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Home » एक ख़ुशबू वहाँ फैली थी : निशांत उपाध्याय

एक ख़ुशबू वहाँ फैली थी : निशांत उपाध्याय

by arun dev
May 23, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 5 mins read
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एक ख़ुशबू वहाँ फैली थी : निशांत उपाध्याय
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अनंत सूर्यों का अपलक सूरजमुख
निशांत उपाध्याय

 

रुस्तम की कविता जिस पटल पर उछरना शुरू करती है, वह चेतना की ऐसी प्रतिध्वनि से जन्मता है जो समय और जीवन के सभी नियमों को रेशा-रेशा अलग कर, रुचि अनुरूप ढाल देने को प्रेरित है. नाद की परिधि पर बल खाते स्वर-कण की प्रकृति को प्रतिबिंबित करता संगीत इन कविताओं के हिस्से आता है. परस्पर दूर दिखाई देती प्रवृत्तियाँ, स्थिर और जीवंत, रुस्तम के कविताकाश में तरंगित हो एक-दूसरे में घुल जाती हैं. इस कवि की सृष्टि में समय का पारावार इतना वृहद और प्रशांत है कि हर बिम्ब समय की सूक्ष्मता में अपनी सृष्टि रचता है. कमरे में व्याप्त धूल के कणों की तरह रुस्तम की कविताएं और उनके बिम्ब, अनेक होते हुए एक और एक होते हुए अनेक बने रहने का सामर्थ्य प्राप्त किए हुए हैं. यह सामर्थ्य कवि की जीवनरत चेष्टाओं से अपना प्रवाह पाता है.

रुस्तम सिंह

कविता की चेष्टा हमारे मानस में उस बिंदु पर दस्तक देती है जहाँ चेतना अपने निजी यथार्थ से उमगी अनुभूतियों के लेंस से उसी यथार्थ का पुनर्पाठ करने की दिशा रोशन करती है. कवि रुस्तम ने स्व से सतत संवाद के सिलसिले में वह रोशनी अख्तियार की है जो अंधेरे को रेखांकित करते हुए उसे अंधेरा बना रहने देती है. मूल प्रवृत्ति पर हस्तक्षेप की अनाधिकृत चेष्टा तज बैठी यह रोशनी कवि की उस प्रार्थना की संतति है जो ब्रह्मांड में “जो है और जैसा है” को यथावत बनाए रखने के पक्ष में है, बचाए रखने के पक्ष में है. कवि जानता है कि मानवीय हस्तक्षेप के बाद कुछ भी नहीं बचता, बदल जाता है.

अपने नवीनतम काव्य संग्रह में रुस्तम अपने शिल्प और कल्पना के चरमोत्कर्ष को प्राप्त करते प्रतीत होते हैं. प्रथमदृष्टया सीधे-सादे वाक्यों के झुरमुट-सी दिखतीं उनकी रचनाएँ अपने भीतर सुघड़ तंतुओं की बारीक कारीगरी से अपना सौष्ठव प्राप्त करती हैं. इस कारीगरी के दर्शन गहन पड़ताल से नहीं किए जा सकते. गहनता अपने साथ भार की संभावना लाद लाती है. इन कविताओं के पारदर्शी वजूद में भार आर-पार हो जाता है और कविता क्षणिक स्फुटित होती है. बरक्स इसके, अगर आप अपने पूर्वाग्रह-अनुभव-स्मृति तज किसी फाहे की तरह रुस्तम के कवितालोक में ठहर जायें, तब उनकी कविता में व्याप्त स्पंदन अपनी तमाम संभावनाओं में दैदीप्यमान होता है. पानी कदमों को रास्ता दे देता है, किसी के होने का भ्रम छुअन पाता है और उंगलियाँ मरु में बदल जाती हैं. यहाँ जादू किसी उबाऊ शोर के साथ प्रकट नहीं होता है, प्रकृति में व्याप्त प्राचीन नियमों की ज़र्रा-ज़र्रा उपस्थिति सदृश निःसंकोच सहजता के साथ हिलोरें लेता है:

भूरी-काली मिट्टी उसके दोनों तरफ थी.
बल खाती वह राह
उस झील में
जा मिली
जो लाल पर्वतों से घिरी हुई थी.
झील में भी उस राह पर मैं चलता चला गया.
मेरे आगे-आगे झील फटती जा रही थी.

यही सहजता कवि के भाषा बरतने में उपस्थित बनी रहती है. रुस्तम सीधे वाक्यों और लौकिक दृश्यों के बीच सिर्फ एक पंक्ति से तिलिस्म उजागर करने की सरस सक्षमता लिए हुए हैं. यह तिलिस्म का बिंदु उनकी कविताओं में शुरुआत से लेकर अंत तक एकाधिक जगह प्रकट होता है. कविता के इस शिल्प का यह प्रभाव भी दिखता है कि पाठक कविता के बीच से ही दोबारा कविता शुरू करने की इच्छा महसूस करता है. कविता के एक ही पाठ में पुनर्पाठ का शालीन आग्रह घुला होना इस बात की तसदीक है कि रुस्तम अपनी कविताओं को ईंट दर ईंट खड़ा करते हैं. यह उनकी कलम की सफाई है कि ऐसे पूर्व नियोजित तिलिस्मी बिंदु कहीं से भी कविता की रचना प्रक्रिया उजागर करने से बचते दिखाई देते हैं. वह सिर्फ अपने होने में सम्पूर्ण कविता में किसी भी तरह की ज़ोरआजमाइश की शून्यता की तरफ ही इशारा करते दिखते हैं. कविता का नैसर्गिक ओज ज़ाया नहीं करते.

यहाँ यह रेखांकित करना ज़रूरी है कि सीधे वाक्यों की अधिकाधिक उपस्थिति सपाट भाषा की द्योतक नहीं है. उलट इसके, कवि रुस्तम की भाषा निजी और नित परिवर्तनीय है. व्याकरण के व्योम में आमूलचूल परिवर्तन ना करते हुए भी वे उसको अपने हिसाब से ढाल लेने की कोशिश करते दिखाई देते हैं. इसमें वे पारंपरिक किताबी सर्वनामों के लोक-प्रचलित संस्करणों का उपयोग करने और वस्तुनिष्ठ संज्ञा का लिंग-बोध पलटने से गुरेज नहीं करते हैं:

यूँ लगता है कि सारे पत्ते झर गये हैं.
मेरे पैरों के नीचे वे चरमरा रहे हैं.
लो! मैं बेंच पर बैठ गया हूँ.
तुमने
किसी और दुनिया से आना है.
यह पार्क
एक दमक से भर जायेगी
जब तुम उतरोगी.
तुम्हारे होंठों पर दैवीय एक मुस्कान होगी.
तुम्हारे साथ ही मैं उड़ कर चला जाऊंगा.

“तुमने….आना है” में ‘तुमने’ का ऐसा प्रयोग इस कवि के अवचेतन में पैठी प्रांत और क्षेत्रीय भाषा की अनुगूँज तक हमारे कान पहुँचाता है. उत्तर-पश्चिमी भारत से सरककर नागरी में जगह बनाता ‘तुमने’ और इसी तरह के समानांतर प्रयोग कवि के भाषा से निजी संबंध की वजह से प्राकट्य पाते हैं. इस वजह से रुस्तम की कविताओं के संगीत की पूर्णता में वह अनुनासिक स्वरलहरी आवश्यक तत्व है जो राजस्थान, पंजाब, दिल्ली इत्यादि भू-भागों में स्वत: चली आती है. समय और यथार्थ के आर-पार जाती कविताओं में उपस्थित अनुनासिक स्वर कवि की स्थानीयता के छींटों की जगह बनाता चलता है. वह स्थानीयता जिसे यह कवि ब्रह्माण्ड का नागरिक बनते जाने की चेष्टा में छुपाए-दबाये चलता है, पर मनुष्य और स्मृति के चिर-नृत्य में निरुपाय उसे अपनी कविताओं में रिसने भी देता है.

ठीक इसी तरह रुस्तम की कविताओं में शब्द-संयोजन को भी लक्षित और उद्घाटित किया जा सकता है. वे शब्दों को इस क्रम में रखते हैं कि उन्हें पढ़ते हुए पाठक भी कविता की मद्धिम लय को आत्मसात कर पायें. इन कविताओं में त्रासद और वीभत्स बिंब भी आक्रांत दुंदुभि के संगीत से सुनाई नहीं देते. वे अपनी मद्धिम लय और कोमल स्वर में इस तरह उच्चारित होते हैं कि कविता में प्रकट दृश्य अपने ही दर्शन से कलुषित होने से बचे रहते हैं. मितभाषी कविताओं के कवि रुस्तम इस जानिब भी विरले जान पड़ते हैं कि उनकी कविताओं का संगीत ठीक उनकी बातों के संगीत से मेल खाता है. यह अनुनाद इंगित करता है कि कविता गढ़ते वक्त कवि अतिरंजित नाटकीयता के प्रलोभन से खुद को बचा ले जाता है और किसी घड़ी सुधारने वाले वृद्ध की तरह अपनी कविताओं को हौले स्पर्श से आकार प्रदान करता है:

जो असम्भव था वह असम्भव ही रहा.
मैं अब भी उस तक पहुँच नहीं पाया.
हरे से लाल, लाल से नीला, नीले से भूरा और पीला —
कितने रंग आकर चले गये.
उनमें से
एक भी रंग को मैं अब तक पकड़ नहीं पाया.

यह हौला स्पर्श रुस्तम की कविताओं को सुदृढ़ नींव भी प्रदान करता है. इस वजह से इन कविताओं में तमाम फैंटेसी घुली होने के बावजूद उस फैंटेसी के लिए ज़मीन तैयार करने की जरूरत नहीं जान पड़ती. कविता समय के किसी औचक बिंदु से अनायास ही शुरू होती दिखती है और अंतिम बिंदु भी आखिरी बिंदु नहीं महसूस होता है. कविता में अ-लिखा भी लिखे हुए शब्दों की ही एक्सटेंशन की तरह व्याप्त बना रहता है. इसे यूं भी कहा जा सकता है कि रुस्तम की कविताओं के इर्दगिर्द पहले-बाद का खाली स्पेस उस विराट मौन और समय का रूपक दिखाई देता है जिसके भीतर चुनिंदा क्षणों में ये कविताएं घटित होती हैं.

इस संग्रह को पढ़ते वक्त जब सिलसिलेवार कविताएं हम पर तारी होती हैं, यह अहसास जोर पकड़ने लगता है कि सभी कविताएं पृथक नहीं बल्कि समय के कैनवास पर अनवरत गढ़ी जा रहीं बिम्ब-माला हैं. विभिन्न सदियों में घटित, विभिन्न प्रजातियों द्वारा अनुभूत, साकार से निराकार तक. ये कविताएं मिलकर एक अनगढ़ रेखाचित्र बनाती चलती हैं. यह रेखाचित्र टाइम-स्पेस के पृथक बिंदुओं को जोड़कर भी असल में उन बिंदुओं के परे फैले अथाह भावी अंतरिक्ष को रेखांकित कर रहे होते हैं. कविताओं में यह संभावना कवि के वैज्ञानिक दृष्टिकोण की तरफ भी इंगित करती है. वह बताती है कि कवि सिर्फ भावनाओं को तरजीह न देते हुए भौतिकी के नियमों की समझ भी रखता है और जानता है कि प्राय: जो यथार्थ महसूस होता है, वह उसका अंश-भर है.

सिलसिलेवार कविता पढ़ने के क्रम में इस संग्रह का एक और पक्ष गौरतलब है. इस संग्रह में तीन-चार कविताएं ऐसी हैं जो अपने नितांत एकांत में क्लीशे ख्यालों की ज़मीन पर ही हैं. सूक्तियों सी सुलभता ली हुई ये कविताएँ बेहद आम कह कर दरकिनार की जा सकती हैं, लेकिन यही कविताएं जब संग्रह के सिलसिले में पाठक को मिलती हैं तो अपने विशिष्ट आभामंडल को साथ लिए दिखती हैं. जो तिलिस्म और नवाचार अधिकतर कविताओं में सहज प्राप्य है, उसी की परछाईं इन अपेक्षाकृत साधारण कविताओं को नैसर्गिक कलेवर प्रदान करती है. इस प्रभाव के गोचर होना इस तथ्य की पुष्टि करता है कि कविता कोई स्थूल शब्द संयोजन भर नहीं, बल्कि ऐसी जीवंत उपस्थिति है जो वृक्षों की तरह अपने इर्दगिर्द उपस्थित कविताओं से ना सिर्फ राब्ता रखती है, बल्कि उनके साथ तारतम्य से अपना ऐसा पाठ भी रचती है जो कवि के चैतन्य से परे भी संभव है:

तुम चले नहीं जाना.
मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँगी?
कितने लोग चले जाते हैं.
फिर लौटकर नहीं आते हैं.
जैसे कई दुनियाएँ हों.
और उनके बीच की दीवार कहीं से टूट जाये.
कोई भटकता हुआ उस तरफ़ चला जाये
और वापिस लौटने की जगह नहीं ढूँढ पाये.

कविता में पृष्ठभूमि की आवश्यकता को न्यूनतम पर सीमित करते हुए जिस तरह के दृश्य रुस्तम रचते हैं, वे उस दृष्टि से मुकम्मल हो पाते हैं जिसका स्वामी हर दफे बदल रहा है. यह कवि की संभावित संयमित साधना और कल्पना के आलोक का कमाल है कि कवि का ‘मैं’ अपनी दैहिक-सामाजिक उपस्थिति तक सीमित नहीं है. कविता सिर्फ मनुष्य के हवाले से ना होते हुए, विभिन्न चल-अचल तत्वों की जानिब से भी अपनी बात दर्ज करती चली जाती है. इसी कोशिश में कुछ जगह कवि स्त्री का रुप धर कविता कहता है तो अनजाने ही सूफी-भक्ति परंपरा के अथाह समंदर में एक महीन धारा की तरह जुड़ता है. अपने स्वाभाविक ‘स्व’ के परे चले जाने का यह कौशल ही वह कारण है कि रुस्तम की कविताओं में मृत भी मृत से बात कर पाते हैं, उनके लिए कविता कह पाते हैं:

उस दिन
जब सब लोग
अपनी क़ब्रों में से उठेंगे,
हम देखेंगे कितनी सदियों से हम साथ-साथ पड़े हुए थे.

कवि के परकाया प्रवेश की यह दक्षता अपने उरूज़ पर तब दिखती है जब कवि मनुष्येतर जीवों के भी परे, पत्थर और चट्टान की संवेदनाओं-कल्पनाओं-अनुभूतियों को आवाज़ देते दिखायी देते हैं. यहाँ भी रुस्तम उस प्राचीन जगत दर्शन को टेर लगाते दिखते हैं जहाँ चेतना विभिन्न स्तरों पर कण-कण में जीवंत है. यही वह मुख्य कारण बनता है कि रुस्तम पत्थर, उजाड़, वीराने, मरुस्थल इत्यादि जैसे पारंपरिक तौर पर रूखे शब्दों व दृश्यों को अपनी प्रेम पगी दृष्टि की छाँव देने में सफल होते हैं. विषाद से लबालब तस्वीर उकेरते हुए भी कवि उसके सौंदर्य का विशेष ध्यान रखता चलता है. दरअसल इस मितभाषी कवि का सौंदर्य-दर्शन अपने मूल में वही रिक्त चुप्पी पाये हुए है जो विश्वयुद्ध के बाद के दशकों में यूरोपीय सिनेमा में पसरी दिखायी देती है. अपनी प्रवृत्ति के प्रभाव में कवि दक्षिण एशियाई वाचालता से बचता-छुपता रहता है और यह मनोवृत्ति बढ़ते हुए उस मुकाम तक भी पहुँच जाती है जहाँ इस संग्रह के कविता-संसार में कब्रिस्तान की भीषण चुप्पी भी आरामगाह जान पड़ती है. यह पाश्चात्य प्रभाव कवि के ‘ड्रैगन’ के साथ संबंध में भी रेखांकित होता है जो उनकी कविताओं में बरबस चले आते हैं. यह घटित होते देखना, कल्पना के सहारे स्व के लोकैल को बदलने की संभावना के तौर पर, निस्संदेह दर्शनीय है:

इन खंडहरों में कितना अच्छा है!
जो बीत गया, जो ढह गया वही सुन्दर है.
इन कब्रगाहों में मैं रह सकता हूँ.
मृतक मुझे परेशान नहीं करते;
चुपचाप पड़े रहते हैं.

इस संग्रह की कविताओं में ‘मैं’ के अलावा प्रयुक्त अन्य सर्वनाम भी संभावनाशील वितान के साथ उपस्थित होते हैं. यहाँ ‘तुम’ का प्रयोग इस तरह किया गया है कि लक्षित पात्र स्पष्ट ना होने पाये या उसके अनेक अक्स साथ ही पाठक पर उजागर हों. ‘वह‘ सर्वनाम का प्रयोग कवि के उत्कृष्ट काव्य-कौशलों में से है. ‘वह’ कवि की अंजुली में रहस्यमी धुंध की तरह उमड़ता है जिससे वह अनिश्चितता का एक रोशन स्पेक्ट्रम कविता में टांक पाता है. इसी तरह, रुस्तम का ‘हम’ अपने भीतर के सभी अर्थों को एक साथ गुंजायमान करता चलता है. इसके प्रयोग से कविता किस्से से सलाह से चेतावनी से प्रार्थना तक चलती चली जाती है और बीच-बीच में अपनी तासीर से मार्कस औरेलियस की अस्पष्ट-सी याद को आमंत्रण देती जान पड़ती है:

हम लौटेंगे नहीं.
पीठ मुड़ेगी हमारी
इस ओर.
पैर चलने लगेंगे.
पीछे मुड़कर
देखेंगी नहीं
हमारी आँखें.

रुस्तम की कविता का सम्पूर्ण अवलोकन उनकी विश्व-दृष्टि और प्रकृति-प्रेम को छुए बिना नहीं किया जा सकता है. कवि के जीवन और काव्य में प्रकृति, अपने तमाम तत्वों के साथ, अपरिहार्य है. इन कविताओं के उद्गम और प्रवाह में मनुष्येतर जीवों के प्रति संवेदनशीलता और प्रेम इस कदर घुला हुआ है कि कवि चमगादड़ और कीड़े-मकोड़े जैसे प्राणियों को भी वही सौंदर्य बख्शता है जो अमूमन मानव-जाति के तथाकथित ‘प्रिय और खूबसूरत’ प्राणियों को ही मयस्सर होता है. इस प्रेम की वेदिका पर रुस्तम की राजनीतिक चेतना अपनी आँच पाती है. समस्त प्राणियों के प्रति समतामूलक व्यहवार का आकांक्षी कवि उन्मादी नारेबाजी की बजाय समस्त प्राणियों और वस्तुओं के प्रति संवेदना जगाने का प्रयास अपने काव्य कौशल से करता है. साथ ही, यहाँ यह जोड़ना आवश्यक है कि दर्शन और फंतासी का कलेवर ली ये कविताएं कवि के प्रेम-मूल्यों को नवरस में स्थापित करती है.

इस संग्रह की अधिकतर कविताएं अपनी तमाम शक्लों में एक शक्ल प्रेम कविता की भी ली हुई हैं. ऐसे समय में जब महिलाओं के प्रति कुंठा और दानवी यौन पिपासा अपने चरम पर है, तब इन कविताओं को रचते प्रेमिल हृदय की भूमिका राजनीतिक रंग में ही अपने दर्शन देती है. वह प्रेमी जो नायिका के भ्रम तक को छूना चाहता है, उसके आने पर उसको नजरअंदाज भी करना चाहता है, उसके ना होने को भी जी लेना चाहता है, वही प्रेमी उसके घाघरे से झांकते दो हजार टखने गिनने में खुश है, उसकी स्मृतियों के पुनर्कथन में मशगूल है और उसे अपनी निज यात्रा में उसे छोड़ आगे बढ़ जाने को भी प्रेरित करता है. भारतीय पुरुषों में, दुर्भाग्यवश, जो समतामूलक प्रेमिल दृष्टि अपनी महिला साथियों के लिए नहीं पाई जाती है, वह इन कविताओं में नितांत सहजता के साथ उपस्थित है. कवि अपने प्रेम के उच्चारण को इस सलीके के साथ करता है जिससे उसकी नायिका (अगर वह है) का निज अतिक्रमित ना हो. यह दिलचस्प है कि जो कवि इस दुनियावी प्रहसन से अकल्पनीय ऊब का मारा महसूस करता है, वही अपने साथी के प्रति प्रेम-ज्वार की गुनगुनी तपिश में सलिल आकर्षण को निरंतर जीना चाहता है. इन कविताओं का एक आवश्यक पाठ यह भी बनता है कि प्रचलित जहरीली मर्दानगी और प्रेम में अनवरत घुसपैठ करती असुरक्षाओं से लबालब समय में इन्हें सहचर प्रेम के मूल स्वरूप की तरफ इशारे की तरह पढ़ा जाये:

तुम सो रही थीं.
मैं चला गया.
जाने से पहले मैंने तुम्हारे कान में फुसफुसाया:
मन में, तन में प्रेम उमड़े तो उसे रोकना नहीं.
जल्द ही तुम मुझे भूल जाओगी.

ये कविताएँ  अपने पाठ में इस तथ्य की द्योतक भी जान पड़ती हैं कि कवि अपनी दैनिक दिनचर्या में देखे-सुने-छुए जीवन दृश्यों को बारम्बार अपने भीतर तब तक जीता है जब तक उस साधारण में अव्यक्त असाधारण को जीवित न कर दे. इस तथ्य की बानगी रंग, संख्या और स्पर्श केंद्रित विशेषणों की सुनियोजित उपस्थिति बयान करती दिखती है. यह तभी संभव है जब कवि निरंतर यथार्थ के विभिन्न हिस्सों को प्रत्यक्ष के आगे जीने में प्रयासरत हो. इस कारण कहा जा सकता है कि रुस्तम का कविता-कर्म उनके इस प्रयास में साझेदार है जिसमें वह इस जीवन के भीतर इसी जीवन से बचने इसी जीवन को बारम्बार परिभाषित करते रहते हैं. लौकिक के प्रति जो उदार ऊब कवि के भीतर लौकिक ने पोषित की है, उससे निजात पाने कवि उन्हीं चार द्वारों को चुनता है जिनसे कविता मनुष्य के भीतर प्रवेश करती है —- स्वप्न, कल्पना, स्मृति और अनुभव. इन चार द्वारों से रुस्तम वह रास्ते बनाते हैं जो उन्हें अपने भीतर के भीतर जाते हुए दूर बाहर निकल जाने की सहूलियत देते हैं.

इन रास्तों पर निरंतर चलते रुस्तम अपने कवि रूप में वह सूरजमुखी हैं जो एक ही समय में अनंत सूर्यों से अपलक मुखातिब बना रहता है. यह संग्रह उस सूरजमुखी का सहोदर है.

यह संग्रह यहाँ से प्राप्त करें

एक ख़ुशबू वहाँ फैली थी
रुस्तम
सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
संस्करण: २०२६
मूल्य: 300 रुपये मात्र

 

निशांत उपाध्याय कवि, लेखक, आलोचक एवं कला शिक्षक हैं. उनकी कविताएँ, कहानियाँ एवं लेख पत्र-पत्रिकाओं में पिछले कई वर्षों से प्रकाशित होते रहे हैं. वे चर्चित पत्रिका “वनमाली कथा” के सहायक सम्पादक रह चुके हैं. वे कविता और कहानी लिखने की वर्कशॉप भी लेते हैं. निशांत वरिष्ठ कलाकारों से बातचीत के लिए भी जाने जाते हैं और अभी तक 40 से अधिक ऐसे संवाद कर चुके हैं.

nupadhyay37@gmail.com

Tags: 20262026 समीक्षाएक ख़ुशबू वहाँ फैली थीनिशांत उपाध्यायरुस्तम
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Comments 1

  1. तेजी ग्रोवर says:
    4 weeks ago

    निशान्त उन विरल लेखकों में से है जो टेक्स्ट के भीतर से ही मनन बिंदु खोजता है, बाह्य paradigms से नहीं। इन कविताओं पर उसका मनन उत्कृष्ट दर्शन सामर्थ्य का द्योतक है, जो केवल उसी पाठ से अर्जित हुआ है जो उसके सामने है। फिर भी उस मनन में अपनी एक अनूठी विश्वदृष्टि भी है जो उसके समस्त लेखन में व्याप्त है।

    ऐसे आलोचक कम ही होते हैं।

    Arun Aditya ने भी इस पुस्तक में ऐसे ही डूब कर लिखा है। मैं उस पाठ को अगर Nishant Upadhyay की इस टेक्स्ट के साथ रख कर पढूँ तो मुझे लगता है इन दोनों ने इन कविताओं के साथ एक ऐसी बीहड़ यात्रा सम्पन्न की है जो मुझे कमोबेश उतना ही विस्मित करती है, जितना रुस्तम की ये कविताएँ।

    Arun Dev सही कहते हैं कि “यह प्रेम-पथ अब तक अदेखा ही था”. मेरे लिए *ख़ुशबू* के कवि के साथ स्पेस शेयर करना हाड़ कंपा देने वाला अनुभव है।

    मैं इन कविताओं की एक ऐसी पाठक हूँ जिसकी जगह कोई और होता तो शायद वह प्रेम के इस अदेखे पथ पर कवि की यात्रा का साक्षी होने की प्रक्रिया में ख़ुद एक छाया में बदल जाता।

    लेकिन क्या पता मैं छाया में ढल चुकी होऊँ!!!!

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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