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Home » गले का पट्टा : संतोष दीक्षित

गले का पट्टा : संतोष दीक्षित

वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित की नई कहानी ‘गले का पट्टा’ प्रस्तुत है. इसमें एक प्रशासनिक अधिकारी, चुनाव ड्यूटी और एक युवा पशु-चिकित्सक के बीच दाँव-पेंच की महीन कारगुज़ारियों की ख़ोज-ख़बर ली गई है. जाति भी अपना काम कर रही है. आप पढ़िए.

by arun dev
March 20, 2026
in कथा
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गले का पट्टा : संतोष दीक्षित
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गले का पट्टा
संतोष दीक्षित

 

डॉ. शशि भूषण ने न तो इसे एक आघात के रूप में लिया था, ना ही उनके अंदर किसी तरह की कोई वैमनस्यता या कटुता थी. वह एक दक्ष पशु चिकित्सक थे और पशुओं का इलाज करने में, उनका कष्ट हरने में, उन्हें दिली सुकून मिलता था. गरीब पशुपालक जब अपने पशुओं को फिर से स्वस्थ व उत्पादन करने की अवस्था में पाते, उनके चेहरे खिल उठते. पशुपालकों के मुरझाए चेहरे खिले देख डॉ. शशि भूषण भी आह्रलाद से भर उठते. वह स्वयं एक गरीब किसान के बेटे थे और जानते थे कि मूक पशुओं का ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संवारने में, गरीब किसानों की आमदनी बढ़ाने में, कितना योगदान है! यही एकमात्र कारण है कि तमाम झंझटों और तरद्दुद के बावजूद किसान पशुओं को पालने से कभी पीछे नहीं हटते हैं.

डॉ. शशि भूषण राजधानी से सुदूर एक छोटे जिले में सीनियर वेटरीनरी सर्जन के पद पर कार्यरत थे. अपने शहर और आसपास के गांव में अपने कार्य के प्रति निष्ठा और दक्षता के कारण वह काफी लोकप्रिय थे. वह इस जिले में पिछले दो वर्षों से अपनी इसी दिनचर्या के साथ काफी व्यस्त और खुश थे.

चुनाव का समय आ गया था. सत्ता अपनी चालें चलने लगी थीं. बिसात बिछने लगे थे, गोटियाँ सजने लगी थीं. इसी के अंतर्गत इस सुदूर जिले में एक युवा तेज-तर्रार जिलाधिकारी की पदस्थापना हुई. नाम था संजय वर्मा. सांवला चेहरा, करीने से कटी मूछें, नपी-तुली बोलचाल, तेज कदम चाल और आंखों में एक ठंडी कठोर चमक. ऐसी चमक उन लोगों में ही होती है, जिनमें यह आत्मविश्वास आ जाता है कि इस दुनिया का कुछ भी उनकी समझ के अख्तियार से बाहर नहीं. चुनाव का समय था. नए साहब की कुंडली भी खंगाली जा रही थी. लेकिन पता नहीं चल पा रहा था की कौन वाले वर्मा जी हैं … अगड़े या पिछड़े वाले?

महीने भर में ही डीएम साहब अपनी ईमानदारी के कारण लोकप्रिय हो गए. हर बात में जिज्ञासा, प्रत्येक फाइल में क्वेरी! ऑफिस में कार्यरत अफसर, बाबू, सप्लायर से लेकर जिले में कार्यरत पदाधिकारी, कर्मचारी, शिक्षक… सभी उनकी निगाह में पहले शक के घेरे में आते, फिर धीरे-धीरे अपनी सामान्य अवस्था को प्राप्त कर पाते. उनके बारे में यह प्रसिद्ध हो गया कि वह सख्त हैं, रिश्वत नहीं लेते और किसी पर विश्वास नहीं करते. यह अंतिम दो गुण लोगों को पहले दो गुणों से भी अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा था. जिले के पुराने वकील कहते- “ईमानदार है, पर आदमी को आदमी नहीं समझता!” बाबू लोग धीरे से जोड़ते-” जिससे मिलता है उसे चोर समझता है.” उसके निकटवर्ती कर्मचारी, जो अबतक उसकी प्रशंसा करने को अभिशप्त हो चुके थे, कहते- साहब भीतर से बहुत क्लियर हैं!” पर उनके चेहरों पर भी वह प्रसन्नता नहीं होती थी जो किसी प्रिय स्वामी की भक्ति में नजर आती है! बल्कि उसकी जगह एक चौकन्नापन होता था जो किसी कठोर किंतु निष्पक्ष मालिक के अधीन काम करने वालों में पाया जाता है.

देखते देखते चुनाव की घोषणा हो गई और धीरे-धीरे पूरा जिला चुनावमय हो गया. एक कॉलेज को स्ट्रांग रूम में बदलने की तैयारी शुरू हो गई. एक बड़े मैदान वाले हाई स्कूल में चुनाव कार्य के लिए पकड़े गए वाहनों की कतारें लगने लगीं. पेट्रोल पंप व्यस्त रहने लगे. स्टीकर लगी गाड़ियां पूरे जिले में दौड़ने लगीं. जिले भर के अधिकारी, कर्मचारी प्रतिनियुक्त किये जाने लगे. जिले में त्राहिमाम मच गया. लाउडस्पीकर चीखते हुए उम्मीदवारों का प्रचार करने लगे. ऐसे ही वक्त डॉक्टर शशि भूषण की ड्यूटी भी एक बूथ में लगाई गई. पीठासीन पदाधिकारी के रूप में. अमुक-अमुक तिथि को प्रशिक्षण के लिए हाजिर होने का फरमान भी आ गया.

डॉक्टर शशि भूषण चिंतित हो गए. अपने लिए नहीं, उन पशुपालकों के लिए, उन बेजुबान प्राणियों के लिए, जिनकी चिकित्सा वह शुरू कर चुके थे और उन्हें बीच में छोड़कर जाना कहीं से भी हितकारी नहीं था. उन्होंने एक आवेदन लिखा. बहुत ही विनम्र शब्दों में. उसमें कहा गया कि इस मौसम में पशुओं में कई तरह की बीमारियां बढ़ जाती हैं. कई गांवों में दूध देने वाले पशुओं का उपचार चल रहा है. अतः गरीब पशुपालकों को काफी दिक्कत होगी. यही वजह है कि उनका भी मानव चिकित्सकों के समान कार्य हित में अस्पताल में रहना अधिक आवश्यक है. वह आदेश की अवज्ञा नहीं कर रहे, केवल वर्णित कठिनाइयों के आलोक में पुनर्विचार चाहते हैं.

जिलाधिकारी के बारे में सब कुछ जानने-सुनने के बाद उसके अंदर उनके प्रति और भी सम्मान की भावना जग उठी थी. आवेदन लेकर वह स्वयं उपस्थित हुए. वह जिस समय पहुंचे, कमरे में पहले से कुछ लोग बैठे थे- भूमि सुधार उप समाहर्ता, आपूर्ति पदाधिकारी, कई सारे डिप्टी कलेक्टर और दो-तीन बाबू भी! बर्मा साहब ने उसकी अर्जी पढ़ी. फिर अपनी कुर्सी की पीठ से सर टिकाकर कुछ देर को आंखें मूँद ली. उसके बाद फाइल पर नीली स्याही से बड़े अक्षरों में लिख दिया- चुनाव कार्य सर्वोपरि? कोई छूट नहीं!

डॉक्टर ने नम्रता से कहा, “सर मेरा अस्पताल क्षेत्र बड़ा है. पशुपालक परेशान हो जाएंगें. मैं अपनी ड्यूटी से आज तक कभी भागा नहीं. आज भी भाग नहीं रहा… बस निवेदन….” लेकिन वर्मा साहेब ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए  कहा- “डॉक्टर, आप लोग प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं और अपने घोटाले वाले बदनाम विभाग को बहुत गंभीरता से लेते हैं…मानव चिकित्सकों के समान हुँह. पशुपालन विभाग का कोई ऐसा खास काम नहीं, मैं जानता हूं. यह विभाग बंद भी हो जाए तो जनता पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा!”

कमरे में बैठे लोग चुप रहे. कुछ ने सर भी झुका लिया. ऐसी चुप्पियाँ सरकारी दफ्तरों में पैदा नहीं होतीं, पाली जाती हैं.

डॉक्टर का चेहरा लाल पड़ गया. वह स्वभाव से तीखा मनुष्य नहीं था. लेकिन कुछ वाक्य भीतर कहीं बहुत गहरे जाकर चोट करते हैं. उसके साथ उस समय कुछ ऐसा ही हुआ था. उसने धीमी मगर साफ आवाज में प्रतिकार करते कहा, “हुजूर आपको पावर है! आप चाहें तो कुत्ते के गले में भी पट्टा डाल दें तो वह मजिस्ट्रेट हो जाएगा. लेकिन किसी मजिस्ट्रेट के गले में पट्टा डाल देने से वह मेरे जैसा डॉक्टर नहीं बन सकता!”

कमरे में एक क्षण को सन्नाटा रहा. फिर कोई एक व्यक्ति अपनी मुस्कान नहीं दबा सका और फिर मुस्कान की एक स्मित रेखा धीरे-धीरे सबके चेहरों पर फैल गई. यह कोई ऐसी हंसी नहीं थी, कि जिससे किसी का कोई नुकसान हो! ए सिम्पल बेनाइन ह्रूमर! मगर वर्मा साहब सरीखे अफसरों के लिए इतना काफी था कि इसे एक अपमानजनक रूप में स्वीकार किया जा सके! वर्मा साहब का चेहरा कठोर हो गया. उस वक्त उन्होंने केवल इतना ही कहा- “यू में गो नाउ!”

डॉक्टर बाहर चला आया. सड़क पर तेज धूप थी. उसे लगा जैसे वह अभी-अभी किसी गलती के लिए नहीं, बल्कि अपने एक सत्य के लिए दंडित हुआ हो. उसका पूरा बदन क्रोध और तीखी धूप के कारण चुनचुनाने लगा था. फिर भी इस अपमान को बर्दाश्त करे उसने अपनी मोटरसायकिल स्टार्ट की और अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर हो गया.

 

2.

चुनाव में उसकी ड्यूटी सबसे दूरस्थ इलाके के एक बूथ पर लगी थी. संयोग से उस गांव का मुखिया उसका पुराना परिचित था. कभी एक शाम यहाँ आकर और मुखिया जी के यहाँ सारी रात रुक उसने उनकी एक कीमती भैंस की जान बचाई थी. इसी वजह से उसके और उसकी पूरी टीम को वहाँ कोई दिक्कत नहीं हुई. सबसे ज्यादा दिक्कत अगर कुछ हुई थी तो वहाँ तक ट्रैक्टर में बैठ आने में हुई. उसकी लाख अभ्यर्थना के बावजूद वाहन इंचार्ज अधिकारी ने उतनी दूर जने के लिये भी उसे जीप प्रदान नहीं किया धा. बक्सा जमा करने मुख्यालय आने में ट्रैक्टर की वजह से उसे देर भी काफी लग गई. ट्रैक्टर रास्ते में खराब हो गया था. काफी हुज्जत के बाद एक दूसरे वाहन से उसे यहाँ पहुँचाया गया. बक्सा जमा करते वक्त भी उसके तमाम पेपरों की गहन जांच हुई. लेकिन थोड़ी हुज्जत और थोड़ा कड़ा रुख अपनाने के बाद उसे डिपाॅजिट स्लिप मिल गई. स्वयं जिला निर्वाचन पदाधिकारी तक को उससे सहानुभूति हो आई थी.
इसके कुछ ही दिनों बाद जिलाधिकारी महोदय औचक रूप से उसके

पशु अस्पताल के निरीक्षण को आ प्रस्तुत हुए. अस्पताल की इमारत और चिकित्सक निवास वगैरह अंग्रेजों को के जमाने का ही बना था, जो अब काफी जर्जर हो चला था. अस्पताल की छत खपरैल की थी और कई जगह से यह चूती थी. कमरे में छोटे-मोटे गड्ढ़े उभर आए थे और प्लास्टर तो पूरी तरह से उखड़ चुका था. जबकि बाहर छूटी थोड़ी खुली जगह पूरी तरह से साफ-सुथरी थी. किनारे से कई तरह के फूलों के पौधे करीने से लगे थे. एक बगल में लोहे का एक ‘ट्रेविस’ था जिसमें ‘लाॅक’ कर पशुओं का इलाज होता था. जरूरत पड़ने पर रस्सी की गांठ लगा, उसके सहारे पशुओं को जमीन पर गिरा देने की आसान व्यवस्था का जानकार कर्मचारी भी था. इसे तब अंजाम दिया जाता जब छोटे-मोटे ऑपरेशन या बड़े जख्मों के चीर-फाड़ की जरूरत पड़ती. वर्मा साहब अस्पताल की बुरी हालत देख स्वयं ही अचंभित थे. तिस पर से डॉक्टर शशि भूषण ने उन्हें पत्राचार की वह पूरी फाइल सौंप दी, जिसमें ढेर सारे आवेदन और उनके वैसे स्मार पत्र सुरक्षित थे, जो भवन की मरम्मत के लिए विभाग और जिलाधिकारी महोदय को समय-समय पर लिखे गए थे. वर्मा साहब ने दवाओं की सूची जांची और मिलान करवाया. चिकित्सा करने आए कुछ पशुपालकों से अकेले में ढेरों सवाल पूछे. चौतरफा डाक्टर का गुणगान और कुछ भी आपत्तिजनक न पाकर उतरे हुए चेहरे के साथ वापस लौट गए. यहाँ तक की डॉक्टर शशि भूषण द्वारा मंगाये गए अल्पाहार और शीतल पेय की ओर भी ओछी नजर से देखते हुए कहा- “मैं ड्यूटी पर किसी का दिया कुछ नहीं खाता.” जबकि उनके पीठ पीछे उनके साथ आए बॉडीगार्ड, ड्राइवर और अधीनस्थ कर्मचारी वगैरह खूब खा-पीकर तृप्त हो चुके थे.

डीएम साहब बिल्कुल ‘सूखे’ ईमानदार थे, ऐसी बात भी नहीं! धीरे-धीरे उनके जैसे विशाल हाथी के खाने के दांत भी दिखने लगे थे. सिविल सर्जन, जिले के इंजीनियर, सप्लायर वगैरह के मुंह से फूटी डकार की आवाज धीरे-धीरे गंदी हवा की तरह फैलने लगी थी. जब वह यहाँ आए थे, उनके परिवार में एक गोद का बच्चा व पत्नी ही थे. जबकि ज्वाइन करते ही ढेर सारे रिश्तेदार तफरीह करने को आते-जाते रहते. उन सब के आने-जाने की व्यवस्था सरकारी वाहनों से होती. खाने-पीने, घूमने फिरने की व्यवस्था पूरी विनम्रता से उनके स्टेनो बाबू के माध्यम से सप्लायर ही करते. जिले में सबसे ज्यादा चलती थी किसी की, तो एकमात्र उनके स्टेनो की. एक उसी की वह सुनते और सहते भी थे. उनकी विशाल कोठी के आउट हाउस में बच्चे और परिवार के लिए शुद्ध दूध की वास्ते एक देसी काली गाय एक सप्लायर की कृपा से आ चुकी थी. चुनाव के वक्त सारे सप्लायरों की खूब अच्छी-खासी चलती रही थी. पूरे जिले में स्टेनो बाबू की कृपा से सब ठीक-ठाक चल रहा था. काली गाय के लिए पौष्टिक चारे की व्यवस्था का जिम्मा स्टेनो बाबू ने आगे बढ़कर स्वयं के माथे लेते हुए कहा था- “हुजूर! मेरे घर पांच जानवर हैं. दूध का व्यवसाय न करें तो इस मामूली नौकरी से इतना छहर-महर कहाँ संभव है? सो पांच की खुराक में ही छठे का निवाला भी निकल आयेगा, आप जरा भी टेंशन न लें. आप कहाँ एक गाय के पीछे हलकान होते रहेंगे?”

अब भला ऐसे विघ्ननाशक, समस्याभंजक स्टेनो की साहेब कैसे नहीं सुनते! परदेस में ऐसा विकट सहयोगी बहुत मुश्किल से ही मिलते हैं. डीएम साहब हमेशा की तरह उसके कहे पर सर हिलाते और सुबह के कठोर शारीरिक व्यायाम के बाद नाश्ते में गाय के शुद्ध दूध के साथ कॉर्नफ्लेक्स का सेवन करते.

जाहिर सी बात थी. गाय कोठी मैं आते ही डॉक्टर शशि भूषण को प्रत्येक सप्ताह उसके स्वास्थ्य परीक्षण की जिम्मेदारी सौंप दी गई. वह पहले सप्ताह आए और गोपालन संबंधी जरूरी हिदायतों के साथ गाय को प्रतिदिन खिलाने के लिए मिनिरल मिक्सचर के दो पैकेट भी दे गए. डीएम साहब कोठी में ही थे, लेकिन उनसे मिलने की उनमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. यहाँ तक कि डॉक्टर साहब ने लौटने से पहले साहेब को सम्मान देने के वास्ते जब उन्हें सलाम करने की अपनी इच्छा प्रकट की, इसे भी व्यस्तता का हवाला देकर अस्वीकृत कर दिया गया. डॉ. शशि भूषण को अपनी पच्चीस साला नौकरी में अब तक का यही अनुभव रहा था कि अधिकांश उच्च प्रशासनिक अफसर सामंती मिजाज के ही होते हैं. वह ऐसे अवसरों पर मुसकुराते हुए चुपचाप अपना काम करते और चल देते. यह उनकी आदत में शुमार हो चला था. सो उन्हें जरा भी मलाल न हुआ.

अगली विजिट के समय वह नहीं गए. बोले कि जब तक कोई ऐसी इमरजेंसी न हो, समयाभाव के कारण उनका आ पाना मुमकिन नहीं. अभी उन्हें कॉल पर कई गांवों का दौरा करने जाना है, जहाँ गंभीर रूप से बीमार कई पशुओं को देखना ज्यादा जरूरी है.

स्टेनो बाबू ने पूछने पर यह बात सामान्य तरीके से जिलाधिकारी को बतायी. जिलाधिकारी ने इसपर कड़ी कार्यवाई करते हुए उन्हें जिले की कई कमेटियों का सदस्य नियुक्त कर दिया. किसी भी बैठक में उनकी कोई विशेष भूमिका नहीं रहती. बेचारे हाजिरी बना पीछे बैठे ऊंघते रहते. लेकिन हाजिरी बनानी जरूरी थी. नहीं तो वेतन भुगतान बंद होने का खतरा था. इसे स्टेनो बाबू ने समझा दिया था. डाक्टर के लिये वेतन हर हाल में बेहद जरूरी था. दोनों बच्चे हॉस्टल में रहकर तकनीकी पढ़ाई पढ़ रहे थे. उन्हें प्रत्येक माह पैसे भेजते जाना बहुत जरूरी था. परदेस में सबसे बड़ा आसरा पैसे का ही रहता है.

फिर भी दो मीटिंग के बाद वह तीसरे में अनुपस्थित हो गए. जिलाधिकारी के पी. ए. का फोन आने पर अपनी खराब तबीयत का हवाला देते हुए आने-जाने के वास्ते वाहन उपलब्ध कराने की मांग की. बैठक में भाग लेने वाले सारे पदाधिकारी अपने वाहनों से आते थे. केवल एक वही बिना वाहन के थे. उन्होंने एक तकनीकी प्रश्न भी उठाया–अपना पेट्रोल जलाकर सरकारी बैठक में क्यों आएंगे? आखिर जिले के अंदर पाँच किलोमीटर की इस यात्रा के लिए वह कोई यात्रा-भत्ता भी नहीं ले सकते.वैसे भी उनके कार्यालय में सालाना टी. ए. मद का आवंटन पाँच हजार से अधिक नहीं आता. इसमें उनके अधीनस्थ कर्मचारियों का हिस्सा भी सम्मिलित रहता है.

इसी बीच चुनाव हुए साल भर बीतने को आए थे. नई सरकार मजे से अपनी नित्य नई घोषणाओं के सहारे मजे से दौड़ने लगी थी. तभी एक दिन अचानक डी. एम. साहब के तबादले की खबर आ गई. उन्हें राजधानी में एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

विदाई की तैयारी होने लगी. अब लोग पुराने डी. एम. के बारे में बिना किसी लाग लपेट के बोलने लगे थे. जो लोग उनसे लाभान्वित हुए थे, वह इस बात का पता लगाने और इस चर्चा में निमग्न थे कि नए अधिकारी का स्वभाव कैसा होगा?

वर्मा साहब अब जल्द से जल्द यहाँ से जाना चाहते थे. वह जानते थे कि अस्त होते सूर्य की नहीं, हर जगह उगते सूर्य की पूजा होती है, जो कि यहाँ भी शुरू हो चुकी थी. गाय के बारे में राय नहीं बन पा रही थी कि इसे ले जाया जाए या यहीं बेच दिया जाए? स्टेनो बाबू ने जम्हाई लेते हुए राय दी – “न हो तो डॉक्टर शशि भूषण से राय ले ली जाए.

डॉक्टर को बुलाया गया. वह आए. उन्होंने गाय के आगे-पीछे घूमकर उसका भली प्रकार मुआयना किया. उसके पुट्ठों की जांच की. फिर उसने एक बाल्टी पानी और साबुन मंगवाया. साबुन से भली प्रकार हाथ धोकर उसने अपना बायाँ हाथ गाय के मल-द्वार के अंदर डाल मिनट भर तक गहराई से जांच की.

“इसे छोड़ना ठीक नहीं होगा. यह गभिन है. बियाने के बाद इसकी कीमत काफी अधिक हो जाएगी. दूध भी बढ़िया देगी.”

“क्या आप पूरे निश्चय से कह रहे हैं? पहली बार जिलाधिकारी उसके कार्यों का निरीक्षण करते थोड़ी दूर एक कुर्सी पर बैठे थे.

“मेरा परीक्षण कभी गलत नहीं होता! आपकी सुविधा के लिए मैंने बिना ग्लव्स पहने ही गाय की आन्तरिक जांच भी की… खुद के संक्रमित होने की परवाह किए बिना. इसे सावधानीपूर्वक ले जाना होगा.”

भला एक जिलाधिकारी के लिए संसाधनों की क्या कमी! गाय सकुशल राजधानी पहुंच गई. वर्मा साहब एक विभाग में विशेष सचिव हो गए. यहाँ जिलाधिकारी जितनी सुविधा नहीं थी. नये सरकारी आवास में गाय को पहले के हिसाब से चारे-दाने की सुविधा काफी कम हो गई थी. एक महीने में ही वह काफी कमजोर हो गई. वर्मा साहब को कुछ संदेह हुआ. उनसे ज्यादा उनकी पत्नी को. नये सेवादारों को भी. यहाँ उनको कई जतन करने पड़े. यहाँ तक की पशुपालन विभाग के एक समकक्ष अफसर से निवेदन करना पड़ा. तब कहीं जाकर एक पशु चिकित्सक ने उनके आवास पर आकर अपनी सेवा दी. उसने गाय की जांच के बाद इतना ही कहा कि गाय कहीं से भी गाभिन नहीं. किसी ने आपके साथ मजाक किया है.

वर्मा साहब सन्न खड़े रह गए. उनके सामने रह-रहकर कभी डॉक्टर शशि भूषण का निरीह चेहरा कौंध आता लो कभी निवेदन-सी करती उसकी थरथराती हुई धीमी आवाज उनके कानों में गूंजने लगती. वह अपनी इस पराजय पर एक सूखी हंसी हंसकर रह गए. पत्नी उनकी ओर देखे जा रही थी. उन्होंने उससे अकेले में कहा- “मैं उसे छोड़ने वाला नही! कल ही नए डी. एम. से बात करता हूं.”

धीरे-धीरे यह बात पशुपालन विभाग से होते उस जिले तक फैल चुकी थी. नया डीएम प्रमोटी था. अधेड़ और खुर्राट. कुछ दिनों बाद उसने डॉक्टर शशी भूषण को मिलने बुलाया.

नये साहेब की जाति की जानकारी हो चुकी थी. कार्यालय पहुँचे डाक्टर साहेब सहमें से एक कोने में खड़े थे. स्टेनो बाबू ने हंसते हुए उनका स्वागत किया और बोले- “आपने बहुत सही किया डॉक्टर साहब! ऐसे बिगड़ैल लोगों को ऐसी ही चिकित्सा देनी चाहिए!”

“लेकिन अब आगे कहीं या साहब भी पीछे पड़ गए तो… मेरे लिए तो अब यहाँ से तबादला करा लेना ही बेहतर होगा!”

“आप जरा भी चिंता ना करें. आप और नये साहब एक ही जाति के हैं और मैंने उन्हें यह समझा दिया है. गले का यह पट्टा तमाम अन्य पट्टों से श्रेष्ठ होता है. चुपचाप जाकर इसे धारण कर लें. अपने गांव का नाम, पता, सब साहेब को बतला दें. वैसे भी वर्मा साहब के प्रति उनके अंदर कोई अच्छी भावना नहीं. चार्ज देते समय इन्हें प्रमोटी जान उन्होंने काफी हुज्जत किया था.

एक सप्ताह बाद वर्मा साहब का फोन जब नए डी. एम. के पास आया, उन्होंने गंभीर होते हुए कहा, “उसको यहाँ बुलाकर खूब डांट दिया है सर! उसने माफी मांगी है. बताया कि गाय इतनी खायी-पी हुई और तंदुरुस्त थी कि उससे तकनीकी भूल हो गई. अब इसका क्या किया जाए सर…?”

उधर से फोन रखने की धीमी क्लिक की आवाज आई. मामला खत्म हो गया था.

 

 

संतोष दीक्षित
08 दिसम्बर 1958,
कहानी संग्रह’ आखेट’ (1997), ‘शहर में लछमिनियाँ’ (2001), ‘ललस’ (2004), ‘ईश्वर का जासूस’ (2008) एवं ‘भूप में सीधी सड़क’ (2014)
तीन व्यंग्य संग्रह एवं व्यंग्य कहानियों का एक संग्रह ‘बुलडोजर और दीमक’ तथा चयनित व्यंग्य 2022 में प्रकाशित.उपन्यास ‘केलिडोस्कोप’ 2010 में, ‘घर बदर’ वर्ष 2020, बगलगीर 2022 एवं ‘बैल को आँख 2023 में प्रकाशित.
बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान से सम्मानित.

santoshdixit17@gmail.com

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Comments 3

  1. हरेप्रकाश उपाध्याय says:
    3 weeks ago

    कहानी पढ़ ली। प्रशासनिक अधिकारियों की अकड़परस्ती का खूब जायजा लिया है आपने। ईमानदारी की कठोर परत के नीचे स्वार्थ व सुविधाभोग का परनाला भी बहता रहता है।

    Reply
  2. सवाई सिंह शेखावत says:
    3 weeks ago

    वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित की यह कहानी प्रशासनिक हलकों के दुराग्रहों,आंतरिक भ्रष्टाचार और मनोवैज्ञानिक व जातिगत प्रतिकार की यथार्थ तस्वीर पेश करती है, लेखक को बधाई!

    Reply
  3. प्रत्यूष चन्द्र मिश्र says:
    3 weeks ago

    वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित की यह कहानी प्रशासनिक महकमे के सामन्ती मिजाज और व्यवस्था की जकडन को सामने रखती है.आज भी भारत की प्रशासनिक व्यवस्था अंग्रेजी राज वाली है.प्रशासन के निचले स्तर पर काम करते हुए मैंने इस बात को बहुत गहराई से महसूस किया है.समालोचन को बधाई.

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