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समालोचन

Home » गांधी : एक रॉकस्टार फ़क़ीर : त्रिभुवन

गांधी : एक रॉकस्टार फ़क़ीर : त्रिभुवन

by arun dev
October 2, 2026
in विशेष
Reading Time: 19 mins read
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गांधी : एक रॉकस्टार फ़क़ीर :  त्रिभुवन
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विश्व-संगीत में गांधी
प्रार्थना, राजनीतिक पुकार और जनशक्ति की रहनुमाई का “रॉकस्टार” फ़क़ीर


त्रिभुवन

 

हिंसक, ह्रासमान और हृदयहीन हो चुकी मानवता-विमुख दुनिया में यह सुखद विस्मय है कि विश्व-संगीत में गांधी वैश्विक जनशक्ति की रहनुमाई करते एक फ़क़ीर ही नहीं, ‘रॉकस्टार’ की तरह उपस्थित हैं.

वे इकलौते महानायक हैं, जिन पर अहिंसा और नैतिकता बोध से  ओतप्रोत पॉप, रॉक, रेगे, कोरल, गॉस्पेल, एन्थमिक, स्पिरिचुअल, फोक-प्रोटेस्ट और म्यूज़िकल थिएटर शैलियों में ढेरों गीत लिखे-गाए गए. पश्चिमी संगीत में गांधी ‘ऑस्टिनाटो’ यानी सतत लौटते सांगीतिक सूत्र की तरह जीवंत है.

गांधी नाम उनके अपने देश के धूमिल नभ तले उदास उपेक्षित समाधि की ठंडी संगमरमरी सतह पर रखा नाम भर है. “दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल” (“जागृति”, 1954) से “बंदे में था दम, वंदे मातरम्” (“लगे रहो मुन्नाभाई”, 2006) तक हमारे पास गांधी को लेकर कितने गीत हैं?

 

 

1.

धार्मिक असहिष्णुता और क्रॉनी कैपिटलिज़्म से प्रेरित हिंसा के प्रति मंत्रमुग्ध राजसत्ता के लिए गांधी को भुला देना राजसी वसंत सा है. पूँजी और संकीर्ण धर्मसत्ता नाभिनालबद्ध हों तो मंदिर और बाज़ार को पोषण देने वाली राजसत्ता का एक ही गर्भ से प्रसव होता है. गांधी ने इसीलिए सादगी को संगीत की तरह बरता. वे जानते थे, पूँजीवाद की सबसे मोहक धुन एक दिन ख़तरनाक प्रस्तावना बनेगी.

क्रॉनी-कैपिटलिज़्म अंततः ऐसी कैकॉफ़नी बन जाता है, जिसमें बाज़ार ताल पीटता है, अर्थव्यवस्था मुनाफ़ाखोरी को ग्रोथ बताकर विभ्रम पैदा करती है, सत्ता सुर बिगाड़ती है और राजसत्ता और धर्मसत्ता बेहाल मनुष्य को अपने ही दु:खों, अभावों, तकलीफ़ों की चीखों को विकास का अनहद नाद समझकर प्रफुल्लित होने के लिए प्रशिक्षित करती हैं.

भारतीय संस्कृति का वह आदिम प्रकाशपुंज तीव्र अंधड़ में है, जिसमें बहुलतावाद और सांस्कृतिक वैविध्य का वैभव अपनी अाबोहवाआें से तप्त आलिंगन करता था. अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने ‘हिस्ट्री एंड दॅ प्रेजेंट’ में और तुर्की सामाजिक मानवविज्ञानी नूर यलमान ने ‘ऑन सेक्युलरिज़्म एंड इट्स क्रिटिक्स : नोट्स ऑन टर्की, इंडिया एंड ईरान, कंट्रीब्यूशंस टू इंडियन सोशियोलॉजी’ में इसी यथार्थ की प्रभावशाली विवेचना की है.

जर्मन दार्शनिक और संवादात्मक लोकतंत्र के चिंतक युर्गेन हैबरमास, अमेरिकी दार्शनिक और न्याय सिद्धांत के प्रणेता जॉन रॉल्स, जर्मन-अमेरिकी चिंतक और राजनीतिक बहुलता की दार्शनिक हन्ना अरेंड्ट, मूल्य-बहुलतावाद के सिद्धांतकार और रूसी-ब्रिटिश दार्शनिक आइज़ाया बर्लिन, फ्रांसीसी दार्शनिक और स्मृति और अस्मिता के चिंतक पॉल रिकर, फ्रांसीसी दार्शनिक और अन्यता की नैतिकता के विश्लेषक इमैनुएल लेविनास और अमेरिकी दार्शनिक तथा उदार मानवीय एकजुटता के चिंतक रिचर्ड रॉर्टी ने भी आधुनिक लोकतंत्र की आत्मा के लिए संवाद, बहुलता और असहमति को गहरे अंत:करण से साबित किया है.

भारतीय संस्कृति को किसी एक धर्म, एक ग्रंथ, एक भाषा, एक जातीय स्मृति अथवा किसी एक ‘शुद्ध’ अतीत में बंद कर देना, वस्तुतः उसके ऐतिहासिक विराट को छोटा कर देना है.

अमर्त्य सेन की ‘द आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन’ जिस भारत को हमारे सामने रखती है, वह हिंदू, बौद्ध, जैन, मुस्लिम, आस्तिक, नास्तिक और संशयवादी बौद्धिक धाराओं के बीच सदियों से चलते आए तर्क और प्रतितर्क से निर्मित भारत है. उसमें सभी तरह के बहुलतावादी संगीत की अंत:सलिला अबाध बहती है.

भारत सदियों से चलता आ रहा एक सभ्यतागत बहुस्वर है. इसमें बुद्ध की करुणा, महावीर की अहिंसा, शंकराचार्य का तर्कवितर्क, कबीर का प्रतिवाद, आंबेडकर का प्रश्न और आधुनिक मनुष्य का वह विवेक भी है, जो परंपरा के सामने खड़े होकर पूछता है: तुम्हारे भीतर जो सुंदर है, उसे हम कैसे बचाएँ और तुम्हारे भीतर जो अन्याय है, उसे हम क्यों बचाएँ?

मुक्तिबोधीय चेतना से देखें तो एकरूप सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जिस एकांगी, संकीर्ण और धार्मिक ऐक्य के लिए “अन्न” है, लोकतांत्रिक मूल्यबोध के लिए “विष” है. गांधी ने इसी मर्म को ऐसे समय अपना आलाप बनाया, जब दुनिया इस विचार-तत्त्व की पिपासा से भटक रही थी. उसी कारण पश्चिमी संगीतकार गांधी के मुरीद हो गए. विश्व के क्षरणशील जीवन मूल्यों में कहीं कोई उम्मीद का टुकड़ा बचा तो वही एक.

 

 

2.

पश्चिमी लोकप्रिय गीत-संगीत की वह दुनिया, जिसे हमारे यहाँ भोग-विलास, अश्लीलता, उच्छृंखलता और नैतिक शिथिलता की निगाह से देखा जाता है, अपने बिल्लौरी सांगीतिक आकाश के क्षितिज पर गांधी को एक नैतिक नक्षत्र की तरह सँजोए है. वहाँ गांधी कभी अहिंसा का रूपक हैं, कभी आत्मसंयम का. कभी सत्ता के सामने निर्भय नागरिक और कभी वह मनुष्य, जो आत्मरक्षा के रूप में प्रतिहिंसा की पूरी संभावना होने पर भी हिंसा से इनकार कर देता है.

हमारे यहाँ एक व्यापक समूह गांधी की हत्या की जगह ‘गांधी वध’ जैसे अमानुषिक शब्द गढ़कर औचित्य का व्याकरण खोजता है. पश्चिम के रॉक, फोक, रेगे, रैप और शांसों (chanson परंपरागत फ्रेंच गीत) ने उसी गांधी में प्रतिरोध, करुणा और अहिंसा का नया संगीत और नैतिक प्रभामंडल खोज लिया.

ऐसे समय में पश्चिमी रॉकस्टारों ने उदास आँखों में इल्तिज़ाएँ भरकर गांधी की नैतिक चाँदनी से अदा-ए-नाज़ और रंग-ए-नियाज़ रचे हैं. वे गांधी की अहिंसा, सादगी और सत्यनिष्ठा की रश्मियों को अपने कंठ, देह और रोम-रोम में भरते हैं. मानो इतिहास की राख से संगीत के मंच पर कोई उजला, निहत्था शरीर फिर उठ रहा हो….

 

 

3.

गांधी गीतों के भीतर चरखे की कोमल आवाज़ घोलते हैं. ओपेरा के विराट् रंगमंच पर लाठी टिकाते हैं, कभी प्रेल्यूड की नीरवता में सांस लेते हैं तो कभी कैडेंजा की तान बनते हैं और कभी रैप की बेचैन गलियों में टहलते हैं. गांधी का नाम रेगे की देहधर्मी लय बनकर थिरकता है. लोक-स्मृतियों में मिट्टी का वह अजस्र दीया है, जिसकी लौ से इतिहास की क्रूर हवाएँ हार जाती हैं.

बुद्ध और ईसा के बाद शायद ही कोई दूसरा हो, जिसे संसार के संगीत ने इतनी विविध आकृतियों में ग्रहण किया. बुद्ध का मध्यम मार्गीय जीवन का नाद, आष्टांगिक मार्गीय आंदोलन और मौन साधना का ध्वनिप्रवाह है. आत्मा में विविध स्वर-स्थानों पर परदों को ऐसे बांधा जा सके कि साधना के ठाट की रचना हो और आत्मा के तारों का कसाव इतना शिथिल न हो कि मौन के मिज़राब से प्रहार करने पर राग-ताल में बद्ध होकर गत भी आकार न ले सके. ईसा के चारों ओर धर्म, मुक्ति, यातना और पुनरुत्थान का संगीत-संसार है तो गांधी के चारों ओर नमक, चरखा और निहत्थे मनुष्यों की वह भीड़ है, जो किसी साम्राज्य से शक्तिशाली है. गांधी की देह दुबली थी, पर अहिंसा के संगीत में छाया विराट है. वह छाया कभी सितार के झंकृत तारों पर काँपती है, कभी किसी इलेक्ट्रिक गिटार से बहते ताप के बीच सफेद वस्त्र की तरह फहराती है.

यह तस्कीन देता है कि दुनिया में बढ़ते जाते तारीक़ शिग़ाफ़ों के बीच गांधी रॉक-संगीत में असाधारण नैतिक आभामंडलयुक्त रहनुमा हैं. उनकी उपस्थिति में ड्रम की थाप मार्च करते लोगों की पगध्वनि है. बेस-गिटार दबे जनसमुदाय की धड़कन है. गायिका का कंठ उस स्त्री की खुली, तपती देह जैसा हो उठता है, जो भय का आवरण उतारकर प्रतिरोध की हवा के सामने खड़ी हो गई है. 4.

“बापू की अमर कहानी” और “साबरमती के संत” जैसे गीतों में राष्ट्रीय शोक और भक्ति की आकुलता है. पर गांधी की मानवीय जटिलताएँ, राजनीतिक रणनीति और आंबेडकर जैसे समकालीनों के साथ मतभेद अदृश्य हैं.

 

 

4.

महान् गायिका और कवयित्री पैटी स्मिथ, विश्वविख्यात मिनिमलिस्ट संगीतकार फिलिप ग्लास और जर्मन हेवी-मेटल बैंड ग्रेव डिगर गांधी को एक पॉलिटिकल टेक्नोलॉजी अर्थात् सत्ता, प्रतिरोध और जन-आंदोलन को साधने वाली राजनीतिक कार्य-पद्धति बनाते हैं. अफ्रीकी और ब्राज़ीलियाई संदर्भ को देखें तो गांधी अश्वेत प्रतिरोध, उपनिवेशवाद, धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता और सामूहिक उत्सव से मिलकर नया ही रूप हैं. “फील्योस दि गांधी” यानी “गांधी की संतानें” इसका सर्वोत्तम उदाहरण है.

ब्रिटैनिका बताता है, यह ब्राज़ील के साल्वादोर बाहिया का एक प्रसिद्ध अफ्रो-ब्राज़ीलियाई कार्निवल समूह है. इसे 1949 में साल्वादोर बंदरगाह के मजदूरों ने गांधी से प्रेरित होकर बनाया था. समूह गांधी के अहिंसा, शांति और सह-अस्तित्व के विचारों को अफ्रीकी-ब्राज़ीलियाई संगीत, विशेषतः इजेशा लय और कार्निवल से जोड़ता है. इनकी पहचान गांधी जैसे सफ़ेद वस्त्रों और पगड़ियों से जुड़ी है.

 

5.

फ्रेंच संगीत में गांधी की उपस्थिति असाधारण है. एक अध्ययन में गांधी से जुड़े 46 गीत सामने आए हैं. फ्रेंच गीतों में गांधी कहीं शांति के पर्याय हैं तो कहीं धैर्य की अंतिम सीमा. कहीं गैंगस्टर का विलोम हैं तो कहीं नैतिक पूर्णता का असंभव आदर्श. कहीं दुबले, पर सामर्थ्यवान. कहीं खोए हुए अहिंसक युग तो कहीं भारत की सांस्कृतिक पहचान. कहीं हिंसा से भरे आधुनिक नगरों की असुविधाजनक अंतरात्मा. इन गीतों में गांधी जीवित नैतिक स्वर, प्रतिरोध का तालबद्ध आलाप और राजनीतिक चेतना की सांगीतिक उपस्थिति हैं. वे रैप की तेज़ बीट, सड़क की भाषा, नस्ली तनाव, उपनगरों की बेचैनी, पुरुषवादी आक्रामकता, अपराध, बंदूक और सामाजिक हिंसा के बीच अलग ही सुरावली हैं.

फ्रांसीसी रैप ने उन्हें सड़क पर उतारा, हिंसा के सामने खड़ा किया और आधुनिक मनुष्य से असुविधाजनक प्रश्न पूछा : जब चारों ओर प्रतिशोध की भाषा हो, अहिंसा किस स्वर में बोलेगी?

 

 

6.

गांधी संगीत की आंतरिक संरचना में ‘काउंटर-रिद्म’, हिंसा के क्रेशेंडो के सामने शांति का पियानिसिमो, युद्ध की तेज़ बीट के सामने विवेक का ठहराव और प्रतिशोध के आरोह के सामने आत्मसंयम का अवरोह हैं. हिंसा जहाँ संगीत की धड़कनों को उत्तेजना देती है, गांधी उसे अंतरात्मा देते हैं और पूछते हैं, आख़िर वह धड़क किसके लिए रही हैं. इन गीतों में गांधी को सुनना दो प्रतिकूल नादों के बीच इनसानियत की श्रुतियों को सुनना है.

 

 

7.

सांप्रदायिकता का सौंदर्योत्सव मना रहे जिन लोगों को लगता है कि भारत के क्षितिज पर हिन्दुत्व की उषा-सी मुस्कुरा रही है, वे अमेरिकी रॉक कवयित्री और गायिका पैटी स्मिथ (पैट्रिशिया ली स्मिथ) के “गांधी” और एक पंक्ति “आई हैड अ ड्रीम, मिस्टर किंग” को सुनें, जो किसी अमानुषिक हृदय तक को स्वप्नलोक से रूबरू करवाती है. स्वर पसलियों से टकराते हैं, लय नाभि के आसपास वृत्त बनाती है और लंबा सुर घोषणा करता है, भय भी शरीर ही में रहता है और निर्भयता भी. यह नौ मिनट लंबी काव्यात्मक रॉक-इन्कैंटेशन यानी मंत्रोच्चार जैसी रचना विश्व की श्रेष्ठ आधुनिक रॉक-कविता है. इसमें इतिहास, स्वप्न, बाल्य-स्मृति, धार्मिक प्रतीक, भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम, अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन और अमेरिकी राजनीति गुथे-मथे हैं. यह पूरा एल्बम ‘ट्रैंपिन’ (2004) ही नागरिक अधिकार आंदोलन, युद्ध-विरोध, मुक्ति और सामूहिक जागरण की भावनाओं से लबरेज़ था.

पैटी इस गीत में कहती हैं: भारत की धरती पर तिलक का बिगुल बजता है. एक चरखा घूमने लगा. नमक की मुट्ठी उठी. अस्पृश्य कहे गए लोगों ने उसे पुकारा. और फिर वे चिरनिंद्रालीन गांधी को पुकारती हैं : ओ प्यारे-से मनुष्य, नींद से जागो. जीवितों की दुनिया में लौटो. अत्याचारियों को हथियारों से नहीं, लोगों की संख्या से पराजित करो. अंततः यह पुकार गांधी से हटकर हम सबके लिए होती है. अपनी संख्या का बल तो देखो. क्रांति अमर रहे. चरखा चलता रहे. जागना ही आज की सबसे बड़ी पुकार है! मानो यह पुकार आज के भारत के लिए एक सूत्र है.

 

 

८.

इस गीत की पहली पंक्ति मार्टिन लूथर किंग जूनियर के ऐतिहासिक भाषण “आई हैव अ ड्रीम” को प्रतिध्वनित करती है. पैटी किंग से रूबरू हैं, फिर उनके स्वप्न के भीतर गांधी को खोजती हैं. किंग ने ही तो गांधी की अहिंसक प्रतिरोध-पद्धति को अमेरिकी अश्वेत नागरिक अधिकार आंदोलन की आत्मा बना दिया था. वे गांधी को अहिंसक सामाजिक परिवर्तन की अपनी तकनीक का मार्गदर्शक प्रकाश कहते थे. वे 1959 में 10 फरवरी से 10 मार्च तक गांधी की विरासत को समझने भारत भी आए थे. इसे उन्होंने तीर्थयात्रा कहा था. इस तरह यह गीत एक वंशावली है : गांधी, मार्टिन लूथर किंग, पैटी स्मिथ और हम आज के नागरिक.

“दॅ ब्लूज़म्स ड्रॉप्ड लाइक कैंडी” गीत का सबसे रहस्यमय और बार-बार लौटने वाला मार्मिक बिंब है. इसमें दो विपरीत संवेदनाएँ हैं. निरंतर झरते फूल सौंदर्य, शहादत, मासूमियत और क्षणभंगुर जीवन के प्रतीक हैं. अर्थात् गांधी की दुनिया में बलिदान किसी वीरतापूर्ण सैन्य प्रदर्शन की तरह नहीं, नन्ही और सुकुमार हथेलियों पर रखे जा रहे शहद की तरह कोमल, साधारण और जनसुलभ है.

इस गीत में गांधी अँधेरे से डरने वाले ऐसे बालक हैं, जो इस धरती की सबसे अमानुषिक साम्राज्यवादी शक्ति के अँधेरे के सामने दीपक लेकर अकेला खड़ा हुआ. दीया गांधी के भीतर की नैतिक निर्भयता है. गीत में माँ बार-बार दिखती है. उपवास करती, प्रार्थना करती, दीपक के पास बैठती और अंततः दुःख और तपस्या से मुरझाती. तुरही युद्ध का भी संकेत है और जागरण का भी. गांधी को जिस समय उठा तो लेनी थी बंदूक, वह चरखा उठाते हैं और अनुशासित जनसमूह के बीच जाकर नैतिक अवज्ञा का सूत कातते हैं. पैटी यहाँ भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की विभिन्न धाराओं को एक ही काव्यात्मक क्षण में गुलदस्ते की तरह पिरो देती हैं. यह एक तरह का मिथिक मॉटाश्ज (mythic montage) है.

गीत के सबसे सशक्त प्रतीक हैं: “दॅ स्पिनिंग वील …ए हैंडफुल ऑव साल्ट”. चरखा यहाँ साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था से असहयोग, श्रम की प्रतिष्ठा, विकेंद्रीकृत उत्पादन, आत्मनिर्भरता और साधारण मनुष्य को राजनीति का सक्रिय सहभागी बनाने का उपकरण है. चरखे ने स्वतंत्रता को किसी अमूर्त संसदीय बहस से निकालकर घरों, हाथों और वस्त्रों तक पहुँचा दिया. नमक जीवन की सबसे सामान्य आवश्यकता है. गांधी ने उसी साधारण सी चीज़ को औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध असाधारण राजनीतिक हथियार बना दिया. एक बूढ़े, दुबले और शक्तिहीन मनुष्य का समुद्र-तट पर झुककर इस तरह नमक उठा लेना भी है कि साम्राज्य की वैधता काँपने लगे.

 

 

9.

“अवेक फ्रॉम द नेट वेयर यूव बीन स्लीपिंग” इतिहास की निष्क्रिय श्रद्धा से बाहर आने का आह्वान है. महान् व्यक्तियों को स्मारकों, जयंती-समारोहों और प्रतीक-पूजा के जाल में ऐसे कैद किया जाता है कि नाम तो बचा रहता है, पद्धति मर जाती है. इस गीत की राजनीतिक कुंजी है “गेट’ एम विद द नंबर्स.” सत्ता की हिंसा को हिंसा से नहीं, संख्या की नैतिक और लोकतांत्रिक शक्ति से चुनौती दो. यही सत्याग्रहियों की भीड़, मार्च करते नागरिक, तख़्ता पलटने वाले मतदाता और संगठित असहयोग की वह शक्ति है, जाे शासकीय हिंसा को निष्प्रभावी करता है. पैटी स्मिथ ने 2004 में इस पंक्ति को अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और मतदाता-जागरण से जोड़ा था. उनका “गांधी” 1930 के नमक सत्याग्रह से चलकर 2004 के अमेरिकी मतदान केंद्र तक पहुँचा. गांधी को स्मृति से निकालकर सक्रिय नागरिक पद्धति में बदलते हुए.

‘ट्रैम्पिन’ उस अमेरिका में आया था, जिसकी देह पर ग्यारह सितंबर की गरम राख चिपकी थी और जिसकी नसों में अफ़ग़ानिस्तान, इराक, “शॉक एंड ऑ” और जॉर्ज बुश के पुनर्निर्वाचन की बेचैन गर्मी दौड़ रही थी. उसी एल्बम का “रेडियो बगदाद” मानो युद्ध से झुलसी देह पर रखा पैटी स्मिथ का तपता हाथ था. ‘द गार्डियन’ जैसे अख़बार ने एल्बम को बुश-युग में “अमेरिका की आत्मा” के लिए छिड़ी लड़ाई के रूप में देखा था. इसी पृष्ठभूमि में “गांधी” गीत समाधि पुष्प नहीं, राजनीतिक धड़कन है.

आतंक का उत्तर आवश्यक नहीं कि दूसरा आतंक हो, युद्ध का उत्तर दूसरा युद्ध नहीं. जागी हुई जनता भी शक्ति है और बंदूक, तोप, गोलों और युद्ध से अधिक अंतरंग शक्ति.

 

 

१०.

गांधी के 1893 से 1914 तक के दक्षिण अफ्रीकी वर्षों से प्रेरित फिलिप ग्लास का 5 सितंबर 1980 को पहली बार मंचित तीन घंटे का “सत्याग्रह” उस रहस्यमय क्षण का संगीत है, जब एक मनुष्य के भीतर जन्मा नैतिक आग्रह लोकशक्ति बन जाता है. ग्लास और कॉन्स्टेंस डीजॉन्ग ने इसका संस्कृत पाठ भगवद्गीता से निर्मित किया.

सामान्य ओपेरा में पात्र परस्पर प्रेम करते, झगड़ते, स्वीकारोक्तियाँ करते और मरते हैं. “सत्याग्रह” में संस्कृत-मंत्रों की तरह आते हैं. पात्र मानो एक-दूसरे से कम और किसी अदृश्य नैतिक नभ से अधिक संवाद कर रहे हों. ग्लास ने संस्कृत को अनूदित कर गवाने के बजाय मूल रूप में रखा. वे संस्कृत पाठ की अंतर्निहित लय को सुरक्षित चाहते थे. यहाँ शब्द का औचित्य कान की लवों को छूने से पहले उसके स्पंदन का भीतर पहुँचना है.

इसमें ब्रास और परकशन अनुपस्थित हैं, तार और वुडविंड प्रधान ध्वनि-संसार को विचित्र पारदर्शिता देते हैं. युद्ध आधारित राजनीतिक नाटक में ढोल और विस्फोटक ध्वनियों के बजाय ग्लास शोर निकाल देते हैं. रह जाती हैं साँसें, स्वर और पुनरावृत्तियाँ.

इसके तीन अंकों पर तीन महान छायाएँ झुकी रहती हैं. पहले पर रवीन्द्रनाथ टैगोर, दूसरे पर लेव टॉल्स्टॉय और तीसरे पर मार्टिन लूथर किंग. ये परंपरागत पात्र नहीं, नक्षत्र हैं. एक गांधी के समय से जुड़ा भारतीय नैतिक-बौद्धिक आकाश, दूसरा विचारों का पूर्वज, तीसरा उनके विचार का भविष्य. इस संरचना में गांधी विचार की विद्युत-रेखा हैं, जो टॉल्स्टॉय से होकर उनके भीतर प्रवेश करती है और आगे मार्टिन लूथर किंग तक चली जाती है.

ग्लास गांधी को कांस्य प्रतिमा नहीं बनाते. “सत्याग्रह” को गांधी पर रचित पश्चिमी संगीत-नाट्य की सर्वोच्च उपलब्धियों में रखने का कारण उसकी विराटता भर नहीं, विचार को संगीत का एक नया स्वर-विन्यास और ध्वनि-दर्शन देना है.

 

 

11.

पुनरावृत्ति सत्याग्रह है, आरोह जनांदोलन और कोरस जनता. अहिंसक प्रतिरोध में पगी सांस्कृतिक स्मृति वह लौटता हुआ स्वर है, जिसे सत्ता थका तो सकती है, मिटा नहीं सकती.

 

 

12.

आयरिश संगीतकार ब्रायन बॉयडेल की ‘इन मेमोरियम महात्मा गांधी’ 1948 में महात्मा की हत्या के तुरंत बाद रची गई बारह मिनट की ऑर्केस्ट्रल शोक-रचना है, जो मृत्यु के बाद बची नैतिक रिक्तता को स्वर देती है. ब्रिटिश साम्राज्य से संघर्ष कर चुके देश का संगीतकार भारत के अहिंसक उपनिवेश-विरोधी नेता के लिए शोक लिख रहा था. 1948 से 1955 के बीच इसके अनेक प्रदर्शन हुए. यह गांधी की मृत्यु को निजी विलाप नहीं, यूरोपीय सांगीतिक स्मृति में दर्ज एक गंभीर ऐतिहासिक शोक बनाती है.

पुर्तगाली बाँसुरीवादक रॉँ क्याओ का 2021 का “गांधी” दस रचनाओं वाला एक विरल विश्व-संगीत वाद्य-एल्बम है, जिसमें बाँसुरी, जैज़-संवेदना और भारतीय संगीत-प्रभाव एक-दूसरे में घुलते हैं. रेस्पेइतो पेला नातुरेज़ा, पाज़ ए ओ कामिन्यो, सत्याग्रह और मार्शा दो साल जैसे शीर्षक बताते हैं कि क्याओ गांधी को प्रकृति-सम्मान, अहिंसा, आत्मसंयम और विश्व-शांति के प्रतीक के रूप में पढ़ते और गढ़ते हैं. बाँसुरी यहाँ विचार को श्वास में बदलती है.

“मंत्राज़ ऑव कम्पैशन” पृथ्वी की अनेक भाषाओं और देहों से उठी एक ही लंबी साँस है. चालीस देशों के 230 संगीतकार गांधी को स्मारक नहीं, करुणा का जीवंत स्पंदन बनाते हैं. रिकी केज की विश्व-संगीत दृष्टि, टीना गुओ के सेलो की गहरी देहधर्मी कंपन और मंत्रों की आवर्त लय एक-दूसरे को छूती, खुलती और विलीन होती हैं. “कम्पैशन”, “महात्मा”, “कोएग्ज़िस्ट”, “बी द चेंज”, “वी आर वन” और “एम्पैथी” में गांधी सहअस्तित्व, पर्यावरण और मनुष्य की कोमलतम नैतिक धुन बन जाते हैं.

ले शार्त का उदास धुनों वाला फ्रेंच पॉप गीत “गांधी” (1993) बुझती रोशनी के पास रखे हाथ की तरह है. यह गांधी को उस अनुपस्थित कोमलता में याद करता है, जिसकी कमी से सभ्यता रीतती-सूखती-उड़ती जाती है.

इतालवी “महात्मा गांधी” (2024) रेगे और डांसहॉल की उस गर्म, धरती से उठती लय में गांधी को रखता है, जहाँ संगीत से काया भीतर की प्यास बुझाती है. दक्षिण इतालवी सड़क-संस्कृति की धड़कन, बेस की मांसल तरंग और प्रतिरोध की सामूहिक आवाज़ गांधी की अहिंसा से मिलकर एक अनोखा तनाव रचती है. यहाँ शांति अन्याय के सामने तनकर खड़ी चेतना है. उपनिवेशवाद-विरोधी स्मृति और रेगे की विद्रोही परंपरा एक-दूसरे को छूती हैं.

2012 का “बी द चेंज” गांधी को संग्रहालय की धूल से निकालकर हिप-हॉप की जीवित नब्ज़ में रख देता है. दक्षिण अफ्रीका का नस्लभेद, सत्याग्रह, भारत-वापसी और स्वतंत्रता-संघर्ष रैप की तेज़ कथात्मक चाल में खुलते हैं. तबले की थाप, सितार के प्रकंपित तार, सेलो की गहरी साँस और इलेक्ट्रॉनिक बीट एक-दूसरे में ऐसे घुलते-लिपटते हैं कि इतिहास कोई बीती हुई कथा नहीं रहता, वह देह के भीतर उतरती एक जीवित लय बन जाता है.

 

 

13.

जर्मन हेवी-मेटल बैंड ग्रेव डिगर का “साइलेंट रिवोल्यूशन” अद्भुत विरोधाभास रचता है. गिटार गरजते हैं, लय कलेजे पर नश्तर चलाती है, फिर भी गीत के केंद्र में खड़ा मनुष्य हथियार नहीं उठाता. मेटल की हिंस्र ध्वनि गांधी की अहिंसा को कमज़ोर नहीं करती. वह इस तथ्य को बताती है, प्रतिरोध बिना गोली के भी भयंकर हो सकता है. यहाँ मौन भीतर संचित ऊर्जा है. वह उठी बंद मुट्ठी, जो बिना प्रहार साम्राज्य की नींद उड़ा देती है.

कोरल-ऑर्केस्ट्रल “महात्मा गांधी: द प्रॉफेट ऑफ कॉन्शन्स” (1993) गांधी के जीवन में नहीं, मानव-कंठों के सामूहिक श्वास में सुनाई देती है. मानो जीवनी ध्वनि की वास्तुकला बने. यहाँ गांधी स्वरों के बीच टिके नैतिक केंद्र हैं.

2020 की “माय लाइफ़ इज़ माय मैसेज” महामारी के बंद दरवाज़ों के बीच जन्मी ऐसी कैंटाटा है, जिसमें दूर-दूर बैठे गायक एक-दूसरे को छुए बिना सामूहिक देह बना लेते हैं. गांधी के कथन पचास भारतीय और यूरोपीय कंठों में खुलते हैं, स्क्रीन अलग, साँस एक. सैंटियागो लुसार्दी गिरेली का संगीत क्वारंटीन के अकेलेपन में मनुष्यों को एक-दूसरे की साँस के पास ला खड़ा करता है.

क्रिस क्रिस्टोफरसन “दे किल्ड हिम” (1986) कंट्री और फोक की उस विरल परंपरा का गीत है, जिसमें धुन विलाप भी है, नैतिक गवाही भी. जॉनी कैश और बॉब डिलन जैसे कलाकारों ने बाद में इसे गाकर शोक को और व्यापक कर दिया. इस तरह एक हत्या विश्व-स्मृति का कोरस बन गई. वह भारतीय इतिहास की एक घटना भर नहीं, मनुष्य की उस पुरानी विडंबना का हिस्सा हो गई, जिसमें सभ्यता सबसे कोमल नैतिक स्वरों को लेकर चिंतित रहती है. आज सब जानते हैं, गांधी मार्टिन लूथर किंग और ईसा के साथ उसी रक्तरंजित वंशावली में मौजूद हैं, जिसमें प्रेम, करुणा और न्याय चाहने वालों को हिंसा ने चुप कराने की कोशिशें कीं. इस पर न क्रोध का विस्फोट, न प्रतिहिंसा. केवल स्मृति की धीमी ज्वलनशीलता.

 

 

14.

हावर्ड गुडॉल की 2020 की कोरल रचना गांधी से संबद्ध करुणा और दयालुता के विचार को सामूहिक मानवीय स्वर देती है. कोयर, एकल गायन और वाद्य-संगति ऐसी ध्वनि रचते हैं, जैसे अनेक अकेली साँसें एक साझा हृदय हों. कोविड-19 के स्वास्थ्यकर्मियों को समर्पित यह कृति गांधी को राजनीतिक प्रतिरोध से उपचार, सहानुभूति और नैतिक देखभाल के प्रतीक में बदलती है.

एमसी सोलार का “ओ पेई द गांधी” (2003) गांधी-जीवनी नहीं, नाम, भूगोल और नैतिक स्मृति का हिप-हॉप है. भारत और दक्षिण एशिया की छवियों, हिंसा और उससे बाहर निकलने की आकांक्षा के बीच गांधी एक सांस्कृतिक संकेत से दमकते हैं. यह गांधी की वैश्विक पहचान का फ्रेंच पुनर्पाठ है.

जिल्बेर्तो जिल और जॉर्ज बेन की परंपरा को रेखांकित करता “अफोक्से फिल्योस द गांधी” तो अद्वतीय है. ब्राज़ील में गांधी की स्मृति ने अद्भुत देह धारण की. इस सांगीतिक-सांस्कृतिक परंपरा में गांधी का नाम योरूबा देवपरंपरा, कैंडोम्ब्ले, सांबा, अफ्रीकी-ब्राज़ीलियाई अस्मिता और कार्निवल की सामूहिक लय से मिलता है. यह गांधी पर ऐसी सांस्कृतिक पुनर्रचना है, जिसमें अहिंसा सड़क पर उतरती, वाद्य यंत्रों में बजती और नृत्य करती भीड़ की देह में प्रवेश करती है. गांधी यहाँ अटलांटिक पार अश्वेत सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं.

 

 

15.

स्पेन के सार्वजनिक प्रसारक आरटीवीई के बच्चों के कार्यक्रम “लूनिस दे लेयेंदा” ने गांधी की कथा को गीत, एनीमेशन और सरल नाटकीयता में रूपांतरित किया. यहाँ इतिहास बच्चे के सामने अन्याय, प्रतिरोध, साहस और अहिंसा की लोककथा की तरह खुलता है. यही वह सूत्र है, जो गांधी को बाल-स्मृति की धुन में ऐसे सहेजता है, जहाँ पहली बार ही में कोई बच्चा तक समझ लेता है कि बिना हथियार भी प्रतिरोध संभव है.

“शेवो लों ए इदे कुर्त” यानी “लंबे बाल और छोटे विचार” हिप्पी और विरोध-संस्कृति के उस आत्मसंतोष पर कटाक्ष करता है, जिसमें दुनिया बदलने की इच्छा और दुनिया बदलने की कीमत के बीच दूरी है.

ले शार्त का “गांधी” (1993) उसी नाम को अलग रोशनी देता है. वे मनुष्य इतिहास में छूट गया प्रेम का अवसर हैं. गीत की उदासी उस संभावना से बनती है, जिसे मानवता ने क्षणभर छुआ और फिर पुरानी हिंसा की बाँहों में लौट गई. गांधी की मुस्कान युद्ध और सामूहिक पागलपन के सामने है. यह दृश्य राजनीतिक होने से पहले अंतरंग है. मानो किसी संबंध में एक क्षण ऐसा आया हो, जब दो लोग एक-दूसरे को सचमुच समझ सकते थे, अहंकार ने वह क्षण जाने दिया. सभ्यता भी कभी-कभी प्रेम में विफल मनुष्य जैसी दिखती है.

 

 

१६.

उसी दशक में गांधी सार्वजनिक इतिहास से उतरकर निजी संबंधों के केंद्रीय कक्ष में आते हैं. नेटिव के प्रेम संबंधों में शिकायत के गीत “काँ से पूर मोआ” (“जब मेरी बात आती है”) में प्रेमिका क्रोध के क्षण में गांधी की सीख याद करती है और उसी क्षण उसे भुला देने का मन भी करता है. गांधी प्रहार से ठीक पहले भीतर उठती वर्जना हैं. प्रेम शरीर को जितनी निकटता देता है, उतनी ही चोट की आशंका भी, ऐसे में आत्मसंयम किसी राजनीतिक सभा की तुलना में अधिक कठिन होता है. गांधी का नाम यहाँ इसी कठिनाई को मापता है. वह क्रोध पर नियंत्रण रखने वाली अंतरात्मा हैं. सिद्धांत और उत्तेजित रक्त के बीच की दूरी.

वेरोनिक साँसों के “आँ एत्र इदेआल” में गांधी का अर्थ फिर बदलता है. गायिका को प्रेम में गांधी नहीं, ऐसा मनुष्य चाहिए, जिसकी देह में कमजोरियाँ की कला और अपूर्णता की ऊष्मा हो. किसी नैतिक पूर्णता की ऊँचाई वाली प्रतिमा और अंतरंग मनुष्य के बीच फ़र्क़ होता ही है. प्रेम को थकन, भय, चिड़चिड़ापन, भूल और क्षमा वाली देह चाहिए. गांधी इतनी ऊँची नैतिक पूर्णता हैं कि वे रोज़मर्रा के प्रेम में एक असुविधा हैं.

बेन ल’ऑन्कल सोल का “सोलमैन” युग के नए जल्वों में असली नज़र गुम हो जाने को रेखांकित करता है. जैसे समय की नई रोशनी ने नैतिक लोक के भीतर बहुत अँधेरा भर दिया है. यहाँ गांधी ज्ञान, आत्मसंयम और नैतिक परिपक्वता की असंभव ऊँचाई हैं. गीत का सौंदर्य इसी में है कि प्रेम के लिए मनुष्य को गांधी होना आवश्यक नहीं. वह अपूर्ण देह, सीमित बुद्धि और खुले हृदय के साथ भी इस क़ाबिल हैं. गांधी कठोर मूर्ति नहीं, मनुष्य की सीमाओं को उजागर करते दर्पण हैं.

बेल्जियम-आधारित अफ्रीकी समूह ज़ैप मामा के “कोमाँ सा वा?” (1999) में भारत “गांधी की भूमि” बनता है. धूप, सुगंध, समय, यात्रा और परंपरा की छवियों के बीच गांधी व्यक्ति से अधिक भूगोल का सांस्कृतिक चिह्न हैं. पश्चिमी कल्पना अक्सर भारत को रहस्य, आध्यात्मिकता, गांधी और शाश्वत समय की सुगंध में लपेट देती है, जटिल देश सुंदर सम्मोहन और “गांधी की भूमि” में बदल जाता है.

 

 

17.

हम इतिहास में देख चुके हैं कि सबसे प्रचंड विजेता सिंधु के किनारे खड़े रह गए. उनके सामने वह उपमहाद्वीप था, जहाँ सदियों पहले बुद्ध ने हिंसा के विरुद्ध करुणा का साम्राज्य खड़ा किया. इतिहास बताता है कि तलवार के साम्राज्य घोड़े की पीठ पर उठते हैं, नैतिकता के हरण से बनते हैं और घृणा से अपनी आग पाते हैं; इसलिए अंततः ढहते हैं. विचारों के साम्राज्य मनुष्य की चेतना में जन्म लेते हैं. अहिंसा और करुणा का भूगोल किसी सीमा में नहीं बसता; वह स्मृति के समुद्र में बदलकर पीढ़ियों की चेतना से बार-बार तटों पर लौटता रहता है.

 

 

18.

यानिक के “एल” यानी “वह स्त्री” (2000) में यह सांस्कृतिक रूपांतरण है. प्रेम के प्रभाव में वक्ता स्वयं शांत और गांधीमय है. “ला ला ला ला” (2001) में “गांधी डैंडी” जैसी ध्वनियों से शब्द-क्रीड़ा की जाती है. गांधी यहाँ रैपर की आत्म-छवि हैं. वह हिंसक गैंगस्टर नहीं, सुरुचिपूर्ण, मधुर और शांत कलाकार हैं. यह गांधी का पॉप-सांस्कृतिक और भाषाई रूपांतरण है. यह संयोजन गंभीर स्मारकीय गांधी को जनसामान्य में ले आता है. गरिमा यथावत है. सोलार हिंसक गैंगस्टर-छवि के बरक्स एक सुरुचिपूर्ण, बुद्धिमान, शब्दों से काम लेने वाले गांधी की कल्पना करते हैं. पॉप की पोशाक पहने संत रूप में गांधी मुस्कुराते हैं.

सोलार का “लेव-तोआ ए रैप” यानी “उठो और रैप करो” (2001) तो गहरा है. गांधी का दुबलापन सौंदर्यशास्त्रीय विद्रोह है. इतिहास का वह क्षण जब पतली बाँहें भारी साम्राज्य की सैन्य वाहिनी से अधिक शक्तिशाली सिद्ध होती हैं. गांधी की दुबली देह वाणी और बुद्धि की वैकल्पिक शक्ति है. यह फ्रेंच रैप में गांधी संबंधी सबसे रोचक प्रयोगों में है.

केरी जेम्स का “रलेव ला तेत” यानी “अपना सिर उठाओ” (2004) गांधी को फ्रेंच उपनगरों के वंचित युवाओं के सामने लाता है. शिक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक उन्नति की पुकार में माल्कम एक्स और मार्टिन लूथर किंग के साथ गांधी आते हैं.

 

 

19.

भारत का उपनिवेशवाद, अमेरिकी नस्लवाद और फ्रांसीसी उपनगरों की वंचना का एक ही इतिहास नहीं हैं. गीत उन्हें प्रतिरोध की आकांक्षा के एक वैश्विक मंडल में रखता है.

ऑक्समो पुच्चीनो के “वारियरज़” यानी “योद्धा” (2004) से दृश्य खुरदुरा हो जाता है. यही लम्हा फ्रेंच रैप के गांधी को अप्रतिम बनाता है. यह संगीत उन्हें मंदिर में सुरक्षित नहीं रखता, उन्हें ऐसे जीवन में रखता है, जहाँ क्रोध रोज़मर्रा का संसाधन है. अहिंसा को अब सड़क की गरम साँस के सामने उपयोगिता साबित करनी है. गीत में क्षणभर गांधी जैसी “पीस” मुद्रा अपनाने और उसके तुरंत बाद योद्धा बनने का विरोधाभास है. यह शांति का स्थायी कार्यक्रम नहीं, हिंसक या प्रतिस्पर्धी वातावरण में थोड़ी देर का विराम है. गांधी यहाँ रैपर की क्षणिक शांत मुद्रा हैं, जिसके बाद आक्रामक व्यक्तित्व वापस आ जाता है. यही विडंबना गीत को अलग ही रूप में गढ़ती, मढ़ती और पढ़ती है.

 

 

20.

साइ फ़ोर द ला रीम के “ला वी मा आप्री” (2006) यानी “जीवन ने मुझे सिखाया” में गांधी का नाम वहाँ आता है, जहाँ हिंसा और अहिंसा एक-दूसरे के सामने दो विपरीत स्पंदन हैं. एक ओर जीवन है घायल, उत्तेजित, अमानुषिक, दूसरी ओर गांधी हैं हिंस्र धड़कन के भीतर रखा शांत, ठंडा और नैतिक स्वर. जैसे किसी उन्मत्त ताल के बीच अचानक एक लंबा, निर्विकार आलाप उतर आए और पूरा संगीत क्षण-भर को अपनी ही क्रूरता सुनने लगे. यहाँ भाषा अपने वाक्य-विन्यासों के वस्त्र ठीक करने में व्यस्त नहीं, अर्थ के शरीर पर सीधे हाथ रखती है. तुक, लय और विरोधाभास मिलकर ऐसा तनाव रचते हैं, जिसमें गांधी किसी ऐतिहासिक व्यक्ति से अधिक हिंसक जीवन के नैतिक विलोम बन जाते हैं. वे गीत में उपस्थित होकर हिंसा को रोकते नहीं, सामने तन जाते हैं. इतना शांत कि हिंसा को पहली बार में ही अपनी ही साँस की गरमी, अपने ही रक्त की गंध और अपनी ही असभ्यता का बोध होने लगे.

इस सांगीतिक वैभव में गांधी ऐसी प्रतिलय हैं, जो हिंसा की तेज़, मांसल और उत्तेजित गति के भीतर धीमे से प्रवेश करती है और उसके अर्थ को उलट-पलट देती है.

 

 

21.

अलीज़े का “लिली टाउन” (2007) एक रंगीन, स्वप्नवत नगर है. इसी आकाश में जॉन लेनन और गांधी साथ दमकते हैं. दोनों यहाँ बेहतर संसार की दो उजली संभावनाएँ हैं. एक संगीत की शांति, दूसरा राजनीति की अहिंसा. गांधी इस गीत में धरती पर चलते मनुष्य से अधिक यूटोपिया के आकाश में टंगा नैतिक नक्षत्र हैं, ऐसा चिह्न, जिसे देखकर मनुष्य अभी भी किसी सुंदर भविष्य पर विश्वास कर सके.

सोप्रानो फ़ीट इंदिला का “हीरो” (2010) कल्पना का सुंदर स्पर्श है. पीछे जाने की शक्ति मिले तो वे इतिहास की धड़कती नसों तक वापसी चाहते हैं. मार्टिन लूथर किंग को भविष्य दिखाने, मंडेला को विजय का समाचार देने और गांधी के साथ दांडी मार्च में. यहाँ गांधी इतिहास के जीवंत वर्तमान हैं. उनके पैरों में धूल, शरीर में थकान और थकी पिंडलियों के भीतर साम्राज्य से बड़ी चपल कामना. धूल, थकान, दूरी, पसीना और दूसरे शरीरों की निकटता बनकर. इतिहास को समझने की एक विधि उसके साथ थोड़ी दूर पैदल चलना ही है.

 

 

22.

सोप्रानो एवं आरईडीके के “सक्रे द पोलिशिनेल” (2010) की सामग्री “गांधी” जैसी, रूप कैसियस क्ले मुहम्मद अली जैसा. कितना सुंदर विरोधाभास है. भीतर अहिंसा, बाहर प्रहार की मुद्रा. शब्द न्याय की बात करते हैं, पर उनकी लय मुक्के की तरह जबड़े पर उतरती है. गीत बताता है, अहिंसक विचार को निर्बल भाषा की आवश्यकता नहीं. गांधी का नैतिक ताप और अली की शारीरिक ऊर्जा एक ही बीट में समा सकती हैं. संदेश शांत हो सकता है. आवाज़ फिर भी बिजली की तरह शरीर की नस-नस को चीर देने वाली.

मेदीन के “पोरत्रे शिन्वा” (2010) में एक और ही नक़्हत है. वे कहते हैं, अपनी हिंसा को गांधी के वस्त्र पहना देंगे. यह छवि भीतर तक छीलती है. देह में हिंसा, त्वचा पर अहिंसा. गांधी यहाँ सद्गुण से अधिक एक नैतिक वेशभूषा हैं. शक्ति अपने तीखे नाखून छिपाकर करुणा की उँगलियाँ दिखाती है. गीत इसी कपट की नस पकड़ता है.

मेदीन का ही “ओराक्ल” (2013) अदभुत है. “गांधी की बाँहों से युद्ध” जैसा वाक्य स्वयं भीतर चिंगारी रखता है. बाँहें आलिंगन की भी होती हैं, संघर्ष की भी. यह भाषा छलावरण भी है. अहिंसा की त्वचा के नीचे सत्ता की लिप्सा. मेदीन इस असुविधाजनक द्वंद्व को खुला छोड़ते हैं. गांधीवाद यहाँ पवित्र प्रमाणपत्र नहीं, एक नैतिक तकनीक है.

 

 

२३.

आज़ादी के समय अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भय का जो अंधकार भरा आधिपत्य था, उसे गंाधी ने अपनी उपस्थिति की रोशनी से दूर किया. इतना करीने से कि उस पर आधारित गीत सुनें तो ख़ुद ही से लिपट जाने का मन कर जाए. इस बात को मात्ये मेंदेस के “झ स्वि लीब्र” (2013) यानी “मैं स्वतंत्र हूँ” गीत में देखा जा सकता है.

गीत में स्वतंत्रता की हैरानीजनक कल्पना इतनी विस्तृत है कि उसमें कांट, मार्क्स और गांधी के बीच संवाद होता है. यह हैरानीजनक कल्पनाशीलता है. मार्क्स कांट के निधन के 14 साल बाद जन्मे और मार्क्स के निधन के 14 साल बाद गांधी पैदा हुए. इससे 65 साल पहले कांट इस दुनिया से रुख़सत हो चुके थे. ये तीनों दार्शनिक और राजनीतिक विचारक अंतरंग सहचर हैं. पर उनके उनके वस्त्र इतिहास के गर्दोगुबार से सने हैं. स्वतंत्र मन उनके पास प्रश्न लेकर बैठ सकता है.

 

 

24.

ग्रेम्स का “सिमेतिएर” यानी कब्रिस्तान (2013) गांधी की उस विशिष्टता की याद दिलाता है, जिसमें बेकसी कारसाज़ हो जाती है. ग्रेम्स की भाषा टूटी हुई, अतियथार्थवादी और धुँधले स्वप्न जैसी है. इस विखंडित संसार में गांधी की यात्रा हिंसा, अपराध और सामाजिक क्षय के बीच है. उनका वहाँ होना ही अर्थ पैदा करता है. जैसे सफेद वस्त्र पहने कोई शांत देह लोहे, धुएँ और टूटे काँच के नगर से गुजर रही हो. गांधी यहाँ असंभव आगंतुक हैं. ऐसा नैतिक शरीर, जिसकी निस्संग उपस्थिति ही उस क्रूर संसार को और अधिक हृदयहीन दिखाई देने लगती है.

फ्रांसीसी रैपर कारिस “ओर न्वार” यानी काला सोना (2013) में स्वयं को अपराधी बताते हुए कहते हैं, वे गांधी से कई प्रकाश-वर्ष दूर हैं. एकदम प्रतिलोम. गांधी यानी अहिंसा, संयम और नैतिकता और रैपर यानी हिंसा, धन, शक्ति और गैंगस्टर. गांधी का नाम यहाँ यह बताने के लिए है कि गायक उस आदर्श से कितनी दूरी पर है.

 

 

25.

नाक मेंदोसा “दवनीर केलकैं” यानी कुछ बनना (2013) में  गांधी की विरासत को नौ मिलीमीटर की पिस्तौल थामे उत्तराधिकारियों के हाथों में ले आते हैं. यहाँ “गांधी के वंशज” उस सभ्यता की नैतिक संतानें हैं, जिसे अहिंसा का एक असाधारण विचार-विन्यास मिला था. विडंबना इतनी तीखी है कि हृदय को छील डालती है. हथेली में चरखे का सूत नहीं, ठंडी धातु है, उँगली संयम पर नहीं, ट्रिगर पर है. गांधी इसलिए पराजित नहीं होते, उनका उत्तराधिकार पराभूत होता है. गीत पूछता है कि मनुष्य को एक बार हिंसा से मुक्ति की भाषा मिल भी जाए तो क्या वह सचमुच अपनी आदिम अमानुषिक लय छोड़ देता है? बंदूक यहाँ हथियार नहीं, स्मृति की विफलता है. एक ऐसी सभ्यता की, जिसने अपने सबसे कठिन नैतिक पाठ को पढ़ा तो. पर उसे जीवन में उतार नहीं सकी.

 

 

26.

तिएर मोंद के “फ़ेनिक्स” (2014) दासता, नस्लीय अपमान और ऐतिहासिक पराजय के भीतर से शिक्षा, संगठन और आत्मनिर्माण का गीत है. इसी यात्रा में “हथियार गांधी को सौंपने” की छवि है. बंदूक हाथ से जाती है, पर प्रतिरोध नहीं जाता, वह मस्तिष्क, संगठन, व्यवसाय और सामुदायिक शक्ति में रूपांतरित हो जाता है. यह गांधियन रणनीतिक रूपांतरण है. हिंसा की तात्कालिक गर्मी से दीर्घकालिक राजनीतिक बुद्धि. अहिंसा निष्क्रियता नहीं. “फ़ेनिक्स” में गांधी राख से जी उठने की दूसरी तकनीक सुझाते हैं.

ला फुइन के “एनडीएम” (2014) की रानाई अलग ही है. उनकी घोषणा है, गांधी का अपहरण हो गया है. रैप की इस अतिशयोक्ति के नीचे एक गहरा अँधेरा खुलता है. अपहरण मानो किसी समाज से उसकी आख़िरी शांत आवाज़ को उठा ले जाना है. गांधी यहाँ बंधक बनाई गई अहिंसा हैं. इस रूपक में एक विचित्र सिनेमाई दृश्य है. शहर धात्विक आवाज़ों, सायरनों और धमकियों में गंभीर प्रश्न पूछता घूम रहा है: किसी समाज की नैतिकता कब गायब होती है? पराजित किया जाता है तब या उसे बोलने ही नहीं दिया जाता तब?

 

 

27.

मिस्टर यू के “रूम सर्विस” (2014) में एक टुकड़ा है : मैं गांधी नहीं. संयम, आत्मनियंत्रण, प्रतिशोध से दूरी से कोई लेना-देना नहीं. रैपर स्वयं को उनके विलोम में अधिक रखता है. गांधी यहाँ वह बिंदु हैं, जिससे उच्छृंखल “मर्दानगी” को दूर जाने की मुद्रा बनानी पड़ती है. जैसे किसी अँधेरे कमरे में हर वस्तु की छाया उसी अनुपस्थित प्रकाश से परिभाषित होती रहे.

जूल के “आँती बीडीएच” (2014) में “गांधी” यूटोपिया हैं: न्याय, भरोसा, नैतिकता और ऐसी सामाजिक गर्माहट, जिसमें मनुष्य दूसरे मनुष्य को लगातार शत्रु न समझे. वास्तविक संसार विपरीत है : विश्वासघात, संशय और हिंसा. यहाँ गांधी एक अनुपस्थित संसार हैं. यही अनुपस्थिति गीत को उदास बनाती है. आदर्श स्मृति में है, जैसे किसी पुराने घर की रोशनी दूर से दिखाई तो दे. लौटने का रास्ता न मिले. “गांधी की दुनिया” यह स्वीकार करना है कि बेहतर संसार कैसा हो सकता है, फिर भी उसके दैनिक जीवन की संरचना उसी संभावना को असंभव बनाती जाती है.

 

 

28.

बिगफ़्लो एवं ओली के “अटलांतिस” (2014) में गांधी की आँखें रैप की पंचलाइन हैं. गांधी लोकप्रिय स्मृति में दुर्बल देह, गोल चश्मे और गंभीर आँखों वाला सम्मोहक चेहरा हैं, रैप उसी दृश्य-संकेत को बढ़ाकर कॉमिक शक्ति बनाता है. हिंसा हमेशा हाथ, पाँव, शस्त्रास्त्र, शास्त्रों या पवित्र ग्रंथों और धर्मों की स्वार्थपरक व्याख्या से ही नहीं होती, कभी दृष्टि भी हिंसक होकर मनुष्य को निर्वस्त्र कर देती है. गांधी की आँखों में एक ऐसी नैतिक एकाग्रता का रश्मिपुंज है, जिसके सामने छल असहज हो उठता है.

एम. पोकोरा का “अवाँ नू” यानी हमसे पहले (2015) इतिहास की परतें खोलता है. उन मनुष्यों को याद करता है, जिन्होंने संसार की दिशा बदली. मंडेला, मार्टिन लूथर किंग, मेरी क्यूरी और गांधी. वे उन नैतिकप्रभा वाले पूर्वजों में हैं, जिनकी मेहनत की ज़मीन पर आधुनिक मनुष्य अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं की इमारत खड़ी करता है और जो साहस को शोर से और बुद्धिमत्ता को चालाकी से अलग करते हैं. आज हमारे पैरों के नीचे जो गुनगुनाती हुई राहें हैं, उन्हें उन नैतिक पूर्वजों ने ही अपने शरीर, जोखिम, पसीने और कारावासों में जीवन बिताकर तैयार किया था.

 

 

29.

डीजे कायज़ आदि का “जुगनी जी” (2015) के गांधी एक मनोवैज्ञानिक माप हैं. क्रोध और आत्मनियंत्रण के बीच की अंतिम रेखा. कमेलांसियाँ का “ल पूआ दे लुमिएर” (2015) पहली दृष्टि में तुच्छ लगता है. सांस्कृतिक अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण है. इस तरह गांधी नाम वैश्विक आइकनोग्राफ़ी बन चुका है.

 

 

30.

बिगफ़्लो एवं ओली का “ल फ़िलोज़ोफ़ साँ ला बार्ब” (2015) गांधी को “शांति” और हिटलर को “घृणा” के सांस्कृतिक ध्रुवों से जोड़ता है. महत्त्व इस बात का है कि कुछ नाम इतने अर्थ-सघन हो जाते हैं कि वे संज्ञा से विशेषण हो जाते हैं. “गांधी” सुनते ही एक नैतिक तापमान बदलता है, “हिटलर” सुनते ही दूसरा. संगीत इस भाषिक विद्युत को इस्तेमाल करता है.

लेकिन दमी पोर्सियों का “प्लानेत रैश” कहता है मनुष्य यानी हिटलर और गांधी का मिश्रण. गीत मनुष्य को न जन्मजात संत मानता है, न स्थायी राक्षस. उसके भीतर करुणा और क्रूरता, संरक्षण और विनाश, आलिंगन और प्रहार हैं. गांधी यहाँ हिटलर के मात्र ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, मानवीय संभावना के दूसरे ध्रुव हैं. यह नैतिकता को बाहर के नायकों और खलनायकों से खींचकर हमारे शरीर के भीतर रख देता है. प्रश्न अब यह नहीं कि इतिहास में गांधी कौन था और हिटलर कौन, प्रश्न यह है कि हमारे भीतर किसे भोजन मिल रहा है. मनुष्य की माँसपेशियों में और आत्मतत्त्व के भीतर दोनों संभावनाएँ सो सकती हैं. सभ्यता इसी निरंतर चयन का नाम है. हर दिन तय करना कि शक्ति को किस दिशा में बहने देना है. भारतीय परिस्थितियों के लिए संभवत: इससे अधिक प्रासंगिक गीत हो ही नहीं सकता.

सिनिक के “काँ झ सेरे ग्राँ” (2015) यानी “जब मैं बड़ा होऊँगा” उद्वेलनकारी गीत है. मैं बड़ा होकर क्या बनूँगा? गांधी उसी समीकरण में असुविधा पैदा करते हैं. क्या शरीर का प्रतिशोध रोक सकना भी शक्ति है?

दिज़िज़, यूसूफ़ा एवं सोप्रानो का “ला प्रोमेस” (2015) यानी “वादा” बताता है : त्याग कठिन है, संयम अलोकप्रिय. पर तत्काल पुरस्कार सिर्फ़ तमाशों से हासिल होता है. सेलिब्रिटी संस्कृति में चरित्र की धीमी मेहनत की तुलना में दृश्यता की चमक अधिक बिकती है. इसीलिए “गांधी होना बहुत झंझट है” जैसी भावना वस्तुतः आधुनिक मनुष्य की नैतिक अकर्मण्यता पर कटाक्ष है.

 

 

31.

जॉर्जियो के “ऐंदोम्प्ताब्ल” (2015) यानी “अदम्य” की थीम “गांधी की तरह स्वतंत्र” है. ऐसी चेतना, जिसे सत्ता भीतर से वश में न कर सके. गांधी का शरीर कारावास में डाला जा सकता था. पर विचार को कैद करना कठिन था. जॉर्जियो इसी आंतरिक स्वायत्तता को पकड़ते हैं. यहाँ स्वतंत्रता भूगोल या कानून से पहले मानसिक अस्वीकार है. “अदम्य” होने की यह धारणा रैप के आत्मसम्मान से सहज जुड़ती है. गांधी और रैपर एक बिंदु पर मिलते हैं: मेरी चेतना पर तुम्हारा अधिकार संभव नहीं.

 

 

32.

क्यूबेक के बैंड शोकला की “आ ऊऐं” (2016) रचना अशिष्ट, कामुक और हास्यप्रधान है. इसमें गांधी का उल्लेख देहधर्मी विनोद में आता है. संभवतः चेहरे की संरचना के कारण. यहां मुझे प्रख्यात साहित्यकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री की गांधी पर की गई एक विलक्षण टिप्पणी याद आती है : “मैंने गांधी के चेहरे को उनके सामने बैठकर जब-जब बहुत निकट से देखा, उसमें ऐसा सम्मोहन पाया, जैसा संसार के किसी दूसरे चेहरे में मुझे कभी दिखाई ही नहीं दिया.”

यहां चतुरसेन का सौंदर्यबोध शरीर से निकलकर विचार और चरित्र के प्रदेश में प्रवेश करता है. उनके अनुसार सौंदर्य और सम्मोहन का कारण केवल शरीर की बनावट नहीं होता. उसके पीछे चिंतन का ताप भी होता है. अहिंसा, नैतिकता और आत्मसंयम का दीर्घ अभ्यास गांधी के चेहरे पर भीतर से प्रकाशित होता था. मानो उनका आंतरिक तापसी चरित्र धीरे-धीरे उसकी मुखाकृति में उतर आया हो.

 

 

33.

निन्यो का “पूर नू” यानी “हमारे लिए” (2016) नकली गैंगस्टरों की पोल खोलता है. वे बाहर हिंसक, भीतर “गांधी” हैं. निन्यो का व्यंग्य इसी संघर्ष की नस और उसके द्वंद्व पर है.

कलाश क्रिमिनेल के “गेद्रो” (2016) में रैपर अपनी हिंसक मुद्रा उनके ख़िलाफ़ रखकर ही स्पष्ट कर पाता है. लाप्सो लैप्स “गांधी” में कहता है कि कभी उसके भीतर गांधी जैसा संयम था, पर समझौतों के टूटने और विश्वास के क्षरण ने उसे समाप्त कर दिया. यह गैंगस्टर कथा की परिचित नैतिक चाल है: “मैंने शांति की पूरी कोशिश की, अब हिंसा की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है.” गांधी यहाँ ख़त्म हो चुकी सहनशीलता की सीमा हैं. यह प्रयोग नैतिक रूप से दिलचस्प है. अहिंसा की पूर्व-कथा से हिंसा अपने लिए वैधता अर्जित करती है. पहले मैं अच्छा था, इसलिए अब मेरा क्रोध न्यायोचित है. मनुष्य हिंसा से पहले अपने भीतर एक अदालत लगाता है और स्वयं को बरी करता है. गांधी का नाम उस आंतरिक मुकदमे में अंतिम गवाह है.

डी-ट्रैक के 2016 के “फ़्रैंकेंस्टाइन” में गांधी सत्यवक्ता और निर्भीक विचारक हैं. अहिंसा को अक्सर कोमलता समझ लिया जाता है, जबकि सत्याग्रह का “सच” अपने भीतर असुविधा पैदा करने में सक्षम है. स्पष्ट बोलना कई बार थप्पड़ से अधिक बेचैन करता है.

 

 

34.

बूस्ती का “लेट मी लव” में गायक की कामना है कि वह अगले दिन मर जाए तो उसके लिए गांधी को उद्धृत किया जाए.

फ्लोराँ पान्यी का 2017 का “गांधी” कहता है : अच्छे होने की इच्छा पर्याप्त नहीं. उठो. सामने अन्याय हो और तुम उसे बर्दाश्त करो तो तुम्हारी अच्छाई किस काम की? गीत हाथ बाँधकर सदाचार का प्रदर्शन करने और सिर्फ़ शाब्दिक आलोचना के विरुद्ध है, वह आस्तीन चढ़ाने, निर्णय लेने और भलाई को कर्म में बदलने की माँग करता है. गांधी को प्रायः शांत मुस्कान, दुबली देह और उपदेश में स्थिर कर दिया जाता है, जबकि यहाँ वे सक्रिय अच्छाई हैं. नैतिकता केवल मन की सुगंध बनी रहे या हिंसा और हिंसकों पर शाब्दिक प्रहार करके इसे ही प्रतिवाद समझने का भ्रम पालकर बैठे रहे और संसार की गंदगी में उतरने से बचे तो उसका उपयोग क्या है? अच्छाई को भी मांसपेशियाँ चाहिए, करुणा को भी.

डैब्स के “मातैं मिदी स्वार” 2018 यानी “सुबह, दोपहर और शाम” में गांधी त्यागा गया विकल्प हैं. नैतिक विकल्प तभी विकल्प है जब दूसरा रास्ता दिखाई दे. गांधी उस बंद दरवाजे का नाम हैं, जिसे रैपर देखता है, पर खोलता नहीं.

एस. प्री न्वार के 2018 के “ला बेल ए ला बेत” नैतिक उलटाव का गीत है. संसार में गांधी का युग समाप्त हो चुका है यानी निष्कपटता, संयम और आदर्शवाद अब बीती बातें हैं. वर्तमान संबंधों में आकर्षण के भीतर छल, इच्छा के भीतर स्वार्थ और निकटता के भीतर हिंसा प्रवेश कर चुकी है. गांधी यहाँ खोए हुए नैतिक मौसम हैं.

कैराँत-सेत तेर के 2019 के “ओं वियाँ गाशे ते क्लासीक नुमेरो त्रोआ” यानी “हम तुम्हारे क्लासिक गीत को बिगाड़ने आए हैं” में रैपर “बिना हथियार और बिना आँसू, गांधी की तरह” आते हैं. लेकिन आत्मविश्वास से लबरेज़ निहत्थेपन के साथ आते हैं. अनेक गैंगस्टर गीतों में गांधी होना कमज़ोरी था, यहाँ अहिंसा निर्भीक शैली है. हथियार न होना असुरक्षा नहीं, अपने अस्तित्व पर भरोसा है. असली साहस प्रदर्शन के लिए लोहा नहीं ढोता. गांधी इस पंक्ति में सौंदर्यशास्त्र हैं. खाली हाथ, सीधी रीढ़, कंकाल सी काया. हिंसा शरीर पर कवच चढ़ाती है, गांधी की विचार मुद्रा कवच उतारकर भी पीछे नहीं हटती. रैप और अहिंसा यहाँ आकर्षक गठबंधन बनाते हैं.

 

 

35.

विश्व-संगीत में गांधी की सांगीतिक यात्रा बीसवीं सदी की स्मृतियों या इक्कीसवीं सदी के पहले दो दशकों पर आकर रुक नहीं जाती. पेंडेमिक और 2020 के बाद देखें तो दृश्य दिलचस्प है. यह महामारी, युद्धों, नस्ली तनावों, नई राष्ट्रवादी आक्रामकताओं, जलवायु-संकट और डिजिटल हिंसा का कालखंड है. इस समय गांधी का नाम अंगरेज़ी से स्पेनिश, फ्रेंच से डच, अरबी से इतालवी और ब्राज़ील तथा अंगोला की पुर्तगाली तक नाना संगीत-रूपों में घूमता है. वह नाम कहीं प्रेम है, कहीं धैर्य, कहीं आत्मसंयम, कहीं अहिंसक प्रतिरोध. भारत में जिसे गुपचुप चालाकियों से निषिद्ध बनाया जाता है, वह गांधी भारत से बाहर इतिहास से होता हुआ वैश्विक सांगीतिक क्षितिज से गीतिका बनकर झरता है.

 

 

36.

ऑरा दा प्रॉफेट का “गार्डियन एंजेल्स” (2020) गांधी-जैसे जीवन को प्रेम, विनम्रता और आत्मिक स्वतंत्रता से जोड़ता है. नेपोलियन दा लेजेंड और अमेरिगो गज़ावे के बूम-बैप और सोल-हिप-हॉप वाले “सुपरफ्लाई” (2021) में गांधी असाधारण सामाजिक प्रतिष्ठा की उपमा हैं. रीड स्ट्रीट का शीर्षक ही चौंकाता है “गांधी विद द न्यूक्स”. अहिंसा के सबसे पहचाने जाने वाले आधुनिक प्रतीक को परमाणु हथियारों के साथ रख देने से एक तीखी सांगीतिक विसंगति पैदा होती है. गीत हमारे परमाणु युग की नैतिक विडंबना को एक ही शीर्षक में सहेजता है. मनी मैन के ट्रैप गीत “गांधी” (2023) में उनका नाम सम्मान की मुद्रा है, जबकि “ब्लैक एंड व्हाइट” (2024) में कॉन्शन्स शांति को ‘गांधी वाली’ शांति से अलग बताता है. यानी गांधी को स्वीकार किया जाए या उनसे दूरी बनाई जाए, अहिंसा की तुलना का पैमाना वही हैं. आख़िर, हिंसा के ऑर्केस्ट्रा के बीच बजता अहिंसा का अकेला सुर गांधी ही तो हैं, जो हिंस्र धुनों को बेसुरा साबित करके कठघरे में खड़ा कर देते हैं.

स्पेनिश संसार में गांधी का रूप और अधिक राजनीतिक है. एल दोगोल और एल मेटा के “बाकानो” (2020) में वे रैप की अतिशयोक्ति और बुद्धिमत्ता के सांस्कृतिक संकेत हैं. चिली के एरस्तामे का “ला फुएरसा” कहीं गहरा है. यहाँ शक्ति प्रहार करने की क्षमता नहीं, प्रहार को रोकने की क्षमता है. गांधी वह शक्ति हैं, जो ‘बिना लड़े लड़ने’ की कला में निष्णात है. तीन वर्ष बाद बेजो और क्रूज़ काफुने का “रापिन्या” इसी छवि को उलट देता है. गांधी स्पेनिश रैप में एक नैतिक विशेषण हैं.

मिसरी के “दोना एनाकोंडा” (2020) में गांधी शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सामूहिक प्रतिरोध हैं. रोउजे के “क्रिप्टोकरेंसी” (2020) में वे उपभोक्तावादी लालसा प्रतिलोम हैं. यूरी और था-होमी का “टेनेट” (2022) गुस्से की चरम अवस्था में वही पुराना फ्रेंच-रैप वाला वाक्य-विन्यास लौटाता है : मैं गांधी नहीं हूँ. और सादेक के “पूर त्वा” (2023) में कठोरता को समझाने के लिए फिर गांधी का विपरीत बिंब उपस्थित होता है. यह बार-बार लौटता ‘नॉट गांधी’ गांधी की असाधारण सांस्कृतिक विजय है. पश्चिमी रैप को हिंसा समझाने के लिए भी अहिंसा के प्रतीक एक भारतीय फ़क़ीर की दरकार होती है. दरअसल, संगीत और अहिंसा दोनों का पहला नियम एक ही है. दूसरे के अस्तित्व के लिए अपने स्वर में थोड़ी जगह छोड़ना.

फ्रेना के “ड्रैगन रोल” (2021) में गांधी ‘पीस’ का पर्याय हैं. अब सत्याग्रह, दक्षिण अफ्रीका, दांडी मार्च या भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम को समझाने की ज़रूरत नहीं, बस ‘गांधी’ कह देना पर्याप्त है.

इस नाम के सबसे सुंदर विस्तारों में एक पुर्तगाली-भाषी दुनिया में दिखाई देता है. ब्राज़ील में मुत्रेता रैप, फ्रेड बेनीसियो और ओस मालुंगोस का गीत सीधे “महात्मा गांधी” (2021) है. द रासियोसीनियो का “पाज़ द गांधी” है अर्थात् गांधी की शांति. जैसे किसी शांति को उसकी तीव्रता या प्रकृति बताने के लिए ‘गांधी’ एक स्केल हो. यहीं से यह पुर्तगाली स्वर अटलांटिक पार अफ्रीका तक पहुँचता है. 2024 में अंगोला के फेडिलसन, प्रोडीजियो, डीजे तफिन्या और सिडजे के “एतेर्नो” में कलाकार अच्छे मूड को गांधी और बुरे मूड को एक राक्षसी और फासीवादी ध्रुव पर रखता है. 2025 में ब्राज़ील के कार्लोस रेन्नो और मकाको गोर्दो का “ग्रांदे आल्मा” इस यात्रा को पूर्ण वृत्त देता है. ग्रांदे आल्मा यानी ‘महान आत्मा’ ‘महात्मा’ का ही पुर्तगाली भाष्य है.

 

 

37.

अरबी रैप तक पहुँचते-पहुँचते इस यात्रा का भूगोल वैश्विक हो जाता है. 2022 में एमटी3 और ए-पीस का सीधे “गांधी” सामने आता है. एक गुजराती भारतीय, जो कभी औपनिवेशिक दक्षिण अफ्रीका और ब्रिटिश भारत की राजनीति के भीतर संघर्ष कर रहा था, एक सदी बाद अरबी हिप-हॉप ध्वनि-संसार में सिर ताने है. भाषा बदल गई, बीट बदल गई, शहरी अनुभव बदल गया. ‘गांधी’ की सांकेतिक ऊर्जा इतनी बची रही कि वह अरब युवाओं की आधुनिक संगीत-भाषा में थिरकने लगा. क्या यह कम अकल्पनीय है?

और फिर इतालवी रेगे में गांधी का अधिक उजला रूप दिखता है. 2024 में इन्ना कांतीना और सुद साउंड सिस्टम का “महात्मा गांधी” इस दौर के सबसे स्पष्ट गांधी-गीतों में है. रेगे की ऐतिहासिक भाषा ही प्रतिरोध, मुक्ति, प्रेम और सत्ता-विरोध से बनी है, इसलिए गांधी का उसमें प्रवेश स्वाभाविक है. गीत प्रेम को हथियार से अधिक शक्तिशाली है. यहाँ अहिंसा रेगे की बेस-लाइन में उतरती है. प्रतिरोध का टेम्पो धीमा, धड़कन गहरी और तीव्र.

प्रसिद्ध होना एक बात है, भाषा का रूपक बन जाना दूसरी. और किसी देश के गीतों में ढलते जाना तो नक्षत्र होना ही है.

गांधी अब विश्व-संगीत में किसी भारतीय राष्ट्रनायक की स्मृति नहीं. वे कभी अमन, कभी फोर्स विदाउट वायलेंस, कभी आत्मसंयम, कभी करुणा और कभी उस हिंसा की उलटी छाया हैं, जिससे आज की दुनिया भरी है. उन्हें आज़ादी से बहुत पहले ही वर्तमान और भविष्य में झूल रही हिंसा और धर्म का तमतमाया चेहरा दिख गया था. हिंसा, कट्टरता, धार्मिक असहिष्णुता और अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा से लबरेज़ खुरजियों वाले घोड़े भले नज़र न आए हों, पर उन्होंने 70 साल पहले ही उनकी टापें सुन ली थीं.

विश्व-संगीत में गांधी धुनों के बीच रखा हुआ एक नैतिक संदर्भ-सुर हैं. दुनिया के भीतर जब कुछ बहुत तेज़ बजने लगता है, जब ताल युद्ध के मार्च में बदल जाता है, जब बेस सत्ता और आक्रोश से भर जाता है, तब कहीं किसी अंगरेज़ी, फ्रेंच, स्पेनिश, डच, अरबी, इतालवी या पुर्तगाली गीत में उनका नाम अचानक सुनाई देता है.

ओम्ब्रेटूशॉक गर्ल्स का 2025 का रैप “लुक लाइक अ फ्रीस्टाइल’ गांधी को हिंसा, हिरोशिमा-नागासाकी और मैसेराती जैसी अतियथार्थवादी रैप-इमेजरी के बीच रखता है.

 

 

38.

गांधी विश्व-संगीत में बीट बदलते हैं, पर मूल सुर नहीं. कभी इलेक्ट्रिक गिटार की रिफ़ में, कभी ब्लूज़ हार्मोनिका, जैज़ सैक्सोफोन, बास और ड्रम-किट की धड़कन में, कभी सिंथेसाइज़र की चमक के पीछे. शोर जितना आधुनिक हो, नीचे कहीं तानपूरे-सी अहिंसा अपने आदिम स्वर में बजती रहती है. धीमी, अडिग, अविनाशी.

 

 

39.

ग्रैमी-विजेता संगीतकार और पर्यावरणवादी रिकी केज, चीनी-अमेरिकी विश्वविख्यात सेलोवादक और संगीतकार टीना गुओ और जापानी ग्रैमी-विजेता संगीतकार और बहुवादक मासा ताकुमी का “गांधी : मंत्राज़ ऑव कंपैशन’ साधारण एल्बम नहीं, गांधी पर 15-ट्रैक की अंतरराष्ट्रीय संगीत-परियोजना है. इसमें “कम्पैशन (करुणा)”, “महात्मा”, “कोएग्ज़िस्ट (एकम)”, “वी आर वन (रघुपति राघव)”, “संसार”, “एम्पैथी (वैष्णव जन तो)”, “डिवोशन (पायोजी)”, “द लॉर्ड्स प्रेयर (सर्वेशा)”, “व्हेयर आर माई रेनबोज़”, “बी द चेंज” और “अबाइड विद मी” जैसे 11 पूर्ण संगीत-ट्रैक हैं.

अमेरिकी चित्रकार-संगीतकार माइकल स्लोन का “गांधी’ 24-ट्रैक का कॉन्सेप्ट एल्बम है. इसकी संरचना सांगीतिक जीवनी जैसी है. इसके टाइटिल हैं : “प्रील्यूड टू महात्मा गांधी”, “वी विल नॉट स्ट्राइक अ ब्लो”, “द आश्रम”, “द स्ट्रेंथ ऑफ सिविल रेज़िस्टेंस”, “मेकिंग सॉल्ट”, “सत्याग्रह”, “प्रैक्टिसिंग अहिंसा” और “फिनाले टू महात्मा गांधी”.

गांधी हमें इस तरह पश्चिमी संगीत में पाँच रूपों से मिलते हैं: अहिंसा के गांधी (ला फुएरसा), प्रतिलोम गांधी (क्रिप्टोकरेंसी, टेनेट, रापिन्या), शांति के गांधी (पाज़ द गांधी), रेगे के प्रेमवादी गांधी (महात्मा गांधी, इन्ना कांतीना) और अंततः दार्शनिक गांधी (ग्रांदे आल्मा, मंत्राज़ ऑव कंपैशन, माइकल स्लोन).

इस हिंसक कालखंड के अंधेरे में गांधी इन छवियों का सौंदर्य अनंत है. बेन ल’ऑन्कल सोल, नेटिव, यानिक और वेरोनिक साँसों जैसे कलाकारों के यहाँ गांधी सबसे पहले मनुष्य के भीतर की व्यवस्था हैं विवेक, धैर्य, क्षमा और स्वयं पर नियंत्रण बनकर. भीतर उठती हिंसा को पहचानकर उसे अपने ऊपर शासन न करने देना है.

विश्व-इतिहास और मुक्ति-परंपरा में गांधी को सुरक्षित नैतिक मंच पर नहीं रखा जाता. उन्हें हिंसा के बीच फेंक दिया जाता है. कहीं हिंसा को गांधी के वस्त्र पहना दिए जाते हैं. कहीं “गांधी की बाँहों से युद्ध” होता है. यही फ्रेंच रैप की सबसे दिलचस्प सांस्कृतिक उपलब्धि है. वह गांधी को केवल उद्धृत नहीं करता, वह उनकी अहिंसा को हिंसक आधुनिकता की प्रयोगशाला में रखकर देखता है कि वह वहाँ कितना टिकती है. इससे कई असुविधाजनक प्रश्न पैदा होते हैं. क्या अहिंसा की भाषा भी हिंसक इच्छा का आवरण बन सकती है? क्या न्याय का संदेश आक्रामक लय में दिया जा सकता है? क्या शांत विचार को शक्तिशाली होने के लिए शांत आवाज़ ही चाहिए? यहाँ गांधी संगीत के भीतर पैदा हुए तनाव की तरह उपस्थित हैं. जैसे हिंसक बीट के नीचे एक दूसरी, धीमी, लगातार बजती प्रतिलय.

 

 

 

40.

फ्रेंचभाषी हों या अन्य, पूरे योरोप और अमेरिका के संगीत में गांधी केवल भारत के इतिहास से आए व्यक्ति भर नहीं. वे कभी बुद्धिमत्ता हैं, कभी धैर्य, कभी अहिंसा, कभी गैंगस्टर का विलोम, कभी मुक्ति का इतिहास, कभी खोया हुआ यूटोपिया, कभी मजाक, कभी दृश्य-चिह्न और कभी हिंसा की छाती पर रखा हुआ एक असुविधाजनक नैतिक हाथ. यह वैश्विक विस्मय है कि उनका नाम लोगों की रोजमर्रा की भाषा, संगीत, व्यंग्य, प्रेम, हिंसा और आत्मवर्णन में प्रवेश कर गया है.

फ्रेंच और पश्चिमी संगीत में गांधी इतिहास से निकलकर मुहावरा, मुहावरे से आगे जाकर मनुष्य की हिंसक धड़कन के भीतर बजती एक धीमी नैतिक तान बन गए हैं.

किसी आदमी की रीढ़ उसकी कमर में खोंसी बंदूक से नहीं नापी जाती. यही फ्रेंच कॉर्पस का एक बड़ा दार्शनिक योगदान है. वह गांधी के माध्यम से पुरुषत्व की दो देहें सामने रखता है. एक देह मुट्ठी कसती है, शोर करती है, प्रतिशोध को इच्छा की पूर्णता समझती है, दूसरी अपनी शक्ति को रोक सकती है. आत्मसंयम पहली देह को निष्क्रिय दिख सकता है. संभव है कि दूसरी देह अधिक कठिन अनुशासन से बनी हो. किसी को मार सकना जैविक शक्ति है, मारने की इच्छा को भीतर महसूस करते हुए नियंत्रित कर लेना नैतिक शक्ति. रैप इस द्वंद्व को कभी समझता है, कभी उसका उपहास करता है और इसी अस्थिरता द्वंद्व में उसका सौंदर्य है.

 

 

41.

फ्रेंच लोकप्रिय संगीत ने गांधी को प्रेम में, गुस्से में, व्यंग्य में, धमकी में, आत्मस्वीकृति में, नृत्य में और गैंगस्टर-पोशाक तक बरत कर देखा है.

“गांधी” रैप में प्रश्नों की शृंखला हैं. कितना धैर्य संभव है? अहिंसा शक्ति है या कमज़ोरी? क्या हिंसक वातावरण में संयम टिक सकता है? क्या निहत्था मनुष्य भयावह रूप से शक्तिशाली भी हो सकता है? और कोई जब कहता है, मैं गांधी नहीं हूँ तो वह अनजाने में स्वीकार करता है कि अपने नैतिक स्थान को नापने के लिए उसे गांधी की आवश्यकता पड़ी.

मनुष्य मर चुका है, उसका नाम दूसरे मनुष्यों की जीभ पर ताप की तरह बचा हुआ है. कोई उससे प्रेम करता है, कोई उसे अपने क्रोध का प्रतिलोम बनाता है.

 

 

42.

पश्चिमी संगीत में गांधी इस कालखंड के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण धुन हैं. पश्चिमी लोकप्रिय संस्कृति में उनका नाम इसलिए बार-बार लौटता है कि आधुनिकता ने शक्ति तो बहुत पैदा की, पर शक्ति को नैतिक बनाने की तकनीक कम विकसित की. गांधी उसी रिक्ति में प्रवेश करते हैं. उनकी प्रासंगिकता किसी पवित्र निष्क्रियता में नहीं, इस कठिन विचार में है कि दुनिया को मानवीय बनाने के लिए करुणा को संगठित होना होगा, अहिंसा को साहसी और नैतिकता को सार्वजनिक कार्रवाई बनना होगा. पश्चिमी संगीत का गांधी अंततः यही कहता सुनाई देता है: मनुष्य बच सकता है, यदि उसकी शक्ति से पहले उसका विवेक जागे.

पश्चिमी संगीत में गांधी की जो छवि उभरती है, वह एक काउंटर-मेलोडी है. आधुनिक सभ्यता के हिंसक ऑर्केस्ट्रा के भीतर बजती हुई ऐसी प्रतिलय, जो मुख्य धुन को रोकती नहीं. इस संगीत को पूरा सुनने के लिए उसके डिसोनेंस भी सुनने होंगे. गांधी केवल शुद्ध षड्ज नहीं, उनके भीतर कोमल और तीव्र स्वरों का तनाव भी है. यहीं मार्क्स को साथ सुनना उपयोगी है. मार्क्स आधुनिक पूँजीवाद के भीतर शोषण की बेस-लाइन को जितना बेहतर पहचानते हैं, उतना कोई नहीं, वर्ग, उत्पादन, श्रम और पूँजी के संबंधों में छिपी हिंसा को.

गांधी की नैतिक आभा के बीच मार्क्स हमें वह अँधेरा कमरा दिखाते हैं, जहाँ आधुनिक शोषण अपना असली चेहरा छिपाकर बैठता है. आज का रक्तपायी वर्ग हमेशा नाखून गड़ाकर, मशीनों के शोर में मनुष्य का रक्त नहीं पीता. वह अधिक सभ्य, अधिक सौम्य और इसलिए अधिक ख़तरनाक हो चुका है. वह कभी ईएमआई बनकर आपकी महीने की पहली तारीख़ पर होंठ रखता है, कभी लोन और ब्याज की महीन उँगलियों से आपकी कमाई की नसें टटोलता है, कभी हेल्थ इंश्योरेंस के काग़ज़ों में बीमारी तक को बाज़ार की वस्तु बना देता है. वह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने की राहें इतनी महँगी कर देता है कि न्याय का दरवाज़ा दिखाई तो देता है, पर उसकी चौखट छूने की कल्पना से ही आम आदमी की देह में भय उतरने लगता है.

वह बेरोज़गारी को कोड़े की तरह हवा में लटकाए रखता है, डेटा को जीवन की अनिवार्य साँस बना देता है, शहरों को कारों के लिए मल्टी लेन और पैदल मनुष्य के लिए इतना सँकरा कर देता है कि नागरिक अपनी ही सड़क पर अनधिकृत प्राणी हो जाता है. कानून, नियम और इंसाफ़ को ऐसी अभेद्य भाषा पहनाई जाती है, जिसे वही समझ सके जिसके पास वकील, समय और पैसा हो. विस्थापन, कर्ज़, नौकरी खोने का डर, बीमारी, मुक़दमे और असुरक्षा, ये सब मिलकर शोषण की वे महीन नसें बन जाते हैं, जिनसे व्यवस्था मनुष्य का रक्त चूसती रहती है. इस पूरी प्रक्रिया पर धार्मिक डीजे का राक्षसी शोर इतना तेज़ बजता है कि आदमी अपने ही भीतर टूटती हुई हड्डियों की आवाज़ तक सुनता है तो उसे लगता है कि किसी दूसरे की हड्‌डियाें के टूटने की आवाज़ आ रही है.

 

43.

विश्व संगीत में गांधी के भीतर आधुनिक सभ्यता का एक गहरा काउंटर-पॉइंट भी है. इच्छा, उपभोग, मशीन, केंद्रीकरण और मनुष्य की अतृप्त लालसा के ख़िलाफ़. “हिंद स्वराज” में यह स्वर एक कठोर असंगति की तरह उभरता है, बाद के गांधी कुछ लचीले हुए, पर औद्योगिक आधुनिकता की चकाचौंध पर उनका संशय बना रहा.

मार्क्स पूछते हैं, उत्पादन के साधनों पर किसका अधिकार है? गांधी उसी धुन में एक दूसरा स्वर जोड़ते हैं : मनुष्य को वास्तव में कितना चाहिए? मार्क्स का स्वर आर्थिक संरचना का मंद्र है, गांधी का नैतिक संयम का मध्यम. दोनों को एक ही ऑर्केस्ट्रा में सुनें तो आज के पर्यावरणीय संकट का कॉर्ड अचानक पूरा खुलता है: पृथ्वी अब केवल चिमनियों के धुएँ से नहीं तपती, वह डेटा-सेंटरों की गर्मी, सर्वर-फार्मों की भूख, एसी की ठंडी लत, कारों की निरंतर दौड़, हवाई यात्राओं की चमक, उपभोग के अंतहीन क्लिक और हमारी इच्छाओं के कभी न थमने वाली बीट से भी गर्म हो रही है.

 

 

४४.

जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता के क्षरण और उपभोग की उन्मत्त संस्कृति के इस समय में गांधी की आवाज़ विश्व-संगीत के भीतर एक और अर्थ ग्रहण करती है. गांधी आधुनिक वैज्ञानिक अर्थों में पर्यावरण-दार्शनिक नहीं थे, पर वे इतना पहचान चुके थे कि मशीन-सभ्यता, केंद्रीकृत उत्पादन, अतृप्त उपभोग और प्रकृति के दोहन के बीच कोई गहरा, लगभग नाभिनाल-बद्ध संबंध है. इसी कारण उनकी तान यहाँ मंद्र सप्तक में उतरती है. धीमी, संयत, पर पृथ्वी की त्वचा के नीचे बहते ताप को छूती हुई.

पश्चिमी संगीत गांधी को बार-बार किसी संपूर्ण राजनीतिक कार्यक्रम की तरह नहीं, एक नैतिक श्रुति की तरह बुलाता है. मार्क्स हमें संरचना में छिपे अन्याय का बेस-नोट सुनाते हैं, गांधी मनुष्य के भीतर उस क्षण का सूक्ष्म कंपन पकड़ते हैं जब वह प्रतिशोध कर सकता है, फिर भी हाथ रोक लेता है, अधिक पा सकता है, फिर भी कम चुनता है, शत्रु बना सकता है, फिर भी संवाद की ओर झुकता है. हिंसा, उपभोग और प्रतिशोध के बढ़ते डेसिबल के बीच गांधी का यही धीमा स्वर आज भी सबसे दूर तक जाता है.

 

 

45.

यही गांधी का सबसे दीर्घजीवी संगीत है. वे कोई निष्कलंक, पूर्ण राग नहीं हैं, उनके स्वरों में इतिहास की कुछ खराशें हैं, कुछ बेसुरे स्पर्श भी. दुनिया के इस हिंसक, कार्बन से भारी और इच्छाओं से तपते ऑर्केस्ट्रा में वे अब भी उस टॉनिक की तरह उपस्थित हैं, जिसे हटा दें तो पूरी रचना अपना हार्मोनिक घर खो बैठती है. कभी वे ब्लूज़ के उदास ग्राउंड-बेस में उतरते हैं, कभी गॉस्पेल कोयर की सामूहिक उठान में देह भर फैल जाते हैं, कभी फ़ोक की अकूस्टिक गिटार पर नंगी उँगलियों के कोमल स्पर्श-से सुनाई देते हैं और कभी पंक-रॉक के विद्रोही डिस्टॉर्शन के भीतर एक बेचैन काउंटर-मेलडी की तरह धड़कते हैं. वे स्मृति का धीमा लेइटमोटिफ़ हैं, सोल में करुणा की वह गर्म वोकल लाइन, जो कान से प्रवेश करके जैसे सीधे रूह में उतर जाती है.

गांधी लज़्ज़त से लबरेज़ उस लम्हे का नाम है जब रक्त और प्रतिशोध से उत्तेजित सभ्यता अचानक अपने भीतर तानपूरे की एक निर्मल झंकार सुनती है और अपने ही उन्माद से सिहर उठती है. इलेक्ट्रिक गिटार चीख सकता है, बेस-ड्रम युद्ध की धड़कन को मदहोश कर सकता है, ब्रास विजय की फैनफ़ेयर बजा सकता है और सिंथेसाइज़र आधुनिकता के चमकीले शरीर पर नियॉन रोशनी फेर सकता है, गांधी फिर भी उस संगीत के भीतर एक असुविधाजनक हार्मोनिक प्रश्न की तरह लौटते हैं. यदि शक्ति का टेम्पो बढ़ता जाए और उसकी कॉर्ड-प्रोग्रेशन से करुणा का स्वर निकाल दिया जाए तो अंततः बचता क्या है? संगीत या केवल शोर? अहिंसा या केवल हिंसा?

इसीलिए गांधी विजय का फोर्टिस्सिमो नहीं, विवेक का पियानिस्सिमो हैं, इतिहास का उत्तेजित क्रेशेन्डो नहीं, उसके नीचे देर तक काँपता पेडल-पॉइंट. सभ्यता अपनी अंतिम कैडेंस की ओर बढ़ती है, वही महीन स्वर उसकी देह के बिल्कुल पास आकर पूछता है,़ तुमने कितना जीता, यह बाद में बताना, पहले यह बताओ कि तुम्हारे भीतर मनुष्य कितना बचा रहा. दुनिया जब हिंसा का टेम्पो बढ़ाती है, गांधी उसका मेट्रोनोम धीमा कर देते हैं. मानो कान के बहुत पास फुसफुसा रहे हों: सभ्यता गति नहीं है, दूसरे की धड़कन सुन पाने की कामना है और मनुष्य ने अब तक इससे अधिक हृदयस्पर्शी कोई संगीत रचा ही नहीं.

 

 

४६.

और यहीं आकर विश्व-संगीत में गांधी की लंबी यात्रा सबसे गहरी कैडेंस पाती है. गांधी को विश्व राजनीति का ‘रॉकस्टार फ़क़ीर’ कहना एक रूपक भर है. उनके पास चमकता मंच नहीं, पैरों के नीचे मिट्टी थी, विद्युत्-गिटार नहीं, चरखा था, पीछे कोई ब्रास-बैंड नहीं, मनुष्यों की साँसें थीं. अहिंसक असहयोग और सत्याग्रह की उनकी राजनीति ने विशाल जनसमूहों को एक साझा नैतिक अनुशासन में खड़ा करने की कोशिश की. और जब असंख्य अकेले मनुष्य एक ही नैतिक ताल में साँस लेने लगते हैं, तब जनशक्ति संख्या नहीं रहती, सामूहिक लोक-हृदय की धड़कन बन जाती है. उस धड़कन के सामने साम्राज्य की तोपें तनी रह सकती हैं, मगर उनके भीतर के गोलों का संगीत बेसुरा हो जाता है.

गांधी को देवता की तरह नहीं, मनुष्य की देह के बहुत पास बजती हुई एक बेचैन श्रुति की तरह सुनना. सभ्यता का संकट उस दिन शुरू नहीं होता जब कोई मनुष्य दूसरे मनुष्य को मारता है, उसकी पहली दरार उस क्षण पड़ती है जब किसी की हत्या, भूख, अपमान या निर्वासन देखकर हमारे भीतर का कोई तार काँपना बंद कर देता है. हिंसा बंदूक की नली में बहुत बाद में आती है, पहले वह भाषा के होंठों पर जन्म लेती है. किसी मनुष्य को एक नाम दिया जाता है, फिर उस नाम पर घृणा की धुन चढ़ाई जाती है, फिर उसे शत्रु बनाया जाता है और अंत में उसकी पीड़ा को न्याय का संगीत बताकर बजाया जाने लगता है.

तानाशाही की सबसे बड़ी विजय भी जेलों की संख्या नहीं होती, वह मनुष्य की आत्मा में उस छोटी-सी कोमल जगह को सुखा देना होता है, जहाँ कभी नैतिक असहमति स्पर्श किए जाने पर काँपती थी. जिस समाज में करुणा कमज़ोरी और क्रूरता नेतृत्व का पर्याय हो जाए, उसकी राजनीति केवल संविधान नहीं बदलती, वह धीरे-धीरे मनुष्य की जैविक लय तक बिगाड़ देती है.

दुनिया को गांधी की मूर्तियों से अधिक गांधी की असुविधा चाहिए. प्रतिमा चुप रहती है, नैतिक प्रश्न माँसपेशियों के भीतर उतरता है. वह हमें चैन से सोने नहीं देता. पूछता है, तुम्हारी विजय के लिए किसी दूसरे मनुष्य का अपमान आवश्यक था तो तुम वास्तव में जीते हो या केवल उससे अधिक शक्तिशाली हुए हो? धर्म से करुणा, पूँजी से मर्यादा और राजनीति से विवेक निकल जाए तो फिर बचता क्या है? एक ऐसा युद्धगीत, जिसकी हर बीट पर धीरे-धीरे पूरा समाज अपनी ही मनुष्यता से दूर नाचने लगता है.

हर युग अपनी हिंसा के लिए कोई न कोई नैरेटिव रचता है. अहिंसा उस नैरेटिव के बीच रखा गया प्रश्नचिह्न है. और प्रश्नचिह्न की यही समस्या है. वह विजय-घोष को पूरा विराम नहीं बनने देता.

गांधी का अंतिम अर्थ यह नहीं कि हमने उन्हें कितना याद रखा, कितनी सड़कों, विश्वविद्यालयों और मुद्राओं पर उनका नाम लिखा. अधिक बेचैन करने वाला प्रश्न यह है कि इतनी स्मृति के बावजूद दुनिया इतनी निर्दय कैसे हो गई?

और यहीं विश्व-संगीत में गांधी का स्वर अंततः सबसे हिस्सियाती और सबसे लम्स-आमेज़ हो उठता है. बाहर ऑर्केस्ट्रा थक चुका है. ड्रम धीरे-धीरे शांत हैं. इलेक्ट्रिक गिटार का डिस्टॉर्शन हवा में विलीन हो रहा है. ब्रास की विजय-ध्वनि बहुत दूर चली गई है. मंच की रोशनियाँ एक-एक कर बुझ रही हैं. अब केवल गिटार की एक मूल झंकार बची है. लंबी, गर्म, साँस जैसी.

वह मनुष्य की देह के बहुत पास आती है. जैसे कोई प्रिय चेहरा लंबी यात्रा के बाद आपके कंधे पर सिर रख दे. जैसे दो धड़कनें कुछ देर के लिए अहं भूलकर एक ही विलंबित ताल में उतर जाएँ. जैसे स्पर्श के बाद बची हुई वह गहरी निस्तब्धता, जिसमें कुछ माँगना शेष नहीं रहता. केवल उपस्थित होना. और गांधी इसी निस्तब्धता का नाम है.

 

 

47.

दुनिया हिंसा का टेम्पो चाहे जितना बढ़ाए, गांधी इतिहास के भीतर से उसका मेट्रोनोम थोड़ा धीमा करते रहेंगे और बहुत पास, फुसफुसाकर पूछते रहेंगे : तुमने कितनी दुनिया जीत ली, यह बाद में बताना, पहले यह बताओ कि उस जीत के बाद तुम्हारे भीतर मनुष्य कितना बचा. और मनुष्यता का सबसे सुंदर संगीत यही है कि दूसरे की धड़कन को इतना पास से सुन पाना कि कुछ क्षण के लिए वह अपनी ही धड़कन मालूम होने लगे.

 

 


भारत–पाक सीमा के एक गाँव में जन्मे त्रिभुवन जयपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वे हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुके हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, कुछ इस तरह आना,’ शूद्र: एक लंबी कविता,’ और राष्ट्रवाद के नवपरिप्रेक्ष्य .’ त्रिभुवन अपने सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषण, संयमित भाषा और गहन पठनशीलता के लिए जाने जाते हैं. जयपुर में रहते हैं.

thetribhuvan@gmail.com

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Comments 10

  1. Pramod Dwivedi says:
    6 days ago

    जो गांधी का मुरीद भले ना हो, यह पढ़कर त्रिभुवनजी का मुरीद जरूर बन जाएगा। इतने गहरे पैठ कर कौन लिखता है! हमें तो वे लेखकों के लेखक लगते हैं। यह लेख नहीं एक धरोहर है, इसे संभाल कर रखा जाएगा। फैशनिया गांधीवादियों को तो यह संगीत पक्ष पता भी नहीं होगा। यह ज़रूर मालूम होगा कि खादी के स्टाल पर डिस्काउंट आज से शुरू हो गया है।

    Reply
  2. Sheela Rohekar says:
    6 days ago

    त्रिभुवन जी का लेख पारंपरिक `ग्रेट’ से कहीं ऊपर है. उसे पढते हुए लगता है जैसे आपके भीतर किसी और ने जन्म ले लिया है और अब आप वही नूतन बने रहना चाहते हैं!
    त्रिभुवन जी को अनेक शुभकामनाएं.
    आपको धन्यवाद शेयर करने के लिए.

    Reply
  3. Sudha Ranipandey says:
    6 days ago

    अद्भुत आलेख है यह । गांधी दर्शन का इतना गांभीर्य पूर्ण चिंतन चरखे का संगीत और मानवता का उद्दाम प्रवेग जो पूरे विश्व को ‘ अर्धनग्नवृती साधक ‘ के स्वरूप से परिचित कराता है । समलोचन के ऐसे विशिष्ट अंक प्रकाशित होने चाहिए ।
    ‘ निपट मानव गांधी ‘ की इस पुनर्नवा स्मृति को सश्रृद्ध नमन ।Superb

    Reply
  4. कुमार अम्बुज says:
    6 days ago

    त्रिभुवन के साथ जैसे हम इसी लोक में तीन लोकों की यात्रा कर सकते हैं। इस विषय पर ऐसा उपक्रम और ‘कोई दूसरा नहीं’ जैसा लेख संभव करना अप्रत्‍याशित सुखद घटना है। जो पढ़े जाने पर ही अपने सारे रहस्‍य खोलती हो, ऐसी रचना पर अन्‍य कोई टीप अपर्याप्‍त हो जाती है। त्रिभुवन जी का यह विस्‍तृत निबंध ऐसी कमी को पूरा करता है जिसकी कमी हम महसूस नहीं करते थे क्‍योंकि हमें पता ही नहीं था कि हम इसके न होने से वंचित भी हैं। यह वह रचनाशीलता है जो किसी लंबी साधना के बाद जैसे यकायक प्रकट हो गई है। यह हिन्‍दी में नई समृद्धि है। सिनेमा के संदर्भ में जय प्रकाश चौकसे जी ने ऐसी ही किताब लिखी थी जो संसार भर के सिनेमा में गाँधी जी की उपस्थिति को समक्ष करती थी। लेकिन उस से आगे कहें तो बहुत बारीक़ी और सांद्रता के साथ यह काम त्रिभुवन जी ने संपन्‍न किया है। हम एक नये संगीत से भरे सभागार में हैं।

    अब इसमें से संगीत के नानाप्रकार के प्रसंग खोजो और सुनो- कुछ दिनों के लिए यह टॉस्‍क सामने है।

    Reply
  5. गोविन्द माथुर says:
    6 days ago

    अदभुत आलेख है. गाँधी जी के संगीत पक्ष पर कभी पहले इतना जानकारी पूर्ण आलेख नहीं पढ़ा. त्रिभुवन चाहे किसी भी विषय पर लिखें उसके पीछे उनका गहन अध्ययन एवं गंभीरता होती है. बहुत बधाई.

    Reply
  6. जयश्री पुरवार says:
    5 days ago

    आज FB में दिनभर गांधी जी पर लेख पढ़ती रही । अभी त्रिभुवन जी का लेख “विश्व संगीत में गांधी- एक रॉकस्टार फ़क़ीर “ पढ़कर अभिभूत और आश्चर्यचकित हूँ । यह तो विषय पर एक खुला अभिधान सा है । विश्व संगीत में गांधी तो अनंत रूप में विराजमान हैं और रहेंगे । एक विस्तृत शोध एक सम्यक आधार उन्होंने प्रस्तुत कर दिया है । अब इस पर ग्रंथ रचना का साहसिक क़दम भी उठाया जाए तो कितना अच्छा सृजन होगा वह ।मुझे तो बांग्ला भाषा के गीत भी याद आते गए ।इस प्रस्तुति के लिए त्रिभुवन जी और अरुण देव जी का हृदय से आभार ।
    साभार

    Reply
  7. उमा says:
    5 days ago

    कमाल का लेख, विश्व संगीत में इस तरह गांधीजी की उपस्थिति के बारे में तो सोचा ही नहीं था… बेहद शुक्रिया त्रिभुवन जी सर इस आलेख के लिए….

    Reply
  8. पवन करण says:
    5 days ago

    तीन बार में और बार-बार पीछे जाकर आगे बढ़कर गांधी पर इस ( विश्व संगीत में गांधी की उपस्थिति पर केंद्रित) एनसायक्लोपीडिया लेख को पढ़ सका। त्रिभुवन जी का ये लेख किसी घनघोर पढ़ाकू के हाथ-पैर फुला देने वाला है। पढ़कर खुद से पूछा इस लेख में से अपने भीतर कुछ रख पाये। जबाव मिला। अब कुछ सुस्तालो। फिर खुद को सताना।

    त्रिभुवन जी कितनी परीक्षा लोगे।

    Reply
  9. अशोक कुमार शरण says:
    5 days ago

    अद्भुत. गीत, संगीत और काव्य की विदेशी धारामें गांधी को खोजने का प्रयास प्रशंसनीय है.

    Reply
  10. स्वतंत्र मिश्र says:
    4 days ago

    आप पढ़ते हुए थक जाते हैं? जवाब है नहीं।
    लिखते हुए थकान होती ​हैं? जवाब आता है नहीं।
    त्रिभुवन इन्हीं जवाबों के पर्याय हैं। मैंने ये सवाल उनसे नहीं पूछे हैं। यह उनके लिखे लेखों को पढ़कर महसूस होने लगा। गुलाम अली की गाई गजल के अंदाज में कहूं तो मैं इनकी Tribhuvan लेखनी का मुरीद से मुरीदतम होने की दिशा में बढ़ रहा हूं। उनका लिखा यह लेख पढ़ लें, आपको मेरी कही गई बात अतिशयोक्ति नहीं लगेगी।

    Reply

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