गौतम बुद्ध और बुद्धावतार
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आज जब भारतीय ज्ञान परंपराओं के अनुशीलन के द्वारा हमें औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने के लिए आमंत्रित किया जाता है, तब यह प्रश्न उठता है कि उस मानसिकता का कौन-सा प्रतिबिंब अब भी शेष है। औपनिवेशिक प्रभाव को प्रायः वहीं खोजा जाता है जहाँ वह सुगमता से दिखाई देता है, अर्थात् भाषा में, शिक्षा-पद्धति में और विधि-व्यवस्था में। किंतु उसका सूक्ष्मतर रूप वह है जिसमें कोई विदेशी अनुमान कालांतर में परंपरा का ही अंग मान लिया जाता है, और फिर परंपरा की रक्षा के नाम पर उसका पोषण होने लगता है।
प्रस्तुत लेख का विषय ऐसी ही एक धारणा है। आज अनेक हिंदू धर्माचार्य यह मानते हैं कि पुराणों में वर्णित विष्णु के नवमावतार बुद्ध और बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक शुद्धोदन-पुत्र गौतम बुद्ध दो पृथक् व्यक्ति हैं। किंतु मूल-ग्रंथों का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि यह भेद भ्रामक है। १८वीं शताब्दी के पूर्व के परीक्षित हिंदू ग्रंथों में कहीं भी इन दोनों को स्पष्ट रूप से भिन्न नहीं बताया गया है; न मूल पुराणों में, न टीकाओं में, न निबंध-साहित्य में, और न स्तोत्रों में। भारतीय विमर्श में इस भेद का एक आरंभिक स्पष्ट प्रतिपादन १७८८ में सर विलियम जोन्स के उस उद्बोधन में मिलता है जो उन्होंने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के समक्ष दिया था; और उसका मूल भी भारतीय नहीं, अपितु इटली के ऑगस्तीनी पादरी अन्तोनियो अगोस्तीनो जियोर्जी का एक अनुमान है, जिसका श्रेय जोन्स ने स्वयं उन्हीं को दिया है।
जोन्स ने अपना मत किसी शास्त्रीय प्रमाण के बल पर नहीं, अपितु अपने ही एक विरोधाभास के समाधान के लिए कल्पित किया था। उन्हें यह असंगत प्रतीत हुआ कि जो ब्राह्मण बौद्ध-मत का खंडन करते हैं, वे ही बुद्ध को विष्णु का अवतार भी मानें। किंतु यह असंगति भारतीय परंपरा की नहीं थी, अपितु उस दृष्टि की थी जो धार्मिक परंपराओं को परस्पर अपवर्जक कोटियों के रूप में देखती है।
आगे चलकर यही मत भारतीय धर्माचार्यों में प्रविष्ट हुआ। समकालीन उत्तर भारत में इस अवधारणा के प्रचारकों में स्वामी करपात्री का नाम आता है, जिन्होंने भगवान् विष्णु के अवतार बुद्ध को गौतम बुद्ध से भिन्न माना है।[1] कदाचित् इन्हीं के मत से प्रभावित होकर आज के अनेक हिंदू धर्माचार्य— जैसे भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद[2], स्वामी निश्चलानंद सरस्वती[3], स्वामी रामभद्राचार्य[4], स्वामी राघवाचार्य[5], और स्वामी राजेंद्रदास[6] — गौतम बुद्ध के अवतार होने का निषेध करते देखे गए हैं। गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित कल्याण पत्रिका का भी आग्रह है कि बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध पुराणों में वर्णित बुद्धावतार नहीं थे।[7] दूसरी ओर स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जैसे धर्माचार्यों की समन्वयात्मक धारा अब भी गौतम बुद्ध को ही बुद्धावतार स्वीकार करने में संकोच नहीं करती है।[8]
बौद्ध-वाङ्मय में अनेक विगत और अनागत बुद्धों का उल्लेख है, जिनमें से निकटतम अतीत में शुद्धोदन-पुत्र गौतम बुद्ध हुए हैं। जहाँ स्वतंत्र ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से गौतम बुद्ध के अस्तित्व की पुष्टि होती है, वहीं अन्य बुद्धों का प्राकट्य धार्मिक मान्यता का विषय है। दूसरी ओर सनातन धर्म के इतिहास-पुराणों के अनुसार बुद्ध विष्णु के अवतार थे। किंतु चाहे हम एक-बुद्ध-वाद का पक्ष लें अथवा बहु-बुद्ध-वाद का, इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि हिंदू धर्म में शुद्धोदन-पुत्र गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया है। मूल-ग्रंथों, टीकाओं और पूर्वाचार्यों के मतों का अनुशीलन करने से इसमें कोई संशय नहीं रह जाता है।
इस लेख में हम इन्हीं प्रमाणों के आधार पर वर्तमान में चले आ रहे इस प्रवाद का उपशमन करेंगे। यहाँ ध्यातव्य है कि हम किसी को ईश्वर का अवतार सिद्ध अथवा असिद्ध नहीं कर सकते, अपितु केवल धार्मिक मान्यताओं की समीक्षा कर सकते हैं। अतः इस लेख में हमारा ध्येय दो प्रश्नों का विवेचन करना है —
१) क्या हिंदू धर्म में गौतम बुद्ध को विष्णु का बुद्धावतार माना गया है? और
२) क्या बौद्ध-धर्म में भी बुद्ध का विष्णु से कोई संबंध है?
प्रवाद का जन्म
गौतम बुद्ध और बुद्धावतार को भिन्न मानने का प्रचलन अँग्रेज़ी शासनकाल में और विदेशी विद्वानों के प्रभाव में प्रारंभ हुआ था। १८वीं शताब्दी से पूर्व के किसी हिंदू ग्रंथ में दोनों को अलग नहीं बताया गया है। सामान्य जनमानस में दोनों को अभिन्न मानने का इतना प्रचलन था कि १७८८ में सर विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के समक्ष दिए गए अपने उद्बोधन में यह आश्चर्य व्यक्त किया कि तत्कालीन ब्राह्मण बौद्ध-धर्म का विरोध करते हुए भी बुद्ध को विष्णु का अवतार मानते थे। जोन्स ने इस विरोधाभास के समाधान में बुद्धावतार को बौद्धों के बुद्ध से भिन्न मानने का प्रस्ताव किया और इस सुझाव का श्रेय इटली के ऑगस्तीनी पादरी और प्राच्यविद् अन्तोनियो अगोस्तीनो जियोर्जी को दिया।[9] उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि यद्यपि वैष्णव कवि जयदेव शाक्यमुनि को ही नारायण का अवतार स्वीकार करते हैं, तथापि प्रचलित बौद्ध-मतावलंबियों को उत्तरकालीन किसी वेद-विरोधी बुद्ध का ही अनुयायी माना जाना चाहिए।[10]
किंतु तत्कालीन बंगाल के विद्वानों ने जोन्स के मत को नहीं स्वीकारा। शब्दकल्पद्रुम में बुद्धावतार के विवरण से स्पष्ट है कि १८-१९वीं शताब्दी के संस्कृतज्ञ कपिलवस्तु-नरेश शुद्धोदन और मायादेवी के पुत्र गौतम बुद्ध को ही विष्णु का अवतार तथा बौद्ध-धर्म का प्रवर्तक मानते थे।[11] जब जोन्स ने अमरकोश में बुद्ध के नामों[12] के विषय में अपने सहयोगी पंडित राधाकांत (तर्कवागीश) से प्रश्न किया, तो उन्होंने बताया कि ये सभी नाम एक ही व्यक्ति के हैं।[13] तब जोन्स राधाकांत के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने अमरकोश के पूर्ववर्ती १८ नामों को बुद्धावतार और परवर्ती ७ नामों को गौतम बुद्ध का अभिधान मानने का पक्ष लिया।[14] जोन्स के अनुसार बुद्धावतार तथाकथित बौद्धों के बुद्ध से पहले हो चुके थे और दोनों को अभिन्न बताने का भ्रम परवर्ती बौद्धों द्वारा पूर्ववर्ती बुद्धावतार शाक्यमुनि के नाम-रूप को धारण करने के कारण प्रारंभ हुआ था।
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि प्राच्य-चिंतन में बुद्धद्वय-वाद के जनक सर विलियम जोन्स थे, न कि कोई हिंदू धर्माचार्य। यद्यपि अकादमिक जगत् में कुछ ही वर्षों में जोन्स की भूल सुधार दी गई, तथापि कुछ हिंदू धर्माचार्य उनके प्रभाव से कभी बाहर नहीं निकल सके और अपनी ही परंपरा के विरुद्ध गौतम बुद्ध को बुद्धावतार से भिन्न मानने लगे।
अमरकोश से संशय निवारण
सर विलियम जोन्स से लेकर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती बुद्धावतार और गौतम बुद्ध को अभिन्न मानने की तथाकथित भ्रांति का उद्भव अमरकोश से मानते हैं। निश्चलानंद जी के अनुसार अमरकोश के प्रणेता अमरसिंह (जो संभवतः स्वयं बौद्ध थे) ने जानबूझकर विष्णु के अवतार बुद्ध और गौतम बुद्ध के नामों को एक साथ प्रस्तुत कर इस भूल को जन्म दिया है। किंतु क्या यह धारणा सत्य है? क्या संस्कृत भाषा के प्राचीनतम और सर्वमान्य कोश के निर्माता पर लगाया गया ऐसा आरोप सत्यापित हो सकता है? इस विषय में अमरकोश के प्राचीन टीकाकार क्या कहते हैं?
अमरकोश (१.१.१३–१५) का बुद्ध-संबंधी अंश इस प्रकार है –
सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथागतः ।
समन्तभद्रो भगवान्मारजिल्लोकजिज्जिनः ॥
षडभिज्ञो दशबलोऽद्वयवादी विनायकः ।
मुनीन्द्रः श्रीघनः शास्ता मुनिः शाक्यमुनिस्तु यः ॥
स शाक्यसिंहः सर्वार्थसिद्धः शौद्धोदनिश्च सः ।
गौतमश्चार्कबन्धुश्च मायादेवीसुतश्च सः ॥
यहाँ टीकाकारों के अनुसार पूर्ववर्ती १८ नाम (सर्वज्ञ, सुगत, बुद्ध, धर्मराज, तथागत, समंतभद्र, भगवान्, मारजित्, लोकजित्, जिन, षडभिज्ञ, दशबल, अद्वयवादी, विनायक, मुनीन्द्र, श्रीघन, शास्ता, और मुनि) बुद्ध के सामान्य नाम हैं और परवर्ती ७ नाम (शाक्यमुनि, शाक्यसिंह, सर्वार्थसिद्ध, शौद्धोदनि, गौतम, अर्कबन्धु, मायादेवीसुत) शाक्यमुनि नामक बुद्ध-विशेष के नाम हैं। कुछ प्रमुख टीकाकारों की व्याख्याओं का अनुशीलन करते हैं[15]–
- अमरकोशोद्घाटन टीका के रचयिता क्षीरस्वामी परवर्ती ७ नामों को “शाक्यमुनि बुद्धावतार” के नाम मानते हैं।
- अमरकोश-विवृतिकार लिंगयसूरि पूर्ववर्ती १८ नामों को बुद्ध के नाम और परवर्ती ७ नामों को शाक्यमुनि बुद्ध के नाम बताते हैं। यही व्याख्या अमरपदपारिजात के रचयिता मल्लिनाथ को भी मान्य है।
- सुबोधिनी-टीकाकार महेश्वर पूर्ववर्ती १८ नामों को बुद्ध के नाम और परवर्ती ७ नामों को बुद्ध के अवांतर भेद (अर्थात् अनेक बुद्धों में से एक बुद्ध-विशेष) शाक्यमुनि के नाम बतलाते हैं।
- एच. टी. कोलब्रुक द्वारा संपादित अमरकोश के संस्करण के अनुसार पूर्ववर्ती १८ नाम किसी (सामान्य) बुद्ध अथवा जिन के और परवर्ती ७ नाम बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक बुद्ध के नाम हैं।[16]
- शब्दकल्पद्रुम के अनुसार बौद्ध-धर्म के ग्रंथों में विगत और अनागत २५ बुद्धों का वर्णन है, जिनमें से शुद्धोदन और मायादेवी के पुत्र ही “शाक्यसिंह”, “सर्वार्थसिद्ध”, “अर्कबन्धु” और “गौतम” – इन चार नामों से संसार में प्रसिद्ध हुए। कलियुग के २४८६ वर्ष बीतने पर असुरों को विमोहित करने के लिए इन्होंने कपिलवस्तु में शरीर धारण किया।[17]
- समकालीन संस्कृत टीकाकार डॉ. ब्रह्मानंद त्रिपाठी (रत्नप्रभा टीका) भी १८ नामों को बुद्ध के नाम और ७ नामों को शाक्यमुनि (बुद्धविशेष) के नाम मानते हैं। हिंदी टीकाकार हरगोविंद शास्त्री (मणिप्रभा टीका) परवर्ती ७ नामों को “बुद्ध के अवांतरभेद, सप्तम बुद्ध” के नाम मानते हैं।
यहाँ उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त टीकाकारों ने पूर्ववर्ती १८ नामों को विष्णु के बुद्धावतार से नहीं जोड़ा है। प्रत्युत, क्षीरस्वामी परवर्ती ७ नामों को ही “बुद्धावतार” के नाम मानते हैं। इन नामों के क्रम-निश्चय में कोशकार का आशय भी स्पष्ट है कि पहले विगत और अनागत बुद्धों के सामान्य नाम दिए जाएँ; तत्पश्चात् वर्तमान कल्प में हमसे निकटतम शाक्यमुनि गौतम बुद्ध के विशेष नामों का निर्देश हो। पूर्ववर्ती १८ नामों में से कई नाम बौद्ध-धर्म की पारिभाषिक शब्दावली से लिए गए हैं, जैसे –
- “समंतभद्र” अर्थात् सभी ओर से कल्याणमय।[18] यह शब्द महावस्तु (३.२३६.१५), लंकावतार-सूत्र (१०५.९) और गंडव्यूह-सूत्र (अध्याय २) में बुद्ध और बोधिसत्त्वों का अभिधान है।
- “षडभिज्ञ” अर्थात् छह अभिज्ञाओं से संपन्न। ये अभिज्ञाएँ हैं – ऋद्धिविधि (अलौकिक सामर्थ्य), दिव्यश्रोत्र, परचित्तज्ञान, पूर्वनिवासानुस्मृति (पूर्वजन्मों का स्मरण), दिव्यचक्षु और आश्रवक्षय (आश्रवों के क्षय द्वारा विमुक्ति का साक्षात्कार)। यह शब्द त्रिपिटकों में भी बुद्ध का अभिधान है।[19]
- “दशबल” अर्थात् तथागत की दस विशिष्ट ज्ञान-शक्तियों से संपन्न। ये दस “ज्ञान-बल” हैं – स्थानास्थान, कर्मविपाक, नानाधातु, नानाधिमुक्ति, इन्द्रियपरापर, सर्वत्रगामिनीप्रतिपद्, ध्यान-विमोक्ष-समाधि-समापत्ति-संक्लेश-व्यवदान-व्युत्थान, पूर्वनिवासानुस्मृति, च्युतोपपाद तथा आश्रवक्षय। यह शब्द भी त्रिपिटकों में बुद्ध का अभिधान है।[20]
इन सभी पारिभाषिक बौद्ध शब्दों को देखकर कौन कह सकता है कि ये बौद्ध वाङ्मय में गौतम बुद्ध के अभिधान नहीं हैं? यदि ये नाम पौराणिक वाङ्मय अथवा काव्य में प्रयुक्त हों तो भी इनका अर्थबोध बौद्ध परंपरा के अनुशीलन से ही हो सकता है।
अवतारों की सूची
भगवान् विष्णु के दस अवतारों की सूची में कुछ मतभेद है। प्रायः मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम और कल्कि — ये आठ अवतार सभी सूचियों में विद्यमान हैं। किंतु अष्टम और नवम स्थानों पर संप्रदायों की परंपराएँ भिन्न हैं —
१. अधिकांश मतों में अष्टमावतार श्रीकृष्ण और नवमावतार बुद्ध हैं। इस मत के पक्ष में महाभारत (दाक्षिणात्य पाठ), स्कंदपुराण, पद्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुडपुराण, नारदपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिंगपुराण और भविष्यपुराण के अनेक प्रमाण प्राप्त होते हैं।[21]
२. अन्यत्र बलराम को अष्टमावतार और बुद्ध को नवमावतार माना गया है।[22] इस मत के समर्थक श्रीकृष्ण को अवतार नहीं, अपितु परिपूर्णतम परमेश्वर मानते हैं।[23] यह मत कवि जयदेव की परंपरा और गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में मान्य है।
३. एक मत में बलराम को अष्टमावतार और श्रीकृष्ण को नवमावतार माना गया है।[24] प्रायः श्रीवैष्णव-संप्रदाय के अनुयायी इस सूची को स्वीकार करते हैं।
दशावतार की उपर्युक्त तीन सूचियों में से प्रथम और द्वितीय सूचियों में बुद्ध विष्णु के नवमावतार माने गए हैं; केवल तृतीय सूची में उनका स्थान श्रीकृष्ण ने ले लिया है। किंतु जिन संप्रदायों में बुद्ध को नारायण के दशावतारों में परिगणित नहीं किया गया है, उनमें भी बुद्ध के अवतारत्व का निषेध नहीं है। जैसे श्रीवैष्णव संप्रदाय के आळ्वार संतों की परंपरा में प्रचलित दिव्यसूरिचरित में भी भगवान् बुद्ध को हरि का अवतार माना गया है।[25] विष्णुसहस्रनाम के अपने भाष्य में पराशर भट्ट ने भी बुद्ध को विष्णु का अवतार स्वीकार किया है और सहस्रनाम के २२ नामों को बुद्धावतार से संबद्ध माना है।[26]
चाहे शांकर परंपरा की दशावतार-स्तुति हो अथवा जयदेव कवि का दशावतार-स्तोत्र — स्तोत्र-साहित्य में दशावतार के अंतर्गत बुद्ध अनेकत्र प्रतिष्ठित रहे हैं।[27] दशावतार की उपर्युक्त सूची में बुद्ध का स्थान ७वीं शताब्दी की महाभारत की दाक्षिणात्य प्रतिलिपि और महाबलिपुरम् आदिवराह-शिलालेख से भी पुष्ट हो जाता है। आदिवराह-शिलालेख में श्रीकृष्ण के स्थान पर बलराम को अष्टम अवतार माना गया है।[28] आगे चलकर प्रयागराज के समीप गढ़वा दुर्ग में दशावतार के अंतर्गत बुद्ध की प्रतिमा भी प्राप्त हुई है, जो १२वीं शताब्दी की है।
इन उल्लेखों से यह तो स्पष्ट है कि भागवत-धर्म में भगवान् विष्णु का नवम अवतार बुद्धावतार है। किंतु ये बुद्ध कौन हैं? क्या ये बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक शुद्धोदन-पुत्र गौतम बुद्ध हैं अथवा कोई और? यह प्रश्न विचारणीय है। ध्यातव्य है कि बुद्ध को विष्णु से जोड़ने की परंपरा बौद्ध-ग्रंथों से ही प्रारंभ होती है।
बुद्ध और राम
दसरथ-जातक की अट्ठकथा के अनुसार बुद्ध पूर्वजन्म में रामपण्डित थे।[29] अब अनेक विद्वान् मानते हैं कि यह जातक-कथा वाल्मीकीय-रामायण से परवर्ती है तथा उसी से प्रेरित है।[30] फिर भी कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि दसरथ-जातक में वर्णित राम-कथा वाल्मीकीय-रामायण की कथा से अधिक प्राचीन है;[31] और यदि दसरथ-जातक अधिक प्राचीन नहीं तो कम-से-कम वाल्मीकीय-रामायण से भिन्न अवश्य है। तदनुसार ऐसे विद्वान् कहते हैं कि बोधिसत्त्व राम वाल्मीकि के राम नहीं हैं। किंतु क्या यह सत्य है?
