• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » फ़्योदर दसतायेव्स्की : मन के तलघर का साहित्यकार : विजयशंकर चतुर्वेदी

फ़्योदर दसतायेव्स्की : मन के तलघर का साहित्यकार : विजयशंकर चतुर्वेदी

by arun dev
September 27, 2026
in आलेख
Reading Time: 7 mins read
A A
फ़्योदर दसतायेव्स्की : मन के तलघर का साहित्यकार : विजयशंकर चतुर्वेदी
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
फ़्योदर दसतायेव्स्की
मन के तलघर का साहित्यकार


विजयशंकर चतुर्वेदी

 

दुनिया में पैगम्बरों के आने का सिलसिला रुके बहुत दिन हुए, लेकिन फ़्योदर दसतायेव्स्की के बारे में यह धारणा रही है कि अगर कोई अगला पैगम्बर होता, तो शायद वह दसतायेव्स्की होता. इसलिए भी कि देवदूत मनुष्य के भीतर छिपे किसी ऐसे सत्य को सामने लाते हैं, जिसे मनुष्य खुद भी साफ-साफ नहीं देख पाता. दसतायेव्स्की यही काम अपने ढंग से करते हैं.

दसतायेव्स्की से मेरा पहला परिचय सीधे नहीं हुआ. किसी से सुना था:

“एक पलड़े में पूरा सिगमंड फ्रायड रख दीजिए और दूसरे पलड़े में सिर्फ क्राइम एंड पनिशमेंट— दसतायेव्स्की भारी पड़ेंगे.”

मैं ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पढ़ने में जुट गया. सच कहूँ तो रस्कोलनिकोव का नाम भी मुझे तब क्लासनिकोव जैसा लगता था. फिर धीरे-धीरे उस उपन्यास में धँसने लगा. मुझे पहली बार ऐसा लेखक दिखाई दिया जो आदमी के काम करने से पहले और काम कर चुकने के बाद के मन में दिलचस्पी रखता है.

हत्या हो गई— यह तो भयंकर घटना है. लेकिन हत्या करने का विचार पहली बार उस आदमी के भीतर किस रूप में आया? क्या उसने खुद को समझाया? क्या उसने खुद को धोखा दिया? क्या उसे सचमुच विश्वास था कि वह सही कर रहा है? या वह अपने भीतर किसी ऐसी आवाज़ को दबाने की कोशिश कर रहा था जिसे वह खुद सुनना नहीं चाहता था? और सबसे अद्भुत बात यह कि क्या आदमी कोई काम करने के बाद भी अपने भीतर यह भ्रम बनाए रख सकता है कि वह वही आदमी है जो उस काम से पहले था?

दसतायेव्स्की मुझे इन सवालों के जवाब सीधे नहीं दे रहे थे.  यही बात रही होगी कि रस्कोलनिकोव मेरे सामने कोई “अपराधी” बनकर नहीं आया. वह पहले एक विचार लेकर आया. फिर उसने उसी विचार को तर्क में बदला. फिर तर्क को अपने अहंकार में बदलने लगा. और फिर उस अहंकार की बदौलत उसने काण्ड कर डाला! लेकिन दसतायेव्स्की ने मेरा पीछा यहीं नहीं छोड़ा. रस्कोलनिकोव का वह कुकर्म उसके साथ-साथ मेरे पीछे भी पड़ गया. मुझे समझ में आने लगा कि ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में असली अपराध सिर्फ वह हत्या नहीं है जो रस्कोलनिकोव करता है. असली कहानी यह है कि कोई मनुष्य अपने ही गढ़े हुए विचार के सामने कितनी देर तक मनुष्य बना रह सकता है. और यही वह जगह थी जहाँ मुझे दसतायेव्स्की का जादू कुछ-कुछ समझ में आने लगा था. वह पात्र के सिर के भीतर कैमरा लगा देते हैं.

बाद में जब मैंने दूसरी चीजें पढ़ीं तो मुझ पर खुला कि दसतायेव्स्की और फ्रायड के बीच समय का कितना अंतर है. दसतायेव्स्की 1821 में पैदा हुए और 1881 में चले गए, फ्रायड का जन्म 1856 में हुआ और उनका व्यवस्थित मनोविश्लेषणात्मक काम दसतायेव्स्की के बाद की दुनिया में विकसित हुआ. फ्रायड ने स्वयं बाद में दसतायेव्स्की पर गंभीरता से लिखा. इसलिए वह तुलना सिर्फ प्रभाव नहीं थी. समय की घड़ी को सीधा रखकर देखें तो सवाल कहीं ज्यादा दिलचस्प हो जाता है कि एक उपन्यासकार ने मनुष्य के भीतर वह सब कैसे देख लिया जिसे मनोविज्ञान बाद में अपनी अलग भाषा में समझाने लगा? फ्रायड मन के भीतर छिपी चीज़ों को समझने के लिए भाषा बनाते हैं. दसतायेव्स्की उस मनुष्य के साथ कमरे में बैठ जाते हैं. और यही दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर है.

फ्रायड सवाल करते हैं कि मनुष्य के भीतर यह चीज क्यों है? दसतायेव्स्की पूछते हैं कि अगर यह चीज भीतर है, तो इसी क्षण इस आदमी के मन में क्या हो रहा होगा? और फिर वह इंतजार करने लगते हैं— विचार का. उसकी प्रतिक्रिया का. उसकी गलती का. उसके पछतावे का. उसके अगले झूठ का. उसके अगले सच का. और फिर उस सच के भीतर छिपे अगले झूठ का. मुझे लगता है, दसतायेव्स्की की असली गति यहीं है. वह बहुत तेज लेखक हैं. लेकिन वह मन के भीतर ठहरकर तेज होते हैं. कभी-कभी लगता है कि जीवन ने उनकी बाँह पकड़ कर अपनी आँखों के सामने खड़ा करके सख्त लहजे में कहा होगा कि ‘अब मुझे देख!’ और जो आदमी जीवन को इस तरह देख लेता है, उसकी आँख फिर पहले जैसी नहीं रह जाती.

फ़्योदर मिखाइलोविच दसतायेव्स्की जब युवा थे, तब रूस में भीतर से बहुत कुछ हिल रहा था. बाहर ज़ार था, साम्राज्य था, चर्च था, सेना थी, नौकरशाही थी, भीतर नए विचार थे— समाजवाद, उदारवाद, पश्चिम से आती हुई नई राजनीतिक धारणाएँ, रूसी समाज की असमानताओं के खिलाफ बेचैनी और यह सवाल कि मनुष्य को आखिर किस तरह का समाज चाहिए. दसतायेव्स्की भी उस बेचैनी से अछूते नहीं थे. युवा दसतायेव्स्की जिस पेत्राशेव्स्की सर्कल से जुड़े, वहाँ समाज, राजनीति, दासप्रथा और भविष्य के रूस पर बहसें होती थीं. लेकिन उस समय का रूस बहस को सिर्फ बहस की तरह सुनने वाला देश नहीं था. ज़ार निकोलस प्रथम की सत्ता हर तरह की क्रांतिकारी हलचल से बड़ी आशंकित रहती थी. लिहाज़ा 1849 में दसतायेव्स्की गिरफ्तार कर लिए गए. सितम ये कि उन्हें मौत की सजा ही सुना दी गई. और फिर एक सुबह उन्हें और उनके साथियों को ठिकाने लगाने के लिए ले जाया गया.

यहाँ आकर इतिहास अचानक एक अविश्वसनीय उपन्यास बन जाता है. ज़ार के लोग कैदियों को सेमायोनोव्स्की स्क्वेयर ले गए थे. उन्हें फायरिंग स्क्वाड के सामने खड़ा कर दिया गया. एक विवरण के अनुसार पहले दल ने गोली चलाने के लिए अपनी-अपनी बंदूकों के घोड़े पर उँगली रख ली थी. कुछ कैदियों को आखिरी प्रार्थना का समय मिला. लेकिन मौत इतनी निकट थी कि अब वह महज विचार नहीं रह गई थी. एकदम सामने खड़ी थी. तभी अंतिम क्षण में घोषणा हुई कि ज़ार ने उनकी सजा बदल दी है. यानी अचानक मौत टल गई. लेकिन दसतायेव्स्की के लिए फिर वह पूरी तरह कभी स्थगित नहीं हुई. यह वही आदमी था जो बाद में अपने पात्रों के भीतर मृत्यु, अपराध, भय, पाप और मुक्ति को इतनी बारीकी से लिखने वाला था. यह कोरी साहित्यिक कल्पना नहीं थी. उसने मृत्यु को अपने खयाल में नहीं, घड़ी में देखा था. और इसीलिए दसतायेव्स्की के यहाँ समय भी दूसरे लेखकों जैसा नहीं चलता. उनके मशहूर किरदार रस्कोलनिकोव के लिए कुछ मिनट कभी-कभी पूरे जीवन से लंबे हो जाते हैं. मिश्किन के लिए एक क्षण में मनुष्य के चेहरे पर कोई ऐसी चीज़ दिखाई दे सकती है जिसे दूसरा आदमी वर्षों में नहीं देख पाता. वह मनुष्य के भीतर विचारों के बदलने से समय नापते हैं.

साइबेरिया की कैद और कठोर श्रम ने भी उनके जीवन को दूसरी दिशा दी. वहाँ उन्हें रूसी समाज के उन लोगों के बीच रहने का अवसर मिला जिन्हें सेंट पीटर्सबर्ग की बौद्धिक दुनिया से दूर रखा जाता था. इनमें अपराधी, किसान, गरीब, हिंसक, टूटे हुए और तमाम ऐसे लोग शामिल थे जिन्हें तथाकथित सभ्य समाज अपनी सुविधा के लिए असभ्य या बुरे लोग कह देता है. दसतायेव्स्की के लिए यहीं से एक और बड़ा दरवाजा खुला. इस दरवाजे से उनके सामने सवाल निकला कि क्या आदमी सिर्फ वही है जो उसने किया है? अगर किसी ने हत्या की है तो क्या वह सिर्फ हत्यारा है? अगर किसी ने चोरी की है तो क्या उसके भीतर कोई ऐसी जगह नहीं बची जहाँ वह अपनी चोरी से भी बड़ा हो? अगर कोई पाप करता है तो क्या उसके भीतर पश्चात्ताप की संभावना खत्म हो जाती है? और अगर कोई धार्मिक आदमी है तो क्या वह हमेशा अच्छा ही होगा? इन सवालों को उन्होंने सामान्य प्रश्नोत्तरी नहीं समझा.

उनकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह अपने पात्रों को उनके अपराधों से बड़ा और उनकी अच्छाइयों से अधिक जटिल बना देते हैं. उनके उपन्यास में कोई आदमी पूरी तरह अच्छा नहीं रहता और कोई पूरी तरह बुरा भी नहीं. उनके पात्रों को अदालत में खड़ा करना आसान नहीं है. क्योंकि वह अचानक कटघरे से निकलकर हमारे बगल में बैठ जाते हैं. आप ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में रस्कोलनिकोव को देखिए. उसने हत्या करने से पहले अपने लिए एक सिद्धांत गढ़ रखा है कि कुछ असाधारण मनुष्य ऐसे होते हैं जिन्हें सामान्य नैतिक नियमों से ऊपर जाने का अधिकार हो सकता है, बशर्ते उनके किसी बड़े उद्देश्य के लिए ऐसा करना जरूरी हो. यहीं से दसतायेव्स्की एक खतरनाक खेल शुरू करते हैं. रस्कोलनिकोव सोचता है कि उसने एक बूढ़ी सूदखोर औरत को मारने का फैसला किया है. लेकिन दसतायेव्स्की पूछते हैं कि क्या सचमुच उसने आखिरी फैसला कर लिया है? क्योंकि फैसला लेने के बाद भी उसके भीतर फैसला खत्म नहीं होता.

वह चलता रहता है. रस्कोलनिकोव डरता है. फिर अपने डर को तर्क से दबाता है. फिर तर्क से थक जाता है. फिर संयोग उसे अपराध की तरफ धकेलता है. फिर वह खुद अपने संयोगों को अर्थ देने लगता है. और एक जगह वह लगभग अपने ही विचार से पूछता है कि क्या वह सचमुच कुल्हाड़ी उठाकर उस बूढ़ी औरत का सिर फोड़ सकता है. अंग्रेजी में वह वाक्य है: “God… can it be that I will really take an axe and hit her on the head…?” यह वाक्य इसलिए भयावह नहीं है कि इसमें हत्या है. यह डराता है कि इसमें “क्या मैं सचमुच ऐसा करूँगा?” वाला मनुष्य मौजूद है. यानी अपराध अभी हुआ नहीं है. लेकिन अपराध पहले ही उसके मन में घटित हो चुका है. और दसतायेव्स्की उस क्षण को दबोच लेते हैं. उनका मनोविज्ञान किसी सिद्धांत से ज्यादा एक संपूर्ण दृश्य है. वह मन की अंधेरी तहों में टॉर्च लेकर उतर जाते थे.

रस्कोलनिकोव की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह अपनी ही बनाई हुई धारणा के अनुसार असाधारण आदमी साबित नहीं हो पाता. उसने सोचा था कि अगर वह “नेपोलियन” जैसा असाधारण मनुष्य है तो हत्या के बाद उसके भीतर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होगा. लेकिन हुआ उलटा. उसका शरीर उसका साथ नहीं देता. उसका मन उसका साथ नहीं देता. उसका तर्क उसका साथ नहीं देता. उसका अपराध उसे छोड़ता नहीं, अवचेतन से बुरी तरह चिपक जाता है. और अंततः सोन्या मार्मेलादोवा के सामने अपनी व्याख्या करता हुआ वह लगभग स्वीकार कर लेता है कि पैसा उसका असली उद्देश्य नहीं था. वह कहता है: “मैंने अपने लिए मारा था, सिर्फ अपने लिए.” यहाँ दसतायेव्स्की अपराध के भीतर से अहंकार को निकाल फेंकते हैं. क्योंकि रस्कोलनिकोव गरीब जरूर था, लेकिन उसने सिर्फ गरीबी के कारण हत्या नहीं की. उसके भीतर एक विचार था कि क्या मैं वह कर सकता हूँ जिसे सामान्य आदमी नहीं कर सकता? यही असली बीमारी थी. और दसतायेव्स्की हमसे एक ऐसा सवाल पूछते हैं जो उन्नीसवीं सदी से बाहर निकलकर हमारे समय तक आ जाता है कि मनुष्य को अपराध करने के लिए हमेशा लालच चाहिए या कभी-कभी अपने बारे में एक गलत धारणा ही काफी होती है? और इसी सवाल की डोर थामे मैं दसतायेव्स्की के बाकी पात्रों के पीछे-पीछे चलने लगा.

 

 

२.

नास्तास्या फ़िलिप्पोव्ना ‘द इडियट’ की सबसे जटिल और त्रासद स्त्री-पात्र है. बचपन में अफ़ानासी इवानोविच तोत्स्की के संरक्षण में आने के बाद उसका यौन शोषण होता है. लेकिन वह अपने अपमान, अपनी सुंदरता और अपने भीतर पैदा हुई आत्मघृणा को ही समाज के विरुद्ध एक हथियार बना लेती हैं. प्रिंस मिश्किन जब उसे देखता है तो उसको कोई ‘गिरी हुई औरत’ नहीं दिखती. इसके विपरीत नास्तास्या के प्रति परफ़्योन रोगोज़िन का प्रेम जुनून, अधिकार-बोध, वासना और ईर्ष्या से संचालित है. इस तरह नास्तास्या के सामने दो अलग-अलग संसार खड़े हो जाते हैं. मिश्किन का करुणामय और क्षमाशील प्रेम तथा रोगोज़िन का उन्मत्त और विनाशकारी आकर्षण. लेकिन नास्तास्या की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह स्वयं अपने भीतर की आत्मघृणा से मुक्त नहीं हो पातीं. समाज ने जिस स्त्री को ‘अपवित्र’ कहकर दंडित किया है, अंततः वही निर्णय वह अपने बारे में भी सच मानने लगती है और इसीलिए सुख, सम्मान और प्रेम को अपने लिए असंभव समझती है. इस अर्थ में नास्तास्या उस समाज की निर्मम संरचना का आईना है जो पहले स्त्री को वस्तु में बदलता है और फिर उसी वस्तुकरण के लिए उसे दोषी ठहराता है.

पहली नजर में नास्तास्या फिलिप्पोव्ना एक दुखी, घायल और अस्थिर स्त्री दिखाई दे सकती है. लेकिन दसतायेव्स्की उसे किसी एक शब्द में बंद नहीं करते. नास्तास्या चाहती है कि उसे प्रेम किया जाए. फिर जब कोई सचमुच उसे प्रेम करने लगता है तो वह उस प्रेम को नष्ट करने लगती है. वह अपने सम्मान की रक्षा करना चाहती है. फिर स्वयं ही अपने सम्मान को सार्वजनिक रूप से कुचल देती है. वह मिश्किन की निर्मलता को पहचानती है. लेकिन उसी निर्मलता से डरती भी है. वह गुस्ताख़ रोगोज़िन की ओर जाती है. फिर उससे भी बचना चाहती है और वापस उसी अँधेरे की ओर चली जाती है.

किसी मनुष्य का यह व्यवहार अगर बाहर से देखा जाए तो विरोधाभास लगेगा. दसतायेव्स्की के यहाँ विरोधाभास ही मनुष्य है. यही उनकी असाधारणता है. वह पात्र को यह कहकर नहीं छोड़ते कि “यह स्त्री आत्मविनाशकारी है.” वह पूछते हैं कि आखिर वह आत्मविनाश क्यों चाहती है? क्या वह सचमुच मरना चाहती है? या वह चाहती है कि कोई आखिरी क्षण तक उसे बचाने की कोशिश करता रहे? क्या वह प्रेम से भाग रही है? या प्रेम के सामने अपने बारे में वह झूठ टूट जाने से डरती है जिसे उसने वर्षों से बचाकर रखा है? यहाँ दसतायेव्स्की की लेखकीय दृष्टि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से आगे चली जाती है. वह किसी व्यक्ति के व्यवहार का कारण खोजते हुए उसके भीतर एक और कारण खोज लेते हैं. फिर उसके नीचे एक और. फिर एक और. और अचानक पात्र हमारे सामने खड़ा होकर कहता है कि तुम मुझे समझते क्या हो?

मेरे खयाल से यही कारण है कि अगर हम एक बार पढ़ लें, तो दसतायेव्स्की के पात्र इतने लंबे समय तक याद रह जाते हैं. इसी ‘इडियट’ में जनरल इवोल्गिन का पात्र भी दसतायेव्स्की की इस निगाह को बहुत बारीकी से पकड़ता है. इवोल्गिन सचमुच सेना में रहा है, लेकिन अपने अतीत को जिस तरह बढ़ा-चढ़ाकर सुनाता है, उसमें सच और कल्पना की सीमा मिटने लगती है. वह सच के ऊपर कल्पना की इतनी परतें चढ़ाता है कि आखिर में कल्पना ही उसके लिए अपना सच बन जाती है. पहली नजर में लगता है कि वह दूसरों को प्रभावित करने के लिए कहानियाँ गढ़ रहा है, लेकिन मामला उससे थोड़ा गहरा है. आदमी कभी-कभी दूसरों को धोखा देने के लिए झूठ नहीं करता, वह अपने छोटे और असंतोषजनक जीवन से बचने के लिए अपने लिए एक बड़ा आदमी गढ़ता है. फिर वह उसी गढ़े हुए आदमी में रहने लगता है. इवोल्गिन को अपने बारे में जो विश्वास है, उसके सामने दूसरों की हँसी और अविश्वास भी बेअसर हो जाते हैं. दसतायेव्स्की की खूबी यही है कि वह ऐसे आदमी को सिर्फ झूठा कहकर छोड़ नहीं देते, उसके झूठ के पीछे छिपी उस भूख को भी देखते हैं— सम्मान पाने की, अपने ही सामने महत्वपूर्ण होने की. ऐसे इवोल्गिन आज भी हमारे चारों तरफ मिल जाते हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि आज उनकी कहानियाँ कुछ और हैं.

रस्कोलनिकोव को पढ़कर किताब बंद कर दीजिए, वह कमरे में बैठा रहता है. नास्तास्या फिलिप्पोव्ना को छोड़ दीजिए, उसका अगला निर्णय मन में चलता रहता है. इवान करामाज़ोव से बहस कीजिए, वह आपके तर्क का जवाब देकर चुप नहीं होगा, वह आपके जवाब के बाद नया सवाल पैदा करेगा. यही दसतायेव्स्की की असली गति है. वह नाक की सीध में आगे नहीं बढ़ते. एक ही बिंदु में नीचे उतरते जाते हैं. और इसीलिए उनके पात्रों के भीतर हमें इतनी जगह मिलती है. उसी जगह उनके भीतर सौ रास्ते खुल जाते हैं और वह उन अबूझ रास्तों पर निकल पड़ते हैं. इसीलिए उनका आदमी कभी सीधा नहीं होता. वह मुड़ा हुआ होता है. अपने भीतर से. अपने विचारों से. अपने अपराध से. अपने ईश्वर से. अपने अहंकार से. और कभी-कभी अपने प्रेम से भी. लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था कि पात्रों के भीतर उतरने की खुद दसतायेव्स्की ने कितनी कीमत चुकाई थी. क्योंकि जिस आदमी ने मौत को सामने से देखा हो, उसके लिए हर मनुष्य के भीतर एक अदालत होगी. एक जेल होगी. एक प्रार्थना होगी. एक अपराध होगा. और शायद एक ऐसी जगह भी होगी जहाँ से लौटना अभी संभव है.

दसतायेव्स्की के यहाँ आदमी की सबसे बड़ी मुसीबत यह नहीं होती कि वह कुछ गलत कर बैठता है. मुश्किल यह खड़ी होती है कि वह कुछ करने से पहले ही अपने भीतर इतना कुछ कर चुका होता है कि अब करने के लिए कुछ बचता ही नहीं. रस्कोलनिकोव अपराध कर देता है. लेकिन उससे पहले उसके भीतर अपराध का एक पूरा विश्वविद्यालय खुल चुका होता है. वह अपने विचार को तर्क देता है. तर्क को इतिहास का नेपोलियन थमाता है. नेपोलियन को अपने ऊपर आजमाता है. और फिर कुल्हाड़ी उठा लेता है. लेकिन दसतायेव्स्की के पास ऐसा आदमी भी है जो कुल्हाड़ी तक नहीं पहुँचता. वह सिर्फ सोचता रहता है. सोचता है. फिर अपने सोचे हुए पर शक करता है. फिर उस शक पर भी शक करता है. और अंत में अपने ही दिमाग में बैठा-बैठा दुनिया से बदला लेने की कल्पना करता रहता है. यह आदमी है— अंडरग्राउंड मैन.

 

 

 

३.

‘नोट्स फ्रॉम अंडरग्राउंड’ मैंने जब पढ़ी, तो लगा कि दसतायेव्स्की किसी उपन्यास का पात्र नहीं, आदमी के भीतर छिपी हुई किसी बीमारी का नाम बता रहे हैं. किताब की शुरुआत ही ऐसी है कि मानो लेखक अपने पाठक के सामने दरवाजा खोलकर कह रहा हो— आइए हुज़ूर, लेकिन सावधान रहिए, अंदर बैठा आदमी ठीक नहीं है. अंदर बैठा वह आदमी कहता है: “मैं बीमार आदमी हूँ… मैं एक दुष्ट आदमी हूँ. मैं देखने में भी अच्छा नहीं हूँ.” और अगले ही क्षण वह अपनी बीमारी का इलाज कराने से इसलिए इनकार कर देता है कि वह भयंकर ज़िद्दी है. उसे पता है कि डॉक्टर को न दिखाने से नुकसान डॉक्टर का नहीं, उसी का होगा. फिर भी वह डॉक्टर के पास नहीं जाएगा. क्यों? “ज़िद के कारण.”

यहाँ मुझे लगा कि दसतायेव्स्की आदमी की एक ऐसी हरकत पकड़ रहे हैं जिसे हम रोजमर्रा की जिंदगी में देखते हैं, लेकिन उसके भीतर का गणित नहीं देख पाते. कभी-कभी आदमी अपने नुकसान से इसलिए चिपका रहता है कि वह उसके पास बची हुई आखिरी स्वतंत्रता होती है. दुनिया कहती है— इलाज करा लो. वह कहता है— नहीं कराऊँगा. दुनिया कहती है— माफ कर दो. वह कहता है— नहीं करूँगा. दुनिया कहती है— तुम्हारे लिए अच्छा यही है. वह भीतर से कहता है— मुझे मालूम है, लेकिन मंजूर नहीं. दसतायेव्स्की के अंडरग्राउंड मैन की यही “नहीं नहीं” आगे चलकर बहुत बड़ी चीज बन जाती है. वह आदमी हर हाल में साबित करना चाहता है कि मनुष्य मशीन नहीं है.

मान लीजिए, कल को अगर किसी गणितज्ञ ने दुनिया का ऐसा सूत्र बना दिया जिसमें यह पहले से तय हो कि मनुष्य किस परिस्थिति में क्या करेगा, तो मनुष्य सिर्फ एक गणना बनकर रह जाएगा. लेकिन अंडरग्राउंड मैन कहता है— हरगिज नहीं. मनुष्य कभी-कभी जान-बूझकर वही करेगा जो उसके लिए नुकसानदेह है, सिर्फ यह साबित करने के लिए कि वह कोई गणितीय प्राणी नहीं है. यहीं दसतायेव्स्की अपने समय के एक बड़े बौद्धिक विश्वास से भिड़ते हैं कि अगर समाज को सही ढंग से व्यवस्थित कर दिया जाए, मनुष्य की जरूरतें पूरी कर दी जाएँ, तर्कसंगत व्यवस्था बना दी जाए, तो आदमी भी तर्कसंगत ढंग से व्यवहार करने लगेगा. उनको इस विचार पर भरोसा ही नहीं था. उन्हें मनुष्य की अव्यवस्था पर भरोसा था. और इसीलिए उनका आदमी बार-बार अपने ही हित के विरुद्ध जाता है.

अंडरग्राउंड मैन के साथ सबसे विचित्र बात यह है कि वह अपने बारे में झूठ बोलता है और उसी क्षण आपको बता भी देता है कि वह झूठ बोल रहा है. वह कहता है कि वह दुष्ट है. फिर बताता है कि वह सचमुच दुष्ट नहीं है. वह कहता है कि उसे लोगों से नफरत है. फिर किसी की एक छोटी-सी प्रतिक्रिया से आहत हो जाता है. वह बदला लेना चाहता है. फिर बदला लेने के कारणों का विश्लेषण करने लगता है. फिर विश्लेषण करते-करते बदला लेने की इच्छा ही खत्म हो जाती है. फिर उसे इस बात पर गुस्सा आता है कि उसने बदला क्यों नहीं लिया. और फिर वह अपने ऊपर ही गुस्सा करने लगता है. दसतायेव्स्की यहाँ आदमी को एक सीधी रेखा में नहीं चलाते. वह उसे गोल-गोल घुमाते हैं. और यहीं मुझे लगा कि दसतायेव्स्की की मनुष्य-दृष्टि सिर्फ “गहरी” नहीं है. वह गोलाकार है. आदमी एक भावना से दूसरी भावना तक सीधा नहीं जाता. वह वापस उसी भावना के पास लौटता है, लेकिन अब उसके साथ एक नया अनुभव जुड़ चुका होता है. इसलिए वह पहले वाला आदमी नहीं रह जाता.

अंडरग्राउंड मैन अपने दाँत के दर्द की भी फिलॉसफी बना लेता है. यह बात पढ़ते हुए मुझे पहले हँसी आई थी. दाँत में दर्द है. आदमी कराह रहा है. लेकिन कराहना भी उसे आनंद देता है. क्यों? क्योंकि उसे मालूम है कि उसकी कराह से दर्द कम नहीं होगा. वह यह भी जानता है कि दूसरों को परेशान कर रहा है. फिर भी वह कराहता है. और दसतायेव्स्की वहाँ से एक भयानक बात निकाल लेते हैं कि मनुष्य अपने दुख में भी अपनी स्वतंत्रता खोज सकता है. यकीन मानिए, कई बार खुद मेरे साथ भी यही हुआ है. अगर मैं दुखी हूँ और मुझे मालूम है कि मेरा दुख निरर्थक है, तब भी मैं उस निरर्थक दुख को पकड़कर बैठा रह सकता हूँ. क्योंकि कम-से-कम यह मेरा अपना है. इसीलिए अंडरग्राउंड मैन अचानक उन्नीसवीं सदी के किसी रूसी नौकरशाह के बाने से निकलकर हमारे सामने खड़ा आदमी बन जाता है. वह आदमी जो अपनी ही समस्या को हल नहीं करना चाहता. वह आदमी जो जानता है कि उसे किससे माफी माँगनी चाहिए, लेकिन माफी नहीं माँगता. वह आदमी जो जानता है कि उसे फोन कर देना चाहिए, लेकिन फोन नहीं करता. वह आदमी जो जानता है कि संबंध बचाया जा सकता है, फिर भी आखिरी क्षण में ऐसी बात कह देता है जिससे संबंध टूट जाए. क्यों? क्योंकि मनुष्य हमेशा सुख का पीछा नहीं करता. कभी-कभी वह अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए दुख चुन लेता है. और कभी-कभी उसे दुख चुनने की भी जरूरत नहीं पड़ती. वह सिर्फ इतना करता है कि अपने दुख को छोड़ता नहीं.

दसतायेव्स्की की विभिन्न कृतियों के पात्रों के बीच आपको एक अद्भुत रिश्ता दिखाई देगा. रस्कोलनिकोव सोचता है और फिर करता है. अंडरग्राउंड मैन सोचता है और सोचता ही रहता है. दोनों के बीच फर्क सिर्फ इतना नहीं कि एक अपराध करता है और दूसरा नहीं. फर्क यह है कि एक अपने विचार को कर्म में बदलने की कोशिश करता है और दूसरा अपने विचार को इतना फैलाता है कि कर्म की संभावना ही उसमें डूब जाती है. और इसी वजह से आपको ‘नोट्स फ्रॉम अंडरग्राउंड’ को ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ से पहले पढ़ना, दसतायेव्स्की के मनुष्य को समझने की गहरी तैयारी जैसा लगेगा. रस्कोलनिकोव के भीतर जो अपराध होता है, उसका एक बीज अंडरग्राउंड मैन के भीतर पहले ही दिखाई दे चुका है. अपराध नहीं. विचार और कर्म के बीच का वह भयानक फासला. और उस फासले में मनुष्य जितनी देर खड़ा रहता है, उतना ही वह अपने बारे में नई-नई बातें खोजता जाता है.

लेकिन इतने पर ही रुक जाएँ, तो काहे के दसतायेव्स्की? वह इस आदमी को समाज के सामने ले आते हैं. अंडरग्राउंड मैन अकेला है. मगर अकेलापन उसे सिर्फ इसलिए नहीं मिला कि लोग उसे छोड़ गए. वह लोगों के बीच जाने की कोशिश करता है. फिर खुद ही उस कोशिश को खराब करता है. एक अधिकारी के साथ उसकी पुरानी दुश्मनी है. वह आदमी संभवतः उसे ठीक से जानता तक नहीं. लेकिन अंडरग्राउंड मैन के लिए वह अधिकारी उसके आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया है. वह उसके पास से गुजरता है. अधिकारी उसे देखता भी नहीं. और यही बात अंडरग्राउंड मैन को भयंकर रूप से खल जाती है. वह चाहता है कि अधिकारी उसे देखे. उसे अपने बराबर माने. उसे रास्ता दे. उसे महत्व दे. और जब ऐसा नहीं होता तो उसके भीतर एक पूरा युद्ध शुरू हो जाता है. बाहर से कुछ हुआ ही नहीं. अंदर से युद्ध हो चुका है. यह दसतायेव्स्की की अपनी जमीन है. घटना छोटी. प्रतिक्रिया विराट. और मनुष्य का असली जीवन भी कई बार ऐसा ही होता है. दुनिया में कुछ नहीं हुआ. लेकिन आदमी के भीतर बहुत कुछ हो गया.

 

 

 

४.

यही बात मुझे उनके एक और शुरुआती उपन्यास ‘द डबल’ की याद दिलाती है. इसमें दसतायेव्स्की ने एक सरकारी कर्मचारी याकोव पेत्रोविच गोल्यादकिन का डबल रोल चित्रित किया है, जो वास्तव में है नहीं. गोल्यादकिन को एक दिन अपने जैसा ही एक दूसरा आदमी दिखाई देता है. सिर्फ चेहरा ही नहीं मिलता, नाम भी वही है, शक्ल भी लगभग वही. लेकिन दूसरा गोल्यादकिन वह सब करने लगता है जो पहला गोल्यादकिन करना चाहता है और नहीं कर पाता. दूसरा वाला अधिक आत्मविश्वासी है. लोगों से घुलता-मिलता है. जहाँ पहला गोल्यादकिन संकोच करता है, दूसरा आगे बढ़ जाता है. जहाँ पहला आदमी अपने सम्मान के बारे में सोचता रह जाता है, दूसरा उसी जगह अपना स्थान बना लेता है. पहले-पहल लगा कि यह कोई अजीब कल्पना है.  लेकिन फिर मुझे लगा कि दसतायेव्स्की ने यहाँ कोई भूत नहीं खड़ा किया था. बस उन्होंने आदमी का अधूरा हिस्सा बाहर निकाल दिया. हो न हो, गोल्यादकिन का दूसरा आदमी वही है जो पहला आदमी बनना चाहता था. वह आदमी जिसे वह अपने भीतर दबाकर रखता रहा. वह महत्वाकांक्षा जिसे उसने कभी स्वीकार नहीं किया. वह निर्भीकता जिसे वह जी नहीं पाया. वह सामाजिक आत्मविश्वास जिसकी उसे कमी थी. और अब वही सब एक दूसरे आदमी के रूप में उसके सामने खड़ा है. यहाँ दसतायेव्स्की का मनोविज्ञान और भी विचित्र हो जाता है. मनुष्य अपने भीतर जिस आदमी को जगह नहीं देता, क्या कभी वही आदमी उसके सामने बाहर आ सकता है? ‘द डबल’ में यह सवाल भयावह मजाक बनकर उभरता है.

अब जाकर मुझे सूत्र पकड़ में आया कि यह विचार दसतायेव्स्की छोड़ते नहीं हैं. ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में रस्कोलनिकोव के भीतर भी दो आदमी हैं. एक वह जो अपने सिद्धांत पर विश्वास करता है. दूसरा वह जो उस सिद्धांत से डरता है. ‘इडियट’ में नास्तास्या फिलिप्पोव्ना प्रेम चाहती है और उसी प्रेम से भागती भी है. उसे लगता है कि वह प्रेम के योग्य नहीं है, इसलिए जब मिश्किन उसे बिना किसी शर्त के स्वीकार करना चाहता है, तो वह उस स्वीकार को भी सह नहीं पाती. ‘द ब्रदर्स कारमाज़ोव’ में तो पूरा परिवार ही जैसे एक आदमी के भीतर रहने वाले अलग-अलग स्वरों में बदल जाता है. लेकिन यह सब बहुत बाद की बात है.

‘द डबल’ के गोल्यादकिन अभी शुरुआती दसतायेव्स्की हैं. उन्होंने उसी समय एक ऐसा दरवाजा खोल दिया था जिससे वह जीवन भर बाहर नहीं निकले. मनुष्य के भीतर एक दूसरा मनुष्य रहता है. कभी वह विचार होता है. कभी इच्छा. कभी अपराध. कभी अहंकार. कभी डर. कभी वह जीवन जो हम जी नहीं पाए. इसीलिए दसतायेव्स्की के मामले में “किरदार” शब्द का इस्तेमाल करना अपर्याप्त जान पड़ता है. किरदार तो स्थिर चीज होती है. लेकिन दसतायेव्स्की का आदमी स्थिर कहाँ है? वह अभी कुछ है. अगले क्षण कुछ और. और तीसरे क्षण अपने पिछले रूप से ही लड़ रहा है. उनके यहाँ “अभी” का भारी दबाव देखने को मिलता है.

रस्कोलनिकोव को ही लीजिए. वह वर्षों बैठकर अपने सिद्धांत पर विचार नहीं करना चाहता. एक दिन उसे लगता है— बस इसी क्षण. और क़त्ल कर देता है. रोगोज़िन को देखिए. वहाँ प्रेम ठहर कर समझ में आने वाली चीज नहीं रह जाता. वह एक उन्माद बन जाता है. नास्तास्या के सामने वह आदमी तुरंत अपने जीवन की दिशा बदलने को तैयार है. ‘द गैम्बलर’ का अलेक्सेई इवानोविच रूलेट की मेज पर बैठा है. उसके भीतर भी एक आदमी नहीं है. एक जानता है कि यह पहिया उसे बर्बाद कर सकता है, दूसरा उसी पहिए के अगले चक्कर में अपनी मुक्ति देखता है. एक हारकर उठ जाना चाहता है, दूसरा कहता है कि बस एक बाजी और. विचित्र यह है कि जीत भी उसे जुए से मुक्त नहीं करती, उसके भीतर इस विश्वास को और मजबूत कर देती है कि अगली बार भी वह किस्मत को अपने पक्ष में मोड़ सकता है. यहाँ पैसा असली चीज नहीं रह जाता. असली नशा उस क्षण का है जब घूमते हुए पहिए के साथ आदमी को लगता है कि अगले कुछ सेकंड में वह अपनी पूरी जिंदगी उलट देगा. वह जानता है कि वह अपने विनाश की ओर जा सकता है और फिर भी उसी दिशा में कदम बढ़ाता है. यहाँ दसतायेव्स्की मनुष्य की एक और विचित्रता पकड़ लेते हैं कि आदमी हमेशा उस चीज से नहीं बचता जिससे उसे खतरा है, कभी-कभी वह उसी खतरे के पास बार-बार लौटता है, क्योंकि वहीं उसे अपनी इच्छा और अपनी स्वतंत्रता सबसे तीव्र रूप में महसूस होती है. इसी तरह अंडरग्राउंड मैन भी अपने अपमान का बदला “अभी” लेना चाहता है. और इन सबके भीतर एक अदृश्य घड़ी चल रही है. उनके यहाँ आदमी भविष्य से कम, तुरंत आने वाले अगले क्षण से ज्यादा डरता है.

 

 

5.

‘द गैम्बलर’ की एक दिलचस्प बात, उसमें जुए का रोमांच तो है ही, इससे बढ़कर यह खुलासा है कि आदमी परिणाम के स्वरूप को जानने के बावजूद उसके सामने असहाय है. यह आधुनिक मनुष्य की बहुत पुरानी कहानी है. वह जानता है कि रात को अब उसे फोन बंद कर देना चाहिए. फिर भी एक बार और स्क्रीन देखता है. जानता है कि अब दाँव नहीं लगाना चाहिए. फिर कहता है कि एक बार और. जानता है कि सामने वाला आदमी उसके लिए ठीक नहीं है. फिर भी उसके संदेश का इंतजार करता है. जानता है कि उसे क्रोध में जवाब नहीं देना चाहिए. फिर भी तीखा जवाब लिख देता है. मनुष्य को हमेशा यह नहीं मालूम होता कि उसे क्या चाहिए. लेकिन कई बार उसे यह बहुत अच्छी तरह मालूम होता है कि उसे क्या नहीं करना चाहिए, और फिर भी वह वही करता है.

प्रतिभा का आलम यह है कि दसतायेव्स्की इस विरोधाभास को नैतिक उपदेश में नहीं बदलते. वह उसे जीते हुए दिखाते हैं. इसीलिए उनके अपने जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि जिस लेखक ने मनुष्य के आत्मविनाश को इतनी बारीकी से पहचाना, वह खुद भी कई बार उस रास्ते से होकर गुजरा. लेकिन मैं उन्हें यहाँ दोषी की तरह नहीं देख पाता. क्योंकि दसतायेव्स्की अपने दोषों को छिपाकर लेखक नहीं बने. उन्होंने अपने दोषों को भी साहित्य में काम पर लगा दिया. उनकी गरीबी पात्रों में चली गई. उनका कर्ज़ पात्रों में चला गया. उनका जुआ पात्रों में चला गया. उनका धार्मिक संघर्ष पात्रों में चला गया. उनकी राजनीतिक निराशा पात्रों में चली गई. यहाँ तक कि उनकी अपनी असुरक्षाएँ भी अलग-अलग चेहरों में हमारे सामने आती रहीं. बड़ा लेखक अपने जीवन में विरोधाभास ढोता है, लेकिन उन्हें स्वीकार करने का जिगरा भी रखता है. और दसतायेव्स्की में यह साहस मौजूद था. वह खुद को भी छोड़ते नहीं थे.

इसी दौर में उनके जीवन में एक और शख्सियत दाखिल होती है, जो बाद में उनके लेखन की गति बदलने वाली थी. उसका नाम था अन्ना ग्रिगोर्येव्ना स्नित्किना. वह उनके पास किसी रोमांटिक कहानी की नायिका बनकर नहीं आई थी. वह स्टेनोग्राफर थी. दसतायेव्स्की को एक निश्चित समय में एक उपन्यास पूरा करना था. समय कम था. दबाव बहुत था. कर्ज़ और प्रकाशक का अनुबंध सिर पर था. और उनके सामने एक ऐसी स्थिति थी जिसमें असफल होने का अर्थ सिर्फ साहित्यिक असफलता नहीं था, उसका आर्थिक परिणाम भी भयानक हो सकता था. अन्ना आईं. दोनों ने काम शुरू किया. और फिर जो हुआ, वह दसतायेव्स्की के जीवन की सबसे खूबसूरत विडंबना कही जा सकती है. जिस आदमी ने अपने पात्रों के भीतर इतनी उथल-पुथल देखी थी, उसके जीवन में एक युवा स्त्री आई जिसने उसे समय के भीतर लिखना सिखाया. ‘द गैम्बलर’ पूरा हुआ. और कुछ ही समय बाद अन्ना उनकी पत्नी बन गईं.

दसतायेव्स्की को समझने के लिए एक शब्द हमारे सामने पेश किया जाता है— निहिलिज्म या नकारवाद. नकारवाद यानी उस चीज को भी न मानना, जिसे अब तक सच माना जाता रहा है. ईश्वर पर संदेह. पुरानी नैतिकताओं पर संदेह. राज्य, चर्च, परिवार और परंपरा, हर उस व्यवस्था पर सवाल, जो आदमी से कहती है कि तुम्हें इस तरह जीना चाहिए. उन्नीसवीं सदी के रूस में यह सिर्फ कोई दार्शनिक विचार नहीं था. एक बेचैनी थी, खासकर युवाओं के बीच. जारशाही की कठोरता, समाज की जड़ता और बदलाव की धीमी गति से परेशान एक पीढ़ी को लगने लगा था कि पुरानी दुनिया को थोड़ा-बहुत सुधारने से काम नहीं चलेगा. उसे उखाड़ना होगा. महान रूसी लेखक इवान तुर्गनेव ने ‘फादर्स ऐंड सन्स’ (पिता और पुत्र) के बाज़ारोव में इस नई मानसिकता को एक चेहरा दिया था.

बाज़ारोव किसी चीज को सिर्फ इसलिए स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि वह पुरानी है, प्रतिष्ठित है या सब उसे मानते आए हैं. लेकिन दसतायेव्स्की इस अर्थ में नकारवादी नहीं थे. बल्कि आगे चलकर वह नकारवाद के सबसे तीखे आलोचकों में दिखाई देते हैं. फिर भी नकारवाद उनके लिए बाहर की कोई चीज नहीं थी. उन्होंने उस बेचैनी को अपने समय में जिया था. अपनी जवानी में वह उन बौद्धिक मंडलियों तक पहुँचे थे जहाँ समाजवाद, समानता और रूस के भविष्य पर बहस होती थी. पेत्राशेव्स्की मंडली से उनका जुड़ना इसी बेचैन समय का हिस्सा था. फिर गिरफ्तारी हुई. मौत की सजा सुनाई गई. फिर साइबेरिया भेज दिया गया. इसीलिए बाद के दसतायेव्स्की के लिए विचार कभी सिर्फ विचार नहीं रहा. विचार आदमी के भीतर क्या करता है, यह उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया. और यहीं नकारवाद उनके साहित्य में एक बहुत गहरी चीज बन जाता है. अगर ईश्वर नहीं है तो? अगर कोई अंतिम नैतिक कानून नहीं है तो? अगर आदमी खुद तय कर सकता है कि सही क्या है और गलत क्या है तो? और अगर वह अपने लिए कोई भी नियम बना सकता है, तो क्या वह किसी दूसरे आदमी की हत्या को भी अपने तर्क से सही साबित कर सकता है?

मेरे खयाल से नकारवाद और ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ इन्हीं सवालों की रोशनी में एक-दूसरे के करीब आते हैं. इसका नायक रस्कोलनिकोव अंततः एक बूढ़ी साहूकार महिला की हत्या करता है. लेकिन उससे पहले वह अपने भीतर उस नैतिक व्यवस्था को मारने की कोशिश करता है, जो उसे रोकती है. वह अपने लिए एक ऐसा तर्क गढ़ता है जिसमें कुछ असाधारण मनुष्यों को साधारण नैतिक नियमों से ऊपर रखा जा सकता है. लेकिन दसतायेव्स्की की असली दिलचस्पी यहाँ शुरू होती है. वह यह नहीं पूछते कि रस्कोलनिकोव का सिद्धांत सही है या गलत. वह पूछते हैं कि क्या आदमी अपने ही बनाए हुए सिद्धांत के भीतर रह भी सकता है? यही वह जगह है जहाँ दसतायेव्स्की अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक बेचैनी को मनुष्य के निजी मन में ले आते हैं.

बाहर की क्रांति बाद में होती है. पहले आदमी के भीतर होती है. और अगर भीतर की जमीन खिसक जाए, तो आदमी किसी भी विचार को अपना हथियार बना सकता है. यह बात आगे चलकर ‘डेमन्स’ में और भयावह रूप लेती है. वहाँ विचार अकेले किसी एक आदमी के भीतर नहीं रहता. वह दूसरे आदमी तक जाता है. फिर तीसरे तक. फिर एक समूह बनता है. फिर समूह को लगता है कि उसके पास सत्य है. और जिस क्षण किसी समूह को यह भरोसा हो जाए कि सत्य सिर्फ उसी के पास है, हिंसा के लिए दरवाजा खुल जाता है. लेकिन दसतायेव्स्की की नजर सिर्फ उस हिंसा पर नहीं है जो बाहर दिखाई देती है. वह यह देख रहे हैं कि हिंसा से पहले मनुष्य के भीतर क्या हुआ था. किसी ने पहली बार यह विचार कब सोचा? उसने उसे अपने भीतर जगह कैसे दी? उसने अपने संदेह को तर्क में कैसे बदला? तर्क को विश्वास में कैसे बदला? और फिर विश्वास को अधिकार में कैसे बदल लिया? यही दसतायेव्स्की को महज एक राजनीतिक उपन्यासकार होने से बचाता है. उनके यहाँ राजनीति भी अंततः मनुष्य के भीतर जाकर खुलती है.

 

 

6.

‘द ब्रदर्स करमाज़ोव’ तक आते-आते यह सोच और गहरी हो जाती है. सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि ईश्वर है या नहीं. सवाल यह हो जाता है कि अगर ईश्वर को न माना जाए तो मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का क्या करेगा? क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि आदमी जो चाहे कर सकता है? या स्वतंत्रता के साथ कोई ऐसी जिम्मेदारी भी आती है, जिससे आदमी भाग नहीं सकता? दसतायेव्स्की के यहाँ नकारवाद इसलिए सिर्फ किसी विचारधारा का नाम नहीं रह जाता. वह मनुष्य के भीतर पैदा होने वाली उस खाली जगह का नाम बन जाता है, जहाँ पुराने विश्वास टूट चुके हैं लेकिन उनकी जगह अभी कुछ नया नहीं आया. और इसी खाली जगह में सबसे ज्यादा खतरा छिपा होता है. क्योंकि खाली जगह कभी खाली नहीं रहती. वहाँ कोई न कोई विचार आकर बैठता है. कोई प्रेम. कोई घृणा. कोई सत्ता. कोई ईश्वर. या फिर खुद आदमी का अहंकार.

दसतायेव्स्की बार-बार इसी क्षण तक पहुँच जाते हैं, जहाँ कोई विचार अभी अपराध भले नहीं बना है, लेकिन अपराध बनने की पूरी संभावना उसके भीतर पैदा हो चुकी है. यही वह जगह है जहाँ फिर मुझे उनका वह मनुष्य दिखाई देता है, जिसके सिर के भीतर उन्होंने जैसे कैमरा लगा दिया था. बस फर्क इतना है कि वह कैमरा बाहर की घटना पर नहीं रखते. वह उस एक क्षण पर रखते हैं, जब आदमी अपने भीतर किसी ऐसी चीज को जन्म देता है, जिससे बाद में खुद उसे डर लगने लगता है. ‘द ब्रदर्स करामाज़ोव’ में अलेक्सेई करमाज़ोव (एल्योशा) को लेकर यह बात क्रमशः समझ में आती है. दसतायेव्स्की ने उसे बाकी भाइयों से इसलिए अलग नहीं किया कि वह पाप से मुक्त है. बल्कि इसलिए कि वह दूसरे के पाप और दुःख के सामने रुक सकता है. यह रुकना बहुत मामूली चीज लगती है. लेकिन मनुष्य के लिए सबसे कठिन काम यही है. हम किसी दुखी आदमी को देखते हैं और तुरंत उसका कारण खोजने लगते हैं. उसने ऐसा क्यों किया? इसकी गलती क्या थी? इसे पहले ऐसा नहीं करना चाहिए था. इसने खुद अपने लिए मुसीबत खड़ी की. यानी दूसरे के दुःख के सामने पहुँचते ही हम फैसला सुनाने लगते हैं. एल्योशा फैसला नहीं सुनाता. वह सुनता है. और दसतायेव्स्की के यहाँ सुनना भी एक तरह का कर्म है.

इसी उपन्यास में एल्योशा के आध्यात्मिक गुरु ज़ोसिमा की शिक्षाओं में यह बात और गहरी होती है. ज़ोसिमा दूसरों के अपराध पर उंगली उठाने से पहले स्वयं के भीतर झाँकने पर ज़ोर देते हैं. उनके सामने एक ऐसा मनुष्य है जो दूसरों के अपराध का हिसाब रखने के बजाय अपने हिस्से की जिम्मेदारी को देखता है. यह विचार पहली नजर में बहुत असहज करता है. अगर किसी दूसरे ने अपराध किया है तो मैं उसके लिए जिम्मेदार कैसे? लेकिन ज़ोसिमा इसे कानून की जिम्मेदारी की तरह नहीं देखते. यह आत्मा की जिम्मेदारी है कि मैंने इस दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाया या थोड़ा खराब? मैंने किसी आदमी को गिरते देखकर उसका मजाक उड़ाया या उसका हाथ पकड़ा? मैंने किसी की कमजोरी का फायदा उठाया या उसे उसके भीतर लौटने की जगह दी?

यहाँ दसतायेव्स्की की करुणा अचानक बहुत सक्रिय हो जाती है. करुणा सिर्फ यह नहीं कि मुझे तुम्हारे दुःख पर दुःख हो रहा है. करुणा यह भी है कि तुम्हारे दुःख के सामने मैं अपने को निर्दोष घोषित करके किनारे न हो जाऊँ. अल्योशा भी लोगों को बदलने के लिए उन पर चढ़ नहीं जाता. वह उनके भीतर जगह बनाता है. इसीलिए इतने अलग-अलग लोग उसके सामने अपने मन की बातें कहने लगते हैं. मनुष्य को सबसे ज्यादा बोलने की जरूरत तब होती है जब उसे लगता है कि सामने वाला उसके बोलने के बाद उसे छोटा नहीं करेगा. दसतायेव्स्की ने अपने पात्रों के साथ-साथ पाठकों के लिए भी ऐसी जगह बनाई है. वह हमें अपराधी के भीतर जाने देते हैं. हत्यारे के भीतर. झूठे के भीतर. ईर्ष्यालु के भीतर. जुआरी के भीतर. नास्तिक के भीतर. और फिर अचानक हमें पता चलता है कि हम जिस आदमी को बाहर से देखकर दोषी ठहरा रहे थे, उसके भीतर भी डर था. अपमान था. भूख थी. प्रेम की इच्छा थी. स्वीकृति की भूख थी. इसका अर्थ यह नहीं कि उसका अपराध मिट गया. बल्कि अपराध को समझना और अपराध को माफ कर देना दो अलग बातें हैं. दसतायेव्स्की इन दोनों को मिलाते नहीं. यही उनकी करुणा को सस्ता होने से बचाता है.

दसतायेव्स्की की ताकत यह नहीं कि उन्होंने मनुष्य को सबसे ज्यादा समझ लिया था. बल्कि उन्होंने मनुष्य को समझ लेना इतना आसान मानने से इनकार कर दिया. यही वजह है कि इतने साल बाद भी रस्कोलनिकोव हमारे भीतर कहीं चलता रहता है. भूमिगत आदमी अपनी अँधेरी कोठरी से बोलता रहता है. मिश्किन की करुणा हमें रोकती है. एल्योशा की उपस्थिति किसी और रास्ते की संभावना दिखाती है. और करामाज़ोव परिवार की उथल-पुथल में हमें लगता है कि मनुष्य के भीतर प्रेम, वासना, ईर्ष्या, अपराध, विश्वास और विद्रोह अलग-अलग कमरे नहीं हैं. वह एक ही घर में रहते हैं. दसतायेव्स्की का पूरा साहित्य इसी घर की तलाश है. हालाँकि इस घर का कोई नक्शा उनके पास नहीं था. वह बस दरवाजा खोलते चले गए. और ‘द ब्रदर्स करमाज़ोव’ तक पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगता है जैसे वह मनुष्य के भीतर के लगभग सारे कमरों में घूम आए हों. लेकिन लौटकर भी उनके पास कोई सरल उत्तर नहीं है, होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि मनुष्य कोई पहेली नहीं जिसे हल कर दिया जाए.

इसीलिए इतने वर्षों बाद भी उन्हें पढ़ते हुए लगता है कि वह हमारे ही भीतर बैठे किसी ऐसे आदमी से मिलवा रहे हैं, जिसे हम दूसरों से छिपाते हैं. दसतायेव्स्की दिल की वारदात के पैगम्बर हैं.

 


विजयशंकर चतुर्वेदी
15 जून, 1970 (सतना, मध्यप्रदेश)

वरिष्ठ पत्रकार-लेखक
कविता संग्रह ‘पृथ्वी के लिए तो रुको’ राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित.
vijaysshankarchatturvedi@gmail.com

Tags: 20262026 आलेखफ़्योदर दसतायेव्स्कीविजयशंकर चतुर्वेदी
ShareTweetSend
Previous Post

27 डाउन की याद : अरविंद दास

Next Post

कविराज : संजय कुंदन

Related Posts

कला में निष्‍ठा और स्वतंत्रता : कुमार अम्‍बुज
पेंटिंग

कला में निष्‍ठा और स्वतंत्रता : कुमार अम्‍बुज

बस एक सीट के लिए : मनोज कुमार पांडेय
कथा

बस एक सीट के लिए : मनोज कुमार पांडेय

गांधी : एक रॉकस्टार फ़क़ीर :  त्रिभुवन
विशेष

गांधी : एक रॉकस्टार फ़क़ीर : त्रिभुवन

Comments 6

  1. Ram says:
    2 weeks ago

    गजब. हम जैसे नए पाठक के लिय इस तरह के लेख वरदान हैं. जो हमे उकसाते रहते हैं कि पढ़ना है. और थोड़ा बहुत पढ़ने की कोशिश करते रहते हैं. और एक इंसान बनने का रास्ता पता चलता है.

    Reply
  2. कुमार अम्बुज says:
    1 week ago

    दोस्तोएव्स्की के उपन्यासों को एक लेख और किसी सूत्रबद्घता में देखना दिलचस्प है। मनोयोग और विचारशीलता के साथ विजयशंकर चतुर्वेदी ने इसे संभव किया है। यह संवेदित पाठक के उद्वेलित विश्लेषण का उदाहरण है।

    Reply
  3. Krishan Garg. says:
    1 week ago

    अति सुंदर । दोस्तोवस्की के सभी पात्र ज़िंदा कर दिए ।
    💐💐💐💐

    Reply
  4. त्रिभुवन says:
    1 week ago

    दोस्तोयेव्स्की के बारे में यह लेख बहुत पठनीय है। जीवन के उत्तरार्ध में क्रांतिकारी समाजवाद के कठोर आलोचक हो गए दोस्तोयेव्स्की आधुनिक चेतना के लिए असाधारण रूप से महत्त्वपूर्ण हैं; क्योंकि उन्होंने पूँजी, गरीबी, अपमान, ऋण, वर्गीय अकेलेपन और मनुष्य के वस्तु में बदलते जाने की प्रक्रिया को उसके सबसे अँधेरे मनोवैज्ञानिक तहख़ानों तक देखा। ‘अपराध और दंड’ का रस्कोलनिकोव केवल अपराधी नहीं है; वह उस समाज की पैदाइश है जिसमें मनुष्य अपनी आर्थिक निरर्थकता को किसी असाधारण नैतिक अधिकार से भरना चाहता है। इस तरह हम देखते हैं कि हमारा वर्तमान समाज रस्कोलनिकोवों से भर चुका है और वे सत्ता को अपने तरीके से हांक रहे हैं। आधुनिक अलगाव को उन्होंने बखूबी रेखांकित किया है। उस आईने में हम देखते हैं तो लगता है कि हम मनुष्य के आदिम रूप को देख रहे हैं या आज के नागरिक को, जिसे संविधान ने स्वतंत्र तो घोषित किया है; लेकिन जिसकी स्वतंत्रता के पास न सामाजिक शक्ति है, न राजनीतिक चेतना और न सामूहिकता। ‘करमाज़ोव बंधु’ में धर्म, संपत्ति, पितृसत्ता, इच्छा और नैतिक उत्तरदायित्व एक-दूसरे से लड़ते हैं। यह लेख भी दोस्तोयेव्स्की की महत्ता बहुत कुशलता से प्रतिपादित करता है। दोस्तोयेव्स्की की महानता एक ख़ास विरोधाभास में है। उनकी वैचारिकी कई बार रूढ़िवादी दिखाई देती है; लेकिन उनकी कलात्मक दृष्टि अपने ही वैचारिक निष्कर्षों से कहीं अधिक विद्रोही है। वे शोषण को सिद्धांत की भाषा में नहीं, मनुष्य की नसों में घटती हुई घटना की तरह पकड़ते हैं। वे बहुत ही ताक़तवर लेखक हैं। इसीलिए आधुनिक मार्क्सवादी अध्ययन उन्हें खारिज नहीं करता; वह उनमें पूँजीवादी आधुनिकता की उस आंतरिक हिंसा को पढ़ता-देखता और समझता है, जिसमें गरीबी केवल जेब खाली नहीं करती। वह आत्मसम्मान, प्रेम, नैतिकता और कभी-कभी विवेक तक को विकृत कर देती है। दोस्तोयेव्स्की का संसार बताता है कि वर्ग-संघर्ष बाहर जितना है, मनुष्य के भीतर भी उतना ही है। इस हिसाब से यह लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है और इस तरह के लेखों की बहुत ज़रूरत है, ताकि हम मनुष्य समाज को ही नहीं, आज की राजनीति, सत्ता और संस्कृति की तहों के नीचे बहती अमानुषिकता के गटर को पहले देख सकें और फिर इस मन:स्थिति में आएं कि इसे साफ़ भी करना है।

    Reply
  5. पवन करण says:
    1 week ago

    दोस्तोव्स्की के उपन्यासों से होकर गुजरती। उनके प्रमुख पात्रों के भीतर तल में झांकती। उनके आंतरिक मनोविज्ञान और वाह्य व्यवहार को व्याख्यायित करती ये दृष्टिवान यात्रा है। उल्लेखनीय और प्रशंसनीय।….वाह

    Reply
  6. Akhilesh Kumar says:
    1 week ago

    आज के इस विरल समय में जब पत्रिकाएं, विशेषकर हिंदी साहित्य संसार को उदभासित करती पत्रिकाएं धीरे -धीरे लुप्त हो चुकी है और शेष अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत हैं, आपका यह एकांतिक प्रयास अत्यंत सराहनीय है! प्राणी जगत के साथ साथ डार्विन का पारिस्थिक अनुकूलन का सिद्धांत साहित्य और समालोचना पर भी लागू होता है और इसी के चलते कागज़ से डिजिटल तक की आपकी यह यात्रा सुगम और सार्थक हो, यही ईश्वर से कामना है. साधुवाद 🙏

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2026 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक