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समालोचन

Home » गिलगमेश : मिट्टी पर लिखी अमरता : विजयशंकर चतुर्वेदी

गिलगमेश : मिट्टी पर लिखी अमरता : विजयशंकर चतुर्वेदी

by arun dev
July 20, 2026
in आलेख
Reading Time: 8 mins read
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गिलगमेश : मिट्टी पर लिखी अमरता : विजयशंकर चतुर्वेदी
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गिलगमेश
मिट्टी पर लिखी अमरता


विजयशंकर चतुर्वेदी

सभ्यताओं की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वे अपने स्वर्णयुग में नहीं बोलतीं. वे तब बोलती हैं, जब उनके नगर धूल हो चुके होते हैं, राजमहल खंडहर बन चुके होते हैं और साम्राज्य इतिहास की धुंध में खो चुके होते हैं. उस समय बोलती है केवल मिट्टी. वह मिट्टी, जिसने मनुष्य के पदचिह्नों को, उसके भय को, उसकी महत्वाकांक्षाओं को और उसके सपनों को हजारों वर्षों तक अपने भीतर सुरक्षित रखा. पुरातत्त्ववेत्ता जब धरती की पहली परत हटाता है, तब वह केवल ईंटें, अस्थियाँ या मिट्टी के बर्तन नहीं खोज रहा होता; वह मनुष्य की स्मृति का सबसे पुराना द्वार खोल रहा होता है.

मनुष्य का इतिहास उन प्रश्नों का इतिहास है, जिन्हें पूछने का साहस उसने पहली बार किया. वह क्षण कब आया होगा, जब किसी मनुष्य ने पहली बार अपने किसी प्रियजन की मृत्यु देखी होगी और उसके भीतर यह प्रश्न उठा होगा— क्या सब कुछ यहीं समाप्त हो जाता है? क्या समय मनुष्य से अधिक शक्तिशाली है? क्या स्मृति मृत्यु से बड़ी हो सकती है?

सभ्यता का वास्तविक जन्म शायद इसी प्रश्न से हुआ था. नगर बाद में बने, राजसत्ताएँ बाद में आईं, धर्मग्रंथ बाद में लिखे गए; लेकिन मृत्यु के सामने खड़े मनुष्य का विस्मय सबसे पहले जन्मा.

इन्हीं प्रश्नों के साथ मैं सिंधु सभ्यता की ओर लौटता रहा हूँ. हड़प्पा और मुआनजोदाड़ो की मुहरों को देखते हुए बार-बार यह अनुभूति होती है कि हम अपने अतीत को नहीं, अपने मूल्यवान मलबे को पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सिंधु की यह यात्रा एक दिन मुझे उससे भी पश्चिम ले गई— टिगरिस और यूफ्रेटीज़ (दज़ला-फ़रात) की घाटी में, उस भूमि पर जहाँ मिट्टी की तख्तियों पर मनुष्य ने अपनी सबसे प्राचीन महागाथा लिखी.

अलेक्ज़ेंडर हाइडेल की पुस्तक ‘द गिलगमेश इपिक एंड ओल्ड टेस्टामेंट पैरेलल्स’ मेरे हाथ लग चुकी थी. उसे पढ़ते हुए लगा कि किसी महाकाव्य का नहीं, मनुष्य की पहली दार्शनिक बेचैनी का विश्लेषण पढ़ रहा हूँ.

गिलगमेश का महाकाव्य केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वह विश्व के सबसे प्राचीन महाकाव्यों में शुमार है. उसका महत्व इसलिए भी नहीं है कि उसमें जलप्रलय की ऐसी कथा मिलती है जिसकी प्रतिध्वनि बाद में बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट और आज जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ तक सुनाई देती है. उसका सबसे बड़ा महत्व यह है कि यहाँ मनुष्य पहली बार अपनी सीमाओं से टकराता दिखाई देता है. वह बहुत शक्तिशाली होते हुए भी मृत्यु के सामने उतना ही असहाय है जितना आज का मनुष्य. पाँच हजार वर्षों की दूरी अचानक समाप्त हो जाती है. मिट्टी की तख्तियों पर अंकित कीलाक्षर हमारे समय की भाषा बन जाते हैं.

यहीं से एक दूसरा प्रश्न जन्म लेता है. क्या सभ्यताएँ केवल वस्तुओं का व्यापार करती थीं? क्या सिंधु से सुमेर तक केवल ताँबा, मनके, लकड़ी और कपास की यात्रा होती थी? या उनके साथ कथाएँ भी चलती थीं? क्या जलप्रलय की स्मृतियाँ भी समुद्री हवाओं के साथ एक तट से दूसरे तट तक पहुँचीं? क्या मनुष्य का मृत्यु-बोध भी सभ्यताओं के बीच संवाद करता रहा? इन प्रश्नों के उत्तर सरल नहीं हैं.

मेरा प्रयोजन केवल इतना है कि हम गिलगमेश को उसके ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और दार्शनिक संदर्भों में समझें, यह देखें कि वह बाइबिल से किस प्रकार संवाद करता है; और फिर भारतीय दृष्टि से विचार करें कि सिंधु, सुमेर, मिस्र, चीन और भारत जैसी प्राचीन सभ्यताओं के बीच कौन-से प्रश्न ऐसे थे जो मनुष्य को समान रूप से व्याकुल करते थे. क्योंकि सभ्यताओं का इतिहास किसी न्यायालय का मुक़दमा नहीं है. और क्योंकि संभव है कि सभ्यताओं की सबसे बड़ी समानता उनके उत्तरों में नहीं, उनके प्रश्नों में रही हो.

शायद यही कारण है कि गिलगमेश आज भी जीवित है. वह मृत्यु को पराजित नहीं कर सका. उसने अमृत नहीं पिया. उसने देवताओं का सिंहासन नहीं छीना. फिर भी वह जीवित है, क्योंकि उसने अपनी कहानी मिट्टी को सौंप दी थी. समय साम्राज्यों को नष्ट कर सकता है, लेकिन मिट्टी अक्सर मनुष्य से अधिक विश्वसनीय इतिहासकार सिद्ध होती है.

 

The Deluge tablet of the Gilgamesh epic in Akkadian by British Museum

गिलगमेश : एक महाकाव्य की कथा

किसी भी महाकाव्य का वास्तविक परिचय उसके दर्शन से नहीं, उसकी कथा से होता है. विचार तो धीरे-धीरे खुलते हैं, पर कथा पहले पाठक का हाथ पकड़ती है. गिलगमेश के साथ भी यही है. यदि उसके दार्शनिक अर्थों पर विचार करने से पहले उसकी कथा को न समझा जाए, तो उसकी समूची वैचारिक संरचना अधूरी रह जाती है. इसलिए यह जान लेना आवश्यक है कि उरुक का यह राजा कौन था, उसके जीवन में एन्किदु क्यों आया और ऐसी कौन-सी घटना घटी जिसने एक विजेता शासक को मृत्यु और अमरत्व के प्रश्नों से जूझने के लिए विवश कर दिया.

महाकाव्य के अनुसार गिलगमेश उरुक का राजा था. वह असाधारण शक्ति, साहस और प्रतिभा का स्वामी था. उसके बारे में कहा गया कि वह दो-तिहाई देवता और एक-तिहाई मनुष्य था. यह अनुपात ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि उस युग की कल्पना का संकेत है, जिसके माध्यम से यह बताया गया कि वह सामान्य मनुष्य नहीं था. उसने विशाल नगर-प्राचीरों का निर्माण कराया, उरुक को समृद्ध बनाया और अपने समय का सबसे शक्तिशाली शासक माना गया. किंतु उसके भीतर शक्ति के साथ अहंकार भी था. वह अपने अधिकारों की कोई सीमा नहीं मानता था. उसकी प्रजा उससे प्रभावित भी थी और भयभीत भी. अंततः लोगों की प्रार्थना देवताओं तक पहुँची और उन्होंने यह निश्चय किया कि गिलगमेश के सामने उसके समान बलशाली प्रतिद्वन्द्वी खड़ा किया जाए.

यहीं एन्किदु का प्रवेश होता है. वह नगर का मनुष्य नहीं था. वह जंगलों में पशुओं के साथ रहता था. उसे सभ्यता के नियमों का ज्ञान नहीं था. वह प्रकृति की सहजता का प्रतिनिधि था. देवताओं की योजना थी कि गिलगमेश और एन्किदु का संघर्ष होगा और इस संघर्ष में राजा का अहंकार टूटेगा. हुआ भी यही. दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन उस युद्ध का परिणाम किसी की पराजय नहीं, बल्कि एक विलक्षण मित्रता के रूप में सामने आया. यही मित्रता पूरे महाकाव्य का सबसे मानवीय और सबसे मार्मिक पक्ष है. दोनों मिलकर ऐसे अभियानों पर निकलते हैं जिनका उद्देश्य केवल पराक्रम का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने समय की सीमाओं को लाँघना है.

उनकी पहली बड़ी चुनौती देवदारु वन के रक्षक हुंबाबा से होती है. यह वन देवताओं के संरक्षण में माना जाता था और वहाँ प्रवेश करना ही असाधारण साहस का काम था. गिलगमेश और एन्किदु वहाँ पहुँचते हैं, हुंबाबा का वध करते हैं और विजयी होकर लौटते हैं. इस विजय के बाद गिलगमेश का यश चारों ओर फैल जाता है. किंतु यही सफलता आगे चलकर उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी का कारण बनती है.

उरुक लौटने पर प्रेम और सौंदर्य की देवी इश्तर गिलगमेश को अपना प्रेम प्रस्ताव देती है. गिलगमेश उसे अस्वीकार कर देता है और उसके पूर्व प्रेमियों की दुर्दशा का उल्लेख करते हुए उसका उपहास करता है. अपमानित इश्तर क्रोधित होकर देवताओं से स्वर्ग में रहने वाले वृषभ को पृथ्वी पर भेजने की प्रार्थना करती है. यह दिव्य वृषभ विनाश मचाता है, किंतु गिलगमेश और एन्किदु मिलकर उसका भी वध कर देते हैं. यही वह क्षण है जब देवताओं को लगता है कि मनुष्य अपनी सीमा भूलने लगा है. वे निर्णय करते हैं कि इस अपराध का दंड अवश्य दिया जाना चाहिए, और दंड के लिए एन्किदु को चुना जाता है.

महाकाव्य का सबसे हृदयविदारक प्रसंग यहीं से आरम्भ होता है. एन्किदु एक भयानक रोग से ग्रस्त हो जाता है. धीरे-धीरे उसका शरीर क्षीण होने लगता है और अंततः वह गिलगमेश की आँखों के सामने प्राण त्याग देता है. इस मृत्यु ने गिलगमेश के भीतर कुछ ऐसा तोड़ दिया जिसे कोई युद्ध नहीं तोड़ पाया था. उसने पहली बार अनुभव किया कि मृत्यु केवल दूसरों के लिए नहीं है. वह स्वयं भी उसी नियति की ओर बढ़ रहा है. उसके विलाप में केवल मित्र-वियोग का दुःख नहीं है, बल्कि अपने ही भविष्य का भय भी छिपा हुआ है. यही वह क्षण है जहाँ यह महाकाव्य वीरगाथा से बदलकर मनुष्य की आत्मिक यात्रा बन जाता है.

एन्किदु की मृत्यु के बाद गिलगमेश सब कुछ छोड़कर अमरत्व की खोज में निकल पड़ता है. उसे ज्ञात होता है कि उत्नापिष्टिम नाम का एक पुरुष है जिसे महाप्रलय के बाद देवताओं ने अमरत्व प्रदान किया था. यदि संसार में किसी के पास मृत्यु के रहस्य का उत्तर है, तो वही है. इस आशा के साथ गिलगमेश कठिन यात्राएँ करता है, पर्वतों को पार करता है, अंधकारमय सुरंगों से गुजरता है और अंततः उस स्थान तक पहुँचता है जहाँ उत्नापिष्टिम रहता है.

उत्नापिष्टिम उसे महाप्रलय की कथा सुनाता है कि कैसे देवताओं ने पृथ्वी को जलमग्न करने का निश्चय किया, कैसे उसे एक नौका बनाने का आदेश मिला, कैसे उसने अपने परिवार, जीव-जंतुओं और जीवन के बीजों को बचाया और कैसे जल उतरने के बाद उसे अमरत्व का वरदान मिला. किंतु वह साथ ही यह भी स्पष्ट कर देता है कि अमरत्व कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हर मनुष्य प्राप्त कर सके. हालाँकि, विदा होते समय वह गिलगमेश को समुद्र की गहराइयों में उगने वाले एक अद्भुत पौधे का रहस्य बता देता है, जिसके बारे में विश्वास था कि वह वृद्धावस्था को दूर कर सकता है.

गिलगमेश अथक प्रयास के बाद उस पौधे को प्राप्त कर लेता है. उसे लगता है कि उसकी यात्रा अब सफल हो जाएगी. लेकिन नियति का निर्णय कुछ और था. विश्राम के एक क्षण में एक सर्प उस पौधे को खा जाता है और अपनी केंचुल छोड़कर आगे बढ़ जाता है. गिलगमेश खाली हाथ रह जाता है. महाकाव्य का यह दृश्य अत्यंत प्रतीकात्मक है. प्रकृति स्वयं को बार-बार नया कर सकती है, लेकिन मनुष्य उस अर्थ में अमर नहीं हो सकता. उसके हाथ से पौधा छिन जाता है, पर उसके हाथ में एक और चीज़ आ जाती है. अनुभव.

जब गिलगमेश उरुक लौटता है, तो उसके पास अमरत्व नहीं है. वह किसी चमत्कारी औषधि के साथ वापस नहीं आता. वह लौटता है अपने नगर की प्राचीरों के पास, जिन्हें कभी उसने बनवाया था. अब वह उन्हें एक विजेता की दृष्टि से नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य की दृष्टि से देखता है जिसने जीवन का सबसे कठिन सत्य स्वीकार कर लिया है. उसे समझ में आ जाता है कि मनुष्य शरीर से नहीं, अपने कर्मों, अपने निर्माण, अपनी संस्कृति और अपनी स्मृतियों में जीवित रहता है.

 

 

सभ्यताओं की स्मृति और मनुष्य की पहली बेचैनी

मिट्टी का अपना स्वभाव होता है. वह मनुष्य की तरह बोलती नहीं, इसलिए हमें भ्रम होता है कि वह मौन है. परन्तु पृथ्वी का मौन भी एक भाषा है. उसमें साम्राज्यों के उत्थान-पतन की आहटें दर्ज रहती हैं, राजाओं की महत्वाकांक्षाएँ सुरक्षित रहती हैं, साधारण मनुष्यों की दिनचर्या भी बची रहती है और कभी-कभी किसी कवि का हृदय भी. इतिहास की सबसे विश्वसनीय पुस्तकें काग़ज़ पर नहीं, मिट्टी में लिखी गई हैं.

उन्नीसवीं शताब्दी का यूरोप प्राचीन संसार की खोज में जैसे एक विचित्र उन्माद से भरा हुआ था. मिस्र के पिरामिड, ट्रॉय के अवशेष, असीरिया के खंडहर. हर ओर धरती की परतों के नीचे दबे हुए अतीत को बाहर निकालने की बेचैनी थी. यह केवल पुरातत्त्व नहीं था; यह आधुनिक मनुष्य का अपने खोए हुए बचपन की ओर लौटना था. विज्ञान आगे बढ़ रहा था, औद्योगिक क्रांति संसार का चेहरा बदल रही थी, लेकिन उसी समय यूरोप की चेतना बार-बार पीछे मुड़कर पूछ रही थी कि हमारी शुरुआत कहाँ हुई?

इसी बेचैनी ने कुछ लोगों को मेसोपोटामिया की ओर भेजा. टिगरिस नदी के किनारे फैले हुए मिट्टी के ऊँचे-ऊँचे टीलों को स्थानीय लोग सदियों से देखते आए थे. उन्हें वे केवल पुराने खंडहर लगते थे. किसी को अनुमान नहीं था कि इन मौन टीलों के भीतर मनुष्य की सबसे प्राचीन गाथाएँ सो रही हैं.

1840 के दशक में जब ऑस्टिन हेनरी लेयार्ड ने निनेवेह के खंडहरों में व्यवस्थित उत्खनन आरम्भ किया, तब उनका उद्देश्य किसी महाकाव्य की खोज करना नहीं था. वे एक साम्राज्य के अवशेष खोज रहे थे. बाद में होर्मुज़्द रसम और अन्य पुरातत्त्वविदों ने भी उसी कार्य को आगे बढ़ाया. मिट्टी के भीतर से हजारों की संख्या में कीलाक्षर-लिखित तख्तियाँ निकलने लगीं. वे न तो किसी पुस्तक की तरह बँधी हुई थीं और न ही किसी सुव्यवस्थित अभिलेखागार की तरह सुरक्षित. वे टूटी हुई थीं, जली हुई थीं, बिखरी हुई थीं. समय ने उन्हें नष्ट करने का हर संभव प्रयास किया था. बाद में स्पष्ट हुआ कि इनका बड़ा भाग अश्शूरबनिपाल के विशाल पुस्तकालय से आया था, जहाँ ज्ञान को सत्ता का एक महत्त्वपूर्ण आधार माना जाता था.

लेकिन असली चमत्कार अभी होना बाकी था. क्योंकि इतिहास में कुछ घटनाएँ युद्धभूमि पर नहीं, अध्ययन-कक्षों में घटित होती हैं. यह भी ऐसी ही एक घटना थी.

कल्पना कीजिए कि एक मेज़ पर मिट्टी के सैकड़ों टुकड़े रखे हैं. किसी पर तीन पंक्तियाँ हैं, किसी पर दस. कहीं शब्द अधूरा है, कहीं पूरा अनुच्छेद गायब है. कोई टुकड़ा निनेवेह से आया है, कोई सिप्पर से, कोई उरुक से. वे एक-दूसरे से हजारों वर्षों और सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पर बिखरे हुए थे. अब प्रश्न यह था कि क्या इन्हें फिर से पढ़ा जा सकता है? क्या इन बिखरी हुई आवाज़ों से कोई कथा फिर जन्म ले सकती है?

यहीं आधुनिक विद्वत्ता का सबसे सुंदर अध्याय आरम्भ होता है.

भाषाविदों ने पहले कीलाक्षर लिपि को पढ़ना सीखा. फिर पुरातत्त्वविदों ने तख्तियों की पहचान की. उसके बाद असिरियाविदों ने अलग-अलग स्थलों से मिले टुकड़ों का मिलान किया. किसी तख्ती का टूटा हुआ वाक्य दूसरी जगह मिले टुकड़े से पूरा हुआ. किसी पात्र का नाम तीसरे स्रोत से स्पष्ट हुआ. दशकों की साधना के बाद धीरे-धीरे एक महाकाव्य अँधेरे से बाहर आने लगा. यह किसी खोई हुई पुस्तक की खोज नहीं थी; यह मनुष्य की स्मृति का पुनर्जन्म था.

इस पूरी प्रक्रिया में जॉर्ज स्मिथ का नाम विशेष रूप से स्मरणीय है. जब उन्होंने जलप्रलय से संबंधित अंश को पढ़ा, तो उन्हें उसमें बाइबिल के नोहा  की प्रतिध्वनि सुनाई दी. उस खोज ने विद्वानों की दुनिया में हलचल मचा दी. पहली बार पश्चिम को यह एहसास हुआ कि बाइबिल से भी कहीं अधिक प्राचीन साहित्यिक परंपराएँ मेसोपोटामिया की मिट्टी में सुरक्षित थीं. बाद के वर्षों में अनेक दूसरी तख्तियाँ मिलीं, नए संस्करण सामने आए और विद्वानों ने मिलकर उस महाकाव्य का अधिक पूर्ण पाठ तैयार किया जिसे आज हम गिलगमेश के नाम से जानते हैं.

लेकिन मुझे इस पूरी कहानी में सबसे अधिक विस्मित करने वाली बात कुछ और लगती है. हम प्रायः कहते हैं कि पुरातत्त्व अतीत की खोज है. मुझे लगता है कि यह परिभाषा अधूरी है. पुरातत्त्व वास्तव में विश्वास की खोज है. विश्वास इस बात का कि मनुष्य की कहानी इतनी मूल्यवान है कि पाँच हजार वर्ष बाद भी कोई उसे पढ़ना चाहेगा.

सोचिए, यदि उन अज्ञात लिपिकारों ने गीली मिट्टी पर अपने कीलाक्षर न उकेरे होते, यदि उन्होंने यह विश्वास न किया होता कि शब्द समय से अधिक टिकाऊ हो सकते हैं, तो आज गिलगमेश हमारे सामने न होता. वह केवल एक राजा होता, जिसका नाम किसी राजसूची में दबकर रह जाता. लेकिन साहित्य ने उसे इतिहास से बड़ा बना दिया.

यहीं से मेरे भीतर एक दूसरा प्रश्न जन्म लेता है.

क्या सभ्यता का वास्तविक आरम्भ नगर-निर्माण से हुआ था? या उस क्षण से, जब मनुष्य ने पहली बार यह निर्णय लिया कि उसका अनुभव केवल उसके जीवन तक सीमित नहीं रहेगा, वह अगली पीढ़ियों तक जाएगा?

यदि यह दूसरा उत्तर सही है, तो मिट्टी की वे तख्तियाँ केवल लेखन का प्रारम्भ नहीं हैं. वे मानव अमरता का पहला सांस्कृतिक प्रयोग हैं. हाइडेल की पुस्तक पढ़ते हुए जब आप निनेवेह के उन खंडहरों की कल्पना करेंगे, तो वहाँ सबसे पहले कोई राजा दिखाई नहीं देगा. दिखाई देगा एक अनाम लिपिकार, गीली मिट्टी पर शब्द उकेरता हुआ. उसे नहीं पता कि उसका साम्राज्य नष्ट हो जाएगा. उसे नहीं पता कि उसकी भाषा एक दिन मृत भाषा कहलाएगी. उसे यह भी नहीं पता कि हजारों वर्ष बाद कोई भारतीय लेखक उसके लिखे हुए शब्दों के सहारे अपनी ही सभ्यता के प्रश्नों को नए सिरे से समझने की कोशिश करेगा. फिर भी वह लिखता है. शायद इसलिए कि मनुष्य की सबसे बड़ी आकांक्षा अमर होना नहीं, याद रखा जाना है.

 

 

एक राजा नहीं, पहला बेचैन मनुष्य

निनेवेह के खंडहरों से मिट्टी की तख्तियाँ बाहर आ चुकी थीं. विद्वानों ने उनके बिखरे हुए वाक्यों को जोड़कर एक महाकाव्य का रूप दे दिया था. अब पहली बार संसार उस व्यक्ति से मिलने जा रहा था, जिसका नाम पाँच हजार वर्षों से अधिक समय तक समय की धूल में दबा रहा—गिलगमेश. इस महाकाव्य में जो सबसे बड़ी लड़ाई चलती है, वह किसी दूसरे राज्य से नहीं, समय से है. यही वह क्षण है जहाँ गिलगमेश इतिहास से निकलकर दर्शन में प्रवेश करता है.

हम प्रायः प्राचीन महाकाव्यों को युद्धों के कारण याद रखते हैं. इलियड में ट्रॉय का युद्ध है. महाभारत में कुरुक्षेत्र है. रामायण में लंका का युद्ध है. लेकिन गिलगमेश का सबसे बड़ा युद्ध किसी बाहरी शत्रु से नहीं है. उसका सबसे बड़ा युद्ध उस सत्य से है, जिसे हर मनुष्य जानता है लेकिन स्वीकार नहीं करना चाहता—मृत्यु.

और आश्चर्य यह है कि यह युद्ध गिलगमेश तब तक लड़ना शुरू नहीं करता, जब तक उसके जीवन में एन्किदु नहीं आता. मुझे लगता है कि इसी मोड़ पर इस महाकाव्य का वास्तविक नायक बदल जाता है. एन्किदु केवल एक पात्र नहीं है. वह सभ्यता का दर्पण है. वह जंगल से आता है. वह प्रकृति का मनुष्य है. वह पशुओं के बीच रहता है. उसके भीतर सत्ता की महत्वाकांक्षा नहीं है. वह नगर का नागरिक नहीं, पृथ्वी का पुत्र है. और शायद इसी कारण देवताओं ने उसे गिलगमेश के सामने खड़ा किया. क्योंकि केवल शक्ति, शक्ति को नहीं बदलती; मनुष्यता बदलती है.

गिलगमेश और एन्किदु की मित्रता विश्व-साहित्य की सबसे विलक्षण घटनाओं में से एक है. दो शक्तिशाली पुरुषों का मिलना यहाँ केवल साहस का प्रसंग नहीं बनता; वह आत्म-परिवर्तन की प्रक्रिया बन जाता है. पहली बार गिलगमेश अपने अतिरिक्त किसी दूसरे मनुष्य के लिए जीना सीखता है. पहली बार उसे अपने बराबर कोई दिखाई देता है. पहली बार वह अकेला नहीं रहता.

और फिर… एन्किदु मर जाता है. महाकाव्य का सबसे गहरा घुमाव भी यहीं है. ध्यान दीजिए कि गिलगमेश स्वयं नहीं मरता. मरता उसका मित्र है. लेकिन उसी में गिलगमेश को अपनी मृत्यु दिखने लगती है.

आज भी हम अपनी मृत्यु को कभी सीधे नहीं देखते. हम उसे दूसरों की मृत्यु में पहचानते हैं. किसी प्रियजन का जाना केवल उसका जाना नहीं होता; उससे हमारे भीतर यह बोध जागता है कि एक दिन हमारी अनुपस्थिति भी इसी संसार का हिस्सा होगी. आख़िर गिलगमेश का महाकाव्य आज भी मुझे आधुनिक क्यों लगा? इसलिए कि हमारे समय का मनुष्य भी मृत्यु से नहीं, मृत्यु की चेतना से संघर्ष करता है.

मनुष्य अस्पताल बनाता है. औषधियाँ खोजता है. रक्त और डीएनए की जाँच करता है. छापाखाना का आविष्कार करता है. इंटरनेट एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित करता है. डिजिटल स्मृतियाँ सुरक्षित रखता है. लेकिन इन सबके पीछे एक ही पुराना प्रश्न छिपा है—क्या समय को हराया जा सकता है?

पाँच हजार वर्ष पहले गिलगमेश इसी प्रश्न के साथ निकल पड़ा था. आज का मनुष्य भी उसी प्रश्न के साथ प्रयोगशालाओं में बैठा है. तकनीक बदल गई है, मगर प्रश्न नहीं बदला. जाहिर है, गिलगमेश केवल प्राचीन साहित्य का पात्र नहीं रह जाता, बल्कि उस परंपरा का आरंभिक बिंदु दिखाई देने लगता है जिसे आधुनिक दर्शन में अस्तित्ववादी प्रश्न कहा गया.

अब मुझे गिलगमेश अचानक सार्त्र, कामू और दोस्तोयेव्स्की के बहुत निकट दिखाई देने लगता है. इसलिए नहीं कि वे एक-दूसरे को जानते थे; इसलिए कि मनुष्य की मूल बेचैनी समय से स्वतंत्र है. अस्तित्ववाद बीसवीं शताब्दी में दर्शन के रूप में अवश्य प्रकट हुआ, लेकिन उसका पहला कंपन शायद उसी दिन पैदा हो गया था, जब उरुक का एक राजा अपने मित्र के शव के सामने खड़ा होकर पूछ रहा था—”यदि वह मर सकता है, तो मैं क्यों नहीं?”

यहीं से महाकाव्य किसी पहाड़ी नदी की तरफ अचानक मुड़ कर गति पकड़ लेता है और आत्मा की यात्रा बन जाता है. गिलगमेश अमरत्व की खोज में निकलता है. लेकिन मेरे खयाल से वह भय से मुक्ति खोजने निकल पड़ा है. ये दोनों बातें अलग हैं. जो मृत्यु से डरता है, वह अमर होना चाहता है. जो मृत्यु को समझ लेता है, उसे अमर होने की आवश्यकता नहीं रहती.

अब मुझे कठोपनिषद का नचिकेता याद आता है. गिलगमेश और नचिकेता एक-दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर हैं, अलग सांस्कृतिक संसारों में हैं, लेकिन दोनों की जिज्ञासा समान है—मृत्यु क्या छीनती है, और क्या नहीं छीन सकती?

यहाँ किसी का प्रभाव पड़ने या समयरेखा की बात नहीं है. कहना यह है कि मनुष्य की महान सभ्यताएँ अंततः उन्हीं प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जिन्हें कोई भी सभ्यता अकेले अपना नहीं कह सकती. शायद इसी कारण गिलगमेश आज भी हमारा समकालीन है. इसलिए भी कि उसने पहली बार स्वीकार किया—शक्ति सीमित है. राज्य सीमित हैं. जीवन सीमित है. लेकिन प्रश्न…?

प्रश्न सीमित नहीं होते. वे सभ्यताओं की सीमाएँ पार करते हैं. वे भाषाएँ बदल लेते हैं. वे देवताओं के नाम बदल लेते हैं. फिर भी जीवित रहते हैं. और शायद यही कारण है कि पाँच हजार वर्ष बाद भी जब हम गिलगमेश को पढ़ते हैं, तो हमें किसी प्राचीन राजा की नहीं, अपनी ही आवाज़ सुनाई देती है.

The king-hero Gilgamesh battling the ‘Bull of Heaven’.

जलप्रलय: स्मृति, मिथक या इतिहास?

यदि गिलगमेश का महाकाव्य केवल एन्किदु की मृत्यु तक सीमित रहता, तो वह मनुष्य के अस्तित्व की एक महान कथा होता. लेकिन महाकाव्य यहीं नहीं रुकता. वह एक ऐसे प्रसंग की ओर मुड़ता है जिसने पिछले डेढ़ सौ वर्षों से इतिहासकारों, धर्मशास्त्रियों, पुरातत्त्वविदों और मिथक-विशेषज्ञों को बराबर आकर्षित किया है—जलप्रलय.

यहीं गिलगमेश की भेंट होती है उत्नापिष्टिम से. वह मनुष्य, जिसे देवताओं ने महाप्रलय के बाद अमरत्व प्रदान किया.

पहली दृष्टि में यह एक अद्भुत कथा है. यह मनु और नोहा की कथाओं के साथ कथ्यगत समानता रखती है. कथाओं की संरचना, घटनाओं का क्रम और अनेक बिंदु इतने निकट हैं कि लंबे समय से विद्वानों के बीच यह प्रश्न बना हुआ है कि इनके बीच संबंध क्या है? यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि किसने, किससे, क्या लिया. सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि कोई विकराल बाढ़ मानव चेतना में इतनी गहराई तक क्यों धँस गई?

यदि हम केवल गिलगमेश, बाइबिल और भारत की मनु-प्रलय कथा को देखें, तो हमें लगेगा कि यह एक सांस्कृतिक संयोग है. लेकिन ऐसा नहीं है. चीन की प्राचीन परंपराओं में भी महान बाढ़ का उल्लेख मिलता है. यूनानी परंपरा में ड्यूकैलियन की कथा है. भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के अनेक आदिवासी समुदायों की मौखिक परंपराओं में भी किसी न किसी रूप में महाजल की स्मृतियाँ सुरक्षित हैं.

क्या यह संभव है कि पृथ्वी के अलग-अलग भागों में रहने वाले मनुष्यों ने एक जैसी कल्पना कर ली?

संभव है.

क्या यह भी संभव है कि हिमयुग के अंत, समुद्र-स्तर में वृद्धि, नदियों के भीषण उफान या क्षेत्रीय महाबाढ़ों की तबाहियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिथक का रूप लेती चली गई हों?

यह भी संभव है.

और क्या यह भी संभव है कि मेसोपोटामिया और सिंधुघाटी जैसी नदी-आधारित सभ्यताओं में बार-बार आने वाली विनाशकारी बाढ़ों ने एक ऐसी सांस्कृतिक स्मृति निर्मित कर दी हो, जिसने बाद के धार्मिक आख्यानों को प्रभावित किया?

यह संभावना भी गंभीर अध्ययन का विषय रही है. हमारे यहाँ मनु की कथा केवल विनाश की कथा नहीं है. वह पुनर्सृष्टि की कथा भी है. प्रलय यहाँ अंत नहीं, एक नए आरम्भ की भूमिका है. इसी प्रकार गिलगमेश में भी जलप्रलय केवल दंड नहीं है; वह मनुष्य व देवताओं के संबंध, मृत्यु एवं अमरत्व, तथा स्मृति व उत्तरजीविता के प्रश्नों को खोलता है.

जलप्रलय की सबसे बड़ी व्याख्या भूगोल में नहीं, मानव मनोविज्ञान में छिपी है. हर सभ्यता किसी न किसी समय यह अनुभव करती है कि उसके सामने जो संसार है, वह स्थायी नहीं है. एक नदी सब कुछ बहा सकती है. एक सूखा जीवन समाप्त कर सकता है. एक भूकंप नगरों को मिट्टी में मिला सकता है. इस असुरक्षा के अनुभव ने मनुष्य को दो काम करने के लिए प्रेरित किया— पहला, वह प्रकृति को देवत्व देने लगा. दूसरा, उसने स्मृति को सुरक्षित रखना शुरू किया. इसीलिए जलप्रलय की कथाओं में केवल नौका नहीं बचती. कहानी भी बच जाती है.

उत्नापिष्टिम इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वह जीवित बच गया. बड़ी बात यह है कि उसने उस घटना की स्मृति भी बचा ली. यदि वह स्मृति न बचती, तो प्रलय केवल एक प्राकृतिक आपदा बनकर रह जाता. यहाँ आप पाते हैं कि सभ्यताओं की वास्तविक शक्ति उनके नगरों में नहीं थी. वह उनकी स्मरण-शक्ति में निहित थी.

यह विशेषता गिलगमेश के महाकाव्य को साहित्य से आगे बढ़ाकर मानवशास्त्र का दस्तावेज़ बना देती है. लेकिन यहाँ एक सावधानी आवश्यक है. आज अनेक लोकप्रिय लेखों और वीडियोज में यह दावा किया जाता है कि “बाइबिल ने सब कुछ गिलगमेश से लिया”, या “मनु की कथा ही सबसे प्राचीन है”, या “सारी सभ्यताएँ एक ही स्रोत से निकली हैं.” तो ऐसे निष्कर्ष आकर्षक अवश्य लगते हैं, पर इतिहास का काम आकर्षक निष्कर्ष देना नहीं है. इतिहासकार का धर्म है कि वह जहाँ निश्चितता हो, वहाँ दृढ़ता से बोले; और जहाँ केवल संभावना हो, वहाँ विनम्रता से कह दे कि हम अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं जानते.

ज्ञान की सबसे बड़ी पहचान यही विनम्रता है. लेकिन वह हमसे एक और गहरा प्रश्न पूछता है कि मनुष्य किसी ऐसी घटना को, जिसने उसे भयंकर रूप से भयभीत किया हो, हजारों वर्षों तक कैसे याद रखता है? इस प्रश्न के बाद जलप्रलय इतिहास नहीं रहता. वह स्मृति बन जाता है. और स्मृति… सभ्यता का सबसे टिकाऊ स्थापत्य है.

 

क्या सभ्यताएँ केवल परस्पर व्यापार ही करती थीं?

इतिहास की सबसे रोचक बात यह है कि वह वह नदियों की तरह अपना मार्ग बदलते हुए बहता है. कहीं दो धाराएँ मिलती हैं, कहीं अलग हो जाती हैं, कहीं वे वर्षों तक समानांतर चलती हैं और फिर अचानक किसी दूरस्थ मोड़ पर पुनः एक-दूसरे का स्पर्श कर लेती हैं. प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास भी ऐसा ही है.

जब हम सुमेर की ओर देखते हैं, तो हमारी दृष्टि अनायास ही पूर्व की ओर मुड़ती है. वहाँ सिंधु सभ्यता है—हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, राखीगढ़ी, लोथल. एक ओर दज़ला-फ़रात की घाटी, दूसरी ओर सिंधु और उसकी सहायक नदियों का संसार. आज लगभग तीन हजार किलोमीटर का वह फ़ासला बहुत बड़ा मालूम होता है. लेकिन पाँच हजार वर्ष पहले समुद्र ने इस दूरी को महज़ दो गंतव्यों का जहाज़ी सफर बना दिया था.

हमारे पास पर्याप्त पुरातात्त्विक प्रमाण हैं कि मेसोपोटामिया के अभिलेखों में जिस “मेलुहा” का उल्लेख मिलता है, उसे अधिकांश विद्वान सिंधु सभ्यता से जोड़ते हैं. मेसोपोटामिया में सिंधु शैली की मुहरें मिली हैं. कार्नेलियन के मनके, समुद्री शंख, भार-प्रणाली की समानताएँ और फ़ारस की खाड़ी के मार्ग से होने वाले समुद्री व्यापार के अनेक संकेत इस बात की पुष्टि करते हैं कि इन दोनों सभ्यताओं के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था.

लेकिन यह मान लेने पर प्रश्नों का ताँता लग जाता है. यदि जहाज़ ताँबा लेकर जाते थे, तो क्या वे केवल ताँबा ही ले जाते थे? यदि व्यापारी मनके बेचते थे, तो क्या वे केवल मनके ही बेचते थे? यदि नाविक महीनों समुद्र में साथ रहते थे, तो क्या वे केवल सौदों की भाषा बोलते थे? या फिर वे अपनी विविधतापूर्ण कहानियाँ भी सुनाते थे?

इन प्रश्नों का कोई प्रामाणिक उत्तर हमारे पास नहीं है. हमें ऐसी कोई तख्ती नहीं मिली, जिस पर लिखा हो कि “सिंधु के व्यापारी ने सुमेर में मनु की कथा सुनाई.” न ही हमें कोई ऐसा अभिलेख मिला है जिसमें किसी सुमेरियन लिपिकार ने लिखा हो कि “यह कथा हमें मेलुहा से मिली.” इतिहास इस विषय में मौन है. लेकिन इतिहास का मौन विचार की समाप्ति नहीं होता. वह केवल इतना ही कहता है कि अभी प्रश्न पूछो, निर्णय मत सुनाओ. इसीलिए मैं भी केवल इतना ही पूछूँगा कि क्या मनुष्य केवल वस्तुओं का व्यापारी होता है?

आज भी जब कोई व्यापारी किसी दूसरे देश जाता है, तो वह अपने साथ केवल प्रस्ताव, अनुबंध या सामान नहीं ले जाता. वह अपनी भाषा ले जाता है. अपने लोकगीत ले जाता है. अपने त्योहार ले जाता है. अपने भोजन की गंध ले जाता है. अपनी दादी की कहानियाँ ले जाता है. और इन सबसे बढ़कर, वह अपने भय, आशंकाएँ, आस्था, मिथक और अपने रीति-रिवाज भी साथ ले जाता है. यदि आज का मनुष्य ऐसा करता है, तो क्या पाँच हजार वर्ष पहले का मनुष्य बिल्कुल अलग था? यह प्रश्न इतिहास से अधिक मानवशास्त्र का है. और इसका उत्तर “हाँ” या “नहीं” में नहीं दिया जा सकता.

सिंधु सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम उसके नगर जानते हैं. उसकी जल-निकासी व्यवस्था जानते हैं. उसकी मुहरें जानते हैं. उसकी व्यापारिक दक्षता जानते हैं. लेकिन हम उसकी भाषा नहीं पढ़ सकते. सुमेर हमारे सामने बोलता है, क्योंकि मेसोपोटामिया की मिट्टी ने अपने शब्द बचा लिए. यानी एक ने अपनी आवाज़ बचाई. दूसरे ने अपना स्थापत्य. यही अंतर दोनों सभ्यताओं को एक साथ जोड़ता भी है और अलग भी करता है.

सोच कर देखिए कि यदि किसी दिन सिंधु लिपि पढ़ ली गई, तो क्या होगा? क्या हमें वहाँ भी कोई महाकाव्य मिलेगा? क्या कोई प्रलय-कथा मिलेगी? क्या कोई ऐसा पात्र मिलेगा जो गिलगमेश की तरह मृत्यु से जूझ रहा हो? या फिर हमें बिल्कुल भिन्न प्रकार का मनुष्य मिलेगा? हम नहीं जानते. लेकिन यह “नहीं जानते” किसी पराजय का वाक्य नहीं है. यही तो शोध की शुरुआत है. और शायद इसी कारण सिंधु सभ्यता आज भी हमें उतना ही आकर्षित करती है जितना गिलगमेश. दोनों मिलकर हमें एक ही बात सिखाते हैं कि सभ्यताएँ स्मृति के संगठन से बनती हैं.

 

 

भारत का उत्तर : नचिकेता, यक्ष प्रश्न और गिलगमेश

गिलगमेश की कथा का सबसे बड़ा प्रभाव उसके घटनाक्रम में नहीं, बल्कि उसके बाद पाठक के भीतर उठने वाले प्रश्नों में है. महाकाव्य समाप्त हो जाता है, पर उसके प्रश्न समाप्त नहीं होते. एन्किदु की मृत्यु, उत्नापिष्टिम से हुई भेंट, अमरत्व की वनस्पति का हाथ से निकल जाना और अंततः उरुक लौटता हुआ गिलगमेश—ये सब घटनाएँ मिलकर हमें उस बिंदु तक पहुँचा देती हैं जहाँ किसी भी गंभीर पाठक के भीतर अपनी ही सभ्यता की स्मृतियाँ जागने लगती हैं.

मैं भी यही जानना चाहता हूँ कि जिन प्रश्नों ने मेसोपोटामिया के मनुष्य को व्याकुल किया, क्या वे सिंधु घाटी की चेतना में भी उपस्थित थे? यदि थे, तो उनका उत्तर किस प्रकार दिया गया? अतः गिलगमेश का अध्ययन करते समय भारत की ओर लौटना दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच एक गंभीर संवाद स्थापित करने की चेष्टा है.

गिलगमेश का संसार नगरों, राजसत्ता और मनुष्य की भौतिक उपलब्धियों का संसार है. उरुक की प्राचीरें केवल स्थापत्य नहीं हैं; वे उस सभ्यता के आत्मविश्वास का भी प्रतीक हैं. महाकाव्य के आरम्भ में गिलगमेश स्वयं उसी आत्मविश्वास का मूर्त रूप दिखाई देता है. उसे विश्वास है कि मनुष्य अपनी शक्ति, साहस और उपलब्धियों के बल पर संसार को अपने अनुकूल बना सकता है. किंतु एन्किदु की मृत्यु उसके भीतर ऐसी दरार पैदा करती है जिसे कोई विजय भर नहीं पाती. पहली बार उसे अनुभव होता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा प्रतिद्वन्द्वी कोई शत्रु राजा नहीं, बल्कि मृत्यु है. उत्नापिष्टिम तक पहुँचने की उसकी बीहड़ यात्रा और अमरत्व की वनस्पति हासिल करने का उसका प्रयास वस्तुतः मृत्यु से बच निकलने का उद्यम भर नहीं है. महाकाव्य के अंत तक पहुँचते-पहुँचते उसका सबसे बड़ा परिवर्तन यही है कि वह एक विजेता राजा से बदलकर अपनी सीमाओं को पहचानने वाला मनुष्य बन जाता है.

भारतीय परंपरा इसी प्रश्न के सामने एक भिन्न मार्ग प्रस्तुत करती है. कठोपनिषद का नचिकेता भी मृत्यु के द्वार तक पहुँचता है, पर उसकी जिज्ञासा का स्वर अलग है. वह यम से अमर होने की विधि नहीं पूछता. उसका प्रश्न यह है कि मृत्यु के पार क्या है और मनुष्य का सत्य क्या है. देखने में यह अंतर सूक्ष्म प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में यही दो महान सभ्यताओं की चिंतन-दिशा को अलग कर देता है. गिलगमेश मृत्यु को जीवन का सबसे बड़ा संकट मानकर उससे पार पाने का उपाय खोजता है, जबकि नचिकेता मृत्यु को ज्ञान के द्वार के रूप में स्वीकार करता है. एक देवताओं और चमत्कारों के माध्यम से उत्तर खोजता है, दूसरा आत्मबोध के माध्यम से. एक की यात्रा बाहरी संसार में है, दूसरी भीतर की ओर. दोनों यात्राएँ भिन्न अवश्य हैं, पर उनका प्रारम्भ एक ही प्रश्न से होता है—मनुष्य कौन है, और उसकी सीमा कहाँ तक है?

यहीं भारतीय आख्यानों का एक और चरित्र याद आता है—रावण. उसका उल्लेख यहाँ इसलिए नहीं कि उसे गिलगमेश का समकक्ष सिद्ध किया जाए, बल्कि इसलिए कि मानव सभ्यता की महान कथाएँ बार-बार एक ही प्रश्न को अलग-अलग रूपों में व्यक्त करती हैं. रामायण तथा उसके बाद विकसित हुई अनेक पौराणिक और लोक परंपराओं में रावण को ऐसा शासक बताया गया है जिसने वरदानों के माध्यम से अपनी मृत्यु को लगभग असंभव बना देना चाहा. कुछ परंपराएँ तो यहाँ तक कहती हैं कि उसने मृत्यु के विविध कारणों को भी अपने वश में कर रखा था. इन कथाओं का ऐतिहासिक नहीं, प्रतीकात्मक अर्थ अधिक महत्त्वपूर्ण है. वे बताती हैं कि असाधारण शक्ति प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य का अगला स्वप्न अमरता बन जाता है. किंतु चाहे वह रावण हो या गिलगमेश, अंततः दोनों के सामने एक ही सत्य खड़ा रहता है—मृत्यु को छलना संभव नहीं है. अपार शक्ति भौतिक संसार को बदल सकती है, अपराजेय समय को नहीं.

यही कारण है कि भारतीय चिंतन में अमरत्व का अर्थ भी बदल जाता है. यहाँ शरीर की निरंतरता को अंतिम लक्ष्य नहीं माना गया. उपनिषद मनुष्य को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि नश्वरता जीवन का दोष नहीं, उसका स्वभाव है. यदि कुछ अमर है तो वह शरीर नहीं, चेतना है; यदि कुछ स्थायी है तो वह सत्ता नहीं, सत्य है. इसलिए भारतीय दर्शन मृत्यु से संघर्ष करने की अपेक्षा उसे समझने की दिशा में आगे बढ़ता है. यह दृष्टि गिलगमेश की चिंता का खंडन नहीं करती, बल्कि उसे एक दूसरा आयाम प्रदान करती है. मानो भारतीय परंपरा गिलगमेश से कह रही हो कि अमरत्व बाहर नहीं, उस बोध में है जहाँ मृत्यु अपना आतंक खो देती है.

महाभारत का यक्ष-प्रश्न इस संदर्भ में और भी अधिक अर्थपूर्ण हो उठता है. जब यक्ष युधिष्ठिर से पूछता है कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, तब युधिष्ठिर का उत्तर केवल नैतिक शिक्षा नहीं है; वह मनुष्य के मन का गहरा विश्लेषण है. वह कहते हैं कि मनुष्य प्रतिदिन दूसरों को मरते हुए देखता है, फिर भी अपने लिए अमरता की कल्पना करता है. यक्ष-युधिष्ठिर संवाद काफी लंबा है. वह भारतीय मेधा और चिंतन परंपरा का अद्भुत प्रसंग है. किंतु युधिष्ठिर के उपर्युक्त उत्तर को पढ़ते हुए एन्किदु की मृत्यु के बाद व्याकुल होकर भटकता हुआ गिलगमेश सहज ही स्मरण हो आता है. दोनों अलग-अलग सभ्यताओं के पात्र हैं, किंतु दोनों एक ही मानवीय अनुभव तक पहुँचते हैं. अंतर केवल इतना है कि गिलगमेश उस अनुभव से भयभीत होकर यात्रा आरम्भ करता है, जबकि युधिष्ठिर उसे जीवन के सबसे बड़े सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं.

अक्सर हम इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न गलत ढंग से पूछते हैं. हम जानना चाहते हैं कि सबसे प्राचीन सभ्यता कौन-सी है, किसका प्रभाव किस पर पड़ा और किसने किससे क्या ग्रहण किया. निस्संदेह ये प्रश्न अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं, किंतु उनसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मनुष्य ने पहली बार स्वयं को किस रूप में पहचाना. क्या उसने स्वयं को केवल प्रकृति का एक प्राणी माना, या एक नैतिक सत्ता के रूप में देखा? क्या उसने मृत्यु को अंत समझा, या एक रहस्य? क्या उसने स्मृति को इतिहास बनाया, या दर्शन का आधार? गिलगमेश और उपनिषदों का वास्तविक संवाद इन्हीं प्रश्नों के स्तर पर स्थापित होता है.

आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी और डिजिटल अभिलेखों का युग हमारे सामने है, तब गिलगमेश का महाकाव्य पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है. मिट्टी की तख्तियों का स्थान सिलिकॉन चिपों ने ले लिया है, कीलाक्षरों का स्थान डिजिटल संकेतों ने और राजकीय अभिलेखागारों का स्थान वैश्विक डेटा-संग्रहों ने. साधन बदल गए हैं, किंतु प्रश्न वही है—क्या मनुष्य अपने जीवन से अधिक समय तक जीवित रह सकता है? विज्ञान इसका उत्तर तकनीक में खोजता है, दर्शन चेतना में और साहित्य स्मृति में. गिलगमेश का महाकाव्य इन तीनों के बीच खड़ा होकर हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य की पहली अमरता उसके शरीर में नहीं, उसकी कथा में जन्मी थी.

हम पाते हैं कि गिलगमेश ने मृत्यु को पराजित नहीं किया, देवताओं से अमरत्व नहीं छीना और समय को रोक भी नहीं पाया. लेकिन उसकी वास्तविक विजय यह थी कि उसने मनुष्य के उस प्रश्न को शब्द दे दिए जो कभी पुराना नहीं पड़ता. पाँच हजार वर्ष बाद भी जब हम उसकी कथा पढ़ते हैं, तो हमें किसी टेस्टामेंट की नहीं, अपने ही समय के प्रश्नाकुल मनुष्य की आवाज़ सुनाई देती है. यही कारण है कि गिलगमेश केवल सुमेर का महाकाव्य नहीं रह जाता; वह मानव सभ्यता की साझा आत्मकथा का पहला महान अध्याय बन जाता है.

 

 

बाइबिल और सभ्यताओं की साझा स्मृति

गिलगमेश का महाकाव्य उन्नीसवीं शताब्दी में जब पहली बार व्यवस्थित रूप से पढ़ा जाने लगा, तब उसकी सबसे बड़ी सनसनी उसका साहित्यिक सौंदर्य नहीं था. विद्वानों को सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह लगी कि उसके भीतर वर्णित महाप्रलय की कथा बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट में वर्णित नोहा की कथा से अनेक स्तरों पर मेल खाती है. नाव, महाजल, जीव-जंतुओं का संरक्षण, जल उतरने की प्रतीक्षा, पक्षियों को उड़ाकर भूमि का पता लगाना— ये सब ऐसे बिंदु थे जिन्होंने इतिहासकारों और धर्मशास्त्रियों के सामने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया. क्या यह केवल संयोग था? या दोनों कथाओं के पीछे कोई साझा सांस्कृतिक स्मृति काम कर रही थी? इसी प्रश्न ने गिलगमेश को पुरातत्त्व के दायरे से निकालकर विश्व-बौद्धिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया.

स्वाभाविक था कि प्रारम्भिक शोध का बड़ा भाग इसी दिशा में गया. कुछ विद्वानों ने यह मत रखा कि बाइबिल की जलप्रलय कथा मेसोपोटामिया की प्राचीन परंपराओं से प्रभावित है. कुछ ने इसके विपरीत तर्क दिए. बाइबिल का अंतिम रूप बहुत बाद का है, पर उसके भीतर निहित परंपराएँ उससे कहीं अधिक प्राचीन हैं. दूसरी ओर, गिलगमेश स्वयं भी एक दिन में नहीं लिखा गया. वह सदियों तक विकसित होती रही मौखिक और लिखित परंपराओं का परिणाम है.

यहीं मुझे लगता है कि हमें प्रश्न बदल देना चाहिए. शायद यह पूछना अधिक उपयोगी होगा कि महाप्रलय की स्मृति मानव सभ्यता में इतनी व्यापक क्यों है?

यदि यह कथा केवल मेसोपोटामिया और बाइबिल तक सीमित होती, तो प्रभाव की चर्चा पर्याप्त होती. किंतु प्राचीन भारत में मनु की कथा, यूनानी परंपरा में ड्यूकैलियन, चीन की बाढ़-कथाएँ और संसार के अनेक आदिवासी समाजों में संरक्षित प्रलय-स्मृतियाँ संकेत देती हैं कि जल केवल प्राकृतिक शक्ति नहीं था; वह मानव कल्पना में विनाश और पुनर्जन्म— दोनों का प्रतीक बन चुका था. अलग-अलग सभ्यताओं ने उसे अलग-अलग भाषा दी, किंतु उसके भीतर छिपी मानवीय अनुभूति कहीं न कहीं समान रही.

गिलगमेश और ओल्ड टेस्टामेंट के बीच की समानताएँ केवल जलप्रलय तक सीमित नहीं हैं. अलेक्ज़ेंडर हाइडेल की पुस्तक में ऐसे अनेक समानांतर संकेतों की चर्चा है, जो यह समझने में सहायता करते हैं कि मेसोपोटामिया की सांस्कृतिक स्मृतियाँ और ओल्ड टेस्टामेंट की धार्मिक परंपरा किन-किन स्तरों पर एक-दूसरे के निकट दिखाई देती हैं. उत्नापिष्टिम और नोहा दोनों ऐसे पात्र हैं जिन्हें एक महाविनाश के बीच जीवन को सुरक्षित रखने का दायित्व सौंपा जाता है. दोनों के सामने नौका है, जल है, विनाश है और उसके बाद एक नई शुरुआत का वचन है.

इसी प्रकार गिलगमेश और ओल्ड टेस्टामेंट दोनों में सर्प एक अत्यंत अर्थपूर्ण प्रतीक के रूप में उपस्थित होता है. गिलगमेश में वही सर्प अमरत्व प्रदान करने वाली वनस्पति मनुष्य के हाथ से छीन लेता है और अपनी केंचुल बदलकर आगे बढ़ जाता है. ओल्ड टेस्टामेंट में वही सर्प मनुष्य को निषिद्ध ज्ञान के सामने खड़ा करता है. दोनों कथाएँ भिन्न हैं, किंतु दोनों में सर्प मनुष्य की सीमाओं का स्मरण कराता है. संभवतः यही कारण है कि सर्प विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में केवल एक विषैला सरीसृप नहीं, बल्कि मृत्यु, ज्ञान, पुनर्जन्म और समय के रहस्य का प्रतीक बनकर उपस्थित होता है. मिस्र में वह राजसत्ता और संरक्षण का प्रतीक है, यूनानी परंपरा में चिकित्सा और पुनर्सृजन का, जबकि भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में तक्षक, वासुकि, शेष और कालिय नाग जैसे रूपों में वह बार-बार सामने आता है. यह कहना इतिहाससम्मत नहीं होगा कि इन सभी प्रतीकों का कोई एक साझा स्रोत है, किंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि संभवतः केंचुल बदलने की उसकी जैविक प्रक्रिया ने उसे प्राचीन मनुष्य की कल्पना में पुनर्जन्म और नवीकरण का प्रतीक बना दिया.

यह उल्लेखनीय है कि पश्चिमी एशिया की धार्मिक स्मृति शताब्दियों तक एक निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह के रूप में जीवित रहती है. गिलगमेश के महाकाव्य से लेकर ओल्ड टेस्टामेंट और फिर अब्राहमी परंपराओं के विस्तार तक, कुछ मूल कथाएँ समय-समय पर नए अर्थों और नए धार्मिक संदर्भों में पुनः व्यक्त होती रहती हैं. शताब्दियों बाद न्यू टेस्टामेंट में भी जीजस क्राइस्ट नोहा का उल्लेख करते हैं. गिलगमेश का उत्नापिष्टिम, ओल्ड टेस्टामेंट का नोहा और कुरआन के नूह—नाम और धार्मिक संदर्भ बदलते हैं, किंतु महाप्रलय की सांस्कृतिक स्मृति बनी रहती है. सहस्राब्दियों के बाद भी कोई सभ्यता अपने मूल अनुभवों को विस्मृत नहीं करती; वह उन्हें नई भाषा, नई धार्मिक संवेदनाओं और नए सांस्कृतिक अर्थों के भीतर पुनः अभिव्यक्त करती रहती है. इस दृष्टि से हज़रत नूह केवल एक पैग़म्बर नहीं हैं; वे उस मनुष्य की स्मृति भी हैं जिसने विनाश के बीच जीवन की निरंतरता को बचाए रखा. अतः गिलगमेश, ओल्ड टेस्टामेंट और कुरआन को पश्चिमी एशिया की दीर्घजीवी सांस्कृतिक स्मृति के अलग-अलग पड़ावों के रूप में भी पढ़ा जा सकता है.

लेकिन हम सिंधु सभ्यता की कथाओं का बाइबिल की भाँति विश्लेषण नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें पढ़ा जाना शेष है. फिर भी हमारी सांस्कृतिक परंपरा में जल का असाधारण महत्त्व, पीपल की दीर्घजीविता, नाग-परंपराओं का निरंतर बने रहना, महाभारत के तक्षक से लेकर बौद्ध साहित्य में मुचलिंद नाग तक अनेक ऐसे रूपांकन दिखाई देते हैं जो बताते हैं कि कुछ प्रतीक हजारों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं, भले ही उनकी मूल कथा हमारे पास न बची हो. इस आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भारतीय सभ्यता ने अपने अनेक सांस्कृतिक प्रतीकों को असाधारण दीर्घजीविता प्रदान की. मेसोपोटामिया ने अपनी स्मृति शब्दों में बचाई, भारत ने संभवतः अपने प्रतीकों, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक व्यवहारों में. दोनों ही स्थितियों में मनुष्य का प्रयत्न एक ही था— समय बदल जाए, किंतु अनुभव की लौ बुझने न पाए.

यहाँ मुझे इतिहास और मिथक के संबंध पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता महसूस होती है. आधुनिक शिक्षा ने हमें लंबे समय तक यह सिखाया कि इतिहास तथ्य है और मिथक कल्पना. किंतु पिछले कुछ दशकों में इतिहास, मानवशास्त्र और मिथक-अध्ययन के विद्वानों ने यह समझाया है कि मिथक को केवल असत्य मान लेना भी एक प्रकार की बौद्धिक सरलता है. मिथक का उद्देश्य घटनाओं का समाचार देना नहीं होता; वह किसी सभ्यता के गहरे अनुभव को ठोस रूप में सुरक्षित रखता है. इस अर्थ में जलप्रलय की कथा हमें यह नहीं बताती कि अमुक दिन पूरी पृथ्वी डूब गई थी. वह यह बताती है कि जल के साथ मनुष्य का संबंध इतना गहरा और इतना भयावह था कि उसने उसे अपनी जीवन-यात्रा का स्थायी हिस्सा बना लिया.

शायद इसी कारण गिलगमेश का महाकाव्य और ओल्ड टेस्टामेंट एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं. दोनों अपने-अपने धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में विकसित हुए, दोनों की अपनी विशिष्टताएँ हैं, किंतु दोनों एक ऐसे मानवीय अनुभव को सुरक्षित रखते हैं जो किसी एक सभ्यता की निजी संपत्ति नहीं कहा जा सकता. यदि गिलगमेश, मनु और नोहा तीनों अलग-अलग भाषाओं में जल को स्मरण करते हैं, तो वे हमें यह बता रहे होते हैं कि मनुष्य की सबसे गहरी स्मृतियाँ सीमाओं में कैद नहीं होतीं.

 

Uruk Archaeological site at Warka.

अमरत्व की सबसे बड़ी विडम्बना

गिलगमेश की पूरी यात्रा को एक वाक्य में समेटना संभव नहीं है. वह एक राजा की कथा भी है, एक मित्र की शोकगाथा भी, और मनुष्य के पहले अस्तित्ववादी प्रश्न का दस्तावेज़ भी. लेकिन यदि इस पूरे महाकाव्य से एक केंद्रीय विचार निकालना हो, तो शायद वह यह होगा कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या मृत्यु नहीं है; मृत्यु से उसका संबंध है. वह मरते हुए इसलिए दुखी नहीं होता कि मृत्यु अन्यायपूर्ण है. वह इसलिए व्याकुल होता है कि उसके भीतर अमर रहने की इच्छा मृत्यु की अनिवार्यता से कहीं अधिक प्रबल रहती है. यही वह द्वंद्व है जिससे गिलगमेश भी गुजरता है और हर युग का मनुष्य भी.

यदि ध्यान से देखें तो गिलगमेश की यात्रा आरंभ से अंत तक इसी एक भ्रम के टूटने की यात्रा है. वह सोचता है कि कहीं न कहीं ऐसा कोई रहस्य अवश्य होगा जिससे मृत्यु को पराजित किया जा सके. इसलिए वह उत्नापिष्टिम तक पहुँचता है, इसलिए वह समुद्र की गहराइयों से उस अद्भुत वनस्पति को प्राप्त करता है, इसलिए वह आख़िरी क्षण तक आशा नहीं छोड़ता. किंतु नियति उससे वह वनस्पति भी छीन लेती है. पहली दृष्टि में यह उसकी पराजय प्रतीत होती है, किंतु वास्तव में यहीं उसकी सबसे बड़ी विजय छिपी हुई है. क्योंकि उसी क्षण उसे यह बोध होता है कि अमरत्व किसी औषधि में नहीं है. वह मनुष्य के जीने के ढंग में है.

यह सूत्र गिलगमेश को भारतीय चिंतन से जोड़ता है. उपनिषद बार-बार कहते हैं कि जो नश्वर है, उसे नश्वर ही रहना है. मृत्यु से युद्ध करने वाला अंततः मृत्यु से ही पराजित होगा. किंतु जो नश्वरता को स्वीकार कर लेता है, वह मृत्यु के आतंक से मुक्त हो जाता है. यह मुक्ति शरीर की नहीं, दृष्टि की होती है. गिलगमेश इस सत्य तक उपनिषदों की तरह नहीं पहुँचता, लेकिन उसकी पूरी यात्रा अंततः उसे उसी बोध के निकट ले आती है.

अंततः मुझे लगता है कि गिलगमेश अमरत्व की खोज में निकला ही नहीं था. उसे स्वयं भी इसका ज्ञान नहीं था. वह तो केवल अपने मित्र की मृत्यु से भयभीत एक मनुष्य था, जो पहली बार यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि जिस संसार को उसने अपने पराक्रम से जीत लिया है, उस संसार में समय उससे अधिक शक्तिशाली है. उसकी यात्रा की त्रासदी भी यही है और उसका सौंदर्य भी. वह अमरत्व खोजते-खोजते नश्वरता का ज्ञान प्राप्त कर लेता है.

उसके इस प्रयास में मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बना भी छिपी हुई है. मनुष्य का सबसे बड़ा दुःख मृत्यु नहीं है. मृत्यु तो प्रकृति का सबसे सामान्य नियम है. उसका सबसे बड़ा दुःख यह है कि वह अपनी नश्वरता को स्वीकार नहीं कर पाता. उसकी आकांक्षाएँ अनंत हैं, लेकिन उसका जीवन सीमित है. उसकी कल्पना समय से बड़ी है, लेकिन उसका शरीर समय के भीतर बँधा हुआ है. शायद इसी कारण हर सभ्यता ने किसी-न-किसी रूप में अमरत्व का स्वप्न देखा—कहीं अमृत के रूप में, कहीं स्वर्ग के रूप में, कहीं वरदान के रूप में, कहीं पुनर्जन्म के रूप में.

और यहीं गिलगमेश अपनी सबसे बड़ी विजय प्राप्त करता है. उसकी देह भी उसी मिट्टी में मिल गई, जिससे वह बनी थी. लेकिन उसका अमरत्व कहीं अधिक मानवीय है. उसने उरुक की प्राचीरें बनाईं, नगर बसाया, अनुभव अर्जित किए और अंततः अपनी कथा समय को सौंप दी. उसके साम्राज्य का अधिकांश भाग नष्ट हो गया, किंतु उसकी बेचैनी बची रही. उसके महल ढह गए, किंतु उसके प्रश्न जीवित रहे. शायद यही कारण है कि पाँच हजार वर्षों बाद भी हम गिलगमेश को इसलिए नहीं पढ़ते कि वह उरुक का राजा था. हम उसे इसलिए पढ़ते हैं क्योंकि वह हममें से पहला मनुष्य था जिसने अपनी सीमाओं को देखकर उनसे आँखें नहीं चुराईं. उसने मृत्यु को हराया नहीं, लेकिन उसने मृत्यु के सामने खड़े मनुष्य की भाषा खोज ली. और जो भाषा मनुष्य के सबसे बड़े भय को शब्द दे देती है, वह स्वयं समय से बड़ी हो जाती है.

यहीं सभ्यता का अर्थ भी थोड़ा बदल जाता है. सभ्यता केवल नगरों, साम्राज्यों, मंदिरों या व्यापारिक मार्गों का नाम नहीं है. यदि वह केवल इतना ही होती, तो मिट्टी की वे तख्तियाँ आज हमारे लिए मात्र पुरातात्त्विक अवशेष होतीं. लेकिन वे अब भी संवाद करती हैं. वे केवल गिलगमेश की कथा नहीं कहतीं; वे यह भी बताती हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी विरासत उसका अनुभव है.

इस पूरी यात्रा को समेटकर देखने से लगता है कि गिलगमेश की वास्तविक खोज यह थी कि मनुष्य कैसा जीवन जिए, जो मृत्यु के बाद भी अर्थवान बना रहे. उसकी कथा ही उसका अमृत बन गई. आज संसार के अनगिनत विजेताओं, सम्राटों और योद्धाओं के नाम इतिहास के अँधेरे में खो चुके हैं, जबकि गिलगमेश अब भी हमारे सामने खड़ा है— एक प्रश्न की तरह. शायद इसलिए कि सभ्यताएँ अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों की निरंतरता से जीवित रहती हैं.

 

 

विजयशंकर चतुर्वेदी
15 जून, 1970 (सतना, मध्यप्रदेश)

वरिष्ठ पत्रकार-लेखक
कविता संग्रह ‘पृथ्वी के लिए तो रुको’ राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित.
vijaysshankarchatturvedi@gmail.com

Tags: 20262026 आलेखगिलगमेशमिट्टी पर लिखी अमरताविजयशंकर चतुर्वेदी
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Comments 9

  1. अरुण सिंह says:
    4 weeks ago

    गिलगमेश के बहाने एक गहन पाठ रचा है लेखक ने। महत्वपूर्ण और पठनीय आलेख।

    Reply
    • Reeta Bhuiyar says:
      4 weeks ago

      आपको मेरा प्रणाम
      आपका दर्शन प्रस्तुत करता है कि मनुष्य और दुनिया के सभी जीव और उनकी स्मृति जो अगली पीढ़ी के व्यवहार में आई और लगातार जीव हित में हजारों लाखों वर्षों से आज भी जीव और मनुष्य के व्यवहार और सोच में बनी हुई और जुड़ी हुई है उसको पहचाना और उसको बिना सुरक्षित के सोच और व्यवहार के साथ आने वाली पीढ़ी को सोच और व्यवहार में देना या समर्पित करना,
      इसको उजागर करना या इस पर ध्यान केंद्रित करना ही आपका उद्देश्य है….

      Reply
  2. रुपेश कश्यप says:
    4 weeks ago

    विजयशंकर जी का यह लेख काफ़ी खोजपरक है और हमारी चेतना का विस्तार करती है – गिलगमेश के ज़रिए। उन्होंने गिलगमेश के ज़रिए दुनिया की कई प्राचीन सभ्यताओं का समानांतर विवेचन किया है और वह महत्वपूर्ण है। एक पाठक के तौर पर आप मनुष्य की चेतना के प्रश्न की सारभौमिकता से आमना-सामना करते हैं।

    बेहतरीन। बहुत बहुत बधाई लेखक को। प्रकाशन को। आपको।

    Reply
  3. कुमार अम्बुज says:
    4 weeks ago

    विचारोत्तेजक प्रश्नों को उत्साहित करता यह निबंध पठनीय है। एक कथा फिर से इस तरह कहने के लिए कि वह एक नयी कथा बन सके, अन्य कथाओं की तरफ़ ले जा सके- यही साहित्य और सर्जनात्मक आकांक्षा है। यहाँ दर्शन है, समय है, स्मृति है, मृत्यु से संलग्न अमरता है और जड़ में बेचैनी। और वह विचारशील सीमा-बोध, वह अनिश्चितता, वह संदेह, वह उत्कंठा जो ज्ञान-विज्ञान को अग्रसर करते हैं। उसकी अनिवार्यता को असमाप्य बनाये रखते हैं। संस्कृतियों के समवेत और सभ्यताओं की वैश्विक निरंतरता एवं सूत्रबद्घताओं को रेखांकित करता यह निबंध, एकाधिक पाठ के लिए आमंत्रित करता है।

    विजयशंकर की भाषा इस कहन के लिए आकर्षक और समर्थ संवाहक है। उनकी पिछले दिनों यहीं प्रकाशित कहानी ने और इस आलेख ने, उनके रचनाकार के प्रति मुझे आशावान बना दिया है।
    वाह!

    Reply
  4. arvind kumar khede says:
    4 weeks ago

    कितने पाकिस्तान पुस्तक में गिलगमेश से परिचय हुआ था….उसके बाद बाबा गूगल के माध्यम से खोजा और जानने की चेष्टा की है. किंतु आपके इस आलेख से मेरी सारी जिज्ञासाएं शांत हुई है. आपके इस आलेख से कई संस्कृतियों और सभ्यताओं के बारे में विस्तार से जाना और समझा. वाकई आपका यह लेख जरूरी हस्तक्षेप लगा… अरविन्द कुमार खेड़े

    Reply
  5. Dr. Jitendra Sharma says:
    4 weeks ago

    First I know or read about Gilgamesh from Discovery of India by Respected Sir Jawaharlal Nehru… But in very brief… But your article satisfied me . Thank you Sir.

    Reply
  6. Tarakendra Vaishnav says:
    4 weeks ago

    बहुत सार्थक जानकारी. हमने संसार की आदि सभ्यता ओं को भूगोल की दृष्टि से बांट लिया है.सभी सभ्यता ऐं एक ही सभ्यता के अंश हैं. सिंधु घाटी की लिपि भविष्य में शायद इन प्रश्नो का उत्तर दे सके.

    Reply
  7. ARVIND SURWADE says:
    4 weeks ago

    एक विश्व धरोहर, एक महान सभ्यता का परिचय करवाया। धन्यवाद। क्या इस आलेख का मराठी भाषान्तर कर सकता हूँ? ताकि मराठी पाठकों तक पहुंचा सकू।

    Reply
  8. mukta pandey says:
    3 weeks ago

    विजयशंकर चतुर्वेदी बहुत सभ्य लेखक है।हार्दिक धन्यावाद। आपकी हर कृति सराहनीय होती है।यह लेख काफी संतोष जनक है।हर प्रश्न का उत्तर है।

    Reply

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