| गिर्दाब उज़्मा कलाम |
पुलिस, थाना, वकील, कचहरी, मुकदमा के बारे में ख़्वाब में भी न सोचने वाला इंसान इस दलदल में उतर रहा था. जिस वकील की ऊँगली पकड़कर वह एफआईआर लिखा आये थे. वह दस पंद्रह हज़ार कमाकर इनसे कन्नी काटकर शुरूआती राह में छोड़, उन्नाव जिला न्यायलय में अपना खोखा बनाकर बैठने लगा था. बीवी उठते-बैठते कहती, “भरोसा रखो” लेकिन भरोसे पर से भरोसा उठ गया था. धोखेबाज़ क्या फंसता खुद ही फंस गए थे.
लोगो की सलाह पर नए वकील की तलाश थी, कई वकीलों से सलाह-मशवरे सुनकर वह पागल से हो गए थे. एक तो कुकुरमुत्ते जैसे वकील हर गली-मोहल्ले में उग आये थे या ना जाने मुस्तफ़ा का ही पाला पड़ गया सबसे. पास रहने वाले आलम का लड़का नदीम नया-नया जाने कहाँ से वकालत पढ़ आया था. वकीलों की ज़ुबान उनकी अक़्ल से दो गुनी तेज़ चलती है. लगा समझाने, “FIR हो गयी है. थोड़ा दबाव बनाना पड़ेगा तो जाँच होगी. गैर ज़मानती वारंट निकलेगा पुलिस वाले दिमाग ठिकाने ला देंगे. दस-पंद्रह दिन का मामला है. फिर चार्ज शीट तैयार होगी और अदालत में पेश होते ही धारा 420 में केस बनेगा. कोर्ट हम संभाल लेंगे चच्चा. पंद्रह दिन-महीने में मामला साफ़ हो जायेगा. धोखेबाज़ पकड़ा जायेगा.”
इस वकील की महीन-महीन बातो के जाल और फुर्ती से उससे निकलकर सारे मसले हल कर देने वाले वादों को सुनकर जैसे ही उन्हें तसल्ली होती, कि वैसे ही उन्हें याद आया अभी कुछ दिन पहले ही एक वकील से धोखा खा चुके थे. उनकी नज़र में चोर, धोखेबाज़, दगाबाज़ का अगर पर्यायवाची लिखना हो तो वकील भी लिखा जा सकता है. वह घबराये,
“नहीं भैय्या कोर्ट कचहरी हमसे ना होगी.”
“चच्चा कानून पर भरोसा रखो. हमने ग़लत नहीं किया तो हम क्यों डरे. “
बेटे का साथ देते हुए आलम जोश में बोल गए, “भैय्या कानून अँधा होता है” वह दर्जनों फिल्म में यह डायलॉग सुन चुके थे. पुलिस कचहरी के नाम से घबराये हुए मुस्तफ़ा, यह डायलॉग सुनते ही सकपका गए, “एई भैय्या कानून काहे अँधा होता है?” आलम को जवाब न मिला “नहीं भाई अँधा नहीं होता है, खाली पट्टी बांधे होता है. “
“इतनी मुसीबत में लोग कचहरी पहुँचते है और कानून पट्टी काहे बाँध लेता है?” नदीम ने मोर्चा संभाला, अपने बाप को आंखें दिखायीं.
“चच्चा तुम यह सब छोड़ो.”
ख़ैर महीना क्या, साल से ज़्यादा गुज़र गया. फ़ैसले का अता-पता नहीं मिला. लेकिन वकील का मुँह किसी न किसी बहाने खुला रहता. हर बार वह चार-छह हज़ार खा जाता. वकील का हर पर्यायवाची मुस्तफ़ा के लिए सच था.
२.
मुस्तफ़ा, जिला उन्नाव के एक गांव के रहवासी थे. जो पुरवा तहसील में लगता था. ठीक-ठाक खेतिहर ज़मीन के मालिक, जो बाप दादा से विरासत में मिली थी. ऊँचे लम्बे कद काठी वाले मुस्तफ़ा की शख़्सियत अलग ही थी. उनकी तीन लड़कियों पर एक लड़का था. लड़कियाँ अल्लाह की रहमत थी. बस उन्हें अपना नाम लेवा वारिस चाहिए था. वह नाम जो सिर्फ़ उन्नाव के कसबे पुरवा तक महदूद था. वैसे तो मुस्तफ़ा और फ़िरोज़ा ने बेटा और बेटियों की परवरिश में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया.
उनके पास ज़मीन अच्छी थी, और पैदावार भी. लेकिन जमा पूँजी कुछ नहीं. जो पैसा आया खा-पीकर लें-देकर खर्च कर देते. ऐसे थोड़े ही मान-सम्मान था उनका ग़रीबो के बीच. मुस्तफ़ा अपने बाप दादाओं के ज़माने की इज़्ज़त क़ायम रखने के चक्कर में ग़रीबो के मसीहा बने हुए थे.
मुस्लिम बहुल गांव में पच्चीस फ़ीसदी चौधरियों के मकान थे. चौधरी लाला की बड़ी परचून की दुकान थी लेकिन उनका ख़ास काम ब्याज पर कर्ज़ा देना था.
सब कुछ खर्च करके खाली हुए मुस्तफ़ा ने उस दफ़ा बुआई से पहले कुछ क़र्ज़ लिया था, जल्दी लौटा देने के वादे के साथ. चौधरी मुस्कराते हुए बोले थे,
“अरे दे दियो आराम से, ना तुम कहीं भागे जा रहे ना हम, कउनो चिंता ना है.”
३.
खैर मुस्तफा की ज़मीन वक़्फ़ की तो नहीं थी. लेकिन अवध सल्तनत के वक़्त की थी. छह फ़ुट दो इंच का ये आदमी था भोला-भाला. दुनिया के साथ कदम मिलाकर न चलने वाले को भोला-भाला के अलावा बेवकूफ़ भी माना जाता है. चौधरी को शक़ था. मुस्तफ़ा की ज़मीन के काग़ज़, आज के डिजिटल भारत के हिसाब से कुछ अधूरे है. आजकल ऑनलाइन और डिजिटलाइज़ेशन का धंधा उरूज़ पर चल रहा है. जबकि चौधरी ने उन्हें अपने काग़ज़ों के सुधार के लिए सिर खपाते देखा सुना नहीं. मौजूदा सरकार अवाम को लम्बी-लम्बी लाइन में खड़ा करने का काम बखूबी कर रही है. लोग काग़ज़ बनाओ और काग़ज़ सुधारो के काम में जी जान से जुटे है. हर शख़्स देशवासी बना रहने के लिए तरह-तरह के काग़ज़ इकट्ठा करने में लगा है. यही इकलौता रोज़गार बुलेट ट्रैन की रफ़्तार से दौड़ रहा है. तेज़ धार की सीधी तलवार तो मुसलमानों के सिर पर टंग रहीं है. वह सीधे निशाने पर है. पूरी उम्र काटकर कब्र में पैर लटकाये लोगों के भी जन्म प्रमाण पत्र बन रहे है. बस मुस्तफ़ा जाने कहाँ छूट गए. आधार, पहचान पत्र जैसी चीज़ें तो बनी है लेकिन…
ऐसे माहौल में चौधरी का दिमाग ठनका. मुस्तफ़ा की ज़मीन उसे पहले से पसंद थी. बेचने के लिए वह कई बार कह चुके थे. घी सीधी उंगली से नहीं निकल रहा था. पहलवानो की आधा दर्जन फ़ौज उसके पास थी. बनिया था पंगे-संगे चलते रहते थे. बस पहलवान पहुँच गए मुस्तफ़ा के खेत पर उनके मज़दूर हटाकर अपने मज़दूर काम पर लगा दिए. जंगल की आग की तरह ख़बर फैली, मुस्तफ़ा के कान तक पहुँची, पल भर को भरोसा नहीं हुआ. फिर कदमो ने ख़ुद-ब-ख़ुद चौधरी के घर का रूख़ किया.
“जल्दी पइसा लौटाओ नाही तो जमीन हमरे नाम लिख दो “
चौधरी डरते और अकड़ दिखाते हुए बोले. क्योंकि वह जानते थे की मुस्तफ़ा से हाथ-पांव की लड़ाई में कतई जीत नहीं पाएंगे. मुस्तफ़ा की त्योरियां चढ़ गयी,
“तुह जमीन पर नज़र धरे है.”
