्म, परिवार, समाज, नैतिकता सब मनुष्य के आवरण में पुरुष की रक्षा के लिए बने शब्द हैं और स्त्री उन्हीं के बीच बिल्कुल अकेली खड़ी रहती है. डॉली की आवाज़ यहाँ नाटकीय होकर विशाल नहीं होती. वह कहानी के क़रीब रहती है, जैसे कोई स्त्री दूसरी स्त्री से रसोई में धीरे-धीरे बात कह रही हो और दरवाज़े के बाहर पूरा समाज खड़ा सुन रहा हो. इसीलिए वे युवा लड़कों को एक ख़ास नसीहत देती रहती थीं. और इस मामले में डॉली पार्टन की हाज़िरजवाबी का एक मशहूर किस्सा 1987-88 के उनके टेलीविजन शो ‘द डॉली शो’ से जुड़ा है. एक किशोर प्रशंसक ने उनसे पूछा कि वे अमेरिका के नौजवानों को ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए क्या सलाह देना चाहेंगी. डॉली ने बिना एक क्षण गंवाए कहा :

“ऐसे जियो जैसे हर दिन बारिश होने वाली हो और अपने ‘रबर्स’ हमेशा साथ रखो.”

वाक्य पूरा होते ही स्टूडियो ठहाकों से गूंज उठा. परंपरागत अमेरिकी बोलचाल में ‘रबर्स’ उन वाटरप्रूफ जूतों या जूतों पर चढ़ाए जाने वाले कवर के लिए कहा जाता था, जिन्हें बारिश और कीचड़ से बचने के लिए पहना जाता था. इस अर्थ में डॉली की सलाह जीवन-दर्शन जैसी थी : ज़िंदगी में बारिश कभी भी आ सकती है, इसलिए तैयार रहो. लेकिन उसी शब्द में एक शरारती फंदा भी था. अमेरिकी स्लैंग में ‘रबर्स’ का अर्थ कंडोम भी होता है.

डॉली को अगले ही क्षण अपने वाक्य का दूसरा अर्थ समझ में आ गया. वे खुद हंस पड़ीं, थोड़ी झेंपीं और बोलीं, उन्हें यकीन नहीं हो रहा कि उन्होंने अभी यह कह दिया. यही डॉली पार्टन हैं. एक ही वाक्य में पहाड़ी समझदारी, देसी व्यावहारिकता और ऐसी अनायास यौन-शरारत, जिस पर सबसे पहले वे स्वयं हंस पड़ती हैं.

 

 

 

39.

डॉली की नारीवादी राजनीति विशेष रूप से दिलचस्प है, क्योंकि वह अक्सर “फेमिनिस्ट” कहलाने से बचती थीं, लेकिन उनके गीत बार-बार स्त्री के प्रश्न पर लौटते हैं. “जस्ट बिकॉज़ आई ऐम अ वुमन’ में सेक्सुअल डबल स्टैंडर्ड है. पुरुष का अतीत अनुभव है, स्त्री का अतीत चरित्र. पुरुष की इच्छाएँ स्वाभाविक हैं, स्त्री की इच्छाएँ प्रमाण-पत्र माँगती हैं. डॉली इस पाखंड को बहुत भीनी लहर से सामने रखती हैं और स्त्री की पुकार को पूरे व्योम में बिखेर देती हैं.

फिर नाइन टू फाइव आता है और बेडरूम से वर्कप्लेस की ओर कैमरा घूम जाता है. 1980. जेन फोंडा. लिली टॉमलिन. डॉली पार्टन. एक ऑफ़िस. एक सेक्सिस्ट बॉस. और टाइपराइटर की मैकेनिकल दुनिया में स्त्री का श्रम. गीत का रिद्म स्वयं ऑफ़िस मशीनरी जैसा है. उसकी प्रसिद्ध परकसिव साउंड के पीछे डॉली के एक्रिलिक नेल्स से ताल खोजने की कहानी भी जुड़ी है. नाखून टाइपराइटर जैसे बजते थे. कितनी सुंदर बात है, जिस मैनिक्योर को स्त्री-सौंदर्य का फ्रिवलस प्रतीक समझा जा सकता था, वही कैपिटलिस्ट ऑफ़िस की मशीन की ध्वनि बन गया.

यह डॉली का पूरा एस्थेटिक्स है.

जिस चीज़ से लोग उन्हें हल्का समझते थे, वह उसी को हथियार बना लेती थीं. ब्लॉन्ड हेयर? ठीक है. और ऊँचा विग. ब्रेस्ट्स पर चुटकुले? वह पहले स्वयं कर देंगी. राइनस्टोन्स? और लगाइए. फिर जब सामने वाला यह मान चुका हो कि इस चमकीली देह में बुद्धि कम होगी, वह पब्लिशिंग राइट्स अपने नाम रख लेंगी, बिज़नेस एम्पायर बना लेंगी और श्रम के एक्सप्लॉइटेशन पर हिट सॉन्ग लिख देंगी.

नाइन टू फाइव में ऑफिस केवल वर्कप्लेस नहीं है. कैपिटलिज़्म और पैट्रियार्की का छोटा-सा संयुक्त उपक्रम है. ऊपर बॉस, नीचे वर्कर्स और उनमें भी स्त्रियाँ अधिक असुरक्षित. श्रम किसी और की आय बनाता है. महत्त्वाकांक्षा किसी और की हायरार्की में फँसी है. यहाँ वर्ग और जेंडर एक-दूसरे के ऊपर नहीं, भीतर बैठे हैं. यही इंटरसेक्शनैलिटी है. बिना शब्द बोले. गीत इतना कैची है कि आदमी नाच सकता है और नाचते हुए एक्सप्लॉइटेशन गा रहा होता है. यह लोकप्रिय कला की महान शरारत है. मैनिफेस्टो आपको पढ़ना पड़ता है, पॉप कोरस स्वयं याद हो जाता है.

 

 

40.

डॉली के सबसे बड़े गीतों के शब्द प्रायः साधारण हैं. मामा. वर्क. लव. होम. बेबी. मैन. वुमन. लेकिन प्लेसमेंट असाधारण. जैसे बहुत ही साधारण शब्दों के साथ हिन्दी कविता में रघुवीर सहाय, मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी या कुमार अंबुज का ट्रीटमेंट.

डॉली भावना को शब्दों से सजाती नहीं, शब्द ही हटाती जाती हैं जब तक भावना अकेली न रह जाए. यह एक प्रकार की ऐंद्रिकता है और गाढ़ी ऐंद्रिकता शब्दों के आधिक्य से नहीं, त्वचा की अनुभूतियों से जन्म लेती है. डॉली ऑर्नामेंट हटाती हैं और घटना की त्वचा तक पहुँचती हैं.

इसलिए जोलीन के लिए साइकोलॉजिकल वोकैब्युलरी आवश्यक नहीं. एक नाम पर्याप्त है. कोट ऑफ मेनी कलर्स के लिए ग़रीबी की मैक्रोइकॉनॉमिक्स नहीं, कोट है. नाइन टू फाइव में कैपिटलिज़्म नहीं. नौकरी है. आई विल ऑलवेज़ लव यू में अटैचमेंट थ्योरी नहीं. विदाई है. वे शॉर्ट-स्टोरी राइटर की तरह काम करती हैं. सेटअप, छोटा दृश्य, कॉन्फ्लिक्ट और फिर अक्सर आखिरी वर्स में इमोशनल रिवर्सल.

 

 

41.

डॉली केवल एपलैचियन दु:ख की गायिका नहीं थीं. यही उन्हें बड़ा बनाता है. यदि वह केवल ग़रीबी और माउंटेन बैलड्स में रुक जातीं तो महान कंट्री आर्टिस्ट रहतीं. उन्होंने पॉप के दरवाज़े खोले. 1970 के दशक के उत्तरार्ध में हियर यू कम अगेन ने उन्हें अधिक पॉलिश्ड कंट्री-पॉप साउंड दिया. यह वह समय था जब नैशविल का कंट्रीपॉलिटन सौंदर्य ग्रामीण कहानी को शहरी रिकॉर्डिंग सोफिस्टिकेशन के साथ मिला रहा था. यानी स्ट्रिंग्स. पॉलिश्ड रिद्म सेक्शन. यानी स्मूद प्रोडक्शन. और उसके ऊपर वही ट्वैंग. यानी डॉली शहर गईं, पर पहाड़ को होटल में नहीं छोड़ा.

फिर केनी रोजर्स के साथ आइलैंड्स इन द स्ट्रीम. बी गीज़ के बैरी, रॉबिन और मॉरिस गिब की रचना. 1983. कंट्री और पॉपदोनों संसारों में विशाल सफलता. गीत में डॉली की आवाज़ एक रोचक कॉन्ट्रास्ट बनाती है. केनी का स्वर अधिक गर्म, फुलर, मैस्क्युलिन ग्रेन वाला, डॉली का ऊपर चमकता हुआ. डुएट में दोनों टिम्बर्स एक-दूसरे को आलोकित करते हैं. एक अच्छा डुएट दो आवाज़ों का जोड़ नहीं, दो अलग शारीरिक तापमानों का संसर्ग है. एक दूसरे की कमी पूरी नहीं करता, उसकी भिन्नता को अधिक स्पष्ट करता है. केनी के पास अर्थ है. डॉली के पास एयर. गीत दोनों के बीच बहता है.

 

 

42.

बड़े पॉप क्रॉसओवर के बाद किसी कलाकार के सामने एक भय रहता है, क्या वह अपनी पहली ज़मीन खो चुका है? डॉली ने उत्तर बाद के वर्षों में दिया. द ग्रास इज़ ब्लू, लिटिल स्पैरो. यानी ब्लूग्रास. एपलैचियन फोक. कंट्री गॉस्पेल. अकूस्टिक इंस्ट्रूमेंट्स. उनका 2001 का लिटिल स्पैरो स्वयं उनकी भाषा में “ब्लू माउंटेन म्यूज़िक” था. माउंटेन म्यूज़िक और ब्लूग्रास की जड़ों की ओर लौटना.

डॉली के गीतों की सबसे विलक्षण बात यह है कि अत्यधिक सफलता ने उनके भीतर से निर्धन बच्ची को पूरी तरह निर्वासित नहीं किया. बहुत से लोग गरीबी से बाहर निकलते हैं और फिर उसे भूलने में ऊर्जा लगाते हैं. एक्सेंट बदलते हैं. कपड़े. मित्र. स्मृति. लेकिन डॉली ने ठीक उलटा किया. उन्होंने वेल्थ अर्जित की और चाइल्डहुड मेमरी को कैटलॉग की तरह साथ सहेजकर रखा.

यही कारण है कि फिलैंथ्रॉपी उनके जीवन में ऑर्नामेंटल सेलिब्रिटी चैरिटी नहीं लगती. इमैजिनेशन लाइब्रेरी ने बच्चों को करोड़ों पुस्तकें पहुँचाईं. कोविड वैक्सीन रिसर्च के लिए वेंडरबिल्ट को धन दिया. अपने टेनेसी क्षेत्र में शिक्षा, अस्पताल, जंगल की आग और आपदा राहत के लिए लगातार संसाधन लगाए. उनके जीवन-वृत्त में यह परोपकार उसी निर्धनता की स्मृति का विस्तार दिखाई देता है जिससे उनकी सॉन्गराइटिंग निकली थी. धन यहाँ गिल्ट नहीं मिटाता. स्मृति को संसाधन देता है.

 

 

 

43.

उन्होंने यह असाधारण कला छोड़ी कि किसी बड़े विचार को इतना सरल कैसे किया जाए कि वह विचार ही दिखाई देना बंद कर दे और मनुष्य दिखाई देने लगे. मार्क्सवाद वर्ग की संरचना समझाता है. ह्यूमन-राइट्स डिस्कोर्स अधिकार बताता है. फेमिनिज़्म सत्ता-संबंधों काे नाम देता है. साइकोलॉजी इनसिक्योरिटी को वर्गीकृत करती है. इकॉनमिक्स पॉवर्टी मेज़र करता है. डॉली एक बच्चा, एक कोट, एक दफ़्तर, एक दूसरी स्त्री, एक विदाई हमारे सामने रख देती हैं और कहती हैं, अब यह देखो. यही मनुष्य है. प्रफुल्लित होकर इसके प्राणों में समस्त अभावों, दु:खों और संतापों कोद शाश्वत शरण दो और गीत बना दो.

