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समालोचन

Home » घेराबंदी और अन्य कविताएँ: फ़रीद ख़ाँ

घेराबंदी और अन्य कविताएँ: फ़रीद ख़ाँ

by arun dev
May 22, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 7 mins read
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घेराबंदी और अन्य कविताएँ: फ़रीद ख़ाँ
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तुम उनकी घेरेबन्दी में हो
फ़रीद ख़ाँ

लोकतंत्र में एक ऐसा भी समय आता है जब तंत्र लोक के सिर पर चढ़ कर सवारी करने लगता है. यह दमन का वह दौर होता है जिसमें नागरिकों को मौलिक अधिकारों से वंचित करने और कर्तव्य के नाम पर कुछ भी सहने को मजबूर किया जाता है. जो कई बार अदृश्य तरीके से होता है और कई बार अति सूक्ष्म. संजय कुंदन का नया कविता-संग्रह ‘घेराबन्दी और अन्य कविताएँ’ दमन की इस सूक्ष्मता को उजागर करता हैं. मानो सभी कविताएँ माईक्रोस्कोप की हैसियत रखती हों.

संजय कुंदन

जब सत्ता दमन को दमन की तरह नहीं बल्कि लोकतंत्र की तरह जनता के सामने प्रक्षेपित करती है तो देश में एक ऐसी माया की रचना होती है जिसमें सांप सांप नहीं रस्सी दिखाई देती है और कई बार इसके विपरीत भी. ऐसे में यथार्थ की पहचान सिर्फ़ एक प्रतिबद्ध कवि के द्वारा ही की जा सकती है.

एक प्रतिबद्ध कवि किसी मज़दूर की तरह चुपचाप भीगे हुए ईंटों की तरह भीगे हुए शब्दों से कविता का निर्माण करता है. उसमें उसके ख़ून और पसीने की मेहनत भी लगती है.

जैसे कमज़ोर लोगों का ख़ून पसीना लगा है शहर में
मैं भी कविता को सींचता रहूँगा अपनी तरह से.
[कमज़ोर की ताक़त]

साहित्य की प्रतिबद्धता को साहित्य उत्सवों से निरंतर चुनौती मिल रही है. ये कविताएँ उस कवि की हैं जो साहित्य में बढ़ती लोकप्रियतावाद की चकाचौंध से दूर रह कर अपनी साधना कर रहा है, उस विनम्र मज़दूर की तरह जो पूरे शहर का निर्माण तो कर देता है पर कभी उसका श्रेय नहीं लेता. एक प्रतिबद्ध कवि असल में कविता का मज़दूर ही होता है. अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा असल में अपनी राजनीति की घोषणा भी है. कवि किस जगह खड़े होकर दुनिया को देख रहा है, इसको लेकर दुविधा की कोई स्थिति नहीं है.

दुकान पर बैठी वह महिला मुझे
बिलकीस बानो जैसी लगी
उससे दूध का पैकेट लेता हुआ
मैं उसकी सलामती की दुआ करने लगा.
[कविता है तो]

कवि की आशंका निर्मूल नहीं है कि सत्ता ने जिस तरह बिलकीस बानो को दमन का रूपक बना दिया है वह सिर्फ़ रूपक नहीं है, बल्कि दूसरी तमाम औरतों के लिए वह कभी भी सच्चाई में बदल सकती है, बदलती रही है. ऐसे में कवि होना एक ऐसी यातना का चुनाव करना है जिसे कबीर ने बरसों पहले कहा था –

सुखिया सब संसार है, खावे अरु सोवे
दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवे.

कवि ही सोच सकता है कि फ़िलिसतीन में जो बम गिर रहे हैं वह कहीं बहुत दूर नहीं बल्कि उसके पड़ोस में ही गिर रहे हैं. इतिहास के माध्यम से हम जानते हैं कि हमारा देश भी जनसंहार से अछूता नहीं रहा है. किसी का मारा जाना मानो एक सरकारी परियोजना है कि किसी को नाम पूछ कर मारा जा सकता है तो किसी को सिर्फ़ इसलिए कि हत्यारे का मन हुआ कि थोड़ा मनोरंजन के लिए किसी को मार दें. हत्या और बलात्कार के बाद फूल मालाओं से सम्मान के ‘गारंटी कार्ड’ बंट चुके हैं. ऐसे में एक कवि कैसे अपने चिकित्सक को बताए कि उसकी नींद क्यों उड़ चुकी है और क्यों उसका रक्तचाप ‘अकारण’ ही बढ़ने लगता है. प्रत्यक्ष रूप से उसके अपने जीवन में तो कोई तकलीफ़ नहीं है. जबकि इसके उलट तथाकथित ‘शरीफ़’ आदमी चलते फिरते ज़हर उगलता है और चैन की नींद सोता है, यही इस समय का ‘न्यू-नॉर्मल’ है. इस ‘न्यू-नॉर्मल’ में एक व्यक्ति जिसके अंदर ‘इमपैथी’ भरी है, वह इस प्रतिरोध के सहारे ही जीवित है कि वह कविता लिखता है.

इस संग्रह की कविताओं से इस बात का अनुभव होता है कि राष्ट्र-राज्य अपने अदृश्य और अपरिभाषित दमन का निरंतर चलने वाला चक्र बना कर रखता है जिसकी स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है. इस अदृश्य और अपरिभाषित दबाव में एक ऐसा तबका आकार ले रहा है जिसमें हर कोई अकेला है. जिसका परिवार है वह भी और जिसके दोस्त हैं वह भी. उनके साथ अगर कुछ है तो बस अविश्वास और ग़लत समझे जाने की शंका है [अकेले लोग].

फ़ासीवाद-नाज़ीवाद सबसे पहले जनता को एक ऐसी भीड़ में तब्दील करता है जिसमें सबके चेहरे एक जैसे होते हैं, एक जैसी उनकी भाषा होती है, यहाँ तक कि एक अदृश्य परियोजना के तहत खान, पान और स्वाद भी एक जैसे कर दिए जाते हैं. पूरा देश सियारों के झुण्ड की तरह एक ही सुर में हूआं हूआं करता हुआ प्रतीत होता है. हर व्यक्ति सड़क पर लुढ़कते हुए हथगोले की तरह किसी भी क्षण फट पड़ने को निकला है. अगर आपको बच कर चलना है तो हाशिये पर चलना होगा.

लगता है
एक ही आयुध कारख़ाने में बने हथगोले
सड़कों पर लुढ़क रहे हों
कभी भी हो सकता है विस्फोट
[एक ही सुर]

असहमति जहाँ जानलेवा बन चुकी है वहाँ सहमति भी कम यातनादायी नहीं है. आख़िर कोई कब तक सहमत होता रहेगा ? किस-किस बात पर सहमत होता रहेगा ? क्या एक दिन उसका धैर्य नहीं टूटेगा ? धैर्य नहीं टूटेगा तो क्या वह भीतर से नहीं टूटेगा ? आख़िर वह इंसान है, उसके पास बुद्धि है. जर्मन कवि ब्रेख्त ने ‘सहमत’ व्यक्ति के बारे में अलग तरह से लिखा है –

जनरल, आदमी कितना उपयोगी है
वह उड़ सकता है और मार सकता है.
लेकिन उसमें एक नुक्स है –
वह सोच सकता है.
[मूल जर्मन से हिन्दी अनुवाद – मोहन थपलियाल]

उपरोक्त कविता के लगभग अस्सी साल बाद भारत में एक कवि को उसी नाज़ीवाद का अनुभव होता है जिसका अनुभव ब्रेख्त ने किया था और दोनों कवियों ने ‘सोचने’ वाले व्यक्ति की बात की है. लेकिन अलग–अलग तरह से. वह ‘सोचने’ वाला व्यक्ति कभी तो अपनी हालत देख कर बीमार भी पड़ेगा ? यह अलग बात है कि कोई उसका कारण नहीं जान पाएगा न ही वह बता भी पाएगा. पर कब तक वह सहन करेगा ? क्या इस तरह सहते रहने से वह स्वस्थ रह पाएगा?

हो सकता है वह एक बेहद डरा हुआ आदमी हो
जिसे उच्च रक्तचाप ने नहीं
लम्बी चुप्पी ने पहुँचा दिया होगा इस हाल में
या हर हाल में सहमत बने रहने के आतंक ने
[बीमार शहर]

डॉक्टर से नींद की गोली लिखवाते हुए
मैं उससे नहीं कह सकता था कि
मेरी अनिद्रा का सम्बन्ध ट्रेन में हुई एक हत्या से है
जो मैंने नहीं देखी
और मृतक मेरा कोई नहीं था
बस उसके बारे में सिर्फ़ अख़बार में पढ़ा था
[कविता है तो]

संजय कुंदन की ये कविताएँ प्रतिरोध की आदिम परंपरा से जुड़ती हैं.

1936.  August Landmesser. from Wikipedia

नाज़ी जर्मनी की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर दिखाई देती है जिसमें हिटलर-भक्तों की भीड़ में ‘अगस्त लैंडमेसर’ नाम का एक सिपाही हाथ आगे करके ‘नाज़ी-सलाम’ नहीं करने पर अडिग दिखाई दे रहा है. कितना मुश्किल रहा होगा उसके लिए हिटलर की आँधी में अकेले खड़े रहना यह हमको दूर हिन्दुस्तान में कविता से समझ में आता है –

जब मेरा एक पड़ोसी मुझसे पूछता है कि
मैं एक नायक की जय क्यों नहीं बोल रहा
तो उसके नथुने एक थानेदार की तरह ही
फड़क रहे होते हैं
[घुसपैठिया]

असहमति जताने वालों से हर जगह अदालतें लगा–लगा कर पूछे जा रहे हैं सवाल और उनके साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है मानो वह इस देश के न होकर कोई घुसपैठिया हों. हम कविता पढ़ते हैं हिन्दी की और हमें समझ में आता है जर्मन ‘अगस्त लैंडमेसर’ की मानसिक यातना.

नाच रहे सत्ता के लाडले लाठियाँ भाँजते हुए
तलवारें लहराते हुए, गंडासा उछालते हुए
उनके चेहरे से टपक रहा विजय दर्प
[विजेताओं का नृत्य]

कहीं भी अदालतें लगाना, अदालतों के बाहर इंसाफ़ करना, जो उनके साथ न हो उसे पाकिस्तान भेजना, यह तभी संभव होगा जब कोई ‘सत्ता का लाडला’ हो. उसे उद्दंडता की खुली छूट मिली होती है. वरना आप अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतर कर देख लीजिये. पानी – बिजली की मौलिक समस्या को लेकर आवाज़ उठा कर देख लीजिये. सत्ता से लेकर अदालतों तक से आपको परजीवी की संज्ञा से संबोधित किया जाएगा. इस तरह सत्ता व्यवस्था यह मानती है कि आपके कोई अधिकार नहीं बल्कि अधिकार केवल उन्हीं के हैं जो उनके साथ हैं और उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं कि उन्होंने अपने ‘नृत्य’ से किस तरह शहर की गति को ठप्प कर रखा है.

सत्ता व्यवस्था ने अभिव्यक्तियों के तमाम माध्यमों को भी ठप्प कर रखा है. चाहे वह बॉलीवुड का सिनेमा हो या बॉलीवुड बनता हुआ साहित्य. यह एक अदृश्य और अपरिभाषित अँधेरा है.

महोत्सवों से
दक्षिणा गिनते इस तरह लौटते लेखकगण
जैसे लौट रहे हों राजसूय यज्ञ से ब्राह्मण.
[फ़ासिस्ट समय में उत्सव]

असहमति की हर आवाज़ के विरुद्ध
छेड़ दिया गया है युद्ध
[बुलडोज़र]

ताकत हुंकार भरती है
बुलडोज़र के धड़धड़ाते पहियों में.
[बुलडोज़र]

जिस बुलडोज़र को कविता में व्यंजना और रूपक की तरह आना चाहिए था उसे सत्ता ने हथिया लिया है. इसलिए कविता में वह अभिधा की तरह आता है. वरिष्ठ कवि कुमार अम्बुज की टिप्पणी देखते हैं –

“विकास और सभ्यता की ओट में पनप रही बर्बरताओं को संजय कुंदन अपनी कविता से समक्ष करते हैं. नेहरू, बुलडोज़र, दंगाई, घुसपैठिया, हत्यारे, फ़ासीवाद, उत्सव, किसान आन्दोलन, जैसी संज्ञाओं, विशेषणों, क्रियाओं और सन्दर्भों के ज़रिये वे अपने बदलते देश की नये सिरे से शिनाख्त करते हैं”. [‘घेराबंदी और अन्य कविताएँ’ (2026) के ब्लर्ब का अंश]

हम मध्यवर्गीय लोगों [जो किसी आन्दोलन से बहुत दूर खड़े हैं] में से बहुत सारे लोग समाज में अलग थलग पड़ने की यातना झेल रहे हैं पर हमारी यातनाओं की उन सामाजिक कार्यकर्ताओं की यातनाओं के आगे क्या बिसात है जो काल कोठरी में बंद कर दिए गए हैं या उनकी यातना के आगे जिन्हें ‘कपड़ों से पहचाना जाता है’ और केवल उसी को आधार बना कर उन्हें जेल में डाल दिया जा सकता है. हमारे अकेलेपन के आगे उनका अकेलापन कहीं बड़ा और भारी है जिन्हें बिना किसी मुकदमे के जेल में बंद रखा जाता है. हम उनके लिए क्या कर सकते हैं –

मैं चाहता हूँ उनके बारे में किसी से बात करूँ
कहूँ कि वे हमारे अपने लोग हैं
कहूँ कि उनका हौसला टूटा नहीं है
कहूँ कि वे लौट कर आएँगे हम सबके बीच

पर किससे बात करूँ
सब चुप रहना चाहते हैं.
[डरावनी हँसी]

जो चुप रहना चाहते हैं अक्सर वे एक राक्षसी हँसी हँसते हैं पर बड़ी शराफ़त से, बड़ी शालीनता से. वे कोई और नहीं हमारे ही पढ़े लिखे दोस्त, पड़ोसी और संबंधी हैं. वे कॉकरोच नहीं हैं, उनके पास रोज़गार है, उनका अपना कारोबार, वे किसी भी शक्तिशाली व्यक्ति और संस्थान से कोई सवाल नहीं करते.

हर दंगे के बाद
वे दफ़्तरों, रेस्तराओं और अपने परिवार में बैठकर
बात करते हैं
यू नो, इन लोगों ने गंद मचा रखी है देश में
इन्हें इसी तरह मारा जाना चाहिए.
[शरीफ़ दंगाई]

ये ‘शरीफ़ दंगाई’ हर आन्दोलन की वैधता पर सवाल उठाते हैं. वे उन अफ़वाहों के वाहक होते हैं जिनमें किसी महिला आन्दोलनकारी के चरित्र का हनन किया जाता है या किसानों को पाकिस्तानी एजेंट बता देश के बाकी हिस्से में रहने वालों को उनके ख़िलाफ़ भड़काया है.

राजधानी में सवाल उठ रहा है
कि किसानों ने धोती
क्यों नहीं पहन रखी है मैली-कुचैली,
क्यों नहीं है उनका गमछा तार-तार,
जैसा दीखता है किताबों में ?
[सवाल है कि]

राजधानी में रहने वाले ‘शरीफ़ दंगाई’ एक ऐसे प्रोपेगेंडा सेल में तब्दील हो चुके हैं जहाँ आप कैसा भी कपड़ा पहनें, पर अगर आपने सरकार से कोई सवाल किया तो वे आपके कपड़े उतार लेंगे.

कपड़े पहनते हुए अचानक ख़याल आया कि
कुछ लोगों की शिनाख्त सिर्फ़ उनके कपड़ों से होगी
और सन्दिग्ध घोषित किया जाएगा
हो सकता इसी कारण डाल दिया जाए
काल कोठरी में
[डरावनी हँसी]

“यह ठीक इस समय, इस देश, काल और क्षण की कविता है, जिसके केंद्र में मनुष्य सबसे अधिक है, एक ऐसा ‘अच्छा भला’ मनुष्य, जिसकी संवेदना को मनुष्य-विरोधी राजनीति, सामाजिक पाखंडों और भूमंडलीय बाज़ार द्वारा लगातार ख़राब किया जा रहा है, जो अपना अंतस तानाशाहों के पास गिरवी रखने को विवश है और लोकतंत्र, स्वाधीनता, मानवीय अच्छाई को नष्ट किये जाते हुए देखने के बावजूद उससे मुठभेड़ करने में असमर्थ है”.

[मंगलेश डबराल, ‘तनी हुई रस्सी पर’ (201९) के ब्लर्ब का अंश]

पूर्वग्रह से ग्रस्त समाज चाहे कितने भी रसातल में हो पर निरंतर चलने वाला प्रोपेगेंडा जब उनकी नफ़रत को पुष्ट करता है तो लोग भूल जाते हैं कि भूमंडलीकरण की आंधी में उनका अपना घर बर्बाद हो गया है. वह आंधी उनका सम्मान, उनके संबंध और उनकी भावना सब उड़ा ले गई पर जब – जब उनके मोबाइल पर ख़बर आती है कि पड़ोसी मुल्क बर्बाद हो रहा है, इससे भी ज़्यादा कि पड़ोसी मुल्क को बर्बाद किया जा रहा है तो उनका सारा विषाद, उनकी भूख – प्यास उनके लिए बेमानी हो जाती है और ख़ुशी में बमबम हो जाते हैं [बुढ़ऊ]. ऐसे ही समाज का एक शरीफ़ दंगाई, जो ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के अनुशासन में रहता है, जिसे लोग ‘संस्कारी पुरुष’ मानते हैं, वह जब भीड़ को संबोधित करता है तो मुँह से आग निकलती है. ऐसे ही आग से आज से पचीस छब्बीस साल पहले ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चे को ज़िन्दा जला दिया गया था.

उनके एक भाषण के बाद
उग्र भीड़ ने फूँक डाला
एक विधर्मी को
उस संस्कारी पुरुष ने देखा उस आग को
हवन की पवित्र अग्नि की तरह.
[संस्कारी पुरुष]

पौराणिक गाथा की चर्चित पात्र होलिका का दहन और उसकी राख से खेली जाने वाली होली हमारे समय की राजनीतिक सच्चाई है. काल बदल गए, पात्रों के नाम बदल गए पर कथा वही है. इस परिदृश्य में ‘नूर मोहम्मद’ का सांप्रदायिक तनाव के बीच भी सामान्य व्यवहार लोगों को चकित करता है. ऐसे असामान्य परिस्थिति में सामान्य व्यवहार ही प्रतिरोध है और इस तरह ‘नूर मोहम्मद’ अपनी विकल्पहीनता में प्रतिरोध का रास्ता निकाल लेता है.

दिल्ली आई आई टी के रिटायर प्रोफ़ेसर वी के त्रिपाठी जब फ़िलिसतीन और वहाँ के बच्चों के पक्ष में सड़कों पर खड़े हो कर बोलते हैं तो उनकी ही उम्र के दूसरे रिटायर लोग उन्हें रोकते हैं, कहते हैं कि आप भारत में रह कर ग़ज़ा की बात क्यों करते हैं ? मानो भारत में रह कर ग़ज़ा की बात करना भारत के साथ ग़द्दारी करना है. पर असलियत यह है कि वे लोग जानते हैं कि जो ग़ज़ा की बात कर रहा है वह कभी भी अपने देश और अपने देश के बच्चों की भी बात कर सकता है. वे अपने बच्चों के अंधकारमय भविष्य पर बात नहीं कर सकते, इस वजह से उन्हें रोकते हैं. एक अदृश्य सत्ता लोगों को ‘ज़ौम्बी’ बना देती है जो मरे तो नहीं होते पर ज़िंदा भी नहीं होते और दूसरों को अपने जैसा बना देना चाहते हैं.

बच्चों का ग़ायब होना कोई मुद्दा नहीं है
सरकारी स्कूलों का बन्द होते जाना कोई मुद्दा नहीं है
एक मासूम का मज़दूरी करना कोई मुद्दा नहीं है
मुद्दा बस यह है कि ग़ज़ा के बच्चों पर बात न हो
[वे किनके बच्चे हैं]

हमारा वर्तमान ही हमारा भविष्य है या भविष्य कुछ और होने वाला है ?

बीसवीं सदी में वरिष्ठ कवि अरुण कमल की एक कविता ‘दुःस्वप्न’ ने एक ऐसे डिसटोपिया की रचना की थी जिसमें न्यूट्रॉन बम गिरने के बाद वातावरण से ऑक्सीजन ग़ायब हो जाता है और केवल उनका ही अस्तित्व बचता है जो निर्जीव हैं. इक्कीसवीं सदी में एक ऐसा ही डिसटोपिया संजय कुन्दन रचते हैँ कि दुनिया पर बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद का जो बम गिरा है उसमें चाहे कुछ भी हो पर ‘पानी नहीं होगा’. यहाँ पानी तथ्य भी है और रूपक भी कि आँख का पानी भी नहीं होगा और चेहरे का पानी भी नहीं होगा और अगर पानी नहीं होगा तो जीवन भी कैसे होगा ? यह कविता यह अभी अनुभव कराती है कि जिसे हम भविष्य समझ रहे थे वह हमारा वर्तमान है. बीसवीं सदी का डिसटोपिया भविष्य की आशंका था पर इक्कीसवीं सदी का डिसटोपिया इक्कीसवीं सदी का वर्तमान है.

संजय कुंदन की कविताएँ वृहत्तर से सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतर से वृहत्तर की यात्रा करती हुई प्रतीत होती है. ‘संयुक्त परिवार’, ‘नर्स’, ‘शोषित’, ‘माइग्रेन’, ‘देह पर बात मत करो स्त्री’, ‘बीमार आदमी की पत्नी’, ‘अमरता’, ‘सफल स्त्री को देखकर’, ‘सोसाइटी की चाचियाँ’, ‘मैं संदिग्ध ही रहूँगा’, ‘पितरों की याद’, ‘पिता : पुनर्पाठ’ आदि – आदि ऐसे कुछ उदाहरण हैं.

कविता में केवल एक शब्द भी आपको छोटे से बड़े फलक पर पहुँचा देता है और आपकी राजनीतिक दिशा भी स्पष्ट कर देता है. ‘शोषित’ में कवि अपनी शोषित बहनों को याद करते हुए कहता है –

हम मानकर चल रहे थे
वे बेहद ख़ुश हैं
पाँच किलो राशन पर पलने वाले
लोगों की तरह.

परिवार में लड़कियों के शोषण से निकली बात को एक कविता ही पाँच किलो अनाज देकर राज सत्ता के शोषण तक पहुँचा सकती है. जहाँ ग़रीबों [दलित, स्त्री, अल्पसंख्यक या कोई भी कमज़ोर तबका] पर ही विकास में बाधा डालने के आरोप लगाए जाते हैं. जैसे जिनके पास सोना खरीदने की हैसियत नहीं उन्हें ही सोना नहीं खरीदने की नसीहतें दी जाती हैं. जिनके पास प्रचलित खाद्य का अभाव है उनको ही ‘ऑर्गनिक फ़ूड’ खाने की नसीहतें मिल रही है, ‘रोटी नहीं है तो केक खाओ’ की तर्ज़ पर.

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने जब मान लिया कि बेरोज़गार नौजवान और सामाजिक कार्यकर्ता कॉकरोच की तरह होते हैं तो एक तरह से सत्ता व्यवस्था यह मान रही है कि नौजवानों, बेरोज़गारों, सामजिक कार्यकर्ताओं और असहमति व्यक्त करने वालों को ऐसी गन्दगी में धकेला जा चुका है जहाँ सिर्फ़ कॉकरोच ही जीवित रह सकते हैं. संजय कुंदन की कविताएँ इन्हीं कॉकरोच बना दिए गए लोगों के लिए लड़ती हैं और इस लड़ाई में युवा कवियों को हाथ हिला कर बुलाती हैं.

पर सुकून मिला यह जानकर
कि तुम भी उन्हीं किताबों और
सपनों की सोहबत में हो
जिनसे झिलमिलाती रहती थी
हमारी तरुणाई
[युवा साथी]

यह संग्रह यहाँ से प्राप्त करें.

फ़रीद ख़ाँ मुंबई में रहते हैं और टीवी तथा सिनेमा के लिए पट कथाएं आदि लिखते हैं.  ‘गीली मिट्टी पर पंजों के निशान’ (कविता-संग्रह); ‘मास्टर शॉट’ (कहानी-संग्रह); ‘अपनों के बीच अजनबी’ (कथेतर गद्य) आदि प्रकाशित.
kfaridbaba@gmail.com
Tags: 20262026 समीक्षाघेराबंदी और अन्य कविताएँफ़रीद ख़ाँसंजय कुंदन)
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Comments 1

  1. कैलाश बनवासी says:
    4 weeks ago

    संजय कुंदन के इस संग्रह की कविताएं, हमारे आज का सीधा,सच्चा और जोखिम लेकर कहें गए बयान है ।देश की, लोगों की जैसी दशा, किंकर्तव्यविमूढ़ता ही नहीं बल्कि आपके मत के प्रति गहरी असहिष्णुता और नफ़रत,जो आम हो चला है,उसकी अकथनीय पीड़ा इन कविताओं में दिखाई देती हैं। समीक्षक फरीद खां ने इन्हें जिस शिद्दत से महसूस किया है, समीक्षा जैसे इन कविताओं के समानांतर हमारे समय का सबसे जरूरी जिरह बन गयी है। उन्होंने इन कविताओं के बहाने जो हमारे वर्तमान और भविष्य का जो खाका खींचा है, और गहरी विडंबना व्यक्त की है कि क्या यह वर्तमान ही हमारा भविष्य है?
    संजय जी को इस जरुरी संग्रह के लिए,फरीद जी को ऐसी उम्दा समीक्षा के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई।
    समालोचन को यहां प्रकाशित करने धन्यवाद।

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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