यहाँ आवश्यक है कि हम सुत्तपिटक के खुद्दकनिकाय में प्राप्त मूल दसरथ-जातक और उसकी परवर्ती टीका (अट्ठकथा) में अंतर समझें। मूल दसरथ-जातक में केवल १३ गाथाएँ हैं जो राम-कथा के केवल एक ही परिदृश्य से संबद्ध हैं।[32] यह दृश्य वन में भरत और राम के मिलन का है। राजा दशरथ के स्वर्गवास का समाचार लेकर भरत राम के पास जाते हैं। राम भरत को जीवन की नश्वरता तथा कर्तव्य-पालन की महत्ता का उपदेश देते हैं। तत्पश्चात् जातक की अंतिम गाथा में सूचित किया गया है कि राम ने १६,००० वर्षों तक शासन किया था। मूल जातक में इस लघु वृत्तांत की न तो कोई पूर्वपीठिका बताई गई है, न ही राम द्वारा अपने राज्य में पुनः लौटने का उल्लेख किया गया है। यह भी स्पष्टतः नहीं कहा गया है कि राम बोधिसत्त्व थे, किंतु जातक-कथा होने के कारण यह बात अनुक्त होते हुए भी अवगम्य है।
इस विवरण से स्पष्ट है कि दसरथ-जातक वाल्मीकीय-रामायण के अयोध्या-कांड के एक प्रकरण का संक्षिप्त रूप है। आगे चलकर बौद्ध-परंपरा में दसरथ-जातक की कथा का विस्तार श्रीलंका की अट्ठकथाओं में किया गया, जिनके प्रणेता बुद्धघोष (५वीं शताब्दी) माने जाते हैं। इस अट्ठकथा के द्वारा दसरथ-जातक की राम-कथा में अनेक बाह्य तत्त्व और परिवर्तन जोड़े गए, जैसे —
१. इक्ष्वाकु-वंश की राजधानी अयोध्या न होकर वाराणसी होना;
२. दशरथ की तीन रानियों के स्थान पर दो रानियों की परिकल्पना;
३. दशरथ की प्रथम रानी से तीन संतानों (राम, लक्ष्मण और सीता) का तथा द्वितीय रानी से भरत का जन्म;
४. राम का वनवास दंडकारण्य में न होकर हिमालय में होना;
५. वनवास की अवधि १४ वर्ष न होकर १२ वर्ष होना; और
६. सीताहरण और रावण-वध की कथाओं का अभाव तथा उनके स्थान पर राम का वनवास की अवधि पूर्ण कर पुनः अपने राज्य में लौटना।
उपर्युक्त परिवर्तनों के कारण ही हमें राम-कथा के बौद्ध और वाल्मीकीय संस्करणों में भेद दिखलाई देता है। किंतु त्रिपिटक-वाङ्मय पर वाल्मीकीय-रामायण का प्रभाव विद्वानों से छिपा नहीं है। दसरथ-जातक में भरत से राजा दशरथ के स्वर्गवास का समाचार पाकर राम सीता और लक्ष्मण को जल में उतरने का आदेश देते हैं। अट्ठकथा के अनुसार यह “दंड-कम्म” है, अर्थात् राम सीता और लक्ष्मण को विलंब से आने के कारण दंडित कर रहे हैं, किंतु वाल्मीकीय-रामायण के सामान्य अनुशीलन से ही ज्ञात होता है कि यह आदेश दशरथ के जल-तर्पण के लिए दिया गया है। संभवतः श्रीलंका के टीकाकार को इस वैदिक तर्पण-विधि का ज्ञान नहीं था।[33]
दसरथ-जातक और वाल्मीकीय-रामायण में अनेक भाषागत समानताएँ हैं। एक गाथा तो लगभग वाल्मीकीय-रामायण के श्लोक का भाषांतर प्रतीत होती है।[34] अन्यत्र भी दोनों ग्रंथों के कुछ श्लोकांशों में असाधारण समानताएँ हैं।[35] सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण तो यह है कि दसरथ-जातक की अंतिम गाथा में, जिसमें राम का शासन-काल वर्णित है, वाल्मीकीय-रामायण के श्लोकांश की प्रत्यक्ष छाया है। वाल्मीकीय-रामायण के समीक्षित-पाठ में श्रीराम का शासन-काल दस सहस्र वर्ष बताया गया है।[36] महाभारत के समीक्षित-पाठ में भी यह अवधि प्रदत्त है।[37] इसी अवधि का विस्तार वाल्मीकीय-रामायण के पारंपरिक पाठ में ११,००० वर्षों तक किया गया है।[38] वहीं दसरथ-जातक में राम-राज्य की अवधि १६,००० वर्ष वर्णित है, जिससे प्रतीत होता है कि यह मूल राम-कथा की अवधि का ही विस्तार है।[39]
दसरथ-जातक के अतिरिक्त अन्य जातकों में भी वाल्मीकीय-रामायण की कथा का प्रभाव है। वेस्संतर-जातक में पति का अनुगमन करने वाली एक रानी को राम का अनुगमन करने वाली सीता की उपमा दी गई है।[40] इसी प्रकार जयद्दिस-जातक में राक्षसों से आक्रांत वन की ओर प्रस्थान करने वाले एक राजकुमार की माता कहती हैं कि वे अपने पुत्र का स्वस्त्ययन उसी प्रकार करती हैं, जिस प्रकार दंडकारण्य को जाने वाले राम की माता ने उनका स्वस्त्ययन किया था।[41]
दसरथ-जातक की समापन-गाथा राम को “कम्बुग्रीव” (शंख के समान त्रि-रेखा-युक्त ग्रीवा वाले) और “महाबाहु” (लंबी भुजाओं वाले) — इन दोनों वाल्मीकीय अभिधानों से विशेषित करती है।[42] यहाँ तक कि वाल्मीकीय-रामायण में राम के जो प्रमुख सामुद्रिक लक्षण वर्णित हैं, उनमें से अनेक लक्षण दीघनिकाय के अंतर्गत प्राप्त लक्खण-सुत्त में गिनाए गए द्वात्रिंशत् महापुरुष-लक्षणों के समतुल्य हैं।[43]
त्रिपिटकों से इतर भी प्रारंभिक बौद्ध वाङ्मय में वर्णित बुद्ध और राम की समानताएँ उल्लेखनीय हैं। बुद्धचरित के प्रणेता अश्वघोष राम-कथा से भली-भाँति परिचित थे। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि को आदि-कवि माना है, बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण की तुलना श्रीराम के वन-गमन से, और शुद्धोदन के विलाप की तुलना दशरथ के विलाप से की है।[44] इससे स्पष्ट होता है कि अश्वघोष बुद्ध-चरित में राम-कथा की प्रतिमूर्ति देखते थे।

महायान परंपरा से प्रमाण
यद्यपि अवतारों की परिकल्पना प्रधानतया भागवत अथवा वैष्णव धर्म में प्रसिद्ध है, तथापि बुद्ध को देवस्वरूप मानने का बीज प्रथमतः बौद्ध-धर्म की महायान परंपरा में अंकुरित हुआ था। महायान में बुद्ध का लोकोत्तर और अतिमानवीय रूप प्रतिष्ठित और पूज्य है। विशेषतः प्राचीन महायान सूत्र बुद्ध में नारायण का स्वरूप देखते हैं। ५वीं शताब्दी से पूर्व संकलित महायान-सूत्र ललितविस्तर[45] के जन्मपरिवर्त में शाक्य-नरेश शुद्धोदन के पुत्र के जन्म पर महर्षि असित कहते हैं कि यह बालक “नारायण की शक्ति से समन्वित” है और महापुरुष के ३२ लक्षणों से युक्त है।[46] ललितविस्तर में वर्णित बुद्ध के इन ३२ लक्षणों[47] का मूल त्रिपिटकों में है।[48] किंतु त्रिपिटक यह भी बताते हैं कि ये लक्षण ब्राह्मणों की मंत्र-परंपरा में सुविदित थे। सुत्तपिटक के अंतर्गत अम्बट्ठ-सुत्त में इन ३२ लक्षणों को वैदिक मंत्रों में वर्णित माना गया है। सेल-सुत्त में ब्राह्मण सेल कहते हैं कि ये द्वात्रिंशत्-महापुरुष-लक्षण “हमारे [ब्राह्मणों के] मंत्रों में आये हुए हैं”।[49] गरुडपुराण के अनुसार नारायण भी इन्हीं ३२ लक्षणों से समन्वित हैं।[50]
ललितविस्तर में ही कथा है कि राजकुमार सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण के पश्चात् उनके द्वारा त्यागे गए बहुमूल्य आभूषणों को शाक्य कुल के अन्य राजकुमारों (भद्रिक, महानाम और अनिरुद्ध) ने धारण करने का प्रयास किया। किंतु ये आभूषण साधारण मनुष्यों के लिए असह्य थे क्योंकि वे सिद्धार्थ के “नारायण-संहनन” के द्वारा ही धारण किए जाने योग्य थे। अंततः महाप्रजापति गौतमी ने सिद्धार्थ की स्मृति से जुड़े शोक को क्षीण करने के लिए उन आभूषणों को एक पुष्करिणी में प्रवाहित कर दिया, जो “आभरण-पुष्करिणी” के नाम से जानी जाती है।[51] आगे इसी ग्रंथ में बुद्ध की उपमा नारायण से दी गई है[52] और उन्हें स्वयं “नारायण” तथा “महानारायण” कहा गया है।[53]
वाल्मीकीय-रामायण में श्रीराम और ललितविस्तर में गौतम बुद्ध की स्थिति लगभग समान प्रतीत होती है। रामायण में श्रीराम को विष्णु के अर्ध-भाग से उद्भूत बताया गया है[54] और अनेकशः विष्णु से उनके पराक्रम की तुलना भी की गई है।[55] ललितविस्तर में भी बुद्ध और नारायण का अनन्य संबंध द्रष्टव्य है।
आगे चलकर देवातिशय-स्तोत्र में उल्लेख मिलता है कि पुराणों में शाक्यमुनि बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया है —[56]
पौराणी श्रुतिरेष लोकमहितो बुद्धः किलासौ हरिर्
दृष्ट्वा जन्मजराविनाशबलतां लोकं कृपाभ्युद्यतः।
जातः शाक्यकुले वरेऽद्भुतमतिस्त्राता नृणां गौतमः
शास्तारं हितमेव कस्तमबुधो नावैति मूढो जनः॥[57]
इस स्तोत्र के प्रणेता कुषाण अथवा गुप्तकालीन बौद्ध आचार्य शंकरस्वामी (अथवा भट्टवराहस्वामी) माने जाते हैं। देवातिशय-स्तोत्र के अनुसार यद्यपि वैष्णव-धर्मानुयायी बुद्ध को अपने इष्ट का अवतार मानते हैं, तथापि वे बौद्ध-धर्म को स्वीकार नहीं करते। ८-९वीं शताब्दी में प्रज्ञावर्मा ने इस स्तोत्र पर टीका लिखी थी, जिसमें वे तत्कालीन वायुपुराण को बुद्धावतार-कथा का मूल मानते हैं। प्रज्ञावर्मा के अनुसार भगवान् बुद्ध ने पूर्व-जन्म में श्रीराम के स्वरूप में अनेक दुष्टों का संहार किया था, जिसके प्रायश्चित्त-स्वरूप उन्होंने पुनः शाक्यमुनि का रूप ग्रहण किया।[58]
कुषाणकालीन अवदान-शतक में एक कथा आती है जिसमें राजगृह की एक उपासिका अपने पति के पुनरागमन पर नारायण की पूजा हेतु जाती है, किंतु मार्ग में स्थित महापुरुष के ३२ लक्षणों से युक्त और सहस्रों सूर्यों की आभा वाले बुद्ध को देखकर उनकी भक्तिपूर्वक अर्चना करती है।[59]
अनेक महायान बौद्ध-सूत्रों में बोधिसत्त्वों को मूल अधिष्ठान मानकर हिंदू देवताओं को उनका ही निर्माणकाय बताया गया है। उदाहरणार्थ, कारण्डव्यूह-सूत्र में अवलोकितेश्वर को विश्वव्यापी महाबोधिसत्त्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए उनके विभिन्न अंगों से देवताओं की उत्पत्ति वर्णित है, जिनमें बुद्ध का हृदय ही नारायण का स्थान है।[60] इस सूत्र के अनुसार अवलोकितेश्वर ही प्राणियों के कल्याण हेतु उन-उन देवताओं का रूप धारण कर सद्धर्म की शिक्षा प्रदान करते हैं।[61] इसी प्रकार करुणापुंडरीक-सूत्र में भगवान् बुद्ध प्राणियों की आध्यात्मिक योग्यता के अनुरूप उन्हें सद्धर्म का उपदेश देते हैं। उनकी धर्मसभा की विशेषता यह है कि ब्रह्मा, महेश्वर, सूर्य अथवा अन्य देवताओं के उपासक अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार तथागत का साक्षात् अपने ही इष्ट देव के रूप में दर्शन करते हैं।[62] लंकावतार-सूत्र में बुद्ध स्वयं कहते हैं कि कुछ लोग उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, ईश्वर, सूर्य, सोम, विनायक और राम आदि रूपों में जानते हैं।[63] कुषाणकालीन बौद्धाचार्य मातृचेट ने अपने वर्णार्हवर्णस्तोत्र में तथागत को ब्रह्मा के रूप में भी प्रतिष्ठित किया है।[64]
छठी शताब्दी के स्वातंत्रिक-माध्यमिक आचार्य भावविवेक द्वारा प्रणीत तर्कज्वाला में दशावतार की स्पष्ट सूची प्राप्त होती है, जिसमें बुद्ध को विष्णु का नवम अवतार कहा गया है।[65] यद्यपि भावविवेक स्वयं विष्णु को सृष्टिकर्ता ईश्वर स्वीकार नहीं करते थे, तथापि उन्होंने इस सूची को तत्कालीन वैष्णवों के पूर्वपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया है।[66] इससे स्पष्ट होता है कि छठी शताब्दी तक वैष्णव-परंपरा में बुद्ध को विष्णु के नवम अवतार के रूप में व्यापक मान्यता प्राप्त थी।[67]
आज एक मान्यता चल निकली है कि भागवत-धर्म ने अनधिकार बुद्ध को अवतार मानकर पचा लिया है। किंतु हम पाते हैं कि प्राचीन बौद्धाचार्य बुद्ध और विष्णु की समानता अथवा एकरूपता को वैष्णवों को बौद्ध-धर्म की ओर आकृष्ट करने का एक माध्यम मानते थे।
पौराणिक-परंपरा से प्रमुख प्रमाण
अग्निपुराण में बुद्धावतार का वर्णन मिलता है, जिसके अनुसार विष्णु शुद्धोदन के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए थे।[68] इस पुराण में विष्णु के दशावतार की प्रतिमाओं के लक्षणों का वर्णन है। अग्निपुराण के अतिरिक्त बृहत्संहिता, अपराजित-पृच्छा, रूपमंडन और काश्मीर शैवागमों में प्रतिष्ठित नेत्रतंत्र में भी बुद्धावतार की प्रतिमा के लक्षण प्राप्त होते हैं। इनमें बुद्ध को शांत, प्रसन्न-मूर्ति, अभयप्रद, दीर्घकर्ण, सुंदर नेत्रों वाले, गौरवर्ण, हाथों और चरणों में पद्म-चिह्न से युक्त, काषाय-वस्त्रधारी, पद्मासनस्थ, द्विभुज, और समाधि-मग्न बताया गया है।[69] ये लक्षण गौतम बुद्ध की प्रतिमाओं के लक्षणों से मेल खाते हैं।
पद्मपुराण के विष्णुसहस्रनाम-स्तोत्र में बुद्धावतार के नाम संगृहीत हैं। इस स्तोत्र में ८७०वाँ नाम “शौद्धोदनि” अर्थात् शुद्धोदन का पुत्र है।[70] साथ ही अन्य नाम भी हैं जिनसे गौतम बुद्ध का बोध होता है —
(१) “सर्वशून्य” अर्थात् शून्यतावादी;
(२) “चतुष्कोटिपृथक्-तत्त्व-प्रज्ञापारमितेश्वर” अर्थात् चार कोटियों (अस्ति — है, नास्ति — नहीं है, उभय — है भी और नहीं भी है, नोभय — न तो है और न ही नहीं है) से पृथक् प्रज्ञापारमिता[71] अर्थात् परम प्रज्ञा के स्वामी; और
(३) “पाखण्डवेदमार्गेश” अर्थात् वेद-विरुद्ध (पाखंड) मार्ग के उपदेष्टा। पद्मपुराण का यह विष्णुसहस्रनाम-स्तोत्र आगम-परंपरा में सम्मानित रहा है और इसका संपूर्ण उद्धरण नारद-पांचरात्र (४.३) में दिया गया है।
यहाँ “चतुष्कोटिपृथक्तत्त्वप्रज्ञापारमितेश्वर” विशेषतः ध्यातव्य है। पूर्वोक्त भावविवेक-कृत मध्यमकहृदय और उसके भाष्य तर्कज्वाला में वैष्णवों के पूर्वपक्ष का निरूपण करते हुए विष्णु के परम स्वरूप को भी अस्ति, नास्ति, उभय तथा नोभय— इन चारों कोटियों से परे निरूपित किया गया है।[72] क्या यह केवल एक संयोग है कि पद्मपुराण में विष्णु को इन्हीं चार कोटियों से पृथक् तत्त्व का स्वामी बताया गया है? पद्मपुराण में “चतुष्कोटि” और “प्रज्ञापारमिता” जैसी महायान की विशिष्ट पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग यह संकेत करता है कि बुद्धावतार की वैष्णव धारणा उस बौद्ध दार्शनिक परिवेश से परिचित थी जिसमें ये सिद्धांत सुप्रतिष्ठित थे।
यहाँ एक तर्क यह दिया जाता है कि बुद्धावतार शुद्धोदन-पुत्र थे, किंतु वे बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध नहीं थे।[73] इस तर्क में यह विचार निहित है कि पौराणिक शुद्धोदन शाक्य-नरेश शुद्धोदन से भिन्न थे।[74] किंतु मत्स्य-पुराण और विष्णु-पुराण के अनुसार पौराणिक शुद्धोदन इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुए थे और उनके पिता का नाम “शाक्य” था। मत्स्य-पुराण के अनुसार उनके पुत्र का नाम “सिद्धार्थ” था।[75] नृसिंह-पुराण में शुद्धोदन के पुत्र का नाम “बुध” उल्लिखित है[76] — ये भी सूर्यवंशी कहे गए हैं।[77] विष्णुपुराण में शुद्धोदन को शाक्य का पुत्र अथवा उत्तराधिकारी बताया गया है, किंतु यहाँ शुद्धोदन के पश्चात् सिद्धार्थ अथवा बुद्ध का नहीं, अपितु राहुल का उल्लेख है। यह बुद्ध द्वारा राज्य के परित्याग के पश्चात् राहुल के उत्तराधिकारी होने का संकेत करता है।[78] ये सभी अभिधान बौद्ध त्रिपिटकों से मेल खाते हैं, जहाँ बुद्ध ने स्वयं को क्षत्रिय, आदित्य (इक्ष्वाकु) गोत्रीय और शाक्य-जातीय बताया है।[79] यहाँ आख्यायिका है कि बुद्ध के इक्ष्वाकु-वंशी पूर्वजों ने पिता द्वारा अभिशप्त होकर गोतम-वंशी कपिल मुनि के आश्रम में शरण ली और शाक-वृक्षों से ढके स्थान पर निवास करने के कारण “शाक्य” कहलाए।[80] अतः इनका गोत्र गौतम हुआ। पौराणिक परिप्रेक्ष्य में शाक्य नामक नरेश के वंशज होने के कारण भी बुद्ध के वंश को शाक्य-वंश कहा जा सकता है।
महाभारत (विस्तृत पाठ) में भगवान् विष्णु कहते हैं कि वे कलियुग के प्रारंभ में शुद्धोदन-पुत्र बुद्ध के रूप में अवतीर्ण होंगे। इस अवतार में वे काषाय-वस्त्र-धारी, मुंडित सिर वाले और उज्ज्वल दाँत वाले होंगे।[81] विष्णुधर्म-पुराण में भी इसी वृत्तांत की पुनरावृत्ति की गई है[82] और साथ ही जोड़ा गया है कि बुद्धावतार के अनुयायी शूद्र वर्ण के होंगे तथा रक्तांबर धारण करेंगे; इस अवतार के समय पृथ्वी देवालयों से नहीं, अपितु एडूकों अर्थात् स्तूपों से भर जाएगी।[83]
हरिवंश-पुराण में “शाक्य बुद्ध” के अनुयायियों को शूद्र, मुंडित-शिर और काषाय-वस्त्र-धारी कहा गया है।[84] कुमारिल भट्ट ने भी पुराणों में वर्णित इन शाक्यों का उल्लेख किया है, जो कलियुग में धर्म-विप्लव के हेतुभूत थे।[85] ये वर्णन समाज में प्रचलित बौद्ध-धर्मानुयायियों के ही हैं। कुमारिल भट्ट के उल्लेख से यह भी सिद्ध होता है कि पुराणों के ये बौद्ध-संबंधी वचन ७वीं शताब्दी में सुविदित थे। कश्मीर के प्रसिद्ध स्थल-पुराण नीलमत-पुराण में बुद्ध को विष्णु का अवतार, उनके अनुयायियों को “शाक्य”, पूजा-स्थान को “चैत्य” और पूजन-तिथि को वैशाख पूर्णिमा बताया गया है।[86] यह प्रचलित बौद्ध-मत का ही विवरण है।
भागवत-पुराण में बुद्धावतार
भागवत-पुराण में बुद्धावतार के वर्णन के विषय में संशय बना रहता है। वहाँ यह श्लोक आया है —
ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।
बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥[87]
इस श्लोक के तृतीय चरण में चार पाठभेद हैं —
१. बुद्धो नाम्ना जिनसुतः
२. बुद्धो नाम्नाऽजिनसुतः
३. बुद्धो नाम्नाऽजनसुतः
४. बुद्धो नाम्नाऽञ्जनसुतः
कुछ लोग द्वितीय और तृतीय पाठभेदों के आधार पर बुद्धावतार को शुद्धोदन-पुत्र बुद्ध से भिन्न बताते हैं। किंतु यह उचित नहीं है। चारों पाठभेदों में प्रथम पाठ ही अधिक समीचीन है, क्योंकि इस प्रकरण के अतिरिक्त “अजिन” अथवा “अजन” नाम इतिहास-पुराणों में अप्रसिद्ध है। जहाँ “अजिन” का सामान्य अर्थ “मृगचर्म” है, वहीं “अजन” का अर्थ जनशून्य स्थान अथवा कुत्सित पुरुष है।
आधुनिक व्याख्याकार और अनुवादक तो इस श्लोक की असंभव-सी लगने वाली व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं। अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद ने अपने भागवत-अनुवाद में तृतीय चरण का चतुर्थ पाठ स्वीकार किया है, किंतु उसका अनुवाद “अंजना का पुत्र” किया है।[88] यहाँ ध्यातव्य है कि “अंजन” को “अंजना” नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि “अंजना” स्त्रीलिंग शब्द है, जबकि “अञ्जनसुतः” में आया “अंजन” पुंल्लिंग है। “अञ्जनसुतः” का व्याकरणिक विग्रह “अञ्जनस्य सुतः” ही होगा; यदि “अंजना का पुत्र” अथवा “अंजनी का पुत्र” अभिप्रेत होता, तो क्रमशः “अञ्जनासुतः” अथवा “अञ्जनीसुतः” अपेक्षित था। अतः स्वामी प्रभुपाद का अनुवाद उन्हीं के द्वारा स्वीकृत पाठ के अनुरूप नहीं है।
वहीं प्रथम पाठ में आया “जिनसुत” सार्थक है। यह पाठ गरुडपुराण में बुद्धावतार के प्रसंग में भी आया है —
ततः कलेस्तु सन्ध्यान्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।
बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥[89]
गरुडपुराण के परीक्षित प्रकाशित संस्करणों में “जिनसुतः” पाठ ही है, “अजिनसुतः” अथवा “अजनसुतः” नहीं। इस पाठ को प्रधान अथवा वैकल्पिक पाठ के रूप में श्रीधरस्वामी, वीरराघवाचार्य, विजयध्वजतीर्थ, विश्वनाथ चक्रवर्ती, स्वामी वल्लभाचार्य और गिरिधर जैसे भागवत के टीकाकारों ने स्वीकार किया है।[90] विजयध्वजतीर्थ “जिनसुत” शब्द की व्याख्या में लिखते हैं — “जिनेन सुतत्वेन वृतः” अर्थात् “जिन द्वारा पुत्र के रूप में चुना गया।” यहाँ वे मध्वाचार्य-प्रणीत महाभारत-तात्पर्य-निर्णय (३२.१४६) में प्रदत्त कथा का संकेत कर रहे हैं। मध्वाचार्य के अनुसार शुद्धोदन ही “जिन” हैं, जिनके पुत्र का स्थान लेकर भगवान् विष्णु ने स्वयं को “बुद्ध” घोषित किया था।[91] मध्वाचार्य के कथन पर वादिराज-तीर्थ की टीका भी “जिनसुत” पाठ का अनुमोदन करती है।[92] अतः इसमें संशय नहीं कि मध्व-संप्रदाय में भी शुद्धोदन-पुत्र बुद्ध को ही बुद्धावतार माना जाता है।
भागवत के लगभग सभी टीकाकारों ने “जिनसुत” पाठभेद को स्वीकार किया है, और बौद्ध-वाङ्मय से इसका बोधिसत्त्व-अर्थ स्पष्ट हो जाता है। ऐसा करना मीमांसा-दर्शन के अनुरूप है। महर्षि जैमिनि के पूर्व-मीमांसा-सूत्रों (१.३.१०) पर भाष्य लिखते हुए शबरस्वामी ने “म्लेच्छ” भाषाओं के शब्दों पर विचार किया है। प्रश्न उठता है कि क्या इन शब्दों को वेद, संस्कृत-व्याकरण और निरुक्त के बल पर किसी धातु से व्युत्पन्न माना जाए, अथवा इन्हें वैसा ही समझा जाए जिस अर्थ में ये शब्द संस्कृतेतर भाषाओं में प्रयुक्त होते हैं? शबरस्वामी निष्कर्ष निकालते हैं कि ऐसे अल्प-ज्ञात शब्दों के वही अर्थ मान्य होते हैं जो उनसे संबद्ध परंपराओं में माने जाते हैं।
बौद्ध-वाङ्मय में “जिनसुत” शब्द बोधिसत्त्वों के लिए अनेकत्र प्रयुक्त हुआ है।[93] इन प्रयोगों का विस्तार विनयपिटक और बुद्धवंश से लेकर संस्कृत के महायान-साहित्य तक है। इनमें “जिनपुत्र”, “जिनेंद्रपुत्र” और “जिनात्मज” बोधिसत्त्वों की प्रसिद्ध उपाधियाँ हैं। त्रिपिटकों पर लिखी गई अट्ठकथाओं (टीकाओं) में बौद्ध-श्रावकों को “जिनपुत्त” कहकर संबोधित किया गया है।[94]
[95] कोश-ग्रंथों में “बुद्ध” के नामों में “जिन” शब्द भी समाविष्ट है।[96] प्राचीन जिनों का उत्तराधिकारी होने के कारण वर्तमान बुद्ध को “जिनसुत” कहना उपयुक्त है। जिस प्रकार किसी सम्मानित पुरुष को “आर्य” और “आर्यपुत्र” दोनों कहा जा सकता है, उसी प्रकार बुद्ध को भी “जिन” और “जिनपुत्र” कहना उचित है। बौद्ध-वाङ्मय के अतिरिक्त आयुर्वेद के महनीय ग्रंथ अष्टांग-संग्रह में भी “जिन” और “जिनसुत” की आराधना से कुष्ठ-रोग का उन्मूलन विहित है।[97] टीकाकारों ने यहाँ “जिन” का अर्थ “बुद्ध” और “जिनसुत” का अर्थ “अवलोकितेश्वर आदि” किया है।[98]
“जिनसुत” की उपर्युक्त व्याख्या के अतिरिक्त एक अन्य व्याख्या भी सुगम्य है। महाभारत के अनुसार सभी पर विजय प्राप्त करने के कारण भगवान् विष्णु का एक नाम “जिष्णु” भी है।[99] यह नाम कोश-ग्रंथों में भी द्रष्टव्य है।[100] “जिष्णु” की व्युत्पत्ति संस्कृत के “जि” (अर्थात् “जीतना”) धातु से हुई है[101] और इसका अर्थ “जीतने वाला” अथवा “विजयशील” होता है। इसी धातु से “जिन” शब्द भी व्युत्पन्न होता है।[102] “जिन” का वही अर्थ है जो “जिष्णु” का है। हेमचंद्र और हलायुध के कोशों में भी “जिन” को विष्णु का नाम बताया गया है।[103] माघ-प्रणीत शिशुपालवध महाकाव्य में शत्रुओं की सेना को पराभूत करने के कारण श्रीकृष्ण को “जिन” कहा गया है।[104] अवतारांतर का संकेत करने वाला महाकवि का यह प्रयोग साभिप्राय ही है। इस प्रकार यदि “जिन” विष्णु का अभिधान है तो उनके अंशावतार होने के कारण, और “आत्मा वै जायते पुत्रः” इस न्याय से, बुद्ध को “जिनसुत” कहना उपयुक्त ही है।
भागवत के श्लोक में प्रयुक्त “कीकट” शब्द भी संदेह का कारण रहा है। प्रायः भागवत के टीकाकारों ने इसका अर्थ मगध देश अथवा गया-प्रदेश किया है। यह सर्वविदित है कि गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य जनपदांतर्गत लुंबिनी में हुआ था। यह स्थान वर्तमान नेपाल में है। फिर भागवत में उनका आविर्भाव मगध में क्यों बताया गया है? इस प्रश्न के दो समाधान हैं। एक तो यह कि शाक्य राजकुमार सिद्धार्थ गौतम की जन्मभूमि चाहे लुंबिनी रही हो, “बुद्ध” का प्रादुर्भाव मगध में ही हुआ था, क्योंकि बोधगया पहुँच कर ही सिद्धार्थ को बुद्धत्व प्राप्त हुआ था। तदनंतर वे, जो पहले “जिनसुत” अर्थात् (पूर्व-जन्मों के जिनों के) बोधिसत्त्व कहलाते थे, अब “बुद्ध” नाम से जाने गए। श्लोक में यही वृत्तांत वर्णित है। तदनुरूप भागवत और गरुडपुराण के श्लोक में बुद्धत्व-प्राप्ति की भूमि का ही उल्लेख समझना चाहिए, सिद्धार्थ की जन्मभूमि का नहीं।
दूसरा समाधान “कीकट” के प्राचीन अर्थ के आधार पर दिया जा सकता है। ऋग्वेद (३.५३.१४) में “कीकट” शब्द एक बार आया है। सायणाचार्य ने इसका अर्थ किया है — “वह जनपद जहाँ अनार्य लोग रहते हैं”।[105] यही अर्थ यास्काचार्य ने भी माना है।[106] कुमारिल भट्ट के अनुसार भी यद्यपि “कीकट” जनपद को कहते हैं, तथापि वे नित्य हैं, नाम-विशेष नहीं; अथवा सभी लोकों में स्थित कृपण ही कीकट हैं।[107] ऐसा अनिवार्य नहीं कि यह स्थान मगध ही हो। सुभाषितकार कहते हैं कि लोभी और अधार्मिक पुरुष के लिए काशी भी “कीकट” है।[108] भागवत-पुराण में भी अन्यत्र अशुद्ध-देश के अर्थ में “कीकट” शब्द प्रयुक्त हुआ है।[109] वहाँ कहा गया है कि जहाँ-जहाँ सदाचारी भगवद्भक्त निवास करते हैं, वे “कीकट” देश भी पवित्र हो जाते हैं। टीकाकारों ने यहाँ “कीकट” शब्द से अंग, वंग, कलिंग, सौराष्ट्र और मगध आदि अनेक जनपदों को अभिप्रेत माना है।[110] सायण “कीकट” का एक और अर्थ देते हैं — “‘यज्ञ, दान, होम आदि क्रियाओं से क्या फलीभूत होगा?’ — ऐसी अश्रद्धा रखने वाले और ‘पियो, खाओ, (क्योंकि) यही एक लोक है, दूसरा नहीं’ — ऐसा कहने वाले नास्तिक लोग कीकट हैं।”[111] अतः वैदिक धर्म के प्रति अश्रद्धा रखने वाले समाज को “कीकट” कहा जा सकता है। वैदिक धर्म के सीमित प्रभाव के कारण शाक्य जनपद को भी “कीकट” मानने में हानि नहीं; अथवा श्रमण-मतावलंबियों के मध्य प्रतिष्ठित होने के कारण भी बुद्ध को “कीकटों में प्रादुर्भूत” मानने में कठिनाई नहीं है। इस प्रकार भागवत में वर्णित बुद्धावतार भी गौतम बुद्ध से अभिन्न ही हैं।
ब्राह्मण-कुलीन बुद्ध?
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती का मत है कि बुद्धावतार ब्राह्मण-कुलीन थे, जबकि गौतम बुद्ध क्षत्रिय-वंशी थे। इसके समर्थन में वे भविष्यपुराण के प्रतिसर्ग-पर्व का एक श्लोक उद्धृत करते हैं, जहाँ बुद्ध के पिता को “द्विज” कहा गया है और उनका नाम “अजिन” बताया गया है।[112] किंतु किसी अन्य पुराण में “अजिन” नाम के किसी ब्राह्मण-पात्र की ख्याति नहीं है। विष्णुपुराण के अनुसार पृथु के एक वंशज का नाम “अजिन” था, किंतु वे क्षत्रिय थे, ब्राह्मण नहीं।[113] अतः केवल एक “द्विज” शब्द से अजिन को ब्राह्मण मान लेना उचित नहीं है, क्योंकि इस शब्द की परिभाषा ही उपनीत त्रैवर्णिक है।[114]
वहीं दूसरी ओर इसी भविष्यपुराण के प्रतिसर्ग-पर्व में अन्यत्र शाक्यमुनि गौतम बुद्ध को ही बुद्धावतार माना गया है।[115] किंतु वहाँ शाक्यमुनि के पश्चात् शुद्धोदन और तदनंतर शाक्यसिंह का उल्लेख है। पुनः इसी पर्व में बुद्ध के लिए “शाक्यसिंह” और “गौतमाचार्य” जैसी उपाधियों का प्रयोग हुआ है।[116] अतः प्रतिसर्ग-पर्व में प्रदत्त बुद्धावतार के वर्णनों में विरोधाभास प्रतीत होता है। ध्यातव्य है कि प्रतिसर्ग-पर्व की पाठ-परंपरा अत्यंत अस्थिर और अर्वाचीन है। मुद्रित संस्करणों का आधार बनी प्रति अमृतसर के एक निजी संकलन से प्राप्त हुई थी। यह पर्व वाराणसी तथा लंदन की भविष्यपुराण-हस्तलिपियों में अप्राप्य है। भविष्यपुराण के समीक्षक और अनुवादक भी प्रतिसर्ग-पर्व को अर्वाचीन और अप्रामाणिक मानते हैं।[117]
स्वामी करपात्री और निश्चलानंद सरस्वती दशावतारों की सूची में “चार विप्र” का उल्लेख करने वाले गोस्वामी तुलसीदास के एक तथाकथित दोहे का साक्ष्य देते हैं। वे “चार विप्र” से वामन, परशुराम, बुद्ध और कल्कि को ग्रहण करते हैं। किंतु यह दोहा तुलसीदास की किसी भी प्रामाणिक रचना में प्राप्त नहीं होता और कई समीक्षक इसे संदिग्ध मानते हैं। इसका मूल भक्तमाल को बताया जाता है, किंतु अनुशीलन करने पर यह मूल पाठ में नहीं मिलता। प्रियादास-कृत टीका सहित प्रकाशित भक्तमाल के गीता प्रेस संस्करण की पाद-टिप्पणी में इस दोहे को उद्धृत किया गया है। किंतु उन्होंने बुद्धावतार को द्वापर-युगीन माना है, जो भागवतपुराण और गरुडपुराण के विवरणों से भिन्न है।[118] अतः, ऐसे संशयास्पद दोहे के आधार पर धार्मिक मान्यताओं का निर्धारण उचित नहीं है। यदि इस दोहे को प्रामाणिक मान भी लिया जाए तो भी यह अनिवार्य नहीं है कि “चार विप्र” के अंतर्गत गौतम बुद्ध ही परिगणित हों; वे श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद, सनत्कुमार आदि ब्राह्मण-कुलीन अवतार भी हो सकते हैं।

मायामोह की कथा और बुद्धावतार का प्रयोजन
विष्णुपुराण में भगवान् विष्णु के “मायामोह” अंशावतार की कथा निबद्ध है। देवताओं के निवेदन पर असुरों को मोहित कर वैदिक धर्म से विमुख करने के लिए विष्णु ने यह अवतार लिया था। विष्णुपुराण, हरिवंश-पुराण, गरुडपुराण, नारदीयपुराण और लिंगपुराण में “बुद्ध”, “अर्हन्”, “जिन”, “मायामोह” इत्यादि नामों से विष्णु के अवतारों का वर्णन मिलता है।[119] बौद्ध और जैन कोशकारों ने भी “अर्हन्” और “जिन” शब्दों को जैन तीर्थंकर और बुद्ध — दोनों का पर्याय स्वीकार किया है।[120]
विष्णुपुराण में मायामोह के वर्णन से सर्वप्रथम जैन तीर्थंकर का और तदनंतर बुद्ध का संकेत है। सर्वप्रथम मायामोह को दिगंबर, मुंडित सिर और मोरपंख से युक्त बताया गया है।[121] आज भी जैन दिगंबर साधु जीव-रक्षणार्थ मयूरपिच्छ धारण करते हैं। इस दिगंबर स्वरूप में भगवान् ने असुरों के समक्ष अनेकांतवाद का प्रतिपादन कर उन्हें वैदिक धर्म से विमुख कर दिया।[122] इनके अनुयायी “आर्हत” कहलाए।
तदनंतर मायामोह ने अपना रूप परिवर्तित कर लिया और वे रक्तांबर धारण कर अपनी मधुर वाणी से असुरों को विमोहित करने लगे।[123] मायामोह बुद्ध ने विज्ञानवाद और शून्यवाद का सिद्धांत दिया।[124] ये बौद्ध योगाचार-मतावलंबियों का विज्ञानवाद और माध्यमिकों का शून्यवाद ही हैं।[125]
यहाँ अपनी टीका में श्रीधरस्वामी लिखते हैं कि मायामोह का प्रथम (दिगंबर) रूप आर्हत मत के प्रवर्तन के लिए और द्वितीय (रक्तांबर) रूप बौद्ध मत के प्रचार के लिए प्रकट हुआ था।[126] विष्णुचित्त स्वामी की व्याख्या में भी प्रथम स्वरूप का संबंध आर्हतों के स्याद्वाद और द्वितीय का संबंध बौद्धों के विज्ञानवाद और शून्यवाद से दर्शाया गया है।[127] विष्णुसहस्रनाम की टीका में पराशर भट्ट विष्णुपुराण के इस प्रसंग को उद्धृत करते हैं। वे सहस्रनाम के “कृतागम” का अर्थ बौद्ध और जैन आगम-शास्त्रों के प्रणेता, “वाजसनि” का क्षपणकों को लौकिक भोगों में प्रवृत्त करने वाले, “शृंगी” का मयूर-पिच्छ धारण करने वाले और “जयंत” का आस्तिकों को विज्ञानवाद के द्वारा जीतने वाले करते हैं।[128] इन टीकाओं से भी सिद्ध होता है कि मायामोह-रूपी बुद्ध का प्रादुर्भाव समाज में प्रचलित जैन और बौद्ध-धर्म के संस्थापन के लिए ही हुआ था।
पुराणों में वर्णित बुद्धावतार और गौतम बुद्ध के उपदेशों में भी अत्यधिक साम्य है, जैसे —
१. विष्णुपुराण में मायामोह बुद्ध यज्ञों में पशु-हिंसा का विरोध करते हैं। यदि स्वर्ग अथवा निर्वाण लक्ष्य हो तो पशु-घात जैसे दुष्ट धर्म का त्याग कर देना चाहिए। यदि यज्ञ में मारा गया पशु स्वर्ग जाता है तो यजमान अपने पिता को क्यों नहीं मार देता?[129] विष्णुधर्म-पुराण के अनुसार भी बुद्धावतार सभी प्राणियों पर दया करने के लिए हुआ था।[130] दूसरी ओर बौद्ध वाङ्मय के कूटदंतसुत्त (दीघनिकाय ५) में गौतम बुद्ध यज्ञ में विभिन्न प्राणियों की हिंसा का निषेध करते हैं।[131]
२. विष्णुपुराण में मायामोह बुद्ध कहते हैं कि आप्त-जनों के वचन आकाश से नहीं गिरते; अतः सभी के युक्तियुक्त वचन ही ग्रहण करने चाहिए।[132] वहीं चंकीसुत्त (मज्झिमनिकाय ९५) में गौतम बुद्ध कहते हैं कि कोई बात केवल परंपरा से प्राप्त होने के कारण प्रामाणिक नहीं हो सकती।[133] सम्यक् प्रकार से प्राप्त परंपरा भी “रिक्त” और “तुच्छ” हो सकती है और ऐसी परंपरा को मानने वालों की श्रद्धा निर्मूल सिद्ध होती है।[134]
यहाँ पूर्वपक्षी तर्क दे सकते हैं कि जहाँ पौराणिक बुद्धावतार वेदों की रक्षा के लिए हुआ था, वहीं गौतम बुद्ध स्वयं वेद-निंदक थे। किंतु हम देख चुके हैं कि पुराणों के अनुसार बुद्धावतार का प्रयोजन भी असुरों को विमोहित करके उन्हें वैदिक धर्म से विमुख करना था।[135] इसके लिए वेदों की प्रमाणमीमांसा पर प्रश्न उठाना आवश्यक था। बुद्धावतार ने यही किया। बौद्ध त्रिपिटकों में भी गौतम बुद्ध वेदों के प्रामाण्य को अस्वीकार करते हैं। तेविज्जसुत्त में बुद्ध “त्रैविद्य” (तीनों वेदों में निष्णात) ब्राह्मणों से पूछते हैं कि क्या उनमें से किसी ने ब्रह्म का साक्षात्कार किया है। जब उत्तर में “नहीं” मिलता है तो वे उन ब्राह्मणों के पूर्वाचार्यों और मंत्रों के प्रणेताओं के विषय में भी यही प्रश्न करते हैं। संतोषप्रद उत्तर नहीं मिलने पर बुद्ध इस परंपरा की तुलना अंधों की ऐसी पंक्ति से करते हैं, जिसमें न पहला देखता है, न मध्यवर्ती और न अंतिम।[136] दूसरी ओर अन्य प्रकरणों में स्वयं गौतम बुद्ध को “वेदगू” (वेदज्ञ) तथा “वेदन्तगू” (वेदांतज्ञ) कहा गया है।[137]
इसके अतिरिक्त गौतम बुद्ध हिंसक यज्ञों की अपेक्षा अहिंसक नैतिक और आध्यात्मिक यज्ञों को श्रेष्ठ मानते हैं, वेदाध्ययन-मात्र को ब्रह्म-प्राप्ति के लिए पर्याप्त नहीं समझते, तथा जन्म की अपेक्षा आचरण को महत्त्व देते हैं। ये सभी वचन सनातन धर्म के शास्त्रों में भी पाए जा सकते हैं। आगे चलकर गौतम बुद्ध के अनुयायी वेद-प्रामाण्य, ईश्वर-कर्तृत्व, यज्ञ से फल-प्राप्ति और जातिवाद की आलोचना करने लगे।[138] पुराणों के अनुसार भी बुद्धावतार के उपदेशों से प्रभावित होकर उनके अनुयायी वैदिक-धर्म से विमुख हो गए और वेद, देवता, यज्ञानुष्ठान और द्विजों की निंदा करने लगे।[139] वहाँ केवल यही जोड़ा गया है कि जब धर्म-विरुद्ध आचरण करने के कारण बुद्ध के असुर-रूपी अनुयायियों की शक्ति क्षीण हो गई, तब उन्हें देवता पराजित कर सके।[140] इस तुलनात्मक विवेचन से भी कोई संशय नहीं रह जाता कि गौतम बुद्ध ही बुद्धावतार हैं।
बुद्धावतार के द्वारा दिए गए उपदेशों को “उपधर्म” की संज्ञा दी गई है, जो पुराणों के परिप्रेक्ष्य में प्रचलित बौद्ध-धर्म ही है।[141] भागवत-पुराण में “नग्न” (जैन दिगंबर) तथा “रक्तपट” (बौद्ध रक्तांबर) को उपधर्मों में प्रवृत्त बताया गया है।[142]
यहाँ “उपधर्म” का अर्थ विचारणीय है। इसका व्युत्पत्ति-परक अर्थ “धर्म के समीप विद्यमान रहने वाला” है। मनुस्मृति कहती है कि वेदाध्ययन के अतिरिक्त सभी धर्म “उपधर्म” हैं।[143] सामान्यतः वैदिकों का सिद्धांत है कि “धर्म” शब्द का मुख्य अर्थ वेदविहित धर्म ही है। मार्कंडेयस्मृति के अनुसार पुराणों में दान आदि जिन कर्तव्यों का वर्णन है, उन्हें पुण्यदायी कर्म तो कहते हैं, परंतु मुख्य अर्थ में धर्म नहीं मानते। उन कर्मों में “धर्मत्व” का व्यवहार केवल गौण-वृत्ति से होता है, मुख्य-वृत्ति से नहीं।[144] अतः वैदिकों की दृष्टि में पुराणवर्णित धर्म भी “उपधर्म” हो जाते हैं।
मनुस्मृति में ही अन्यत्र कहा गया है कि माता, पिता और आचार्य की सेवा करना ही परम धर्म है, शेष सभी अग्निहोत्र आदि उपधर्म हैं।[145] इन सभी शास्त्र-वाक्यों को समझाने के लिए टीकाकारों ने प्रसंगानुसार “उपधर्म” के कई अर्थ सुझाए हैं — (१) अल्प धर्म, (२) अप्रधान धर्म, (३) अन्य धर्म, (४) अपकृष्ट धर्म, (५) विधर्म, और (६) अधर्म।[146] भागवत-पुराण में “उपधर्म” का एक अर्थ “पाखंड” अथवा “दंभ” भी निर्दिष्ट है।[147]
बौद्ध-धर्म के प्रसंग में उपधर्म का कौन-सा अर्थ उपयुक्त होगा? यदि भागवत-पुराण के टीकाकारों के मत का अनुशीलन करें तो यहाँ उपधर्म के तीन अर्थ स्वीकार्य हैं —
(१) वेद-विरुद्ध अथवा वेदबाह्य आगमों और स्मृतियों में प्रोक्त धर्म;
(२) दंभ अर्थात् प्रदर्शन के लिए धर्म के लक्षणों को धारण करना; और
(३) प्रवंचना के लिए किया जाने वाला धर्म।[148]
अधिकतर टीकाकारों के मत में उपधर्म और अधर्म में अंतर है। यदि वैदिक कर्मों में अनधिकृत लोग इनसे इतर स्तूपों और चैत्यों की पूजा जैसे अनुष्ठान करें तो उनके कर्म को अपकृष्ट धर्म माना जा सकता है, सर्वथा अधर्म नहीं। इसके विपरीत यदि अनधिकृत जन वैदिक कर्मों में ही प्रवृत्त हो जाएँ तो उनके कर्म को अधर्म माना जाएगा।
भगवद्गीता के अनुसार भी भूत, पिशाच, राक्षस आदि की पूजा करने वाले उन्हीं योनियों को प्राप्त होते हैं[149], किंतु उनका सर्वथा अधःपतन नहीं होता है क्योंकि ऐसे उपधर्म में भी धर्म का अंश विद्यमान रहता है। हितोपदेश में बताया गया है कि यज्ञ, अध्ययन, दान और तप का आचरण दंभ के लिए भी हो सकता है।[150] गीता के अनुसार दंभ से प्रेरित होकर किया गया यज्ञ “राजस यज्ञ” और तप “राजस तप” है।[151] इनका फल सात्त्विक यज्ञ अथवा तप के समान तो नहीं होता किंतु ये पूर्णतः निष्फल भी नहीं होते हैं।
हिंदू-धर्म की बौद्ध-धर्म के प्रति भी यही दृष्टि है। सूत-संहिता के अनुसार वेदों से लेकर बौद्ध, आर्हत और लोकायत प्रस्थानों के कर्ता स्वयं भगवान् शिव हैं। शिव के द्वारा प्रोक्त होने के कारण ये सभी प्रमाण हैं। फिर भी सभी मार्गों में वैदिक मार्ग सर्वश्रेष्ठ है।[152] इस प्रसंग की टीका में स्वामी विद्यारण्य स्पष्ट करते हैं कि अधिकारिभेद से बनाए गए ये सभी मार्ग प्रमाण हैं, क्योंकि स्वयं शिव पर मृषावाद का दोष नहीं लग सकता।[153] अद्वैत आचार्य अप्पय्य दीक्षित भी सूत-संहिता के इस प्रकरण का उद्धरण देकर सिद्ध करते हैं कि बौद्ध और चार्वाक जैसे प्रस्थानों की भी वेदांत-शास्त्र के लिए उपयोगिता है।[154] आगे इसी सूत-संहिता में कहा गया है कि निर्मूल देवताराधन रूपी धर्म से समूल धर्म श्रेष्ठ है और समूल धर्मों में बुद्धप्रोक्त आगमों में प्रतिपादित धर्म श्रेष्ठ है।[155] बौद्धागम से वैष्णव और शैव आगम प्रशस्ततर हैं और इन सबसे श्रेष्ठ वैदिक मार्ग है। किंतु जो बुद्धागम में दीक्षित हैं, वे उसी के अनुरूप तिलक-धारण आदि धर्माचरण करें।[156] मुमुक्षु-जनों के लिए बौद्ध और जैन आदि मार्गों में अवस्थित और उनके द्वारा पूज्य मूर्तियों को देवता समझना भी एक यज्ञ है।[157]
अब प्रश्न उठता है — पुराणों में जिन “असुरों” और “दैत्यों” को बुद्धावतार से मोहित माना गया है, वे वस्तुतः कौन हैं? यह प्रश्न आधुनिक विद्वानों में विवाद का विषय रहा है। वेंडी डोनिगर अपनी पुस्तक द ऑरिजिन्स ऑफ़ ईविल इन हिंदू मिथोलॉजी में एच.एच. विल्सन के अनुसरण में तर्क देती हैं कि रूढ़िवादी ब्राह्मणवाद ने बौद्धों को “दैत्य” के रूप में चित्रित कर उन्हें कुख्यात बनाने का प्रयास किया था। इनके अनुसार यह पौराणिक संघर्ष संभवतः धार्मिक मतभेदों से उपजी राजनैतिक अस्थिरता का प्रतिबिंब था, जहाँ ब्राह्मणवाद अपनी सत्ता पुनः स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा था। कई पुराणों में बुद्धावतार के पश्चात् कलियुग के विधर्मियों का विनाश करने वाले कल्कि-अवतार का वर्णन मिलता है और यह गुप्त-काल से पूर्व के उस काल की ओर संकेत करता है जब ब्राह्मणवाद विदेशी आक्रमणों और बौद्ध-धर्म के प्रसार के विरुद्ध रक्षात्मक मुद्रा में था।[158] इसके विपरीत, व्लादिस्लाव सेरीकोव जैसे विद्वान् यह तर्क देते हैं कि ये “दैत्य” पात्र किसी वास्तविक बौद्ध समूह का प्रतिनिधित्व न करके केवल एक धार्मिक रूपक हैं। सेरीकोव बुद्ध और हारीति की कथा का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि पौराणिक ग्रंथों में इन दैत्यों को भ्रमित होने के कारण वेदों से विमुख माना गया है, न कि धर्म के मार्ग से पूर्णतः भ्रष्ट।[159] यह मत भी बौद्ध-धर्म के उपधर्मत्व को पुष्ट करता है।
रोचक बात यह है कि बुद्धावतार द्वारा मोह अथवा भ्रम उत्पन्न करने वाली पौराणिक परंपरा संभवतः स्वयं कतिपय बौद्ध ग्रंथों से साम्य रखती है। ललितविस्तर के मारघर्षण परिवर्त के अनुसार बुद्ध माया के द्वारा मार को ही भ्रम में डाल देते हैं।[160] महावस्तु में बुद्ध द्वारा राहु और वेमचित्रि जैसे असुरों के धर्मांतरण का वर्णन है।[161] जहाँ लंकावतार-सूत्र में वेदों के उत्थान को “धर्म” के रूप में प्रस्तुत किया गया है,[162] वहीं इसके वेई और ताङ् चीनी संस्करणों में रावण को वेदों में प्रतिपादित धर्म को न मानने का निर्देश मिलता है।[163]
टीकाकारों, निबंधकारों और कवियों का मत
इतिहास-पुराण की परंपरा के पश्चात् हम पाते हैं कि प्रायः सभी प्रमुख हिंदू संप्रदायों के प्रवर्तक आचार्यों और महाकवियों ने भी गौतम बुद्ध को बुद्धावतार माना है।
सर्वप्रथम तो आदि शंकराचार्य ने ही जिस बौद्ध-मत का खंडन किया था, वह गौतम बुद्ध द्वारा प्रवर्तित बौद्ध-मत ही था। ब्रह्मसूत्र के शांकर भाष्य में कहा गया है कि बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद और शून्यवाद के उपदेष्टा सुगत असंबद्धप्रलापी और विरुद्ध अर्थ वाले उपदेशों से जनता को विमोहित करने वाले हैं। यह कथन पुराणों में बुद्ध द्वारा लोगों को भ्रमित करने की प्रसिद्ध कथा के अनुरूप ही है।[164] शांकर भाष्य पर आनंदगिरि लिखते हैं कि यद्यपि इतिहास और पुराणों में सर्वज्ञ भगवान् वासुदेव ही बुद्ध रूप में प्रसिद्ध हैं, तथापि उनका मत वैदिक-मतावलंबियों द्वारा आदरणीय नहीं है।[165] भाष्यरत्नप्रभा-व्याख्या का भी यही मत है।[166]
स्वामी विद्यारण्य द्वारा प्रणीत शंकर-दिग्विजय में प्रसंग आता है कि एक बार सभी देव-गणों ने भगवान् शिव से निवेदन किया कि “बुद्धावतार धारण कर भगवान् विष्णु बौद्धों को ठगते हुए हमारा ही कल्याण कर रहे हैं। किंतु बुद्ध के द्वारा प्रणीत आगमों का अवलम्बन लेकर दर्शन-शास्त्र को दूषित करने वाले बौद्धों के द्वारा पृथ्वी संव्याप्त हो चुकी है। ये लोग वर्णाश्रम का विरोध करते हैं और वेदों को जीविका का साधन-मात्र बतलाते हैं।”[167]
शंकर-दिग्विजय के अनुसार इन्हीं बौद्धों के मत का प्रत्याख्यान करने हेतु शंकराचार्य का अवतार हुआ था। इस प्रसंग से संदेह नहीं रह जाता कि बुद्धावतार ही गौतम बुद्ध हैं और उनके अनुयायी ही सुविदित बौद्ध-मतावलंबी हैं। यदि संदेह रहता हो तो शंकर-दिग्विजय के इन श्लोकों की धनपति-सूरि-प्रणीत टीका द्रष्टव्य है — वहाँ उद्धृत है भागवत का वही प्रसिद्ध श्लोक: “बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति।” अतः जिन बुद्ध के दर्शन का शंकराचार्य ने खंडन किया था, वे बुद्धावतार ही थे। आगे चलकर इसी ग्रंथ में बौद्धों को “शाक्य” और बुद्ध को “तथागत” कहा गया है।[168] यदि बुद्धावतार और शाक्यमुनि गौतम बुद्ध पृथक् थे, तो उनके अनुयायियों को “शाक्य” क्यों कहा जाता?
इसी क्रम में योगवासिष्ठ में भुशुंड स्मरण करते हैं कि सौ कलियुगों में “शौक” नामक प्रदेश में भगवान् विष्णु ने सौ बार बुद्धत्व को प्राप्त किया। आनंदबोधेंद्र सरस्वती अपनी तात्पर्यप्रकाश टीका में “शौक” को कीकट-देश-विशेष मानते हुए यहाँ उस प्रदेश के शुद्धोदन नामक राजा के पुत्र का अर्थ ग्रहण करते हैं, जो साक्षात् विष्णु के अवतार थे।[169]
द्वैत-वेदांत संप्रदाय के प्रवर्तक मध्वाचार्य ने भी भागवत के प्रसिद्ध श्लोक (“बुद्धो नाम्ना जिनसुतः”) में “जिन” को शुद्धोदन का पर्याय माना है।[170] इस अवतार का उद्देश्य असुरों को शून्यवाद का उपदेश देकर वेद-विमुख करना और देवों को मुक्ति के लिए प्रशांत-विद्या का ज्ञान देना था।[171] महाभारत-तात्पर्य-निर्णय की टीका के अनुसार मध्वाचार्य ऐतिहासिक शुद्धोदन-पुत्र बुद्ध को ही बुद्धावतार मानते थे।[172] आगे चलकर मध्व-संप्रदाय के वादिराज-तीर्थ दशावतार-स्तुति में शौद्धोदनि बुद्ध की ही स्तुति करते हैं।[173] मध्वाचार्य के अनुव्याख्यान पर जयतीर्थ की न्यायसुधा-टीका में भी बुद्धावतार को प्रचलित बौद्ध-मत (सौगत-मत) का प्रणेता माना गया है और विष्णु-प्रणीत होते हुए भी बौद्ध-मत को अग्राह्य सिद्ध करने के लिए भागवत-पुराण के उपर्युक्त प्रसिद्ध श्लोक का प्रमाण दिया गया है।[174]
क्षेमेंद्र-प्रणीत दशावतार-चरित (९.२) में विष्णु के नवमावतार के रूप में शाक्यकुल में उत्पन्न और शुद्धोदन तथा मायादेवी के पुत्र गौतम बुद्ध के चरित का ही वर्णन किया गया है।[175] नैषधीय-चरित में श्रीहर्ष ने दशावतार-स्तुति के प्रकरण में बुद्धावतार का चार मनोरम पद्यों में स्तवन किया है।[176] इनमें उन्होंने बुद्धावतार के लिए कुछ ऐसे विशेषणों का प्रयोग किया, जो बौद्ध-दर्शन की पारिभाषिक शब्दावली से प्रेरित हैं—
१. “विधुतकोटिचतुष्क” अर्थात् चतुष्कोटि-तत्त्वों का निराकरण करने वाले। यहाँ टीकाकार नारायण ने चतुष्कोटि की व्याख्या के लिए माध्यमिकों की एक प्रसिद्ध कारिका उद्धृत की है।[177]
२. “षडभिज्ञ” अर्थात् छह अभिज्ञाओं से युक्त। यहाँ टीकाकार “षडभिज्ञ” की वही परिभाषा देते हैं जो बौद्ध वाङ्मय में पाई जाती है।[178]
साथ ही टीकाकार ने उस पौराणिक आख्यायिका का भी स्मरण कराया है जिसके अनुसार दैत्यों की बुद्धि को मोहित करने और उन्हें वैदिक मार्ग से विमुख करने के लिए ही नारायण ने बुद्ध रूप में अवतीर्ण होकर बौद्ध-मत का उपदेश किया था।[179] इस उद्धरण से कोई संदेह नहीं रह जाता कि श्रीहर्ष और उनके प्राचीन टीकाकार बुद्धावतार किन्हें मानते थे। यह भी ध्यातव्य है कि श्रीहर्ष महाकवि ही नहीं, खंडनखंडखाद्य जैसे महनीय वेदांत ग्रंथ के प्रणेता भी थे। उनके द्वारा गौतम बुद्ध को बुद्धावतार मानना स्वतः महत्त्वपूर्ण है।
यहाँ तक कि उत्तरवर्ती परंपरा दार्शनिक निबंधकारों और व्याख्याकारों ने बौद्ध-मत का खंडन करने से पूर्व यह प्रश्न उठाया है कि यदि बुद्ध स्वयं विष्णु के अवतार होने के कारण सर्वज्ञ और परम आप्त पुरुष हैं तो उनका मत उपादेय क्यों नहीं हो सकता है? इस प्रश्न के समाधान में बौद्ध-मत के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के अवतारत्व का निषेध किए बिना उनका मूल प्रयोजन ही दैत्य-व्यामोह होने के कारण उनके मत को परिहार्य माना गया है।[180]
यद्यपि किसी पौराणिक ग्रंथ में शुद्धोदन-पुत्र बुद्ध के अतिरिक्त अन्य बुद्ध का स्पष्ट उल्लेख दुर्लभ है, तथापि यदि ऐसा प्राप्त होता है तो उसे बौद्ध परंपरा के सहस्रों विगत और अनागत बुद्धों में से किसी का प्रतिबिंब मान लेना चाहिए।[181] किंतु उपर्युक्त प्रमाणों के आधार पर यह निषेध नहीं किया जा सकता कि शुद्धोदन-पुत्र बुद्ध विष्णु के अवतार माने गए हैं। इस प्रकार बौद्ध और सनातन धर्म — दोनों के वाङ्मय में शुद्धोदन-पुत्र गौतम बुद्ध का विष्णु से संबंध है। बौद्ध-परंपरा में बुद्ध विष्णु की शक्ति से संपन्न और पूर्व-जन्म के राम हैं, जबकि पौराणिक परंपरा में वे स्वयं भगवान् विष्णु के अवतार हैं।
बुद्ध की उपासना
कुछ विद्वान् यद्यपि गौतम बुद्ध को ही विष्णु का अवतार मानते हैं, तथापि उनकी उपासना का निषेध करते हैं। मुद्गल पुराण के अनुसार वेद-विरुद्ध मार्ग का प्रवर्तन करने के कारण बुद्ध-रूप में विष्णु पूजा से विहीन हो गए।[182] किंतु अन्य पुराणों में विष्णु के समस्त अवतारों के समान ही बुद्ध की पूजा का भी विधान है। इसका यही अर्थ लगाया जा सकता है कि बुद्ध की पूजा सामान्यतः अप्रचलित होते हुए भी विशिष्ट देश-काल में विहित है; उदाहरण-स्वरूप कहा गया है कि रूप-सौंदर्य की कामना रखने वाले को बुद्ध का यजन करना चाहिए।[183] अग्निपुराण, वायुपुराण और नारदपुराण के अनुसार धर्मारण्य-क्षेत्र (गया-क्षेत्र) में श्राद्ध-कर्ता को महाबोधि-वृक्ष और “धर्मेश्वर” को नमस्कार करना चाहिए।[184] स्कंदपुराण के अनुसार ये “धर्मेश्वर” भगवान् शिव हैं।[185] किंतु ध्यातव्य है कि बुद्ध को भी “धर्मराज” और “धर्मेश्वर” कहा गया है एवं महाबोधि-वृक्ष से उनका संबंध सिद्ध ही है।[186] यह भी ध्यातव्य है कि शिवपुराण और लिंगपुराण में प्राप्त शिवसहस्रनाम में भगवान् शिव का एक नाम “सुगत” भी है, जिसका अर्थ “बुद्धस्वरूप” किया जाता है।[187] आज भी अनेक हिंदू मतावलंबी महाबोधि-मंदिर-परिसर में पिंडदान करने जाते हैं। विभिन्न पुराणों में बुद्ध के लिए नमस्कारात्मक मंत्र प्राप्त होते हैं, जिनमें “नमो बुद्धाय” प्रसिद्ध है।[188] नारद-पुराण में विष्णु के अवतारों की स्तुति में बुद्ध की भी स्तुति की गई है।[189]
दशावतार-पूजन के अंतर्गत बुद्ध की पूजा तो विहित ही है,[190] किंतु मध्यकालीन निबंध-साहित्य में शाक्यमुनि बुद्ध की विशिष्ट उपासना से संबद्ध कई उल्लेख मिलते हैं। चण्डेश्वर ठाकुर-प्रणीत कृत्यरत्नाकर में वामनपुराण का उद्धरण देकर शुद्धोदन-पुत्र बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया है।[191] साथ ही ब्रह्मपुराण का उद्धरण देते हुए लिखा है कि अट्ठाईसवें कलियुग में भगवान् विष्णु बुद्ध बनकर धर्महीन शाक्यों का प्रवर्तन करेंगे।[192] ग्रंथकार ने वैशाख शुक्ल सप्तमी को इन्हीं बुद्ध की पूजा का विधान किया है। आगे नीलमत-पुराण में प्राप्त श्लोकों का उद्धरण देते हुए वे बुद्ध-सप्तमी के दिन बुद्ध-प्रतिमा के अभिषेक और शाक्यों को दिए जाने वाले दान का वर्णन करते हैं। हेमाद्रि-प्रणीत चतुर्वर्ग-चिंतामणि में बुद्ध-द्वादशी (श्रावण शुक्ल द्वादशी) के व्रत का वर्णन है, जिसमें भी शुद्धोदन-पुत्र बुद्ध की ही पूजा का विधान है।[193]
पुराणों के अतिरिक्त तंत्र-मार्ग में भी अनेकत्र बुद्धावतार की उपासना वर्णित है। मेरुतंत्र में वैदिक संस्कारों से रहित उपासकों के लिए बुद्ध-रूपी विष्णु की आराधना और मंत्र-जप का विधान है।[194]
उपसंहार
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विष्णु के नवम अवतार बुद्ध और बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक शुद्धोदन-पुत्र गौतम बुद्ध को अलग मानने की परंपरा हिंदू-वाङ्मय में १८वीं शताब्दी से पूर्व अप्रचलित थी। यह विभाजन सर विलियम जोन्स द्वारा जियोर्जी की भ्रांति के अनुसरण में प्रस्तावित किया गया था, जिसे तत्कालीन बंगाल के विद्वानों ने अस्वीकार कर दिया था और जिसका परित्याग आगे चलकर प्राच्यविद्या ने भी कर दिया। दूसरी ओर, प्राचीन बौद्ध-वाङ्मय स्वयं शुद्धोदन-पुत्र को नारायण की शक्ति से समन्वित तथा पूर्वजन्म में श्रीराम मानता है, और पौराणिक तथा टीका-निबंध की समस्त प्रधान परंपरा (मीमांसा, अद्वैत, द्वैत और अन्य वैष्णव संप्रदायों सहित) इन्हीं गौतम बुद्ध में बुद्धावतार का दर्शन करती है। अतः बुद्धावतार को गौतम बुद्ध से भिन्न बताने का सिद्धांत न तो शास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है और न ही पूर्वाचार्यों के मत के अनुरूप। जो कुछ भ्रांति है, वह १८वीं शताब्दी की प्राच्यविद्या से जनित है — शास्त्र से नहीं।
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संदर्भ
[1] “…अवतार बुद्ध गौतम बुद्ध से भिन्न ही है। जैसे मुख्यलक्ष्मी गृहलक्ष्मी से भिन्न होती है, वैसे ही बुद्ध भी गौतम बुद्ध से भिन्न हैं।” स्वामी करपात्री, रामायण-मीमांसा (वाराणसी: श्रीधर्मोपदेश निधि / गीता प्रेस), पृ. १०७। एवं देखें: “पुराणों के अवतारभूत बुद्ध गौतम बुद्ध से भिन्न प्रतीत होते हैं।” (रामराज्य और मार्क्सवाद पर राहुलजी की भ्रांति, पृ. ११४)
[2] https://bbtirtha.org/EN/text/1541
[3] “बुद्ध दो हुए हैं। एक भगवान् विष्णु के जो दशावतार हैं, उनमें बुद्ध हुए हैं। जितने भी कर्मकांडी भारत, नेपाल, भूटान में हैं, ‘बौद्धावतारे’ ऐसा पढ़ते हैं, लेकिन बुद्ध कौन हुए, इसका ज्ञान उनको नहीं है। एक बुद्ध हुए हैं नेपाल में। उनका ससुराल भी नेपाल में, उनका जन्म भी नेपाल में। वे क्षत्रिय कुल में हुए हैं। उनको सिद्धि भले ही बोधगया में हुई हो, लेकिन जन्मस्थल की दृष्टि से वे नेपाल में हुए हैं और क्षत्रिय कुल में हुए। लेकिन भविष्यपुराण के अनुसार विचार करें तो ब्राह्मण कुल में बौद्धावतार हुआ है। बौद्धावतार का क्षेत्र भविष्यत्-गति से श्रीमद्भागवत में है—‘कीकटेषु भविष्यति’। कीकट में भगवान् विष्णु बुद्ध का अवतार लेंगे। बौद्धावतार कीकट में होगा। ‘कीकट’ शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में भी किया गया है और सायणाचार्य के भाष्य में कहा गया कि देश या क्षेत्र-विशेष का नाम कीकट है, लेकिन वह क्षेत्र-विशेष कौन है, ऐसा वहाँ नहीं लिखा गया। श्रीधर स्वामी ने, जिन्होंने श्रीमद्भागवत पर भाष्य लिखा, उनकी ‘श्रीधरी टीका’ विश्वभर में चर्चित है। चैतन्य महाप्रभु भी उस टीका पर लट्टू थे। उन श्रीधर स्वामी ने ‘कीकट’ का अर्थ किया है—गया-क्षेत्र।…हमने लगभग दस वर्ष पहले ही यहाँ के कई महानुभावों से कहा कि गया-क्षेत्र में… जैसे पुरुषोत्तम-क्षेत्र है, उसके अंतर्गत पुरी है। पुरी का नाम ही पुरुषोत्तम-क्षेत्र नहीं है; पुरुषोत्तम-क्षेत्र के अंतर्गत पुरी है। इसी प्रकार कीकट-क्षेत्र के अंदर गया भी है। चारों ओर अनुसंधान होना चाहिए कि ब्राह्मण कुल में भगवान् बुद्ध का अवतार कहाँ हुआ? कुछ महानुभावों ने लगभग चार साल पहले बताया—एक टीले पर ब्राह्मणों का गाँव है और वहाँ बुद्ध की प्राचीन मूर्ति है। मैं एक संकेत कर दूँ—अग्निपुराण में भगवान् बुद्ध का ध्यान बताया गया। इन बौद्धों ने क्या किया? उस श्लोक के आधार पर भगवान् बुद्ध का जो चित्र बन सकता है, बना के रख दिया। अग्निपुराण में जो भगवान् बुद्ध का ध्यान लिखा गया है; उसके आधार पर भगवान् बुद्ध की जो आकृति बनती है, चित्र बनता है, गौतम बुद्ध के अनुयायियों ने उसी को बुद्ध के रूप में ख्यापित कर दिया। दूसरी बात क्या है? अमरसिंह हुए हैं, जिन्होंने अमरकोश की रचना की; वे बौद्ध थे। उन्होंने बहुत चतुराई से भगवान् बुद्ध और गौतम बुद्ध के नाम एक साथ लिख दिए। बीच में विभाजक के रूप में एक शब्द का प्रयोग कर दिया, जिसका अर्थ लोग नहीं समझ नहीं पाते कि विभाजक है; ताकि भविष्य में लोग ब्राह्मण कुल में अवतीर्ण बुद्ध को भूल जाएँ, गौतम बुद्ध ही बुद्ध के रूप में चर्चित हो जाएँ। एक और कारण है—गौतम गोत्र दोनों बुद्ध का था। क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए बुद्ध का गोत्र भी गौतम और ब्राह्मण कुल में गया-क्षेत्र में उत्पन्न बुद्ध का गोत्र भी…क्षत्रिय-वैश्य के गोत्र तो ब्राह्मणों के आधार पर, ऋषियों के आधार पर चलते हैं। इस भ्रम के कारण, दोनों का गोत्र मिलने के कारण भी, ब्राह्मण कुल में उत्पन्न जो हमारे विष्णु के अवतार बुद्ध [हैं], उनको हम लोग भूल गए। हमको जिस कुल में जो उत्पन्न हुए, उनके प्रति आदर है। आदर्श कोई भी हो सकते हैं; इसको लेकर कोई परहेज नहीं। क्या हम भगवान् राम को ब्राह्मण कुल में उत्पन्न सिद्ध करेंगे? नहीं। हमारे आराध्य हैं, मगर क्षत्रिय वंश में हुए। भगवान् श्रीकृष्ण को क्या हम ब्राह्मण बनाना चाहेंगे? क्षत्रिय कुल में होते हुए हमारे आराध्य हुए। लेकिन सत्य का गला न घोंटा जाए।” स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती, “बुद्ध का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था—शंकराचार्य”, गोवर्धन मठ, यूट्यूब वीडियो, 4:35, ११ सितंबर २०१७, https://youtu.be/unHZeSQ0Lqg ।
[4] “काश्यप बौद्धावतार—ये गौतम बुद्ध भगवान् नहीं हैं। वे तो नेपाल में जन्मे; वे संत हैं। बौद्ध लोग भी कहते हैं कि तुम उनको क्यों घसीट रहे हो? वे वास्तव में भगवान् नहीं। हमारे बुद्ध—काश्यप बौद्धावतार—कश्यप-गोत्रीय ब्राह्मण हैं। वे सिद्धार्थ के जन्म से २,७०० वर्ष पहले जन्म लिये थे। ये बुद्ध पूर्णिमा को जन्मे, सिद्धार्थ गौतम; और हमारे काश्यप बुद्ध जो हैं, [वे] कार्तिक…शुक्ल एकादशी को [जन्मे]। इनके पिता का नाम था ‘जिन’; माता का नाम था ‘जैनी’ (अस्पष्ट)। ये बारह भाई थे। एतावता।” जगद्गुरु रामभद्राचार्य, “क्या गौतम बुद्ध भगवान के अवतार हैं?”, यूट्यूब वीडियो, २५ जून २०२३, 1:00, https://youtube.com/shorts/HMG322ZT9ak।
[5] “यहाँ पर जो बुद्धावतार है, बुद्धावतार की भविष्यवाणी करते हैं वेदव्यास जी। क्योंकि वेदव्यास जी महाराज जब भागवत की रचना करते हैं — आज से लगभग ५,१०० कुछ वर्ष पूर्व — उस समय बुद्धावतार नहीं हुआ था। इसलिए भविष्यवाणी की — ‘बुद्धो नाम्नाऽजनसुतः कीकटेषु भविष्यति।’ कीकट देश में बुद्ध भगवान् का अवतार होगा, जो भगवान् के चौबीस अवतारों में से इक्कीसवें अवतार होंगे। लेकिन वे बुद्ध कौन? जिनको आज सारी दुनिया गौतम बुद्ध कहती है, वे गौतम बुद्ध नहीं। ये गौतम बुद्ध भगवान् के अवतार नहीं हैं। भगवान् के जो अवतार हैं, जिनको हम बुद्धावतार कहते हैं, वे भगवान् बुद्ध एक जिन के घर में उत्पन्न हुए। ‘बुद्धो नाम्ना जिनसुतः’, ‘बुद्धो नाम्नाऽजनसुतः’ ऐसा भी पाठ है। तो बुद्ध भगवान् जो प्रकट हुए, उन बुद्ध का अवतार कीकट देश में हुआ।…अब कीकट देश कौन-सा है? भारत में पाँच देशों को कीकट देश कहा जाता है — अंग, बंग, कलिंग, सौराष्ट्र और मगध। ये पाँच कीकट देश माने गए। इन कीकट देशों के विषय में स्मृतियों में कहा गया है कि अन्य देश के रहने वाले लोग इन कीकट देशों की अगर यात्रा करें, तो तीर्थयात्रा के निमित्त अगर जाते हैं तब तो कोई बात नहीं, लेकिन तीर्थयात्रा के अतिरिक्त किसी अन्य स्वार्थ से अगर इन देशों की कोई यात्रा करे अन्य देश का व्यक्ति, तो आने के बाद उसे पुनः यज्ञोपवीत-संस्कार प्रायश्चित्त-रूप में करना पड़ता था — ‘अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु सौराष्ट्रे मगधेषु च । तीर्थयात्रां विना गत्वा पुनः संस्कारमर्हति ॥’ तीर्थयात्रा के अतिरिक्त अगर किसी उद्देश्य से जाए तो पुनः आकर के उसको यज्ञोपवीत-संस्कार कराना पड़ता था, क्योंकि ये कीकट देश अन्य देश के रहने वाले लोगों के लिए निषिद्ध माने जाते थे। उन पाँच कीकट देशों में एक मगध है, और मगध का ही संकेत करते हुए वेदव्यास जी कहते हैं — ‘बुद्धो नाम्नाऽजनसुतः कीकटेषु भविष्यति।’ कीकट देश में बुद्ध भगवान् का अवतार हुआ। लेकिन आज जिनको सारी दुनिया बुद्ध मानती है, वे गौतम बुद्ध तो नेपाल में लुंबिनी में प्रकट हुए। वह कीकट देश नहीं है। अगर इनको बुद्ध मानें, तो वेदव्यास जी की भविष्यवाणी झूठी साबित हो जाएगी, क्योंकि गौतम बुद्ध का जन्म तो लुंबिनी में हुआ, वह कीकट देश नहीं है। तो किस कीकट में भगवान् बुद्ध का अवतार हुआ? तो आचार्य लोग, महापुरुष लोग कहते हैं कि वेदव्यास जी की वाणी ‘कीकटेषु भविष्यति’ के अनुसार मगध में भगवान् बुद्ध का अवतार हुआ। और मगध में कहाँ? बोधगया में। बोधगया ही भगवान् बुद्ध की जन्मस्थली है। जिसको आज हम बोधगया कहते हैं, उस बोधगया में भगवान् बुद्ध का अवतार हुआ, जो हमारे बुद्ध, भगवान् विष्णु के अवतार हैं। उन्हीं भगवान् बुद्ध की जन्मस्थली पर जाकर, वहीं पर भगवान् बुद्ध का चिन्तन करते हुए, गौतम बुद्ध को भी बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। उन भगवान् बुद्ध की कृपा से ही गौतम बुद्ध को भी बोधगया में जाकर बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। और वे भगवान् बुद्ध, जो चौबीस अवतारों में हैं — ‘बुद्धो नाम्नाऽजनसुतः’— वे भगवान् बुद्ध वेद-निन्दक नहीं थे। यह भी जान लेना चाहिए। जिन भगवान् बुद्ध को हम अवतार के रूप में स्वीकार करते हैं, वे भगवान् बुद्ध वेद के निन्दक नहीं थे। लेकिन गौतम बुद्ध वेद-निंदक थे। गौतम बुद्ध ने और उनके अनुयायियों ने वेदों की निंदा की, इसलिए बौद्ध-दर्शन को नास्तिक-दर्शन कहा गया। नास्तिक कौन होता है? श्री मनु जी महाराज मनुस्मृति में कहते हैं — ‘नास्तिको वेदनिन्दकः।’ जो वेद की निन्दा करे, उसको नास्तिक कहते हैं। नास्तिक का मतलब ‘ईश्वर को जो न माने वह नास्तिक, और ईश्वर को जो माने वह आस्तिक’ — यह नास्तिक-आस्तिक की परिभाषा हमारे यहाँ नहीं है। हमारे यहाँ बहुत-से ऐसे दर्शन हैं जो ईश्वर को नहीं मानते, किन्तु आस्तिक हैं, जैसे सांख्य-दर्शन। साङ्ख्य अनीश्वरवादी है, लेकिन साङ्ख्य को आस्तिक-दर्शन माना जाता है, क्योंकि वह वेदों में उसे विश्वास है, वेद को प्रमाण मानता है। मीमांसा-दर्शन भी अनीश्वरवादी है, किन्तु मीमांसा को परम वैदिक-दर्शन कहा गया, क्योंकि वह वेद को परम प्रमाण मानता है; उसे नास्तिक नहीं कहा। तो नास्तिक-आस्तिक की यही परिभाषा है — जो वेद को प्रमाण माने वह आस्तिक, और जो वेद की निंदा करे वह नास्तिक। ‘नास्तिको वेदनिन्दकः।’ गौतम बुद्ध ने वेद की निंदा की, इसलिए बुद्ध का दर्शन नास्तिक-दर्शन हुआ। और यही जैन ने भी किया; महावीर के अनुयायियों ने भी आगे चलकर वेदों की निन्दा की, इसलिए जैन-दर्शन को भी नास्तिक-दर्शन कहा गया — ‘नास्तिको वेदनिन्दकः।’ तो भगवान् बुद्ध जो चौबीस अवतारों में हैं, वे नास्तिक नहीं हैं। वे तो वेद को परम प्रमाण मानते हैं। भगवान् बुद्ध ने केवल हिंसा का विरोध किया — ‘सदयहृदयदर्शितपशुघातं…केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे’ श्री जयदेव कवि कहते हैं कि भगवान् हिंसा को देखकर दुःखी हुए, और वेदों में ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का जो उपदेश है, इसी उपदेश का विस्तार करने के लिए भगवान् ने बुद्ध के रूप में अवतरित हुए। और भगवान् बुद्ध ने ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का उपदेश किया।” — स्वामी राघवाचार्य, “बुद्धावतार का जन्म कहाँ हुआ? गौतम बुद्ध वेद निंदक हैं?” यूट्यूब वीडियो, १५ फरवरी २०२२, https://youtu.be/pWafM09WQGA।
[6] “भगवान् व्यास-कृत पुराणों के अनुसार, जो बुद्ध इस समय बुद्धावतार के रूप में प्रसिद्ध हैं, वे व्यास जी के बुद्ध नहीं हैं। वर्तमान जिनको बुद्ध के रूप में हम लोग मानते हैं, उनका अवतार लुंबिनी में हुआ, क्षत्रिय कुल में हुआ। … किन्तु भागवत जी में जो बुद्ध की चर्चा है, उसमें लिखा है ‘ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्। बुद्धो नाम्नाऽजनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥’ कलियुग के आने पर, देवताओं के विरोधी जो दैत्य हैं, उन दैत्यों को मोहित करने के लिए, कीकट माने बिहार, मगध-देश में। कीकट देश में। यह गया जी जिसे कहते हैं, वहाँ। ‘कीकटेषु अजनसुतः’ अजन आपके पिताजी का नाम है; अजन नाम के ब्राह्मण ऋषि के यहाँ बुद्ध-रूप से भगवान् अवतार लेंगे। आज भी वह गाँव भी है, और उस गोत्र के ब्राह्मणों का परिवार भी आज तक है। और हम स्वयं दर्शन करके आए हैं बोधगया में। वहाँ शिवलिंग है, जिसकी उपासना बुद्ध ने की है।…ये जो बुद्ध हैं, जिनकी पुराणों में चर्चा है — चौबीस अवतारों में, दशावतारों में — ये बुद्ध बहुत प्राचीन हैं। और ये जो दूसरे बुद्ध हुए, ये परवर्ती हैं, ये उनके बहुत पीछे हुए हैं। लेकिन इन बुद्ध का इतना प्रभाव हुआ कि उन बुद्ध को लोग भूलकर इन्हीं को बुद्धावतार के रूप में मानने लगे।…वस्तुतः भगवद्-अवतारों में जिनकी गणना है, उनका जन्म इसी भारतवर्ष में, कीकट में, और एक ब्राह्मण कुल में हुआ। छह भाई थे, वे सबसे छोटे थे। और वे एक वैदिक ब्राह्मण थे। काल में भी अंतर है, चरित्र में भी अंतर है। असुरों को मोहित करने के लिए अवतार हुआ है बुद्ध का; वैदिक धर्म की रक्षा के लिए हुआ है।” — स्वामी राजेन्द्र दास, “बुद्ध जयन्ती पर विशेष —जानिए भगवान् के २४ अवतारों में जो बुद्ध हैं वे किस क्षेत्र में प्रकट हुए,” यूट्यूब वीडियो, ५ मई २०२३, https://www.youtube.com/watch?v=TpCNziHmgVM ।
[7] “बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महाराज शुद्धोदन के यशस्वी पुत्र गौतम बुद्ध के रूप में ही श्रीभगवान् अवतरित हुए थे, ऐसी प्रसिद्धि विश्रुत है; परंतु पुराण-वर्णित भगवान् बुद्धदेव का प्राकट्य गया के समीप कीकट देश में हुआ था। उनके पुण्यात्मा पिता का नाम ‘अंजन’ बताया गया है। यह प्रसंग पुराण-वर्णित बुद्धावतार का ही है।” कल्याण, अंक ८१ (जनवरी २००७), गोरखपुर: गीता प्रेस।
[8] “We regard Buddha as Bhagavan, as the Lord, as an incarnation of the Lord. And if you ask the Buddhists in Nepal and in other places, they will tell you that Hinduism is their own mother-religion, from which Buddhism has branched out. Similarly, in Japan, China, and in other places, when you ask questions with regard to religious matters of a metaphysical type, they will tell you that India is their religious mother-land. And there is no trouble about it at all.” Swam.Bharat.Krishna Tirtha, Sanatana Dharma (Bombay: Bharatiya Vidya Bhavan, 1964), 139.
[9] “The Brahmanas universally speak of the Bauddhas with all the malignity of an intolerant spirit: yet the most orthodox among them consider Buddha himself as an incarnation of Vishnu. This is a contradiction hard to be reconciled, unless we cut the knot, instead of untying it, by supposing with Giorgi, that there were two Buddhas, the younger of whom established the new religion, which gave so great an offence in India, and was introduced into China in the first century of our era.” Sir William Jones, “On the Chronology of the Hindus,” in Asiatick Researches, vol. 2 (Calcutta: Asiatick Society of Bengal, 1790), 111.
[10] “It seems highly probable, on the whole, that the BUDDHA, whom JAYADE’VA celebrates in his Hymn, was the Sácyasinha, or Lion of SA’CYA, who, though he forbad the sacrifices of cattle, which the VE’DA’S enjoin, was believed to be VISHNU himself in a human form, and that another Buddha, one perhaps of his followers in a later age, assuming his name and character, attempted to overset the whole system of the BRA’HMANS…” Sir William Jones, “On the Chronology of the Hindus,” Asiatick Researches, vol. 2 (1790), 122.
[11] “इह खलु बौद्धशास्त्रसमूहेषु सम्प्रोक्ताः पञ्चविंशतिर्बुद्धा दृश्यन्ते । तेषां शुद्धोदनौरसात् मायादेवीगर्भजातः शाक्यसिंहसर्व्वार्थसिद्धार्कबन्धुगौतमेति नामचतुष्टयेन प्रसिद्धोऽन्तिमतमः लोकविश्रुतो बुद्धः कपिलवस्तुनगरे कलेश्चतुःशतषडशीत्यधिकद्विसहस्रमितेषु गतेष्वब्देषु शुक्रवासरे सुरद्विषां सम्मोहनाय साक्षाद् विवेकमूर्त्तिः स्वेच्छाविग्रहेण प्रादुर्बभूव।” राधाकांत देव, “बुद्ध,” शब्दकल्पद्रुम (कलकत्ता, १८२१–१८५८)
[12] सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथागतः ।
समन्तभद्रो भगवान्मारजिल्लोकजिज्जिनः ॥
षडभिज्ञो दशबलोऽद्वयवादी विनायकः ।
मुनीन्द्रः श्रीघनः शास्ता मुनिः शाक्यमुनिस्तु यः ॥
स शाक्यसिंहः सर्वार्थसिद्धः शौद्धोदनिश्च सः ।
गौतमश्चार्कबन्धुश्च मायादेवीसुतश्च सः ॥ (अमरकोश १.१.१३–१५)
[13] “When .pointed out this curious passage to RA’DHA’CA’NT, he contended that the first eighteen names were general epithets, and the following seven, proper names, or patronymics, of one and the same person…” Jones, “On the Chronology of the Hindus,” Asiatick Researches, vol. 2 (1790), 122–23.
[14] पूर्ववर्ती १८ नाम — सर्वज्ञ, सुगत, बुद्ध, धर्मराज, तथागत, समन्तभद्र, भगवत्, मारजित्, लोकजित्, जिन, षडभिज्ञ, दशबल, अद्वयवादिन्, विनायक, मुनीन्द्र, श्रीघन, शास्ता, और मुनि; परवर्ती ७ नाम — शाक्यमुनि, शाक्यसिंह, सर्वार्थसिद्ध, शौद्धोदनि, गौतम, अर्कबन्धु, मायादेवीसुत।
[15] “यस्तु शकेषु जातः शाक्यमुनिर्बुद्धावतारः – शकोऽभिजनोऽस्येति शण्डिकादिभ्यो ञ्यः।” (अमरकोश (१.१.१३–१५) पर क्षीरस्वामी-टीका); “सर्वज्ञः सुगतः बुद्धः,..मुनिः…एतानि बुद्धनामानि। शकदेशेषु जातो मुनिः शाक्यमुनिः…मायादेवीसुतः। एतानि शकदेशबुद्धनामानि।” (लिंगयसूरि-टीका); “सर्वज्ञः…मुनिः। बुद्धनामानि। शाक्यमुनिस्तु यः–मायादेवीसुतश्च सः। शाक्यसिंह इत्यभिधानबुद्धनामानि।” (मल्लिनाथ-टीका); “सर्वज्ञः सुगतः बुद्धः,..मुनिः इत्यष्टादश बुद्धस्य।…शाक्यमुनिः शाक्यसिंहः…मायादेवीसुतः इति सप्तनामानि बुद्धावान्तरभेदस्य शाक्यमुनेः।” (महेश्वर-टीका); रत्नप्रभा व्याख्या, पृष्ठ ७; मणिप्रभा व्याख्या, पृष्ठ १०
[16] एच. टी. कोलब्रुक, कोश ऑर डिक्शनरी ऑफ द संस्कृत लैंग्वेज, अंग्रेज़ी व्याख्या एवं टिप्पणियाँ, तृतीय संस्करण (कलकत्ता: हरगोबिन्द रक्षित, १८९१)। प्रथम संस्करण श्रीरामपुर, १८०८
[17] ऊपर, पादटिप्पणी १० (शब्दकल्पद्रुम, “बुद्ध”) द्रष्टव्य।
[18] समन्तात् भद्रमस्य
[19] दीघनिकाय ३४, दसुत्तरसुत्त
[20] मज्झिमनिकाय १२, महासीहनादसुत्त; संयुक्तनिकाय १२.२१, दसबलसुत्त
[21] मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः ।
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्किश्च ते दश॥ (स्कन्दपुराण, अवन्तीखण्ड, रेवाखण्ड १५१.४; वराहपुराण ४.२);
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नृसिंहो वामनस्तथा ।
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की ततः स्मृतः ।
एते दशावताराश्च पृथिव्यां परिकीर्तिताः ॥ (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड ७१.२६–२७); एवं मत्स्यपुराण २८५.६–७; गरुडपुराण १.८६.१०–११; नारदपुराण १.११९.१६; लिंगपुराण २.४८.३१–३२; भविष्यपुराण ४.१९०.६–७।
[22] मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः।रामो रामश्च रामश्च बुद्धः कल्कीति ते दश॥ (महाभारत, दाक्षिणात्य-पाठ १२.३४८.२); एवं वनजौ वनजौ खर्वः त्रिरामी सकृपोऽकृपः ।
अवताराः दशैवेते कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्॥ (अग्नि-पुराण)
[23] “एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।” (भागवत-पुराण १.३.२८); एवं सूकरो वामनः कल्किर्बौद्धः कपिलमीनकौ ।
एते चांशाः कलाश्चान्ये सत्येव कतिधा मुने ॥
कूर्मो नृसिंहो रामश्च श्वेतद्वीपविराड्विभुः ।
परिपूर्णतमः कृष्णो वैकुण्ठे गोकुले स्वयम् ॥ (ब्रह्मवैवर्तपुराण ४.९.१२–१३)
[24] मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहश्च वामनः ।
रामो रामश्च रामश्च कृष्णः कल्कि च ते दश ॥ (महाभारत, गीता-प्रेस, १२.३३९.२द)
[25] अवतार एव सुगतोऽपि हरेर्दलितस्त्वया कृतधियाऽपि यतः ।
तदसम्प्रतं त्वमपराधपदं जगदेकनाथ इति संजगदे ॥ (गरुडवाहन पण्डित, दिव्यसूरि-चरित १४.८२)
[26] ये नाम हैं — दुरारिहा, शुभाङ्ग, लोकसारंग, सुतंतु, तंतुवर्धन, इन्द्रकर्मा, महाकर्मा, कृतकर्मा, कृतागम, उद्भव, सुंदर, सुंद, रत्ननाभ, सुलोचन, अर्क, वाजसन, शृङ्गी, जयन्त, सर्वविज्जयी, सुवर्णबिंदु, अक्षोभ्य, सर्ववागीश्वरेश्वर (महाभारत १३.१३५.९६–९९)।
[27] धराबद्धपद्मासनस्थाङ्घ्रियष्टिर्नियम्यानिलं न्यस्तनासाग्रदृष्टिः ।
य आस्ते कलौ योगिनां चक्रवर्ती स बुद्धः प्रबुद्धोऽस्तु निश्चिन्तवर्ती ॥ (दशावतार-स्तुति)
निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं,
सदयहृदयदर्शितपशुघातम् ।
केशव धृतबुद्धशरीर, जय जगदीश हरे ॥ (जयदेव-कृत-दशावतार-स्तोत्र ९)
[28] मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहश्च वामनः ।
रामो रामश्च रामश्च बुद्धः कल्किश्च ते दश॥ (आदिवराह-शिलालेख, महाबलिपुरम्, ७वीं शताब्दी)
[29] “तदा दसरथमहाराजा सुद्धोदनमहाराजा अहोसि, माता महामायादेवी, सीता राहुलमाता, भरतो आनन्दो, लक्खणो सारिपुत्तो, परिसा बुद्धपरिसा, रामपण्डितो पन अहमेव अहोसिन्ति।” (दसरथ-जातक अट्ठकथा, जातक ४६१, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक)
[30] क्रिश्चियन लासेन, हरमन याकोबी, आर्थर एन्थनी मैक्डोनल, आर्थर बेरीडेल कीथ, मॉरिज़ विंटरनित्ज़ (जातक-गद्य के विषय में विशेषतः), कामिल बुल्के, दिनेशचंद्र सिरकार, पांडुरंग वामन काणे, रिचर्ड गॉम्ब्रिच, और रॉबर्ट गोल्डमैन — इन सभी ने दसरथ-जातक को वाल्मीकीय-रामायण की कथा का परवर्ती रूप माना है। गोल्डमैन विशेष रूप से कहते हैं कि दसरथ-जातक “वाल्मीकीय-रामायण से पर्याप्त परवर्ती है और उसी से प्रेरित एवं व्युत्पन्न है।” कामिल बुल्के, रामकथा: उत्पत्ति और विकास, तृतीय संस्करण (प्रयाग: हिंदी परिषद्, १९७१), पृ. ८२–१०७; D. C. Sircar, The Bhārata War and Purāṇic Genealogies (Calcutta: University of Calcutta, 1976), pp. 50–53; P. V. Kane, “The Two Epics,” Annals of the Bhandarkar Oriental Research Institute 47, nos. 1–4 (1966): 11–58, esp. 45–46; Richard Gombrich, “The Vessantara Jātaka, the Rāmāyaṇa and the Dasaratha Jātaka,” Journal of the American Oriental Society 105, no. 3 (1985): 427–37; Robert P. Goldman, ed. and trans., The Rāmāyaṇa of Vālmīki: An Epic of Ancient India, Volume 1: Bālakāṇḍa (Princeton: Princeton University Press, 1984), Introduction
[31] Romila Thapar, “Variants as Historical Statements: The Rāma-kathā in Early India,” in The Anthropologist and the Native: Essays for Gananath Obeyesekere, ed. H. L. Seneviratne (London: Anthem Press, 2011), 349–94; डॉ. थापर दसरथ-जातक को “या तो वाल्मीकीय-रामायण के ठीक पूर्व अथवा उसके समकालीन” मानती हैं।
[32] एथ लक्खण सीता च उभो ओतरथोदकं ।
एवायं भरतो आह राजा दसरथो मतो ॥१
केन रामप्पभावेन सोचितब्बं न सोचसि ।
पितरं कालकतं सुत्वा न तं पसहते दुखं ॥२
यं न सक्का निपालेतुं पोसेन लपतं बहुं ।
स किस्स विञ्ञू मेधावी अत्तानमुपतापये ॥३
दहरा च हि वुद्धा च ये बाला ये च पण्डिता ।
अड्ढा चेव दलिद्दा च सब्बे मच्चुपरायणा ॥४
फलानमिव पक्कानं निच्चं पतनतो भयं ।
एवं जातानं मच्चानं निच्चं मरणतो भयं ॥५
सायमेके न दिस्सन्ति पातो दिट्ठा बहुज्जना ।
पातो एके न दिस्सन्ति सायं दिट्ठा बहुज्जना ॥६
परिदेवयमानो चे किञ्चिदत्थं उदब्बहे ।
सम्मूळ्हो हिंसमत्तानं कयिरा तं विचक्खणो ॥७
किसो विवण्णो भवति हिंसमत्तानमत्तनो ।
न तेन पेता पालेन्ति, निरत्था परिदेवना ॥८
यथा सरणमादित्तं, वारिना परिनिब्बये ।
एवम्पि धीरो सुतवा, मेधावी पण्डितो नरो।
खिप्पमुप्पतितं सोकं, वातो तूलंव धंसये॥९
मच्चो एकोव अच्चेति एकोव जायते कुले ।
संयोगपरमात्वेव सम्भोगा सब्बपाणिनं ॥१०
तस्मा हि धीरस्स बहुस्सुतस्स सम्पस्सतो लोकमिमं परञ्च ।
अञ्ञाय धम्मं हदयं मनञ्च सोका महन्तापि न तापयन्ति ॥११
सोहं दस्सञ्च भोक्खञ्च भरिस्सामि च ञातके ।
सेसञ्च पालयिस्सामि, किच्चमेतं विजानतो ॥१२
दस वस्ससहस्सानि सट्ठि वस्ससतानि च ।
कम्बुगीवो महाबाहु रामो रज्जमकारयीति ॥१३
(दसरथ-जातक, जातक ४६१, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक)
[33] एथ लक्खण सीता च, उभो ओतरथोदकं ।
एवायं भरतो आह राजा दसरथो मतो ॥
(दसरथ-जातक १)
जलक्रियार्थं तातस्य गमिष्यामि महात्मनः ।
सीता पुरस्ताद् व्रजतु त्वमेनामभितो व्रज ॥…
अवातारयदालम्ब्य नदीं मन्दाकिनीं शिवाम् ॥
(वाल्मीकीय-रामायण २.९५.२१–२४)
यथा प्रव्रजितो रामो मातुर्दत्ते वरे तव ।
यथा च पुत्रशोकेन राजा दशरथो मृतः ॥
(वाल्मीकीय-रामायण ६.११४.५)
V Fausbøll, ed., The Jātaka Together with its Commentary, vol. IV (London: Trübner, 1877–96), p. 128; N. B. Utgikar, “The Mention of the Rāmāyaṇa in the Dasaratha-Jātaka,” Indian Antiquary 52 (1923): 132–36; कामिल बुल्के, रामकथा: उत्पत्ति और विकास, तृतीय संस्करण (प्रयाग: हिंदी परिषद्, १९७१), पृ. ६०–६३।
[34] यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद्भयम् ।
एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद्भयम् ॥
(वाल्मीकीय-रामायण २.९८.१७)
फलानमिव पक्कानं निच्चं पतनतो भयं ।
एवं जातानं मच्चानं निच्चं मरणतो भयं ॥
(दसरथ-जातक ५)
[35] मिलाएँ “राजा दसरथो मतो” (दसरथ-जातक १), “राजा दशरथो मृतः” (वाल्मीकीय-रामायण ६.११४.५); “पितरं कालकतं सुत्वा, न तं पसहते दुखं” (दसरथ-जातक २), “न त्वां प्रव्यथयेद् दुःखं प्रीतिर्वा न प्रहर्षयेत्” (वाल्मीकीय-रामायण २.१०६.३); “मच्चो एकोव अच्चेति एकोव जायते कुले”
(दसरथ-जातक १०), “यदेको जायते जन्तुरेक एव विनश्यति”(वाल्मीकीय-रामायण २.१०८.३); “कम्बुगीवो महाबाहु” (दसरथ-जातक १३), “विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः” (वाल्मीकीय-रामायण १.१.९), “कम्बुग्रीवः शुभाननः” (वाल्मीकीय-रामायण ५.३३.१५)
[36] सर्वे लक्षणसंपन्नाः सर्वे धर्मपरायणाः ।
दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमकारयत् ॥
(वाल्मीकीय-रामायण ६.११६.९०)
[37] श्यामो युवा लोहिताक्षो मत्तवारणविक्रमः ।
दश वर्षसहस्राणि रामो राज्यमकारयत् ॥
(महाभारत १२.२९.५४)
[38] दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।
भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् रामो राज्यमकारयत्॥
(वाल्मीकीय-रामायण, दाक्षिणात्य-पाठ ६.१२८.१०६)
[39] दस वस्ससहस्सानि सट्ठि वस्ससतानि च ।
कम्बुगीवो महाबाहु रामो रज्जमकारयीति ॥१३
(दसरथ-जातक १३)
[40] अवरुद्धस्साहं भरिया राजपुत्तस्स सिरीमतो ।
तं चाहं नातिमञ्ञामि, रामं सीतावनुब्बता ॥
(वेस्संतर-जातक २१०८)
[41] यं दण्डकारञ्ञगतस्स माता रामस्सकासि सोत्थानं सुगुत्ता ।
तं ते अहं सोत्थानं करोमि एतेन सच्चेन सरन्तु देवा ॥
अनुञ्ञातो सोत्थि पच्चेहि पुत्त ॥
(जयद्दिस-जातक, ७०)
अभिवाद्य तु कौसल्यां रामः संप्रस्थितो वनम् ।
कृतस्वस्त्ययनो मात्रा धर्मिष्ठे वर्त्मनि स्थितः ॥
(वाल्मीकीय-रामायण २.२३.१९)
चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यं दण्डके मया
(वाल्मीकीय-रामायण २.२३.२२)
[42] “विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः” (वाल्मीकीय-रामायण १.१.९), “कम्बुग्रीवः शुभाननः” (वाल्मीकीय-रामायण ५.३३.१५)
[43] “महाबाहु” (१.१.९), “आजानुबाहु” (१.१.१०) और “त्रिप्रलंब” (५.३३.१७) का “स्थितावनतप्रलंबबाहु” (जो खड़े होकर बिना झुके ही अपने जानुओं का स्पर्श कर लेते हैं, लक्षण ९) से साम्य है। “पंचसूक्ष्म” (५.३३.१९), “पंचस्निग्ध” (५.३३.१९) और “सुकुमार” (३.१६.६) का “मृदुतरुणहस्तपाद” (कोमल और तरुण हाथ और चरण, लक्षण ५) से साम्य है। “पंचसूक्ष्म” (५.३३.१९) और “स्निग्धवर्ण” (५.३३.१६) का साम्य “सूक्ष्मच्छवि” (कोमल त्वचा, लक्षण १२) से है। “षडुन्नत” (५.३३.१९) का “सप्तोत्सद” (सात उन्नत अंग, लक्षण १६), “विपुलांस” (१.१.९) का “चितंतरंस” (स्कन्ध-मध्य से पूर्ण, लक्षण १८), “महाहनु” (१.१.९) का “सीहहनु” (सिंह के समान हनु, लक्षण २२), “सिंहोरस्क” (३.१६.६) का “सिंहपूर्वार्धकाय” (सिंह समान पूर्वार्ध-देह, लक्षण १७), “द्विशुक्ल” (१.१.९) का “सुशुक्लदंष्ट्र” (शुक्ल दाँत, लक्षण २६) और “दुंदुभि-स्वन-निर्घोष” (५.३३.१६) का “ब्रह्मस्वर” (ब्रह्म-सदृश स्वर, लक्षण २८) से साम्य है।
[44] वाल्मीकिरादौ च ससर्ज पद्यं जग्रन्थ यन्न च्यवनो महर्षिः ।
चिकित्सितं यच्च चकार नात्रिः पश्चात् तदात्रेय ऋषिर्जगाद ॥ (बुद्धचरित १.४३);
निशाम्य च स्रस्तशरीरगामिनौ विनागतौ शाक्यकुलर्षभेण तौ ।
मुमोच बाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते ॥ (बुद्धचरित ८.८);
यानं विहायोपययौ ततस्तं पुरोहितो मन्त्रधरेण सार्धम् ।
यथा वनस्थं सहवामदेवो रामं दिदृक्षुर्मुनिरौर्वशेयः ॥ (बुद्धचरित ९.९)
[45] महायान-सूत्र के रूप में ललितविस्तर का संस्कृत रूप ३–५वीं शताब्दी के मध्य निर्धारित किया जाता है।
[46] सोऽद्राक्षीत्कपिलाह्वये पुरवरे शुद्धोदनस्यालये
जातो लक्षणपुण्यतेजभरितो नारायणस्थामवान् ।
दृष्ट्वा चात्तमना उदग्रमनसः स्थामास्य संवर्धितः ॥ (ललितविस्तर ७.६१);
पुत्रस्ते वररूपपारमिगतो जातो महातेजवान्, द्वात्रिंशद्वरलक्षणैः कवचितो नारायणस्थामवान्…(ललितविस्तर ७.६६); सोऽपश्यद्वरलक्षणैः कवचितं नारायणस्थामवं…(ललितविस्तर ७.६९)
[47] “यस्यैवरूपा गर्भावक्रान्तिर्भवति स द्वात्रिंशता महापुरुषलक्षणैः समन्वागतो भवति।” (ललितविस्तर ३); एवं देखें ललितविस्तर परिवर्त ५
[48] “समन्नागतो खो समणो गोतमो द्वत्तिंसमहापुरिसलक्खणेहि परिपुण्णेहि, नो अपरिपुण्णेहि।” (सेलसुत्त, मज्झिमनिकाय ९२); एवं देखें लक्खणसुत्त (दीघनिकाय ३०)
[49] “अम्हाकं भो मन्तेसु आगतानि द्वत्तिंस महापुरिसलक्खणानि” — “हे भो, हमारे [ब्राह्मणों के] मंत्रों में द्वात्रिंशत् महापुरुष-लक्षण आये हुए हैं” (सेलसुत्त, सुत्तनिपात ३.७ = मज्झिमनिकाय ९२); इसी भाव का प्रकाशन अम्बट्ठसुत्त (दीघनिकाय ३) और ब्रह्मायुसुत्त (मज्झिमनिकाय ९१) में भी है। आधुनिक शोध के लिए देखें Kenneth Zysk, The Indian System of Human Marks (Leiden: Brill, 2016), ch. V; एवं Nathan McGovern, “On the Origins of the 32 Marks of a Great Man,” Journal of the International Association of Buddhist Studies 39 (2016): 207–47।
[50] तस्मादाहुर्लक्ष्मणेत्येव सर्वे तल्लक्षणं शृणु चादौ खगेन्द्र ।
नारायणे पूर्णगुणे रमेशे द्वात्रिंशत्संख्यानि सुलक्षणानि ॥ (गरुडपुराण, ब्रह्मकाण्ड २२.४)
[51] “ततश्छन्दकः कण्ठकमाभरणानि चादायान्तःपुरं प्राविक्षत् । ततस्तान्याभरणानि चिरेण कालेन भद्रिकस्य शाक्यकुमारस्य महानाम्नोऽनिरुद्धस्य चाबध्यन्त स्म । तानि महानारायणसंघटनकायार्थमन्ये नारायणसंहनना न शक्नुवन्ति स्म धारयितुम् । यदा न कश्चित्तानि धारयितुं शक्नोति स्म, तदा महाप्रजापत्या गौतम्या चिन्तितमभूत् — यावदहमिमान्याभरणानि पश्यामि, तावन्मम हृदये शोको भविष्यति । यन्न्वहमिमान्याभरणानि पुष्करिण्यां प्रक्षिपेयमिति । ततो महाप्रजापती गौतमी तान्याभरणानि पुष्करिण्यां प्रक्षिपति स्म ।
अद्यापि सा आभरणपुष्करिणीत्येवं संज्ञायते॥” (ललितविस्तर १५)
[52] “सो एषो वरलक्षणो हितकरो नारायणस्थामवान् बोधेर्मूलमुपागतो गुणधरस्तस्यैष पूजा कृता ॥” (ललितविस्तर २०.२); “नारायणस्य यथ काय अछेद्यभेद्यो क्षान्तिबलैः कवचितो दृढवीर्यखङ्गः।” (ललितविस्तर २१.४५); “बलवानसि त्वमग्रसत्त्व नारायण इव दुर्धर्षः।
दृढसमादानस्त्वं लोकनाथ अनुत्थाता बोधिमण्डा॥” (ललितविस्तर २१.१४५)
[53] “वज्रदृढ अभेद्य नारायणो आत्मभावो गुरुः।” (ललितविस्तर १५.२१); “महानारायणबलोपेतत्वान्महानारायण इत्युच्यते।” (ललितविस्तर २६)
[54] कौसल्याजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुतम् ।
विष्णोरर्धं महाभागं पुत्रमिक्ष्वाकुनन्दनम् ॥ (वाल्मीकीय-रामायण १.१७.६)
[55] विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः ।
कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥ (वाल्मीकीय-रामायण १.१.१७);
सर्वभूतेषु सर्वत्र सर्वकालेषु नास्ति सः ।
यो रामं प्रतियुध्येत विष्णुतुल्यपराक्रमम् ॥ (वाल्मीकीय-रामायण ५.५१.४२)
[56] देवातिशय-स्तोत्र और उसकी प्रज्ञावर्मा-टीका के लिए देखें Johannes Schneider, Der Lobpreis der Vorzüglichkeit des Buddha (Bonn: Indica et Tibetica Verlag, 1993)
[57] देवातिशय-स्तोत्र १४।
[58] प्रज्ञावर्मा, देवातिशय-स्तोत्र-टीका (तिब्बती अनुवाद, तंजुर)
[59] “अथासौ दारिका ददर्श बुद्धं भगवन्तं द्वात्रिंशता महापुरुषलक्षणैः समलङ्कृतमशीत्या चानुव्यञ्जनैर्विराजितगात्रं व्यामप्रभालङ्कृतं सूर्यसहस्रातिरेकप्रभं जङ्गममिव रत्नपर्वतं समन्ततो भद्रकम् । सहदर्शनाच्च लब्धप्रसादा भगवति सौवर्णचक्रं क्षेप्तुमारब्धा । ततश्चेटिकया वार्यते नायं नारायण इति ।
सा वार्यमाणाऽपि तीव्रप्रसादावर्जितमानसा बुद्धस्य भगवत उपरि सौवर्णचक्रं निक्षिप्य गन्धमाल्यं च दत्तवती॥” (अवदान-शतक २३, चक्रम्)
[60] भगवानाह — चक्षुषोश्चन्द्रादित्यावुत्पन्नौ, ललाटान्महेश्वरः, स्कन्धेभ्यो ब्रह्मादयः, हृदयान्नारायणः, दंष्ट्राभ्यां सरस्वती, मुखतो वायवो जाताः, धरणी पादाभ्याम्, वरुणश्चोदरात्। (कारण्डव्यूह-सूत्र ४)
[61] “भगवानाह — बहुभिः कुलपुत्र कारणैः सत्त्वाः कारणात् संसारे संसरन्ति, देवता सत्त्वान् परिपाचयति, तेषां सत्त्वानां बोधिमार्गमुपदर्शयति। येन येन रूपेण वैनेयाः सत्त्वाः, तेन तेन रूपेण धर्मं देशयति…नारायणवैनेयानां सत्त्वानां नारायणरूपेण धर्मं देशयति।
ब्रह्मवैनेयानां सत्त्वानां ब्रह्मरूपेण धर्मं देशयति…एवं कुलपुत्र अवलोकितेश्वरो बोधिसत्त्वो महासत्त्वः सत्त्वान् धर्मं देशयति, परिपाचयति, निर्वाणभूमिमुपदर्शयति॥” (कारण्डव्यूह-सूत्र ८)
[62] “स च विमलगुणतेजराजस्तथागतस्तेषां बोधिसत्त्वानामेवमाह — ‘समन्तचक्षुः कुलपुत्राः शाक्यमुनिस्तथागतः। ये केचित् कुलपुत्राः सहे लोकधातौ सत्त्वा भूमिस्थिता वा अन्तरीक्षस्थिता वा ततश्चैकैकः सत्त्व एवं संजानाति — मां शाक्यमुनिस्तथागतः सर्वचेतसा निरीक्षते ममैकमारभ्य धर्मं देशयति…ये च तत्र कुलपुत्र सत्त्वा ब्राह्मभक्तास्ते शाक्यमुनिं तथागतं ब्रह्माणं समनुपश्यन्ति…यावद् ये महेश्वरभक्तिकास्ते सत्त्वा महेश्वररूपवर्णसंस्थानवचनव्याहारेण शाक्यमुनिं तथागतं पश्यन्ति धर्मं च शृण्वन्ति। यावच्चतुरशीतिस्तत्र सत्त्वानां वर्णसंस्थानभक्तिरूपव्याहारसहस्राणि ते तथा चैव शाक्यमुनिं तथागतं पश्यन्ति धर्मं च शृण्वन्ति’।” (करुणापुण्डरीक-सूत्र ६)
[63] “तत्र केचिन्महामते तथागतमिति मां संजानन्ति। केचित् स्वयंभुवमिति। नायकं विनायकं परिणायकं बुद्धमृषिं वृषभं ब्रह्माणं विष्णुमीश्वरं प्रधानं कपिलं भूतान्तमरिष्टनेमिनं सोमं भास्करं रामं व्यासं शुकमिन्द्रं बलिं वरुणमिति चैके संजानन्ति।” (लङ्कावतार-सूत्र ३.८५)
[64] ब्राह्मणा ब्राह्मणः पुत्रा औरसा मुखजा इति ।
प्रसृतो लोकवादोऽयं त्वयि साफल्यमागतः ॥
त्वं ब्रह्मा प्रतिपद् ब्राह्मी त्वयि त्वं ब्राह्मणर्षभः ।
प्रणेता चोपनेता च त्वम् ऋत्विक् त्वं पुरोहितः ॥ (मातृचेट, वर्णार्हवर्ण-स्तोत्र ७.१२–१३)
[65] “मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, विष्णु (कृष्ण), बुद्ध और कल्कि — ये दस हैं।” (भावविवेक, तर्कज्वाला, अष्टम-अध्याय — वेदान्ततत्त्वविनिश्चय) मानक-संदर्भ: Olle Qvarnström, Hindu Philosophy in Buddhist Perspective: The Vedāntatattvaviniścaya Chapter of Bhavya’s Madhyamakahṛdayakārikā (Lund: Plus Ultra, 1989)
[66] “विष्णु का स्वरूप द्विविध है — दिव्य (परम) तथा सांसारिक (व्यक्त)। इनमें दिव्य स्वरूप ही एक अकेला शान्त है; सांसारिक स्वरूप दस अशान्त रूपों के रूप में विद्यमान है, जो लोक में दुष्ट प्राणियों के दमन के लिए अवतरित होते हैं।” (भावविवेक, तर्कज्वाला, अष्टम-अध्याय)
[67] “अब यह दिखाया जाएगा कि इस मत का अनिष्ट-प्रसंग होता है।” (भावविवेक, तर्कज्वाला, अष्टम-अध्याय)
[68] वक्ष्ये बुद्धावतारं च पठतः शृण्वतोऽर्थदम् ।
पुरा देवासुरे युद्धे दैत्यैर्देवाः पराजिताः ॥
रक्ष रक्षेति शरणं वदन्तो जग्मुरीश्वरम् ।
मायामोहस्वरूपोऽसौ शुद्धोदनसुतोऽभवत् ॥
मोहयामास दैत्यांस्तांस्त्याजिता वेदधर्मकम् ।
ते च बौद्धा बभूवुर्हि तेभ्योऽन्ये वेदवर्जिताः ॥ (अग्निपुराण १६.१–३)
[69] शान्तात्मा लम्बकर्णश्च गौराङ्गश्चाम्बरावृतः ।
ऊर्ध्वपद्मस्थितो बुद्धो वरदाभयदायकः ॥ (अग्निपुराण ४९.८)
पद्माङ्कितकरचरणः प्रसन्नमूर्तिः सुनीचकेशश्च ।
पद्मासनोपविष्टः पितेव जगतो भवेद् बुद्धः ॥ (बृहत्संहिता ५७.४४)
काषायवस्त्रसंवीतः स्कन्धसंसक्तचीवरः ।
पद्मासनस्थो द्विभुजो ध्यायी बुद्धः प्रकीर्तितः ॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण ८५.८१)
कलौ युगे तु सम्प्राप्ते आश्विने कृष्णपक्षके ।
नवम्यां च तिथौ चैव मृगान्ते समुहूर्तके ॥
शुद्धोदनसुतो भूत्वा मोहयिष्यामि मानवम् ।
युगे तत्र भविष्यन्ति मुण्डाः काषायवाससः ॥ (अपराजितपृच्छा २९.१–२)
बद्धपद्मासनो रक्तस्त्यक्ताभरणमूर्धजः ।
काषायवस्त्रो ध्यानस्थो द्विभुजोऽङ्कोर्ध्वपाणिकः ॥ (रूपमंडन ३.२७–२८)
बुद्धः पद्मासनगतः प्रलम्बश्रुतिचीवरः ।
पद्माक्षः पद्मचिह्नश्च मणिबद्धो जगद्धितः ।
समाधिस्थो महायोगी वरदाभयपाणिकः ॥
अक्षसूत्रधरो देवः पद्महस्तः सुलोचनः ।
एवं ध्यातः पूजितश्च स्त्रीणां मोक्षफलप्रदः ॥ (नेत्रतंत्र १३.३४—३६)
[70] बुद्धो ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः ॥
निरायुधो जगज्जैत्रः श्रीधरो दुष्टमोहनः ।
दैत्यवेदबहिःकर्त्ता वेदार्थश्रुतिगोपकः ॥
शौद्धोदनिर्दष्टदृष्टिः सुखदः सदसस्पतिः ।
यथायोग्याखिलकृपः सर्वशून्योऽखिलेष्टदः ॥
चतुष्कोटिपृथक्तत्त्वप्रज्ञापारमितेश्वरः ।
पाखण्डवेदमार्गेशः पाखण्डश्रुतिगोपरः ॥ (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड ७१.२७९–२८२)
“सुगत” नाम भी शिवसहस्रनाम में प्राप्त होता है:
ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः ।
जगद्धितैषी सुगतः कुमारः कुशलागमः ॥ (शिवपुराण, कोटिरुद्रसंहिता ३५.७२; लिंगपुराण १.९८.९६)
[71] बौद्ध-धर्म में ‘प्रज्ञापारमिता’ महायान-परम्परा के ‘द्वितीय धर्मचक्र-प्रवर्तन’ से संबंधित सूत्रों की एक विशिष्ट श्रेणी का नाम है। इसके अंतर्गत वज्रच्छेदिका प्रज्ञापारमिता तथा प्रज्ञापारमिताहृदय-सूत्र जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ आते हैं। इसके अतिरिक्त महायान बौद्ध दर्शन में ‘प्रज्ञापारमिता’ को सर्वोच्च ज्ञान की देवी के रूप में भी प्रतिष्ठित किया गया है।
[72] अन्यैवासौ हरेर्मूर्तिः शिवा यदि विकल्प्यते ।
दृष्ट्वा हि यतयो यां न पुनर्यान्ति पुनर्भवम् ॥
न सती नासती चासौ नासौ सदसती मता ।
तस्मात् सत्त्वादसत्त्वाच्च सदसत्त्वाच्च सा परा ॥ (मध्यमकहृदय ८.७४—७५)
[73] “जैसे नास्तिक-मत का प्रवर्तक बृहस्पति माना जाता है, लेकिन वह देवगुरु नहीं है, दूसरा ही है; वैसे बुद्धावतार भी गौतम-बुद्ध से अन्य है। वह तो शौद्धोदनि (शुद्धोदन का वा अजिन का लड़का) माना जाता है, गौतम-बुद्ध नहीं।” (दीनानाथ शर्मा, श्रीसनातन-धर्मालोक, खण्ड ७, पृ. २०२)
[74] आधुनिक द्वैत वेदान्त परम्परा के विद्वान् विद्यावाचस्पति बन्नञ्जे गोविन्दाचार्य ने महाभारत-तात्पर्य-निर्णय (अध्याय ३२) पर अपने भाष्य में ऐसा ही तर्क प्रस्तुत किया है: “शुद्धोदनेत्येव । ‘शुद्धोदनसुतो बुद्धो मोहयिष्यामि मानवान्’ [शां.प. ३४८.४३] इति भारते । ननु तर्हि ‘बुद्धो नाम्ना जिनसुतः’ इति भागवत-विरोध इत्यत आह — जिनेति चोक्तः । शुद्धोदन एव जैनधर्म-प्रवर्तकः प्रथममासेति जिन इति चोक्तः । एतेन ऐतिहासिकः शुद्धोदनसुतो बुद्धोऽन्यः, भगवदवतारभूतो बुद्धोऽन्य इति वदन्तः परास्ताः । न केवलं बुद्धः, अयं शुद्धोदनोऽप्यन्य इति त्वद्भुतमितिहासकौशलम् ।
सम्प्रास्य, यथा प्रासनानन्तरं तं शिशुं कोऽपि न पुनः पश्येत् ॥
१४६ ॥”
[75] सञ्जयस्य सुतः शाक्यः शाक्याच्छुद्धौदनो नृपः ।
शुद्धौदनस्य भविता सिद्धार्थः पुष्कलः सुतः ॥ (मत्स्य-पुराण २७१.१२); अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः पार्थिवाः कथ्यन्ते…रणञ्जयात्सञ्जयस्तस्माच्छाक्यः शाक्याच्छुद्धोदनस्तस्माद्राहुलस्ततः प्रसेनजित् ॥ (विष्णुपुराण ४.२२.१–८)
[76] अमरकोश (१.१.१३) की व्याख्या-सुधा टीका में “बुध” को भी बुद्ध का नाम बताया गया है — “सर्वज्ञः सुगतो बुधः।”
नैषधीय-चरित में दशावतार-स्तुति के प्रकरण में बुद्ध को “बुध” कहा गया है — एकचित्तततिरद्वयवादिन्नत्रयीपरिचितोऽथ बुधस्त्वम् ।
पाहि मां विधुतकोटिचतुष्कः पञ्चबाणविजयी षडभिज्ञः ॥
(नैषधीय-चरित २१.८८)
ज्योतिष-शास्त्र में बुध-ग्रह बुद्ध का प्रतीक है —
रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः।
नृसिंहो भूमिपुत्रस्य बुद्धः सोमसुतस्य च॥
(बृहत्पाराशर-होराशास्त्र २.५)
[77] “वस्त्रपाणेः शुद्धोदनः, शुद्धोदनाद् बुधः, बुधादादित्यवंशो निवर्तते।” (नृसिंह-पुराण २२.१५)
[78] “रणञ्जयात् सञ्जयस्तस्माच्छाक्यः शाक्याच्छुद्धोदनस्तस्माद् राहुलस्ततः प्रसेनजित्।” (विष्णुपुराण ४.२२.८)
[79] “अहं, भिक्खवे, एतरहि अरहं सम्मासम्बुद्धो खत्तियो जातिया अहोसिं, खत्तियकुले उप्पन्नो।” (पुब्बेनिवासपटिसंयुत्तकथा ५, दीघनिकाय); “आदिच्चा नाम गोत्तेन, साकिया नाम जातिया” (पब्बज्जासुत्त ४२५, महावग्ग, विनयपिटक)
[80] शाकवृक्षप्रतिच्छन्नं वासं यस्माच्च चक्रिरे ।
तस्मादिक्ष्वाकुवंश्यास्ते भुवि शाक्या इति स्मृताः ॥
(सौंदरानंद-महाकाव्य १.२४)
[81] काषायवस्त्रसंवीतो मुण्डितः शुक्लदन्तवान् ।
शुद्धोदनसुतो बुद्धो मोहयिष्यामि मानवान् ॥ (महाभारत, गीता-प्रेस, १२.३४८.४३)
[82] ततः कलियुगे घोरे सम्प्राप्तेऽब्जसमुद्भव ।
शुद्धोदनसुतो बुद्धो भविष्यामि विमत्सरः ॥
बौद्धं धर्ममुपाश्रित्य करिष्ये धर्मदेशनाम् ।
नराणामथ नारीणां दयां भूतेषु दर्शयन् ॥ (विष्णुधर्म-पुराण ६६.६८–६९)
[83] रक्ताम्बरा ह्याञ्जिताक्षाः प्रशान्तमनसस्ततः ।
शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति मयि बुद्धत्वमागते ॥
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता ।
भवित्री प्रायशो ब्रह्मन् मयि बुद्धत्वमागते ॥ (विष्णुधर्म-पुराण ६६.८०–८१)
[84] शुक्लदन्ताञ्जिताक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः ।
शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति शाक्यबुद्धोपजीविनः ॥ (हरिवंश-पुराण, भविष्य-पर्व ३.१५)
[85] स्मर्यन्ते च पुराणेषु धर्मविप्लुतिहेतवः ।
कलौ शाक्यादयस्तेषां को वाक्यं श्रोतुमर्हति ॥ (कुमारिल भट्ट, तंत्रवार्त्तिक, मीमांसा-सूत्र १.३.७ पर)
[86] विष्णुदेवो जगन्नाथो ब्रह्मन् प्राप्ते कलौ युगे ।
अष्टाविंशत्तमे भावी बुद्धो नाम जगद्गुरुः ॥
पुष्ययुक्ते निशानाथे वैशाखे मासि काश्यप ।
तस्मात् कालादथारभ्य काले भाविन्यतः परम् ॥
शुक्ले सम्पूजनं तस्य यथा कार्यं तथा शृणु ।
सर्वौषधैः सर्वरत्नैः सर्वगन्धैस्तथैव च ॥
बुद्धार्चास्नापनं कार्यं शाक्योक्तैर्वचनैस्तथा ।
सुधासिताश्च कर्तव्या शाक्यावासाः प्रयत्नतः ॥
क्वचिच्चित्रयुताः कार्याश्चैत्या देवालयास्तथा ।
उत्सवं च तथा कार्यं नटनर्तकसङ्कुलम् ॥
शाक्यानां पूजनं कार्यं चीवराहारपुस्तकैः ।
सर्वमेतद् भवेत् कार्यं यावत् प्राप्ता भवेन्मघा ॥
दिनत्रयं च कर्तव्यं नैवेद्यं विधिवद् द्विज ।
पुष्पवस्त्रादिना पूजा दानं दीनजनस्य च ॥
पौर्णमासीं तु सम्प्राप्य वैशाखस्य द्विजोत्तम ।
मधुयुक्तैस्तिलैः कार्यं तदा ब्राह्मणपूजनम् ॥ (नीलमत-पुराण ७०९–७१६)
[87] भागवत-पुराण १.३.२४
[88] A. C. Bhaktivedanta Swam.Prabhupāda, trans. and comm., Śrīmad-Bhāgavatam, canto 1, ch. 3, verse 24, https://vedabase.io/en/library/sb/1/3/24/.
[89] गरुडपुराण १.२.३२; एवं गरुडपुराण, ब्रह्मकाण्ड (मोक्षकाण्ड) १५.२६: “ततः कलौ संप्रवृत्ते हरिस्तु संमोहनार्थं चासुराणां खगेन्द्र ।
नाम्ना बुद्धो कीकटेषु प्रजातो वेदप्रमाणं निराकर्तुमेव ॥”
[90] “अजिनस्य सुतः; जिनसुत इति पाठे जिनोऽपि स एव।” (श्रीधरस्वामी); “जिनस्य सुतो भविष्यति नाम्ना बुद्धः।” (वीरराघवाचार्य); “जिनेन सुतत्वेन वृतः।” (विजयध्वजतीर्थ); “अजनसुतोऽजिनसुतश्चेति पाठद्वयम्।” (विश्वनाथ चक्रवर्ती); “जिनस्य अजिनस्य वा सुतः।” (स्वामी वल्लभाचार्य); “जिनस्य सुतो नाम्ना च बुद्धो भविष्यतीत्यन्वयः; अजनसुत इति पाठान्तरमर्थस्तु समान एव।” (गिरिधर)
[91] यस्त्रैपुराणां प्रथमोऽत्र जातः शुद्धोदनेत्येव जिनेति चोक्तः ।
क्षेत्रे गयाख्येऽस्य शिशुं प्रजातं सम्प्रास्यदूरेऽत्र बभूव विष्णुः ॥ (मध्वाचार्य, महाभारत-तात्पर्य-निर्णय ३२.१४६)
[92] “बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यतीति भागवत-वचनात् जिनसुततयाऽप्येकवारं बुद्धावतारोऽस्ति।” (वादिराज-तीर्थ, महाभारत-तात्पर्य-निर्णय ३२.१४६ पर टीका)
[93] अनवतप्तह्रदे निवसन्ति ये गिरिनदीषु च पर्वतकन्दरे ।
जिनसुताः खलु ध्यानरताः सदा समुदयन्त्विह तेऽद्य कृपाबलाः ॥ (दिव्यावदान, कुणालावदान २७, श्लोक ८१); “एवं समन्तभद्रस्य मन्त्रः — ॐ समासमजिनसुत मा विलम्ब हूँ फट्।” (आर्यमञ्जुश्रीमूलकल्प ३७); “जिनसुत! परितुष्टा हर्षिता धर्महेतोः।” (दशभूमिकसूत्र ५.१)
[94] अट्ठकथाओं में यह वाक्य पाँच स्थलों पर उपलब्ध है—दीघनिकाय-अट्ठकथा सुमङ्गलविलासिनी, महासतिपट्ठानसुत्तवण्णना, बोज्झङ्गपब्बवण्णना; मज्झिमनिकाय-अट्ठकथा पपञ्चसूदनी, मूलपण्णास, मूलपरियायवग्ग, सतिपट्ठानसुत्तवण्णना, बोज्झङ्गपब्बवण्णना; संयुत्तनिकाय-अट्ठकथा सारत्थप्पकासिनी, महावग्ग, बोज्झङ्गसंयुत्त, साकच्छवग्ग, आहारसुत्तवण्णना; अङ्गुत्तरनिकाय-अट्ठकथा मनोरथपूरणी, एककनिपात, अपर-अच्छरासङ्घातवग्गवण्णना; तथा विभङ्ग-अट्ठकथा सम्मोहविनोदनी, सतिपट्ठानविभङ्ग, बोज्झङ्गपब्बवण्णना। पाठ है—“जातियापि त्वं इदानि न लामकजातिको, असम्भिन्नाय महासम्मतपवेणिया आगतउक्काकराजवंसे जातोसि, सुद्धोदनमहाराजस्स च महामायादेविया च नत्ता, राहुलभद्दस्स कनिट्ठो, तया नाम एवरूपेन जिनपुत्तेन हुत्वा न युत्तं कुसीतेन विहरितुन्ति एवं जातिमहत्तं पच्चवेक्खतोपि उप्पज्जति।” अर्थात्—“जन्म अथवा वंश की दृष्टि से भी अब तुम किसी निम्न वंश के नहीं हो; तुम महासम्मत की अखण्ड परम्परा से चले आए ओक्काक-राजवंश में उत्पन्न हुए हो; तुम महाराज शुद्धोदन और महामाया देवी के पौत्र तथा राहुलभद्र के कनिष्ठ भ्राता हो; ऐसे जिनपुत्र होकर तुम्हारा आलस्यपूर्वक रहना उचित नहीं।”
[95] तस्मा हि वत्तं पूरेय्य जिनपुत्तो विचक्खणो ।
ओवादं बुद्धसेट्ठस्स ततो निब्बानमेहितीति ॥ (अन्तेवासिकवत्त-कथा, वत्तक्खन्धक, चूळवग्ग, थेरवाद विनयपिटक);
ये तत्थासुं जिनपुत्ता पदक्खिणमकंसु मं ।
देवा मनुस्सा असुरा च अभिवादेत्वान पक्कमुं ॥ (सुमेधपत्थना-कथा, बुद्धवंस);
यदा वेरोचनो नागो दानं ददाति सत्थुनो ।
तदा समिंसु जिनपुत्ता असीतिसतसहस्सियो ॥ (नारदबुद्धवंस, बुद्धवंस);
“तथागते जिनपुत्ते दानं दत्वा अनप्पकं” (ककुसन्धबुद्धवंस, बुद्धवंस, खुद्दकनिकाय); एवं “ये तत्थासुं जिनपुत्ता सब्बे पदक्खिणमकंसु मं” (अपदान-अट्ठकथा, गन्थारम्भकथा; जातक-अट्ठकथा, नेत्तिप्पकरण-अट्ठकथा, और धम्मसङ्गणी-अट्ठकथा में भी उद्धृत)। मिलिन्दपञ्ह के मेण्डक-पञ्ह (मूल-सुत्त, खुद्दकनिकाय) में “जिनपुत्त” शब्द आठ बार प्रयुक्त हुआ है; बुद्ध-श्रावकों के लिए यह विशेषण मानो शिष्ट-सम्बोधन-रूप में स्थिर हो चुका था। नागसेन को सम्बोधित करते हुए राजा मिलिन्द कहते हैं: “साधु, भन्ते नागसेन, थोमितं जिनसासनं, जोतिता जिनपारमी…जिनपुत्तानं निब्बाहनं, एवमेतं गणिवरपवर तथा सम्पटिच्छामी” तथा “जिनपुत्तानं चक्खुं उप्पादितं” अर्थात् जिनपुत्रों की दृष्टि खुल गई। साथ ही एक अन्य प्रसङ्ग में मिलिन्द नागसेन से पूछते हैं कि “अनागतानं जिनपुत्तानं चक्खुं देहि निब्बाहनाय” अर्थात्, भावी जिनपुत्रों (भावी बौद्ध शिष्यों) के मार्ग-निर्वहण हेतु उनकी दृष्टि खोलिये। उत्तरवर्ती टीका-साहित्य में भी यह शब्द व्यापक रूप से प्रयुक्त हुआ है, यथा विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय (चूळवग्ग), नेत्तिविभावनी (सङ्गहवार-अत्थ-विभावना तथा सासनपट्ठान-विभावना), चतुरारक्खदीपनी (अप्पमादावह-प्रकिण्णक-निद्देस), एवं सिंहळ मिलिन्द-टीका (पकिण्णकथा-विवरण) आदि। महायान-साहित्य के अंतर्गत महाव्युत्पत्ति २२.५; आर्यमञ्जुश्रीमूलकल्प ३७; सद्धर्मपुण्डरीक में ये शब्द अनेकशः प्रयुक्त हुए हैं।
[96] सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथागतः ।
समन्तभद्रो भगवान्मारजिल्लोकजिज्जिनः ॥ (अमरकोश १.१.१३); बुद्धस्तु सुगतो धर्मधातुस्त्रिकालविज्जिनः ।
बोधिसत्त्वो महाबोधिरार्यः शास्ता तथागतः ॥ (हेमचन्द्र, अभिधान-चिन्तामणि २.२३२)
[97] व्रतदमयमसेवात्यागशीलाभियोगो द्विजगुरुसुरपूजा सर्वसत्त्वेषु मैत्री ।
जिनजिनसुतताराभास्कराराधनानि प्रकटितमलपापं कुष्ठमुन्मूलयन्ति ॥ (वाग्भट, अष्टांग-संग्रह २१.१३५; अष्टांग-हृदय १९.९७)
[98] “जिनो बुद्धः, जिनसुता अवलोकितेश्वरादयः।” (शशिलेखा-टीका अष्टांग-हृदय १९.९७ पर)
[99] विष्णुर्विक्रमणादेव जयनाज्जिष्णुरुच्यते ।
शाश्वतत्वादनन्तश्च गोविन्दो वेदनाद्गवाम् ॥ (महाभारत ५.६८.१३)
[100] विष्णुर्जिष्णुजनार्दनौ हरिहृषीकेशाच्युताः केशवः । (हेमचन्द्र, अभिधान-चिन्तामणि २.२१४)
[101] “जि जये” + “ग्लाजिस्थश्च क्स्नुः” (पाणिनि, अष्टाध्यायी ३.२.१३९)
[102] “जि जये” + “इण्सिञ्जिदीङुष्यविभ्यो नक्” (उणादि-सूत्र ३.२)
[103] “जिनोऽर्हद्बुद्धविष्णुषु।” (हेमचन्द्र, अनेकार्थसंग्रह २.२६९); सनातनो जिनः शम्भुर्विधिर्वेधा गदाग्रजः ।
कैटभारिरजो जिष्णुः कंसजित् पुरुषोत्तमः ॥ (हलायुध, अभिधानरत्नमाला [हलायुध-कोश] १.२५)
[104] भीमास्त्रराजिनस्तस्य बलस्य ध्वजराजिनः ।
कृतघोराजिनश्चक्रे भुवः सरुधिरा जिनः ॥ (माघ, शिशुपालवध १९.११२); “जिनो हरिः।” (मल्लिनाथ-टीका)
[105] “अनार्यनिवासेषु जनपदेषु।” (सायणाचार्य, ऋग्वेद-भाष्य ३.५३.१४ पर)
[106] “कीकटा नाम देशोऽनार्यनिवासः। कीकटा किङ्कृताः, किं क्रियाभिरिति प्रेप्सा वा।” (यास्क, निरुक्त ६.३२)
[107] “कीकटा नाम यद्यपि जनपदास्तथापि नित्याः। अथवा सर्वलोकस्थाः कृपणाः कीकटाः।” (कुमारिल भट्ट, तंत्रवार्त्तिक, मीमांसा-सूत्र १.१.३१ पर)
[108] अशनं वसनं वासो यस्य काश्याममार्गतः ।
कीकटेन समा काशी गङ्गाप्यङ्गारवाहिनी ॥ (सुभाषित)
[109] यत्र यत्र च मद्भक्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः ।
साधवः समुदाचारास्ते पूयन्तेऽपि कीकटाः ॥ (भागवत-पुराण ७.१०.१९)
[110] “कीकटा अङ्गवङ्गाद्याः — अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु सौराष्ट्रमगधेषु च ।
तीर्थयोगं विना गत्वा पुनः संस्कारमर्हति ॥” (वंशीधर, भागवत-टीका ७.१०.१९ पर)
[111] “क्रियाभिर्यागदानहोमलक्षणाभिः किं फलिष्यतीत्यश्रद्दधानाः प्रत्युत पिबत खादतायमेव लोको न पर इति वदन्तो नास्तिकाः कीकटाः।” (सायणाचार्य, ऋग्वेद-भाष्य ३.५३.१४ पर)
[112] बौद्धरूपस्त्वयं जातः कलौ प्राप्ते भयानके ।
अजिनस्य द्विजस्यैव सुतो भूत्वा जनार्दनः ॥ (भविष्य-पुराण, प्रतिसर्ग-पर्व ४.१२.२७)
[113] हविर्धानात्षडाग्नेयी धिषणाजनयत्सुतान् ।
प्राचीनबर्हिषं शुक्रं गयं कृष्णं वृजाजिनौ ॥ (विष्णुपुराण १.१४.२)
[114] मातुर्यदग्रे जायन्ते द्वितीयं मौञ्जिबन्धनात् ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशस्तस्मादेते द्विजाः स्मृताः ॥ (याज्ञवल्क्य-स्मृति १.३९)
[115] एतस्मिन्नेव काले तु कलिना संस्मृतो हरिः ।
काश्यपादुद्भवो देवो गौतमो नाम विश्रुतः ॥
बौद्धधर्मं च संस्कृत्य पट्टणे प्राप्तवान् हरिः ।
दशवर्षं कृतं राज्यं तस्माच्छाक्यमुनिः स्मृतः ॥ (भविष्य-पुराण ३.१.६.३६–३७)
[116] बलिना प्रेषितो भूमौ मयः प्राप्तो महासुरः ।
शाक्यसिंहगुरुर्गेयो बहुमायाप्रवर्तकः ॥
स नाम्ना गौतमाचार्यो दैत्यपक्षविवर्द्धकः ।
सर्वतीर्थेषु तेनैव यन्त्राणि स्थापितानि वै ॥
तेषामधो गता ये तु बौद्धाश्चासन् समन्ततः ।
शिखासूत्र-विहीनाश्च बभूवुर्वर्णसङ्कराः ॥ (भविष्य-पुराण ३.४.२१.३०–३२)
[117] “श्री वेङ्कटेश्वर प्रेस बम्बई में मुद्रित ‘भविष्यपुराण’ की प्रति में उपर्युक्त लक्षण प्रायः घटित नहीं होता। पद्यसंख्या का भी बिलकुल मेल नहीं। हो सकता है कि इसमें कुछ अंश असली भविष्यपुराण का सम्मिलित हो, तथापि यह प्रायः उपेक्षणीय है। खासकर प्रतिसर्ग पर्व तो सर्वथा अमान्य है। हमें कहते हुए दुःख होता है कि ‘आपस्तम्बधर्मसूत्र’ (२ । २४ । ५-६) आदि प्राचीन ग्रन्थों में जिस ‘भविष्यपुराण’ का ससम्मान उल्लेख मिलता है वह महामहिम उपयोगी ग्रन्थ आज अदृश्य हो रहा है।” (पुराण-दिग्दर्शन, अध्याय १५, पृ. ८३); “भविष्यपुराण चार पर्वों में मिलता है। ब्राह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग तथा उत्तर। कहीं-कहीं भविष्योत्तरपुराण की भी चर्चा पढ़ी जाती है। वराहपुराण में भविष्यपुराण का नाम आया है। किसी के मत से भविष्यपुराण साम्ब द्वारा शोधित किया गया। अपरार्क ने अपने ग्रन्थ में भविष्योत्तर नामक पुराण के एक सौ साठ श्लोकों का उल्लेख किया है। अतः लगता है कि भविष्यपुराण के विविध रूप भारत में उपलब्ध रहे होंगे। अतः यदि इस प्रतिसर्गपर्व को देखे बिना बाकी सभी पर्वों में देखता हूँ, तब यह महापुराण सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, में अपूर्ण भविष्यपुराण हस्तलिपि में संकलित है। इसमें सभी पर्वों का पूर्ण रूप नहीं मिलता। यह अपूर्ण है। लन्दन के इण्डिया ऑफिस में इसकी जो प्रति संकलित है, उसमें ‘सप्तमी व्रत कल्प’ तक की ही सामग्री होने के कारण वह अपूर्ण है। इसमें प्रतिसर्गपर्व नहीं होने का संकेत दिया गया है। बिहार के हथुआराज पुस्तकालय में भी इसकी अपूर्ण प्रति है। इस समय वेंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई, की मूल श्लोकों वाली प्रति उपलब्ध है, जिसके आधार पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, ने अपना संस्करण प्रकाशित कराया था। वेंकटेश्वर प्रेस को जो भविष्य महापुराण की प्रति मिली थी, वह प्रतिसर्गपर्व रहित थी। अमृतसर के ठाकुर चन्दर के यहाँ से प्रतिसर्गपर्व मिला था। लेकिन उसकी प्रामाणिकता जो भी हो, वेंकटेश्वर प्रेस ने उसी आधार पर अपना संस्करण इससे युक्त कर दिया।” श्रीभविष्यमहापुराणम्, प्रथम भाग, अनु. एस. एन. खण्डेलवाल (दिल्ली: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान), निवेदन।
[118] नाभादास, भक्तमाल, प्रियादास-कृत टीका सहित (गोरखपुर: गीता प्रेस), पाद-टिप्पणी पृ. ४७।
[119] विष्णुपुराण ३.१८; भागवत-पुराण २.७.३७; ११.४.२२।
[120] “अर्हन्” — हेमचन्द्र, अभिधान-चिन्तामणि २.१४९; “जिन” — अमरकोश १.१.१३।
[121] ततो दिगम्बरो मुण्डो बर्हिपिच्छधरो द्विज ।
मायामोहोऽसुरान् श्लक्ष्णमिदं वचनमब्रवीत् ॥ (विष्णुपुराण ३.१८.२)
तपस्यभिरतान्सोऽथ मायामोहो गतोऽसुरान् ।
तेषां समीपमागत्य बृहस्पतिरुवाच ह ॥
अनुग्रहार्थं युष्माकं भक्त्या प्रीतस्त्विहागतः ।
योगी दिगम्बरो मुण्डो बर्हिपत्रधरो ह्ययम् ॥ (पद्मपुराण १.१३.३४५–३४६)
[122] धर्मायैतदधर्माय सदेतन्न सदित्यपि ।
विमुक्तये त्विदं नैतद्विमुक्तिं सम्प्रयच्छति ॥
परमार्थोऽयमत्यर्थं परमार्थो न चाप्ययम् ।
कार्यमेतदकार्यं च नैतदेवं स्फुटं त्विदम् ॥
दिग्वाससामयं धर्मो धर्मोऽयं बहुवाससाम् ॥
इत्यनेकान्तवादं च मायामोहेन नैकधा ।
तेन दर्शयता दैत्याः स्वधर्मं त्याजिता द्विज ॥
अर्हतेमं महाधर्मं मायामोहेन ते यतः ।
प्रोक्तास्तमाश्रिता धर्ममर्हतास्तेन तेऽभवन् ॥
त्रयीधर्मसमुत्सर्गं मायामोहेन तेऽसुराः ।
कारितास्तन्मया ह्यासंस्ततोन्ये तत्प्रचोदिताः ॥
तैरप्यन्ये परे तैश्च तैरप्यन्ये परे च तैः ।
अल्पैरहोभिः सन्त्यक्ता तैर्दैत्यैः प्रायशस्त्रयी ॥ (विष्णुपुराण ३.१८.९–१५)
[123] पुनश्च रक्ताम्बरधृङ् मायामोहो जितेन्द्रियः ।
अन्यानाहासुरान् गत्वा मृद्वल्पमधुराक्षरम् ॥ (विष्णुपुराण ३.१८.१६)
[124] विज्ञानमयमेवैतदशेषमवगच्छत ।
बुध्यध्वं मे वचः सम्यग्बुधैरेवमिहोदितम् ॥
जगदेतदनाधारं भ्रान्तिज्ञानार्थतत्परम् ।
रागादिदुष्टमत्यर्थं भ्राम्यते भवसंकटे ॥ (विष्णुपुराण ३.१८.१८–१९)
[125] विज्ञप्तिमात्रमेवैतदसदर्थावभासनात् ।
यथा तैमिरिकस्यासत्केशचन्द्रादिदर्शनम् ॥ (विंशतिकारिका १)
[126] “आर्हतमतमुक्त्वा बौद्धमतमाह पुनश्चेति सप्तभिः। रक्तेत्येतदाचारप्रदर्शनम्।” (विष्णुपुराण (३.१८.१६ ) पर श्रीधरस्वामि-टीका)
[127] “सप्तधा ह्यनेकान्तवादिनामार्हतानां स्याद्वादः…पुनश्चेति बौद्धमतारम्भः। विज्ञानमयमिति तत्र विज्ञानमयमिति योगाचाराणामात्मख्यातिपक्षोक्तिः। जगदिति जगदेतदनाधारमिति निरधिष्ठानौ भ्रान्तिज्ञानतदर्थाविति माध्यमिकानां शून्यख्यातिपक्षोक्तिः। एवमिति बुध्यतेरावृत्तिर्बौद्धत्वनिरुक्त्यर्था। (विष्णुपुराण (३.१८.९–२५) पर विष्णुचित्त-स्वामि-टीका)
[128] “तत्स्थेम्ने प्रणीतबुद्धार्हतादिसामयिकागमः कृतागमः।…क्षपणकव्रतं हीदं यत् प्रातः प्रातः दध्योदनकबलान् गृह्णते।…शृङ्गमिव अहिंसाविडम्बनपिञ्छिका अस्य करे अस्तीति शृङ्गी।…आस्तिक्यवादिनः संविदात्मत्वप्रपञ्चमिथ्यात्वमिथ्यावादैः जितवान् इति जयन्तः।” (विष्णुसहस्रनाम ७९५, ८०२, ८०३, ८०४ पर पराशरभट्ट-टीका)
[129] स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा निर्वाणार्थमथासुराः ।
तदलं पशुघातादिदुष्टधर्मैर्निबोधत ॥ (विष्णुपुराण ३.१८.१७)
निहतस्य पशोर्यज्ञे स्वर्गप्राप्तिर्यदीष्यते ।
स्वपिता यजमानेन किं नु तस्मान्न हन्यते ॥ (विष्णुपुराण ३.१८.२८)
[130] बौद्धं धर्ममुपाश्रित्य करिष्ये धर्मदेशनाम् ।
नराणामथ नारीणां दयां भूतेषु दर्शयन् ॥
(विष्णुधर्म-पुराण ६६.६९)
[131] “नेव गावो हञ्ञिंसु, न अजेळका हञ्ञिंसु, न कुक्कुटसूकरा हञ्ञिंसु, न विविधा पाणा सङ्घातं आपज्जिंसु।” (दीघनिकाय ५, कूटदंतसुत्त)
[132] न ह्याप्तवादा नभसो निपतन्ति महासुराः ।
युक्तिमद्वचनं ग्राह्यं मयान्यैश्च भवद्विधैः ॥ (विष्णुपुराण ३.१८.३१)
[133] “सद्धा, रुचि, अनुस्सवो, आकारपरिवितक्को, दिट्ठिनिज्झानक्खन्ति— इमे खो, भारद्वाज, पञ्च धम्मा दिट्ठेव धम्मे द्वेधा विपाका।” (मज्झिमनिकाय ९५, चङ्कीसुत्त)
[134] “ननु एवं सन्ते ब्राह्मणानं अमूलिका सद्धा सम्पज्जती?” (मज्झिमनिकाय ९५, चङ्कीसुत्त)
[135] पूर्व में उद्धृत विष्णुपुराण (३.१८) के अतिरिक्त देखें—
ततस्तु सौगतं रूपं शिश्राय श्रीपतिः स्वयम् ।
अतीव सुन्दरतरं त्रैलोक्यस्यापि मोहनम् ॥ (स्कंदपुराण, काशीखंड ५८.७१)
तथा बुद्धत्वमपरं नवमं प्राप्स्यतेऽच्युतः ।
शान्तिमान्देवदेवेशो मधुहन्ता मधुप्रियः॥
तेन बुद्धस्वरूपेण देवेन परमेष्ठिना ।
भविष्यति जगत्सर्वं मोहितं सचराचरम् ॥ (स्कंदपुराण, अवंतीखंड, रेवाखंड, १५१.२१–२२)
[136] “सेय्यथापि, वासेट्ठ, अन्धवेणि परम्परसंसत्ता पुरिमोऽपि न पस्सति, मज्झिमोऽपि न पस्सति, पच्छिमोऽपि न पस्सति। एवमेव खो, वासेट्ठ, अन्धवेणूपमं मञ्ञे तेविज्जानं ब्राह्मणानं भासितं, पुरिमोऽपि न पस्सति, मज्झिमोऽपि न पस्सति, पच्छिमोऽपि न पस्सति। तेसमिदं तेविज्जानं ब्राह्मणानं भासितं हस्सकञ्ञेव सम्पज्जति, नामकञ्ञेव सम्पज्जति, रित्तकञ्ञेव सम्पज्जति, तुच्छकञ्ञेव सम्पज्जति।” (तेविज्जसुत्त, दीघनिकाय १३.५२७–५२९)
[137] यथा — “वेदन्तगू सो” (सभियसुत्त, सुत्तनिपात ३.६, गाथा ५३४); “वेदगू परिणिट्ठितो सो” (सेलसुत्त, सुत्तनिपात ३.७ = मज्झिमनिकाय ९२, गाथा ५६२); एवं “वेदगू” शब्द वसलसुत्त (सुत्तनिपात १.७) एवं परायणवग्ग (सुत्तनिपात ५) में अनेकत्र बुद्ध का अभिधान है। यहाँ ध्यातव्य है कि तेविज्जसुत्त में जिस “तेविज्ज” (त्रैविद्य) पद का पारम्परिक अर्थ बुद्ध अस्वीकार करते हैं, वहीं वे स्वयं को “तेविज्ज” कहलवाते हैं — केवल इसका पुनःपरिभाषण अपने ज्ञान-मार्ग की तीन विद्याओं के रूप में करते हैं। अतः बुद्ध का लक्ष्य वेद-निन्दा नहीं, अपितु वेद-पदावली के सम्यक् पुनःप्रयोजन का प्रतिपादन है।
[138] वेदप्रामाण्यं कस्यचित् कर्तृवादः स्नाने धर्मेच्छा जातिवादावलेपः ।
सन्तापारम्भः पापहानाय चेति ध्वस्तप्रज्ञानां पंचलिङ्गानि जाड्ये ॥ (धर्मकीर्ति, प्रमाणवार्त्तिकवृत्ति १.३४०)
“वेदों को प्रमाण मानना, ईश्वर को कर्ता मानना, तीर्थ-स्नान से धर्म की इच्छा करना, जाति का अहंकार करना, और पाप से मुक्ति के लिए तपस्या करना — ये बुद्धिहीनों के पाँच लक्षण हैं।”
[139] केचिद् विनिन्दां वेदानां देवानामपरे द्विज ।
यज्ञकर्मकलापस्य तथान्ये च द्विजन्मनाम् ॥ (विष्णुपुराण ३.१८.२५)
[140] अग्निपुराण १६.१–३ (पूर्वोक्त)
[141] देवद्विषां निगमवर्त्मनि निष्ठितानां पूर्भिर्मयेन विहिताभिरदृश्यतूर्भिः ।
लोकान् घ्नतां मतिविमोहमतिप्रलोभं वेषं विधाय बहु भाष्यत औपधर्म्यम् ॥ (भागवत-पुराण २.७.३७)
[142] धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु ।
प्रायेण सज्जते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥ (भागवत-पुराण ४.१९.२५)
[143] वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः ।
तं ह्यस्याहुः परं धर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥ (मनुस्मृति ४.१४७)
[144] धर्मशब्दो मुख्यतः स्यादन्यत्र ह्युपचारतः ।
पुराणाद्युक्तधर्माणां नानादानादिरूपणम् ॥
सुकृतत्वं वदन्त्येते न धर्मत्वं तु वैदिकाः ।
धर्मत्वं किल तेषां तु गौण्या वृत्त्या न मुख्यतः ॥ (मार्कंडेयस्मृति)
[145] त्रिष्वेतेष्वितिकृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते ।
एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥ (मनुस्मृति २.२३७)
[146] देखें मनुस्मृति (४.१४७) की टीकाएँ —
“उपधर्मः धर्मस्य समीपे उपधर्मः। समीपप्रधानस्तत्पुरुषो नाव्ययीभावः। ‘उपमानानि सामान्यवचनैरिति’ (पाणिनि-सूत्र २.१.५५) यथा धर्मान्तरनिन्दा वेदजपस्तुत्यर्था, न तन्निषेधार्था।” (मेधातिथि-टीका)
“उपधर्मोऽल्पधर्मः” (सर्वज्ञनारायण-टीका)
“ततोऽपकृष्टो धर्मः” (कुल्लूकभट्ट-टीका)
“उपधर्मः अपकृष्टधर्मो विधर्मो वा” (राघवानंद-टीका)
“अन्यो धर्म उपधर्म उच्यते” (रामचंद्र-टीका)
“तदन्यस्त्वमुख्यो धर्मस्तैरुच्यते” (गोविंदराज-टीका)
[147] धर्मबाधो विधर्मः स्यात्परधर्मोऽन्यचोदितः ।
उपधर्मस्तु पाखण्डो दम्भो वा शब्दभिच्छलः ॥ (भागवतपुराण ७.१५.१३)
[148] “उपधर्मः तु पाखण्डः वा दम्भः” (कृष्णप्रिया); “पाखण्डोऽवेदमूलकः चैत्यवन्दनादिः” (वंशीधर-टीका); “पाखण्डः वेदविरुद्धागमोक्तो धर्मः दम्भो वा परवञ्चनार्थो वा धर्मः उपधर्मः इत्यर्थः” (अन्वितार्थप्रकाशिका); “उपधर्म इति पाखण्डः वेदविरुद्धागमोक्तः दम्भो वा परवञ्चनार्थो वा उपधर्म इत्यर्थः” (वीरराघवव्याख्या); “दम्भेन क्रियमाणो धर्मो दम्भः स चोपधर्म इत्युच्यते” (विजयध्वजतीर्थ-टीका); “पाखण्डो वेदबाह्यः दम्भः सकपटः” (जीवगोस्वामि-टीका); “यः पाखण्डः जटाभस्मादिधारणमयः दम्भः स्वस्य धार्मिकत्वज्ञापनामयो वा स उपधर्मः उपमा धर्मस्योपमा न तु धर्म इत्यर्थः” (विश्वनाथ-चक्रवर्ती-टीका); “पाखण्डः वेदविरुद्धस्मृतिप्रोक्तः दम्भो वा स्वस्य धार्मिकत्वख्यापनाय प्रकाशितो वा उपमा उपधर्मः” (शुकदेव-टीका)
[149] यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥ (भगवद्गीता ९.२५)
[150] इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं धृतिः क्षमा ।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥
तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते ।
उत्तरस्तु चतुर्वर्गो महात्मन्येव तिष्ठति ॥ (हितोपदेश १.८–९)
[151] अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ (भगवद्गीता १७.१२, १८)
[152] अथातः संप्रवक्ष्यामि मार्गप्रामाण्यनिर्णयम् ।
श्रद्धया सहिता यूयं शृणुध्वं मुनिपुङ्गवाः ॥
वेदांश्च धर्मशास्त्राणि पुराणं भारतं तथा ।
वेदाङ्गान्युपवेदांश्च कामिकाद्यागमानपि ॥
कापालं वातुलं चैव तयोर्भेदान् द्विजर्षभाः ।
तथा पाशुपतं सोमं भैरवप्रमुखागमान् ॥
तेषामेवोपवेदांश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
विष्ण्वागमांस्तथा ब्राह्मान् बौद्धानार्हतागमानपि ॥
लोकायतं तर्कशास्त्रं बहुविस्तरसंयुतम् ।
मीमांसामतिगम्भीरां साङ्ख्ययोगं तथैव च ॥
अनेकभेदान्यन्यानि तथा शास्त्रान्तराण्यपि ।
निर्ममे शङ्करः साक्षात् सर्वज्ञः सङ्ग्रहेण तु ॥
…
तस्मादुक्तेन मार्गेण शिवेन कथिता अमी ।
मार्गा मानं न चामानं मृषावादी कथं शिवः ॥
महाकारुणिको देवः सर्वज्ञो निर्मलः खलु ।
तथापि वेदो मार्गाणामुत्तमः सर्वसाधकः ॥
(सूतसंहिता २२.१–६, २७–२८)
[153] “श्रुतिस्मृत्यादिभिः शैवपाशुपतबुद्धाद्यागमैः समये नानाविधा मार्गाः प्रतिपादितास्तेषामधिकारिभेदेन प्रामाण्यनिर्णयः क्रियत इत्यर्थः…श्रुतिस्मृतीहासपुराणादीनि वैदिकानि शास्त्राणि तदर्थानुसारिशैवपाशुपताद्यागमान् बुद्धार्हतादिबहुभेदभिन्नान् वेदविरुद्धांश्च सर्वज्ञः शिव एव स्वशक्त्या निर्मितवानित्यर्थः… अतः सर्वज्ञेन शिवेनैव प्रणीतत्वादेषां मध्ये कस्यचिदप्यप्रामाण्यं न युक्तमिति भावः…यस्मादुक्तप्रकारेण शिवेनैवोपदिष्टाः सर्वे मार्गास्तस्मात् तत् सर्वं प्रमाणमेव। अन्यथा मृषावादित्वप्रसङ्गादित्यर्थः।” (सूतसंहिता (२२.१–६, २७–२८) पर स्वामिविद्यारण्य-टीका)
[154] “ननु सकलश्रुतिस्मृतिपुराणादिषु वैदिकव्यतिरिक्ततन्त्राणामग्राह्यत्वप्रतिपादनात् कथं तेषां वेदान्तशास्त्रोपयोगित्वोपपादनमिति चेत् — सत्यम्; तेषु तन्त्रेषु अवान्तरतात्पर्येण तत्तन्त्रसिद्धान्ततत्वेन प्रतिपाद्यमानस्य वेदान्तविरुद्धार्थस्यैव पारमार्थिकत्वबुद्ध्या तेषामनुपादेयत्वेऽपि उक्तरीत्या तेषां तन्त्राणामपि परम्परया वेदान्तशास्त्रोपयोगित्वमिति बुद्ध्या उपादेयत्वेन तदुपपादनसंभवात्। तस्माद् बौद्धचार्वाकपाञ्चरात्रपाशुपतन्यायवैशेषिकपूर्वमीमांसासाङ्ख्ययोगतन्त्राणामप्युक्तरीत्या वेदान्तशास्त्रोपयोगित्वं संभवतीति न काप्यनुपपत्तिः। अत एवोक्तं श्रीमत्सूतसंहितायां यज्ञवैभवखण्डे द्वाविंशाध्याये — ‘अथातः संप्रवक्ष्यामि…’”
(अप्पय्यदीक्षित, व्यासतात्पर्यनिर्णय १)
[155] देवताराधनाकारान्निर्मूलाद् बुद्धिकल्पितात् ।
धर्माच्छ्रेष्ठः समाख्यातः समूलो धर्म आस्तिकाः ॥
समूलेषु च धर्मेषु बद्धागमसमन्वितः ।
धर्मः श्रेष्ठ इति प्रोक्तो मया वेदार्थपारगाः ॥ (सूतसंहिता ४.२०.१५–१६)
[156] अश्वत्थपत्रसदृशं हरिचन्दनेन
मध्ये ललाटमतिशोभनमादरेण ।
बुद्धागमे मुनिवरा यदि संस्कृतश्चेन्
मृद्वारिणा सततमेव तु धारयेच्च ॥ (सूतगीता ८.३४)
[157] बुद्धार्हतादिमार्गस्थे देवताप्रतिमासु च ।
देवताबुद्धिमात्रं यत् सोऽपि यज्ञः प्रकीर्तितः ॥ (सूतसंहिता ४.३.२१)
“बुद्धार्हतादिमार्गस्थे पुरुषे तदीयदेवताप्रतिमास्वप्यादरमकृत्वा देवताबुद्धिमात्रं समबुद्धित्वादविरुद्धं ‘शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः’ इति न्यायेनेत्याह बुद्धेति।” (सूतसंहिता (४.३.२१) पर स्वामिविद्यारण्य-टीका)
[158] Wendy Doniger O’Flaherty, The Origins of Evil in Hindu Mythology (Berkeley: University of California Press, 1976), esp. ch. 6. एच. एच. विल्सन के मूल शब्द: “We may have in this conflict of the orthodox divinities and heretical Daityas some covert allusion to political troubles, growing out of religious difference, and the final predominance of Brahmanism.” (H. H. Wilson, trans., The Vishnu Purana: A System of Hindu Mythology and Tradition, vol. 3 [London: Trübner & Co., 1866], III.18)
[159] Vladislav Serikov, “Zur Einheit der Hindu-Kultur: Buddha als Avatāra des Viṣṇu,” Journal für Religionskultur / Journal for Religious Culture, no. 147 (2010): 1–23.
[160] अथ पुनरेव बोधिसत्त्वो दक्षिणेन पाणिना शीर्षं प्रमार्ष्टि स्म। मारश्च पश्यति स्म। बोधिसत्त्वस्य हस्ते खड्ग इति दक्षिणामुखः प्रपलायते स्म। न किञ्चिदिति पुनरेव प्रतिनिवर्तते स्म। (ललितविस्तर, मारघर्षण-परिवर्त २१.८६ के पश्चात्) बोधिसत्त्व के प्रभाव से मार को ऐसी भ्रान्ति होती है कि बोधिसत्त्व के केवल अपना सिर स्पर्श करने पर उसे उनके हाथ में खड्ग दिखाई देता है और वह भयभीत होकर भाग जाता है; वास्तविकता का भान होने पर वह पुनः लौटता है। इसी प्रसंग में मार-सेना द्वारा फेंके गए पर्वत पुष्प-वितान और विमान तथा आयुध पुष्पमालाओं में परिणत हो जाते हैं।
[161] महावस्तु, तृतीय भाग, असुर-परिवर्त (राहु, वेमचित्रि और अन्य असुरेन्द्रों के धर्मान्तरण की कथा)
[162] वेदाश्च यज्ञं दानं च धर्मस्था वर्त्स्यते पुनः ।
आख्यायिकेतिहासाद्यैर्गद्यचूर्णिकवार्तिकैः ।
एवं मया श्रुतादिभ्यो लोको वै विभ्रमिष्यति ॥ (लङ्कावतार-सूत्र १०, सगाथक ७८९)
[163] “We.and T’ang: Do not hold the views maintained in the Vedas.” D. T. Suzuki, trans., The Laṅkāvatāra Sūtra: A Mahāyāna Text (London: Routledge & Kegan Paul, 1932), ch. 1, n. 12.
[164] “बाह्यार्थविज्ञानशून्यवादत्रयमितरेतरविरुद्धमुपदिशता सुगतेन स्पष्टीकृतमात्मनोऽसम्बद्धप्रलापित्वम्। प्रद्वेषो वा प्रजासु — विरुद्धार्थप्रतिपत्त्या विमुह्येयुरिमाः प्रजा इति। सर्वथाप्यनादरणीयोऽयं सुगतसमयः श्रेयस्कामैरित्यभिप्रायः॥” (ब्रह्मसूत्र (२.२.३२) पर शांकर-भाष्य)
[165] “सर्वज्ञस्य भगवतो वासुदेवस्येतिहासपुराणयोर्बुद्धत्वप्रसिद्धेस्तस्यासम्बद्धप्रलापित्वमयुक्तमित्याशङ्क्याह – प्रद्वेषो वेति । वैदिकपथविरुद्धजन्तूपलक्षणार्थं प्रजाग्रहणम् । चतुर्धापि सुगतमतस्य वैदिकैरनादरणीयत्वान्न तद्विरोधो नित्यसच्चिदात्मनो ब्रह्मणो जगत्सर्गवादिनः समन्वयस्येति निगमयति – सर्वथापीति ॥” (ब्रह्मसूत्र (२.२.३२) पर आनंदगिरि-प्रणीत-न्यायनिर्णयव्याख्या)
[166] “सुगतमतासाङ्गत्यमुपसंहरति – सर्वथेति । सर्वज्ञस्य कथं विरुद्धप्रलापः, तत्राह – प्रद्वेषो वेति । वेदबाह्या अत्र प्रजा ग्राह्याः । अतो भ्रान्त्येकमूलसुगतसिद्धान्तेन वेदान्तसिद्धान्तस्य न विरोध इति सिद्धम् ॥” (ब्रह्मसूत्र (२.२.३२) पर भाष्यरत्नप्रभाव्याख्या)
[167] विज्ञातमेव भगवन् विद्यते यद्धिताय नः ।
वञ्चयन् सुगतान् बुद्धवपुर्धारी जनार्दनः ॥
तत्प्रणीतागमालम्बैर्बौद्धैर्दर्शनदूषकैः ।
व्याप्तेदानीं प्रभो धात्री रात्रिः सन्तमसैरिव ॥
वर्णाश्रम-समाचारान् द्विषन्ति ब्रह्मविद्विषः ।
ब्रुवन्त्याम्नायवचसां जीविकामात्रतां प्रभो ॥ (विद्यारण्य, शंकर-दिग्विजय १.३०–३२)
[168] “श्रुतिः साध्वी मदक्षीवैः का वा शाक्यैर्न दूषिताः।” (शंकर-दिग्विजय १.३६); “तथागतकथा गता…।” (शंकर-दिग्विजय १०.११९)
[169] शतं कलियुगानां च हरेर्बुद्धदशाशतम् ।
शौकराजतयेवाप्तं स्मरामि मुनिनायक ॥ (योगवासिष्ठ ६.२२.१६)
“शौकः कीकटदेशविशेषस्तद्राजतया शुद्धोदनाख्यतद्राजपुत्रतयेति यावत्।” (आनन्दबोधेन्द्र सरस्वती, तात्पर्यप्रकाश-टीका, योगवासिष्ठ ६.२२.१६ पर)
[170] ऊपर, पादटिप्पणी ९० (महाभारत-तात्पर्य-निर्णय ३२.१४६) द्रष्टव्य।
[171] महाभारत-तात्पर्य-निर्णय ३२.१३४–१५५
[172] “एतेन ऐतिहासिकः शुद्धोदनसुतो बुद्धोऽन्यः, भगवदवतारभूतो बुद्धोऽन्य इति वदन्तः परास्ताः।” (महाभारत-तात्पर्य-निर्णय ३२.१४६ पर बन्नञ्जे-भाष्य)
[173] बुद्धावतार कविबद्धानुकम्प कुरु बद्धाञ्जलौ मयि दयाम् । शौद्धोदनिप्रमुखसैद्धान्तिकासुगमबौद्धागमप्रणयन ।
क्रुद्धाहितासुहृतिसिद्धासिखेटधर शुद्धाश्वयान कमला-शुद्धान्त मां रुचिपिनद्धाखिलाङ्ग निजमद्धाव कल्क्यभिध भोः ॥ (वादिराज-तीर्थ, दशावतार-स्तुति ३२)
[174] एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् ।
चकार सौगतमतं मोहायैव चकार तत् ॥
असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् ।
अतोऽसुराधिकारत्वान्न ग्राह्यं तन्मतं क्वचित् ॥
यद्यपि भगवान् बुद्धः पटुकरणः, तत्त्वज्ञानवांश्च श्रुत्यादिसिद्धः । ग्रन्थकरणादेव विवक्षुश्च । नैतावताऽप्याप्तः, विप्रलम्भकत्वात् । यथोक्तम् —
ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।
बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥
इति । अतस्तदुक्तं मोक्षस्वरूपं हेयमेवेति। (जयतीर्थ, न्यायसुधा-टीका ४.२.३२)
[175] स सर्वसत्त्वोपकृतिप्रयत्नः कृपाकुलः शाक्यकुले विशाले ।
शुद्धोदनाख्यस्य नराधिपेन्दोर्धन्यस्य गर्भेऽवततार पत्न्याः ॥
मायाभिधाना नरमाथपत्नी गर्भे हरिं विश्वगुरुं वहन्ती ।
आसन्नचन्द्रेव सुधाब्धिवेला निधानधन्येव वसुन्धराऽभूत् ॥ (क्षेमेन्द्र, दशावतार-चरित ९.२–३)
[176] नैषधीय-चरित २१.८८—९१
[177] न सन्नासन्न सदसन्न चाप्यनुभयात्मकम् ।
चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥
(ज्ञानसारसमुच्चय २८; नैषधीय-चरित २१.८८ पर प्रकाशटीका में उद्धृत। पाठ एवं विवेचन के लिए देखें Katsum.Mimaki, “Jñānasārasamuccaya kk. 20–28: ‘Mise au point’ with a Sanskrit Manuscript,” in Wisdom, Compassion, and the Search for Understanding: The Buddhist Studies Legacy of Gadjin M. Nagao (Honolulu: University of Hawai‘.Press, 2000), 233–244, विशेषतः 241)
[178] “देशादिव्यवहितवस्तुवस्तुदर्शनं, देशादिव्यवहितशब्दश्रवणम्, अतीतजन्मस्थितिस्मरणं, परचित्तज्ञानम्, अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाख्य-पञ्चक्लेशक्षयः, अणिमादिसिद्धश्चेति षडभिज्ञा ज्ञानप्रकारा यस्य।” (नैषधीय-चरित २१.८८ पर प्रकाशटीका); मिलाएँ दीघनिकाय ३४, दसुत्तरसुत्त
[179] “वेदानुसारिभिर्दैत्यैः पराभूता देवा ब्रह्माणं शरणं गताः, ब्रह्मणा प्रसादितो नारायणो बुद्धरूपेणावतीर्य दैत्यबुद्धिं वेदार्थेभ्यश्च्यावयित्वा बौद्धमतमुपदिदेश, अतस्ते देवानां जय्याः संपन्ना इति।” (नैषधीय-चरित २१.८८ पर प्रकाशटीका)
[180] “बुद्धवाक्यमपि नोपादेयं दैत्यानां मोहायैव हि तत् ।
प्रसिद्धं हि पुराणादिषु तस्माद् व्यामोहनमेव प्रयोजनम् ॥
अद्धा साक्षाद् व्यामोहनमेव प्रयोजनं तदवतारस्य पुराणादिषु प्रसिद्धां भ्रमप्रमादकरणापाटवविप्रलिप्सादिहीनो हि विवक्षुराप्तः करणापाटवाद्यभाववतोऽपि बुद्धस्य विप्रलम्भकत्वान्नाप्तत्वम्। न च हरेः परमाप्तत्वेन कथं व्यामोहकत्वं तेषां योग्यताया अदृष्टानां तादृशत्वात् तदनुसारेण व्यामोहकत्वेऽप्याप्तत्वोपपत्तेः।
ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।
बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥
इति स्मृतेः। अतस्तदुक्तो मोक्षो हेय एव।”
(श्रुतिसिद्धांतसारसंग्रह १.१०६)
[181] स्कन्द-पुराण (१.२.४०.२५६) के अनुसार मगध देश में हेमसदन और अञ्जनी के पुत्र के रूप में बुध (बुद्ध) का प्रादुर्भाव हुआ था; नेपाल-माहात्म्य (५७–६३) के अनुसार सौराष्ट्र देश में विष्णु ने बुद्ध के रूप में अवतार लिया था; रुद्रयामल-तंत्र (१७ पटल) के अनुसार चीन-स्थित भगवान् बुद्ध ने महर्षि वसिष्ठ को कुलमार्ग का उपदेश दिया था।
[182] तथापि पूजया हीनो बभूव बुद्धरूपधृक् ।
विष्णुर्वेदविरुद्धस्थमार्गसंसर्जनात् किल ॥ (मुद्गल-पुराण ८.१५.५२)
[183] बलकृष्णौ यजेद् धीमान् पुत्रकामो न संशयः ।
रूपकामो यजेद् बुद्धं कल्किनं शत्रुघातने ॥ (वराह-पुराण ४८.२३; भविष्य-पुराण, उत्तर-पर्व ८३.१२१)
[184] तत्कूपयूपयोर्मध्ये श्राद्धं कुलशतोद्धृतौ ।
महाबोधितरुं नत्वा धर्मवान् स्वर्गलोकभाक् ॥ (अग्नि-पुराण ११५.३७);
तत्कूपयूपयोर्मध्ये सर्वांस्तारयते पितॄन् ।
धर्मं धर्मेश्वरं नत्वा महाबोधितरुं नमेत् ॥ (वायु-पुराण २.४९.३३; एवं नारद-पुराण २.४५.१०३)
[185] धर्म्मारण्यपतिस्त्रिविष्टपपतिर्नित्यं भवानीपतिः
पायाद्वः स्थिरभोगयोगसुलभो देवः स धर्मेश्वरः ।
सर्वेषां हृदयानि जीवकलया व्याप्य स्थितः सर्वदा
ध्यात्वा यं न पुनर्विशन्ति मनुजाः संसारकारागृहम् ॥
(स्कंदपुराण, ब्रह्मखंड, धर्मारण्य-खंड १.११)
[186] कामेश्वरोऽसि यदि व्यक्तमनीश्वरोऽसि
धर्मेश्वरोऽहमपि पश्यसि तत्त्वतो माम् ।
कामेश्वरोऽसि यदि दुर्गतिंन प्रयासि
प्राप्स्यामि बोधिमवशस्य तु पश्यतस्ते ॥ (ललितविस्तर २१.१६६)
“सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथागतः” (अमरकोश १.१.१३)
[187] ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः ।
जगद्धितैषी सुगतः कुमारः कुशलागमः ॥ (शिवपुराण, कोटिरुद्रसंहिता ३५.७२; लिंगपुराण १.९८.९६)
[188] “नमो बुद्धाय शुद्धाय दैत्यदानवमोहिने।” (भागवत-पुराण १०.४०.२२); “नमो बुद्धाय शुद्धाय नमस्ते ज्ञानरूपिणे।” (कूर्म-पुराण १.६.१५); “नमो बुद्धाय शुद्धाय योगिनां गुरवे नमः।” (कूर्म-पुराण १.१०.४९); “नमो बुद्धाय शुद्धाय नमो युक्ताय हेतवे।” (कूर्म-पुराण २.४४.६१); “नमो बुद्धाय शुद्धाय कल्कये म्लेच्छनाशिने।” (स्कन्द-पुराण, अवन्तीखण्ड, अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य ४२.१४); “नमो बुद्धाय शुद्धाय सकृपाय नमो नमः।” (पद्म-पुराण, क्रियाखण्ड ११.९४); “नमोऽस्तु बुद्धदेवाय कल्किने च नमो नमः।” (पद्म-पुराण, उत्तरखण्ड ३०.१३)
[189] भूम्यादिलोकत्रितयं सन्तृप्तात्मानमात्मनि ।
पश्यन्ति निर्मलं शुद्धं तमीशानं भजाम्यहम् ॥ (नारद-पुराण १.२.४४, पाठभेद — “निर्मलं बुद्धम्”)
[190] पूजयेत् कमलैर्देवि मद्भक्तः संयतेन्द्रियः ।
मत्स्यं कूर्मं वराहं च नरसिंहं च वामनम् ॥
रामं रामं च कृष्णं च बुद्धं चैव च कल्किनम् ।
एवं दशावतारांश्च पूजयेद्भक्तिसंयुतः ॥ (वराह-पुराण २११.६८–६९)
[191] शुद्धोदनस्य पुत्रोऽभूत् स्वयं देवो जनार्दनः ।
भुक्त्वा राज्यश्रियं सोऽथ गतिं परमकां गतः ॥ (चण्डेश्वर ठाकुर, कृत्यरत्नाकर, पृ. २४८)
[192] अष्टाविंशतिमे प्राप्ते विष्णुः कलियुगे सति ।
शाक्यान् विनष्टधर्मांश्च बुद्धो भूत्वाऽप्रवर्त्तयत् ॥ (चण्डेश्वर ठाकुर, कृत्यरत्नाकर, पृ. १५९–१६०)
[193] “शुद्धोदनेन बुद्धोऽभूत् स्वयं पुत्रो जनार्दनः।” (हेमाद्रि, चतुर्वर्ग-चिन्तामणि, व्रतखण्ड १५)
[194] अथातः संप्रवक्ष्यामि बौद्धमन्त्रं महाफलम् ।
सभ्यत्वान्न द्विजातीनामधिकारोऽस्ति कर्हिचित् ॥
वाममार्गरता विप्राः कुण्डका जातिविच्युताः ।
हीना वैदिकसंस्कारैः प्रमादान्म्लेच्छतां गताः ॥
गोलकाश्च तथा जात्या कायस्थादय एव च ।
बौद्धं विष्णुं समाराध्य भुक्तिं मुक्तिं प्रयान्ति ते ॥
पतितानामयं मन्त्रः सम्प्रोक्तः सुखदायकः ।
नमो भगवते बुद्ध संसारार्णवतारक ।
कलिकालादहं भीतः शरण्यं शरणं गतः ॥ (मेरुतंत्र २६.१३९४–१३९७)
(इस लेख का एक अंश २१ अगस्त २०२६ को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में “लिविंग-रामायण” संगोष्ठी के अंतर्गत लेखक द्वारा दिए गए व्याख्यान “त्रिपिटक वाङ्मय और वाल्मीकीय-रामायण” में प्रस्तुत किया गया था। पूर्व में श्री सचित वार्ष्णेय ने इस शोध में सहायता प्रदान की थी, जिसके लिए लेखक उनके प्रति कृतज्ञ हैं।)
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बिहार में जन्मे कुशाग्र अनिकेत न्यू यॉर्क, अमेरिका में अर्थशास्त्र और प्रबंधन-विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। कुशाग्र ने अर्थशास्त्र, गणित, और सांख्यिकी में स्नातक की शिक्षा न्यू यॉर्क के कॉर्नेल विश्वविद्यालय से पूरी की, जहाँ उन्हें विश्वविद्यालय के सर्वोच्च अकादमीय सम्मान से पुरस्कृत किया गया। तत्पश्चात् वे कोलंबिया विश्वविद्यालय से प्रबंधन-शास्त्र (MBA) में सर्वोच्च सम्मान से उत्तीर्ण हुए। कुशाग्र तीन भाषाओं (अंग्रेज़ी, हिंदी, एवं संस्कृत) में अपने गद्य और पद्य लेखन के लिए भारत और सयुंक्त-राज्य में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं। उन्होंने नित्यानंद मिश्र के सह-लेखन में Krishna-Niti: Timeless Strategic Wisdom (२०२४) नाम की चर्चित पुस्तक लिखी है। सम्प्रति वे भारतीय शिलालेखीय साहित्य पर शोध कर रहे हैं। |





भारतीय ज्ञान परंपरा और इतिहास-पुराणों के सूक्ष्म अनुशीलन पर आधारित यह अत्यंत विचारोत्तेजक एवं प्रामाणिक आलेख है!
कुशाग्र अनिकेत जी ने जिस बौद्धिक तटस्थता और अकादमिक अनुशासन के साथ ‘गौतम बुद्ध और बुद्धावतार’ के अंतर-संबंधों की पड़ताल की है, वह वास्तव में सराहनीय है।
आलेख की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल सतही मान्यताओं या भावुक तर्कों पर आश्रित न होकर अमरकोश की प्राचीन टीकाओं (क्षीरस्वामी, लिंगयसूरि आदि), त्रिपिटक, महायान सूत्रों (जैसे ललितविस्तर), और औपनिवेशिक काल के प्राथमिक दस्तावेज़ों (सर विलियम जोन्स के उद्बोधन) के ठोस प्रमाणों पर आधारित है।
औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसा (colonial epistemology) ने किस प्रकार भारतीय परंपरा में अपवर्जक (mutually exclusive) दृष्टिकोण को रोपा और कैसे १८वीं शताब्दी के पूर्व की स्वाभाविक समन्वयात्मक धारा को भ्रमित किया—इसकी परत-दर-परत विवेचना अत्यंत आंखें खोलने वाली है।
इतने गहन विषय को १९४ फुटनोटों के साथ प्रस्तुत करना लेखक की शोध-निष्ठा को दर्शाता है। इस उत्कृष्ट और दिशा-निर्देशक आलेख को पाठकों के समक्ष लाने के लिए अरुण देव जी और ‘समालोचन’ मंच को हार्दिक धन्यवाद!
Amazing clarity & deep research! This is the most definitive work on the Buddhavatar, the ninth Dashavatar and the Historical Shakya Muni, Lord Buddha. Very well articulated with evidence from scriptures & history. This should put to rest all the theories on the duality of the two. Amazed at the author’s multidisciplinary command & powerful, evidence-backed approach.
लेख पूरा पढ़ा। लेखक ने अपनी प्रस्थापना अच्छी तरह सिद्ध की है। लेकिन अभी के भारत में यह प्रस्थापना ही प्रायः अज्ञात है। कुछ किताबें लिख चुकने के बाद भी कम से कम मैंने तो अबतक नहीं सुना था कि विष्णु अवतारी बुद्ध और शुद्धोदन-पुत्र सिद्धार्थ गौतम, दो सर्वथा अलग, व्यक्तिगत पहचानें हो सकती हैं। व्यावहारिक यथार्थ यह है कि वैष्णव मत पिछले डेढ़ हजार वर्षों से भारत की सर्वाधिक अनुदारवादी, जाति-पांति, ऊंच-नीच, छुआछूत में विश्वास करने वाली धारा है, जबकि बौद्ध मत की सभी धाराएं और उपधाराएं जन्मना पहचानों को सिरे से उपेक्षणीय मानती आई हैं। लंबे सह-अस्तित्व में विविध दबावों के बीच दोनों में जब-तब कुछ न कुछ आपसी तालमेल हुए होंगे और एक छोर द्वारा दूसरे छोर को खुद में समाहित कर लेने की कोशिशें भी हुई होंगी। लेकिन तेरहवीं सदी ईसवी में बौद्ध धर्म के भारत में समूल नाश के बावजूद दोनों की मूल सामाजिक और दार्शनिक प्रस्थापनाएं अपने निहितार्थ में प्राचीन काल की तरह ही एक-दूसरे के विरुद्ध अक्षुण्ण बनी हुई हैं।
यदि पुरातात्विक दृष्टि से देखें तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि बुद्धावतार शाक्यमुनि गौतम बुद्ध ही हैं। प्रमाण स्वरूप श्रावस्ती स्थित जेतवन विहार से विष्णु अवतार के रूप में गौतम बुद्ध की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। यह वही स्थान है जहां गौतम बुद्ध ने अपने जीवन का सर्वाधिक समय व्यतीत किया था।
आपका और मेरा मत समान है, शौद्धोदनि बुद्ध साक्षाद् हरि हैं इसमें कोइ सन्देह नहीं।
हरि ने अन्य बुद्धावतार अलग-अलग कल्पों में भी लिए हैं इसके लिए अच्छा प्रमाण मिलता है।
एक श्रीमद्भागवत का श्लोक है जिसमें बुद्ध का वर्णन भूतकाल में दिया गया है, और एक बुद्ध का भाविरूपेण वर्णन है। ‘बहुभाष्यत औपधर्म्यम्’ यहाँ यदि अडागम का लोप मान कर बहु अभाष्यत ऐसा रूप समझें तो यह भूतविवक्षा में प्रयोग है।
अन्यत्र विष्णु-पुराण में और दूसरे स्थानों पर मायामोहरूप बुद्ध का वर्णन है – यह बुद्ध असुरमोहार्थ प्रकट हुए थे और तदनन्तर अवतारलीला को समेट लिया।
Dear Sri. Kushagra,
I just completed reading your wonderful paper and thanks a lot for writing it and sharing the same here. I think you have not spared any effort to cullout proofs from numerous texts for this valuable paper and the whole writing is lucid, pointed and objective. Please accept my heartfelt congratulations and I look forward to more such writings from you.
Dear Kushagra,
I just read your interesting review. In Odisha (from where I come), Jayadeva’s dashAvatAra is pretty popular, the ninth incarnation is given to the Buddha. The Buddha is equated to Sri Jagannatha in the local lore (fifteenth century). You may check the literature of Buddhism in Odisha.
Well written article, goes into detail and proves that Buddhavatara Vishnu and Gautama Buddha are the same.
अत्यन्त ज्ञानवर्धक और गम्भीर विवेचन। लेखक को साधुवाद। वत्स
An important scholarly critical engagement by Kushagra Aniket. Thank you for writing this.
Excellent essay. Enjoyed reading it.