• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » गार्गी मिश्र की कविताएँ

गार्गी मिश्र की कविताएँ

by arun dev
June 30, 2026
in कविता
Reading Time: 2 mins read
A A
गार्गी मिश्र की कविताएँ
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
गार्गी मिश्र की कविताएँ

 

1.
कटी हुई ज़ुबानों का कोरस

इस पूरी दुनिया में सिर्फ ‘तबाही’ ही है
जिसका गणित कभी फ़ेल नहीं होता
इस दुनिया में केवल ‘अव्यवस्था’ ही है
जिसके पास एक बेदाग़ कैलेंडर है

तबाही तुम्हारी लय की जासूसी करती है
तुम्हारी खुशी के ऊँचे पठारों को नापती है
और उस बिंदु का इंतज़ार करती है
जहाँ तुम्हारी सुरक्षा की दीवारें सबसे पतली हों

वह प्रहार तब करती है
जब विरोधाभास सबसे अधिक काव्यमय बन जाए

भोर के सन्नाटे में हुई एक त्रासदी
महज़ एक दुर्घटना है
पर एक भरे-पूरे विवाह-उत्सव के बीचों-बीच
गूँजने वाली चीख
समय की नक्काशी का एक क्रूर और मुकम्मल शाहकार है

वह सलीकेदार हत्यारे की तरह
तुम्हारे जश्न की मेज़ पर बैठती है
और तुम्हारे ही हँसते हुए चेहरे के दर्पण में
अपनी धार तेज़ करती है

क्या तुम उस घड़ी की सुइयों को देख पा रही हो
या तुम खुद उस नाचती हुई सुई का
हिस्सा हो जिसका रुकना तय है?

तुम्हें अपनी आज़ादी का रास्ता
उस आखिरी बूढ़े परिंदे के लहू से भीगे गले की
सबसे ऊँची और आखिरी दर्दभरी तान के टूटने से पहले ढूँढना होगा
वरना वो राग भी दम तोड़ देगा और तुम भी.

 

 

2.
ये बैसाख का आसमान है

ये बैसाख का आसमान है
एक सुलगती हुई राख का शामियाना
जहाँ सूर्य किसी फक्कड़
की तरह अपनी धूनी रमाए बैठा है

उसी धूनी के पास एक दरिया बह रहा है
हम उस दरिया की सूखी और दरकी हुई मिट्टी में
अपने पुराने नाम छोड़ आए हैं
इस इंतिज़ार में कि पानी हमें भुला दे

जली हुई शक्कर और किसी क़दीम याद
की महक लिए अचानक आई हवा
घर की खाली पसलियों से गुज़रती है

मैं चौखट पर बैठी हूँ
और साल के चौथे महीने की
इस अंधी कर देने वाली धूप में
अपने ग़म को भाप बनते देख रही हूँ

यह एक धीमी और बेरहम कीमियागरी है
यहाँ मिट्टी का मटका भरा है
छाँव में पसीना बहा रहा है
लेकिन प्यास है कि
पूरी तरह से बुझी हुई है

ये कौन सी चीज़ है जो मेरे चेहरे पर पसरी हुई है ?
मेरा कान अचानक बोल पड़ता है

“ये एक ख़याली मुँह है
जो तुम्हारे ही सीने के
ख़ालीपन से बेतहाशा पी रहा है”

 

 

3.
फ़िर मुझे दीदा-ए-तर याद आया

दफ़नाने के कई तरीक़े हो सकते हैं
पर जिस्म के गलने का एक ही तरीका है

पहले चमड़ी गलती है
भूलती है कोई छुअन

फिर गलती हैं धमनियाँ
नहीं उठती कोई पुकार

फिर गलती हैं हड्डियाँ
कुछ भी टूटने को नहीं बचता

और सबसे आख़िर में
आँखें गलती हैं
एक टक तकती हैं

जब करना मुझे दफ़्न
मत देखना मेरी ओर

कहाँ रखोगे ये एक जोड़ी आँखें
गल जाना था जिन्हें रौशनी के रहते तुम्हारे शानों पर

 

 

4.
मेरा हृदय खिसकते पत्थरों का एक घाट है

मेरा हृदय खिसकते पत्थरों का एक घाट है
जहाँ आत्मा की धारा लगातार पसलियों से टकराती रहती है

‘याद रखना’ केवल गाद के हटने की प्रतीक्षा करना है
रक्त चतुर है, वह गंगा की उस कला को सीख लेता है
जो एक ही प्रतिबिंब को दोबारा कभी नहीं थामती

यहाँ हर नई धड़कन एक लहर है
जो लयबद्ध विस्मृति के साथ आती है
और अपने से ठीक पहले वाली लहर के शिखर को
मिटाकर समतल कर देती है

इस मिटाने में कोई हिंसा नहीं है
यह एक निरंतर तरल प्रवाह है
एक ऐसी सतह जिसे ‘वर्तमान’
के घर्षण ने एक छली दर्पण की तरह चमका दिया है

वह पहली स्मृति
जिसने आत्मा को उसका भार दिया था
मिटती नहीं है
वह बस डूबना सीख लेती है.

 

 

5.
नदी कुछ नहीं भूलती

यह काशी लाखों बार जलती है
और फिर साँस लेती है
गंगा
साम्राज्यों की राख और
हार मान चुके लोगों की प्रार्थनाओं को पी चुकी है

एक अकेला मल्लाह
जिसकी त्वचा गीली मिट्टी के रंग की है
मणिकर्णिका की छाया में अपना जाल फेंकता है

वह चाँद से भी भारी एक मछली खींचता है
जिसकी खाल मटमैली चांदी जैसी है
और जिसके मुख से प्राचीन चमेली की गंध आती है

वह उसे एक बैंगनी आकाश के नीचे चीरता है
और वहाँ, मछली के पेट के खाली घेरे में
वही आदिम, प्राचीन चिंगारी चमकती है

जैसे ही वह उसे छूता है नदी ठहर जाती है
उसे एक ऐसा चेहरा दिखता है
जिसे उसने कभी नहीं जाना
वह एक ऐसी भाषा में लोरी सुनता है
जो लुप्त हो गई थी
काशी के पहले पत्थर रखे जाने से भी पहले

वह “अनन्त प्रवाह ” अंततः अपना लंगर पा लेता है
और मल्लाह रो पड़ता है
यह महसूस करते हुए कि नदी
वास्तव में कभी कुछ नहीं भूलती

वह बस अपनी साँस रोककर रखती है
जब तक कि हृदय अपने
प्रेतों को मुक्त करने के लिए तैयार न हो जाए.

 

 

 

6.
नील का विलोपन

हवा नीले रंग की एक खास
सर्द रंगत ओढ़े हुए है

और तुम्हारा सबसे प्रिय कोट
जो कभी तुम्हें गर्म रखता था
अचानक किसी अजनबी की
ठंडी खाल जैसा महसूस होता है

तुम एक कमरे के बीचों-बीच खड़ी हो
पर तुम्हें उस अदृश्य निकास का पता
तब तक नहीं चलता
जब तक कि ताला बाहर से
किसी अनजानी चाबी से न घूम जाए

यह अंत कोई शोर मचाता धमाका नहीं है
यह तो बस साँसों का एक स्वप्निल विश्वासघात है
कि जिस जगह तुम खड़ी हो
वहाँ की हवा में
अब तुम्हारी आग को जिलाए रखने के लिए प्राण वायु नहीं बची

क्या तुम जानती हो की
आत्मा का एक मौसम समाप्त हो गया है?

क्या तुम अपनी साँसों के इस धीमे पड़ने को
आज़ादी मानती हो

या एक नए पिंजरे की दस्तक?

तुम्हें अपने होने का फैसला
उस बूढ़े पक्षी के
रक्त-रंजित कंठ से निकलने वाली उस अंतिम
सबसे ऊँची और सबसे सुंदर तान के टूटने से पहले करना होगा

जिसने पिछली बारिशों में
तुम्हारे आँगन में अपना घर ढूँढा था.

 

 

7.
अगर ऐसा होता

क्या पछतावा महज़ एक ऐसी घड़ी है
जो उलटी चलती है?

कानों में एक आवाज़ फुसफुसाती है
“नहीं, यह एक ऐसी घड़ी है जिसमें सुइयाँ ही नहीं हैं
बस एक चुप और भारी घंटा है
जो ‘अगर ऐसा होता’ की चोट पर बार-बार बजता है”

यह उस घर में ताला लगने की आवाज़ है
जिसकी दहलीज़ से तुमने अभी-अभी अपना कदम पीछे खींचा है

पछतावा उस सूरज की परछाईं है
जो तुम्हारे मुरझाए हुए बगीचे को बचाने के लिए बहुत देर से उगा

एक ऐसी शाम जो
तुम्हारी सबसे बड़ी हिचकिचाहट के उस एक पल पर
हमेशा के लिए ठहर गई है

मेरे शायर,
क्या तुम उस घड़ी की टिक-टिक को अपनी धड़कनों में सुन सकते हो
या वह शोर अब तुम्हारी ख़ामोशी
का हिस्सा बन चुका है?

 

 

 

8.
अश्रुत तंतुओं का जाल

वह एक अदृश्य मकड़ी है
जो उस शून्य के आर-पार
पारदर्शी रेशम का जाल बुनती है

वह समय के कंपन को
अपनी अंगुलियों से मापती है
यह देखते हुए कि ख़ामोशी कब इतनी झीनी हो जाए कि एक शब्द से टूट जाए
या कब इतनी घनी
कि एक दीवार बनकर धड़कनों को अलग कर दे

“मुझे तुम प्रिय हो” कहने का समय,
उस जाल की महीन बुनावट का बंधक है
जो किसी अनकही गूँज के आने का इंतज़ार कर रहा है
ताकि सत्य का भारीपन उस रेशम को तोड़ न दे

क्या वह मकड़ी तुम्हारी ही धड़कनों के धागों से
वह दीवार बुन रही है
ताकि तुम कभी पार न जा सको?

 

 

9.
अनुपस्थित स्पंदनों का अर्घ्य

क्यों यह हृदय उस चेहरे के लिए तड़पता है
जिससे वह कभी मिला ही नहीं?

वह मुलाकात तो एक परछाईं है
जो तुम्हारे मिलने से पहले ही
तुम्हारी पसलियों के पिंजरे में अपना बसेरा बना चुकी है

समय एक चतुर बहरूपिया है
वह आने वाली ऋतु का शोक और सुख
पहले ही भेज देता है
एक पुरानी इत्र की शीशी की गंध की तरह
जिसे तुमने अभी तक खोला भी नहीं

तुम उस इतिहास की प्रतिध्वनि हो
जिसका कंठ अभी जन्मा ही नहीं
एक ऐसी भाषा का मौन
जो अपनी ही लिपि के खंडहरों में खुद को ढूँढ रहा है

क्या वह चेहरा भी
तुम्हारी आँखों की दहलीज़ पर खड़ा
अपनी ही अनुपस्थिति का साक्षी बना बैठा है ?

 

 

 

10.
काल-पुरुख की अंतिम पांडुलिपि

कहो, कवि
क्या होगा जब समय का वह अंतिम बुनकर थककर अपनी सुई छोड़ देगा?

जब घड़ियों के भीतर के सारे झरने अचानक सूख जाएँगे
और तुम्हारे भविष्य की राख
तुम्हारे अतीत के गालों पर मल दी जाएगी,

तब क्या तुम उस सन्नाटे को पहचान पाओगी?
वह क्षण, जब ‘अभी’ और ‘कभी नहीं’ के बीच की झिल्ली फट जाएगी

और तुम्हारी सारी अनकही दुआएँ
एक साथ, एक ही धमाके के साथ
आसमान से नीले और काले फूलों की तरह बरसेंगी

क्या तुम उस मलबे में खड़ी होकर मुसकुरा सकोगी
यह जानते हुए कि अंततः
तुम बिल्कुल सही समय पर नष्ट हुई हो?

 

गार्गी मिश्र
बनारस

देश की महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं में कविताओं, लेखों, अनुवाद और फीचर्स का प्रकाशन.
संगीत, चित्रकला, दर्शनशास्त्र, फ़ोटोग्राफ़ी व सिनेमा में गहरी रुचि.

gargigautam07@gmail.com

 

Tags: 20262026 कवितागार्गी मिश्र
ShareTweetSend
Previous Post

सलमान रुश्दी से ग्रांटा के संपादक थॉमस मीनी की बातचीत : अनुवाद : प्रभात रंजन

Next Post

उपनिवेश : सांस्कृतिक अन्याय को कैसे समझें : कुँवर प्रांजल सिंह

Related Posts

लाल्टू की नई कविताएँ
कविता

लाल्टू की नई कविताएँ

गिर्दाब : उज़्मा कलाम
कथा

गिर्दाब : उज़्मा कलाम

उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन : अजय कुमार यादव
शोध

उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन : अजय कुमार यादव

Comments 7

  1. Dipak Vankar says:
    2 weeks ago

    हर तरफ कविता ही कविता हो तो कविता तक पहुचना ही उपलब्धि हैं । अपने आप से कही गई अकथ्य सम्वेदना आपकी काव्य रचना का आधार बन आई है। धन्यवाद आपका ।

    Reply
  2. Pramod Pathak says:
    2 weeks ago

    बहुत सुंदर कविताएँ हैं। कमाल की भाषा है, एकदम साधी और सटीक।

    Reply
  3. Tribhuvan says:
    2 weeks ago

    बड़ी सुंदर, संवेदनशील और मन को उद्वेलित करने वाली कविताएँ हैं। समय की दरारों के बीच से झांकते सच और संवेग को समझने में मदद करने वाली गहन अनुभूति वाली इन कविताओं के लिए गार्गी को शुभकामनाएँ।

    Reply
  4. रोहिणी अग्रवाल says:
    2 weeks ago

    अंतर्लोक की बसावटों में चुप्पियाँ बात करती हैं। सांसें विश्वास के रेशम से सपने बुनती हैं। और घुमावदार गलियों में घूमता ब्रह्मांड कितनी ही किलकारियों से गूंज उठता है। गार्गी मिश्र को पहली बार पढ़ रही हूँ और महसूस रही हूँ कि स्थितप्रज्ञ चेतना की ओर जाने का मार्ग इसी अंतर्लोक से होकर गुजरता है। भाषिक संयम संवेदना के शांत जल का ठहराव है जहां लावण्य कांति बन गया है। बहुत बधाई।

    Reply
  5. रश्मि लहर says:
    2 weeks ago

    हर कविता विशिष्ट! अंतिम कविता पढ़कर चिंतन को नवीन सोचों का विस्तार मिला!

    Reply
  6. सुदीप सोहनी says:
    2 weeks ago

    बहुत ही सुंदर, आत्म के गहरे बोध से उपजी कविताएँ. गार्गी उन कवियों/लेखकों में हैं जो चुपचाप, बगैर शोर के सृजन में विश्वास रखती हैं जहाँ रचने का सुख छपने के सुख से कहीं ज़्यादा है. निस्संदेह, संगीत, चित्रकला, सिनेमा और स्मृति से ये कविताएँ आ रही हैं, जिन्हें पढ़ने का अपना सुख है. यह संधान और सृजन जारी रहे. समालोचन पर इन्हें एक साथ पढ़ने का भी अपना आनंद है.

    Reply
  7. Rahul vikas says:
    2 weeks ago

    कविताओं में प्रयुक्त बिंबों में बला की ताजगी और मारकता है | उपमाओं की विविधता हमारी समकालीनता को उद्देलित करती प्रतीत होती है | बहुत बढ़िया | जिंदाबाद |

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक