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Home » फुटबॉल और हिन्दी-जगत : शुभनीत कौशिक

फुटबॉल और हिन्दी-जगत : शुभनीत कौशिक

by arun dev
June 23, 2026
in आलेख
Reading Time: 6 mins read
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फुटबॉल और हिन्दी-जगत : शुभनीत कौशिक
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फुटबॉल और हिन्दी-जगत

शुभनीत कौशिक

उन्नीसवीं सदी में जब भारत में फुटबॉल, हॉकी और क्रिकेट जैसे खेलों की आमद हुई तो उन्हें प्रायः यूरोपीय/पश्चिमी खेल के रूप में देखा गया. और जैसा अक्सर होता है शुरू में भारतीयों ने उन खेलों की उपेक्षा भी की. मगर धीरे-धीरे इन खेलों को भारतीयों ने अपना लिया. एक समय वह भी आया कि वे इन खेलों में अंग्रेज़ों को बढ़-चढ़कर टक्कर देने लगे. बंगाल जैसे प्रांत में तो फुटबॉल की लोकप्रियता किसी अन्य खेल के मुक़ाबले कहीं ज़्यादे थी.

सरकारी स्कूल-कॉलेजों और बोर्डिंग हाउस आदि में फुटबॉल, हॉकी और क्रिकेट जैसे खेलों पर ज़ोर दिए जाने की वजह से भी भारतीय युवाओं के बीच इनकी लोकप्रियता बढ़ी. इस संदर्भ में लिखते हुए खेल इतिहास के पुरोधा जे.ए. मंगन ने अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘गेम्स एथिक एंड इम्पीरियलिज़्म’ में क्रिकेट जैसे खेलों को ब्रिटिश साम्राज्य के नैतिक औज़ार और उपनिवेशों के देशज अभिजात वर्ग के अंग्रेज़ीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ज़रूरी समझे गए सांस्कृतिक औज़ार के रूप में देखा है.[1] वे यह भी बताते हैं कि खेलों से जुड़ी औपनिवेशिक नैतिकता के साँचे में भी उपनिवेशों के लोगों द्वारा अपने देशज सरोकारों के अनुरूप अनुकूलन, समायोजन और फेरबदल किए जा रहे थे, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.

वहीं दूसरी ओर क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेलों के संदर्भ में लिखते हुए इतिहासकार कौशिक बंद्योपाध्याय ने उन्हें राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता और जन-संस्कृति के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले कारक के रूप में भी देखा है.[2] इन खेलों के इस दूसरे पक्ष की ओर इशारा करते हुए इतिहासकार बोरिया मजूमदार ने कहा है कि इन औपनिवेशिक खेलों को सिर्फ़ उपनिवेशवाद के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा! हमें यह भी देखना होगा कि कैसे इन खेलों का देशीकरण और रूपांतरण हो रहा था और कैसे यह खेल राष्ट्रवाद के देशी ब्रांड के रूप में उभर रहे थे.[3]

वर्ष 1911 में फुटबॉल की चर्चित प्रतियोगिता आई.एफ़.ए. शील्ड के फ़ाइनल में मोहन बागान क्लब की ऐतिहासिक विजय के उदाहरण से बोरिया मजूमदार ने दिखाया है कि अंग्रेज़ी और बांग्ला की पत्र-पत्रिकाओं में फुटबॉल जैसे खेल के कवरेज में कितना अंतर था. जहाँ अंग्रेज़ी के पत्र मोहन बागान की उस विजय को औपनिवेशिक परियोजना की सफलता के रूप में देख रहे थे, वहीं बांग्ला के पत्रों ने उस जीत को भारतीय राष्ट्रवाद की मुखर अभिव्यक्ति के रूप में देखा.

 

 

हिंदी में फुटबॉल 

भारतीय उपमहाद्वीप में फुटबॉल जैसे खेलों की इस प्रभावशाली उपस्थिति से उत्तर भारत का हिंदीभाषी संसार भी अछूता न था. अकारण नहीं कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में ही फुटबॉल पर पहले-पहल हिंदी में किताबें लिखी गईं. फुटबॉल पर लिखी हिंदी की इन शुरुआती पुस्तकों में खेल से जुड़े नियमों पर निरपवाद रूप से ज़ोर दिया जाता था. कुछ किताबें तो सीधे-सीधे खेलों की नियमावलियाँ ही हैं. जैसे कालिदास माणिक ने ‘फुटबॉल का खेल’ शीर्षक से पुस्तक लिखी थी, जो वर्ष 1908 में बाबू माधो प्रसाद ने बनारस से छापी थी. बीसवीं सदी के आरम्भिक वर्षों में उत्तर भारत के शहरों-क़स्बों में फुटबॉल की लोकप्रियता के संदर्भ में कालिदास माणिक ने लिखा है कि

अब यह खेल गाँव गाँव, नगर नगर में फैल गया है हर सनीचर को गोल के गोल लड़के फुटबॉल मैच देखने के लिए आते जाते सड़क पर दिखाई देते हैं – कभी कभी भीड़ ऐसी हो जाती है कि खेल का मैदान बालवृद्ध और युवा सज्जनों से भर जाता है सभी हार जीत होने पर हर्ष विषाद प्रगट करते हैं तमाम रास्ते फुटबॉल ही की कथा गाते जाते हैं.[4]

कालिदास माणिक ने फुटबॉल में दिलचस्पी रखने वाले युवाओं को यह किताब पढ़कर फुटबॉल खेल के नियम जानने की सलाह दी. साथ ही कुछ ‘आवश्यक उपदेश’ भी दिए. मसलन, खेल की पोशाक में ही मैदान में उतरना, रेफ़री से प्रतिवाद न करना, कप्तान की इज़्ज़त करना, खेलते वक़्त अधिक बोलने से बचना, मैच खेलने से पहले अपने को न थकाना, दर्शकों के हर्ष विषाद पर ध्यान न देना, हार जाने पर हिम्मत न हारना और न ही जीतने पर फूल कर कुप्पा होना. आगे इस किताब में उन्होंने फुटबॉल टीम में गोलकीपर, फ़ारवर्ड, बैक, हाफ़ बैक के महत्त्व को बताया है. साथ ही, वे प्लेस किक, फ़्री किक, हैंडलिंग, ट्रिपिंग और होल्डिंग जैसे फुटबॉल के तकनीकी शब्दों की भी चर्चा करते हैं.

इस किताब के छपने के क़रीब तीन दशक बाद बम्बहादुर सिंह नेपाली की किताब ‘फुटबॉल की नियमावली’ प्रकाशित हुई. स्वयं फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी रहे बम्बहादुर सिंह नेपाली हिंदी के प्रसिद्ध कवि-साहित्यकार गोपाल सिंह नेपाली (1911-1963) के छोटे भाई थे, जो ‘सुधा’, ‘चित्रपट’, ‘योगी’ जैसी पत्रिकाओं के सम्पादन से जुड़े रहे थे और बेतिया राज प्रेस के व्यस्थापक भी रहे थे. ख़ुद बम्बहादुर सिंह भी चम्पारन हिंदी-साहित्य-सम्मेलन के संयुक्त-मंत्री रहे थे. बम्बहादुर सिंह नेपाली ‘मगन’ ने फुटबॉल पर दो पुस्तकें लिखी थीं. उनकी पहली पुस्तक थी ‘फुटबॉल की नियमावली’, जो वर्ष 1936 में छपी थी. जिसे छपरा के वाणी-मंदिर प्रेस के संचालक मंगलप्रसाद सिंह ने छापा था.[5] उल्लेखनीय है कि बम्बहादुर सिंह ने इस किताब में उस दौर में छपरा में होने वाले फुटबॉल टूर्नामेंट का उल्लेख किया है. जिससे फुटबॉल की लोकप्रियता और उसके प्रसार का पता चलता है.

बम्बहादुर सिंह की उक्त किताब के आरम्भ में अंग्रेज़ी का एक उद्धरण छपा है, जिसमें खेलों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पर ज़ोर दिया गया है और कहा गया है कि प्रतिस्पर्धा की जगह ईर्ष्या, विद्वेष या झगड़े को खेलों में क़तई जगह नहीं मिलनी चाहिए. फुटबॉल के महत्त्व पर ज़ोर देते हुए बम्बहादुर सिंह ने लिखा है कि

‘यों तो दुनिया में बहुत से नए-पुराने और देशी-विदेशी खेल निकले हैं, परन्तु जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति फुटबॉल को प्राप्त हैं, वह दुनिया के और किसी भी खेल को नहीं.’[6]

भारत में फुटबॉल के व्यापक प्रसार के संदर्भ में बम्बहादुर सिंह ने लिखा कि ‘आज हमारे यहाँ मुश्किल से एक-आध ही ऐसे गाँव, क़स्बा और शहर मिलेंगे, जहाँ यह खेल न खेला जाता हो.’ उन्होंने भी खिलाड़ियों से ‘सच्चा स्पोर्ट्समैन’ बनने का आग्रह किया यानी ऐसा खिलाड़ी जो जीतने हारने पर एकसा बना रहे और हारने पर हिम्मत न हारे.

फुटबॉल पर ही बम्बहादुर सिंह की दूसरी किताब वर्ष 1939 में बाँकीपुर से छपी थी. जिसकी भूमिका कवि गोपाल सिंह नेपाली ने लिखी थी. फुटबॉल को भारत में अपनाए जाने के संदर्भ में गोपाल सिंह नेपाली ने लिखा कि ‘इस खेल का वर्तमान रूप विदेशी तो है, मगर हमारे जीवन के खेल-कौतुकों में यह इस तरह से घुल-मिल गया है कि स्वदेशी-विदेशी की कोई भावना आड़े नहीं आती.’[7]

इस किताब में फुटबॉल की नियमावली के साथ ही फुटबॉल के खिलाड़ियों को आचार-व्यवहार, खेलने की ड्रेस, खान-पान की सजगता के संदर्भ में भी ज़रूरी निर्देश दिए गए थे. पुस्तक को लिखने की आवश्यकता के संदर्भ में बम्बहादुर सिंह ने लिखा कि इसके ज़रिए वे हिंदी में खेल सम्बन्धी साहित्य के अभाव की पूर्ति करना चाहते हैं. बक़ौल बम्बहादुर सिंह :

वर्षों से मेरी इच्छा थी कि मैं मातृभाषा हिंदी में फुटबॉल की एक अच्छी-सी पुस्तक भेंट करूँ. यों तो अंग्रेज़ी साहित्य में इस विषय की दर्जनों पुस्तकें मौजूद हैं. पर यह हमारी हिंदी की बदक़िस्मती है कि उसके साहित्य में स्पोर्ट्स विषय की पुस्तकों का सर्वथा अभाव है, एक भी पुस्तक नहीं है. यही वजह है कि हमारे अंग्रेज़ी आदि भाषा न जानने वाले, फुटबॉलर स्पोर्ट्स अथवा फुटबॉल, हॉकी, टेनिस आदि खेल-कूदों में यथेष्ट निपुण नहीं होते.  इन्हीं भावों से मजबूर होकर मैंने इस पर अपनी कलम उठायी है.[8]

 

 

 

फुटबॉल, प्रेमचंद और निराला

एक ओर जहाँ फुटबॉल पर किताबें लिखी जा रही थीं और आम लोगों, ख़ासकर युवाओं में यह खेल लोकप्रिय हो रहा था. वहीं दूसरी ओर फुटबॉल का खेल और उसका मैदान साम्राज्यवाद के विरोध में भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति का माध्यम भी बन रहा था. इतिहासकार पार्थ चटर्जी ने बंगाल के संदर्भ में लिखते हुए बीसवीं सदी के आरम्भ में बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन के उभार, उग्र राष्ट्रवाद और फुटबॉल के खेल के जुड़ाव को रेखांकित किया है.[9]

कथाकार प्रेमचंद के जीवन में भी फुटबॉल से जुड़े एक ऐसे ही वाक़ये का ज़िक्र अमृतराय ने प्रेमचंद की चर्चित जीवनी ‘कलम का सिपाही’ में किया है. बीस वर्षीय प्रेमचंद (तब नवाब राय) चुनार के एक मिशन स्कूल में उस समय अध्यापक थे. चुनार में ही तब सेना की छावनी भी थी. गोरे सैनिकों की एक टीम से चुनार के स्कूल की टीम का फुटबॉल मैच हुआ. जिसमें गोरे हार गए और स्कूल के लड़कों ने ‘हिप-हिप-हुर्रे’ का नारा लगाया. जिससे चिढ़कर एक गोरे ने क्रोध में आकर स्कूली टीम के एक खिलाड़ी को बूट से ठोकर मार दी. प्रेमचंद भी मैच देख रहे थे. इस अपमान से उसका खून खौल गया. उन्होंने मैदान में गड़ी एक झंडी उखाड़ी और उस गोरे पर पिल पड़े. बाद में सभी ने उस गोरे की अच्छी धुनाई की. अन्याय का विरोध करने की इस प्रवृत्ति के कारण पाँच-छह महीने के भीतर ही आख़िरकार प्रेमचंद को एक दूसरे प्रसंग में चुनार के उस स्कूल से हटना पड़ा.[10]

उनके जीवन में घटित इस वाक़ये के अलावा प्रेमचंद की कुछ कहानियों में भी फुटबॉल का ज़िक्र आता है. मसलन, ‘विनोद’ शीर्षक वाली कहानी में प्रेमचंद ने परंपरावादी और अपनी जातीयता पर मिथ्याभिमान करने वाले इलाहाबाद के एक छात्र चक्रधर के हवाले से पाखंड, आडंबर और आधुनिकता और परम्परा के अंतर्द्वंद्व के बारे में बहुत ही दिलचस्प ढंग से लिखा है. इस कहानी में विजातीय वस्तुओं को हेय समझने वाले चक्रधर एक एंग्लो-इंडियन लड़की लूसी के प्रेम के छलावे में पड़कर न सिर्फ़ अंग्रेज़ी सूट-बूट और टाई पहनने लगता है. बल्कि लूसी को प्रभावित करने के इरादे से चिलचिलाती धूप में जाकर फुटबॉल की प्रैक्टिस भी करने लगता है, जिससे तब तक वह सर्वथा अनभिज्ञ रहता है.

यह भी दिलचस्प है कि बहुत सोच-विचारकर अपने पात्रों का नाम रखने वाले प्रेमचंद ने अपनी एक कहानी ‘घमंड का पुतला’ में एक खुशामदी अर्दली का नाम ही ‘फुटबॉल’ रख दिया है. उसके नामकरण और व्यक्तित्व के बारे में प्रेमचंद ने कुछ यूँ लिखा है :

फुटबॉल ने दबे पांव पास आकर मुझे सलाम किया कि जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहता है. फुटबॉल के नाम से जिस प्राणी का जिक्र किया गया वह मेरा अर्दली था. उसे सिर्फ एक नजर देखने से यक़ीन हो जाता था कि यह नाम उसके लिए पूरी तरह उचित है. वह सिर से पैर तक आदमी की शकल में एक गेंद था. लम्बाई-चौड़ाई बराबर. उसका भारी-भरकम पेट, जिसने उस दायरे के बनाने में खास हिस्सा लिया था, एक लम्बे कमरबन्द में लिपटा रहता था, शायद इसलिए कि वह इन्तहा से आगे न बढ़ जाए. जिस वक्त वह तेजी से चलता था बल्कि यों कहिए लुढ़कता था तो साफ़ मालूम होता था कि कोई फुटबॉल ठोकर खाकर लुढ़कता चला आता है.

हिंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का कुश्ती के साथ-साथ फुटबॉल के प्रति प्रेम भी सर्वविदित है. फुटबॉल से अपने इसी लगाव के चलते वे प्रायः लखनऊ में होने वाले फुटबॉल मैचों में बतौर दर्शक उपस्थित होते. फुटबॉल के मैदान में उनकी प्रभावशाली उपस्थिति के विषय में रामविलास शर्मा ने लिखा है कि

‘गोमती के किनारे फुटबॉल का मैच खतम होने पर भीड़ में उन्हे ढूँढ़ने में दिक्कत नहीं होती थी; उस विशाल मुण्ड-समुदाय में उनका सिर ऊपर उठा हुआ दिखाई देता था. कोई भी फ़ील्ड के किसी भी कोने से देख सकता था कि कविवर मत्त-गयन्द-गति से इस प्रवाह में बहते-ठेलते हुए बढ़ रहे हैं.’[11]

निराला को सिर्फ़ फुटबॉल देखने ही नहीं खेलने का भी शौक़ था. इसी चक्कर में एक बार उनके दाएँ पैर में चोट भी लगी थी. इसका उल्लेख उन्होंने फ़रवरी 1928 में शिवपूजन सहाय को लिखे एक पत्र में किया है. गढ़ाकोला (उन्नाव) से लिखे गए इस पत्र में निराला लिखते हैं :

इधर एक चोट मेरे पैर में भी लगी. छूटी आदत, शौक चर्राया. फुटबॉल हो रहा था, मैं भी back के लिये तैयार हो गया. फिसला एक शॉट, दाहिना foot पीड़ा हो गया. चारपाई से न उठ सकने वाली अवस्था 36 घंटे, लठ्ठ सहायता से चलने वाली 7 दिन, अब चल लेता हूँ खूब, पर कसक है. पहले से यानी छतरपुर से अब बहुत अच्छी हालत में हूँ.[12]

जाहिर है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में जहाँ एक ओर फुटबॉल जैसे खेलों को उत्तर भारत के स्कूल-कॉलेज, यूनिवर्सिटियों में जगह मिल रही थी, युवाओं और आम लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी. शहरों, क़स्बों और गाँवों तक में फुटबॉल के मैच और प्रतियोगिताएँ आयोजित हो रही थीं.  वहीं दूसरी ओर, हिंदी साहित्य की दुनिया में भी फुटबॉल को लेकर काफ़ी कुछ लिखा जा रहा था. इसमें फुटबॉल पर लिखी हुई परिचयात्मक पुस्तिकाएँ तो थीं ही. जो हिंदी में खेल साहित्य के विकास-यात्रा को समझने के लिए बेहद ज़रूरी स्रोत हैं. वहीं प्रेमचंद और निराला जैसे साहित्यकारों के निजी जीवन और उनकी रचनाओं में भी फुटबॉल का खेल अपनी प्रभावशाली मौजूदगी दर्ज़ कर रहा था.

इस दरमियान जहाँ फुटबॉल कभी साम्राज्यवाद के विरोध और राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति का माध्यम बन रहा था, तो कभी आधुनिकता और परम्परा के द्वंद्व का साक्षी भी बन रहा था.

संदर्भ :

[1] जे.ए. मंगन, गेम्स एथिक एंड इम्पीरियलिज़्म : आसपेक्ट्स ऑफ़ द डिफ़्यूज़न ऑफ़ एन आइडियल (लंदन : फ़्रैंक कैस, 1986), पृ. 8.
[2] कौशिक बंद्योपाध्याय, “स्पोर्ट्स हिस्ट्री इन इंडिया”, द इंटरनैशनल जर्नल ऑफ़ द हिस्ट्री ऑफ़ स्पोर्ट, 22 : 4 (2005), पृ. 710.
[3] बोरिया मजूमदार, “द वर्नाक्यूलर इन स्पोर्ट्स हिस्ट्री”, द इंटरनैशनल जर्नल ऑफ़ द हिस्ट्री ऑफ़ स्पोर्ट, 20: 1 (2003), पृ. 114.
[4] कालिदास माणिक, फुटबॉल का खेल (बनारस : भारत प्रेस, 1908), देखें भूमिका.
[5] छपरा के वाणी-मंदिर प्रेस ने जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, भुवनेश्वर नाथ मिश्र ‘माधव’, अनूपलाल मंडल जैसे साहित्यकारों की कृतियाँ भी प्रकाशित की थीं.
[6] बम्बहादुर सिंह नेपाली, फुटबॉल की नियमावली (छपरा : वाणी-मंदिर, 1936), पृ. 1.
[7] बम्बहादुर सिंह नेपाली, फुटबॉल (बाँकीपुर : ग्रन्थमाला-कार्यालय, 1939), देखें भूमिका.
[8] वही, दो शब्द.
[9] पार्थ चटर्जी, द ब्लैक होल ऑफ़ द एंपायर : हिस्ट्री ऑफ़ ए ग्लोबल प्रैक्टिस ऑफ़ पॉवर (प्रिंसटन : प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012).
[10] अमृतराय, कलम का सिपाही (इलाहाबाद : हंस प्रकाशन, 1976), पृ. 38-39.
[11] रामविलास शर्मा, निराला (बम्बई : जन-प्रकाशन गृह, 1948), पृ. 31.
[12] रामविलास शर्मा, निराला की साहित्य साधना, तृतीय खंड (नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, 1987), पृ. 300-01.

 

युवा इतिहासकारों में उल्लेखनीय शुभनीत कौशिक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में इतिहास के शिक्षक हैं. जवाहरलाल नेहरू और उनके अवदान पर केंद्रित पुस्तक ‘नेहरू का भारत: राज्य, संस्कृति और राष्ट्र-निर्माण’ (संवाद प्रकाशन, 2024) का सह-सम्पादन किया है. पत्र पत्रिकाओं में हिंदी-अंग्रेजी में लेख आदि प्रकाशित हैं.

ईमेल : kaushikshubhneet@gmail.com

 

Tags: 20262026 इतिहासFIFA World Cup 2026football-in-hindi-public-sphereफुटबॉल और हिन्दी साहित्य-संसारशुभनीत कौशिक
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Comments 1

  1. जयप्रकाश सावंत says:
    3 weeks ago

    शुभनीत कौशिक का ‘फुटबॉल और हिंदी जगत’ आलेख अच्छा लगा। इस संदर्भ में फुटबॉल की पार्श्वभूमी पर लिखी अशोक सेकसरिया की एक बहुत ही सुन्दर कहानी ‘दुखवा कासे कहूं मोर सजनी’ का उल्लेख करना चाहूंगा। मोती नंदी का हिंदी में पढ़ा उपन्यास ‘स्ट्राइकर’ भी याद आ रहा है।

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