• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » एक चरवाहे का गीत : महेश कुमार

एक चरवाहे का गीत : महेश कुमार

by arun dev
May 13, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 4 mins read
A A
एक चरवाहे का गीत : महेश कुमार
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
एक चरवाहे का गीत
महेश कुमार

केतन यादव का कविता संग्रह है ‘एक चरवाहा का गीत’.  इसमें चरवाहों, उनकी संस्कृति और समकालीन परिस्थितियों से उनके संवाद पर ग्यारह कविताएँ हैं. हिन्दी कविता में चरवाहों पर इससे पहले भी कई कवियों ने कविताएँ लिखी हैं. लेकिन, एक श्रृंखला में चरवाहों की  दुनिया संभवतः हिन्दी कविता में यह पहली बार आई है. चरवाहों का संबंध हर धर्म में ‘नेतृत्व’ और ‘ भरोसे’ से जुड़ा है.

हिन्दू मिथकीय कहानियों में कृष्ण से जुड़े दो प्रसंग जो लोक में प्रचलित है उसका विश्लेषण यहाँ जरूरी लग रहा है.

Ketan Yadav

पहला, कृष्ण को माखन चोर बताया गया है. दही, माखन और अन्य दुग्ध सामग्रियों का मथुरा भेजा जाना कृष्ण को पसंद नहीं था. कंस ने इन सामग्रियों पर कर भी लगाया था. इसके प्रतिरोध में कृष्ण अपने साथियों के साथ दुग्ध सामग्रियों को बेचने वाली ग्वाल बालाओं और व्यक्तियों की मटकियों को फोड़ दिया करते या छीन लिया करते थे. उनका मानना था कि चरवाही हम करते हैं तो इन वस्तुओं का उपभोग करने का अधिकार हमारा है.

दूसरा, कृष्ण का मानना था कि हम इंद्र की पूजा क्यों करें? हमें अपने पशुओं और चारागाहों की पूजा करनी चाहिए. इस बात पर इंद्र क्रोधित होकर गोकुल डुबाना चाहता है. इंद्र अपने साथियों के सहयोग से गोवर्धन पर्वत के नीचे पशु समेत गाँव वासियों की रक्षा करते हैं. इंद्र की हार होती है. इस मान्यता के तहत पशुपालन करने वाला और कृषक समाज आज भी गोवर्धन पूजा मनाता है.

ईसा मसीह भी चरवाहे थे और मोहम्मद साहब भी बकरियाँ चराते थे. उनके उपदेशों में बार-बार अच्छा चरवाहा बनने पर जोर है. आज भेड़ और गड़रिया शब्द रूढ़ होकर ‘भेड़चाल’ और ‘पिछलग्गू’ की तरह प्रयोग होता है. मिथक और इतिहास में इसका संदर्भ नेतृत्व, भरोसा और प्रतिरोध से जुड़ा हुआ है.

समाजशास्त्र में चरवाहों (हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कश्मीर और राजस्थान) का अध्ययन यह बताता है कि इनका संबंध क्षत्रियों से भी रहा है. इनके राजवंश भी हुए हैं. कुछ जातियाँ पराजित राजाओं के साथ जंगल में भटकते रहे और विस्थापित हुए. मुख्यधारा से कट जाने के कारण इनकी जातिगत स्थिति में भी बदलाव आया. यानी इनका रिश्ता स्वाभिमान की रक्षा से भी जुड़ा रहा. केतन की कविताओं का संदर्भ इन सबसे जुड़ता है.

‘एक चरवाहे का गीत’ कविता की शुरुआती पंक्ति है:-

“खानाबदोश था मेरा आदिम चरवाहा”
वह घर नहीं चारागाह बदलता था”.

यह तब की बात है जब राष्ट्र-राज्य नहीं हुआ करते थे. कोई सीमाएँ नहीं थीं. सारी दुनिया ही चारागाह के लिए उपलब्ध था. सब संसाधन सबके लिए था. यही कवि का यूटोपिया भी है. जब राष्ट्र-राज्य बने तब सीमाएँ बनीं. संसाधन और मनुष्यों को श्रेणीक्रम में विभाजित किया गया. मनुष्य के बौद्धिकता के विकास के साथ विभाजनों का भी विकास हुआ. इस विकास में चरवाहों की चरवाही खतरे में आ जाता है. कवि को लिखना पड़ता है :-

“मैं अपने मवेशियों को खूँखार जंगली जानवरों से बचा भी लूँ
पर शहर के बाज़ार से आती कंपनी की गाड़ी से कैसे बचाऊँ
?”

‘कंपनी की गाड़ी’ उस व्यवस्था का प्रतीक है जिसे सबकुछ पर नियंत्रण और वितरण का एकाधिकार चाहिए. यह एकाधिकार संसाधन और संस्कृति दोनों पर चाहिए. चरवाही एक संस्कृति है. उसमें स्वायत्तता है. मनमर्जी से काम करने की अपने वस्तुओं की कीमत तय करने की आज़ादी है. इस आज़ादी से ज्ञान की एक परंपरा (knowledge system) भी बनती है. ‘कंपनी की गाड़ी’ को यह नहीं चाहिए. उसे मोनोपोली और कॉन्ट्रैक्ट पर भरोसा है. वह उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण करके ज्ञान परंपरा पर भी नियंत्रण चाहता है.  ऐसा करने के लिए वह चारागाहों को लगातार खत्म कर रहा है. कवि इस प्रक्रिया को इस तरह दर्ज करता है :-

“पहले चारागाह में क़ब्रें होती थीं
अब क़ब्रों में चारागाह है.”

यानी एक पूरी जीवन पद्धति ही बदल गयी.  यह जीवन पद्धति स्वायत्तता और स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है. संसाधन और स्वायत्तता का आपस में गहरा संबंध है. जिसके पास जितना कम संसाधन होगा उसकी स्वायत्तता उतनी ही कम होगी. ‘कब्र में चारागाह’ की पूरी प्रक्रिया जमीन की लूट, संस्कृति पर खतरा और उस जीवन पद्धति से जुड़े लोगों के अस्तित्व पर खतरे से जुड़ता है. लगातार वन अधिनियम और भूमि संबंधित कानूनों को लचीला बनाने के उपक्रमों को इस संदर्भ में देखा जा सकता है.

केतन के पास गंवई समाज की छवियाँ और स्मृतियाँ बहुत सघन और वैचारिक हैं. उनका अवलोकन उनकी कविता के स्थापत्य को शिल्प और विचार से एकमेक करता है. वो लिखते हैं :

“खाँटी घरेलू औरतों को शहरों में होम मेकर कहते हैं
और गाँव में आँगन का खूँटा.”

भाषा का एक सांस्कृतिक संदर्भ होता है. सांस्कृतिक अंतर से संवेदना में भी अंतर आ जाता है. कभी-कभी भाषा के भीतर भी चालाकी और शोषण छिपा होता है.  कभी-कभी जो इतिहास में नहीं होता वह साहित्य में आ जाता है. ‘होम मेकर’ और ‘आँगन का खूँटा’ का इतिहास लिखा जाना बाकी है. यहाँ दोनों शब्द स्त्री को घर की चारदीवारी तक ही सीमित कर रहा है. पुरुषों के लिए अबतक ऐसा कोई शब्द नहीं है. एक सुनने में ज्यादा आधुनिक और फैशनेबुल लगता है. यह शहर और गाँव के अंतर को केवल स्पष्ट करता है. बाकी स्त्री के जीवन को बदलने में इसकी बहुत भूमिका नहीं है. बल्कि, ‘आँगन का खूँटा’ सीमित दायरों में ही सही कुछ संदर्भों में स्त्रियों को ज्यादा अर्थवान बनाता है. कवि कहता है

“गाँव में कहते हैं खूँटे के पास लक्ष्मी वास करती है”.

यह छवि निश्चित रूप से पशुपालन करने वाली जातियों के स्त्रियों के लिए है. ‘खूँटा’ स्त्रियों के ‘मूवमेंट’ को नियंत्रित करता है लेकिन, चारदीवारी के भीतर उसके महत्ता को स्वीकार करने और घर की व्यवस्था को चलाने की एक आर्थिक शक्ति भी देता है. ‘होम मेकर’ से यही संदर्भ आता है लेकिन उसका कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं है.  कहने का मतलब है कि यह दोनों शब्द अपर्याप्त है और नया शब्द एक भाषिक चालाकी से अधिक कुछ नहीं है. गंवई स्मृतियाँ कितनी ताकतवर हो सकती है सत्ता आलोचना के संदर्भ में उसकी एक झलक देखिए:

“मुझे मेरे खेत के चावल बहुत पसन्द हैं
पर उनमें से कंकड़ हटाकर ही खाते हैं हम
खूब फटकते-ओसाते हैं
इतनी सहूलियत मेरा खेत मुझे दे देता है”