लेकिन मुस्तफ़ा की बात को बगैर पूरा सुने वह झट से घर में घुसकर सिटकनी चढ़ाते है. अचानक हुई इस हरक़त को मुस्तफ़ा समझ ही नहीं पाएं, कुछ देर सन्नाटे में खड़े रह गए. फिर बदहवासी में कदम घर की तरफ़ चल पड़े. अजीब सी उलझन बेचैनी में खोये हुए वह शब्बीर से टकरा गए.
“अरे मियां काहे इतनी बेहोशी में चलते हो” शब्बीर उन्हें रोकते हुए.
मुस्तफ़ा चौंककर, “माफ़ करो भैया”
“का हुआ”
“कुछ न”
“कुछ तो है, बोल दो, बोले से परेसानी कम होती है”
मुस्तफ़ा ने एक गहरी साँस छोड़ी, मानो उनके सीने पर कोई भारी पत्थर रखा हो. अपनी गठीली हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए थकी आवाज़ में,
“क्या कहें… जउन कर्ज़ा लिए रहे हम उसी का तकाज़ा करे लगा है चौधरी, नीयत डोल गयी उसकी. साल भर बाद लौटाए की बात तय थी, अब एकदम्में पलट गया. हमारी पुश्तैनी ज़मीन पर अपने लठैत बिठा दिए. कहता है अभी पैसा दो, नहीं तो जमीन नाम लिखो.”
“ये का बात हुई, किसी की जमीन का ऐसे कब्ज़ा ली जाएगी.”
4.
इन्हीं आफ़तो में दस लोग समझाए और अब मुकदमा लगे साल से ऊपर हो गया, बमुश्किल कुछ तारीखें पड़ी. जिनमें एक में चौधरी न आया, एक में जज साहब नहीं आयें. किसी में वकील ढंग से बात पेश न कर पाया या करना नहीं चाहा. वक़्त खिंच रहा था. जेब खाली हो रही थी. एक पेशी में जज साहब ने बात ध्यान से सुनी और ज़मीन के काग़ज़ और सुबूत पेश करने को कहा. जिसके लिए एक पुराना ट्रंक खुला. उसमें एक लाल कपड़े में लिपटे बाबा आदम के ज़माने के पुराने राज-शाही दस्तावेज निकले. इसे लेकर वह नवीन वकील के पास पहुंचे.
नवीन वकील उर्दू, फ़ारसी के काग़ज़ देखकर ही चकरा गया. उन्हीं काग़ज़ों में एक सरकारी पर्ची जो ज़मींदारी उन्मूलन 1952 की थी, उसे दिखी ही नहीं. वह उर्दू के काग़ज़ अपने बाप की तरफ़ बढ़ाता है,
“पढ़ो अब्बू” टूटी-फूटी हिज्जे से उर्दू पढ़ने वाले अब्बू को एक अक्षर न समझ आया और उन्होंने लम्बी सांस खींचकर बेटे को लौटाया. दोनों की निगाह उठी और मुस्तफ़ा पर टिकी. वह आँखों का इशारा देख बोल पड़े, “भैया हम है, अंगूठा टेक. हमें उर्दू अरबी कुछ नहीं आती” तो कुल मिलाकर उर्दू मुसलमानो की भाषा है यह कहना ग़लत है. घर में ऐशो आराम की कमी न थी. माँ बाप की इकलौती औलाद होने के नाते मुस्तफ़ा सिर आँखों पर बैठे रहे. पैर ज़मीन को छूते हुए कभी स्कूल नहीं गए और अब ज़मीन थी और वह थे.
वकील बोला चच्चा तुम्हारे काग़ज़ तो केस को पेचीदा बना देंगे. सही मायने में नए वकील को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए. पहले ही केस में उसे अपना करियर डूबता हुआ दिखने लगा. बाप ने इशारो-इशारो में कहा, केस लम्बा चलेगा. लगे रहो.
“चच्चा पाँच हज़ार दो, ये काग़ज़ समझने पड़ेंगे किसी से.” अब मुस्तफ़ा की जेब में पैसे कम हो गए थे. उन्होंने ज़िन्दगी में पहली बार बार्गेनिंग करने की कोशिश की. पुराने पड़ोसी और उसकी औलाद नहीं मानी.
चौधरी दादागिरी से उनकी ज़मीन पर फ़सल काट रहा था. सियासतदाओं से तालुकात भी बना लिए थे सो उससे भिड़ना आसान नहीं रहा. फ़िरोज़ा के ज़ेवर बिकने लगे थे.
५.
रोज़ बादल आ जा रहे थे लेकिन पानी बरसने का नाम नहीं ले रहा था. पसीने से तर-बतर मुस्तफा को देखकर शब्बीर उनके पास ठहर गए. कुछ देर बाद, “मामला तुम्हारा बहुते पेचीदा हो गया है मुस्तफ़ा. काहे तुम पुराने काग़ज़-पत्तर पर ध्यान नहीं दिए?”
मुस्तफ़ा ने झटके से अपनी चप्पल से ज़मीन की धूल उड़ाई. आँखों में लाचारी और गुस्से का मिला-जुला सैलाब था. खीजते हुए बोले, “अब कुछ न कहो.”
उनकी हालत देखकर शब्बीर की आवाज़ ग़मगीन सी हो गयी “सबसे पुराना तुम्हारा ही घराना है इस गाँव में. न जाने तुम्हारी कितनी पुश्तें इस मिट्टी में दफ़न हैं. तुम तो यहाँ के जमें-जमाये दरख़्त थे…”
“…तब ही तो उखाड़ दिए गए! जो दरख़्त जितना पुराना होय, उसकी जड़ें कमजोर समझकर कुल्हाड़ी पहले चलत है.”
“दिल छोटा न करो…सुधार की गुंजाइश है, यही शुक्र करो. माथापच्ची होगी, बखत लगेगा… लेकिन सब ठीक हो जाएगा.”
शब्बीर थोड़ा करीब खिसक आए. आवाज़ को संजीदा करते हुए, “काग़ज़ तो तुमने पुराने इकट्ठे कर लिए हैं. अल्लाह ने चाहा तो तहसीलदार अदालत में कोई वक़्ती फ़ैसला मिल जायेगा, जिससे चौधरी कब्ज़ा छोड़े. एक बार अपनी ज़मीन हाथ आ जाए, तो पैसे-कौड़ी का बंदोबस्त बना रहेगा. बाकी काम फिर जी-जान लगाकर निबटाना ही है. अइसा करो, बाबा कमालुद्दीन से मिल लो. कोई कमी न छोड़ो. चार-पांच हज़ार लगेंगे पर वह मसला हल करा देंगे. बड़े पहुंचे हुए हैं. कचहरी के पास उनका मकान है.”
“अरे! हम ना जा रहे इन बाबन-वाबन के पास! यह सब अइसे ही लूटने बैठे हैं. उधर जमीन अधर में पड़ी, और इधर ये गिद्ध नोच डलिये!”
मुस्तफ़ा की आँखों में आँखें डालकर, “अरे कोसिस करो, वरना जमीन जाते बखत न लगी. देख ही रहे हो आजकल का माहौल… मुसलमानों की हर अमानत आफ़त में है.”
वह आखिरी जुमला मुस्तफ़ा के सीने में तीर की तरह चुभ गया. बादल आ रहे थे, घड़घड़ा रहे थे लेकिन बरस नहीं रहे थे.
मुस्तफ़ा परेशान से घर लौटें.
“कहाँ हैं इम्तियाज़?”
इम्तियाज़, मुस्तफ़ा और फ़िरोज़ा की तमाम मन्नतों के बाद पैदा हुआ इकलौता बेटा.
“सोई रहें, अबहिं स्कूल से आये” फ़िरोज़ा ने बड़े लाड से कहा. इम्तियाज़ ग्यारहवीं का छात्र था. आज पहली बार मुस्तफ़ा को इम्तियाज़ की ज़रुरत पड़ी थी.
“इ लो, इन्हां घर दुआर लुटे जा रहा और ई साहेब सोइ रहें, जाके उठाओ” फ़िरोज़ा ने इम्तियाज़ को उठाया तो वह आँखें मलते हुए अब्बा के पास आया.
“कल सुबहों तहसीलदारी जाना है, जाने कहाँ-कहाँ भागे पड़ी.”
फ़िरोज़ा उम्मीद से, “कल फ़ैसला हो जाइ?”
“अब का हम अल्लाह मियां है. पुराने कागज धरोहर की तरह संभाले बैठे रहे.”
“तो का पुराने कागज न सँभालते?”
“अब तोह को का समझाए, जब हमें ही कुछ ना समझ आ रहा.”
“या अल्लाह क्या चौधरी एकदम्में बदल गए”
“चौधरी अकेले ना है अम्मा बदले वालों में, सबहिं हिन्दू रंग दिखाये रहें, जब तक हम लोग इनकी आँखें दिखियें यह अइसन ही दिखईये, अब तो इनकी आँखें निकार के कंचे खेले का बखत आ गया हैं.”
इम्तियाज़ की बातें सुनकर मुस्तफ़ा एकदम से भभक गए और झुककर जैसे ही अपने पैरों से चप्पल निकाली. इम्तियाज़ कमरे की तरफ़ लपका और मुस्तफ़ा उसके पीछे. उसने फट से कमरे की सिटकनी लगा ली. फ़िरोज़ा उबलती हुई चाय का पतीला छोड़ मुस्तफ़ा के पीछे दौड़ी.
मुस्तफ़ा कमरे के दरवाज़े पर चप्पल फेंकते हुए,
“ऐ देखो हरामखोर की बातें, हग्गे की तमीज ना हैं, आँखें निकार के कंचे खिलिहें. अरे बउवा पढ़ लेयो. आजकल सीधे-साधे लोग बेवकूफ़ कहलाये है. पढ़े-लिखे से थोड़ी समझदारी और चालाकी आती है यही सब तो हम कर ना पाए.”
वह माथे पर हाथ रखते हुए धम्म से दरवाज़े की चौखट पर बैठ गए. घर के मज़बूत खम्बे को ऐसे बिखरता देख फ़िरोज़ा की आँखें डबडबा गयीं.
6.
रात बेचैनी में बीती. सुबह ही इम्तियाज़ और मुस्तफ़ा घर से निकल पड़े. ये जानते हुए कि ग्यारह बजे से पहले तहसीलदार अदालत में काम ही शुरू नहीं होगा. फ़िरोज़ा ने रोका था थोड़ा ठहर के चले जाना. कुछ खा लो. लेकिन वह बिना खाये एक प्याला चाय पीकर घर से निकल गए. शब्बीर की कही बातें उनके दिमाग में घूम रही थी. इम्तियाज़ चुपचाप साथ चल रहा था. उसे बीती शाम की अब्बा की चप्पल याद थी. मुस्तफ़ा मन ही मन सोच रहे थे कि एक बार शब्बीर के बताये हुए बाबा से मिल ले. बताये रास्ते के हिसाब से हनुमानजी के मंदिर की सीध में लगे पीपल के पेड़ से एक रास्ता दाहिनी ओर मुड़ा था. मुड़ते ही पहली गली में पहला मकान जैसे शब्बीर की आवाज़ उनके कान में गूंजी. अब वह दोनों एक दरवाज़े के सामने थे. घड़ी नौ बजा रही थी. दीवारों का हरा रंग और छत पर लहराते हरे झंडे देख, इम्तियाज़ ने कुछ अंदाज़े लगा लिए. घर के दरवाज़े में घुसते ही बाबा के चेले ने रोका, उसने मुस्तफ़ा से नाम पूछा और एक पर्ची पर लिख लिया. उनसे वहीं बैठकर इंतज़ार करने को कहा. क़रीब 10 मिनट बाद उन्हें बुलाया गया. अंदर कमरे में बाबा हाथ में तसवी लिए गऊ तकिया लगाए दीवान पर बैठे थे. ऊपर से नीचे तक हरे हो रखे थे, मतलब हरे रंग का चोगा पहने और हरी पगड़ी बांधे थे. आँखें सुरमें से भरी थी, दाढ़ी का रंग मेहँदी से लाल. कमरा लोबान और अगरबत्ती की मिलीजुली ख़ुशबू से महक रहा था.
बाबा ने बड़े अदब और रुआब के साथ कहा, “क्या मसला हैं, ज़रा तफ़सील से बताये?”
मुस्तफ़ा ने तफ़सील से बताया. पूरी बात सुनकर बाबा ने गहरी साँस ली, “मसला बहुत पेचीदा हैं, ख़ाली तावीज़ और दुआ से काम नहीं बनेगा, वक़्त भी बहुत कम हैं.”
फिर वो थोड़ी देर चुप रहने के बाद, “मैं ऐसा करता हूँ, दो जिन्नात तुम्हारे साथ भेज देता हूँ, फ़ैसला तुम्हारे हक़ में करवा देंगे.”
मुस्तफ़ा शुक्रिया अदा करते हुए बहुत मामूली सा मुड़ते ही है कि यकायक ठहरकर पलटते है. चेहरे पर संजीदगी और आँखों में हैरत के साथ, “बाबा, जिन्नात खुदे कचहरी आ जायेंगे?”
बाबा सुरमा भरी बड़ी-बड़ी काली आँखों से घूरते हुए, “कैसी बात करते हो, थोड़ा पाक़ परवरदिगार से डरो, वो अकेले आएंगे…साथ लेकर जाना.” इम्तियाज़ चुपचाप किनारे बैठा मुस्तफ़ा और बाबा की गुफ़्तग़ू सुन रहा था. जिन्नातों के बारे में सुनकर उसके बदन में झुरझुरी हो रही थी.
बाबा फिर बोले, “अभी साढ़े नौ बजे हैं, इतनी देर जिन्नात वहाँ क्या करेंगे? साधन क्या हैं आपके पास?”
मुस्तफ़ा चौंकते हुए, “हम तो टेम्पो से आये है. तहसीलदारी इन्हां से आधा किलोमीटर है पैदल ही चले जायेंगे.”
बाबा तुनक के, “वाह भाई! तुम पैदल जाओ या उड़कर तुम्हारी मर्ज़ी. मगर हमारे जिन्नात नापाक ज़मीन पर पैर घिसते थोड़े जायेंगे.” इम्तियाज़ के दिमाग में ठनका का जूता-चप्पल भी नहीं पहनते जिन्नात.
“ये तुम्हारा लड़का हैं ना?” बाबा ने इम्तियाज़ की तरफ इशारा करते हुए कहा. मुस्तफ़ा ने हाँ में सिर हिला दिया.
“इसे छोड़ जाओ, इसके साथ भेज देंगे. साइकिल चला लेता होगा…? बाहर साइकिल खड़ी है. उसी पर बैठा ले जायेगा दोनों को. मुस्तफ़ा ने एक निगाह इम्तियाज़ पर डाली, फिर बाबा की तरफ़ मुखातिब होकर हामी भर दी.”
इम्तियाज़ का चेहरा पीला पड़ गया, काटो तो खून नहीं. अब्बा के सामने मुँह खोलने की हिम्मत नहीं. बाबा से कुछ कह नहीं सकता. उसकी हालत क़ुर्बानी के बकरे वाली हो गयी. उसके आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा, तभी उसे अब्बा की आवाज़ सुनाई दी…”सही से अउर बख़त पर आ जाना” यह एक फ़रमान था इससे पहले तक उसे एक मामूली-सी आस थी कि अब्बा उसे इस मुसीबत में अकेला छोड़ कर नहीं जायेंगे. मानो उसकी ज़ुबान को लकवा मार गया हो. जिससे चाह कर भी आवाज़ न निकली. फिर उसने हाँ में सिर हिलाया, सिर हिलाते हुए उसे महसूस हुआ जैसे उसका सिर बहुत वज़नी हो गया हो और जिसे हिलाने में उसने अपनी जिस्मानी ताक़त झोंक दी हो. मुस्तफ़ा मुड़ के चल दिए और उन्हें जाते हुए देख इम्तियाज़ के दिल से आह निकली, “या अल्लाह अइसा अब्बा किसी को ना देना.”
बाबा कमालुद्दीन ने इम्तियाज़ से ग्यारह बजे तक बाहर इंतज़ार करने को कहा. वह चुपचाप बाहर बैठ गया और अपने अंदर की सारी हिम्मत एक-जुट करके डर को मिटाने की जद्दोजहद में लग गया. वह जानता था कि उसे यह ज़िम्मेदारी अच्छे से निभानी पड़ेगी, वरना अब्बा के साथ एक घर में रहना मुश्किल हो जायेगा और रुपये भी बाबा जमा करवा चुके थे. वह आज ऐसे दोराहे पर था जिसके एक तरफ़ कुआँ और दूसरी तरफ़ खाई थी.
ठीक ग्यारह बजे, बाबा इम्तियाज़ से मुख़ातिब हुए, “हाँ, अब तुम दोनों जिन्नातों को लेकर कचहरी के लिए निकलो, तुम्हारे अब्बा का केस लगने वाला हैं. दूर से दोनों को अपने अब्बा की पहचान बता देना, बाकी सब ये संभाल लेंगे.”
बाबा जिन्नातों के बारे में ऐसे बात करते जैसे वह उनके पालतू कुत्ते हो, मन ही मन सोचते हुए इम्तियाज़ अपने आप से बोला, ‘ख़ैर, जैसी अल्लाह मियां की मसलिहत.’
“कुछ बोले तुम”
“न, हम पूछ रहें इह दोनों साइकिल पर कइसे बैठेंगे”
“अरे जैसे हम लोग बैठते हैं. एक को आगे डंडे पर बैठा लेना और एक को कर्रिएर पे”
“हमको कइसे पता लगे की दोनों जने बैठ गए”
“वज़न पड़ेगा भाई, बगैर वज़न के थोड़े ही हैं, जिन्नात”
“बाबा साहेब…अभी कहाँ हैं दोनों जने” इम्तियाज़ हिम्मत बटोरते हुए.
“तुम्हारे बगल में खड़े हैं” जवाब सुनते ही इम्तियाज़, सिर से पाँव तक झनझना गया और उसके लड़खड़ाते कदम ख़ुद-ब-ख़ुद पीछे को सरक गए.
इम्तियाज़ के सवाल सुनकर और उसकी हालत समझकर, बाबा अपने पैर समेटते है और चादर पर आयी सिलवटों को अपने दाहिने हाथ से सहेजते हुए, थोड़े कड़क अंदाज़ में,
“तुम सब यहीं बतियाओगे, तो तुम्हारे अब्बा केस हार ही जायेंगे, अब जाओ जल्दी. ये दोनों भी कब से खड़े हैं, तुम्हारे साथ-साथ जायेंगे.”
इम्तियाज़ आगे बड़ा और उसे महसूस हुआ जैसे उसके पीछे कदमों की आहट आ रही हैं. वह बाहर जाकर साइकिल पर सवार हुआ और अपने पास बायीं तरफ़ मुँह करके बड़े अदब से शहरी बोली में बोला, “आप दोनों लोग एक-एक करके डंडे और कर्रिएर पर बैठ जाये” और फिर बाएं हाथ से हैंडिल छोड़ते हुए साइकिल के डंडे पर बैठने की जगह दी. उसके हाथ पैरो में झुरझुरी उठ रही थी लेकिन बहुत कोशिश कर उसने अपने आप को काबू कर रखा था. उसने महसूस किया जैसे डंडा हल्का सा दबा और फ़ौरन ही उसे वज़न महसूस हुआ, उसने जल्दी से बाएं हाथ से हैंडिल पकड़ कर साइकिल को संभाला. फिर हिम्मत करके बायीं तरफ़ सर उठाकर बोला, “आप कर्रिएर पर बैठ जाइये” कुछ सेकेण्ड में उसे कर्रिएर पर वज़न महसूस हुआ.
इम्तियाज़ को यह सब करते हुए सफ़ेद कुर्ता पैजामा और हरी पगड़ी पहने बाबा का चेला आँखें फाड़े, खामोशी से बिना किसी हाव-भाव के गहराई में डूबे हुए देख रहा था.
अब उसने अपना पैर साइकिल के पैडल पर मारा और धीमी रफ़्तार में आगे बड़ा, साथ ही साथ वह सारी आयतें जो उसे याद थी पढ़ने लगा. वह साइकिल संभाल कर चला रहा था ताकि जिन्नातों को किसी तरह की तक़लीफ़ न हो, खड्डे, कंकड़, पत्थरो से बच बचाकर निकल रहा था. उसने सुन रखा था कि अगर जिन्नातों को गुस्सा आ जाये तब उनसे बच पाना नामुमकिन है. साइकिल पर वज़न बहुत था. वह महसूस कर रहा था जैसे अब्बा के बराबर लम्बे तगड़े दो आदमी बैठे हो. तहसीलदारी से कुछ पहले सड़क पर मरम्मत का काम चल रहा था, चारों तरफ़ सड़क खुदी पड़ी थी लोग उसी में से हिचकोले खाकर निकल रहे थे.
तब इम्तियाज़ फिर चलती साइकिल में बड़ी ही नरमी, दर्द और अपनी बोली में नज़ाक़त लाते हुए जिन्नातों से मुख़ातिब हुआ, “आप लोग थोड़ा संभल कर बैठिएगा, यहाँ सड़क टूटी हैं, हचके लगेंगे, हमें माफ़ कर दीजियेगा.”
ख़ैर अल्लाह-अल्लाह करके सड़क पार हुई और वह दोनों जिन्नातों के साथ कचहरी पहुँच गया.
ब्रेक लगाते हुए, “आप लोग उतर जाएँ तो हम साइकिल स्टैंड पर लगा दें” अचानक साइकिल पर का वज़न छूमंतर हुआ और इम्तियाज़ का बैलेंस बिगड़ा. वह डगमगा गया. स्टैंड पर साइकिल लगाकर वह वापस उसी जगह पर आया जहाँ साइकिल की ब्रेक लगायी थी. वह पसीने से भीगा हुआ, अदब से झुकते हुए बोला, “चलिए मेरे साथ.” जब वे पहुंचे तब मुस्तफ़ा की पेशी शुरू हो गयी थी. मुस्तफ़ा, चौधरी और तीन काले कोट वाले कमरे में मौजूद थे. कमरे के बाहर आने जाने वालों का तांता लगा हुआ था. उसी बीच सबसे आँख चुराते हुए इम्तियाज़ धीमी आवाज़ में फिर जिन्नातों से मुख़ातिब हुआ,
“देखिये वह जो दाहिनी तरफ़ सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने, काली टोपी लगाए खड़े हैं वह हमारे अब्बा मुस्तफ़ा अली हैं. बस इन्हीं के हक़ में फैसला करवाना हैं.”
जब इम्तियाज़ हवा में बाते कर रहा था तब एक आदमी उसे घूरने लगा, उससे आँख मिलते ही वह चुप हो गया और इधर-उधर देखने लगा. कुछ सेकेण्ड बाद वह आदमी आगे बढ़ गया तो फिर वह मुख़ातिब हुआ, “अब आप लोग अंदर चले जाइये, हम बाहर इंतज़ार करेंगे.” यह कहकर, वह दो मिनट रुका और फिर बाहर कचहरी के मेन गेट की तरफ़ चला गया.
7.
अरे पठान साहब ये किस ज़माने के काग़ज़ ले आये, “कौन सी भाषा है… उर्दू?”
अपने काग़ज़ों पर गर्व करते हुए, “न, फ़ारसी मौर्यध्वज में आने वाले बैस राजाओ के बखत की. वैसे सब अवध के नवाबों की सरपरस्ती में रहें”
“इन काग़ज़ों पर कैसे फैसला होगा, अभी तो यही पता करना पड़ेगा ये ज़मीन आपकी है भी कि नहीं”
“कैसी बात कर रहे है साहेब”
“अभी तक कहाँ थे. ज़माना कहाँ से कहाँ पहुँच गया. डिजिटल युग आ गया. तुम इन पीले पड़े बिखरते काग़ज़ों से न निकल पाए”
“हाँ मालूम है साहेब, हाल फ़िलहाल में ये नया युग आया है. आप बताओ का ये काग़ज़ ज़मीनी हक़ के दस्तावेज न है?”
“है पठान साहब, लेकिन आजकल ये सब सबको मनवाना आसान न रहा और ऊपर से तुम”
“का मतलब?”
“मतलब रहने दो, अब जाओ पहले इन काग़ज़ों को सुधारो. मुंशी जी से जानकारी लो.” बिना किसी फ़ैसले के जज साहब ने उन्हें बाहर भेज दिया.
मुंशी जी काग़ज़ों को उलटते पलटते हुए, “तुम तो शाही फ़रमान लिए घूम रहे हो. काहे पे आये हो रथ पर या बग्घी पर.” कुछ मिनट तक काग़ज़ों को देखने के बाद संजीदा होते हुए, “वैसे ये अच्छी बात है कि तुम्हारे पास ज़मींदारी उन्मूलन 1952 की सरकारी पर्ची है. ये बहुत बड़ा और मजबूत कानूनी प्रमाण है. ऐतिहासिक साक्ष्य, वंशावली के प्रमाण के रूप में काम आ जायेंगे” कुछ देर और काग़ज़ों को परखते हुए, “लेकिन भाई सब कुछ ऐतिहासिक ही है. मामला राजस्व नियमों का है, अब डिजिटल भारत में हो, मालूम है. काम अभी बहुत बाकी है.”
“हाँ भैया…अब मालूम पड़ रहा है” मुस्तफ़ा की घबराहट देखकर चौधरी मुस्कुराते हुए निकल गए.
मुंशी जी हल्की-सी मुस्कराहट के साथ, “तुम्हारी ज़मीन के काग़ज़ तो वक़्फ़ की ज़मीन के काग़ज़ों से भी दुर्लभ और ऐतिहासिक हो गए.” ये सुनकर मुस्तफ़ा और ज़्यादा घबरा गए. उनकी घबराहट महसूस करके,”अरे मज़ाक कर रहे. देखो क्या होता है, बहुत लम्बी चौड़ी कानूनी कायर्वाही है. अपना व्हाट्सप्प नंबर बोलो तो कुछ जानकारी भेजे.” मुस्तफ़ा अपने कुर्ते की जेब से बटन वाला फ़ोन निकालते है. मुंशी जी देखते ही, “अरे बाबा इतनी बड़ी ज़मीन के मालिक हो और फ़ोन ये रखे हो. छोड़ो अब तुम मेरी बात गौर से सुन लो. चाहो तो लिख लो.” लिखने में भी हाथ तंग था. इम्तियाज़ कहीं नज़र नहीं आ रहा था. मन ही मन दो गलियां इम्तियाज़ को देते हुए मुंशी जी के हाथ जोड़े. आप सब ज़रूरी जानकारी बता दो बहुत मेहरबानी होगी.
इम्तियाज़ जिन्नातों को अब्बा के पास भेज कर बाहर बेंच पर बैठा, अल्लाह को याद कर रहा था. बहुत बहादुरी के काम को अंजाम देने के बाद ठंडी सांसे भर रहा था. काफ़ी देर हो चुकी थी तब वह आहिस्ता-आहिस्ता अंदर पहुंचा. अब्बा का चेहरा पीला पड़ा हुआ था. मुंशी जी जानकारी दे रहे थे क्या और कैसे करना है. वह अपनी जेब से काग़ज़ पेन निकालकर जल्दी से एक लड़खड़ाते स्टूलपर बैठ गया. उसकी मुद्रा देखकर मुंशी जी बोल पड़े, “कानूनी कार्यवाही होगी रिकॉर्ड दुरुस्ती तहसीलदार न्यायालय में होगी. सबसे पहले उत्तर प्रदेश सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर खसरा और खतौनी ऑनलाइन चेक करवायो “मुंशी जी कुछ देर चुप रहकर, “अगर आपके दादा, परदादा या पूर्वजों का नाम दर्ज है. लेकिन शजरा आगे नहीं बढ़ा है. तब तुम्हे तहसील में विरासत दर्ज कराने के लिए आप्लिकेशन देनी पड़ेगी.” कुछ देर शांति रही, “सबसे ज़्यादा माथपच्ची तुम्हे अपने आपको साबित करने में ही लगेगी, कि अब तुम ज़मीन के मालिक हो.” मुस्तफ़ा चौंकते हुए, “वह काहे साहब हमारे अब्बा का और कोई वारिस न था. फिर काहे की मुश्किल?”
मुंशी जी लम्बी साँस खींचते हुए, “आजकल खुद को साबित करना सबसे मुश्किल काम बन गया है. ज़मीन जायदाद के मामले में और भी ज़्यादा.”
मौसम बहुत ख़राब था. बेइंतिहां उमस चारो तरफ़ बिखरी हुई थी. छत पर बूढ़े हो चुके पंखे टंग रहे थे. जो हवा से कहीं ज़्यादा आवाज़ फैला रहे थे. मुंशी जी कुछ-कुछ देर में अपने रुमाल से पसीना पोंछ रहे थे. इस मौसम में हर मख्लूक़ के लिए बारिश का इंतज़ार बहुत ही आम बात है. लेकिन किसान की आँखें आसमान पर टंगी रहती है. उसके खेत तैयार रहते है और बीज राह तक रहे होते है अपने बोये जाने की. पहली बारिश में एक देग हलवा बनवाने वाले मुस्तफ़ा अब बारिश का इंतज़ार नहीं करते.
अचानक आसमान से कुछ छींटे पड़ती दिखती है. मुंशी जी काग़ज़ों से सिर उठाकर खिड़की की तरफ़ देखते है और एक बार फिर मेज़ पर रखे अपने रुमाल से पसीना पोछते है,
“अपने ग्राम प्रधान और लेखपाल से मिलकर एक पक्की वंशावली बनवाओ, जो यह साबित करे कि शाही पट्टे में दर्ज मूल व्यक्ति और ज़मींदारी उन्मूलन में दर्ज व्यक्ति के वैध वारिस आप ही हैं. ग्राम प्रधान से प्रमाणित शजरा बनवाना बेहद जरूरी है ताकि आपका उनसे खून का रिश्ता साबित हो सके. सबके मृत्यु प्रमाण पत्र और अपना जन्म प्रमाण पत्र भी लगाना पड़ेगा. सब बनवा लो.”
मुसीबत में पड़े मुस्तफ़ा के गठीले चेहरे की हर शिकन गहरा गयी थी. सिर और माथे से उतरता पसीना इन शिकनों में से गुजरने की कोशिश करता आगे बढ़ रहा था,
“हमें तो अपने दादा परदादा किसी के मरे का दिन, साल, महीना नहीं मालूम. न ही अपने जन्में का. कइसे बनेगा ये सब?”
“सब बनेगा. आजकल यही धन्धा ज़ोरो पर है. तुम्हारे पास अवध काल के कागज़ात के साथ ज़मींदारी उन्मूलन की पर्ची है और ज़मीन पर कब्ज़ा भी है, तो कानूनी पक्ष मजबूत है.”
कब्ज़ा सुनते ही मुस्तफ़ा की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा. वह सनसनाते हाथ एक दूसरे में रगड़ते हुए वहीं बैठ गए. मुंशी जी काग़ज़ों पर निगाह टेके हुए आगे बोले, “अब लग जाओ ज़ोर-शोर से, अगर ज़मीन का कब्ज़ा कायम रखना चाहते हो.”
ऐतिहासिक काग़ज़ मुस्तफ़ा को थमाते हुए, मुंशी जी जोश से बोले, “वकील कहाँ है तुम्हारा?”
“आज आया नाही, साल से ऊपर हो गया. पइसा खा रहा है. एक काम न कराया.”
“पहला काम, तुम वकील बदलो और कोई अच्छा वकील करो.”
एक और मुसीबत का आगमन सुनकर मुस्तफ़ा लाचारी से, “अच्छा वकील कइसा होता है?”
मुंशी जी मुस्कुराते हुए, “ये अब तुम्हे पहचानना पड़ेगा” वह फिर बोले, “चालाकी और समझदारी दोनों चाहिए. वकीलों से काम निकालना लोहे के चने चबाने जैसा है.”
मुस्तफ़ा उम्मीद से मुंशी जी का चेहरा ताक रहे थे, “अगर हम ये सब ना करा सके?”
“तब ज़मीन सरकार की हो जाएगी और तुम बेघर” मुंशी जी सपाट से बोल गए.
पास बैठा आदमी जो काफ़ी देर से सुनने के अमल में शामिल था. बोल पड़ा, “अब देश बहुत सुधर रहा है. इस देश के रहने वाले होंगे तो प्रमाण भी होंगे. घुसपैठिये निकाले जा रहे है. घुसपैठियों ने देश बर्बाद कर रखा था” वह थोड़ा अकड़कर बैठा, “जिसके पास मज़बूत प्रमाण नहीं वह जाए पाकिस्तान.” उस आदमी की बात सुनकर इम्तियाज़ का खून खौल गया. लेकिन माहौल की नज़ाकत समझकर उसने खुद को रोक लिया. मुंशी जी पर उस आदमी की बात का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. मुस्तफ़ा अपनी मुश्किलों में मुब्तिला उसे सुन ही नहीं पाए.
वह आदमी डिजिटल युग के बख़ान करता रहा. मुंशी जी नज़र भर उस आदमी को देखकर, मुस्तफ़ा से मुख़ातिब हुए, काफ़ी देर से मुस्तफ़ा से बात करते हुए वह उसकी परेशानी और बेचैनी महसूस करने लगे थे. हिम्मत बंधाते हुए, “घबरायो नहीं, तुम्हारे केस में मज़बूती है. घर जाओ, दिमाग शांत करके ये सब काम शुरू करो.”
इतनी ढेर काग़ज़ी कार्यवाही के बारे में सोचते हुए वह इम्तियाज़ के साथ बाहर निकले. बैठते दिल के साथ वह वही पर नीम के पेड़ के नीचे बनी पत्थर की बेंच पर बैठकर शून्य में ताकने लगे. ‘हर जगह मुंशी जी जैसा नेक आदमी नहीं मिलेगा. जो इतना वक़्त दे. एक नया अच्छा वकील भी खोजना था, सोचते हुए उनके माथे से टपकती पसीने की बूंदे महीन धार में तब्दील हो गयीं.
8.
इम्तियाज़ कुछ कहना चाह रहा था, लेकिन हिम्म्त बांधते हुए उसे क़रीब दस मिनट लग गए, “अब्बा…दो जिन्नात हम छोड़ के आये रहें तुम्हारे पास, वो कुछ ना करिन का?”
“कऊन जिन्नात?” मुस्तफ़ा अपनी परेशानी में जिन्नातों की कहानी भूल ही गए थे. इम्तियाज़ चौंका कि जो काम उसने अपनी जान पर खेल कर किया है, वह तो अब्बा भूल ही गए, इनाम और शाबाशी दूर की बात हैं.
“ओहि जो बाबा कमालुद्दीन भेजिन था”
अचानक मुस्तफ़ा के ज़हन में कुछ घंटे पहले गुज़री वारदात ने ज़ोर की दस्तक दी, “ओए साला, चार हज़ार रूपये जमा करा लिया अउर कउनो काम ना बना. वे साले साइकिल पे लद के, इन्हां सैर सपाटे को आये थे. आज के जमाने में कउनो का भरोसा ना रहा. अब बताओ जिन्नातों ं दो नम्बरी हो गए” मुस्तफ़ा की घबराहट बेचैनी कुछ वक़्त के लिए गुस्से में तब्दील हो गयी और वह जिन्नातों ं को बुरा-भला बोलते रहें.
“चल. घर चलें” मुस्तफ़ा अचानक से बोलें.
इम्तियाज़ डरते हुए, “पहले जिन्नातों ं को छोड़ आएं?”
“काहे…मरन देओ, जावेंगे अपने आप, कउनो बहुत कमाल करिन हैं जो डोली में छोड़ के आवें.”
“बाबा की साइकिल उठा, हमें बिठा पीछे. उसके दरवाज़े पे छोड़कर घर निकल जायेंगे. हमाई भी मति मारी गयी जो हरामखोर बाबा के चक्कर मा पड़ गए, साइकिलन पर जिन्नातन को भिजवा दिया साला.” अब्बा की एक-एक बात सुनकर इम्तियाज़ का खून सूख रहा था.
9.
थके-हारे वे घर पहुँचे. फ़िरोज़ा ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, मुस्तफ़ा अंदर घुसते ही चारपाई पर लेट गए. उनके दिमाग में काग़ज़, वकील, कचहरी, मुकदमा, शजरा, खसरा, पटटा, ऐतिहासिक धरोहर जाने क्या-क्या गूँज रहा था. फ़िरोज़ा उनसे कुछ पूछ रही थी लेकिन थकावट उनको तेज़ी से नींद की आगोश में ले रही थी. उनके सामने हवा में ढेर काग़ज़ ऊँचे और ऊँचे उड़ते जा रहे थे और वह उन्हें पकड़ने के लिए बदहवास से उनके पीछे भाग रहे थे. बार-बार हाथ ऊंचाकर के उनको लपकने के लिए कूद रहे थे, फिर लड़खड़ा कर गिर रहे थे.
इम्तियाज़ कि निगाह घर के दरवाज़े पर थी. खुले किवांड़ हवा के झोंको से बार-बार चौखट से टकरा रहे थे. न चाहते हुए भी उसकी निगाह खुले किवांड़ो पर अटक जाती. उसका ज़हन कुछ सवालों में उलझा था. उसने साइकिल पर जिन्नातों ं के वज़न को महसूस किया था. वह जिन्नातों ं के वुजूद से इनकार नहीं कर सकता था. जिन्नातों ं का उनके हक़ में कुछ न करना उसे कचोट रहा था. वह बाबा से मिलकर पूछना चाहता था. वह जिन्नातों से भी पूछना चाहता था. उसका दिमाग थक चुका था. अब्बा को सोया देखकर वह भी लेट गया और मानो किसी ने उसका सर सहलाना शुरू किया तो उसे नींद आ गई. कोई उसे पुकार रहा था इम्तियाज़….
10.
अधिकारियों और विभागों के चक्करों ने मुस्तफ़ा के जूते घिस दिए थे. कुर्ते पाजामें अपना उजला सफ़ेद रंग खो चुके थे. ज़ेवर बिक रहे थे. जेब खाली हो गयी थी. वकील कठपुतली का नाच नचा रहा था. चौधरी चमक रहा था. आधी ज़मीन पर फैक्ट्री डालने का काम शुरू हो गया था. सबकुछ जायज़ था. चौधरी मेयर का चुनाव लड़ा और धूम-धाम से जीत गया.
इम्तियाज़ ने पंचर का काम नहीं, लोहे-लंगड़ का काम सीखना शुरू किया. पढ़ाई छूट गयी, वैसे भी आये दिन पेपर लीक हो रहे थे. परीक्षाएं रद्द हो रही थी. नौकरियां थी नहीं. ये सब वह ही झेल सकता है जिसके पास पैसा और वक़्त हो. इम्तियाज़ के घर से अब ये दोनों आसाइश नदारद थी. नए और गरम खून से लबरेज़ इम्तियाज़ माहौल की नज़ाकत बहुत जल्दी समझकर बुझ चुका था. कुनबे की ज़िम्मेंदारी उसके अधूरे मज़बूत कंधो पर वक़्त से पहले आ गयी थी.
चौधरी मेयर बन गया. अगला टारगेट MLA का था. मुस्तफ़ा नबीना की तरह काग़ज़ों के लिए सिर मार रहे थे कहीं एक सुलझाव क़ामयाबी की तरफ़ बढ़ता तो कई नयी उलझाव मुँह फाड़े खड़े दिखते. कोई काम ढंग से नहीं हो रहा था. चौधरी की बढ़ती ताक़त देखकर इम्तियाज़ ने ज़मीन पाने का ख़्वाब छोड़ दिया था. अब्बा को भी घर बैठने की सलाह दी. लेकिन मुस्तफ़ा नहीं माने ….
चंद सालों की ज़िंदगी में मिले गहरे ज़ख़्म, फ़रेब और ग़ैर-बराबरी को अपने दिल में दफ़न करके लड़ते रहने की ज़िद और उसकी कड़वाहट को दरकिनार कर इम्तियाज़ लोहे के काम में एक अच्छा कारीगर बन रहा है. वह खुद को लोहार नहीं आयरनवर्कर कहलवाना पसंद करता. इन्हीं दिनों उसके हाथ एक ढीली-ढाली, बेदम-सी पुरानी साइकिल लगी. अपने खाली वक़्त को उसने उस मरुभूमि जैसी सूनी साइकिल को नया रंग-रूप देने में लगा दिया. साइकिल में एक मज़बूत और ख़ूबसूरत कर्रिएर जोड़ा, जिस पर नर्म फ़ोम की गद्दी मढ़ी. साइकिल का पुराना डंडा हटाकर उसने लोहे के एक सख़्त पाइप को वेल्डिंग की चिंगारियों से जोड़ा और उस पर एक आरामदायक सीट लगायी. फिर हरे और काले रंग के पेन्ट्स से रंगकर एक खूबसूरत रूप देकर अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में ला खड़ा किया. यह पुश्तैनी घर, उसका अपना महफ़ूज़ कोना था, जिसके काग़ज़ात की मज़बूती में उसने कोई कमी नहीं छोड़ी थी. मुस्तफ़ा आज भी खेतों के काग़ज़ों की भूलभुलैया में भटक रहे थे, वहीं इम्तियाज़ ने अपने इस आशियाने की नींव के काग़ज़ों को पुख़्ता कर लिया था. मुस्तफ़ा की नज़र कभी उस साइकिल पर नहीं ठहरी, लेकिन फ़िरोज़ा जब-तब ठहरकर पूछ लेती—
“इतनी खूबसूरत साइकिल को यूँ नुमाइश की तरह घर में क्यों कैद कर रखा है?”
दरअसल, इम्तियाज़ को एक ख़ामोश भरोसा था. ज़माने की तमाम बंदिशों और ख़राबियों के बावजूद, उसके भीतर बग़ैर अल्फ़ाज़ों के एक उम्मीद धड़कती थी… कि किसी रोज़ इस साइकिल का डंडा दबेगा, कर्रिएर पर भी वज़न पड़ेगा. तब, वह कुछ जवाबों का इंतज़ार करते हुए, बेहद धीरे से कुछ पूछेगा….
उसी आशियाने में मुस्तफ़ा एक बेरहम गिर्दाब (भंवर) में फँस चुके थे, जो चट्टानों और पत्थरों से टकराता हुआ हर गुज़रते पल के साथ और गहरा, और तेज़ होता जा रहा था. मेयर के बढ़ते रसूख़ और दिन-ब-दिन मज़बूत होती ताकत के ख़िलाफ़ मुस्तफ़ा अकेले खड़े थे, और इस गिर्दाब से निकलने के सारे रास्ते संकरे हो चुके थे. उनकी ज़मीन, जो कभी सुकून से लहलहाती थी, अब सियासत और लालच के अँधेरे में छुप गयी थी.
दिनभर की थका देने वाली भाग-दौड़ से हारकर, मुस्तफ़ा ढलती शाम के साये में अपनी ही ज़मीन के किसी ओझल कोने में छुपकर बैठ जाते. वह बे-आवाज़ अपनी हथेलियों में वहाँ की मिट्टी को मसलते, जैसे उस मिट्टी में ख़ुद के वजूद को टटोल रहे हों. अब उस ज़मीन के पौने हिस्से पर शुगर मिल का कंक्रीट ढांचा खड़ा था और कुछ हिस्से पर गन्ने की फ़सल. कभी इसी मिट्टी की कोख से गेहूँ, चावल, अरहर और उड़द की हरी-भरी खुशहाली फूटती थी, जो न जाने कितने ग़रीब चूल्हों की भूख भी मिटाती थी. मगर आज यह ज़मीन खुद भूखी थी- अपनेपन, और मोहब्बत के लिए. कभी हरा लहलहाता यह खेत अब महज़ एक सर्द कारोबार बन चुका था. लाख नज़रअंदाज़ करने के बावजूद मिट्टी की वे पोशीदा बेड़ियाँ मुस्तफ़ा के पैरों को अपनी तरफ़ खींच लेती….
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उज़्मा कलाम एक निजी कॉलेज में अध्यापन करने के साथ-साथ महिला उत्थान से सम्बन्धित एक गैरसरकारी संगठन की परियोजना में सलाहकार के रूप में जुड़ी हुई हैं. जोधपुर, राजस्थान में रहती हैं. ‘काली बिल्लियों के साये में चटोरी चुड़ैल’ कहानी संग्रह राजकमल से प्रकाशित है. |




शानदार, दमदार, चुटीली और जरूरी कहानी। जिन्नात के तड़के ने इसे खास ऊँचाई दी है।
मार्मिक कहानी है। भारत ऐसे सच्चे मुस्तफाओं और इम्तियाजों की दुखद वास्तविकताओं से भरा पड़ा है। क्या कहें।
एक खूबसूरत, मार्मिक और उदास करने वाली कहानी, जिसमें हमारा समय और उसकी विडंबनाएँ बोलती हैं।
यदि हिंदी साहित्य में मुस्लिम जीवन पर लिखी गई प्रमुख कहानियों की परंपरा के संदर्भ में गिर्दाब को देखें, तो यह एक दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण रचना है, लेकिन अभी उसे उस ऊँचाई पर रखना जल्दबाज़ी होगी जहाँ राही मासूम रज़ा, शानी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, असगर वजाहत या नासिरा शर्मा जैसी परंपरा की प्रतिनिधि रचनाएँ आती हैं। इसके बावजूद, समकालीन संदर्भ में इसकी अपनी विशिष्ट पहचान है।
हिंदी में मुस्लिम जीवन पर लिखी गई श्रेष्ठ कहानियाँ केवल मुस्लिम पात्रों की उपस्थिति से महत्त्वपूर्ण नहीं बनतीं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मनुष्य को उसके पूरे सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक संदर्भ में प्रस्तुत करती हैं। उनमें धर्म पहचान का एक तत्व होता है, सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं।
उदाहरण के लिए राही मासूम रज़ा के यहाँ गाँव और मुसलमान अलग-अलग नहीं हैं; दोनों एक-दूसरे में घुले हुए हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह के यहाँ गरीब मुसलमान का संघर्ष आर्थिक है, धार्मिक नहीं। असगर वजाहत सांप्रदायिकता पर लिखते हुए भी व्यंग्य और मानवीय दृष्टि बनाए रखते हैं।
‘गिर्दाब’ इसी परंपरा से जुड़ने की कोशिश करती है।
मुस्तफ़ा पहले किसान है, बाद में मुसलमान। उसकी प्राथमिक चिंता खेत, ऋण, मुकदमा और परिवार है। यह कहानी की बड़ी उपलब्धि है।
जहाँ कहानी अलग पहचान बनाती है…
इस कहानी की सबसे बड़ी मौलिकता यह है कि यह मुस्लिम प्रश्न को “भूमि-अधिकार” और “दस्तावेज़ी अस्तित्व” के प्रश्न से जोड़ती है।
हिंदी साहित्य में किसान, भूमि विवाद और नौकरशाही पर बहुत लिखा गया है, लेकिन
• नागरिकता
• दस्तावेज़
• डिजिटल रिकॉर्ड
• विरासत
• शजरा
• ऑनलाइन राजस्व व्यवस्था
इन सबको एक मुस्लिम किसान की कथा में इस तरह पिरोना अपेक्षाकृत नया है।
यहीं गिर्दाब अपने समय की कहानी बनती है।
कहानी का सबसे मजबूत पक्ष उसका लोक-जीवन का अनुभव है।
घर का वातावरण,
पति-पत्नी के संवाद,
अवधी मिश्रित भाषा,
आर्थिक टूटन,
बेटे की पढ़ाई छूटना,
ये सब अत्यंत विश्वसनीय हैं।
इम्तियाज़ का चरित्र विशेष रूप से याद रह जाता है।
अंत में साइकिल का प्रतीक कहानी को साधारण यथार्थ से उठाकर साहित्यिक ऊँचाई देता है।
जहाँ यह पूर्ववर्ती परंपरा से पीछे रह जाती है…
यहीं इसकी सीमाएँ भी स्पष्ट होती हैं।
श्रेष्ठ मुस्लिम कथा-लेखन में लेखक अपने विचारों को पात्रों और घटनाओं के भीतर विलीन कर देता है।
गिर्दाब में कई स्थानों पर लेखक का वैचारिक हस्तक्षेप प्रत्यक्ष हो जाता है। इससे कहानी कहीं-कहीं कथा कम और टिप्पणी अधिक लगने लगती है।
दूसरी बात, चौधरी और कुछ अन्य पात्र अपेक्षाकृत एकरेखीय हैं। राही मासूम रज़ा या शानी के यहाँ विरोधी पात्र भी अपने सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों के साथ आते हैं। गिर्दाब में यह जटिलता अपेक्षाकृत कम है।
तीसरी बात, बाबा कमालुद्दीन और जिन्नात वाला प्रसंग प्रतीकात्मक स्तर पर प्रभावशाली है, लेकिन यथार्थवादी कथा के प्रवाह में उसका विस्तार कुछ पाठकों को असंगत लग सकता है।
फिर भी गिर्दाब को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
यह उन नई कहानियों में है जो यह दिखाती हैं कि आज का संकट केवल सांप्रदायिक तनाव नहीं, बल्कि दस्तावेज़ों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और संस्थागत शक्ति का भी संकट है। कहानी यह स्थापित करती है कि किसी व्यक्ति का इतिहास, स्मृति और श्रम भी तब तक पर्याप्त नहीं माने जाते, जब तक वे सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज न हों।
यदि हिंदी साहित्य में मुस्लिम जीवन पर लिखी गई कहानियों की परंपरा को तीन स्तरों में बाँटा जाए, तो ‘गिर्दाब’ को समकालीन दौर की एक उल्लेखनीय और संभावनाशील कहानी कहा जा सकता है, लेकिन अभी उसे क्लासिक श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।
इसकी ताकत है इसका जीवंत ग्रामीण यथार्थ, किसान-मुस्लिम जीवन का विश्वसनीय चित्रण, दस्तावेज़ और भूमि-अधिकार के संकट को कथा का केंद्र बनाना, तथा मार्मिक अंत। इसकी सीमाएँ हैं लेखक का कभी-कभी प्रत्यक्ष वैचारिक हस्तक्षेप, कुछ पात्रों का एकरेखीय निर्माण और शिल्प में कुछ असंतुलन।
फिर भी, यदि उज़्मा कलाम अपनी आगामी कहानियों में इसी अनुभव-संपन्नता के साथ शिल्प को और संयमित करती हैं, तो वे हिंदी के मुस्लिम जीवन-लेखन की परंपरा में एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान बना सकती हैं।
इतनी सशक्त कहानी के लिए उज्मा कलाम और समालोचन को बधाई! साधुवाद!
आपकी गहन और मार्गदर्शनीय टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया
आज के हालात की बेहतरीन कहानी।
उज्मा जी मुबारकबाद की मुस्तहक हैं जो उन्होने इस विषय पर अपनी कलम चलाई और एक अच्छी कहानी रची।
शानदार कहानी है। छोटी से छोटी डिटेलिंग है। मायूसियां, विडम्बनाएं, संघर्ष, टूटन बहुत अच्छे से उभर कर आता है। लेकिन जिन्नात वाला संदर्भ पूरी क्लैरिटी के साथ नहीं आ पाया। चौधरी की बदमाशी, उसकी सांठ गांठ, हथकंडे और बारीकी से सामने प्रस्तुत होते तो कहानी और प्रभावी होती। फिर भी बहुत अच्छी कहानी
गिर्दाब कहानी पढ़ते हुए सबसे पहले जो अनुभूति मन में जन्म लेती है वह हमारे समय की उस विडम्बना की है जहाँ न्याय पाने की प्रक्रिया स्वयं सबसे बड़ा दंड बन जाती है। लेखक ने मुस्तफ़ा के माध्यम से उस आम नागरिक के भय, असहायता और टूटते हुए विश्वास को शब्द दिए हैं, जो पुलिस, अदालत और कानून जैसी संस्थाओं को अंतहीन पीड़ा का पर्याय मानने लगता है। कहानी का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि इसमें करुणा कहीं आरोप बनकर नहीं आती बल्कि धीरे-धीरे पाठक के भीतर उतरती है। मुस्तफ़ा का चरित्र अत्यंत जीवंत और विश्वसनीय बन पड़ा है। वह अपनी सीमाओं, भोलेपन, नैतिकता और असुरक्षाओं के साथ उपस्थित होता है। उसकी सबसे बड़ी त्रासदी उसकी सरलता है, जो बदलते समय की चतुर दुनिया में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। लेखिका ने यह स्थापित किया है कि मनुष्य व्यवस्था की जटिलताओं, कागज़ी प्रक्रियाओं और निरंतर टलते न्याय से भी धीरे-धीरे पराजित हो जाता है। मुस्तफ़ा का संघर्ष किसी एक मुक़दमे का संघर्ष नहीं रह जाता; वह अपनी पहचान, अपने पूर्वजों और अपनी मिट्टी को बचाने का संघर्ष बन जाता है।
कहानी की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि इसका यथार्थबोध है। ग्रामीण समाज, प्रशासनिक प्रक्रियाएँ, भूमि विवाद, राजनीतिक संरक्षण, दस्तावेज़ों का संकट और डिजिटल व्यवस्था की जटिलता इन सभी को लेखिका ने बिना किसी कृत्रिमता के कथा में पिरोया है। विशेष रूप से पुराने फ़ारसी दस्तावेज़ों और आधुनिक डिजिटल व्यवस्था के बीच का द्वंद्व इतिहास और वर्तमान के टकराव का रूप ग्रहण कर लेता है। यहाँ प्रश्न महज ज़मीन का नहीं वरण स्मृति और अस्तित्व का है। यही कारण है कि कहानी सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ सांस्कृतिक विस्थापन की पीड़ा को भी समान तीव्रता से अभिव्यक्त करती है। कहानी का एक अत्यंत प्रभावशाली पक्ष इसका व्यंग्य है। वकीलों, दलालों और न्यायिक प्रक्रिया पर किया गया व्यंग्य तीखा होते हुए भी असंतुलित नहीं होता। लेखिका किसी संस्था का प्रत्यक्ष निषेध नहीं करती हैं बल्कि उन मानवीय प्रवृत्तियों को उजागर करती हैं जिन्होंने न्याय को व्यापार में बदल दिया है। मुस्तफ़ा का यह अनुभव कि हर नया सहारा अंततः एक नए शोषण में बदल जाता है, जो कहीं न कहीं पाठक को भीतर तक विचलित करता है। बाबा कमालुद्दीन और जिन्नातों वाला प्रसंग कहानी का सबसे अनूठा और बहुस्तरीय हिस्सा है। पहली दृष्टि में यह प्रसंग हास्य उत्पन्न करता है, किन्तु भीतर ही भीतर यह समाज में व्याप्त उस विवश आस्था को उद्घाटित करता है, जहाँ न्यायिक और प्रशासनिक असफलताओं के बाद मनुष्य अलौकिक शक्तियों में आश्रय खोजने लगता है। इम्तियाज़ का अदृश्य जिन्नातों को साइकिल पर बैठाकर ले जाना भारतीय लोकविश्वास, बालमन और सामाजिक विडम्बना का ऐसा दृश्य रचता है जो लंबे समय तक स्मृति में बना रहता है। इस पूरे प्रसंग में हास्य और करुणा का जो संतुलन दिखाई देता है वही कहानी को विशिष्ट बनाता है।
इम्तियाज़ का चरित्र कहानी के भविष्य का प्रतिनिधि है। उसके माध्यम से लेखिका ने यह दिखाया है कि अन्याय अगली पीढ़ी के सपनों को भी समय से पहले बूढ़ा कर देता है। उसकी अधूरी पढ़ाई, समय से पहले श्रम में उतर जाना और अंत में उसी साइकिल को नए रूप में सँजोकर रखना अत्यंत मार्मिक प्रतीक बन जाता है। वह साइकिल विश्वास, स्मृति और अनुत्तरित प्रश्नों का जीवंत रूपक बन जाती है। कहानी का अंतिम दृश्य इसी कारण अत्यंत प्रभावशाली बन पड़ता है, जहाँ उत्तरों से अधिक प्रतीक्षा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। समग्रतः यह कहानी केवल भूमि विवाद की कथा नहीं है; यह विश्वास के क्षरण, व्यवस्था की निर्ममता, बदलते सामाजिक यथार्थ, स्मृति, विरासत और मनुष्य की जिजीविषा का व्यापक आख्यान है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति यह है कि लेखिका किसी बड़े नारे या वैचारिक घोषणा-पत्र के सहारे नहीं चलती वह साधारण मनुष्यों के छोटे-छोटे अनुभवों से एक बड़े सामाजिक सत्य की रचना करती हैं। कहानी समाप्त होने के बाद भी मुस्तफ़ा, इम्तियाज़, वह साइकिल, वे पुराने कागज़ और मिट्टी की गंध पाठक के भीतर लंबे समय तक जीवित रहते हैं। यही किसी भी सफल कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
डॉ. अमित कुमार चौबे
सहायक आचार्य
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर
प्रिय उज़्मा,
‘समालोचन’ पर आपकी कहानी ‘गिर्दाब’ पढ़ी। अच्छी कहानी है। जिन्नात को कहानी में लाकर आपने जादुई हक़ीक़त की अच्छी कोशिश की है।
बाक़ी इस जद्दो-जहद में हम आपके साथ हैं।
बधाई।
सामयिक ज्वलंत मुद्दे पर उम्दा कहानी।