 

 

 

44.

इसी कारण इन द गेटो में वह भूख हमसे अधिक देर तक टिकती है, जितना किसी पॉवर्टी रिपोर्ट का प्रतिशत. इसीलिए नाइन टू फाइव का ऑफिस किसी लेबर ट्रीटीज़ से जल्दी याद आता है. इसीलिए कोट ऑफ मेनी कलर्स क्लास डिग्निटी की ऐसी परिभाषा बन जाता है, जिसे नौ वर्ष का बच्चा भी समझ सकता है. इसीलिए जोलीन जेलसी का क्लिनिकल केस नहीं, काँपती हुई त्वचा के नीचे रक्त कणों में बहती एक प्रार्थना है. और इसीलिए आई विल ऑलवेज़ लव यू प्रेम का सबसे कठिन पाठ पढ़ाता है, हर प्रेम जिसे बचाना हो, उसे अपने पास रखना आवश्यक नहीं.

 

 

 

45.

कुछ प्रेम-प्रसंगों की अंतिम गरिमा यही है कि हथेली खुल जाए, प्रिय चला जाए, लेकिन आत्मा में उसकी ऊष्मा देर तक बची रहे. डॉली पार्टन अब चली गई हैं, पर उनके गीतों में भूख, अभाव और अपमान के वलय में मनुष्य की मुक्ति की जाने कितनी पिपासा थी, जो आज भी बुझी नहीं है. उनकी आवाज़ में गरीबी कभी कोई आँकड़ा नहीं बनी. वह भूखे बच्चे का चेहरा थी, किसी अकेली स्त्री की देह पर पड़ा समय का निशान, किसी मां की आंख में अटका हुआ आंसू.

इसीलिए उनके गीतों के पीछे कभी-कभी वह कठोर वाक्य भी ध्वनित होता है कि आधुनिक राज्य की कार्यपालिका अंततः पूंजीपति वर्ग के सामूहिक हितों की प्रबंध-समिति है. वरना हमारी सुबहें इतनी धूसर और ठंडीठार क्यों होतीं? सत्ताएँ इतनी निर्दय क्यों रहतीं? और दुनिया के किसी न किसी “गेटो’ में आज भी कोई मां क्यों रो रही होती?

डॉली पार्टन 80 साल की उम्र में चली गईं. मगर कहीं बहुत दूर से अब भी सुनाई देता है “ऐंड हिज़ ममा क्राइज़…” और लगता है, वह किसी एक मां का रोना नहीं, उस दुनिया की आवाज़ है, जो सबसे सुंदर गीत गाने के बाद भी अब तक न्याय नहीं सीख सकी और इस दुनिया के हर “गेटो” में हर नन्हे शिशु को जन्म देने वाली हर माँ कराहती है!

ऑन अ कोल्ड ऐंड ग्रे शिकागो मॉर्निन’
अनदर लिटल बेबी चाइल्ड इज़ बॉर्न
इन द गेटो
ऐंड हिज़ ममा क्राइज़
इन द गेटो!

 

भारत–पाक सीमा के एक गाँव में जन्मे त्रिभुवन जयपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वे हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुके हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, कुछ इस तरह आना,’ शूद्र: एक लंबी कविता,’ और राष्ट्रवाद के नवपरिप्रेक्ष्य .’ त्रिभुवन अपने सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषण, संयमित भाषा और गहन पठनशीलता के लिए जाने जाते हैं. जयपुर में रहते हैं.

thetribhuvan@gmail.com

Tags: 2026डॉली पार्टनत्रिभुवन
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Comments 12

  1. Raajaysh Chetwal says:
    3 weeks ago

    बहुत ही अच्छा लेख है। Dolly Parton के बहाने बात सिर्फ़ संगीत तक नहीं रहती… प्यार, रिश्ते, गरीबी, अपनी पहचान और अपने काम पर हक़ तक चली जाती है।

    I Will Always Love You और Coat of Many Colors वाले हिस्से खास तौर पर अच्छे लगे। गरीबी को सिर्फ़ वस्तुओं की कमी नहीं, बल्कि इज़्ज़त और शर्मिंदगी के अनुभव से जोड़ना बहुत असरदार लगा। Elvis को गीत न देने वाला प्रसंग भी बहुत कुछ कह जाता है… भावना अपनी जगह, लेकिन अपने काम पर हक़ भी ज़रूरी।

    बस कहीं-कहीं भाषा की सजावट मेरे पसंदीदा मुद्दे की गहराई पर थोड़ी हावी प्रतीत होती है…

    Reply
  2. Deepti Kushwah says:
    3 weeks ago

    ·
    हिंदी में पश्चिमी लोकप्रिय संगीत पर प्रायः सूचनात्मक सामग्री ही मिलती है। किसी गायिका की आवाज़ को उसके वर्ग, भूगोल, देह और सार्वजनिक व्यक्तित्व के भीतर रखकर पढ़ने का काम कम दिखता है। यह आलेख अपने विपुल अध्ययन, बहुआयामी दृष्टि और काव्यात्मक भाषा के कारण विशिष्ट है। लेखक डॉली की जीवनी के साथ, यह भी दिखाते हैं कि निर्धनता से आई एक स्त्री ने अपनी आवाज़ और कृत्रिम मानी जाने वाली चमक को स्वायत्तता की शक्ति में कैसे बदला।
    पॉप संगीत में गायिका की दृश्य छवि उसके संगीत से अलग नहीं होती। मुझे बेहद चर्चित केटी पेरी यहाँ याद आती हैं। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर उनके फ़ॉलोअर्स की कुल संख्या लगभग 37 करोड़ है। वे ट्विटर पर दस करोड़ फ़ॉलोअर्स का आँकड़ा छूने वाली संसार की पहली शख्सियत थीं। लोकप्रियता के इस पैमाने को आज विराट कोहली के इंस्टाग्राम पर लगभग 27.3 करोड़ फ़ॉलोअर्स के संदर्भ से समझा जा सकता है। हालाँकि डॉली और केटी को एक ही साँचे में नहीं रखा जा सकता पर इन्हें देखते हुए समझ आता है कि प्रसिद्धि के लिए अच्छे कंठ की ही ज़रूरत नहीं होती। वह समय, बाजार, दृश्यता और अपनी सार्वजनिक छवि पर कलाकार के अधिकार से भी बनती है।
    त्रिभुवन जी का यह शानदार आलेख बताता है कि किसी लोकप्रिय कलाकार को लिखने के लिए जानकारी ही नहीं, उसके समय और समाज को समझने वाली संवेदनशील दृष्टि भी चाहिए।

    Reply
  3. Nidhi Agarwa says:
    3 weeks ago

    l
    ·
    जहाँ अभाव कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं, जीवन का ऋतुचक्र थे. कभी वसंत किसी छोटी उम्मीद की तरह रेत पर उग आए रंगीन फूल-सा फूटता, फिर ग्रीष्म आता और दुःख पसीने की तरह देह से चिपक जाता. वर्षा में संताप नमी बनकर दीवारों, बिस्तरों और मन के भीतर उतरता, शरद निर्मल उजास में घर की रिक्तताओं को और अधिक साफ़ दिखा देता.
    क्या ही बहती हुई भाषा है। त्रिभुवन सर को पढ़ने का सुख!

    Reply
  4. Vinod Das says:
    3 weeks ago

    ·
    आपने अद्भुत लिखा है. गायन-संगीत में समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के साथ विवेचन इस पाठ को एक नया आयाम देता है. गायन समाज विमुख कला नहीं है. यह अपने समय से संगीतात्मक संवाद है. आपकी काव्यात्मक भाषा इसे पठनीय ही नहीं बनाती, बल्कि गद्य पढ़ने का सुख भी देती है. त्रिभुवन जी को मन से सलाम और कृतज्ञता व्यक्त करता हूं. समालोचन को आभार

    Reply
  5. कुमार अम्बुज says:
    3 weeks ago

    यह पुस्तिकाकार आलेख एकाधिक पाठ की चाह पैदा करता है। नीचे उद्धृत पंक्तियाँ/वाक्य संकेत दे सकते हैं कि यह किस स्तर का लेख है। कलाकार के अवसान के बहाने कला जीवन का सक्रिय उत्सव। और सृजनात्मक :

    राज्य की सबसे सुविधाजनक नैतिकता यही है. वह परिणाम को दंडित करता है और कारण को स्थगित कर देता है
    *
    शायद महान् गीतों की यही नियति है. वे रिकॉर्ड कंपनियों से बच निकलते हैं. चार्ट से उतर जाते हैं. फिर किसी अदालत की सीढ़ियों पर दो टूटे दिलों के बीच गरम उच्छ्वास की तरह बहने लगते हैं और अमरता प्राप्त कर लेते हैं।
    *
    जहाँ प्रेम स्वामित्व से अलग होने लगता है. यहीं बोध होता है कि प्रेम मनुष्य की सबसे कठिन आत्मतृप्ति है।
    *
    किसी जीवनी को इससे सुंदर वृत्त शायद ही मिलता है. अगर हम अपने गायकों या सिने-सितारों को देखें तो हमें अपने देश के सिने गगन में शून्यता का सन्नाटा सुनाई देता है।
    *
    सत्ता ने उसे कई बार सम्मानित करना चाहा. प्रेजिडेंशल मेडल ऑव फ्रीडम की पेशकश दो बार की. बाद में भी प्रस्ताव आया तो भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया. वह व्हाइट हाउस के मेडल के सहारे बड़ी होना नहीं चाहती थी।
    *
    और उस आवाज़ को, जो ऊँचाइयों तक जाकर भी कभी अपनी मिट्टी से अलग नहीं हुई. वह आवाज़ जिसने ग़रीबी को आँकड़ा नहीं बनने दिया, स्त्री को केवल पीड़िता नहीं रहने दिया, प्रेम को स्वामित्व में नहीं बदला और श्रम को घोषणापत्र के बिना राजनीति बना दिया।
    *
    मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को विनिमय-मूल्य में बदल देने वाली व्यवस्था की सबसे बड़ी क्रूरता यह नहीं कि वह इन्सान की मेहनत खरीदती है, उसकी अश्लीलता यह है कि वह धीरे-धीरे उसकी देह, उसकी इच्छाओं, उसके भय, उसकी गरिमा, उसकी स्मृतियों और अंततः उसके भविष्य पर भी अपना प्राइस-टैग टाँक देती है. फिर मनुष्य मनुष्य नहीं रहता. वह श्रम-घंटों, वेतन-पर्चियों, किराये, क़र्ज़, अपराध-संभावनाओं और चुनावी आँकड़ों में विभाजित एक जीवित वस्तु हो जाता है।
    *
    उसकी त्वचा अपनी रहती है, मगर उसके भीतर दौड़ता रक्त किसी और अर्थव्यवस्था के अनुशासन में है. उसकी भूख निजी है, लेकिन भूख पैदा करने वाली व्यवस्था सार्वजनिक।
    ***
    इसने मुझे विवश किया कि मैं अभी Dolly Patron’s Coat of Many Colors, 2015 मूवी देखूँ।
    🍀

    Reply
  6. subhash gatade says:
    3 weeks ago

    डॉली पार्टन 
    # इस शानदार आलेख के लिए त्रिभुवन जी का जितना शुक्रिया अदा किया जाये उतना कम है 
    ईमानदारी की बात यह है कि जॉन लेनन, बॉब डायलन  आदि के चंद गीतों को छोड़ कर निजी तौर पर पश्चिमी संगीत से लगभग अनभिज्ञ हूँ पिछले दिनों इस महान गायिका के न रहने की ख़बर मिली तब पहली बार मैंने उनका नाम सुना था 

    # त्रिभुवन अपने लेखन से हमेशा ही मुग्ध करते हैं 
    प्रस्तुत लेख को जिस तरह बुना गया है वह अद्भुत है। गौर करेंगे वह किस तरह इस महान गायिका पर लिखे आलेख का आगाज़ करते हैं :

    ‘यह निर्धनता के नागपाश से वैभव के प्रवाल-द्वीप तक की एक विलक्षण यात्रा है. लेकिन साथ ही यह असाधारण कथा है अँधकार भरे जीवन में चाँदनी उतार लाने की. देह, प्रेम, अभाव और स्त्री-स्वायत्तता की. सांसों में सौरभ भरकर प्राणों को भीनी लहरों से आप्यायित करने की. और धमनियों में जलते हरे जंगलों के बीच स्वरलहरियों की धार-धार वर्षा करती महान गायिका डॉली पार्टन की. ‘
    # हमारे इस दौर में जब बड़े बड़े सूरमा – कलाकार , खिलाडी, चित्रकार, पत्रकार  – सत्ता के चारण बनने में धन्य महसूस करते हैं , हमारे ‘Nonbiological महामहिम ‘ के साथ एक अदद सेल्फी से ही खुश होते हैं उस दौर में डॉली पार्टन का यह रुख अभिभूत कर देता है ,

    “..अमेरिकी सत्ता ने उसे कई बार सम्मानित करना चाहा. डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने प्रेजिडेंशल मेडल ऑव फ्रीडम की पेशकश दो बार की. बाद में बाइडन की ओर से प्रस्ताव आया तो भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया. वह व्हाइट हाउस के मेडल के सहारे बड़ी होना नहीं चाहती थी. “

    Reply
  7. पवन करण says:
    3 weeks ago

    ये मनुष्य, उसके संघर्ष, उसकी गुणवत्ता उसकी असाधारणता और समाज में खुद को साबित करके दिखा देती प्रतिभा को गहरी संवेदना से व्याख्यायित करता लेख है। शायद डोली पार्टन पर इतने विस्तार से उनके जीवन और कला वैविध्य को लेकर लिखा गया अब तक का पहला लेख हो। हिंदी में तो इसके पहले होने पर विश्वास किया जा सकता है।

    त्रिभुवन जी आपके पास करते रहने के लिए कितना ‘कमाल’ है?

    Reply
  8. प्रबोध गोविल says:
    3 weeks ago

    यह जानकार कि दिवंगता पर कई पन्नों के स्मरणांजलि आलेख लिखे गए हैं त्रिभुवन ने जो लिखा वो किसी भी कोण से कहीं से लिया गया नहीं लगता। एक मौलिक ताज़गी लगातार मिली। अच्छा आलेख।

    Reply
  9. Shashi Bhooshan says:
    3 weeks ago

    समालोचन में डॉली पॉर्टन् पर त्रिभुवन जी का एक स्मरण लेख प्रकाशित हुआ है। ऐसा स्मरण लेख किसी गायिका, संगीत और संसार पर इसके पहले मेरे पढ़ने में नहीं आया। कोई ऐसा लेख कैसे लिख पाता है। हर पैराग्राफ़ ने आँखों, दिल और चेतना को तरल रखा।
    दुनिया की सबसे मशहूर लोकप्रिय गायिका का जीवन हो, संगीत की बारीकी हो, गीतों का मर्म हो या दुनिया के अन्याय का परत दर परत उद्घाटन सब कुछ भाषा में ऐसा पिरोया है कि पढ़ते हुए लगा सब देख पा रहे हैं और जहाँ गीतों के बोल लिखे हैं उन्हें सुन रहे हैं।
    कमाल का अनुभव है इसे पढ़ना। जैसा कि न्यूयार्क के मेयर ममदानी ने कहा कि डॉली पॉर्टन् ने अमेरिका को बेहतर बनाया कहा जा सकता है यह लेख पढ़ने को बेहतर बनाने वाला है।

    Reply
  10. Anonymous says:
    3 weeks ago

    पढ़ना आनंद, प्रेरणा और विचार देता है जब हम कुछ ऐसा पढ़ते हैं।

    Reply
  11. kamlanand jha says:
    3 weeks ago

    अद्भुत। विलक्षण। बार – बार पठन के लिए आमंत्रित करनेवाला।

    Reply
  12. एम आई ज़ाहिर says:
    1 week ago

    त्रिभुवन जी। आपने बहुत मेहनत से बहुत रोचक, पठनीय और ज्ञानवृद्धक आलेख लिखा है । इतना लंबा है कि शोध प्रतीत हो रहा है। रंगकर्मियों और कलाकारों के साथ ही एनएसडी और पूना फिल्म इंस्टीट्यूट के छात्रों को इस आलेख का अवश्य अध्आययन करना चाहिए। एम आई ज़ाहिर ,साहित्यकार पत्रकार जयपुर/जोधपुर। संपर्क : 9928986086

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समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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