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Home » घर जाते : पवन करण

घर जाते : पवन करण

गुलाममोहम्मद शेख (1937, सुरेंद्रनगर, गुजरात) केवल चित्रकार ही नहीं, बल्कि कला-चिंतक और लेखक भी हैं. उनकी चित्रकला की बहुस्तरीय कथात्मकता में विभिन्न समय, स्थान और सांस्कृतिक संदर्भ एक साथ उपस्थित होते हैं. वे कविताएँ भी लिखते हैं. उनका गुजराती में ‘ઘેર જતાં’ शीर्षक से प्रकाशित गद्य-श्रृंखला हिंदी में ‘घर जाते’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है. इस कृति को गुजराती भाषा का साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है. हिंदी में इस विश्वप्रसिद्ध चित्रकार की इस पुस्तक का आना सुखद है. रज़ा फ़ाउंडेशन के सहयोग से इसका प्रकाशन हुआ है. इसकी सम्यक चर्चा कवि पवन करण कर रहे हैं. प्रस्तुत है.

by arun dev
April 1, 2026
in समीक्षा
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घर जाते : पवन करण
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घर जाते
जो कभी घर नहीं लौटा, वह कभी कहीं से, कहीं नहीं लौटा.
पवन करण

संवेदना एक कवि-लेखक और चित्रकार का निर्माण बाद में करती है, पहले वह उसे बड़ा इंसान बनाती है. हालाँकि कई प्रसंग इस धारणा को झुठलाते भी आये हैं. किंतु इस कथन को एक उदाहरण के रूप में देखना हो तो उसे मशहूर चित्रकार-लेखक गुलाममोहम्मद शेख के आत्मकथ्य ‘घर जाते’ को पढ़ना चाहिए, जिसमें गुलाममोहम्मद शेख चित्रकार और लेखक से अधिक एक शानदार, संवेदनशील और बेहतर मनुष्य के रूप में हमें मिलते हैं. वह शायद इसलिए भी संभव हो सका है कि टुकड़ों-टुकड़ों में लिखे और समय-समय पर विभिन्न पत्रिकाओं में गुजराती भाषा में प्रकाशित हुए अपने आत्मकथ्य में उन्होंने अपने मनुष्य स्वरूप को ही केंद्र में रखा है. संभवतया अपने चित्रकार और लेखक होने की जितनी कम बात वे कर सकते थे उन्होंने की है. जो उल्लेखनीय है.

गुमोशे (गुलाममोहम्मद शेख) ने अपने इस दीर्घमानवीय जीवनकथ्य को अपने जन्मस्थान, अपने परिजनों और मित्रों को मध्य में रखकर लिखा है. जिनमें वे अपने कथ्य के आखिरी तक में विचरते और अपनी स्मृति में जाकर उसे बार-बार उलटते-पलटते रहते हैं. कमाल है कि वे इसके लिए अपने एक घर के सामने खड़ी ऊंची-पुरानी और लंबी पत्थर की दीवार और उसमें पड़ने वाली लकीरों-दरारों को भी अपने आत्मकथ्य का हिस्सा बनाते हैं और उस दीवार के उस पार देख पाने, उसमें सूराख कर पाने की तीव्र जिज्ञासा और कौतुक पाठक से लगातार रोचक-मार्मिकता की उंगली पकड़कर चलने का आग्रह करता है. दरवाज़े से होकर घर के भीतर पड़ने वाली उसकी परछाई की ‘घूम’ का वर्णन भी उतना ही अनूठा है. आखिर घर के ऐन सामने खड़ी दीवार घर को कारावास और लोहे की सलाखों के अनुभव में बदल देती है. गुमोशे इसे नहीं कहते मगर ये भाव इस आत्मकथ्य के पाठक के मन पर उभरने लगता है. और फिर बस यही नहीं इस आत्मकथ्य में पाठक की चेतना में उमड़-घुमड़ करते ऐसे कई बेजोड़ प्रत्युत्पन्नमति भाव-उभार हैं. जो मन में मीठी गुदगुदी और होंठों पर छुपती-दिखती मुस्कान बनकर उभरते हैं. हम कल्पना करें क्या ये गुमोशे के बार-बार बरते जाते वे रंग हैं जो हमारे भीतर पैदा होते आश्चर्य को बढ़ा देते हैं.

गुलाममोहम्मद शेख की एक पेंटिंग

यह शैली की दुर्लभता है कि जब गुमोशे अपनी स्मृतियों के रंग में गुजराती भाषा के शब्दों को कूचियों में बदलकर समय के कैनवस पर अपना आत्मकथ्य लिखने बैठते हैं तब ही दादा, भाई, माँ और गुदड़ी जैसा ‘आत्मचित्र’ बना पाते हैं. घटनाओं, चलित-अचलित वस्तुओं, बसते-उजड़ते, बनते-बदलते स्थान और मनुष्य को देखने की उनकी दृष्टि की बारीकी और उसका कहीं खिलंदड़ और कहीं गंभीर विश्लेषण अलग हटकर और खास है. जिसे पकड़ते-परखते हुए मुंह से बस वाह निकलता है. हर कहीं अपनी आंख से देखे जा रहे का रेशा-रेशा टटोलना उन्हें आता है. यहाँ तक की वे अपनी कल्पना से उसमें एक या दो-चार रेशे और टांक देते हैं. जिस तरह से उन्होंने जीवन के आखिरी में खटिया पर लेटे अपने दादा को देखा है. कम-स-कम उनका वह देखना और दादा और खटिया को एक दृष्टि प्रदान कर देना अविस्मरणीय है. ठीक इसी तरह अपने संस्मरण में वह मृत्यु की बाट जोहती अपनी माँ को देखते है. माँ की मृत्यु नहीं होती, माँ मरकर मिट्टी में मिलती है और हम उस मिट्टी की ओर बार-बार लौटते हैं. मिट्टी में मिलने की अनिवार्यता लिए हम सब मिट्टी द्वारा ली जाती सांसो के उतार-चढ़ाव हैं.

मगर अपने भाई पर लिखे संस्मरण में वह जिस तरह समाज और परिवार में पुरुष एकाधिकार की परतों को उधेड़ते हैं वह पुरुष-प्रवृत्ति का प्रामाणिक और देखा-भोगा-भुगता प्रतीक बनकर सामने आता है. हम परखते हैं कि इसमें पुरुष सत्ता किस तरह पुरुषों को ही अपना शिकार बनाती है. इस हिस्से में स्त्री शोषण गौण है. मगर संपदा स्वामी और संरक्षक पुरुष का अपने ही सरीखे पुरुषों के पैरों में बेड़िया बनकर पड़ जाना और उनके आगे अपने पीछे या उनके खुद के ही पीछे घिसटने की परिस्थितियां पैदा कर देना मन-मस्तिष्क में दर्ज कर देने की तरह है. जीवन में, जीवन के हिसाब-किताब का पल-पल और पग-पग लिखकर रखने वाले उनके बड़े भाई जितने अनूठे रहे उन्होंने उसे कागज पर स्थान भी उतने ही अनूठेपन से दिया है. कि कैसे घर के ब्याह में आने के अनिच्छुक अपने भाई को वे एक ‘देखे और जाने-पहचाने प्रचलित दृश्य की तरह’ ब्याह में शामिल होने के लिए मना लाते हैं. पहचान कोई भी हो ये हमारे भारतीय परिवारों के पुरुष-मुखिया और सामाजिक-असामाजिक व्यक्ति की पहचान भी है. इस खंड को पढ़कर आपके

लिए अपने इर्दगिर्द ऐसा कोई भाई पहचान लेना आसान होगा. तब से वह आपके लिए भाई के स्थान पर गुमोशे के ‘घर जाते’ का पात्र होगा. समाज के बीच अनेक सक्रियताओं से बना एक देखा-जाना मगर इस तरह नहीं पहचाना पुरुष.

इस आत्मकथन की एक पहचान भारतीय होने की भी है. लगता ही नहीं कि इसमें कोई पहचान अपना पक्ष रख रही है. पहचान भेद इसमें बहुत कम और कहीं-कहीं उभरता है मगर उसमें किसी के प्रति नफरत का कोई भाव नहीं है. पीड़ित पक्ष (विक्टिम कार्ड) जैसी कहीं कोई बात नहीं है. बह तब भी नहीं है जब उन्हें 2002 गुजरात दंगों के दौरान बड़ोदरा से आग्रह भरा दबाव बनाकर किसी तरह हवाई जहाज से दिल्ली भेजा जाता है. जबकि वे अपनी पत्नी नीलू के साथ अपना बनाया घर छोड़ने को तैयार नहीं थे. और तब भी जब सोमनाथ से अयोध्या तक ‘भारतीयता की हत्यारी’ एक रथयात्रा निकलती है और आस्था के नाम पर अयोध्या में एक मस्जिद को ढहा दिया जाता है. इन कट्टर और पागलपन भरे सांप्रदायिक आपराधिक क्रियाकलापों पर अपने भीतर की भारतीय निराशा को गुमोशे भले ही अपने भीतर से बाहर नहीं आने देते हों मगर यहाँ उन्हें पढ़ने वाले उस पीड़ा को अपने भीतर महसूस कर लेते हैं.

इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है आम अल्पसंख्यक भारतीय मानस के लिए ये कितना कठिन दौर रहा होगा जब सबसे सहायता माँगते सांसद एहसान जाफ़री तक सांप्रदायिकता की इस आग में दफ़्न हो गये. भारत की कोई सरकार कभी ये भी सर्वे करवाये कि 2002 दंगों के बाद कितने अल्पसंख्यकों ने गुजरात से देश के भीतर पलायन किया. आगामी वर्षों में कितने परिवार वापस पहुंचे. वापस लौटे भी या नहीं. गुजरात से पलायनकर वे देश के किन राज्यों में बसे. ये आंकड़ा सबको चौका सकता है. याद खींचकर अल्पसंख्यक शरणार्थी शिविरों से असगर वजाहत की शाह आलम केंद्र की रूहों तक पहुंच जाती है. हिंसा के कितने ही संदर्भ, प्रमाण और तथ्य हमारे सामने आने लगते हैं. कितनी ही खबरें, चित्र और रिपोर्टें हमें फिर से पीड़ा से उपजी हताशा में धकेलने लगती हैं.

गुलाममोहम्मद शेख

अपने जीवन में हम भारतीयों ने ‘गुदड़ी के लाल’ वाली कहावत खूब सुनी है. मगर सचमुच के गुदड़ी के लाल ‘गुमोशे’ जैसा गुदड़ी पर लिखा ‘महीन’ संस्मरण शायद ही कभी पढ़ा हो. शब्दों की तकली पर क्या बारीक कताई की है उन्होंने गुदड़ी की. गुमोशे की कलम से भाषा के रास्ते मनुष्य जीवन की सहायक गुदड़ी किस तरह अपनी जीवन यात्रा करती है यह पढ़ना उछाल भरा रोचक है. गुदड़ी में जीवन भी है तो मृत्यु भी. रात भी है दिन भी. नींद भी है और जगार भी. युवा होने की पहचान भी है और कल्पना की सक्रियता भी. गुदड़ी में माँ के हाथ भी हैं तो यह भावना भी कि इसकी बुनावट में घर के सभी लोगों के पहने वस्त्र शामिल हों तो इसमें सोने वाले सभी बच्चों का उनसे जुड़ाव बने. उनका अदृश्य लगाव उन्हें मिले. और यह भी कि रात के अंधेरे में डूबी गुदड़ी अपने भीतर के अंधेरे में किसी युवा के युवा होने के अहसास सक्रिय कर देती है.

मगर गुदड़ी पर लिखे इस संस्मरण में गुदड़ी के लाल के रूप में गुमोशे ही नहीं एक ‘गुदड़ी की लाली’ भी है. जो तेजी से आते-जाते हुए ही गुमोशे का दिल उसकी छाती से बाहर खींचकर अपनी छाती ढकती फरिया में बांध लेती है. संस्मरण का यह भाग अलग भी हो सकता था मगर गुमोशे का यह पहला अनछुआ-अल्पदेखा प्रेम गुदड़ी पर लिखे संस्मरण का हिस्सा बन गया है. गुमोशे के इस प्रथम प्रेम में वही ताजगी, जुनून, नाज़ुकी, तलाश, बेचैनी, तथा आवेश और आवेग है जैसा आमतौर अ-दुनियादार प्रथम प्रेम में होता है. अधिकतर विफल होने वाले प्रथम प्रेम की तरह उनके प्रेम को असफल होना ही था. मगर गुमोशे के मन में उसकी स्मृति कितने गहरे और गाढ़े रंगों से भरी है ये हमें इसे पता चलता है.

गुमोशे ने ‘घर जाते’ में अपने चित्रकार होने के बारे में बहुत कम बात की है तो फिर यह भी हुआ है कि वह अपने चित्रकार साथियों के बारे भी कम बात कर पाये है. ‘रेजीडेंशी बंगला’ वाले संस्मरण में, जिसमें दीर्घावधि तक वे अपनी पत्नी के साथ रहे और वहीं उनके बच्चों ने जन्म लिया में वे जरूर अपने समकालीन चित्रकार मित्रों तथा अपने और उनके द्वारा बनाये जाने वाले चित्रों का जिक्र करते हैं. मगर उन्होंने अपनी किशोरावस्था में अपने से बड़े लेखक साथियों के साथ बिताये, रचनात्मक रूप से उर्वर-आवारा, जिसमें सीखने-करने को कितना था का ‘शब्द के शराबी: ‘शायर’ और शेखाणी’ में जीवन्त जिक्र किया है. दरअसल गुमोशे के लेखक और भारतीय-सामाजिक-मानस का निर्माण भी यहीं होता है. जिसमें वे भारतीय समाज के वैविध्य से परिचित होते हैं. जिसके चलते पहचान आधारित भेदभाव उन्हें अल्पसंख्यकों के लिए कठिन दौर में भी विचलित नहीं करता और वे घर ढूंढने और बनाने के क्रम में संयत बने रहते हैं. वे अपने अल्पसंख्यक होने की वजह से अपने ही बहुसंख्यक भारतीयों द्वारा उन्हें रहने के लिए घर न दिये जाने पर आक्रोशित नहीं होते. न ही गहरे अल्पसंख्यक-बोध में डूबते हैं. बल्कि इस आत्मकथ्य के अंश कैफ़ियत में हम उन्हें मनुष्यता-बोध से करीबी और अल्पसंख्यक-बोध से सम्मानित दूरी बनाता देखते हैं. उनकी परखी-पहचानी ठोस भारतीयता यहाँ काम आती है.

कैफ़ियत, कायनान्श, वीराने के जीव, उगाल, घर जाते, जाड़े की सुबह तथा घर खोजे, खोये और मिले सरीखे संवेदनशील और शानदार संस्मरणों से गुमोशे की दुनिया बनती है. इसमें चित्रात्मक बारीकी इतनी है कि ये हमें देखे जाने और पढ़े जाने के बीच के अपरिचित-अन्जान अहसास में गुमा देती है. इसे गुमोशे की शब्दों की ओट में छिपी चित्रात्मक-संस्मरणात्मक आत्मकथा कहा जा सकता है. गुमोशे की यह संस्मरणात्मक शब्द दुनिया प्रतिक्रिया लिखने वाले के समक्ष उसे इस पर और लिखने के लिए उकसाकर संकट खड़ा करती है. खटास को खारिज करते हुए जीवन को मिठास से भरती वह उसे ‘घर जाते’ की उस ट्रेन में बिठा देती है जो उसे फिर नीचे उतरने ही नहीं देती. मनुष्य को घर ले जाती ट्रेन से अच्छी कोई ‘गति’ नहीं. जो कोई कभी घर जाने के लिए रेल में नहीं बैठा. घर पहुंचने के लिए जिसने बस की यात्रा नहीं. जो कभी घर नहीं लौटा, वह कभी कहीं से, कहीं नहीं लौटा. कल्पना करता हूं कि ‘घर जाते’ गुजराती भाषा-रस से किस कदर भरी होगी. क्या अनुवाद के चलते रास्ते में इससे कुछ रस निचुड़-टपक गया होगा. काश ऐसा न हुआ हो. बिल्कुल न हुआ हो. अच्छे अनुवादकों के चलते हिंदी में आकर भी इससे जो रस झरता है वह कहीं गुजराती से कम न हो. इसे पढ़ने के दौरान ये ख्याल बराबर आता रहा.

 

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें.

 

पवन करण
(18 जून, 1964; ग्वालियर,म.प्र.)
प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित.
सम्मान : ‘रामविलास शर्मा पुरस्कार’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान आदि से सम्मानित.
pawankaran64@rediffmail.com
Tags: 20262026 समीक्षागुलाममोहम्मद शेखघर जातेपवन करणઘેર જતાં
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Comments 1

  1. अशोक अग्रवाल says:
    2 weeks ago

    भारत ही नहीं विश्व के एक महान चित्रकार पर बेहद महत्वपूर्ण किताब। इसके प्रस्तुति के लिए पवन करण और आपको बहुत-बहुत बधाई।

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