इन पंक्तियों में बिना कुछ कहे राष्ट्रवाद की बेहद तीखी आलोचना है. जो अच्छा है और पोषण के लिए जरूरी है हम उसी को ग्रहण करते हैं. इससे अनाज या खेत का अपमान तो नहीं होता है. लोकतांत्रिक राजनीति में देश के भीतर असहमति में उठी आवाज देशद्रोह तो नहीं हो सकता है. कविता कैसे बनती हैं, उसके स्थापत्य और रूप को समझने के लिए यह बेहद मजबूत कविता है. केतन के पास ऐसी कविताएँ पर्याप्त मात्रा में हैं. जिसे हम यथार्थ कहते हैं उसको पाने की प्रक्रिया क्या हो सकती है उसकी एक चित्रात्मक प्रस्तुति देखिए:-

“कार पर छाई बूंदों को थोड़ा पोंछता है विंडशील्ड
धुंधलके को चीरकर निकलता है
झिलमिलाता हुआ कोई यथार्थ.”

यह कविता हमें ‘उषा’ की याद दिलाती है. हर कवि अपने समय की परिस्थितियों से यथार्थ को इसी तरह जीवन के अलग-अलग तहों से निकालकर लाता है. यथार्थ प्रस्तुत करते हुए जरूरी नहीं है कि पक्ष-विपक्ष रखा ही जाए. कविता से हमेशा यह माँग करना उचित नहीं है. कई बार कविता में बस वह होता है जो ‘बस है’. वहाँ बस द्वंद्व होता है. जैसे ‘विदा’ कविता इन पंक्तियों को देखिए:-

“पानी में भर चुकी है फड़फड़ाहट
साँसे तैर-तैरकर ऊपर आ रही
तन गई हैं नसें लहरों की

एक ओर से दूसरी ओर तक सिहर चुकी है नदी
किसी मछुआरे ने अभी-अभी

जाल खींचा है नदी से”

यह कविता मछली के पक्ष में और मछुआरों के विरोध में नहीं है. यह बस जीवन की वास्तविकता है, द्वंद्व है. यहाँ कवि और कविता से पक्ष-विपक्ष की माँग करना तर्कसंगत नहीं है. यहाँ कविता की मजबूती उसकी वास्तविकता और चित्रात्मकता है. यह पूरी कविता एक पेंटिंग है. कविता पढ़ते हुए कविता को बनते हुए देखना भी जरूरी है. कई बार कविता खास जीवन छवि के साथ उपस्थित होता है. जो उस जीवन को नहीं जानता उसके लिए वहाँ तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है. इस संदर्भ में दो उदाहरण यहाँ जरूरी है. पहला,

“गोइठा के आग और धुएँ में घुल-मिल्कर
सुनहरी साड़ी वाली दही.”

इस पंक्ति की समझ के लिए जरूरी है कि व्यक्ति चूल्हे के धीमे आँच में दूध के ऊपर छाली को जमते देखा हो या दही को मटकी में जमा हुआ देखा हो. यह मुख्य रूप से ग्रामीण जीवन की छवि है. दूसरा,

“बांस की अर्थी ही ठुमककर चलती है मसान”.

यह पंक्ति ‘बांस के फूल’ कविता की है. अर्थी में बांस का ‘ठुमकना’ शब्ददोष लग सकता है. लेकिन, उत्तर-पूर्व राज्यों में जिनको बांस के महत्व का जिनको अंदाज़ा है उनको इसका सांस्कृतिक संदर्भ समझ आ जाएगा. एक युवतम कवि जब इस तरह के शिल्प और स्थापत्य से कविता में आता है तो उम्मीद बनती है. इस उम्मीद का एक सिरा समसामयिक घटनाओं से जुड़ता है और दूसरा सिरा मिथकों से. कवि अपनी पीढ़ी के समसामयिक दबावों में ‘बुद्ध की आत्महत्या’ और ‘एक शव का शोकगीत’ रचता है. वह लिखता है :

“घर छोड़ने वाले हर युवक बुद्ध नहीं बनते
कुछ बोधि के बाद भी आत्महत्या कर लेते हैं.”

बुद्ध बनने की एक विशेष परिस्थिति होती है. उनमें निर्णय का अधिकार बेहद जरूरी है. मनुष्य को मनुष्य होने का एहसास बने रहना जरूरी है. जहाँ मनुष्य ‘संसाधन’ (मानव संसाधन मंत्रालय, ह्यूमन रिसोर्स) बन जाता है वहाँ बस वह उत्पादन और उत्पाद है. ऐसी व्यवस्था में उसका मशीनीकरण ही होगा और उसका खुद से अलगाव होना स्वाभाविक होता जाएगा. ऐसे में बुद्ध की संभावना बाधित होगी ही. जब सच आपके सामने हो. सबको सबकुछ पता हो और इसके बावजूद अपनी सीमाओं और स्वार्थों से चिपके रहने को व्यक्ति अपना लोकतांत्रिक ‘चुनाव’  का नाम दे रहा हो, ऐसी स्थिति में व्यर्थता बोध और असमर्थता बोध  अपने होने को संकटग्रस्त बना ही देता है. सच से ज्यादा जब अपने निज स्वार्थ में ‘पक्ष-विपक्ष’ महत्वपूर्ण हो जाए तब एक कवि का कहना कि

“ठीक है अब जो है यही है
चलो मैं अपने जूते के फीते बाँध लूँ
मुझे अब टहलने निकलना है.”

यह बताता है कि नई पीढ़ी के पास भरोसे का संकट गहराता जा रहा है. जहाँ व्यवस्था इतनी क्रूर और सत्ता इतनी लालची हो जाए कि वह अपने नागरिकों के शवों का भी अपने हित में प्रयोग करे वहाँ कवि को लिखना ही पड़ता है :-

“वे सबका उपयोग अपने पक्ष में कर ले रहे
मुझे डर है  वे मेरे शव का उपयोग भी

कहीं अपने पक्ष में न कर लें.”

एक तरफ आधुनिक राज्य ‘निजत्व’ को सबसे अधिक महत्व देने का पक्ष रखता है दूसरी तरफ वही राज्य ‘निजता’ का हर तरह से उपयोग अपने पक्ष में करता है. ‘इंडिविजुअल’ की ‘प्राइवेसी’ अब राज्य और उसके तंत्रों के पास है. ‘व्यक्तिकता’ एक भ्रम है अब. इसी क्रम में कवि अपने मिथकों की पड़ताल भी कर ही लेना चाहता है. वह न्याय की तलाश में समसामयिकता से मिथक की ओर जाता है और पाता है कि ‘अयोध्या से बाहर’ जो राम के पास आए, जो जुड़े सब ‘उद्धार’ की जगह ‘न्याय’ माँग रहे हैं. अहल्या कहती है:-

“मुझे पत्थर रहना मंजूर है प्रभु
पर वह दोष लेकर भटकना अस्वीकार है
अहल्या को पाषाण ही रहने दो
मुझे उद्धार नहीं चाहिए राम
मुझे न्याय चाहिए.”

शम्बूक की पत्नी, वानर और स्वयं राम को भी न्याय चाहिए. ‘न्याय’ आधुनिक शब्दावली है. न्याय में सभी दोषियों का दोष और दंड सुनिश्चित होता है. ‘उद्धार’ राजतंत्र व्यवस्था का शब्द है. इस व्यवस्था में राजा प्रायः जनता का उद्धार (कल्याण) ही करते थे. यहाँ दोषियों की तरफ ध्यान नहीं जाकर स्वयं को ‘महान’ घोषित करने की अधीरता अधिक है. ‘न्याय’ समता और जनता के अधिक निकट है और ‘उद्धार’ मालिकाना व्यवहार के. मिथकों का पाठ करते हुए यह ध्यान देना जरूरी होता है कि कवि ‘नया’ क्या कह रहा है और जो कह रहा है उसमें समकालीन यथार्थ कैसे उपस्थित हो रहा है? यदि मिथक का पुनर्पाठ पुनरुत्थान और उग्र गर्वबोध और राष्ट्रबोध को संबोधित है तब उसका बहुत महत्व नहीं रह जाता है. मिथकों का आधुनिक पाठ तब और आज की वंचित जनता के ‘पक्ष’ को स्वर नहीं दे रहा हो तब उसको ‘समकालीन यथार्थ’ नहीं कहना चाहिए. केतन ने मिथकों के पाठ के जरिये तब के पीछे छोड़ गए और उद्धार से दबे समूहों को ‘न्याय’ के लिए उठते हुए दिखाया है. वहाँ धोबिन और सीता दो छोर पर नहीं है. वे एक साथ बहनापे में हैं और अयोध्यावासियों से अपने लिए न्याय माँग रही हैं. वानर कह रहे हैं कि

“पशुओं ने तो कथाओं में मनुष्य के पक्ष में लड़ाई लड़ ली
परंतु मनुष्य ने पशुओं के अधिकार की  लड़ाई
कब लड़ी
?”

कविता का यही वह पक्ष है जो समकालीन यथार्थ से जुड़ता है और मिथकों में नया जोड़ता जाता है. इस तरह समकालीन कविता का यथार्थ, न्याय और आधुनिकता से एक रिश्ता बनता है.

कवि जब ‘न्याय’ तलाश में भाषा के सभी क्षेत्रों में आवाजाही कर रहा है तब उसका ध्यान ‘पाठक’ और ‘आलोचना’ के संबंधों पर भी जाता है. वह आलोचकों के तानाशाही और पक्षपातपूर्ण रवैये से खुश नहीं है. उसे लगता है आलोचक न्याय नहीं करते. वे अपनी सत्ता स्थापित करते हैं. उत्तर आधुनिक समय में ‘आलोचना के अंत’ और ‘हर पाठक आलोचक है’ के विचार को कवि अपने ज्यादा करीब पाता है. वह लिखता है:-

“पहले आलोचक ब्रह्मा हुआ करता था
अब मानवीय पाठक में बदल चुका है
देखने और ताड़ने के बीच का अंतर|
अब मेरे पाठक ने सीख लिया है.”

इन पंक्तियों में कवि आलोचक को ‘मानवीय पाठक’ में बदलता देख आश्वस्त है.  वह आलोचना के ‘मठाधीशी’ को ध्वस्त होते देखना चाहता है. यह होना भी चाहिए. लोकतांत्रिक प्रक्रिया तो यही है. तब सवाल है कि क्या सचमुच पाठकों ने ‘ताड़ने’ और ‘देखने’ का फर्क समझ लिया है? भारत का हिंदी प्रदेश आज भी अशिक्षा, कुशिक्षा, अर्धशिक्षा और जड़ मूल्यों से ग्रस्त है. ऐसे में बाजार और तकनीक के द्रुतगति ने एक भ्रम बनाया है कि उसकी पहुँच पाठ तक सुलभ हो गयी है और अभिव्यक्ति भी. फलस्वरूप, पाठकीय टिप्पणियों को, सूचनात्मक जानकारियों को, पेड समीक्षाओं और प्रचार सामग्रियों को सोशल मीडिया पर समीक्षा और आलोचना कहने का चलन बढ़ गया है. आलोचना प्रशंसा और प्रचार में सिमटने लगी है. राज्य और विभिन्न प्रतिक्रियावादी ताकतों ने इसे अपने तरीके से प्रयोग किया है. अब पाठ के अर्थों को विकृत होने का खतरा बढ़ा है. अब राज्य भी अपनी सुविधानुसार पाठों का अर्थ गढ़कर प्रचार करती है. कुपाठ का तो पूरा दौर ही चल रहा है. ऐसे में केवल ‘पाठकों’ के पाठ के भरोसे रचनाओं को उत्तर आधुनिक प्रभावों के कारण छोड़ देना न्यायसंगत नहीं है. आलोचना के लिए अब और ज्यादा सतर्कता और प्रशिक्षण की जरूरत है. ‘आलोचना के अंत’ की घोषणा पाठक को अराजक भी बना सकता है और आलोचना की एजेंसी को राज्य हथियाकर अपने लिए दुरुपयोग कर सकता है. ‘आलोचना का लोकतांत्रिकरण’ की जरूरत है अंत की नहीं.

 

यह संग्रह यहाँ से प्राप्त करें.

महेश कुमार
शोधार्थी(हिंदी), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस
manishpratima2599@gmail.com
Tags: 20262026 समीक्षाएक चरवाहे का गीतकेतन यादवमहेश कुमार
ShareTweetSend
Previous Post

यूनुस एमरे की कविताएँ : सरिता शर्मा

Next Post

अ डिफेन्स ऑफ पोएट्री : शेली : अनुवाद : महेश मिश्र

Related Posts

डेटा नॉट फाउंड : विजयशंकर चतुर्वेदी
कथा

डेटा नॉट फाउंड : विजयशंकर चतुर्वेदी

शिंजिनी की कविताएँ
कविता

शिंजिनी की कविताएँ

ताइवान ट्रैवलॉग:2026 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार:सरिता शर्मा
आलेख

ताइवान ट्रैवलॉग:2026 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार:सरिता शर्मा

Comments 9

  1. जावेद आलम ख़ान says:
    1 month ago

    बढ़िया समीक्षा लिखी है विशेष रूप से मिथक चर्चा. गंभीरतापूर्वक पढ़कर लिखी गई टिप्पणी है.कवि और समीक्षक दोनों को बधाई. एकाध जगह वाक्यों में लिंगदोष दिखा शायद स्थानीयता केअ असर हो और कहीं कहीं टाइपिंग एरर जो शायद संपादन से छूट गया.

    Reply
  2. Pawan karan says:
    1 month ago

    अच्छा लिखा है।

    Reply
  3. अभिषेक says:
    1 month ago

    केतन यादव की कविताएँ लोकजीवन, श्रम संस्कृति और पशुपालक समाज की स्मृतियों को समकालीन यथार्थ के साथ अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती हैं। ‘एक चरवाहे का गीत’ में चरवाहा केवल एक पेशागत पहचान नहीं रह जाता, बल्कि वह स्वायत्तता, प्रतिरोध और सामुदायिक जीवन का प्रतीक बनकर सामने आता है। कविताओं में चारागाह, मवेशी, गाँव, खेत और लोकजीवन की छवियाँ केवल स्मृति नहीं हैं, बल्कि वे बदलते समय और बाजारवादी व्यवस्था के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध का स्वर भी निर्मित करती हैं।
    महेश जी की समीक्षा शानदार है।

    Reply
  4. Amit Mandal says:
    1 month ago

    आपकी कविताओं में मिथकों का पुनर्पाठ भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अहल्या, शम्बूक, सीता और वानरों जैसे पात्रों के माध्यम से “उद्धार” के बजाय “न्याय” की माँग समकालीन लोकतांत्रिक चेतना को स्वर देती है। यह दृष्टि मिथकों को वर्तमान सामाजिक यथार्थ से जोड़ती है और उन्हें नई अर्थवत्ता प्रदान करती है।

    Reply
  5. Ayush Shukla says:
    1 month ago

    बेहद शानदार कविता संग्रह। बहुजन विमर्श का प्रतिनिधि संग्रह। समीक्षक को भी बधाई।

    Reply
  6. Anurag Gautam says:
    1 month ago

    आपकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें लोकसंस्कृति और आधुनिक समय के संकट एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं। “कंपनी की गाड़ी” जैसी छवियाँ जिस तरह ग्रामीण जीवन, संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान-व्यवस्था पर बढ़ते कॉरपोरेट नियंत्रण की ओर संकेत करती हैं, वह कविता को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करती हैं। Very nice poetry

    Reply
  7. Abhimanyu Aaryan says:
    1 month ago

    केतन यादव बधाई और साधुवाद के पात्र हैं। इतनी कम उम्र में इतना गंभीर लेखन करना मामूली बात नहीं है। केतन जी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना हैं।

    Reply
  8. विजय राही says:
    1 month ago

    केतन को इतनी कम उम्र में बेहतरीन और सघन कविताओं के साथ देखना सुख देता है लेकिन इस विकट समय के बारे में सोचकर उसकी चिंता भी करता हूं। हमको ऐसे प्रतिबद्ध कवियों की आज बेहद ज़रूरत है। महेश कुमार ने इस कविता संग्रह पर बहुत सुंदर और बहुत ज़रूरी लिखा है। ख़ासतौर से लोक और मिथकों से जुड़ी कविताओं को जैसे खोला‌ है, मेरे जैसा कोई भी पाठक उससे समृद्ध ही होगा। आलोचना का लोकतांत्रिकरण हो, यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है। महेश कुमार को पहले भी पढ़ता रहा‌ हूं, आगे भी उनके लिखे का इंतज़ार रहेगा। मेरी और से केतन यादव को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। इसे पढ़वाने के लिए समालोचन और अरुण जी का आभार।

    Reply
  9. Shambhu Yadav says:
    1 month ago

    अस्सी के दशक तब मेरी उमर आठ दस साल की होगी अपनी भैंस और गायें की चरवाही करने के लिए गाँव से बहुत दूर चले जाने का अनुभव तो है आज इनकी कविता पढ़ी तो उस उमर का उल्लास इस उमर को उल्लासित कर दिया. केतन जी परिपकवय कवि है और उतनी ही paripakavta से mahesh जी ने समीक्षा की है

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक