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समालोचन

Home » गणराज्य का स्वधर्म : कुँवर प्रांजल सिंह

गणराज्य का स्वधर्म : कुँवर प्रांजल सिंह

by arun dev
April 7, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 3 mins read
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गणराज्य का स्वधर्म : कुँवर प्रांजल सिंह
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गणराज्य का स्वधर्म या स्वधर्म का गणराज्य
कुँवर प्रांजल सिंह

 

योगेंद्र यादव की किताब गणराज्य का स्वधर्म को पढ़ना केवल एक नई किताब से गुजरना नहीं है बल्कि उनके पूरे बौद्धिक सफ़र के साथ एक आलोचनात्मक संवाद में प्रवेश करना है. 333 पृष्ठों में फैली यह किताब पहली दृष्टि में सवालों की एक पोटली जैसी लगती है, लेकिन जैसे-जैसे पाठक इसके भीतर उतरता है, यह स्पष्ट हो जाता है कि यह भारतीय लोकतंत्र के आत्म-संघर्ष का एक ऐसा दस्तावेज़ जो न केवल व्यवस्था से प्रश्न करने के साथ साथ स्वयं लेखक की पूर्व मान्यताओं को भी कटघरे में खड़ा करता है.

इस किताब की समीक्षा की शुरुआत, स्वाभाविक रूप से, योगेंद्र यादव के उन लेखों की आलोचनात्मक स्मृति से करनी चाहिए, जिन्होंने एक समय में भारतीय समाज विज्ञान को नई दिशा दी थी. मेकिंग सैन्स ऑफ़ इंडियन डेमोक्रेसी : थ्योरी एंड प्रैक्टिस (2020), स्टेट ऑफ़ डेमोक्रेसी इन साउथ एशिया (2008), इन किताबों के साथ लेखों में इलेक्शन पॉलिटिक्स इन द टाइम ऑफ़ चेंज, इंडियस थर्ड इलेक्टोरल सिस्टम 1989–99 और अंडरस्टेंडिंग सेकंड डेमोक्रेटिक उपसर्ज, जैसे लेख केवल अकादमिक हस्तक्षेप नहीं थे; वे उस दौर के बौद्धिक आत्मविश्वास के प्रतीक भी थे. जब भारतीय राजनीति को ‘परिवर्तन’ के एक बड़े आख्यान में पढ़ा जा रहा था.

यह वह समय था जब 1990 के बाद का भारत गहरे राजनीतिक-सामाजिक संक्रमण से गुजर रहा था. मंडल राजनीति ने सामाजिक न्याय के प्रश्न को सत्ता के केंद्र में ला खड़ा किया, मंदिर आंदोलन ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उभार दिया, आर्थिक उदारीकरण ने राज्य की भूमिका को पुनर्परिभाषित किया और गठबंधन राजनीति ने केंद्रीकृत सत्ता संरचना को तोड़ दिया. कांग्रेस का वर्चस्व ढह रहा था, क्षेत्रीय दल उभर रहे थे और पिछड़े-दलित समुदाय पहली बार निर्णायक राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने आ रहे थे. लोकतंत्र अब केवल संस्थागत प्रक्रिया नहीं रह गया था बल्कि ‘प्रतिनिधित्व’ के नए दावों और पहचानों की जटिल भूमि बन चुका था.

 

योगेंद्र यादव ने इस ऐतिहासिक क्षण को बड़ी संवेदनशीलता के साथ समझने का प्रयास किया. ‘तीसरा चुनावी तंत्र’ और ‘दूसरा लोकतांत्रिक उभार’ जैसे उनके प्रतिपादन इसी परिवर्तन को सिद्धांतबद्ध करने की कोशिश थे. उनके विश्लेषण में लोकतंत्र एक गतिशील प्रक्रिया के रूप में उभरता है; जहाँ हाशिए के समुदाय सत्ता संरचनाओं में प्रवेश कर रहे हैं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विस्तार हो रहा है. लेकिन यहीं से उनकी बौद्धिक परियोजना की सीमाएँ भी उजागर होने लगती हैं. जिस परिवर्तन को उन्होंने लोकतंत्र के ‘उभार’ के रूप में प्रस्तुत किया. वह वस्तुतः एक असमान, अधूरा और अंतर्विरोधों से भरा संक्रमण था. उनके लेखों में बार-बार यह विश्वास दिखाई देता है कि चुनावी भागीदारी का विस्तार अपने आप सामाजिक न्याय में परिणत होगा. परंतु यह विश्वास उस कठोर यथार्थ से टकराता है जहाँ सत्ता के नए केंद्र तो बनते हैं लेकिन सामाजिक वर्चस्व के पुराने ढाँचे अपनी जड़ें बनाए रखते हैं. दरअसल, लोकतंत्र का जो ‘उभार’ उनके विश्लेषण में दिखाई देता है, वह कई बार प्रतीकात्मक अधिक और संरचनात्मक रूप से सीमित साबित होता है.

प्रतिनिधित्व का विस्तार वास्तविक सशक्तिकरण में बदलने से पहले ही सत्ता की पुरानी संरचनाएँ उसे आत्मसात कर लेती हैं. इस प्रकार, योगेंद्र यादव का लोकतांत्रिक आशावाद एक ऐसे बिंदु पर आकर ठहर जाता है, जहाँ वह परिवर्तन की गहराई को पूरी तरह नहीं माप पाते. उनकी विश्लेषणात्मक दृष्टि में एक प्रकार का ‘डेटा-आधारित विश्वास’ भी झलकता है; जहाँ चुनावी आँकड़े और प्रवृत्तियाँ व्यापक सामाजिक निष्कर्षों का आधार बन जाती हैं. लेकिन भारतीय समाज की जटिलता केवल आँकड़ों से नहीं समझी जा सकती; वह अनुभवों, असमानताओं और मौन संघर्षों की परतों में छिपी होती है. यही कारण है कि उनके कई निष्कर्ष ज़मीनी यथार्थ की कठोरता के सामने अधूरे प्रतीत होते हैं. इसी आलोचनात्मक पृष्ठभूमि में गणराज्य का स्वधर्म एक नया अर्थ ग्रहण करता है. यह किताब केवल भारतीय लोकतंत्र की आलोचना नहीं करती बल्कि कहीं-न-कहीं योगेंद्र यादव के अपने पूर्व लेखन की भी अप्रत्यक्ष समीक्षा प्रस्तुत करती है.

 

 

स्वधर्म का प्रश्न 

गणराज्य का स्वधर्म में लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया या प्रतिनिधित्व के विस्तार के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे एक नैतिक और सांस्कृतिक परियोजना के रूप में समझने का प्रयास किया गया है. यह किताब बार-बार इस प्रश्न पर लौटती है कि क्या भारतीय लोकतंत्र केवल संस्थाओं के संचालन तक सीमित रह गया है या वह अपने मूल नैतिक उद्देश्यों से भी जुड़ा हुआ है?

योगेंद्र यादव

यहाँ ‘स्वधर्म’ का विचार एक केंद्रीय अवधारणा बनकर उभरता है; एक ऐसा स्वधर्म जो केवल राज्य का नहीं बल्कि नागरिकों और समाज का भी है. स्वधर्म की अवधारणा, भारतीय बौद्धिक परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण किन्तु जटिल विचार है, जिसे लेखक ने पारंपरिक धार्मिक व्याख्याओं से अलग हटकर एक गतिशील, ऐतिहासिक और सामाजिक प्रक्रिया के रूप में समझाने का दावा किया है. सामान्यतः “स्वधर्म” को व्यक्ति या समुदाय के लिए पूर्वनिर्धारित कर्तव्यों और नैतिक दायित्वों के रूप में देखा जाता रहा है जो जन्म, वर्ण, या धार्मिक परंपराओं से निर्धारित होते हैं. किंतु लेखक इस स्थिर और शाश्वत समझ को चुनौती देता है और यह स्थापित करता है कि स्वधर्म न तो सनातन मूल्यों में स्थिर है और न ही केवल शास्त्रीय ग्रंथों में निहित है, बल्कि यह समय, स्थान और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार निरंतर परिवर्तित होता रहता है. इस प्रकार स्वधर्म को एक जीवंत और प्रवाहमान प्रक्रिया के रूप में देखा गया है जो सामाजिक अनुभवों, संघर्षों और आंदोलनों के माध्यम से आकार ग्रहण करता है.

लेखक के अनुसार, भारतीय समाज में नैतिकता और धर्म को “स्व” से जोड़ने की परंपरा रही है, किन्तु यह “स्व” कोई स्थिर या एकांगी सत्ता नहीं है. यह सामूहिक अनुभवों, ऐतिहासिक परिवर्तनों और सांस्कृतिक अंतःक्रियाओं से निर्मित होता है. इस दृष्टि से स्वधर्म न तो पूर्णतः व्यक्तिगत है और न ही केवल सामूहिक बहुमत का परिणाम. लेखक इस बात पर विशेष बल देता है कि बहुमत भी कई बार अनुचित हो सकता है, इसलिए स्वधर्म को केवल संख्यात्मक आधार पर नहीं समझा जा सकता. यह विचार महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लोकतांत्रिक राजनीति के भीतर भी एक आलोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत करता है, जहाँ बहुमत का निर्णय हमेशा न्यायसंगत नहीं होता. हालांकि, यहाँ यह प्रश्न भी उठता है कि यदि स्वधर्म न तो शास्त्रों में निश्चित है और न ही बहुमत में, तो फिर उसका अंतिम निर्धारण कैसे होगा? यह अस्पष्टता इस किताब की अवधानरणमात्मक सीमा के रूप में सामने आती है.

दरअसल, स्वधर्म के स्रोत के रूप में लेखक का मूल दावा आंदोलन को विशेष महत्व देने पर है. जहाँ लेखक यह तर्क देते है कि भारत का स्वधर्म औपचारिक दस्तावेजों या संस्थागत धर्मग्रंथों तक सीमित नहीं है बल्कि उन सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में प्रकट होता है जिनके माध्यम से समय-समय पर स्थापित सत्ता और रूढ़ियों को चुनौती दी गई. मसलन, प्राचीन काल में श्रमण परंपराओं में बौद्ध और जैन आंदोलनों ने वैदिक कर्मकांड, जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी और करुणा, मैत्री तथा समता जैसे मूल्यों को सामने रखा. मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने भाषा, जाति और धार्मिक रूढ़ियों के विरुद्ध एक व्यापक सांस्कृतिक विद्रोह का रूप लिया, जिसमें कबीर, तुलसीदास, मीराबाई और चैतन्य जैसे संतों ने सामाजिक समानता और व्यक्तिगत भक्ति पर जोर दिया. आधुनिक काल में राष्ट्रीय आंदोलन ने न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग की, बल्कि सामाजिक सुधार, आर्थिक पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक पुनर्संरचना का भी कार्य किया. इस प्रकार स्वधर्म को एक ऐसी ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो निरंतर संघर्ष और पुनर्परिभाषा के माध्यम से विकसित होती है.

 

 

भारतीयता बनाम संविधान का प्रश्न 

और इसी दिशा में लेखक जब संविधान के होने या न होने के प्रश्न पर विचार करते हैं, तो उनकी भूमिका बदल जाती हैं. वह एक व्यवहारवादी सिद्धांत की वकालत करते हुए नज़र आते हैं और संविधान को ही स्वधर्म की अभिव्यक्ति मानते हैं. भारतीय लोकतंत्र और संविधान की प्रकृति, उसकी वैधता तथा उसकी “भारतीयता” को लेकर किताब एक गहन वैचारिक हस्तक्षेप करती हैं, जहाँ लेखक का उद्देश्य संविधान के औपचारिक अस्तित्व और उसके वास्तविक, व्यवहारिक रूप के बीच बढ़ती खाई को उजागर करना है. यह विमर्श इस मूल प्रश्न से शुरू होता है कि आख़िर “भारतीयता” की कसौटी क्या है और क्या किसी व्यवस्था की वैधता केवल उसके स्वदेशी या विदेशी स्रोत से तय की जा सकती है. लेखक इस विचार को सिरे से ख़ारिज करते हुए यह तर्क देते हैं कि भारतीयता किसी वस्तु, विचार या संस्था के मूल से नहीं बल्कि उसके उपयोग, संदर्भ और सामाजिक प्रभाव से निर्धारित होती है. इसी तर्क के आधार पर वह संविधान पर लगे उस आरोप को कमजोर करता है कि वह पश्चिमी प्रभावों का उत्पाद है और इसलिए उसकी वैधता संदिग्ध है.

लेखक का यह दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण बौद्धिक हस्तक्षेप है, क्योंकि यह हमें सांस्कृतिक शुद्धता के आग्रह से बाहर निकालकर एक व्यावहारिक और संदर्भगत समझ की ओर ले जाता है. जैसे सिनेमा की तकनीक भले ही विदेश से आई हो लेकिन उसकी संवेदनाएं भारतीय हो सकती हैं, वैसे ही संविधान भी अपने मूल से अधिक अपने प्रयोग और प्रभाव के कारण भारतीय बनता है. इस प्रकार, संविधान की “भारतीयता” का प्रश्न उसके स्रोत से हटकर उसके सामाजिक-राजनीतिक परिणामों पर केंद्रित हो जाता है. किन्तु यही विमर्श आगे चलकर एक गंभीर मोड़ लेता है, जहाँ समीक्षित यह किताब यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि वर्तमान समय में संविधान का व्यवहारिक स्वरूप उसके मूल आदर्शों से भटक गया है. वह 2019 के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों को एक ऐसे दौर के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ एक “नया संविधान” व्यवहार में उभर आया है. यह नया संविधान कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सत्ता के संचालन का एक नया व्याकरण है, जिसने मूल संविधान की आत्मा को पीछे छोड़ दिया है.

इस संदर्भ में लेखक “भारत के पहले गणतंत्र के अंत” की बात करते है जो अत्यंत गंभीर और प्रतीकात्मक कथन है. यह कथन यह संकेत करता है कि संविधान का केवल औपचारिक अस्तित्व बचा है, जबकि उसकी मूल भावना जैसे बहुलवाद, अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा और संस्थागत संतुलन धीरे-धीरे क्षीण हो रही है. लेखक विशेष रूप से अल्पसंख्यकों की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करते है और यह तर्क देते है कि मूल संविधान ने उनके अधिकारों को एक सीमारेखा के रूप में स्थापित किया था, वहीं वर्तमान व्यवस्था में बहुसंख्यक समुदाय को यह शक्ति मिल गई है कि वह इन सीमाओं को स्वयं निर्धारित करे. इससे एक प्रकार की “द्वितीय श्रेणी की नागरिकता” का भाव उत्पन्न होता है जो लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है. यह तर्क न केवल राजनीतिक बल्कि नैतिक स्तर पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है क्योंकि यह समानता और न्याय के संवैधानिक आदर्शों को चुनौती देता है.

इन सभी परिवर्तनों का अंतिम परिणाम लेखक एक “व्यक्ति-केन्द्रित शासन” के रूप में देखते है, जहाँ लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित रह जाता है. जनता की भूमिका हर पाँच साल में एक बार वोट देने तक सिमट जाती है और उसके बाद सत्ता एक व्यक्ति या सीमित समूह के हाथों में केंद्रित हो जाती है. यह स्थिति लोकतंत्र के उस आदर्श के विपरीत है, जहाँ निरंतर जवाबदेही और जनभागीदारी अपेक्षित होती है. लेखक का यह दावा कि 2024 में संविधान को राजनीतिक दलों ने नहीं बल्कि जनता ने बचाया, लोकतंत्र में नागरिक समाज की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है. लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि संविधान की रक्षा एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसे केवल संस्थाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसके लिए सक्रिय और सजग नागरिकता आवश्यक है. इसके विपरीत, वह कहते हैं कि लोकतंत्र में किसी भी मुद्दे को महत्व तभी मिलता है, जब वह राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बनता है. इस प्रकार, संविधान की रक्षा भी एक राजनीतिक कार्य है, जिसे टाला नहीं जा सकता. हालांकि लेखक का यह विमर्श हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि क्या हम केवल एक औपचारिक लोकतंत्र में रह रहे हैं या वास्तव में उन मूल्यों को जी रहे हैं, जिन पर यह लोकतंत्र आधारित है.

 

 

धार्मिकता से सेकुलरवाद का प्रश्न 

धार्मिकता से सेकुलरवाद का प्रश्न इस किताब का केंद्रीय विचार है. लेखक शुरुआत में सेकुलरवाद की उस पारंपरिक धारणा पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, जिसमें यह माना जाता है कि वह सभी धर्मों के प्रति समान दूरी और तटस्थता बनाए रखता है. वे तर्क देते हैं कि हिंदू धर्म के संदर्भों के साथ तटस्थ व्यवहार का यह सिद्धांत अब डगमगाने लगा है. हिंदू धर्म को उसकी जाति-व्यवस्था के साथ जोड़कर आलोचना और उपहास का विषय बनाया जाता है, जबकि अन्य धर्मों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशीलता बरती जाती है. यह तर्क एक विवादास्पद, लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है कि क्या सेकुलर विमर्श वास्तव में निष्पक्ष है या उसमें कोई अंतर्निहित बौद्धिक पक्षपात मौजूद है. हालांकि, लेखक की इस ईमानदार कोशिश को कई विद्वानों ने एकतरफा भी माना है. प्रतापभानु मेहता के स्वर में स्वर मिलाते हुए, लेखक यह मानते हैं कि व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए “एक नए स्वतंत्रता-संग्राम” की आवश्यकता है. यह विचार नैतिक रूप से अत्यंत आकर्षक है क्योंकि यह लोकतंत्र के मूल्यों; व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा को केंद्र में रखता है. परंतु समस्या यह है कि इस “नए स्वतंत्रता-संग्राम” को ज़मीन पर कैसे उतारा जाए, लोगों का समर्थन कैसे जुटाया जाए और इसे सामाजिक स्वीकृति कैसे मिले.

यहाँ पारंपरिक राजनीतिक रणनीतियों की आलोचना भी इस किताब में महत्वपूर्ण है. समीक्षित यह किताब मानती है कि बहुसंख्यकवाद के खिलाफ अल्पसंख्यकवाद को खड़ा करना, या चुनावी जोड़-घटाव के माध्यम से सत्ता संतुलन बनाना, अब एक “पुराना फ़ॉर्मूला” बन चुका है जो आज के जटिल राजनीतिक परिदृश्य में कारगर नहीं है. इस प्रकार, लेखक संकेत देते हैं कि लोकतंत्र के भीतर ही उत्पन्न हो रही अन्याय और असमानताओं से निपटने के लिए नए राजनीतिक और वैचारिक उपकरणों की आवश्यकता है.

इसी बिंदु पर लेखक एक महत्वपूर्ण और कुछ हद तक अप्रत्याशित प्रस्ताव रखते हैं ; वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्य-तरीके से सीखने की बात करते हैं. लेखक का तर्क है कि आरएसएस ने दशकों तक समाज के साथ गहरे सांस्कृतिक और भावनात्मक स्तर पर संवाद स्थापित किया है. यह संवाद केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक भाषा में हुआ है, जिसने उसे व्यापक सामाजिक स्वीकृति दिलाई है. लेखक यहाँ आरएसएस के पद्धति को यानी समाज के साथ संवाद स्थापित करने की प्रक्रिया से सीखने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं. हालांकि, यही वह बिंदु है जहाँ लेखक का तर्क विरोधाभासीय हो जाता है. धार्मिक और सांस्कृतिक भाषा का उपयोग एक ओर लोकतांत्रिक संवाद को अधिक प्रभावी बना सकता है लेकिन दूसरी ओर यह खतरा भी पैदा करता है कि राजनीति पुनः उसी बहुसंख्यकवादी ढांचे में फंस जाए, जिससे वह बाहर निकलने की कोशिश कर रही है. इस प्रकार, लेखक का प्रस्ताव एक दोधारी तलवार की तरह है जो संभावनाओं और जोखिमों दोनों को साथ लेकर चलता है.

 

 

किताब की बनावट और कुछ खूबियों और खामियों की ओर 

जैसाकी समीक्षा के शुरुआत में, हम योगेंद्र यादव के पूर्व लेखन से पहले ही परिचित हुए हैं, इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह संभवतः उनकी पहली ऐसी कृति है जो अकादमिक दायरे से बाहर है. इस किताब में उन्होंने समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेखों के माध्यम से भारत की समकालीन घटनाओं और राजनीति पर अपनी त्वरित प्रतिक्रियाओं को संकलित किया है, जिसे पत्रकारीयता की भाषा में संपादकीय लेखन कहते है. यह उनकी शायद पहली हिंदी किताब भी है, इसलिए इस आधार पर इसका स्वागत किया जाना उचित प्रतीत होता है. फिर भी, यह प्रश्न विचारणीय है कि यह कृति शोधार्थियों, विद्यार्थियों, जन-बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के लिए कितनी सार्थक सिद्ध होगी, यह प्रश्न विचारणीय है. इसका कारण यह है कि किताब में राजनीतिक सहीपन (political correctness) का विशेष आग्रह दिखाई देता है जो उनके पूर्व अकादमिक लेखन से न केवल अलग है बल्कि पाठकों के लिए कुछ हद तक अप्रत्याशित भी हो सकता है.

लेखक जब स्वधर्म को केवल आंदोलनों से जोड़ कर परिभाषित करते हैं तब लेखक का यह प्रयास एक प्रकार से जटिल और गंभीर सवालों से छुटकारा पाने जैसा लगता है, क्योंकि सभी आंदोलन स्वाभाविक रूप से न्यायपूर्ण या समावेशी हो यह ज़रूरी नहीं होता. कई बार आंदोलनों के भीतर भी सत्ता-संबंध और बहिष्कार की प्रक्रियाएँ मौजूद होती हैं. उदाहरण के लिए, भक्ति आंदोलन को समानता का प्रतीक माना जाता है, किन्तु इसमें भी स्त्रियों और निम्न जातियों की आवाज़ें अक्सर सीमित या प्रतिनिधित्व के माध्यम से ही सामने आती हैं. इसी प्रकार, राष्ट्रीय आंदोलन में भी दलित, आदिवासी और अन्य हाशिए के समुदायों की स्वतंत्र आवाज़ें पूरी तरह से केंद्र में नहीं आ पाईं. इस दृष्टि से देखा जाए तो स्वधर्म की अवधारणा स्वयं भी सत्ता और प्रतिनिधित्व के प्रश्नों से मुक्त नहीं है.

सबाल्टर्न के आईने में अगर इस पक्ष को रखकर देखा जाए तो किताब की सीमाएँ और स्पष्ट होती है. जहाँ स्वधर्म को आंदोलनों की भाषा में खोजा जाए, तो यह भी देखना आवश्यक है कि उन आंदोलनों में कौन बोल रहा है और किसकी आवाज़ को मान्यता मिल रही है. हाशिए के समुदाय, जैसे मुसहर, डोम, अति पिछड़ा अक्सर “सुने” तो जाते हैं, लेकिन उनकी बातों को वैधता नहीं दी जाती. इस स्थिति में स्वधर्म का निर्माण एक ऐसी प्रक्रिया बन जाता है, जिसमें प्रभुत्वशाली वर्ग अपने अनुभवों और दृष्टिकोणों को “सामूहिक” दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करने लगता हैं. इस प्रकार स्वधर्म की अवधारणा जो मूलतः मुक्ति और न्याय का माध्यम बन सकती थी, कई बार सत्ता के पुनरुत्पादन का साधन भी बन जाती है. लेखक जब स्वधर्म को एक “रस्सी” के रूपक के माध्यम से समझाने का प्रयास करते है और कहते है कि रस्सी में लगे हुए धागे अलग-अलग समय के साथ धागे बदलते रहते हैं, जिससे एक निरंतरता बनी रहती है.

यह रूपक इस अवधारणा की गतिशीलता और ऐतिहासिक निरंतरता को प्रभावी तो करता है लेकिन यह सवाल छोड़ जाता है कि इस निरंतरता का आधार क्या है? यदि सभी तत्व बदलते रहते हैं, तो वह कौन-सी बुनियादी संरचना है जो स्वधर्म को एकीकृत बनाए रखती है? इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर पाठ में नहीं मिलता, जिससे यह अवधारणा कुछ हद तक अस्पष्ट बनी रहती है. फिर भी लेखक के अनुसार, आधुनिक भारत का स्वधर्म राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान विकसित हुआ, जहाँ भारतीय परंपरा और यूरोपीय आधुनिकता के बीच एक संवाद स्थापित हुआ. भारतीय संविधान इस संवाद का संस्थागत रूप है, जिसने स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मूल्यों को औपचारिक रूप दिया.

इस प्रकार स्वधर्म को केवल सांस्कृतिक या धार्मिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और नैतिक ढाँचे के रूप में भी देखा गया है जो गणराज्य के सामूहिक जीवन को दिशा देता है. किताब में कश्मीर, मणिपुर, अरुणाचल और मैकाले की शिक्षा नीति के दूरगामी प्रभावों पर लेखक का विश्लेषण इसे समकालीन संदर्भों से गहराई से जोड़ता है और इसकी प्रासंगिकता को सुदृढ़ करता है. हालाँकि, सैद्धांतिक प्रश्नों तथा गहन वैचारिक विमर्श के अभाव में इसकी वैकल्पिक दृष्टि और सुझाव अपेक्षित मजबूती हासिल नहीं कर पाते जिसके कारण समीक्षित तर्कों की प्रभावशीलता कुछ हद तक सीमित प्रतीत होती है.

फिर भी, इन सीमाओं के बावजूद, यह किताब समकालीन राजनीतिक विमर्श में एक महत्त्वपूर्ण और सशक्त हस्तक्षेप के रूप में स्वीकार की जा सकती है.

 

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें.

कुँवर प्रांजल सिंह
सहायक प्रोफ़ेसर (राजनीति विज्ञान विभाग )
दिल्ली विश्वविद्यालय
पार्थ चटर्जी की अनूदित पुस्तक ‘शासितों की राजनीति’ प्रकाशित.
pranjal695@gmail.com
Tags: 20262026 समीक्षाकुंवर प्रांजल सिंहगणराज्य का स्वधर्मयोगेन्द्र यादव
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Comments 2

  1. आलोक टंडन says:
    3 months ago

    समीक्षा के नए प्रतिमान गढ़ती एक जबरदस्त समीक्षा, पढ़ने योग्य।बहुत बहुत बधाई।

    Reply
  2. ईश्वर सिंह दोस्त says:
    3 months ago

    कुँवर प्रांजल की यह समीक्षा प्रभावित करती है। किताब के बुनियादी तर्कों और उनकी मजबूती व कमजोरियों व विरोधाभासों को बहुत अच्छे से पेश किया गया है। यह समीक्षा किताब में स्वधर्म जैसे पदों की अपर्याप्त व्याख्या को सामने लाकर किताब के अरमानों और हकीकत का भी एक बिंब बनाती है।

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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